Harivamsha Purana
160
अध्याय 160 / 318

Parva 2, Adhyāya 105

83 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ83 श्लोक

अध्याय 160

श्लोक 1

प्रद्युम्नेन शम्बरासुरस्य सेनायाः मन्त्रिणां च संहारः ततः प्रवृद्धं युद्धं तु तुमुलं लोमहर्षणम् ।शम्बरस्य तु पुत्राणां रुक्मिण्या नन्दनस्य च

pradyumnena śambarāsurasya senāyāḥ mantriṇāṃ ca saṃhāraḥ tataḥ pravṛddhaṃ yuddhaṃ tu tumulaṃ lomaharṣaṇam | śambarasya tu putrāṇāṃ rukmiṇyā nandanasya ca

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तत्पश्चात्‌ शम्बरासुरके पुत्रों तथा रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्नका घोर रोमाज्जकारी युद्ध आरम्भ हुआ

अध्याय 160

श्लोक 2

ततः क्रुद्धा महादैत्याः शरशक्तिपरश्वधान् ।चक्रतोमरकुन्तानि भुशुण्डीर्मुसलानि च

tataḥ kruddhā mahādaityāḥ śaraśaktiparaśvadhān | cakratomarakuntāni bhuśuṇḍīrmusalāni ca

श्लोक 2–8 का हिन्दी अर्थ

उस समय क्रोधमें भरे हुए बड़े-बड़े वेगशाली दैत्य एक ही साथ प्रद्युम्मपर बाण, शक्ति, फरसे, चक्र, तोमर, कुन्त, भुशुण्डी और मुसलोंकी वर्षा करने लगे। यह देख श्रीकृष्णकुमार प्रद्युम्न अत्यन्त कुपित हो उठे और अपने सर्वास्त्रवर्षी धनुषसे छूटे हुए पाँच-पाँच बाणोंद्वारा उन्होंने युद्धके मुहानेपर शत्रुओंके प्रत्येक अस्त्रको क्रोधपूर्वक काट डाला। तब वे सभी असुर पुनः कुपित हो युद्धके लिये दृढ़ निश्चय करके प्रदयुम्नके वधकी इच्छासे बाणसमूहोंकी वर्षा करने लगे। इससे अनड्स्वरूप प्रद्युम्नका क्रोध बहुत बढ़ गया। उन्होंने तुरंत ही धनुष हाथमें लेकर अपने बाणोंद्वारा शम्बरासुरके दस महाबली पुत्रोंको तत्काल कालके गालमें भेज दिया। तत्पश्चात्‌ कुपित हुए पराक्रमी केशवकुमारने दूसरे भल्लसे बड़ी शीघ्रताके साथ चित्रसेनका मस्तक काट डाला। तदनन्तर जो मरनेसे बच गये, वे सब एक साथ संगठित होकर युद्ध करने लगे। बाणोंकी वर्षा करते हुए उन्होंने प्र्युम्नको मार डालनेकी इच्छासे उनपर धावा किया। वे बाणोंको धनुषपर रखकर युद्धके लिये उत्सुक हो उन्हें छोड़ने लगे

अध्याय 160

श्लोक 3

युगपत् पातयन्ति स्म प्रद्युम्नोपरि वेगिताः ।कार्ष्णायनिस्तु सङ्क्रुद्धः सर्वास्त्रधनुषश्च्युतैः

yugapat pātayanti sma pradyumnopari vegitāḥ | kārṣṇāyanistu saṅkruddhaḥ sarvāstradhanuṣaścyutaiḥ

अर्थ श्लोक 2 के साथ

अध्याय 160

श्लोक 4

एकैकं पञ्चभिः क्रुद्धश्चिच्छेद रणमूर्धनि ।पुनरेवासुराः क्रुद्धाः सर्वे ते कृतनिश्चयाः

ekaikaṃ pañcabhiḥ kruddhaściccheda raṇamūrdhani | punarevāsurāḥ kruddhāḥ sarve te kṛtaniścayāḥ

अर्थ श्लोक 2 के साथ

अध्याय 160

श्लोक 5

ववृषुः शरजालानि प्रद्युम्नवधकाङ्क्षया ।ततः प्रकुपितोऽनङ्गो धनुरादाय सत्वरः

vavṛṣuḥ śarajālāni pradyumnavadhakāṅkṣayā | tataḥ prakupito'naṅgo dhanurādāya satvaraḥ

अर्थ श्लोक 2 के साथ

अध्याय 160

श्लोक 6

शम्बरस्य जघानाशु दश पुत्रान् महौजसः ।ततोऽपरेण भल्लेन कुपितः केशवात्मजः

śambarasya jaghānāśu daśa putrān mahaujasaḥ | tato'pareṇa bhallena kupitaḥ keśavātmajaḥ

अर्थ श्लोक 2 के साथ

अध्याय 160

श्लोक 7

चिच्छेदाशु शिरस्तस्य चित्रसेनस्य वीर्यवान् ।ततस्ते हतशेषास्तु समेत्य समयुद्ध्यत

cicchedāśu śirastasya citrasenasya vīryavān | tataste hataśeṣāstu sametya samayuddhyata

अर्थ श्लोक 2 के साथ

अध्याय 160

श्लोक 8

शरवर्षं विमुञ्चन्तो ह्यभ्यधावञ्जिघांसितुम् ।ततः सन्धाय बाणांस्ते विमुञ्चन्तो रणोत्सुकाः

śaravarṣaṃ vimuñcanto hyabhyadhāvañjighāṃsitum | tataḥ sandhāya bāṇāṃste vimuñcanto raṇotsukāḥ

अर्थ श्लोक 2 के साथ

अध्याय 160

श्लोक 9

क्रीडन्निव महातेजाः शिरांस्येषामपातयत् ।निहत्य समरे सर्वाञ्छतमुत्तमधन्विनाम्

krīḍanniva mahātejāḥ śirāṃsyeṣāmapātayat | nihatya samare sarvāñchatamuttamadhanvinām

श्लोक 9–13 का हिन्दी अर्थ

महातेजस्वी प्रद्युम्न खेल-सा करते हुए इनके मस्तक काट-काटकर गिराने लगे। समराड्णमें जो सौ उत्तम धनुर्धर वीर थे, उन सबका संहार करके वे मनमें और भी युद्धकी अभिलाषा लिये संग्रामके मुहानेपर खड़े हो गये। अपने सौ पुत्रोंका वध हुआ सुनकर शम्बरासुरको बड़ा क्रोध हुआ। उसने सारथिको आदेश दिया कि मेरे रथको जोतो। राजाकी यह बात सुनकर सारथिने पृथ्वीपर मस्तक टेककर प्रणाम किया और सेनासहित रथको पूरी सावधानीके साथ युद्धके लिये प्रेरित किया। उस रथमें एक सहस्र मृग जुते हुए थे। वह सर्पोंकी रस्सियोंसे जोता गया था। वह रथ व्याघ्रचर्मसे ढका हुआ था, उसमें घुँघुरुओंकी माला शोभा दे रही थी, वह कृत्रिम पशु-पक्षियोंसे व्याप्त तथा दस चित्रभागोंसे विभूषित था

अध्याय 160

श्लोक 10

प्रद्युम्नः समराकाङ्क्षी तस्थौ सङ्ग्राममूर्धनि ।हतं पुत्रशतं श्रुत्वा शम्बरः क्रोधमादधे

pradyumnaḥ samarākāṅkṣī tasthau saṅgrāmamūrdhani | hataṃ putraśataṃ śrutvā śambaraḥ krodhamādadhe

अर्थ श्लोक 9 के साथ

अध्याय 160

श्लोक 11

सूतं सञ्चोदयामास रथं मे सम्प्रयोजय ।राज्ञो वाक्यं निशम्याथ प्रणम्य शिरसा भुवि

sūtaṃ sañcodayāmāsa rathaṃ me samprayojaya | rājño vākyaṃ niśamyātha praṇamya śirasā bhuvi

अर्थ श्लोक 9 के साथ

अध्याय 160

श्लोक 12

ससैन्यं नोदयामास रथं स सुसमाहितम् ।युक्तमृष्यसहस्रेण सर्पयोक्त्रेण योजितम्

sasainyaṃ nodayāmāsa rathaṃ sa susamāhitam | yuktamṛṣyasahasreṇa sarpayoktreṇa yojitam

अर्थ श्लोक 9 के साथ

अध्याय 160

श्लोक 13

शार्दूलचर्मसंविष्टं किङ्किणीजालमालिनम् ।ईहामृगगणाकीर्णं पङ्क्तिभक्तिविराजितम्

śārdūlacarmasaṃviṣṭaṃ kiṅkiṇījālamālinam | īhāmṛgagaṇākīrṇaṃ paṅktibhaktivirājitam

अर्थ श्लोक 9 के साथ

अध्याय 160

श्लोक 14

ताराचित्रपिनद्धाङ्गं स्वर्णकृबरभूषितम् ।सुपताकमहोच्छ्रायं मृगराजोग्रकेतनम्

tārācitrapinaddhāṅgaṃ svarṇakṛbarabhūṣitam | supatākamahocchrāyaṃ mṛgarājograketanam

हिन्दी अर्थ

उसके सारे अड्ध तारिकाओंके चित्रसे व्याप्त थे। सोनेका कूबर उस रथकी शोभा बढ़ा रहा था। उसका बहुत ही ऊँचा भाग सुन्दर पताकाओंसे सुशोभित था। उसमें सिंहके चिहनवाली उग्र ध्वजा फहरा रही थी

अध्याय 160

श्लोक 15

सुविभक्तवरूथं च लोहेषावज्रकूबरम् ।मन्दरोदग्रशिखरं चारुचामरभूषितम्

suvibhaktavarūthaṃ ca loheṣāvajrakūbaram | mandarodagraśikharaṃ cārucāmarabhūṣitam

हिन्दी अर्थ

उस रथका आवरण सुन्दर विभागपूर्वक बना हुआ था। उसमें लोहेके हरसे और वज़्रमणिजटित कूबर शोभा पाते थे। उसका शिखर मन्दराचलके समान ऊँचा था। वह सुन्दर चँवरसे विभूषित था

अध्याय 160

श्लोक 16

नक्षत्रमालापिहितं हेमदण्डसमाहितम् ।विराजमानं श्रीमन्तमारोहच्छम्बरो रथम्

nakṣatramālāpihitaṃ hemadaṇḍasamāhitam | virājamānaṃ śrīmantamārohacchambaro ratham

हिन्दी अर्थ

नक्षत्रोंकी मालाओंसे आवृत तथा सुवर्णमय दण्डसे सुस्थिर बने हुए उस शोभाशाली कान्तिमान्‌ू रथपर शम्बरासुर आरूढ़ हुआ

अध्याय 160

श्लोक 17

काञ्चनं चित्रसन्नाहं धनुर्गृह्य शरांस्तथा ।प्रस्थितः समराकाङ्क्षी मृत्युना परिचोदितः

kāñcanaṃ citrasannāhaṃ dhanurgṛhya śarāṃstathā | prasthitaḥ samarākāṅkṣī mṛtyunā paricoditaḥ

हिन्दी अर्थ

सोनेका विचित्र कवच, धनुष और बाण धारण करके कालसे प्रेरित हो युद्धकी इच्छासे वह प्रस्थित हुआ

अध्याय 160

श्लोक 18

चतुर्भिः सचिवैः सार्द्धं सैन्येन महता वृतः ।दुर्धरः केतुमाली च शत्रुहन्ता प्रमर्दनः

caturbhiḥ sacivaiḥ sārddhaṃ sainyena mahatā vṛtaḥ | durdharaḥ ketumālī ca śatruhantā pramardanaḥ

श्लोक 18–20 का हिन्दी अर्थ

उसके साथ चार मन्त्री थे और वह विशाल सेनासे घिरा हुआ था। दुर्धर, केतुमाली, शत्रुहन्ता और प्रमर्दन-इन मन्त्रियोंसे घिरा हुआ वह युद्धकी इच्छासे रणभूमिकी ओर प्रस्थित हुआ। दस हजार हाथी, दो सौ रथ, आठ हजार घोड़े और दस लाख पैदल, इतने योद्धाओंसे घिरे हुए शम्बरासुरने उस समय युद्धके लिये प्रस्थान किया

अध्याय 160

श्लोक 19

एतैः परिवृतोऽमात्यैर्युयुत्सुः प्रस्थितो रणे ।दशनागसहस्राणि रथानां द्वे शते तथा

etaiḥ parivṛto'mātyairyuyutsuḥ prasthito raṇe | daśanāgasahasrāṇi rathānāṃ dve śate tathā

अर्थ श्लोक 18 के साथ

अध्याय 160

श्लोक 20

हयानां चाष्टसाहस्रैः प्रयुतैश्च पदातिनाम् ।एतैः परिवृतो योधैः शम्बरः प्रययौ तदा

hayānāṃ cāṣṭasāhasraiḥ prayutaiśca padātinām | etaiḥ parivṛto yodhaiḥ śambaraḥ prayayau tadā

अर्थ श्लोक 18 के साथ

अध्याय 160

श्लोक 21

प्रयातस्य तु सङ्ग्रामे उत्पाता बहवोऽभवन् ।गृध्रचक्राकुलं व्योम सन्ध्याकाराभ्रनादितम्

prayātasya tu saṅgrāme utpātā bahavo'bhavan | gṛdhracakrākulaṃ vyoma sandhyākārābhranāditam

हिन्दी अर्थ

युद्धके लिये जाते समय उसके सामने बहुत-से उत्पात प्रकट हुए। आकाशमें गृक्नोंका मण्डल मँडराने लगा। पंध्याकालके समान लाल रड़के बादल गड़गड़ाने लगे

अध्याय 160

श्लोक 22

गर्जन्ति परुषं मेघा निर्घातश्चाम्बरात् पतत् ।शिवा विनेदुरशिवं सैन्यं सङ्कालयन्महत्

garjanti paruṣaṃ meghā nirghātaścāmbarāt patat | śivā vineduraśivaṃ sainyaṃ saṅkālayanmahat

हिन्दी अर्थ

मेघ बड़े कठोर शब्दमें गर्जना करने लगे, आकाशसे बिजली गिरने लगी, गीदड़ियाँ अमज्लसूचक बोली बोलने लगीं, जिससे सेनाके महान्‌ संहारकी पूचना मिलती थी

अध्याय 160

श्लोक 23

ध्श्जशीर्षेऽपतद्गृध्रः काङ्क्षन् वै दानवासृजम् ।रथाग्रे पतितश्चास्य कबन्धो भुवि दृश्यते

dhśjaśīrṣe'patadgṛdhraḥ kāṅkṣan vai dānavāsṛjam | rathāgre patitaścāsya kabandho bhuvi dṛśyate

हिन्दी अर्थ

गीध दानवोंके रक्तका पान क्ररनेकी इच्छा रखकर उसकी ध्वजाके अग्रभागपर जा बैठा । उसके रथके सामने पृथ्वीपर कबन्ध पड़ा हुआ दिखायी देने लगा

अध्याय 160

श्लोक 24

चीचीकूचीति वाशन्ति शम्बरस्य रथोपरि ।स्वर्भानुग्रस्त आदित्यः परिघैः परिवेष्टितः

cīcīkūcīti vāśanti śambarasya rathopari | svarbhānugrasta ādityaḥ parighaiḥ pariveṣṭitaḥ

हिन्दी अर्थ

शम्बरासुरके रथके ऊपर बहुत-से पक्षी 'चीची कूची' ऐसी बोली बोलने लगे। पूर्वको राहुने ग्रस लिया और उनपर अनेक घेरे पड़ ये

अध्याय 160

श्लोक 25

स्फुरते नयनं चास्य सव्यं भयनिवेदनम् ।बाहुः प्रकम्पते सव्यः प्रास्खलन्रथवाजिनः

sphurate nayanaṃ cāsya savyaṃ bhayanivedanam | bāhuḥ prakampate savyaḥ prāskhalanrathavājinaḥ

हिन्दी अर्थ

उसका बायाँ नेत्र फड़कने लगा, जो भयकी पूचना दे रहा था। बायीं भुजा काँपने लगी और रथके ओोड़े लड़खड़ाकर गिरने लगे

अध्याय 160

श्लोक 26

ध्वाङ्क्षो मूर्घ्नि निपतितः शम्बरस्य सुरारिणः ।ववर्ष रुधिरं देवः शर्कराङ्गारमिश्रितम्

dhvāṅkṣo mūrghni nipatitaḥ śambarasya surāriṇaḥ | vavarṣa rudhiraṃ devaḥ śarkarāṅgāramiśritam

हिन्दी अर्थ

देवद्रोही शम्बरासुरके मस्तकपर कौआ जा बैठा, पर्जन्यदेव कंकड़ और अज्ञारोंसे मिश्रित रक्तकी वर्षा करने लगे

अध्याय 160

श्लोक 27

उल्कापातसहस्राणि निपेत् रणमूर्धनि ।प्रतोदो न्यपतद्धस्तात् सारथेर्हययायिनः

ulkāpātasahasrāṇi nipet raṇamūrdhani | pratodo nyapataddhastāt sāratherhayayāyinaḥ

हिन्दी अर्थ

संग्रामके मुहानेपर सहस्रों उल्कापात होने लगे, घोड़े हाँकनेवाले सारथिके हाथसे चाबुक गिर पड़ा

अध्याय 160

श्लोक 28

एतानचिन्तयित्वा तु उत्पातान् समुपस्थितान् ।प्रययौ शम्बरः क्रुद्धः प्रद्युम्नवधकाङ्क्षया

etānacintayitvā tu utpātān samupasthitān | prayayau śambaraḥ kruddhaḥ pradyumnavadhakāṅkṣayā

हिन्दी अर्थ

इन उपस्थित हुए उत्पातोंकी कोई परवा न करके क्रोधमें भरा हुआ शम्बरासुर प्रद्युम्मको मार डालनेकी इच्छासे आगे बढ़ा

अध्याय 160

श्लोक 29

भेरीमृदङ्गशङ्खानां पणवानकदुन्दुभेः ।युगपन्नाद्यमानानां पृथिवी समकम्पत

bherīmṛdaṅgaśaṅkhānāṃ paṇavānakadundubheḥ | yugapannādyamānānāṃ pṛthivī samakampata

हिन्दी अर्थ

उस समय एक ही साथ भेरी, मृदज्भ, शड्भ, पणव, आनक और दुन्दुभि आदि बाजे बज उठे। उनकी तुमुल ध्वनिसे यह पृथ्वी काँपने लगी

अध्याय 160

श्लोक 30

तेन शब्देन महता सन्त्रस्ता मृगपक्षिणः ।समन्ताद् दुद्रुवुस्तस्माद् भयविक्लवचेतसः

tena śabdena mahatā santrastā mṛgapakṣiṇaḥ | samantād dudruvustasmād bhayaviklavacetasaḥ

हिन्दी अर्थ

उस महान्‌ शब्दसे सारे पशु-पक्षी संत्रस्त हो गये और भयसे व्याकुलचित्त होकर सब ओर भागने लगे

अध्याय 160

श्लोक 31

रणमध्ये स्थितः कार्ष्णिश्चिन्तयन्निधनं रिपोः ।सैन्यैः परिवृतोऽसङ्ख्यैर्युद्धाय कृतनिश्चयः

raṇamadhye sthitaḥ kārṣṇiścintayannidhanaṃ ripoḥ | sainyaiḥ parivṛto'saṅkhyairyuddhāya kṛtaniścayaḥ

हिन्दी अर्थ

उस समय रणभूमिके मध्यभागमें शत्रुके वधका चिन्तन करते हुए श्रीकृष्णकुमार प्रद्युम्न असंख्य सेनाओंसे घिरे हुए युद्धके लिये दृढ़ निश्चय करके खड़े हुए थे

अध्याय 160

श्लोक 32

क्रुद्धः शरसहस्रेण प्रद्युम्नं समताडयत् ।सम्प्राप्ताश्चैव तान् बाणांश्चिच्छेद कृतहस्तवत्

kruddhaḥ śarasahasreṇa pradyumnaṃ samatāḍayat | samprāptāścaiva tān bāṇāṃściccheda kṛtahastavat

हिन्दी अर्थ

शम्बरासुरने कुपित होकर प्रधुम्नपर एक हजार बाणोंका प्रहार किया, उन बाणोंको अपने पास आते ही प्रद्युम्नने एक सिद्धहस्त योद्धाकी भाँति काट डाला

अध्याय 160

श्लोक 33

प्रद्युम्नो धनुरादाय शरवर्षं मुमोच ह ।तस्मिन्सैन्येन कोऽप्यस्ति यो न विद्धः शरेण वै

pradyumno dhanurādāya śaravarṣaṃ mumoca ha | tasminsainyena ko'pyasti yo na viddhaḥ śareṇa vai

हिन्दी अर्थ

अब प्रच्युम्न धनुष लेकर ब्राणोंकी वर्षा करने लगे। उस समय उस सेनामें ऐसा क्रोई भी सैनिक नहीं था, जो उनके बाणोंसे विद्ध न दुआ हो

अध्याय 160

श्लोक 34

प्रद्युम्नशरपातेन तत् सैन्यं विमुखीकृतम् ।शम्बरस्य तथाभ्याशे स्थितं संहृत्य भीतवत्

pradyumnaśarapātena tat sainyaṃ vimukhīkṛtam | śambarasya tathābhyāśe sthitaṃ saṃhṛtya bhītavat

हिन्दी अर्थ

प्रद्युम्नके बाणोंके प्रहारसे वह सारी पेना युद्धसे विमुख हो गयी तथा भयभीतकी भाँति शम्बरासुरके समीप सिमटकर खड़ी हो गयी

अध्याय 160

श्लोक 35

स्वबलं विद्रुतं दृष्ट्वा शम्बरः क्रोधमूर्च्छितः ।आज्ञापयामास तदा सचिवान् दानवेश्वरः

svabalaṃ vidrutaṃ dṛṣṭvā śambaraḥ krodhamūrcchitaḥ | ājñāpayāmāsa tadā sacivān dānaveśvaraḥ

हिन्दी अर्थ

अपनी सेनाको भागती देख दानवराज शम्बर क्रोधसे भचेत-सा हो गया। उस समय उसने अपने मन्त्रियोंको भाज्ञा दी—

अध्याय 160

श्लोक 36

गच्छध्वं मन्नियोगेन प्रहरध्वं रिपोः सुतम् ।नोपेक्षणीयः शत्रुर्वै वध्यतां क्षिप्रमेष वै

gacchadhvaṃ manniyogena praharadhvaṃ ripoḥ sutam | nopekṣaṇīyaḥ śatrurvai vadhyatāṃ kṣiprameṣa vai

हिन्दी अर्थ

तुम सब लोग जाओ और मेरे भादेशसे शत्रुके उस पुत्रपर प्रहार करो । तुम्हें इस शत्रुकी पेक्षा नहीं करनी चाहिये। इसे शीघ्र ही मार डालो

अध्याय 160

श्लोक 37

उपेक्षित इव व्याधिः शरीरं नाशयेद् धुवम् ।तदेष दुर्मतिः पापो वध्यतां मत्प्रियेप्सया

upekṣita iva vyādhiḥ śarīraṃ nāśayed dhuvam | tadeṣa durmatiḥ pāpo vadhyatāṃ matpriyepsayā

हिन्दी अर्थ

यदि इसकी उपेक्षा की गयी तो यह उपेक्षित रोगकी पाँति निश्चय ही शरीरका नाश कर डालेगा, अत: मेरा प्रेय करनेकी इच्छासे इस दुर्बुद्धि पापीका वध कर डालो '

अध्याय 160

श्लोक 38

ततस्ते सचिवाः कुद्धाः शिरसा गृह्य शासनम् ।शरवर्षं विमुञ्चन्तस्त्वरिता नोदयन् रथान्

tataste sacivāḥ kuddhāḥ śirasā gṛhya śāsanam | śaravarṣaṃ vimuñcantastvaritā nodayan rathān

हिन्दी अर्थ

तब उन मन्त्रियोंने स्वामीकी आज्ञाको शरोधार्य करके क्रोधपूर्वक बाणवर्षा करते हुए बड़ी तावलीके साथ रथोंको हाँका

अध्याय 160

श्लोक 39

तान् दृष्ट्वा धावतः सङ्ख्ये क्रुद्धो मकरकेतनः ।चापमुद्यम्य सम्भ्रान्तस्तस्थौ प्रमुखतो बली

tān dṛṣṭvā dhāvataḥ saṅkhye kruddho makaraketanaḥ | cāpamudyamya sambhrāntastasthau pramukhato balī

हिन्दी अर्थ

युद्धमें उन्हें धावा करते देख बलवान्‌ मकरध्वज प्रद्युम्न भी कुपित हो उठे और बड़े वेगसे धनुष उठाकर शत्रुओंके सामने खड़े हो ये

अध्याय 160

श्लोक 40

दुर्धरं पञ्चविंशत्या शरैः सन्नतपर्वभिः ।बिभेद सुमहातेजाः केतुमालिं त्रिषष्टिभिः

durdharaṃ pañcaviṃśatyā śaraiḥ sannataparvabhiḥ | bibheda sumahātejāḥ ketumāliṃ triṣaṣṭibhiḥ

श्लोक 40–41 का हिन्दी अर्थ

रुक्मिणीका आनन्द बढ़ानेवाले महातेजस्वी ुम्नने अत्यन्त अमर्षमें भरकर झुकी हुई गाँठवाले च्चीस बाणोंसे दुर्धरको, तिरसठ बाणोंसे केतुमालीको, सत्तर बाणोंसे शत्रुहन्ताको और बयासी बाणों से प्रमर्दनको घायल कर दिया

अध्याय 160

श्लोक 41

सप्तत्या शत्रुहन्तारं द्व्यशीत्या तु प्रमर्दनम् ।बिभेद परमामर्षी रुक्मिण्या नन्दिवर्धनः

saptatyā śatruhantāraṃ dvyaśītyā tu pramardanam | bibheda paramāmarṣī rukmiṇyā nandivardhanaḥ

अर्थ श्लोक 40 के साथ

अध्याय 160

श्लोक 43

ततस्ते सचिवाः क्रुद्धाः प्रद्युम्नं शरवृष्टिभिः ।एकैकशो बिभेदाजौ षष्टिभिः षष्टिभिः शरैः ४२॥ तानप्राप्ताञ्छरान् बाणैश्चिच्छेद मकरध्वजः ।ततोऽर्द्धचन्द्रमादाय दुर्द्धरस्य स सारथिम्

tataste sacivāḥ kruddhāḥ pradyumnaṃ śaravṛṣṭibhiḥ | ekaikaśo bibhedājau ṣaṣṭibhiḥ ṣaṣṭibhiḥ śaraiḥ 42|| tānaprāptāñcharān bāṇaiściccheda makaradhvajaḥ | tato'rddhacandramādāya durddharasya sa sārathim

श्लोक 43–53 का हिन्दी अर्थ

उन बाणोंको अपने पास आनेसे पहले ही प्रद्युम्नने तीखे सायकोंसे काट डाला। तत्पश्चात्‌ एक अर्धचन्द्राकार बाण लेकर समस्त राजाओं और उनके सैनिकोंके देखते-देखते दुर्धरके सारथिको मार डाला। फिर उत्तम गाँठवाले, कड्पत्रयुक्त चार तीखे नाराचोंद्वारा दुर्धरके रथसम्बन्धी चार घोड़ोंको कालके गालमें भेज दिया। इसके बाद एक बाणसे रथको जोड़नेवाली रस्सी, छत्र और ध्वज तथा एक बाणसे बन्धुरके टुकड़े-टुकड़े कर डाले। फिर साठ बाणोंसे प्रद्युम्नने रथके जुए, धुरे और पहियोंको भी काट डाला। तदनन्तर प्रद्युम्नने कड्पक्षीके पर लगे हुए और अत्यन्त तेज किये हुए एक बाणको लेकर दूसरेके आश्रयपर जीनेवाले दुर्धरके हृदयपर छोड़ा। तब वह दुर्धर निष्प्राण हो शोभा और सत्त्वसे रहित हो गया। उसकी कान्ति फीकी पड़ गयी। वह रथकी बैठकमेंसे नीचे गिर पड़ा। उस समय वह, जिसका पुण्य क्षीण हो गया हो ऐसे ग्रहके समान दीखने लगा। दुर्धर शूर दानव था, उसके मारे जानेपर दानवेधर केतुमाली भी कृष्णकुमार प्रद्युम्नपर बाणोंके समूहोंको छोड़ता हुआ चढ़ आया। तदनन्तर क्रोधमें भरा हुआ केतुमाली भ्रुकुटी चढ़ाकर मुखको भीषण बना प्रद्युम्नपर सहसा दौड़ पड़ा और उनसे कहने लगा खड़ा रह! खड़ा रह! !' यह सुनकर श्रीकृष्णकुमार प्रद्युम्नको बड़ा क्रोध हुआ, उन्होंने बाणोंकी वर्षा करके केतुमालीको ढक दिया, ठीक उसी तरह जैसे वर्षा-ऋतुमें बादल जलकी धाराओंसे पर्वतको आच्छादित कर देता है। धनुर्धर प्रदयुम्नके द्वारा घायल हुए दानवमन्त्री केतुमालीने प्रदुम्नका वध करनेकी इच्छासे चक्र लेकर उनके ऊपर चलाया। श्रीकृष्णके चक्रके समान तेजस्वी उस सहस््रार चक्रको पास आया देख प्रद्युम्नने सहसा उछलकर उसे पकड़ लिया और सबके देखते-देखते उस समय उसी चक्रसे केतुमालीका सिर काट लिया ॥ ढइ—

अध्याय 160

श्लोक 44

जघान पश्यतां राज्ञां सर्वेषां सैनिकस्य वै ।चतुर्भिरथ नाराचैः सुपर्वैः कङ्कतेजितैः

jaghāna paśyatāṃ rājñāṃ sarveṣāṃ sainikasya vai | caturbhiratha nārācaiḥ suparvaiḥ kaṅkatejitaiḥ

अर्थ श्लोक 43 के साथ

अध्याय 160

श्लोक 45

जघान चतुरः सोऽश्वान्दुर्धरस्य रथं प्रति ।एकेन योक्त्रं छत्रं च ध्वजमेकेन बन्धुरम्

jaghāna caturaḥ so'śvāndurdharasya rathaṃ prati | ekena yoktraṃ chatraṃ ca dhvajamekena bandhuram

अर्थ श्लोक 43 के साथ

अध्याय 160

श्लोक 46

षष्ट्या च युगचक्राक्षं चिच्छेद मकरध्वजः ।अथापरं शरं गृह्य कङ्कपत्रं सुतेजितम्

ṣaṣṭyā ca yugacakrākṣaṃ ciccheda makaradhvajaḥ | athāparaṃ śaraṃ gṛhya kaṅkapatraṃ sutejitam

अर्थ श्लोक 43 के साथ

अध्याय 160

श्लोक 47

मुमोच हृदये तस्य दुर्द्धरस्यान्यजीविनः ।स गतासुर्गतश्रीको गतसत्त्वो गतप्रभः

mumoca hṛdaye tasya durddharasyānyajīvinaḥ | sa gatāsurgataśrīko gatasattvo gataprabhaḥ

अर्थ श्लोक 43 के साथ

अध्याय 160

श्लोक 48

निपपात रथोपस्थात् क्षीणपुण्य इव ग्रहः ।दुर्धरे निहते शूरे दानवे दानवेश्वरः

nipapāta rathopasthāt kṣīṇapuṇya iva grahaḥ | durdhare nihate śūre dānave dānaveśvaraḥ

अर्थ श्लोक 43 के साथ

अध्याय 160

श्लोक 49

केतुमाली शरव्रातैरभिदुद्राव कृष्णजम् ।प्रद्युम्नमथ सङ्क्रुद्धो भ्रुकुटीभीषणाननः

ketumālī śaravrātairabhidudrāva kṛṣṇajam | pradyumnamatha saṅkruddho bhrukuṭībhīṣaṇānanaḥ

अर्थ श्लोक 43 के साथ

अध्याय 160

श्लोक 50

कृत्वाभ्यधावत्सहसा तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत् ।सङ्क्रुद्धः कृष्णसूनुस्तु शरवर्षैरवाकिरत्

kṛtvābhyadhāvatsahasā tiṣṭha tiṣṭheti cābravīt | saṅkruddhaḥ kṛṣṇasūnustu śaravarṣairavākirat

अर्थ श्लोक 43 के साथ

अध्याय 160

श्लोक 51

पर्वतं वारिधाराभिः प्रावृषीव यथा घनः ।स विद्धो दानवामात्यः प्रद्युम्नेन धनुष्मता

parvataṃ vāridhārābhiḥ prāvṛṣīva yathā ghanaḥ | sa viddho dānavāmātyaḥ pradyumnena dhanuṣmatā

अर्थ श्लोक 43 के साथ

अध्याय 160

श्लोक 52

चक्रमादाय चिक्षेप प्रद्युम्नवधकाङ्क्षया ।तं तु प्राप्तं सहस्रारं कृष्णचक्रसमद्युतिम्

cakramādāya cikṣepa pradyumnavadhakāṅkṣayā | taṃ tu prāptaṃ sahasrāraṃ kṛṣṇacakrasamadyutim

अर्थ श्लोक 43 के साथ

अध्याय 160

श्लोक 53

निपत्योत्पत्य सहसा सर्वेषामेव पश्यताम् ।तेनैव तस्य चिच्छेद केतुमालेः शिरस्तदा

nipatyotpatya sahasā sarveṣāmeva paśyatām | tenaiva tasya ciccheda ketumāleḥ śirastadā

अर्थ श्लोक 43 के साथ

अध्याय 160

श्लोक 54

तद् दृष्ट्वा कर्म विपुलं रौक्मिणेयस्य देवराट् ।विस्मयं परमं प्राप्तः सर्वैर्देवगणैः सह ।गन्धर्वाप्सरसश्चैव पुष्पवर्षैरवाकिरन्

tad dṛṣṭvā karma vipulaṃ raukmiṇeyasya devarāṭ | vismayaṃ paramaṃ prāptaḥ sarvairdevagaṇaiḥ saha | gandharvāpsarasaścaiva puṣpavarṣairavākiran

हिन्दी अर्थ

तमोउध्याय: + ७९३ रुक्मिणीकुमारका वह महान्‌ कर्म देखकर समस्त देवताओंसहित देवराज इन्द्रको बड़ा विस्मय हुआ। उस समय गन्धर्वों और अप्सराओंने उनके ऊपर फूलोंकी वर्षा की

अध्याय 160

श्लोक 55

केतुमालिं हतं दृष्ट्वा शत्रुहन्ता प्रमर्दनः ।महाबलसमूहेन प्रद्युम्नमथ दुद्रुवे

ketumāliṃ hataṃ dṛṣṭvā śatruhantā pramardanaḥ | mahābalasamūhena pradyumnamatha dudruve

हिन्दी अर्थ

केतुमालीको मारा गया देख शत्रुहन्ता और प्रमर्दन विशाल सैन्यसमूहके साथ प्रद्युम्मपर टूट पड़े

अध्याय 160

श्लोक 56

ते गदां मुसलं चक्रं प्रासतोमरसायकान् ।भिन्दिपालान्कुठारांश्च भास्वरान्कूटमुद्गरान्

te gadāṃ musalaṃ cakraṃ prāsatomarasāyakān | bhindipālānkuṭhārāṃśca bhāsvarānkūṭamudgarān

श्लोक 56–59 का हिन्दी अर्थ

वे गदा, मुसल, चक्र, प्रास, तोमर, सायक, भिन्दिपाल, कुठार और चमकीले कूटमुद्गरोंको एक साथ ही श्रीकृष्णकुमारके वधके लिये उनके ऊपर फेंकने लगे। वीर प्रद्युम्नने भी अपने हाथोंकी फुर्ती दिखाते हुए शस्त्रसमूहोंद्वारा शन्रुओंके अस्त्र-जालके बारम्बार बहुतेरे टुकड़े कर डाले। उन्होंने कुपित होकर सहस्रों हाथियों और हाथीसवारोंको मार डाला । सारधियोंसहित रथों और घोड़ोंको भी रौंदकर मिट्टीमें मिला दिया। उन सबको धराशायी करते हुए प्रच्युम्नने अपने बाण-समूहोंद्वारा समस्त सैनिकोंको वींध डाला। कोई भी ऐसा नहीं दिखायी देता था, जो उनके बाणोंसे विद्ध न हुआ हो

अध्याय 160

श्लोक 57

युगपत् सङ्क्षिपन्ति स्म वधार्थं कृष्णनन्दने ।सोऽपि तान्यस्त्रजालानि शस्त्रजालैरनेकधा

yugapat saṅkṣipanti sma vadhārthaṃ kṛṣṇanandane | so'pi tānyastrajālāni śastrajālairanekadhā

अर्थ श्लोक 56 के साथ

अध्याय 160

श्लोक 58

चिच्छेद बहुधा वीरो दर्शयन्पाणिलाघवम् ।गजान्सोऽभ्यहनत्कुद्धो गजारोहान्सहस्रशः

ciccheda bahudhā vīro darśayanpāṇilāghavam | gajānso'bhyahanatkuddho gajārohānsahasraśaḥ

अर्थ श्लोक 56 के साथ

अध्याय 160

श्लोक 59

रथान् सारथिभिः सार्धं हयांश्चैव ममर्द ह ।पातयंस्ताञ्छरव्रातैर्नाविद्धः कश्चिदीक्ष्यते

rathān sārathibhiḥ sārdhaṃ hayāṃścaiva mamarda ha | pātayaṃstāñcharavrātairnāviddhaḥ kaścidīkṣyate

अर्थ श्लोक 56 के साथ

अध्याय 160

श्लोक 60

एवं सर्वाणि सैन्यानि ममन्थ मकरध्वजः ।नदीं प्रावर्तयद् घोरां शोणिताम्बुतरङ्गिणीम्

evaṃ sarvāṇi sainyāni mamantha makaradhvajaḥ | nadīṃ prāvartayad ghorāṃ śoṇitāmbutaraṅgiṇīm

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार मकरध्वजने शत्रुकी सारी सेनाओंको मथ डाला और एक भयानक नदी बहा दी, जो रक्तमय जलकी तरड़्ोंसे सुशोभित होती थी

अध्याय 160

श्लोक 61

मुक्ताहारोर्मिबहुलां मांसमेदःसपङ्किनीम् ।छत्रद्वीपां शरावर्तां रथैः पुलिनमण्डिताम्

muktāhārormibahulāṃ māṃsamedaḥsapaṅkinīm | chatradvīpāṃ śarāvartāṃ rathaiḥ pulinamaṇḍitām

हिन्दी अर्थ

मोतियोंके हार उसमें उठती हुई बहुसंख्यक लहरोंके समान प्रतीत होते थे। वसा और मेदे कीचके समान जान पड़ते थे। छत्र द्वीप और बाण आवर्त ( भँवर )-के समान थे। रथ ही उस नदीके तट बनकर उसकी शोभा बढ़ाते थे

अध्याय 160

श्लोक 62

केयूरकुण्डलाकूर्मां ध्वजमत्स्यविभूषिताम् ।नागग्राहवतीं रौद्रामसिनक्रविभूषिताम्

keyūrakuṇḍalākūrmāṃ dhvajamatsyavibhūṣitām | nāgagrāhavatīṃ raudrāmasinakravibhūṣitām

हिन्दी अर्थ

केयूर और कुण्डल उसमें कछुएका श्रम उत्पन्न करते थे। ध्वजरूपी मत्स्य उसकी शोभा बढ़ाते थे। हाथीरूपी ग्राहोंसे युक्त होनेके कारण वह बड़ी भयड्र जान पड़ती थी । खड्गरूपी नाकें उसके आभूषण थे

अध्याय 160

श्लोक 63

केशशैवलसञ्छन्नां श्रोणिसूत्रमृणालिकाम् ।वराननसुपद्मां च हम्मचामरवीजिताम्

keśaśaivalasañchannāṃ śroṇisūtramṛṇālikām | varānanasupadmāṃ ca hammacāmaravījitām

हिन्दी अर्थ

वह केशरूपी सेवारसे ढकी हुई थी, कटिसूत्र कमलनालके समान प्रतीत होते थे, सुन्दर मुख ही उसमें खिले हुए मनोहर कमल थे, हिलते हुए चँवर हंसोंके पड्सज्ञालनकी भाँति प्रतीत होते थे, मानो उनके द्वारा उस नदीको हवा की जा रही थी

अध्याय 160

श्लोक 64

शिरस्तिमिसमाकीर्णो शोणितौघप्रवर्तिनीम् ।नदीं दुस्तरणीं भीमामनङ्गेन प्रवर्तिताम्

śirastimisamākīrṇo śoṇitaughapravartinīm | nadīṃ dustaraṇīṃ bhīmāmanaṅgena pravartitām

श्लोक 64–65 का हिन्दी अर्थ

(हाथी आदि पशुओंके कटे हुए) मस्तक उसमें तिमि नामक मत्स्यके प्रमान सब ओर व्याप्त थे। वह शोणितकी वेगयुक्त धारा त्हा रही थी। अनज्स्वरूप प्रद्युम्नके द्वारा बहायी गयी त्रह रक्तनदी अत्यन्त दुस्तर, दुर्लक्ष्य, दुर्गम एवं भयंकर थी। तेजोहीन पुरुषोंके लिये उसे पार करना अत्यन्त कठिन था । शस्त्ररूपी ग्राहोंसे युक्त वह घोर नदी यमराजके ज्यकी वृद्धि कर रही थी

अध्याय 160

श्लोक 65

दुष्प्रेक्षां दुर्गमां रौद्रां हीनतेजःसुदुस्तराम् ।शस्त्रग्राहवतीं घोरां यमराष्ट्रविवर्द्धनीम्

duṣprekṣāṃ durgamāṃ raudrāṃ hīnatejaḥsudustarām | śastragrāhavatīṃ ghorāṃ yamarāṣṭravivarddhanīm

अर्थ श्लोक 64 के साथ

अध्याय 160

श्लोक 66

तत्र रुक्मिसुतः श्रीमान्विलोडयति धन्विनः ।शत्रुहन्तारमाश्रित्य शरानभ्यकिरद् बहून्

tatra rukmisutaḥ śrīmānviloḍayati dhanvinaḥ | śatruhantāramāśritya śarānabhyakirad bahūn

हिन्दी अर्थ

उस युद्धमें श्रीमान्‌ रुक्मिणीकुमार प्रद्युम्नने बहुत- से धनुर्धरोंको मथ डाला और शत्रुहन्तापर अनेक बाणोंकी वर्षा की

अध्याय 160

श्लोक 67

शत्रुहन्ता पुनः क्रुद्धो मुमोच शरमुत्तमम् ।प्रद्युम्नस्य समासाद्य हृदये निपपात ह

śatruhantā punaḥ kruddho mumoca śaramuttamam | pradyumnasya samāsādya hṛdaye nipapāta ha

हिन्दी अर्थ

तब पुन: क्रोधमें भरे हुए शात्रुहन्ताने एक उत्तम बाण छोड़ा, जो प्रद्युम्नकी छातीपर जाकर लगा

अध्याय 160

श्लोक 68

स विद्धस्तेन बाणेन प्रद्युम्नो न व्यकम्पत ।शक्तिं जग्राह बलवाञ्छत्रुहन्त्रे मुमूर्षवे

sa viddhastena bāṇena pradyumno na vyakampata | śaktiṃ jagrāha balavāñchatruhantre mumūrṣave

हिन्दी अर्थ

उस बाणसे घायल होकर बलवान्‌ प्रदयुम्न तनिक भी विचलित नहीं हुए, उन्होंने मरणासन्न शत्रुहन्ताके लिये एक शक्ति उठायी

अध्याय 160

श्लोक 69

सा क्षिप्ता रौक्मिणेयेन शक्तिर्ज्वालाकुला रणे ।पपात हृदयं भित्त्वा शक्राशनिसमस्वना

sā kṣiptā raukmiṇeyena śaktirjvālākulā raṇe | papāta hṛdayaṃ bhittvā śakrāśanisamasvanā

हिन्दी अर्थ

रणभूमिमें रुक्मिणीकुमारने वह अग्निकी ज्वालासे युक्त शक्ति चला दी। इन्द्रके वज्रकी भाँति गड़गड़ाहट पैदा करती हुई वह शक्ति शत्रुहन्ताका हृदय विदीर्ण करके पृथ्वीपर गिर पड़ी

अध्याय 160

श्लोक 70

स भिन्नहृच्च स्रस्ताङ्गो मुक्तमर्मास्थिबन्धनः ।पपात रुधिरोद्गारी शत्रुहन्ता महाबलः

sa bhinnahṛcca srastāṅgo muktamarmāsthibandhanaḥ | papāta rudhirodgārī śatruhantā mahābalaḥ

हिन्दी अर्थ

हृदय विदीर्ण हो जानेसे उसके सारे अड् शिथिल हो गये, मर्मस्थानों और अस्थियोंके बन्धन खुल गये, उस दशामें महाबली शत्रुहन्ता रक्त वमन करता हुआ धरतीपर गिर पड़ा

अध्याय 160

श्लोक 71

पतितं शत्रुहन्तारं दृष्ट्वा तस्थौ प्रमर्दनः ।जग्राह मुसलं सोऽथ वचनं चेदमाददे

patitaṃ śatruhantāraṃ dṛṣṭvā tasthau pramardanaḥ | jagrāha musalaṃ so'tha vacanaṃ cedamādade

हिन्दी अर्थ

शत्रुहन्ताको धराशायी हुआ देख प्रमर्दन युद्धके लिये डट गया। उसने मुसल हाथमें ले लिया और यह बात कही-

अध्याय 160

श्लोक 72

तिष्ठ किं प्राकृतैरेभिः करिष्यसि रणप्रियः ।मां योधयस्व दुर्बुद्धे ततस्त्वं न भविष्यसि

tiṣṭha kiṃ prākṛtairebhiḥ kariṣyasi raṇapriyaḥ | māṃ yodhayasva durbuddhe tatastvaṃ na bhaviṣyasi

हिन्दी अर्थ

अरे! खड़ा रह! तुझे युद्ध बड़ा प्रिय है न? इन प्राकृत सैनिकोंके मारनेसे तू क्या लाभ उठायेगा। दुर्बुद्धे! तू मेरे साथ युद्ध कर, फिर तो तू नहीं हो जायगा

अध्याय 160

श्लोक 73

वृष्णिवंशकुले जातः शत्रुरस्मत्पिता तव ।पुत्रं हन्तास्त्वहं तस्य ततोऽसौ निहतो भवेत्

vṛṣṇivaṃśakule jātaḥ śatrurasmatpitā tava | putraṃ hantāstvahaṃ tasya tato'sau nihato bhavet

हिन्दी अर्थ

तू वृष्णिकुलमें उत्पन्न हुआ है, तेरा पिता हमलोगोंका शत्रु है, मैं उसके पुत्रको मार डालूँगा, फिर वह स्वयं ही मर जायगा

अध्याय 160

श्लोक 74

मृतेन तेन दुर्बुद्धे सर्वदेवक्षयो भवेत् ।दैतेया दानवाः सर्वे मोदन्तां हतशत्रवः

mṛtena tena durbuddhe sarvadevakṣayo bhavet | daiteyā dānavāḥ sarve modantāṃ hataśatravaḥ

हिन्दी अर्थ

दुर्ुद्ध! उसके मरनेसे समस्त देवताओंका क्षय हो जायगा, इस प्रकार अपने शत्रुओंके मर जानेपर समस्त दैत्य और दानव आनन्दके भागी होंगे

अध्याय 160

श्लोक 75

हते त्वयि ममास्त्रेण त्वत्समुत्थैश्च शोणितैः ।शम्बरस्य तु पुत्राणां करोम्युदकसत्क्रियाम्

hate tvayi mamāstreṇa tvatsamutthaiśca śoṇitaiḥ | śambarasya tu putrāṇāṃ karomyudakasatkriyām

हिन्दी अर्थ

मेरे अस्त्रसे तेरा वध हो जानेपर तेरे ही रक्तसे मैं शम्बरासुरके पुत्रोंका तर्पण करूँगा

अध्याय 160

श्लोक 76

अद्य सा भीष्मकसुता करुणं विलपिष्यति ।निहतं त्वां च श्रुत्वैव यौवनस्थं गतायुषम्

adya sā bhīṣmakasutā karuṇaṃ vilapiṣyati | nihataṃ tvāṃ ca śrutvaiva yauvanasthaṃ gatāyuṣam

हिन्दी अर्थ

आज वह भीष्मककी पुत्री रुक्मिणी तो तुझ-जैसे नौजवान बेटेको मारा गया और गतायु हुआ सुनकर निश्चय ही करुण विलाप करेगी

अध्याय 160

श्लोक 77

स ते पिता चक्रधरो निष्फलाशो भविष्यति ।हतं त्वां स विदित्वाथ प्राणांस्त्यक्ष्यति मन्दधीः

sa te pitā cakradharo niṣphalāśo bhaviṣyati | hataṃ tvāṃ sa viditvātha prāṇāṃstyakṣyati mandadhīḥ

हिन्दी अर्थ

तेरे उस पिता चक्रधारी कृष्णकी आशा अब निष्फल हो जायगी। तुझे मारा गया जानकर वह मन्दबुद्धि मानव अपने प्राणोंका परित्याग कर देगा'

अध्याय 160

श्लोक 78

इत्युक्त्वा परिघेणाशु ताडयद्रुक्मिणीसुतम् ।ताडितो हि महातेजा रौक्मिणेयः प्रतापवान्

ityuktvā parigheṇāśu tāḍayadrukmiṇīsutam | tāḍito hi mahātejā raukmiṇeyaḥ pratāpavān

श्लोक 78–80 का हिन्दी अर्थ

ऐसा कहकर उसने तुरंत ही रुक्मिणी- कुमार प्रद्युम्मपर परिघसे प्रहार किया। उससे ताड़ित हुए महान्‌ तेजस्वी और प्रतापी प्रद्युम्नने अपनी दोनों ततमो5ध्याय: + ७९५ भुजाओंसे उसके रथको ही ऊपरको उछाल दिया और न पृथ्वीपर गिराकर चूर-चूर कर डाला। प्रमर्दन उस रथसे _ कूदकर पैदल ही युद्धके लिये खड़ा हो गया और अपनी उस प्रसिद्ध गदाको हाथमें लेकर उसने सहसा रुक्मिणीकुमारपर आक्रमण किया, परंतु प्रद्युम्नने उसकी फेंकी हुई उस गदासे ही प्रमर्दनको मार गिराया

अध्याय 160

श्लोक 79

दोर्भ्यामुत्क्षिप्य तस्यैव रथ मह्यां व्यचूर्णयत् ।सोऽवप्लुत्य रथात्तस्मात्पदातिरवतस्थिवान्

dorbhyāmutkṣipya tasyaiva ratha mahyāṃ vyacūrṇayat | so'vaplutya rathāttasmātpadātiravatasthivān

अर्थ श्लोक 78 के साथ

अध्याय 160

श्लोक 80

तां गदां गृह्य सहसा रौक्मिणेयमुपाद्रवत् ।तयैव गदया कामः प्रमर्दनमपोथयत्

tāṃ gadāṃ gṛhya sahasā raukmiṇeyamupādravat | tayaiva gadayā kāmaḥ pramardanamapothayat

अर्थ श्लोक 78 के साथ

अध्याय 160

श्लोक 81

हते प्रमर्दने दैत्ये दृष्ट्वा सर्वे प्रदुद्रुवुः ।न शक्ताः प्रमुखे स्थातुं सिंहत्रासाद् गजा इव

hate pramardane daitye dṛṣṭvā sarve pradudruvuḥ | na śaktāḥ pramukhe sthātuṃ siṃhatrāsād gajā iva

हिन्दी अर्थ

दैत्य प्रमर्दनके मारे जानेपर समस्त असुर सैनिक भाग खड़े हुए। सिंहके भयसे भागे हुए हाथियोंके समान वे प्रद्युम्नके सामने ठहर न सके

अध्याय 160

श्लोक 82

सारमेयं यथा दृष्ट्वाविगणो वै पलायते ।तथा सेना विषीदन्ती प्रद्युम्नस्य भयार्दिता

sārameyaṃ yathā dṛṣṭvāvigaṇo vai palāyate | tathā senā viṣīdantī pradyumnasya bhayārditā

हिन्दी अर्थ

जैसे शिकारी कुत्तेको देखकर भेड़ोंका समूह पलायन करने लगता है, उसी प्रकार प्र्ुम्नके भयसे पीड़ित हुई दैत्यसेना विषादग्रस्त होकर भागने लगी

अध्याय 160

श्लोक 83

क्षतजादिग्धवस्त्रा वै मुक्तकेशा विशोभना ।रजस्वलेव युवतिः सेना समवगूहते

kṣatajādigdhavastrā vai muktakeśā viśobhanā | rajasvaleva yuvatiḥ senā samavagūhate

हिन्दी अर्थ

उन सब सैनिकोंके वस्त्र खूनसे रंग गये थे, केश खुले हुए थे। वे शोभाहीन हो गये थे। इस अवस्थामें वह दैत्यसेना रजस्वला युवतीकी भाँति कहीं छिप जानेका प्रयत्न करने लगी

अध्याय 160

श्लोक 84

मदनशरविभिन्ना सैनिकानभ्ययायाद् युवतिसदृशवेषा साध्वसैः पीड्यमाना ।रतिसमरमशक्ता वीक्षितुं सोच्छ्वसन्ती स्वगृहगमनकामा नेच्छते स्थातुमत्र

madanaśaravibhinnā sainikānabhyayāyād yuvatisadṛśaveṣā sādhvasaiḥ pīḍyamānā | ratisamaramaśaktā vīkṣituṃ socchvasantī svagṛhagamanakāmā necchate sthātumatra

हिन्दी अर्थ

युवतीके समान वेष धारण करनेवाली वह दैत्यसेना कामदेव (प्रद्युम्न)- के बाणोंसे घायल हो सैनिकोंकी ओर चली। उस समय वह भय आदिसे पीड़ित हो रही थी। समररूपी सुरतको तो देखनेमें भी असमर्थ थी, केवल उच्छूवास लेती हुई अपने घरको जाना चाहने लगी, वहाँ ठहरना नहीं

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

धर्म ग्रंथ निःशुल्क और विज्ञापन-रहित है। Dharma Granth is free and has no ads. इसे ऐसा बनाए रखने में सहयोग करेंHelp keep it that way → How it is funded

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.