Harivamsha Purana
152
अध्याय 152 / 318

Parva 2, Adhyāya 97

44 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ44 श्लोक

अध्याय 152

श्लोक 1

प्रद्युम्नेन वज्रनाभस्य वधं, प्रद्युम्नादीनां पुत्राणां राज्याभिषेकः जगतश्चक्षुषि ततो मुहूर्ताभ्युदिते रवौ ।प्रादुरासीद्धरिर्देवस्तार्क्ष्येणोरगशत्रुणा

pradyumnena vajranābhasya vadhaṃ, pradyumnādīnāṃ putrāṇāṃ rājyābhiṣekaḥ jagataścakṣuṣi tato muhūrtābhyudite ravau | prādurāsīddharirdevastārkṣyeṇoragaśatruṇā

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर जब जगतूके नेत्ररूप भगवान्‌ सूर्यके उदित हुए दो घड़ी श्रीत गयी, तब सर्पशत्रु गरुड़के द्वारा भगवान्‌ श्रीहरि तरहाँ प्रकट हुए

अध्याय 152

श्लोक 2

हंसत्रायुमनोभिश्च सुशीघ्रतरगः खगः ।तस्थौ वियति शक्रस्य समीपे कुरुनन्दन

haṃsatrāyumanobhiśca suśīghrataragaḥ khagaḥ | tasthau viyati śakrasya samīpe kurunandana

हिन्दी अर्थ

कुरुनन्दन ! हंस, वायु और मनसे पी अत्यन्त शीघ्रतर गतिसे गमन करनेवाले पक्षी गरुड़ माकाशमें इन्द्रके समीप खड़े हो गये

अध्याय 152

श्लोक 3

समेत्य च यथान्यायं कृष्णो वासवसन्निधौ ।पाञ्चजन्यं हरिर्दध्मौ दैत्यानां भयवर्द्धनम्

sametya ca yathānyāyaṃ kṛṣṇo vāsavasannidhau | pāñcajanyaṃ harirdadhmau daityānāṃ bhayavarddhanam

हिन्दी अर्थ

श्रीकृष्णने रैवराज इन्द्रके समीप जाकर उनके साथ यथोचित ीतिसे मिलकर अपना पाज्चजन्य नामक शड्डू बजाया, तो दैत्योंका भय बढ़ानेवाला था

अध्याय 152

श्लोक 4

तं श्रुत्वाभ्यागतस्तत्र प्रद्युम्नो परवीरहा ।वज्रनाभं जहीत्युक्तः केशवेन त्वरेति च

taṃ śrutvābhyāgatastatra pradyumno paravīrahā | vajranābhaṃ jahītyuktaḥ keśavena tvareti ca

हिन्दी अर्थ

शत्रु -वीरोंका पंहार करनेवाले प्रद्युम्न वह शड्डुध्वनि सुनकर तुरंत वहाँ भाये । उस समय श्रीकृष्णने उनसे कहा—' बेटा ! वज़नाभको पार डालो और इस कार्यमें शीघ्रता करो!

अध्याय 152

श्लोक 5

तार्क्ष्यमारुह्य गच्छेति पुनरेव प्रणोदितः ।चकार स तथा वीरः प्रणिपत्य सुरोत्तमौ

tārkṣyamāruhya gaccheti punareva praṇoditaḥ | cakāra sa tathā vīraḥ praṇipatya surottamau

हिन्दी अर्थ

उन्होंने पुन: प्रेरित करते हुए कहा—' गरुड़पर चढ़कर जाओ।' और प्रद्यु्ने उन दोनों श्रेष्ठ देवताओंको नमस्कार करके बैसा ही किया

अध्याय 152

श्लोक 6

स मनोरंहसा वीर तार्क्ष्येणाशु ययौ नृप ।अभ्याशं वज्रनाभस्य महाद्वन्द्वस्य भारत

sa manoraṃhasā vīra tārkṣyeṇāśu yayau nṛpa | abhyāśaṃ vajranābhasya mahādvandvasya bhārata

हिन्दी अर्थ

वीर! भरतनन्दन! नरेधर! तब वे मनके समान वेगशाली गरुड़के द्वारा तुरंत ही महान्‌ न्द्युद्ध करनेवाले वज़नाभके निकट जा पहुँचे

अध्याय 152

श्लोक 7

ततस्तार्क्ष्यगतो वीरस्ततर्द राणमूर्द्धनि ।वज्रनाभं स्थिरो भूत्वा सर्वास्त्रविदनिन्दितः

tatastārkṣyagato vīrastatarda rāṇamūrddhani | vajranābhaṃ sthiro bhūtvā sarvāstravidaninditaḥ

हिन्दी अर्थ

+ ७५९ सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंके ज्ञाता तथा निन्दारहित वीर , | प्रद्युप्न गरुड़पर स्थिरभावसे बैठकर युद्धके मुहानेपर वज्नाभको पीड़ा देने लगे

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श्लोक 8

तेन तार्क्ष्यगतेनैव गदया कृष्णसूनुना ।उरस्यभ्याहतो वीरो वज्रनाभो महात्मना

tena tārkṣyagatenaiva gadayā kṛṣṇasūnunā | urasyabhyāhato vīro vajranābho mahātmanā

हिन्दी अर्थ

गरुड़पर बैठे हुए ही महामना श्रीकृष्णकुमार प्रद्युप्नने वज़नाभकी छातीमें गदाद्वारा . | प्रहार किया

अध्याय 152

श्लोक 9

स तेनाभिहतो वीरो दैत्यो मोहवशं गतः ।चक्षार च भृशं रक्तं बभ्रामैव गतासुवत्

sa tenābhihato vīro daityo mohavaśaṃ gataḥ | cakṣāra ca bhṛśaṃ raktaṃ babhrāmaiva gatāsuvat

हिन्दी अर्थ

उनसे आहत होकर वह वीर दैत्य मूर्च्छित हो गया। उसने मुँहसे बहुत-सा रक्त वमन किया। उसे चक्कर आने लगा और वह मृतकतुल्य हो गया

अध्याय 152

श्लोक 10

आश्वसेत्यथ तं कार्ष्णिरुवाच रणदुर्जयः ।लब्धसंज्ञः स वीरस्तु प्रद्युम्नमिदमब्रवीत्

āśvasetyatha taṃ kārṣṇiruvāca raṇadurjayaḥ | labdhasaṃjñaḥ sa vīrastu pradyumnamidamabravīt

हिन्दी अर्थ

तब रणदुर्जय श्रीकृष्णकुमारने उससे कहा—"तुम आश्वस्त हो जाओ।' इससे सचेत होकर उस वीरने प्र्यु्से इस प्रकार कहा—

अध्याय 152

श्लोक 11

साधु यादव वीर्येण श्लाघ्यो मम रिपुर्भवान् ।प्रतिप्रहारकालोऽयं स्थिरो भव महाबल

sādhu yādava vīryeṇa ślāghyo mama ripurbhavān | pratiprahārakālo'yaṃ sthiro bhava mahābala

हिन्दी अर्थ

बहुत अच्छा, यादव ! तुम शत्रु होते हुए भी पराक्रमके द्वारा मेरे लिये स्पृहणीय हो। अब यह मेरी ओरसे तुम्हारे प्रहारका उत्तर देनेका अवसर आया है। अत: महाबली वीर! तुम स्थिर हो जाओ'

अध्याय 152

श्लोक 12

एवमुक्त्वा महानादं मुक्त्वा मेघशतोपमम् ।गदां मुमोच वेगेन सघण्टां बहुकण्टकाम्

evamuktvā mahānādaṃ muktvā meghaśatopamam | gadāṃ mumoca vegena saghaṇṭāṃ bahukaṇṭakām

हिन्दी अर्थ

ऐसा कहकर सैकड़ों मेघोंकी गर्जनाओंके समान महान्‌ सिंहनाद करके बहुत- से कण्टकों तथा घण्टोंवाली गदाको उसने वेगपूर्वक चलाया

अध्याय 152

श्लोक 13

तया ललाटेऽभिहतः प्रद्युम्नो गदया नृप ।उद्वमन् रुधिरं भूरि मुमोह यदुनन्दनः

tayā lalāṭe'bhihataḥ pradyumno gadayā nṛpa | udvaman rudhiraṃ bhūri mumoha yadunandanaḥ

हिन्दी अर्थ

नरेश्वर! उस गदाने प्रध्युप्नके ललाटपर गहरा आघात किया। अतः: यदुनन्दन प्रद्युप्न अधिक रक्त वमन करते हुए मूर््छित हो गये

अध्याय 152

श्लोक 14

तं दृष्ट्वा भगवान् कृष्णः पाञ्चजन्यं जलोद्भवम् ।दध्मावाश्वासनकरं पुत्रस्य रिपुनाशनः

taṃ dṛṣṭvā bhagavān kṛṣṇaḥ pāñcajanyaṃ jalodbhavam | dadhmāvāśvāsanakaraṃ putrasya ripunāśanaḥ

हिन्दी अर्थ

उन्हें अचेत हुआ देख शत्रुनाशन भगवान्‌ श्रीकृष्णने पुत्रको आश्वासन देनेके लिये समुद्रजलसे प्रकट हुए अपने पाज्जजन्य नामक शज्भुको बजाया

अध्याय 152

श्लोक 15

तं पाञ्चजन्यशब्देन प्रत्याश्वस्तं महाबलम् ।दृष्ट्वा प्रमुदिता लोका विशेषेणेन्द्रकेशवौ

taṃ pāñcajanyaśabdena pratyāśvastaṃ mahābalam | dṛṣṭvā pramuditā lokā viśeṣeṇendrakeśavau

हिन्दी अर्थ

पाज्ञजन्यके शब्दसे महाबली प्र्युम्रको आश्यस्त हुआ देख सब लोगोंको बड़ी प्रसन्नता हुई। विशेषत: इन्द्र और श्रीकृष्ण बहुत प्रसन्न हुए

अध्याय 152

श्लोक 16

तस्य चक्रं करे यातं कृष्णच्छन्देन भारत ।क्षुरनेमिसहस्रारं दैत्यसङ्घकुलान्तकम्

tasya cakraṃ kare yātaṃ kṛṣṇacchandena bhārata | kṣuranemisahasrāraṃ daityasaṅghakulāntakam

हिन्दी अर्थ

भारत! श्रीकृष्णकी इच्छासे उनका चक्र प्रद्युप्नके हाथमें चला गया। उसमें सहस्रों अरे थे और उसके नेमि या प्रान्तभागमें छुरे लगे हुए थे। वह चक्र दैत्यसमूहोंके वंशका विनाश करनेवाला था

अध्याय 152

श्लोक 17

तन्मुमोचाच्युतसुतस्तस्य नाशाय भारत ।नमस्कृत्वा सुरेन्द्राय कृष्णाय च महात्मने

tanmumocācyutasutastasya nāśāya bhārata | namaskṛtvā surendrāya kṛṣṇāya ca mahātmane

हिन्दी अर्थ

भारत ! श्रीकृष्णके पुत्र प्रद्युप्नने देवराज इन्द्र और महात्मा श्रीकृष्णको प्रणाम करके उस दैत्यके विनाशके लिये वह चक्र चला दिया

अध्याय 152

श्लोक 18

वज्रनाभस्य तत्कायादुच्चकर्त शिरस्तदा ।नारायणसुतोन्मुक्तं दैत्यानामनुपश्यताम्

vajranābhasya tatkāyāduccakarta śirastadā | nārāyaṇasutonmuktaṃ daityānāmanupaśyatām

हिन्दी अर्थ

श्रीकृष्णकुमार प्रद्युप्रके हाथसे छोड़े गये उस चक्रने उस समय समस्त दैत्योंके देखते-देखते वज़नाभके मस्तकको उसके धड़से काट गिराया

अध्याय 152

श्लोक 19

गदः सुनाभमवधीद् यतमान रणाजिरे ।हर्म्यपृष्ठे जिघांसन्तं रणदृप्तं भयानकम्

gadaḥ sunābhamavadhīd yatamāna raṇājire | harmyapṛṣṭhe jighāṃsantaṃ raṇadṛptaṃ bhayānakam

हिन्दी अर्थ

महलकी छतपर खड़े हुए गदने अपनेको मार डालनेकी इच्छावाले युद्धोन्‍्मत्त भयानक दैत्य सुनाभका, जो समराज़णमें विजयके लिये प्रयत्शील था, वध कर डाला

अध्याय 152

श्लोक 20

साम्बः समरमध्यस्थानसुरानरिमर्दनः ।निनाय निशितैर्बाणैः प्रेताधिपपरिग्रहम्

sāmbaḥ samaramadhyasthānasurānarimardanaḥ | nināya niśitairbāṇaiḥ pretādhipaparigraham

हिन्दी अर्थ

शत्रुमर्दन साम्बने भी समरके मध्यभागमें खड़े हुए असुरोंको अपने पैने बाणोंद्वारा यमराजके घर भेज दिया

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श्लोक 21

निकुम्भोऽपि हते वीरे वज्रनाभे महासुरे ।जगाम षट्पुरं वीरो नारायणभयार्दितः

nikumbho'pi hate vīre vajranābhe mahāsure | jagāma ṣaṭpuraṃ vīro nārāyaṇabhayārditaḥ

हिन्दी अर्थ

महान्‌ असुर वीर वज़नाभके मारे जानेपर नारायण श्रीकृष्ण)-के भयसे पीड़ित हुआ वीर निकुम्भ भी ट्पुरको चला गया

अध्याय 152

श्लोक 22

निबर्हिते देवरिपौ वज्रनाभे महासुरे ।अवतीर्णौ महात्मानौ हरी वज्रपुरं तदा

nibarhite devaripau vajranābhe mahāsure | avatīrṇau mahātmānau harī vajrapuraṃ tadā

हिन्दी अर्थ

जब देवद्रोही महान्‌ असुर ज़नाभका संहार हो गया, तब महात्मा श्रीकृष्ण और न्द्र दोनों वज्पुरमें उतरे

अध्याय 152

श्लोक 23

लब्धप्रशमनं चैव चक्रतुः सुरसत्तमौ ।सान्त्वयामासतुश्चैव बालवृद्धं भयार्दितम्

labdhapraśamanaṃ caiva cakratuḥ surasattamau | sāntvayāmāsatuścaiva bālavṛddhaṃ bhayārditam

हिन्दी अर्थ

उस समय उन दोनों श्रेष्ठ 'वताओंने वहाँ प्राप्त हुए दुःख और शोकका शमन केया। वहाँ बालकोंसे लेकर बूढ़ेतक सभी भयसे ीड़ित थे। उन सबको उन्होंने सान्त्वना दी

अध्याय 152

श्लोक 24

इन्द्रोपेन्द्रौ महात्मानौ मन्त्रयित्वा महाबलौ ।आयत्यां च तदात्वे च नृहस्पतिमतानुगौ

indropendrau mahātmānau mantrayitvā mahābalau | āyatyāṃ ca tadātve ca nṛhaspatimatānugau

श्लोक 24–26 का हिन्दी अर्थ

रेध्वर! उस समय महाबली महात्मा इन्द्र और उपेन्द्रने विष्य और वर्तमानके विषयमें परस्पर सलाह करके [हस्पतिके मतका अनुसरण करते हुए वज़नाभके उस ज्यको चार भागोंमें बाँट दिया। जनेश्वर! उन्होंने एक गौथाई भाग तो जयन्तके पुत्र विजयको दे दिया, दूसरा द्युभ्नके पुत्रको, तीसरा साम्बके पुत्रको दिया और ष चौथा भाग गदके पुत्र चन्द्रप्रभको अर्पित कर दया

अध्याय 152

श्लोक 25

वज्रनाभस्य तद् राज्यं चतुर्धा चक्रतुर्नृप ।विजयस्य चतुर्भागं जयन्ततनयस्य वै

vajranābhasya tad rājyaṃ caturdhā cakraturnṛpa | vijayasya caturbhāgaṃ jayantatanayasya vai

अर्थ श्लोक 24 के साथ

अध्याय 152

श्लोक 26

प्रद्युम्नस्य चतुर्भागं रौक्मिणेयसुतस्य च ।चन्द्रप्रभस्य ददतुश्चतुर्भागं जनेश्वर

pradyumnasya caturbhāgaṃ raukmiṇeyasutasya ca | candraprabhasya dadatuścaturbhāgaṃ janeśvara

अर्थ श्लोक 24 के साथ

अध्याय 152

श्लोक 27

कोट्यश्चतस्रो ग्रामाणामधिकास्ता विशाम्पते ।शाखापुरसहस्रं च स्फीतं वज्रपुरोपमम् ।चतुर्धा चक्रतुस्तत्र संहृष्टौ शक्रकेशवौ

koṭyaścatasro grāmāṇāmadhikāstā viśāmpate | śākhāpurasahasraṃ ca sphītaṃ vajrapuropamam | caturdhā cakratustatra saṃhṛṣṭau śakrakeśavau

हिन्दी अर्थ

प्रजानाथ ! वज़नाभके अधिकारमें चार रोड़से कुछ अधिक ग्राम थे तथा एक हजार शाखानगर बे, जो वज्पुरके समान ही वैभवशाली थे। हर्षमें भरे ए इन्द्र और श्रीकृष्णने वहाँकी सभी वस्तुओंके चार पग कर लिये थे

अध्याय 152

श्लोक 28

कम्बलाजिनवासांसि रत्नानि विविधानि च ।चतुर्द्धा चक्रतुर्वीरौ वीर वासवकेशवौ

kambalājinavāsāṃsi ratnāni vividhāni ca | caturddhā cakraturvīrau vīra vāsavakeśavau

हिन्दी अर्थ

वीर जनमेजय ! वीर इन्द्र और शवने वहाँ प्राप्त हुए कम्बल (कालीन), मृगचर्म, वस्त्र था भाँति-भाँतिके रत्नोंको भी चार भागोंमें बाँट दिया

अध्याय 152

श्लोक 29

ततोऽभिषिक्तास्ते वीरा राजानो वासवाज्ञया ।देवदुन्दुभिवाद्येन नृप विष्णुपदीजलैः

tato'bhiṣiktāste vīrā rājāno vāsavājñayā | devadundubhivādyena nṛpa viṣṇupadījalaiḥ

श्लोक 29–30 का हिन्दी अर्थ

रिश्वर! तदनन्तर इन्द्रकी आज्ञासे वे चारें वीर देवदुन्दुभियोंकी वनिके साथ गड़ाजीके जलसे राजाके पदपर अभिषिक्त ए। इन्द्र और श्रीकृष्णको आनन्दित करनेवाले उन चारों हात्मा राजकुमारोंको स्वयं इन्द्रदेव तथा बुद्धिमान श्रीकृष्णने इषिसमुदायके निकट अभिषिक्त किया

अध्याय 152

श्लोक 30

स्वयं शक्रेण देवेन केशवेन च धीमता ।ऋषिवंशे महात्मानः शक्रमाधवनन्दनाः

svayaṃ śakreṇa devena keśavena ca dhīmatā | ṛṣivaṃśe mahātmānaḥ śakramādhavanandanāḥ

अर्थ श्लोक 29 के साथ

अध्याय 152

श्लोक 31

विजयस्य प्रसिद्धेव गतिर्वियति धीमतः ।मातृजेन गुणेनापि माधवानां महात्मनाम्

vijayasya prasiddheva gatirviyati dhīmataḥ | mātṛjena guṇenāpi mādhavānāṃ mahātmanām

हिन्दी अर्थ

[द्धिमान्‌ू विजयकी आकाशमें चलने-फिरनेकी शक्ति प्रसिद्ध ही थी; महामनस्वी यादवकुमार भी अपनी ताओंके गुणसे नियुक्त हो आकाशमें चल-फिर सकते

अध्याय 152

श्लोक 32

अभिषिच्य जयन्तं तु वासवो भगवान् ब्रवीत् ।त्वयैते वीर संरक्ष्या राजानः समितिञ्जयाः

abhiṣicya jayantaṃ tu vāsavo bhagavān bravīt | tvayaite vīra saṃrakṣyā rājānaḥ samitiñjayāḥ

हिन्दी अर्थ

ऐश्वर्यशाली इन्द्रने उन चारोंका अभिषेक रके जयन्तसे कहा-'वीर! तुम्हें इन युद्धविजयी [जाओंकी भी रक्षा करनी चाहिये

अध्याय 152

श्लोक 33

मम वंशकरोऽत्रैकः केशवस्य त्रयोऽनघ ।अवध्याः सर्वभूतानां भविष्यन्ति ममाज्ञया

mama vaṃśakaro'traikaḥ keśavasya trayo'nagha | avadhyāḥ sarvabhūtānāṃ bhaviṣyanti mamājñayā

हिन्दी अर्थ

अनघ! इनमें कक तो मेरे वंशका प्रवर्तक है और तीन श्रीकृष्णके शका विस्तार करनेवाले हैं। ये सब मेरी आज्ञासे [मस्त प्राणियोंके लिये अवध्य होंगे

अध्याय 152

श्लोक 34

गमनागमनं चैव दिवि सिद्धं भविष्यति ।त्रिविष्टपं द्वारकां च रम्यां भैमाभिरक्षिताम्

gamanāgamanaṃ caiva divi siddhaṃ bhaviṣyati | triviṣṭapaṃ dvārakāṃ ca ramyāṃ bhaimābhirakṣitām

हिन्दी अर्थ

इनका आकाशमें गमनागमन स्वत:सिद्ध होगा। स्वर्गमें तथा यादवोंद्वारा सुरक्षित रमणीय द्वारकापुरीमें भी ये आते-जाते रहेंगे

अध्याय 152

श्लोक 35

दिशागजसुतान् नागान् हयांश्चोच्चैःश्रवोऽन्वयान् ।इच्छयैषां प्रयच्छस्व रथांस्त्वष्टृकृतानपि

diśāgajasutān nāgān hayāṃścoccaiḥśravo'nvayān | icchayaiṣāṃ prayacchasva rathāṃstvaṣṭṛkṛtānapi

हिन्दी अर्थ

दिग्गजोंके पुत्र जो हाथी हैं, उच्चै: श्रवाके कुलमें उत्पन्न जो घोड़े हैं तथा विश्वक्माकि बनाये जो रथ हैं, उन सबको इन्हें इच्छानुसार प्रदान करो

अध्याय 152

श्लोक 36

गजावैरावणसुतौ शत्रुञ्जयरिपुञ्जयौ ।प्रयच्छाकाशगौ वीर साम्बस्य च गदस्य च

gajāvairāvaṇasutau śatruñjayaripuñjayau | prayacchākāśagau vīra sāmbasya ca gadasya ca

श्लोक 36–37 का हिन्दी अर्थ

वीर! ऐरावतके पुत्र जो शत्रुजय और रिपुझ्य नामक आकाशगामी हाथी हैं, उन्हें साम्ब और गदको दे दो; जिससे वे दोनों भीमकुलनन्दन वीर यादवोंद्वारा सुरक्षित रमणीय द्वारकापुरीमें आकाशमार्गसे जा सकें तथा अपने दोनों पुत्रोंको देखनेके लिये यहाँ भी, जब इच्छा हो आ सकें '

अध्याय 152

श्लोक 37

आकाशेन पुरीं यातु द्वारकां भैमरक्षिताम् ।आयातु च सुतौ द्रष्टुं यथेष्टं भैमनन्दनौ

ākāśena purīṃ yātu dvārakāṃ bhaimarakṣitām | āyātu ca sutau draṣṭuṃ yatheṣṭaṃ bhaimanandanau

अर्थ श्लोक 36 के साथ

अध्याय 152

श्लोक 38

इति सन्दिश्य भगवान् देवराजः पुरन्दरः ।जगाम भगवान् स्वर्गं द्वारकामपि केशवः

iti sandiśya bhagavān devarājaḥ purandaraḥ | jagāma bhagavān svargaṃ dvārakāmapi keśavaḥ

हिन्दी अर्थ

ऐसा संदेश देकर ऐश्वर्यशाली देवराज इन्द्र स्वर्गको तथा भगवान्‌ केशव द्वारकापुरीको चले गये

अध्याय 152

श्लोक 39

षण्मासानुषितस्तत्र गदः प्रद्युम्न एव च ।साम्बश्च द्वारकां याता रूढे राज्ये महाबलाः

ṣaṇmāsānuṣitastatra gadaḥ pradyumna eva ca | sāmbaśca dvārakāṃ yātā rūḍhe rājye mahābalāḥ

हिन्दी अर्थ

गद, प्रद्युप्न और साम्ब-ये तीनों महाबली वीर वहाँ छः महीने और रह गये। जब वहाँका राज्य सुदृढ़ हो गया, तब वे द्वारकाको गये

अध्याय 152

श्लोक 40

अद्यापि तानि राज्यानि मेरोः पार्श्वे तथोत्तरे ।तिष्ठन्ति च जगद् यावत् स्थास्यन्त्यमरसन्निभ

adyāpi tāni rājyāni meroḥ pārśve tathottare | tiṣṭhanti ca jagad yāvat sthāsyantyamarasannibha

हिन्दी अर्थ

देवोपम वीर जनमेजय ! आज भी मेरुपर्वतके उत्तर पार्थमें वे राज्य विद्यमान हैं और जबतक यह संसार रहेगा, तबतक वे बने रहेंगे

अध्याय 152

श्लोक 41

निवृत्ते मौसले युद्धे स्वर्गं यातेषु वृष्णिषु ।गदप्रद्युम्नसाम्बास्ते गता वज्रपुरं विभो

nivṛtte mausale yuddhe svargaṃ yāteṣu vṛṣṇiṣu | gadapradyumnasāmbāste gatā vajrapuraṃ vibho

हिन्दी अर्थ

विभो! मौसलयुद्ध समाप्त होनेपर जब समस्त वृष्णिवंशी स्वर्गलोकको चले गये, तब गद, प्रद्युम्न और साम्ब वज़पुरमें गये थे

अध्याय 152

श्लोक 42

ततः प्रोष्य पुनर्यान्ति स्वर्ग स्वैः कर्मभिः शुभैः ।प्रसादेन च कृष्णस्य लोककर्तुर्जनेश्वर

tataḥ proṣya punaryānti svarga svaiḥ karmabhiḥ śubhaiḥ | prasādena ca kṛṣṇasya lokakarturjaneśvara

हिन्दी अर्थ

जनेधर ! वहाँ रहकर लोग लोककर्ता भगवान्‌ श्रीकृष्णके प्रसादसे अपने शुभ कर्मोंद्वारा पुन: स्वर्गलोकमें चले जाते हैं

अध्याय 152

श्लोक 43

प्रद्युम्नोत्तरमेतत् ते नृदेव कथितं मया ।धन्यं यशस्यमायुष्यं शत्रुनाशनमेव च

pradyumnottarametat te nṛdeva kathitaṃ mayā | dhanyaṃ yaśasyamāyuṣyaṃ śatrunāśanameva ca

श्लोक 43–44 का हिन्दी अर्थ

नरदेव! यह मैंने तुमसे प्रद्युप्नके उत्कर्षका वर्णन किया है। यह धन, यश तथा आयु प्रदान करनेवाला है। इसके पाठसे काम, क्रोध आदि शत्रुओंका नाश भी होता है। पुत्रों और पौनत्रोंकी वृद्धि होती है। आरोग्य तथा धन-सम्पत्तिकी प्राप्ति होती है एवं मनुष्य महानू यशका भागी होता है। जैसा कि ट्वैपायन व्यासका कथन है

अध्याय 152

श्लोक 44

पुत्रपौत्रा विवर्धन्ते आरोग्यधनसम्पदः ।यशो विपुलमाप्नोति द्वैपायनवचो यथा

putrapautrā vivardhante ārogyadhanasampadaḥ | yaśo vipulamāpnoti dvaipāyanavaco yathā

अर्थ श्लोक 43 के साथ

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

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आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

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पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.