Harivamsha Purana
149
अध्याय 149 / 318

Parva 2, Adhyāya 94

51 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ51 श्लोक

अध्याय 149

श्लोक 1

प्रद्युम्नप्रभावत्योः गान्धर्वविवाहं समागमं च, तदनन्तरं गदचन्द्रवत्योः एवं साम्बगुणवत्योः गान्धर्वविवाहं आविष्टेयं मया बाला सर्वथेत्यवगम्य तु ।कार्ष्णिर्हृष्टेन मनसा हंसीमिदमुवाच ह

pradyumnaprabhāvatyoḥ gāndharvavivāhaṃ samāgamaṃ ca, tadanantaraṃ gadacandravatyoḥ evaṃ sāmbaguṇavatyoḥ gāndharvavivāhaṃ āviṣṭeyaṃ mayā bālā sarvathetyavagamya tu | kārṣṇirhṛṣṭena manasā haṃsīmidamuvāca ha

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! श्रीकृष्णकुमार [म्नने जब यह समझ लिया कि असुरबाला प्रभावतीपर था मेरा (कामका) आवेश हो गया है, तब वे प्रसन्न से हंसीसे इस प्रकार बोले—

अध्याय 149

श्लोक 2

दैत्येन्द्रतनयां प्राप्तमवगच्छस्व मामिह ।षट्पदैः सह षट्पादो भूत्वा माल्ये निलीय हि

daityendratanayāṃ prāptamavagacchasva māmiha | ṣaṭpadaiḥ saha ṣaṭpādo bhūtvā mālye nilīya hi

श्लोक 2–4 का हिन्दी अर्थ

विहड़मे ! तुम्हें नूम होना चाहिये कि मैं भ्रमरोंके साथ श्रमर बनकर ग मालामें लुक-छिपकर यहाँ दैत्यराजकुमारी प्रभावतीके तर आ गया हूँ (तुम इसे मेरे आगमनकी सूचना दो) । प्रभावतीका आज्ञापालक हूँ। वह मेरे प्रति जैसा चाहे वि कर सकती है'। राजन्‌! ऐसा कहकर सुन्दर वाले प्रद्युम्नने उसे अपने रूपका दर्शन कराया। वह नादपृष्ठ प्रज्ञावान्‌ प्रद्यु्नकी प्रभासे प्रकाशित हो उठा। की कान्तिसे चन्द्रमाकी सुन्दर कान्ति भी तिरस्कृत गयी

अध्याय 149

श्लोक 3

विधेयोऽस्मि प्रभावत्या यथेष्टं मयि वर्तताम् ।इत्युक्त्वा दर्शयामास सुरूपो रूपमात्मनः

vidheyo'smi prabhāvatyā yatheṣṭaṃ mayi vartatām | ityuktvā darśayāmāsa surūpo rūpamātmanaḥ

अर्थ श्लोक 2 के साथ

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श्लोक 4

तद्धर्म्यपृष्ठं प्रभया द्योतितं तस्य धीमतः ।अभिभूता प्रभा चैव राजंश्चन्द्रोद्भवा शुभा

taddharmyapṛṣṭhaṃ prabhayā dyotitaṃ tasya dhīmataḥ | abhibhūtā prabhā caiva rājaṃścandrodbhavā śubhā

अर्थ श्लोक 2 के साथ

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श्लोक 5

प्रभावत्यास्तु तं दृष्ट्वा ववृधे कामसागरः ।चन्द्रस्येवोदये प्राप्ते पर्वण्यां सरितां पतिः

prabhāvatyāstu taṃ dṛṣṭvā vavṛdhe kāmasāgaraḥ | candrasyevodaye prāpte parvaṇyāṃ saritāṃ patiḥ

हिन्दी अर्थ

प्रद्युप्रको देखते ही प्रभावतीके कामरूपी द्रमें ज्वार आ गया; ठीक उसी तरह, जैसे पूर्ण द्रोदयका पर्व प्राप्त होनेपर सरिताओंके स्वामी समुद्रमें ढ़ आ जाती है

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श्लोक 6

सलज्जाधोमुखी किञ्चित्किञ्चित्तिर्यगवेक्षिणी ।प्रभावती तदा तस्थौ निश्चलं कमलेक्षणा

salajjādhomukhī kiñcitkiñcittiryagavekṣiṇī | prabhāvatī tadā tasthau niścalaṃ kamalekṣaṇā

हिन्दी अर्थ

प्रभावतीका मुख लज्जासे कुछ ्रेको झुक गया तो भी वह कुछ-कुछ तिरछी चितवनसे ने प्राणवल्लभकी ओर देख लेती थी। उस समय पलनयनी प्रभावती स्थिरभावसे खड़ी थी

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श्लोक 7

करेणाधःप्रदेशे तां चारुभूषणभूषिताम् ।स्पृष्ट्वोवाच वरारोहां रोमाञ्चिततनुस्ततः

kareṇādhaḥpradeśe tāṃ cārubhūṣaṇabhūṣitām | spṛṣṭvovāca varārohāṃ romāñcitatanustataḥ

हिन्दी अर्थ

मनोहर आभूषणोंसे विभूषित हुई सुन्दराज्ी प्रभावतीके मुखके नीचेके भाग (ठोढ़ी )-का हाथसे स्पर्श करके प्रदयुम्मका शरीर पुलकित हो गया। वे उससे इस प्रकार बोले—

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श्लोक 8

मनोरथशतैर्लब्धं किं पूर्णेन्दुसमप्रभम् ।अधोमुखं मुखं कृत्वा न मां किञ्चित्प्रभाषसे

manorathaśatairlabdhaṃ kiṃ pūrṇendusamaprabham | adhomukhaṃ mukhaṃ kṛtvā na māṃ kiñcitprabhāṣase

श्लोक 8–9 का हिन्दी अर्थ

सुमुखि ! तुम्हारा यह पूर्ण चन्द्रमाके समान कान्तिमान्‌ मुख मुझे सैकड़ों मनोरथोंके द्वारा आज प्राप्त हुआ है। तुम इसे नीचेकी ओर करके मुझसे कुछ बोलती क्यों नहीं हो? तुम अपने मुखचन्द्रकी प्रभाका इस तरह तिरस्कार या लोभ न करो। भीरु! भय छोड़ो और इस दासपर भलीभाँति अनुग्रह करो

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श्लोक 9

प्रभोपमर्दं मा कार्षीर्वदनस्य वरानने ।साध्वसं त्यज्यतां भीरु दासः साध्वनुगृह्यताम्

prabhopamardaṃ mā kārṣīrvadanasya varānane | sādhvasaṃ tyajyatāṃ bhīru dāsaḥ sādhvanugṛhyatām

अर्थ श्लोक 8 के साथ

अध्याय 149

श्लोक 10

न कालमिव पश्यामि भीरु भीरुत्वमुत्सृज ।याचाम्येषोऽञ्जलिं कृत्वा प्राप्तकालं निबोध मे

na kālamiva paśyāmi bhīru bhīrutvamutsṛja | yācāmyeṣo'ñjaliṃ kṛtvā prāptakālaṃ nibodha me

हिन्दी अर्थ

भीरु! तुम्हारा यह सलज्ज मौनभाव मुझे इस समयके लिये उपयुक्त-सा नहीं दिखायी देता। भय त्याग दो। इसके लिये मैं यह हाथ जोड़कर याचना करता हूँ। समयोचित कर्तव्य क्या है—यह मुझसे सुनो

अध्याय 149

श्लोक 11

गान्धर्वेण विवाहेन कुरुष्वानुग्रहं मम ।देशकालानुरूपेण रूपेणाप्रतिमा सती

gāndharveṇa vivāhena kuruṣvānugrahaṃ mama | deśakālānurūpeṇa rūpeṇāpratimā satī

हिन्दी अर्थ

संसारमें तुम्हारे रूपकी कहीं तुलना नहीं है। तुम देश-कालके अनुरूप गान्धर्व-विवाह करके मुझपर अनुग्रह करो'

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श्लोक 12

उपस्पृश्य ततो भैमो मणिस्थं जातवेदसम् ।जुहाव समये वीरः पुष्पैर्मन्त्रानुदीरयन्

upaspṛśya tato bhaimo maṇisthaṃ jātavedasam | juhāva samaye vīraḥ puṣpairmantrānudīrayan

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर वीर यादव प्रद्यु्नन आचमन करके सूर्यकान्तमणिमें स्थित अग्निदेवको प्रकट किया और उस समय मन्त्रोंका उच्चारण करते हुए पुष्पोंद्वारा आहुति दी

अध्याय 149

श्लोक 13

जग्राहाथ करं तस्या वराभरणभूषितम् ।चक्रे प्रदक्षिणं चैवं तं मणिस्थं हुताशनम्

jagrāhātha karaṃ tasyā varābharaṇabhūṣitam | cakre pradakṣiṇaṃ caivaṃ taṃ maṇisthaṃ hutāśanam

हिन्दी अर्थ

तत्पश्चात्‌ उन्होंने प्रभावतीके सुन्दर आभूषणोंसे विभूषित हाथको अपने हाथमें लिया और सूर्यकान्तमणिमें विराजमान आअग्निदेवकी परिक्रमा की

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श्लोक 14

प्रजज्वाल स तेजस्वी मानयन्नच्युतात्मजम् ।भगवाञ्जगतः साक्षी शुभस्याथाशुभस्य च

prajajvāla sa tejasvī mānayannacyutātmajam | bhagavāñjagataḥ sākṣī śubhasyāthāśubhasya ca

हिन्दी अर्थ

उस समय सम्पूर्ण जगत्‌के शुभाशुभके साक्षी तेजस्वी भगवान्‌ अग्निदेव अच्युतकुमार प्रद्युम्मका आदर करते हुए वहाँ प्रज्वलित हो उठे

अध्याय 149

श्लोक 15

उद्दिश्य दक्षिणां वीरो विप्राणां यदुनन्दनः ।उवाच हंसीं द्वारस्थां तिष्ठावां रक्ष पक्षिणि

uddiśya dakṣiṇāṃ vīro viprāṇāṃ yadunandanaḥ | uvāca haṃsīṃ dvārasthāṃ tiṣṭhāvāṃ rakṣa pakṣiṇi

हिन्दी अर्थ

इसके बाद वीर यदुनन्दनने ब्राह्मणोंके उद्देश्यसे दक्षिणा संकल्प करके द्वारपर खड़ी हुई हंसीसे कहा—' पक्षिणि! तुम इस भवनके बाहरी द्वारपर खड़ी रहो और हम दोनोंको दूसरोंकी दृष्टि पड़नेसे बचाओ '

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श्लोक 16

तस्यां प्रणम्य यातायां कामस्तां चारुलोचनाम् ।प्रहाय दक्षिणे हस्ते निनाय शयनोत्तमम्

tasyāṃ praṇamya yātāyāṃ kāmastāṃ cārulocanām | prahāya dakṣiṇe haste nināya śayanottamam

हिन्दी अर्थ

यह सुनकर हंसी उन्हें प्रणाम करके चली गयी। तब प्र्ुम्न मनोहर नेत्रोंवाली प्रभावतीका दाहिना हाथ पकड़कर उसे सुन्दर शय्यापर ले गये

अध्याय 149

श्लोक 17

ऊरावेवोपवेश्यैनां सान्त्वयित्वा पुनः पुनः ।चुचुम्ब शनकैर्गण्डं वासयन् मुखमारुतैः

ūrāvevopaveśyaināṃ sāntvayitvā punaḥ punaḥ | cucumba śanakairgaṇḍaṃ vāsayan mukhamārutaiḥ

हिन्दी अर्थ

वहाँ उसे अपनी जाँघपर ही बिठाकर उन्होंने बारम्बार सान्त्वना दी और अपने मुखकी सुगन्धित वायुसे उसके कपोलको सुवासित करते हुए धीरेसे उसको चूम लिया

अध्याय 149

श्लोक 18

ततोऽस्याश्च पपौ वक्त्रपद्मं मधुकरो यथा ।आलिलिङ्गे च सुश्रोणीं क्रमेण रतिकोविदः

tato'syāśca papau vaktrapadmaṃ madhukaro yathā | āliliṅge ca suśroṇīṃ krameṇa ratikovidaḥ

हिन्दी अर्थ

तत्पश्चात्‌ जैसे भ्रमर प्रफुल्ल कमलके मकरन्दका पान करता है, उसी प्रकार वे उसके मुखारविन्दका—उसके अधरोंका रस पीने लगे। फिर क्रमश: रति-कला-कुशल प्रद्युम्नने मनोहर नितम्बवाली प्रभावतीका पूर्णरूपसे आलिड्न किया

अध्याय 149

श्लोक 19

अरीरमद् रहस्येनां न चोद्वेजितवांस्तदा ।अपकृष्टं चरत्यर्थं रतिकार्यविशारदः ।उवास स तया सार्द्धं रमन् कृष्णसुतः प्रभुः

arīramad rahasyenāṃ na codvejitavāṃstadā | apakṛṣṭaṃ caratyarthaṃ ratikāryaviśāradaḥ | uvāsa sa tayā sārddhaṃ raman kṛṣṇasutaḥ prabhuḥ

हिन्दी अर्थ

उध्याय: + ७४५ रतिकला-कोविद एवं सामर्थ्यशाली श्रीकृष्णकुमार द्युप्न उसके साथ एकान्तमें रमण करने लगे। वे उसे द्वि्र नहीं करते थे। कोई क्षुद्र बर्ताव (बलात्कार पादि) भी नहीं करते थे। उसके साथ रमण करते ए वे रातभर वहीं रहे

अध्याय 149

श्लोक 20

अरुणोदयकाले च ययौ यत्र नटालयम् ।अकामया प्रभावत्या कथञ्चित्स विसर्जितः

aruṇodayakāle ca yayau yatra naṭālayam | akāmayā prabhāvatyā kathañcitsa visarjitaḥ

हिन्दी अर्थ

अरुणोदय-कालमें वे हीं चले गये, जहाँ नटोंका स्थान था। प्रभावती नहीं ाहती थी कि वे एक क्षणके लिये भी उससे अलग ं तथापि किसी तरह उसने उस समय उन्हें विदा क्रिया

अध्याय 149

श्लोक 21

तामेव मनसा कान्तां कान्तरूपां समुद्वहन् ।त ऊषुर्नटवेषेण कार्यार्थं भैमवंशजाः

tāmeva manasā kāntāṃ kāntarūpāṃ samudvahan | ta ūṣurnaṭaveṣeṇa kāryārthaṃ bhaimavaṃśajāḥ

श्लोक 21–25 का हिन्दी अर्थ

इस तरह समयकी प्रतीक्षा करते ए वहाँ निवास करनेवाले बुद्धिमान्‌ यादववीरोंके समक्ष र्षा-ऋतु प्राप्त हुई, जो समस्त प्राणियोंके लिये रमणीय व॑ मनोहर है

अध्याय 149

श्लोक 22

प्रतीक्षन्तस्तदा वाक्यमिन्द्रकेशवयोस्तदा ।उद्योगं वज्रनाभस्य त्रैलोक्यविजयं प्रति

pratīkṣantastadā vākyamindrakeśavayostadā | udyogaṃ vajranābhasya trailokyavijayaṃ prati

अर्थ श्लोक 21 के साथ

अध्याय 149

श्लोक 23

प्रतीक्षन्तो महात्मानो गुह्यसंरक्षणे रताः ।कश्यपस्य मुनेः सत्रं यावत् तावन्नराधिप

pratīkṣanto mahātmāno guhyasaṃrakṣaṇe ratāḥ | kaśyapasya muneḥ satraṃ yāvat tāvannarādhipa

अर्थ श्लोक 21 के साथ

अध्याय 149

श्लोक 24

देवासुराणां सर्वेषामविरोधो महात्मनाम् ।त्रैलोक्यविजयार्थाय यततां धर्मचारिणाम्

devāsurāṇāṃ sarveṣāmavirodho mahātmanām | trailokyavijayārthāya yatatāṃ dharmacāriṇām

अर्थ श्लोक 21 के साथ

अध्याय 149

श्लोक 25

एवं कालं प्रतीक्षाणां वसतां तत्र धीमताम् ।सम्प्राप्तः प्रावृषो रम्यः सर्वभूतमनोहरः

evaṃ kālaṃ pratīkṣāṇāṃ vasatāṃ tatra dhīmatām | samprāptaḥ prāvṛṣo ramyaḥ sarvabhūtamanoharaḥ

अर्थ श्लोक 21 के साथ

अध्याय 149

श्लोक 26

अहर्निशं च वृत्तान्तं प्रयच्छन्ति मनोजवाः ।शक्रकेशवयोर्हंसाः कुमाराणां महात्मनाम्

aharniśaṃ ca vṛttāntaṃ prayacchanti manojavāḥ | śakrakeśavayorhaṃsāḥ kumārāṇāṃ mahātmanām

हिन्दी अर्थ

मनके समान वेगशाली हंस उन हामनस्वी यादवकुमारोंको प्रतिदिन इन्द्र और श्रीकृष्णका ममाचार दिया करते थे

अध्याय 149

श्लोक 27

रेमे सह प्रभावत्या प्रद्युम्नश्चानुरूपया ।रात्रौ रात्रौ महातेजा धार्तराष्ट्राभिरक्षितः

reme saha prabhāvatyā pradyumnaścānurūpayā | rātrau rātrau mahātejā dhārtarāṣṭrābhirakṣitaḥ

हिन्दी अर्थ

प्रत्येक रात्रिको हंसोंसे रक्षित हुए महातेजस्वी प्रद्युम्न अपनी मनोऊनुरूप भार्या भावतीके साथ रमण करते थे

अध्याय 149

श्लोक 28

तैर्हि वज्रपुरं हंसैर्वसद्भिर्वासवाज्ञया ।व्याप्तं नृप नटांस्तांश्च न विदुः कालमोहिताः

tairhi vajrapuraṃ haṃsairvasadbhirvāsavājñayā | vyāptaṃ nṛpa naṭāṃstāṃśca na viduḥ kālamohitāḥ

हिन्दी अर्थ

नरेश्वर ! इन्द्रकी पाज्ञासे वज़पुरमें निवास करनेवाले हंसोंसे वह सारा गर व्याप्त हो रहा था; परंतु कालसे मोहित हुए दानव ह नहीं जानते थे कि वास्तवमें वे हंस और वे नट गैन हैं?

अध्याय 149

श्लोक 29

दिवापि रौक्मिणेयस्तु प्रभावत्या नृपालये ।तिष्ठत्यन्तर्हितो वीरो हंससङ्घाभिरक्षितः

divāpi raukmiṇeyastu prabhāvatyā nṛpālaye | tiṣṭhatyantarhito vīro haṃsasaṅghābhirakṣitaḥ

हिन्दी अर्थ

राजन्‌! वीर रुक्मिणीकुमार दिनमें गी हंससमुदायसे सुरक्षित हो छिपे रूपसे प्रभावतीके रमें रहते थे

अध्याय 149

श्लोक 30

माययास्य प्रतिच्छाया दृश्यते हि नटालये ।देहार्धेन तु कौरव्य सिषेवेऽसौ प्रभावतीम्

māyayāsya praticchāyā dṛśyate hi naṭālaye | dehārdhena tu kauravya siṣeve'sau prabhāvatīm

हिन्दी अर्थ

कुरुनन्दन! मायासे उनकी ायामात्र नटोंके स्थानमें दिखायी देती थी। वे अपने पाधे शरीरसे प्रभावतीका ही सेवन करते थे

अध्याय 149

श्लोक 31

सन्नतिं विनयं शीलं लीलां दाक्ष्यमथार्जवम् ।स्पृहयन्त्यसुरा दृष्ट्वा विद्वत्तां च महात्मनाम्

sannatiṃ vinayaṃ śīlaṃ līlāṃ dākṣyamathārjavam | spṛhayantyasurā dṛṣṭvā vidvattāṃ ca mahātmanām

हिन्दी अर्थ

न महामनस्वी नटोंकी विनय, प्रणति, शील, लीला, आतुरी, सरलता और विद्वत्ता देखकर असुर सदा ही न्हें चाहते रहते थे

अध्याय 149

श्लोक 32

रूपं विलासं गन्धं च मञ्जुभाषामथार्यताम् ।तासां यादवनारीणां स्पृहयन्त्यसुरस्त्रियः

rūpaṃ vilāsaṃ gandhaṃ ca mañjubhāṣāmathāryatām | tāsāṃ yādavanārīṇāṃ spṛhayantyasurastriyaḥ

हिन्दी अर्थ

उन असुरोंकी स्त्रियाँ भी यादवकुमारोंके साथ आयी हुई सुन्दरियोंके रूप, विलास, सुगन्ध, मनोहर बोली और श्रेष्ठ स्वभावकी सदा ही अभिलाषा करती थीं

अध्याय 149

श्लोक 33

वज्रनाभस्य तु भ्राता सुनाभो नाम विश्रुतः ।दुहितृद्वयं च नृपते तस्य रूपगुणान्वितम्

vajranābhasya tu bhrātā sunābho nāma viśrutaḥ | duhitṛdvayaṃ ca nṛpate tasya rūpaguṇānvitam

हिन्दी अर्थ

वज़नाभके एक भाई था, जो सुनाभ नामसे विख्यात था। नरेध्र! उसके दो पुत्रियाँ थीं, जो सुन्दर रूप और उत्तम गु्णोंसे युक्त थीं

अध्याय 149

श्लोक 34

एका चन्द्रवती नाम्ना गुणवत्यथ चापरा ।प्रभावत्यालयं ते तु व्रजतः खलु नित्यदा

ekā candravatī nāmnā guṇavatyatha cāparā | prabhāvatyālayaṃ te tu vrajataḥ khalu nityadā

हिन्दी अर्थ

उनमेंसे एकका नाम चन्द्रवती और दूसरीका नाम गुणवती था। वे प्रतिदिन प्रभावतीके महलमें जाया करती थीं

अध्याय 149

श्लोक 35

ददृशाते तु ते तत्र रतिसक्तां प्रभावतीम् ।परिपप्रच्छतुश्चैव विस्रम्भोपगतां सतीम्

dadṛśāte tu te tatra ratisaktāṃ prabhāvatīm | paripapracchatuścaiva visrambhopagatāṃ satīm

हिन्दी अर्थ

उन दोनोंने वहाँ प्रभावतीको रतिमें आसक्त देखा। सती- साध्वी प्रभावतीका अपनी इन दोनों बहिनोंपर बड़ा विश्वास था; अत: इन दोनोंने उससे पूछा—(बहिन! तुम किसके साथ क्रीड़ा करती हो ?')

अध्याय 149

श्लोक 36

सोवाच मम विद्यास्ति याधीता काङ्क्षितं पतिम् ।रत्यर्थं साऽऽनयत्याशु सौभाग्यं च प्रयच्छति

sovāca mama vidyāsti yādhītā kāṅkṣitaṃ patim | ratyarthaṃ sā''nayatyāśu saubhāgyaṃ ca prayacchati

श्लोक 36–39 का हिन्दी अर्थ

प्रभावती बोली-' मेरे पास एक विद्या है, जिसका अध्ययन कर लेनेपर वह रतिके लिये शीघ्र ही मनोवाज्छित पतिको ला देती है और सौभाग्य प्रदान करती है। अभिलषित पुरुष देवता हो या दानव, यह विद्या उसे तत्काल विवश करके अपने पास उसे ला देती है। *अत: मैं उसी विद्याके प्रभावसे परम बुद्धिमान्‌ देवकुमारको अपना प्राणवल्लभ बनाकर उनके साथ रमण करती हूँ। देखो, मेरे या मेरी विद्याके प्रभावसे प्रद्युम्न मेरे अत्यन्त प्रिय हो गये हैं'। उनके रूप और यौवनकी सम्पत्ति देखकर उन दोनों बहनोंको बड़ा विस्मय हुआ। फिर मनोहर हास्यवाली सुन्दरी प्रभावतीने उन दोनों बहनोंसे यह समयोचित बात कही-

अध्याय 149

श्लोक 37

देवं वा दानवं वापि विवशं सद्य एव हि ।साहं रमामि कान्तेन देवपुत्रेण धीमता

devaṃ vā dānavaṃ vāpi vivaśaṃ sadya eva hi | sāhaṃ ramāmi kāntena devaputreṇa dhīmatā

अर्थ श्लोक 36 के साथ

अध्याय 149

श्लोक 38

दृश्यतां मत्प्रभावेण प्रद्युम्नः सुप्रियो मम ।ते दृष्ट्वा विस्मयं याते रूपयौवनसम्पदम्

dṛśyatāṃ matprabhāveṇa pradyumnaḥ supriyo mama | te dṛṣṭvā vismayaṃ yāte rūpayauvanasampadam

अर्थ श्लोक 36 के साथ

अध्याय 149

श्लोक 39

पुनरेवाब्रवीत् ते तु भगिन्यौ चारुहासिनी ।प्रभावती वरारोहा कालप्राप्तमिदं वचः

punarevābravīt te tu bhaginyau cāruhāsinī | prabhāvatī varārohā kālaprāptamidaṃ vacaḥ

अर्थ श्लोक 36 के साथ

अध्याय 149

श्लोक 40

देवा धर्मरता नित्यं दम्भशीला महासुराः ।देवास्तपसि रक्ता हि सुखे रक्ता महासुराः

devā dharmaratā nityaṃ dambhaśīlā mahāsurāḥ | devāstapasi raktā hi sukhe raktā mahāsurāḥ

हिन्दी अर्थ

देवता सदा धर्ममें तत्पर रहते हैं और महान्‌ असुर दम्भी होते हैं। देवता तपस्यामें अनुरक्त होते हैं और महान्‌ असुर सुखमें आसक्त

अध्याय 149

श्लोक 41

देवाः सत्ये रता नित्यमनृते तु महासुराः ।धर्मस्तपश्च सत्यं च यत्र तत्र जयो धुवम्

devāḥ satye ratā nityamanṛte tu mahāsurāḥ | dharmastapaśca satyaṃ ca yatra tatra jayo dhuvam

हिन्दी अर्थ

देवता सदा सत्यमें तत्पर रहते हैं तो महान्‌ असुर असत्यमें। जहाँ धर्म, तप और सत्य होता है, उसी पक्षको युद्धमें निश्चितरूपसे विजय प्राप्त होती है

अध्याय 149

श्लोक 42

देवपुत्रौ वरयतां पतिविद्यां ददाम्यहम् ।उचितौ मत्प्रभावेण सद्य एवोपलप्स्यथः

devaputrau varayatāṃ patividyāṃ dadāmyaham | ucitau matprabhāveṇa sadya evopalapsyathaḥ

हिन्दी अर्थ

अत: तुम दोनों भी दो सुयोग्य देवकुमारोंका वरण कर लो। पतिकी प्राप्ति करानेवाली यह विद्या मैं तुम्हें देती हूँ। तुम मेरे प्रभावसे तत्काल ही अभीष्ट पति प्राप्त कर लोगी '

अध्याय 149

श्लोक 43

तां तथेत्यूचतुर्हृष्टे भगिन्यौ चारुलोचनाम् ।परिपप्रच्छ भैमं च कार्यं तत् पतिमानिनी

tāṃ tathetyūcaturhṛṣṭe bhaginyau cārulocanām | paripapraccha bhaimaṃ ca kāryaṃ tat patimāninī

हिन्दी अर्थ

तब वे दोनों बहनें अत्यन्त हर्षमें भरकर चारुलोचना प्रभावतीसे बोलीं—* बहुत अच्छा।' तदनन्तर पतिको आदर देनेवाली प्रभावतीने प्रदयुप्से उस कार्यके विषयमें पूछा

अध्याय 149

श्लोक 44

स पितृव्यं गदं वीरं साम्बं चाथाब्रवीत् तदा ।रूपान्वितौ सुशीलौ च शूरौ च रणकर्मणि

sa pitṛvyaṃ gadaṃ vīraṃ sāmbaṃ cāthābravīt tadā | rūpānvitau suśīlau ca śūrau ca raṇakarmaṇi

हिन्दी अर्थ

प्रद्युप्नने उस समय अपने चाचा वीरवर गद और भाई साम्बका नाम बताया और कहा—वे दोनों सुन्दर रूपवाले, सुशील तथा युद्धकर्ममें शूरवीर हैं'

अध्याय 149

श्लोक 45

परितुष्टेन दत्ता मे विद्या दुर्वाससा पुरा ।परितुष्टेन सौभाग्यं सदा कन्यात्वमेव च

parituṣṭena dattā me vidyā durvāsasā purā | parituṣṭena saubhāgyaṃ sadā kanyātvameva ca

हिन्दी अर्थ

इध्याय;: * ७४७ तब प्रभावती अपनी दोनों बहनोंसे बोली—र्वकालमें सेवासे संतुष्ट हुए दुर्बासामुनिने मुझे यह विद्या दी; साथ ही अखण्ड सौभाग्य तथा सदा कन्या- नैसी बनी रहनेका वरदान दिया

अध्याय 149

श्लोक 46

देवदानवयक्षाणां यं ध्यास्यति स ते पतिः ।भवितेति मया चैव वीरोऽयमभिकाङ्क्षितः

devadānavayakṣāṇāṃ yaṃ dhyāsyati sa te patiḥ | bhaviteti mayā caiva vīro'yamabhikāṅkṣitaḥ

हिन्दी अर्थ

उन्होंने यह पी कहा था कि तुम देवता, दानव तथा यक्षोंमेंसे जिसका चिन्तन करोगी, वही तुम्हारा पति होगा। उनके स वरदानके अनुसार मैंने इन्हीं वीर प्रद्युप्रको अपना तति बनानेकी इच्छा की

अध्याय 149

श्लोक 47

गृह्णीतं तदिमां विद्यां सद्यो वां प्रियसङ्गमः ।ततो जगृहतुर्हृष्टे तां विद्यां भगिनीमुखात्

gṛhṇītaṃ tadimāṃ vidyāṃ sadyo vāṃ priyasaṅgamaḥ | tato jagṛhaturhṛṣṭe tāṃ vidyāṃ bhaginīmukhāt

हिन्दी अर्थ

अत: तुम दोनों ही स विद्याको ग्रहण करो। इससे तुम्हें तत्काल ही प्रयतमका समागम प्राप्त होगा। यह सुनकर हर्षमें भरी ुई उन दोनों बहनोंने बहन प्रभावतीके मुखसे वह वद्या ग्रहण की

अध्याय 149

श्लोक 48

दध्यतुर्गदसाम्बौ च विद्यामभ्यस्य ते शुभे ।तौ प्रद्युम्नेन सहितौ प्रविष्टौ भैमनन्दनौ

dadhyaturgadasāmbau ca vidyāmabhyasya te śubhe | tau pradyumnena sahitau praviṣṭau bhaimanandanau

हिन्दी अर्थ

उन शुभलक्षणा कन्याओंने वद्याका अभ्यास करके गद और साम्बका ध्यान किया; फेर तो वे दोनों यादवकुमार गद और साम्ब प्रद्युप्नके माथ ही उस महलमें प्रविष्ट हुए

अध्याय 149

श्लोक 49

प्रच्छन्नौ मायया वीरौ कार्ष्णिना मायिना नृप ।गान्धर्वेण विवाहेन तावप्यरिबलार्दनौ

pracchannau māyayā vīrau kārṣṇinā māyinā nṛpa | gāndharveṇa vivāhena tāvapyaribalārdanau

श्लोक 49–50 का हिन्दी अर्थ

नरेश्वर ! मायावी द्युम्ने अपनी मायासे उन दोनों वीरोंको छिपाकर हाँ उपस्थित किया था। शत्रुसेनाका संहार करनेवाले न दोनों वीरोंने भी गान्धर्व-विवाहकी विधिसे न्त्रोच्चारणपूर्वक उन कन्याओंका पाणिग्रहण किया। बे दोनों ही सत्पुरुषोंके प्रिय थे। चन्द्रवतीके साथ द और गुणवतीके साथ केशवकुमार साम्बका विवाह डुआ

अध्याय 149

श्लोक 50

पाणिं जगृहतुर्वीरौ मन्त्रपूर्वं सतां प्रियौ ।चन्द्रवत्या गदः साम्बो गुणवत्या च कैशविः

pāṇiṃ jagṛhaturvīrau mantrapūrvaṃ satāṃ priyau | candravatyā gadaḥ sāmbo guṇavatyā ca kaiśaviḥ

अर्थ श्लोक 49 के साथ

अध्याय 149

श्लोक 51

रेमिरेऽसुरकन्याभिर्वीरास्ते यदुपुङ्गवाः ।मार्गमाणास्त्वनुज्ञां ते शक्रकेशवयोस्तदा

remire'surakanyābhirvīrāste yadupuṅgavāḥ | mārgamāṇāstvanujñāṃ te śakrakeśavayostadā

हिन्दी अर्थ

इस तरह वे तीनों यदुपुज्ञव वीर न दिनों इन्द्र और श्रीकृष्णके आदेशकी प्रतीक्षा करते ुए उन असुरकन्याओंके साथ रमण करने लगे

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.