Harivamsha Purana
151
अध्याय 151 / 318

Parva 2, Adhyāya 96

70 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ70 श्लोक

अध्याय 151

श्लोक 1

कश्यपेन निषिद्धोपि वज्रनाभस्य त्रिलोकविजयाय प्रस्थानं, श्रीकृष्ण-इन्द्राभ्यां प्रद्युम्नाय सन्देशदानं एवं तेषां सन्ततीनां प्रभावस्य उल्लेखं, दैत्येभिः प्रद्युम्नादीनां पुत्राणां बन्धनं, प्रभावत्यादिना स्वपतीन् असीन् प्रदत्वा युद्धाय प्रेषणम्, इन्द्रेण तेषां साहाय्यं एवं प्रद्युम्नस्य अद्भुतं पराक्रमम् ।सत्रावसाने च मुनेः कश्यपस्यातितेजसः ।जग्मुर्देवासुराः स्वानि स्थानान्यमितविक्रमाः

kaśyapena niṣiddhopi vajranābhasya trilokavijayāya prasthānaṃ, śrīkṛṣṇa-indrābhyāṃ pradyumnāya sandeśadānaṃ evaṃ teṣāṃ santatīnāṃ prabhāvasya ullekhaṃ, daityebhiḥ pradyumnādīnāṃ putrāṇāṃ bandhanaṃ, prabhāvatyādinā svapatīn asīn pradatvā yuddhāya preṣaṇam, indreṇa teṣāṃ sāhāyyaṃ evaṃ pradyumnasya adbhutaṃ parākramam | satrāvasāne ca muneḥ kaśyapasyātitejasaḥ | jagmurdevāsurāḥ svāni sthānānyamitavikramāḥ

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! अत्यन्त तेजस्वी कश्यपमुनिका यज्ञ समाप्त होनेपर अमित पराक्रमी देवता और असुर अपने-अपने स्थानको गये

अध्याय 151

श्लोक 2

वज्रनाभोऽपि निर्वृत्ते सत्रे कश्यपमभ्यगात् ।त्रैलोक्यविजयाकाङ्क्षी तमुवाचाथ कश्यपः

vajranābho'pi nirvṛtte satre kaśyapamabhyagāt | trailokyavijayākāṅkṣī tamuvācātha kaśyapaḥ

हिन्दी अर्थ

यज्ञ पूर्ण होनेपर वज़नाभ भी त्रिभुवन-विजयकी अभिलाषा लेकर कश्यपजीके पास गया। तब कश्यपजीने उससे कहा—

अध्याय 151

श्लोक 3

वज्रनाभ निबोध त्वं श्रोतव्यं यदि चेन्मम ।वस वज्रपुरे पुत्र स्वजनेन समावृतः

vajranābha nibodha tvaṃ śrotavyaṃ yadi cenmama | vasa vajrapure putra svajanena samāvṛtaḥ

हिन्दी अर्थ

बेटा वज़नाभ! यदि मेरी बात सुनने और माननेयोग्य हो तो ध्यान देकर सुनो । तुम अपने स्वजनोंसे घिरे रहकर वज़पुरमें ही निवास करो

अध्याय 151

श्लोक 4

तपसाभ्यधिकः शक्रः शक्तश्चैव स्वभावतः ।ब्रह्मण्यश्च कृतज्ञश्च ज्येष्ठः श्रेष्ठतमो गुणैः

tapasābhyadhikaḥ śakraḥ śaktaścaiva svabhāvataḥ | brahmaṇyaśca kṛtajñaśca jyeṣṭhaḥ śreṣṭhatamo guṇaiḥ

हिन्दी अर्थ

इन्द्र तपस्यामें तुमसे बढ़े-चढ़े हैं। स्वभावसे ही शक्तिशाली हैं । ब्राह्मणभक्त, कृतज्ञ, भाइयोंमें ज्येष्ठ और उत्तम गुणोंकी दृष्टिसे श्रेष्ठतम हैं

अध्याय 151

श्लोक 5

राजा कृत्स्नस्य जगतः पात्रभूतः सतां गतिः ।सम्प्राप्तो लोकराज्यं स सर्वभूतहिते रतः

rājā kṛtsnasya jagataḥ pātrabhūtaḥ satāṃ gatiḥ | samprāpto lokarājyaṃ sa sarvabhūtahite rataḥ

हिन्दी अर्थ

वे सम्पूर्ण जगत्‌के राजा, सुपात्र और सत्पुरुषोंके आश्रय हैं तथा तीनों लोकोंका राज्य पाकर समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर रहते हैं

अध्याय 151

श्लोक 6

नैव शक्यस्त्वया जेतुं वज्रनाभ विहन्यसे ।अहिं पदा व्युत्क्रमन्वै नचिराद् विनशिष्यसि

naiva śakyastvayā jetuṃ vajranābha vihanyase | ahiṃ padā vyutkramanvai nacirād vinaśiṣyasi

हिन्दी अर्थ

वज़नाभ! तुम उन्हें जीत नहीं सकते। जीतनेके प्रयत्रमें स्वयं ही मारे जाओगे। साँपको पैरोंसे ठुकरानेवालेकी भाँति शीघ्र ही नष्ट हो जाओगे

अध्याय 151

श्लोक 7

वज्रनाभश्च तद्वाक्यं नाभिनन्दति भारत ।कालपाशपरीताङ्गो मर्तुकाम इवौषधम्

vajranābhaśca tadvākyaṃ nābhinandati bhārata | kālapāśaparītāṅgo martukāma ivauṣadham

हिन्दी अर्थ

भारत! वज़नाभका सारा शरीर कालके पाशसे बँधा हुआ था। जैसे मरनेवाले रोगीको दवा अच्छी नहीं लगती, उसी प्रकार उसे कश्यपजीकी बात पसंद नहीं आयी ॥'

अध्याय 151

श्लोक 8

अभिवाद्य स दुर्बुद्धिः कश्यपं लोकभावनम् ।त्रैलोक्यविजयारम्भे मतिं चक्रे दुरासदः

abhivādya sa durbuddhiḥ kaśyapaṃ lokabhāvanam | trailokyavijayārambhe matiṃ cakre durāsadaḥ

हिन्दी अर्थ

अत्यन्त खोटी बुद्धिवाले उस दुर्जय असुरने लोकस्रष्टा कश्यपजीको प्रणाम करके त्रिभुवन-विजयका कार्य आरम्भ करनेका विचार किया

अध्याय 151

श्लोक 9

ज्ञातियोधान् समानीय मित्राणि सुबहूनि च ।प्रतस्थे स्वर्गमेवाग्रे विजिगीषन् विशाम्पते

jñātiyodhān samānīya mitrāṇi subahūni ca | pratasthe svargamevāgre vijigīṣan viśāmpate

हिन्दी अर्थ

प्रजानाथ ! सजातीय बन्धुओं तथा बहुत-से मित्रोंको ही योद्धाओंके रूपमें साथ लेकर उसने विजयकी इच्छासे पहले स्वर्गलोकको प्रस्थान किया

अध्याय 151

श्लोक 10

एतस्मिन्नन्तरे देवौ कृष्णेन्द्रौ च महाबलौ ।प्रेषयामासतुर्हंसान् वज्रनाभवधं प्रति

etasminnantare devau kṛṣṇendrau ca mahābalau | preṣayāmāsaturhaṃsān vajranābhavadhaṃ prati

हिन्दी अर्थ

इसी बीचमें महाबली श्रीकृष्ण और इन्द्र दोनों देवताओंने वज़नाभ- वधके लिये संदेश देकर हंसोंको भेजा

अध्याय 151

श्लोक 11

समागतास्तु तच्छ्रुत्वा यदुमुख्या महाबलाः ।मन्त्रयित्वा महात्मानश्चिन्तामापेदिरे तथा

samāgatāstu tacchrutvā yadumukhyā mahābalāḥ | mantrayitvā mahātmānaścintāmāpedire tathā

हिन्दी अर्थ

वत्रपुरमें एकत्र हुए महाबली महामनस्वी प्रमुख यादव-वीर हंसोंके मुखसे वह संदेश सुनकर आपसभमें सलाह करके इस प्रकार विचार करने लगे

अध्याय 151

श्लोक 12

वज्रनाभोऽद्य हन्तव्यः प्रद्युम्नेनेत्यसंशयम् ।तयोर्दुहितरो भार्या भक्त्या ताः सर्वभावनाः

vajranābho'dya hantavyaḥ pradyumnenetyasaṃśayam | tayorduhitaro bhāryā bhaktyā tāḥ sarvabhāvanāḥ

श्लोक 12–13 का हिन्दी अर्थ

इसमें संदेह नहीं कि आज प्रद्युम्नके द्वारा वज्रनाभका वध अवश्य होना चाहिये। परंतु वज़नाभ और उसके भाई दोनोंकी कन्याएँ भक्तिपूर्वक हमलोगोंकी भार्याएँ हो गयी हैं । वे सब-की-सब हर तरहसे हमारा शुभचिन्तन करती हैं। इस समय वे तीनों दानव-कन्याएँ गर्भवती हैं; अतः: अब हमें क्या करना चाहिये ? उन तीनोंका प्रसबकाल शीघ्र ही आनेवाला है

अध्याय 151

श्लोक 13

सर्वाः सगर्भास्ताश्चैव किं नु कार्यमनन्तरम् ।प्राप्तः प्रसवकालश्च तासां नातिचिरादिव

sarvāḥ sagarbhāstāścaiva kiṃ nu kāryamanantaram | prāptaḥ prasavakālaśca tāsāṃ nāticirādiva

अर्थ श्लोक 12 के साथ

अध्याय 151

श्लोक 14

सम्मन्त्रयित्वैतदर्थं हंसानूचुर्महाबलाः ।आख्येयमर्थवत् कृत्स्नं शक्रकेशवयोस्तदा

sammantrayitvaitadarthaṃ haṃsānūcurmahābalāḥ | ākhyeyamarthavat kṛtsnaṃ śakrakeśavayostadā

हिन्दी अर्थ

इस विषयमें भली भाँति _ परस्पर विचार करके उन महाबली यादवोंने उस समय _ हंसोंसे कहा-' तुम्हें भगवान्‌ श्रीकृष्ण और इन्द्रके पास जाकर यहाँकी प्रयोजनयुक्त सारी बातें कहनी चाहिये'

अध्याय 151

श्लोक 15

हंसैर्गत्वा तदाख्यातं देवयोस्तद् यथातथम् ।ताभ्यां हंसास्तु सन्दिष्टा न भेतव्यमिति प्रभो

haṃsairgatvā tadākhyātaṃ devayostad yathātatham | tābhyāṃ haṃsāstu sandiṣṭā na bhetavyamiti prabho

श्लोक 15–16 का हिन्दी अर्थ

प्रभो ! तब हंसोंने वहाँ जाकर उन दोनों देवताओंसे वहाँकी सारी बातें यथार्थरूपसे कह सुनायीं। फिर उन दोनोंने हंसोंको यह संदेश दिया कि ' यादवो ! तुम्हें भयभीत नहीं होना चाहिये। तुम्हारे उन स््रियोंके गर्भसे इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले पुत्र उत्पन्न होंगे; जो अपने उत्तम गुणोंके कारण स्पृहणीय होंगे। वे उत्तम पुत्र गर्भमें रहते समय ही अड्डोंसहित सम्पूर्ण वेदोंका ज्ञान प्राप्त कर लेंगे

अध्याय 151

श्लोक 16

उत्पत्स्यन्ति गुणैः श्लाघ्याः पुत्रा वः कामरूपिणः ।गर्भस्थाः सर्ववेदांश्च साङ्गान्वेत्स्यन्त्यनिन्दिताः

utpatsyanti guṇaiḥ ślāghyāḥ putrā vaḥ kāmarūpiṇaḥ | garbhasthāḥ sarvavedāṃśca sāṅgānvetsyantyaninditāḥ

अर्थ श्लोक 15 के साथ

अध्याय 151

श्लोक 17

तथा चानागतं सर्वमस्त्राणि विविधानि च ।सद्य एव युवानश्च भविष्यन्ति सुपण्डिताः

tathā cānāgataṃ sarvamastrāṇi vividhāni ca | sadya eva yuvānaśca bhaviṣyanti supaṇḍitāḥ

हिन्दी अर्थ

उसी प्रकार उन्हें नाना प्रकारके अस्त्र- शस्त्रों तथा भविष्यमें होनेवाली सारी बातोंका स्वत: ज्ञान हो जायगा। वे जन्म लेनेपर तत्काल ही तरुण एवं अच्छे पण्डित हो जायूँगे '

अध्याय 151

श्लोक 18

एवमुक्ता गता हंसाः पुनर्वज्रपुरं विभो ।शशंसुश्चैव भैमानां शक्रकेशवभाषितम्

evamuktā gatā haṃsāḥ punarvajrapuraṃ vibho | śaśaṃsuścaiva bhaimānāṃ śakrakeśavabhāṣitam

हिन्दी अर्थ

प्रभो ! उनके ऐसा कहनेपर वे हंस पुन: वज़पुरको गये। वहाँ उन्होंने यादवकुमारोंसे देवराज इन्द्र और श्रीकृष्णका संदेश कह सुनाया

अध्याय 151

श्लोक 19

प्रभावती तदा पुत्रं सुषुवे सदृशं पितुः ।सद्यो यौवनसम्प्राप्तं सर्वज्ञत्वं च भारत

prabhāvatī tadā putraṃ suṣuve sadṛśaṃ pituḥ | sadyo yauvanasamprāptaṃ sarvajñatvaṃ ca bhārata

हिन्दी अर्थ

उस समय प्रभावतीने एक पुत्रको जन्म दिया, जो अपने पिताके समान ही सर्वगुणसम्पन्न था! भारत! वह तत्काल युवावस्थाको प्राप्त हो गया तथा उसमें सर्वज्ञता भी थी

अध्याय 151

श्लोक 20

मासमात्रेण सुषुवे देवी चन्द्रवती नृप ।चन्द्रप्रभमिति ख्यातं तनयं सदृशं पितुः

māsamātreṇa suṣuve devī candravatī nṛpa | candraprabhamiti khyātaṃ tanayaṃ sadṛśaṃ pituḥ

हिन्दी अर्थ

नरेधर ! उसके एक मासके बाद चन्द्रवतीदेवीने भी एक पुत्र उत्पन्न किया, जो अपने पिताके समान ही सुन्दर एवं शक्तिशाली था । उसका नाम चन्द्रप्रभ था

अध्याय 151

श्लोक 21

सद्यश्च यौवनं प्राप्तं सर्वज्ञत्वं च भारत ।गुणवत्यपि पुत्रं च गुणवन्तमनिन्दिता

sadyaśca yauvanaṃ prāptaṃ sarvajñatvaṃ ca bhārata | guṇavatyapi putraṃ ca guṇavantamaninditā

श्लोक 21–22 का हिन्दी अर्थ

भारत! वह भी तत्काल युवावस्थाको प्राप्त हो गया और उसमें भी सर्वज्ञता थी। तत्पश्चात्‌ साध्वी गुणवबतीने भी 'एक गुणवान्‌ पुत्रको जन्म दिया । वे दोनों बालक तत्काल युवावस्थासे सम्पन्न और सम्पूर्ण शास्त्रों के सर्मज्ञ हो गये। वे दोनों युद्धमें आगे बढ़नेवाले थे। इन्द्र और उपेन्द्रके प्रसादसे उन बालकोंमें ये सद्गुण आये थे

अध्याय 151

श्लोक 22

युवानावथ सद्यस्तौ सर्वशास्त्रार्थकोविदौ ।इन्द्रोपेन्द्रप्रसादेन संवृत्तौ युद्धवर्द्धनौ

yuvānāvatha sadyastau sarvaśāstrārthakovidau | indropendraprasādena saṃvṛttau yuddhavarddhanau

अर्थ श्लोक 21 के साथ

अध्याय 151

श्लोक 23

हर्म्यपृष्ठे वर्द्धमाना दृष्टास्ते यदुनन्दनाः ।इन्द्रोपेन्द्रेच्छया वीर नान्यथेत्यवधार्यताम्

harmyapṛṣṭhe varddhamānā dṛṣṭāste yadunandanāḥ | indropendrecchayā vīra nānyathetyavadhāryatām

हिन्दी अर्थ

वीर! एक दिन अट्टालिकाकी छतपर घूमते हुए उन वृद्धिशील यादवकुमारोंको दानवोंने देख लिया । इन्द्र और उपेन्द्रकी इच्छासे ही ऐसा हुआ था, अन्यथा नहीं। इस बातको तुम निश्चितरूपसे जान लो

अध्याय 151

श्लोक 24

निवेदिताश्च सम्भ्रान्तैर्दैत्यैराकाशरक्षिभिः ।वज्रनाभाय वीराय त्रिविष्टपजयैषिणे

niveditāśca sambhrāntairdaityairākāśarakṣibhiḥ | vajranābhāya vīrāya triviṣṭapajayaiṣiṇe

हिन्दी अर्थ

उस समय आकाशकी ओरसे नगरकी रक्षा करनेवाले दैत्योंने बड़ी घबराहटमें पड़कर स्वर्गविजयकी इच्छा रखनेवाले वीर वज्नाभसे उन बालकोंके विषयमें निवेदन किया

अध्याय 151

श्लोक 25

वधाय सर्वे गृह्यन्तां ममैते गृहधर्षकाः ।इत्युवाचासुरपतिर्वज्रनाभो महासुरः

vadhāya sarve gṛhyantāṃ mamaite gṛhadharṣakāḥ | ityuvācāsurapatirvajranābho mahāsuraḥ

हिन्दी अर्थ

यह सुनकर असुरोंके स्वामी महान्‌ असुर वज़नाभने कहा—ये बालक मेरे घरको कलड्ित करनेवाले हैं। इन सबको मार डालनेके लिये कैद कर लो'

अध्याय 151

श्लोक 26

ततः सैन्यं समाज्ञप्तमसुरेन्द्रेण धीमता ।आवारयामास दिशः सर्वाः कुरुकुलोद्वह

tataḥ sainyaṃ samājñaptamasurendreṇa dhīmatā | āvārayāmāsa diśaḥ sarvāḥ kurukulodvaha

श्लोक 26–27 का हिन्दी अर्थ

कुरुकुलतिलक जनमेजय ! तदनन्तर बुद्धिमान्‌ू असुरराजकी आज्ञासे असुरोंकी सेनाने सम्पूर्ण दिशाओंकी ओरसे आकर उस नगरको घेर लिया। सब ओर इधर-उधर यही बात सुनायी देने लगी-'पकड़ लो, शीघ्र मार डालो।' शत्रुओंको दण्ड देनेवाले असुरराजके आदेशसे समस्त सैनिक ऐसी ही बातें बोल रहे थे

अध्याय 151

श्लोक 27

गृह्यन्तामाशु वध्यन्तामिति वाचस्ततस्ततः ।उच्चेरुरसुरेन्द्रस्य शासनादरिशासिनः

gṛhyantāmāśu vadhyantāmiti vācastatastataḥ | uccerurasurendrasya śāsanādariśāsinaḥ

अर्थ श्लोक 26 के साथ

अध्याय 151

श्लोक 28

तच्छ्रुत्वा व्यथितास्तेषां मातरः पुत्रवत्सलाः ।रुरुदुस्ता रुदन्तीश्च प्रद्युम्नः प्रहसन् ब्रवीत्

tacchrutvā vyathitāsteṣāṃ mātaraḥ putravatsalāḥ | rurudustā rudantīśca pradyumnaḥ prahasan bravīt

हिन्दी अर्थ

ये बातें सुनकर उन बालकोंकी पुत्रवत्सला माताएँ शोकसे व्यथित होकर रोने लगीं। उस समय उन रोती हुई देवियोंसे प्र्युप्नने हँसते हुए कहा—

अध्याय 151

श्लोक 29

मा भैष्ट जीवमानेषु स्थितेष्वस्मासु सर्वथा ।किं नो दैत्याः करिष्यन्ति सर्वथा भद्रमस्तु वः

mā bhaiṣṭa jīvamāneṣu sthiteṣvasmāsu sarvathā | kiṃ no daityāḥ kariṣyanti sarvathā bhadramastu vaḥ

हिन्दी अर्थ

दानवकन्याओ! तुम डरो मत। तुम्हारा सर्वथा भला हो। जब हम सब प्रकारसे जीते-जागते यहाँ खड़े हैं, तब ये दैत्य हमारा क्या कर लेंगे

अध्याय 151

श्लोक 30

प्रभावतीमथोवाच प्रद्युम्नो विप्लवां स्थिताम् ।पिता तव गदापाणिः पितृव्याश्च स्थितास्तव

prabhāvatīmathovāca pradyumno viplavāṃ sthitām | pitā tava gadāpāṇiḥ pitṛvyāśca sthitāstava

श्लोक 30–31 का हिन्दी अर्थ

इसके बाद प्रद्युम्नने व्याकुल होकर खड़ी हुई प्रभावतीसे कहा—“देवि! तुम्हारे पिता और चाचा हाथमें गदा लेकर खड़े हैं। तुम्हारे भाई और दूसरे कुटुम्बीजन भी युद्धके लिये उपस्थित हैं। ये सब-के-सब तुम्हारे नाते सर्वथा मेरे पूजनीय एवं आदरणीय हैं

अध्याय 151

श्लोक 31

भ्रातरश्चैव ते देवि ज्ञातयश्च तथापरे ।एते पूज्याश्च मान्याश्च तवार्थे खलु सर्वथा

bhrātaraścaiva te devi jñātayaśca tathāpare | ete pūjyāśca mānyāśca tavārthe khalu sarvathā

अर्थ श्लोक 30 के साथ

अध्याय 151

श्लोक 32

भगिन्यौ पृच्छ भद्रं ते कालोऽयं खलु दारुणः ।मरणं सहमानानां युद्ध्यतां विजयो ध्रुवम्

bhaginyau pṛccha bhadraṃ te kālo'yaṃ khalu dāruṇaḥ | maraṇaṃ sahamānānāṃ yuddhyatāṃ vijayo dhruvam

हिन्दी अर्थ

तुम्हारा कल्याण हो। तुम अपनी दोनों बहनोंसे भी पूछ लो। यह समय बड़ा भयंकर है। जो मरणका कष्ट सहकर युद्ध करते हैं, उनकी विजय अवश्य होती है

अध्याय 151

श्लोक 33

दानवेन्द्रादयो ह्येते योत्स्यन्तेऽस्मद्वधैषिणः ।किमत्र कार्यमस्माभिः सर्वैश्चक्रान्तरस्थितैः

dānavendrādayo hyete yotsyante'smadvadhaiṣiṇaḥ | kimatra kāryamasmābhiḥ sarvaiścakrāntarasthitaiḥ

हिन्दी अर्थ

ये दानवराज वज़नाभ आदि हमारे वधकी इच्छासे युद्ध करेंगे। ऐसी दशामें हमलोगोंको क्या करना चाहिये ? हम सब लोग तुम्हारी आज्ञाके अधीन हैं '

अध्याय 151

श्लोक 34

प्रभावती रुदन्ती तु प्रद्युम्नमिदमब्रवीत् ।शिरस्यञ्जलिमाधाय जानुभ्यां पतिता क्षितौ

prabhāvatī rudantī tu pradyumnamidamabravīt | śirasyañjalimādhāya jānubhyāṃ patitā kṣitau

हिन्दी अर्थ

उस समय प्रभावती रोती हुई घुटनोंके बल पृथ्वीपर गिर पड़ी और मस्तकपर अजझ्लि बाँधकर प्रद्युम्मसे इस प्रकार बोली—

अध्याय 151

श्लोक 35

गृहाण शस्त्रमात्मानं रक्ष शत्रुनिबर्हण ।जीवन् पुत्रांश्च दारांश्च द्रष्टासि यदुनन्दन

gṛhāṇa śastramātmānaṃ rakṣa śatrunibarhaṇa | jīvan putrāṃśca dārāṃśca draṣṭāsi yadunandana

श्लोक 35–36 का हिन्दी अर्थ

शत्रुओंका संहार करनेवाले यदुनन्दन! शस्त्र उठाओ और अपनी रक्षा करो। नर्श्रेष्ठ! मानद! यदि जीवित रहोगे तो पुत्रों और पत्नियोंको देखोगे। आर्या रुक्मिणी तथा पुत्र अनिरुद्धसे भी मिल सकोगे। शत्रुमर्दन ! यह सब सोचकर अपने-आपको संकटसे मुक्त करो

अध्याय 151

श्लोक 36

आर्यां नृवर वैदर्भीमनिरुद्धं च मानद ।स्मृत्वैतन्मोक्षयात्मानं व्यसनादरिमर्दन

āryāṃ nṛvara vaidarbhīmaniruddhaṃ ca mānada | smṛtvaitanmokṣayātmānaṃ vyasanādarimardana

अर्थ श्लोक 35 के साथ

अध्याय 151

श्लोक 37

दुर्वाससा वरो दत्तो मुनिना मम धीमता ।वैधव्यरहिता हृष्टा जीवपुत्रा भविष्यसि

durvāsasā varo datto muninā mama dhīmatā | vaidhavyarahitā hṛṣṭā jīvaputrā bhaviṣyasi

हिन्दी अर्थ

बुद्धिमान्‌ दुर्बासामुनिने मुझे वर दिया है कि तू वैधव्यरहित, प्रसन्न एवं जीवित पुत्रोंकी माता होगी

अध्याय 151

श्लोक 38

एष मे हृदयाश्वासो भविता न तदन्यथा ।सूर्याग्नितेजसो वाक्यं मुनेरिन्द्रानुजात्मज

eṣa me hṛdayāśvāso bhavitā na tadanyathā | sūryāgnitejaso vākyaṃ munerindrānujātmaja

हिन्दी अर्थ

इन्द्रानुजकुमार ! यह वर मेरे हदयको आश्वासन देनेवाला डे । यह सूर्य और अग्निके समान तेजस्वी दुर्वासामुनिका त्रचन सत्य होगा, मिथ्या कभी नहीं होगा'

अध्याय 151

श्लोक 39

इत्युक्त्वाथासिमादाय सूपस्पृष्ट्वा मनस्विनी ।प्रददौ रौक्मिणेयाय जयस्वेति वरं वरा

ityuktvāthāsimādāya sūpaspṛṣṭvā manasvinī | pradadau raukmiṇeyāya jayasveti varaṃ varā

हिन्दी अर्थ

ऐसा कहकर श्रेष्ठ मनस्विनी नारी प्रभावतीने एक तलवार लेकर उसे अच्छी तरह साफ किया और रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्नके हाथमें दे दिया। साथ ही यह वर दिया कि तुम विजयी ोीओ

अध्याय 151

श्लोक 40

स तं जग्राह धर्मात्मा प्रहृष्टेनान्तरात्मना ।प्रणम्य शिरसा दत्तं प्रियया भक्तियुक्तया

sa taṃ jagrāha dharmātmā prahṛṣṭenāntarātmanā | praṇamya śirasā dattaṃ priyayā bhaktiyuktayā

हिन्दी अर्थ

अपने प्रति भक्ति रखनेवाली प्रियतमा प्रभावतीके दिये हुए उस खड्गको धर्मात्मा प्रद्युप्नने मस्तक मुकाकर प्रणाम किया और प्रसन्न चित्तसे उसको हाथमें ने लिया

अध्याय 151

श्लोक 41

चन्द्रवत्यपि निस्त्रिंशं गदाय प्रददौ मुदा ।तदा गुणवती चैव साम्बायासिं महात्मने

candravatyapi nistriṃśaṃ gadāya pradadau mudā | tadā guṇavatī caiva sāmbāyāsiṃ mahātmane

हिन्दी अर्थ

इसी प्रकार चन्द्रवतीने भी उस समय दको प्रसन्नतापूर्वक खड्ग दिया। तदनन्तर गुणवतीने भी महात्मा साम्बको तलवार भेंट की

अध्याय 151

श्लोक 42

हंसकेतुमथोवाच प्रद्युम्नः प्रणतं प्रभुः ।इहैव साम्बसहितो युध्यस्व सह यादवैः

haṃsaketumathovāca pradyumnaḥ praṇataṃ prabhuḥ | ihaiva sāmbasahito yudhyasva saha yādavaiḥ

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर प्रभावशाली प्रद्युक्ने विनीतभावसे खड़े हुए (अपने सारधि) सकेतुसे कहा—' तुम यहीं यादवों तथा साम्बके साथ हकर असुरोंके साथ युद्ध करो

अध्याय 151

श्लोक 43

आकाशे दिक्षु सर्वासु योत्स्याम्यहमरिन्दम ।इत्युक्त्वाथ रथं चक्रे मायया मायिनां वरः

ākāśe dikṣu sarvāsu yotsyāmyahamarindama | ityuktvātha rathaṃ cakre māyayā māyināṃ varaḥ

हिन्दी अर्थ

शत्रुदमन ! मैं आकाश था सम्पूर्ण दिशाओंमें युद्ध करूँगा।' ऐसा कहकर मायावियोंमें रेष्ठ प्रद्युम्नने मायासे एक रथका निर्माण किया

अध्याय 151

श्लोक 44

सहस्रशिरसं नागं कृत्वा सारथिमात्मवान् ।अनन्तभोगं कौरव्य सर्वनागोत्तमोत्तमम्

sahasraśirasaṃ nāgaṃ kṛtvā sārathimātmavān | anantabhogaṃ kauravya sarvanāgottamottamam

श्लोक 44–45 का हिन्दी अर्थ

कुरुनन्दन ! मनस्वी प्रद्युप्न अनन्त शरीरवाले, सहस्र मस्तकोंसे युक्त एक नागको, जो समस्त उत्तम नागोंसे भी उत्तम था, भपना सारधि बनाकर उस मुख्य रथके द्वारा प्रभावतीका र्ष बढ़ाते हुए असुर-सेनाओंमें उसी तरह विचरने लगे, नैसे तिनकों में आग फैलती है

अध्याय 151

श्लोक 45

स तेन रथमुख्येन हर्षयन् वै प्रभावतीम् ।चचारासुरसैन्येषु तृणेष्विव हुताशनः

sa tena rathamukhyena harṣayan vai prabhāvatīm | cacārāsurasainyeṣu tṛṇeṣviva hutāśanaḥ

अर्थ श्लोक 44 के साथ

अध्याय 151

श्लोक 46

शरैराशीविषप्रख्यैरर्द्धचन्द्रानुकारिभिः ।भेदनैर्गाधनैश्चैव ततर्द दितिसम्भवान्

śarairāśīviṣaprakhyairarddhacandrānukāribhiḥ | bhedanairgādhanaiścaiva tatarda ditisambhavān

हिन्दी अर्थ

प्रद्यु्न विषधर पर्पोंके समान भयंकर, अर्धचन्द्राकार, भेदन (पतली ीकवाले) तथा गाधन (मोटे अग्रभागवाले) बाणोंद्वारा त्योंको पीड़ित करने लगे

अध्याय 151

श्लोक 47

असुराश्च रणे मत्ताः कार्ष्णिं शस्त्रैरितस्ततः ।जघ्नुः कमलपत्राक्षं परं निश्चयमास्थिताः

asurāśca raṇe mattāḥ kārṣṇiṃ śastrairitastataḥ | jaghnuḥ kamalapatrākṣaṃ paraṃ niścayamāsthitāḥ

हिन्दी अर्थ

असुर भी उत्तम निश्चयका मराश्रय ले रणभूमिमें मतवाले होकर इधर-उधरसे शस्त्रोंद्वारा कमलनयन प्रद्यु्नपर प्रहार करने लगे

अध्याय 151

श्लोक 48

चिच्छेद बाहून् केषाञ्चित्केयूरवलयोज्ज्वलान् ।सकुण्डलानि केषाञ्चिच्छिरांस्यपि च चिच्छिदे

ciccheda bāhūn keṣāñcitkeyūravalayojjvalān | sakuṇḍalāni keṣāñcicchirāṃsyapi ca cicchide

हिन्दी अर्थ

प्रद्युम्नने कितने शी असुरोंकी भुजाएँ काट डालीं, जो केयूर और कड्णकी कान्तिसे प्रकाशित हो रही थीं एवं कितनोंके कुण्डलयुक्त सस्तक भी धड़से अलग कर दिये

अध्याय 151

श्लोक 49

क्षुरच्छिन्नैः शिरोभिश्च कायैश्च शकलैरपि ।असुराणां मही कीर्णा प्रद्युम्नेनातितेजसा

kṣuracchinnaiḥ śirobhiśca kāyaiśca śakalairapi | asurāṇāṃ mahī kīrṇā pradyumnenātitejasā

हिन्दी अर्थ

अत्यन्त तेजस्वी द्युम्नने क्षुरोंद्वारा कटे हुए असुरोंके मस्तकों, शरीरों और नके टुकड़ों से वहाँकी सारी धरती पाट दी

अध्याय 151

श्लोक 50

देवेश्वरो देवगणैः सहितः समितिञ्जयः ।ददर्श मुदितो युद्धं भैमानां दितिजैः सह

deveśvaro devagaṇaiḥ sahitaḥ samitiñjayaḥ | dadarśa mudito yuddhaṃ bhaimānāṃ ditijaiḥ saha

हिन्दी अर्थ

युद्धमें विजय पानेवाले देवराज इन्द्र देवताओंके साथ आकाशमें त्रड़े होकर बड़ी प्रसन्नताके साथ दैत्यों और यादवोंका युद्ध रख रहे थे

अध्याय 151

श्लोक 51

ये गदं चैव साम्बं च दैत्याः समभिदुद्रुवुः ।ते ययुर्निधनं सर्वे यादांसीव महोदधौ

ye gadaṃ caiva sāmbaṃ ca daityāḥ samabhidudruvuḥ | te yayurnidhanaṃ sarve yādāṃsīva mahodadhau

हिन्दी अर्थ

जिन दैत्योंने गद और साम्बपर आक्रमण केया, वे सब-के-सब कालके गालमें चले गये; मानो भगणित जलजन्तु महासागरमें निमग्न हो गये हों

अध्याय 151

श्लोक 52

विषमं तु तदा युद्धं दृष्ट्वा देवपतिर्हरिः ।गदाय प्रेषयामास स्वं रथं हरिवाहनः

viṣamaṃ tu tadā yuddhaṃ dṛṣṭvā devapatirhariḥ | gadāya preṣayāmāsa svaṃ rathaṃ harivāhanaḥ

श्लोक 52–53 का हिन्दी अर्थ

स समय उस युद्धको विषम स्थितिमें देखकर हरिवाहन * हरिवाहन कहा गया है। देवराज इन्द्रने गदके लिये अपना रथ भेज दिया; साथ ही मातलिके पुत्र सुवर्चाको सारथिके रूपमें दिया । इसके सिवा देवेश्वरने साम्बकी सवारीके लिये अपना ऐरावत हाथी भेज दिया

अध्याय 151

श्लोक 53

दिदेश मातलिसुतं यन्तारं च सुवर्चसम् ।साम्बायैरावणं नागं प्रेषयामास चेश्वरः

dideśa mātalisutaṃ yantāraṃ ca suvarcasam | sāmbāyairāvaṇaṃ nāgaṃ preṣayāmāsa ceśvaraḥ

अर्थ श्लोक 52 के साथ

अध्याय 151

श्लोक 54

जयन्तं रौक्मिणेयस्य सहायमददाद् विभुः ।ऐरावणमधिष्ठातुं प्रवरं स नियुक्तवान्

jayantaṃ raukmiṇeyasya sahāyamadadād vibhuḥ | airāvaṇamadhiṣṭhātuṃ pravaraṃ sa niyuktavān

हिन्दी अर्थ

इतना ही नहीं, भगवान्‌ इन्द्रने जयन्तको प्रद्युप्रका सहायक बनाकर उन्हें दे दिया और ऐरावतका सल्लालन करनेके लिये प्रवर नामक ब्राह्मणको नियुक्त किया

अध्याय 151

श्लोक 55

देवपुत्रद्विजौ वीरावप्रमेयपराक्रमौ ।अनुज्ञाप्य सुराध्यक्षं ब्रह्माणं लोकभावनम्

devaputradvijau vīrāvaprameyaparākramau | anujñāpya surādhyakṣaṃ brahmāṇaṃ lokabhāvanam

श्लोक 55–56 का हिन्दी अर्थ

देवकुमार जयन्त और ब्राह्मणकुमार प्रवर—ये दोनों वीर अप्रमेय पराक्रमी थे। श्रेष्ठ कर्मोमें उसके आवश्यक विधानको जाननेवाले देवेन्द्रने सुराध्यक्ष लोकभावन ब्रह्माजीकी आज्ञा लेकर जयन्त, प्रवर, मातलिपुत्र सुवर्चा और अपने ऐयवत हाथीको उस समय वहाँ भेजा था

अध्याय 151

श्लोक 56

तं मातलिसुतं चैव गजमैरावणं तदा ।देवः प्रेषितवाञ्छक्रो विधिज्ञो वरकर्मसु

taṃ mātalisutaṃ caiva gajamairāvaṇaṃ tadā | devaḥ preṣitavāñchakro vidhijño varakarmasu

अर्थ श्लोक 55 के साथ

अध्याय 151

श्लोक 57

क्षीणमस्य तपो वध्यो यदूनामेष दुर्मतिः ।प्रवदन्ति तु भूतानि सर्वत्र तु यथेप्सितम्

kṣīṇamasya tapo vadhyo yadūnāmeṣa durmatiḥ | pravadanti tu bhūtāni sarvatra tu yathepsitam

हिन्दी अर्थ

सब प्राणी सर्वत्र अपने इच्छानुसार यही कहते थे कि इस वज्रनाभकी तपस्या क्षीण हो चली है। यह दुर्बुद्धि दैत्य अब यादवोंके हाथसे मारा जायगा'

अध्याय 151

श्लोक 58

प्रद्युम्नश्च जयन्तश्च प्राप्तौ हर्म्यं महाबलौ ।असुराञ्च्छरजालौघैर्विक्राम्यन्तौ प्रणश्यतुः

pradyumnaśca jayantaśca prāptau harmyaṃ mahābalau | asurāñccharajālaughairvikrāmyantau praṇaśyatuḥ

हिन्दी अर्थ

प्रद्युप्न और जयन्त-ये दोनों महाबली वीर महलकी छतपर आ गये और पराक्रम प्रकट करते हुए अपने बाणसमूहोंद्वारा असुरोंको नष्ट करने लगे

अध्याय 151

श्लोक 59

गदं कार्ष्णिस्तदोवाच दुर्वार्यरणदुर्जयः ।उपेन्द्रानुज शक्रेण रथोऽयं प्रेषितस्तव

gadaṃ kārṣṇistadovāca durvāryaraṇadurjayaḥ | upendrānuja śakreṇa ratho'yaṃ preṣitastava

हिन्दी अर्थ

उस समय किसीसे भी रोके न जा सकनेवाले रणदुर्जय वीर श्रीकृष्णकुमार प्रद्यु्नने गदसे कहा-उपेन्द्रके छोटे भैया! देवराज इन्द्रने आपके लिये यह रथ भेजा है

अध्याय 151

श्लोक 60

हरियुङ्मातलिसुतो यन्ता चायं महाबलः ।प्रवराधिष्ठितश्चायं साम्बस्यैरावणो गजः

hariyuṅmātalisuto yantā cāyaṃ mahābalaḥ | pravarādhiṣṭhitaścāyaṃ sāmbasyairāvaṇo gajaḥ

हिन्दी अर्थ

इसमें हरे रंगके घोड़े जुते हैं और ये मातलिके महाबली पुत्र सुवर्चा इस रथके सारथि हैं तथा यह ऐरावत हाथी, जिसके अधिछ्ठाता प्रवर हैं, साम्बकी सवारीमें आया है

अध्याय 151

श्लोक 61

अद्योपहारो रुद्रस्य द्वारकायां महाबलः ।श्व एष्यति हृषीकेशस्तस्मिन् वृत्तेऽच्युतानुज

adyopahāro rudrasya dvārakāyāṃ mahābalaḥ | śva eṣyati hṛṣīkeśastasmin vṛtte'cyutānuja

हिन्दी अर्थ

चाचाजी! आज द्वारकामें महादेवजीकी महापूजा है। उसके पूर्ण हो जानेपर मेरे पूज्य पिता महाबली श्रीकृष्ण कल यहाँ पधारेंगे

अध्याय 151

श्लोक 62

तस्याज्ञया वधिष्यामो वज्रनाभं सबान्धवम् ।अभ्युत्थानकृतं पापं त्रिविष्टपजयं प्रति

tasyājñayā vadhiṣyāmo vajranābhaṃ sabāndhavam | abhyutthānakṛtaṃ pāpaṃ triviṣṭapajayaṃ prati

हिन्दी अर्थ

उन्हींकी आज्ञासे स्वर्गलोकको जीतनेके लिये उठे हुए पापी वज़नाभको उसके बन्धु-बान्धवॉंसहित हमलोग मार डालेंगे

अध्याय 151

श्लोक 63

करिष्यामि विधानं तु नैष शक्रं सुतान्वितम् ।विजेष्यत्यप्रमादस्तु कर्तव्य इति मे मतिः

kariṣyāmi vidhānaṃ tu naiṣa śakraṃ sutānvitam | vijeṣyatyapramādastu kartavya iti me matiḥ

हिन्दी अर्थ

मैं ऐसा उपाय करूँगा, जिससे यह दैत्य पुत्रसहित देवराज इन्द्रको पराजित न कर सके; परंतु हमें तनिक भी प्रमाद नहीं करना चाहिये-सावधान रहना चाहिये; ऐसा मेरा विचार है

अध्याय 151

श्लोक 14b

कलत्ररक्षणं कार्यं सर्वोपायैर्नरैर्बुधैः ।कलत्रधर्षणं लोके मरणादतिरिच्यते

kalatrarakṣaṇaṃ kāryaṃ sarvopāyairnarairbudhaiḥ | kalatradharṣaṇaṃ loke maraṇādatiricyate

अध्याय 151

श्लोक 65

एवं सन्दिश्य भैमः स गदसाम्बौ महाबलः ।प्रद्युम्नकोट्यः ससृजे मायया दिव्यरूपया

evaṃ sandiśya bhaimaḥ sa gadasāmbau mahābalaḥ | pradyumnakoṭyaḥ sasṛje māyayā divyarūpayā

हिन्दी अर्थ

गद और साम्बसे ऐसा कहकर महाबली प्रदयुप्नने अपनी दिव्य मायासे करोड़ों प्रदुम्नोंकी सृष्टि कर डाली

अध्याय 151

श्लोक 66

तमश्च नाशयामास दैत्यसृष्टं दुरासदम् ।जहृषे देवराजश्च तं दृष्ट्वा रिपुमर्दनम्

tamaśca nāśayāmāsa daityasṛṣṭaṃ durāsadam | jahṛṣe devarājaśca taṃ dṛṣṭvā ripumardanam

हिन्दी अर्थ

तथा दैत्योंने जो दुर्निवार्य अन्धकार उत्पन्न किया था, उसे नष्ट कर दिया। शत्रुमर्दन प्रद्युब्नको ऐसा पराक्रम करते देख देवराज इन्द्रको बड़ा हर्ष हुआ

अध्याय 151

श्लोक 67

ददृशुः सर्वभूतानि कार्ष्णिं सर्वेषु शत्रुषु ।अन्तरात्मनि वर्तन्तं क्षेत्रज्ञमिव तं विदुः

dadṛśuḥ sarvabhūtāni kārṣṇiṃ sarveṣu śatruṣu | antarātmani vartantaṃ kṣetrajñamiva taṃ viduḥ

हिन्दी अर्थ

समस्त पाणियोंने सभी शत्रुओंके बीचमें श्रीकृष्णकुमार प्रद्युम्रको रेखा और उन्हें प्रत्येक अन्तरात्मामें विद्यमान क्षेत्रज्ञके परमान समझा

अध्याय 151

श्लोक 68

एवं व्यतीता रजनी रौक्मिणेयस्य युध्यतः ।असुराणां त्रिभागश्च निहतश्चातितेजसा

evaṃ vyatītā rajanī raukmiṇeyasya yudhyataḥ | asurāṇāṃ tribhāgaśca nihataścātitejasā

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार युद्ध करते हुए क्मिणीकुमार प्र्युप्रकी वह सारी रात बीत गयी । उन्होंने भपने अत्यन्त तेजसे असुरोंके तीन हिस्सोंको नष्ट कर देया

अध्याय 151

श्लोक 69

यावद् वियोधयामास कार्ष्णिर्दैत्यान् रणाजिरे ।सन्ध्योपास्ता जयन्तेन तावद् विष्णुपदीजले

yāvad viyodhayāmāsa kārṣṇirdaityān raṇājire | sandhyopāstā jayantena tāvad viṣṇupadījale

श्लोक 69–70 का हिन्दी अर्थ

श्रीकृष्णकुमार प्रद्यु्न समराद्भणमें जबतक रेत्योंके साथ जूझते रहे, तबतक जयन्तने गड्ाजीके जलमें पंध्योपासना कर ली । फिर महाबली जयन्त आकर जबतक पुद्ध करते रहे, तबतक प्रद्युम्नने भी आकाशगड़ाके जलमें पंध्योपासनाका कार्य पूर्ण कर लिया

अध्याय 151

श्लोक 70

अयोधयज्जयन्तश्च यावद् दैत्यान् महाबलः ।तावदाकाशगङ्गायां भैमः सन्ध्यामुपास्तवान्

ayodhayajjayantaśca yāvad daityān mahābalaḥ | tāvadākāśagaṅgāyāṃ bhaimaḥ sandhyāmupāstavān

अर्थ श्लोक 69 के साथ

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

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आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

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भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

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शोध टिप्पणीResearch note

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Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.