Harivamsha Purana
183
अध्याय 183 / 318

Parva 2, Adhyāya 128

41 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ41 श्लोक

अध्याय 183

श्लोक 1

द्वारकायां उत्सवः, उषसः अन्तःपुरे प्रवेशं सत्कारं च, श्रीकृष्णस्य विष्णुपर्वस्य च महिमा, पर्वस्य उपसंहारं अथाहुको महाबाहुः कृष्णं प्राह महाद्युतिः ।हर्षादुत्फुल्लनयनः श्रूयतां यदुनन्दन

dvārakāyāṃ utsavaḥ, uṣasaḥ antaḥpure praveśaṃ satkāraṃ ca, śrīkṛṣṇasya viṣṇuparvasya ca mahimā, parvasya upasaṃhāraṃ athāhuko mahābāhuḥ kṛṣṇaṃ prāha mahādyutiḥ | harṣādutphullanayanaḥ śrūyatāṃ yadunandana

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर महाबाहु महातेजस्वी उग्रसेनने, जिनके नेत्र हर्षसे खिल उठे थे, भगवान्‌ श्रीकृष्णसे कहा—'यदुनन्दन ! सुनिये

अध्याय 183

श्लोक 2

एवं गतेऽनिरुद्धस्य क्रियतां महदुत्सवः ।क्षेमात् प्रत्यागतं दृष्ट्वा सेव्यमाना महामते

evaṃ gate'niruddhasya kriyatāṃ mahadutsavaḥ | kṣemāt pratyāgataṃ dṛṣṭvā sevyamānā mahāmate

श्लोक 2–3 का हिन्दी अर्थ

महामते ! जब अनिरुद्ध कुशलपूर्वक द्वारका लौट आये और उन्हें देख लिया गया, ऐसी दशामें उनके लिये कोई महान्‌ उत्सव रचाया जाय—ऐसा मेरा विचार है। महाभागा उषा भी सखियोंसे सेवित हो उनसे घिरी रहती है और अनिरुद्धसे मिलकर बड़ी प्रसन्नताके साथ आनन्दपूर्वक समय बिताती है

अध्याय 183

श्लोक 3

उषापि च महाभागा सखीभिः परिवारिता ।रमते परया प्रीत्या चानिरुद्धेन सङ्गता

uṣāpi ca mahābhāgā sakhībhiḥ parivāritā | ramate parayā prītyā cāniruddhena saṅgatā

अर्थ श्लोक 2 के साथ

अध्याय 183

श्लोक 4

कुम्भाण्डदुहिता रामा उषायाः सखिमण्डले ।प्रवेश्यतां महाभागा वैदर्भी वर्द्धयेत् पुनः

kumbhāṇḍaduhitā rāmā uṣāyāḥ sakhimaṇḍale | praveśyatāṃ mahābhāgā vaidarbhī varddhayet punaḥ

हिन्दी अर्थ

उषाकी सखियोंके समुदायमें जो कुम्भाण्डकी पुत्री रामा है, उसको अन्तःपुरमें प्रवेश कराया जाय और महाभागा विदर्भनन्दिनी रुक्मिणी पुन: अपनी पुत्रवधूके रूपमें उसका अभिनन्दन करें

अध्याय 183

श्लोक 5

साम्बाय दीयतां रामा कुम्भाण्डदुहिता शुभा ।शेषाश्च कन्या न्यस्यन्तां कुमाराणां यथाक्रमम्

sāmbāya dīyatāṃ rāmā kumbhāṇḍaduhitā śubhā | śeṣāśca kanyā nyasyantāṃ kumārāṇāṃ yathākramam

हिन्दी अर्थ

कुम्भाण्डकी शुभलक्षणा कन्या रामा साम्बको विवाह दी जाय और शेष कन्याएँ भी क्रमश: अन्यान्य कुमारोंको सौंप दी जायेँ'

अध्याय 183

श्लोक 6

वर्तते सोत्सवस्तत्र अनिरुद्धस्य वेश्मनि ।गृहे श्रीधन्वनश्चैव शुभस्तत्र प्रवर्तते

vartate sotsavastatra aniruddhasya veśmani | gṛhe śrīdhanvanaścaiva śubhastatra pravartate

हिन्दी अर्थ

(उग्रसेनके ऐसा कहनेपर) अनिरुद्ध और श्रीधन्वाके भवनमें उस शुभ उत्सवका आरम्भ हुआ

अध्याय 183

श्लोक 7

वादयन्ति पुरे तत्र नार्यो मदवशं गताः ।नृत्यन्ते चाप्सरास्तत्र गायन्ति च तथापराः

vādayanti pure tatra nāryo madavaśaṃ gatāḥ | nṛtyante cāpsarāstatra gāyanti ca tathāparāḥ

हिन्दी अर्थ

वहाँ नगरकी नारियाँ मदमत्त होकर बाजे बजाने लगीं, कुछ अप्सराएँ नृत्य करने लगीं और दूसरी गीत गाने लगीं

अध्याय 183

श्लोक 8

काश्चित् प्रमुदितास्तत्र काश्चिदन्योन्यमब्रुवन् ।नानावर्णाम्वरधराः क्रीडमानास्ततस्ततः

kāścit pramuditāstatra kāścidanyonyamabruvan | nānāvarṇāmvaradharāḥ krīḍamānāstatastataḥ

हिन्दी अर्थ

कुछ स्त्रियाँ वहाँ आनन्द- विनोदमें मग्र थीं, कुछ आपसमभें बातें कर रही थीं तथा बहुत-सी स्थ्रियाँ नाना प्रकारके वस्त्र धारण किये इधर-उधर भाँति-भाँतिकी क्रीड़ाएँ करती थीं

अध्याय 183

श्लोक 9

अभियान्ति ततोऽन्योन्यं काश्चिन्मदवशात् स्वयम् ।क्रीडन्ति काश्चिदक्षैस्तु हर्षादुत्फुल्ललोचनाः

abhiyānti tato'nyonyaṃ kāścinmadavaśāt svayam | krīḍanti kāścidakṣaistu harṣādutphullalocanāḥ

हिन्दी अर्थ

कितनी ही स्त्रियाँ यौवनमदके वशीभूत हो स्वयं ही परस्पर आलिद्गन करती थीं और कितनी घ्यूतक्रीड़ामें लगी हुई थीं, उन सबके नेत्र हर्षसे खिल उठे थे

अध्याय 183

श्लोक 10

मायूरं रथमारुह्य सखीभिः परिवारिता ।उषा सम्प्रेषिता देव्या रुद्राण्या प्रतिगृह्यताम्

māyūraṃ rathamāruhya sakhībhiḥ parivāritā | uṣā sampreṣitā devyā rudrāṇyā pratigṛhyatām

श्लोक 10–11 का हिन्दी अर्थ

(जब पहले-पहल उषाका रथ द्वारपर आया। उस समय भगवान्‌ श्रीकृष्णने रुक्मिणीसे कहा—) 'देवि! रुद्र-पत्नी पार्वतीदेवीने सखियोंसे घिरी हुई उषाको मयूरयुक्त रथपर चढ़ाकर यहाँ भेजा है। तुम इसे ग्रहण करो। उत्तम कुलकी दृष्टिसे यह हमारे लिये स्पृहणीय है। इस श्रेष्ठ एवं सुन्दरी कन्याका नाम उषा है। यह बाणासुरकी पुत्री और तुम्हारी बहू है, तुम इस भामिनीको सादर ग्रहण करो'

अध्याय 183

श्लोक 11

इयं चैव कुलश्लाघ्या नाम्नोषा सुन्दरी वरा ।बाणपुत्री तव वधूः प्रतिगृह्णीष्व भामिनीम्

iyaṃ caiva kulaślāghyā nāmnoṣā sundarī varā | bāṇaputrī tava vadhūḥ pratigṛhṇīṣva bhāminīm

अर्थ श्लोक 10 के साथ

अध्याय 183

श्लोक 12

ततः प्रतिगृहीता सा स्त्रीभिराचारमङ्गलैः ।प्रवेशिता च सा वेश्म अनिरुद्धस्य शोभना

tataḥ pratigṛhītā sā strībhirācāramaṅgalaiḥ | praveśitā ca sā veśma aniruddhasya śobhanā

हिन्दी अर्थ

तब अन्त:पुरकी स्त्रियोंने मज़लाचारपूर्वक उस न्दरी बहूको ग्रहण किया और उसे अनिरुद्धके हलमें पहुँचाया

अध्याय 183

श्लोक 13

देवकी रोहिणी चैव रुक्मिण्यथ विदर्भजा ।दृष्ट्वानिरुद्धं रोदन्त्यः स्नेहहर्षसमन्विताः

devakī rohiṇī caiva rukmiṇyatha vidarbhajā | dṛṣṭvāniruddhaṃ rodantyaḥ snehaharṣasamanvitāḥ

हिन्दी अर्थ

देवकी, रोहिणी, रुक्मिणी और शुभाड़ी आदि स्त्रियाँ अनिरुद्धको देखकर ख्ेह और हर्षसे विह्नल हो रोने लगीं

अध्याय 183

श्लोक 14

रेवती रुक्मिणी चैव गृहमुख्यं प्रवेशयत् ।वधूर्वर्धसि दिष्ट्या त्वमनिरुद्धस्य दर्शनात्

revatī rukmiṇī caiva gṛhamukhyaṃ praveśayat | vadhūrvardhasi diṣṭyā tvamaniruddhasya darśanāt

हिन्दी अर्थ

रेवती और क्मिणीने अनिरुद्धको उनके श्रेष्ठ भवनमें पहुँचाया और यु्नपत्री शुभाड्ीसे कहा—' बहू ! आज तुम अपने पुत्र निरुद्धको देखकर अभ्युदयशालिनी हुई हो। यह बड़े ौभाग्यकी बात है '

अध्याय 183

श्लोक 15

ततस्तूर्यप्रणादैस्ता वरनार्यः शुभाननाः ।क्रियामारेभिरे कर्तुमुषा च गृहसंस्थिता

tatastūryapraṇādaistā varanāryaḥ śubhānanāḥ | kriyāmārebhire kartumuṣā ca gṛhasaṃsthitā

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर सुन्दर मुखवाली सुन्दरी स्त्रियाँ नाना प्रकारके वाद्योंकी ध्वनिके साथ लाचारका सम्पादन करने लगीं और उषा घरके भीतर राजमान हुई

अध्याय 183

श्लोक 16

ततो हर्म्यतलस्था सा वृष्णिपुङ्गवसंस्थिता ।रमते सर्वसदृशैरुपभोगैर्वरानना

tato harmyatalasthā sā vṛṣṇipuṅgavasaṃsthitā | ramate sarvasadṛśairupabhogairvarānanā

हिन्दी अर्थ

सुमुखी उषा अट्टालिकामें वृष्णिपुद्वव निरुद्धके साथ रहकर अपने योग्य समस्त उपभोगोंके रा आनन्दपूर्वक समय बिताने लगी

अध्याय 183

श्लोक 17

चित्रलेखा च सुश्रोणी अप्सरारूपधारिणी ।आपृच्छ्य च सखीवर्गमुषां च त्रिदिवं गता

citralekhā ca suśroṇī apsarārūpadhāriṇī | āpṛcchya ca sakhīvargamuṣāṃ ca tridivaṃ gatā

हिन्दी अर्थ

सुन्दर टिप्रदेशवाली अप्सरारूपधारिणी चित्रलेखा उषा तथा न्य सखियोंसे विदा ले स्वर्गलोकको चली गयी

अध्याय 183

श्लोक 18

गतासु तासु सर्वासु सखीष्वसुरसुन्दरी ।मायावत्या गृहं नीता प्रथमं सा निमन्त्रिता

gatāsu tāsu sarvāsu sakhīṣvasurasundarī | māyāvatyā gṛhaṃ nītā prathamaṃ sā nimantritā

हिन्दी अर्थ

न सब सखियोंके चले जानेपर असुरसुन्दरी उषाको बसे पहले मायावतीने निमन्त्रति किया और वह उसे पने घरमें ले गयी

अध्याय 183

श्लोक 19

सा तु प्रद्युम्नगृहिणी स्नुषा दृष्ट्वा सुमध्यमा ।वासोभिरन्नपानैश्च पूजयामास सुन्दरीम्

sā tu pradyumnagṛhiṇī snuṣā dṛṣṭvā sumadhyamā | vāsobhirannapānaiśca pūjayāmāsa sundarīm

हिन्दी अर्थ

प्रद्युप्पत्नी सुमध्यमा मायावतीने स सुन्दरी पुत्रवधूको देखकर अन्न, पान और वस्त्र ादिके द्वारा उसका सत्कार किया

अध्याय 183

श्लोक 20

ततः क्रमेण सर्वास्ता वधूमूषां यदुस्त्रियः ।आचारमनुपश्यन्त्यः स्वधर्ममुपचक्रिरे

tataḥ krameṇa sarvāstā vadhūmūṣāṃ yadustriyaḥ | ācāramanupaśyantyaḥ svadharmamupacakrire

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर दुकुलकी सभी स्त्रियोंने अपने कुलाचारपर दृष्टि वकर क्रमश: बहू उषाको बुलाया और स्वधर्मका लन किया

अध्याय 183

श्लोक 21

एतत् ते सर्वमाख्यातं मया कुरुकुलोद्वह ।यथा बाणो जितः सङ्ख्ये जीवन्मुक्तश्च विष्णुना

etat te sarvamākhyātaṃ mayā kurukulodvaha | yathā bāṇo jitaḥ saṅkhye jīvanmuktaśca viṣṇunā

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—कुरुकुलधुरन्धर जनमेजय ! गवान्‌ श्रीकृष्णने युद्धमें जिस प्रकार बाणासुरको जीता और जीवित छोड़ दिया, यह सब प्रसंग मैंने तुमसे ह सुनाया

अध्याय 183

श्लोक 22

द्वारकायां ततः कृष्णो रेमे यदुगणैर्वृतः ।अन्वशासन्महीं कृत्स्नां परया संयुतो मुदा

dvārakāyāṃ tataḥ kṛṣṇo reme yadugaṇairvṛtaḥ | anvaśāsanmahīṃ kṛtsnāṃ parayā saṃyuto mudā

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर यादवोंसे घिरे हुए भगवान्‌ कृष्ण द्वारकामें सुखपूर्वक रहने लगे। वे परमानन्दसे म्पन्न होकर समस्त भूमण्डलका अनुशासन करते

अध्याय 183

श्लोक 23

एवमेषोऽवतीर्णो वै पृथिवीं पृथिवीपते ।विष्णुर्यदुकुलश्रेष्ठो वासुदेवेति विश्रुतः

evameṣo'vatīrṇo vai pṛthivīṃ pṛthivīpate | viṣṇuryadukulaśreṣṭho vāsudeveti viśrutaḥ

हिन्दी अर्थ

पृथ्वीनाथ! इस प्रकार ये भगवान्‌ विष्णु थ्वीपर अवतीर्ण होकर यदुकुलशिरोमणि वासुदेवके मसे विख्यात हुए थे

अध्याय 183

श्लोक 24

एतैश्च कारणैः श्रीमान् वसुदेवकुले प्रभुः ।जातो वृष्णिषु देवक्यां यन्मां त्वं परिपृच्छसि

etaiśca kāraṇaiḥ śrīmān vasudevakule prabhuḥ | jāto vṛṣṇiṣu devakyāṃ yanmāṃ tvaṃ paripṛcchasi

श्लोक 24–25 का हिन्दी अर्थ

इन्हीं सब कारणोंसे मान्‌ भगवान्‌ विष्णु वृष्णिवंशके अन्तर्गत वसुदेवकुलमें त्रकीदेवीके गर्भसे प्रकट हुए। जिसके विषयमें तुमने झसे प्रश्न किया था॥ रढ॥ २४ विद पापलए फ्रािक "दा 2 0 ८ रततमा जनमेजय! नारदजीके प्रश्नका उत्तर मिल जानेसे जब वह प्रश्न निवृत्त हो गया, उस समय मैंने उसके विषयमें संक्षेपसे जो कुछ कहा था, वे सारी बातें तुम पहले विस्तारपूर्वक सुन चुके हो*

English

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अध्याय 183

श्लोक 25

निवृत्ते नारदप्रश्ने यन्मयोक्तं समासतः ।श्रुतास्ते विस्तराः सर्वे ये पूर्वं जनमेजय

nivṛtte nāradapraśne yanmayoktaṃ samāsataḥ | śrutāste vistarāḥ sarve ye pūrvaṃ janamejaya

अर्थ श्लोक 24 के साथ

अध्याय 183

श्लोक 26

विष्णोस्तु माथुरे कल्पे यत्र ते संशयो महान् ।वासुदेवगतिश्चैव सा मया समुदाहृता

viṣṇostu māthure kalpe yatra te saṃśayo mahān | vāsudevagatiścaiva sā mayā samudāhṛtā

हिन्दी अर्थ

भगवान्‌ विष्णुके मथुरामें होनेवाले अवतारके विषयमें तुम्हें महान्‌ संदेह था, उसके समाधानके लिये मैंने वासुदेवके स्वरूपका एवं वासुदेव ही सबकी परम गति (आश्रय) हैं, इस सिद्धान्तका भलीभाँति प्रति- पादन कर दिया

English

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अध्याय 183

श्लोक 27

आश्चर्यं चैव नान्यद् वै कृष्णश्चाश्चर्यसन्निधिः ।सर्वेष्वाश्चर्यकल्पेषु नास्त्याश्चर्यमवैष्णवम्

āścaryaṃ caiva nānyad vai kṛṣṇaścāścaryasannidhiḥ | sarveṣvāścaryakalpeṣu nāstyāścaryamavaiṣṇavam

हिन्दी अर्थ

श्रीकृष्णके सिवा दूसरी कोई आश्चर्यकी वस्तु नहीं है। श्रीकृष्ण ही आश्चर्यके अधिष्टान या समुद्र हैं। समस्त आश्चर्यमय वस्तुओंमें ऐसा कोई आश्चर्य नहीं है, जो भगवान्‌ विष्णुके अंशसे शून्य हो

अध्याय 183

श्लोक 28

एष धन्यो हि धन्यानां धन्यकृद् धन्यभावनः ।देवेषु तु सदैत्येषु नास्ति धन्यतरोऽच्युतात्

eṣa dhanyo hi dhanyānāṃ dhanyakṛd dhanyabhāvanaḥ | deveṣu tu sadaityeṣu nāsti dhanyataro'cyutāt

हिन्दी अर्थ

ये श्रीकृष्ण धन्य हैं, ये ही धन्योंको धन्य बनानेवाले और धन्यभावन हैं, देवताओं तथा दैत्योंमें इन भगवान्‌ अच्युतसे बढ़कर धन्य दूसरा कोई नहीं है

अध्याय 183

श्लोक 29

आदित्या वसवो रुद्रा अश्विनौ मरुतस्तथा ।गगनं भूर्दिशश्चैव सलिलं ज्योतिरेव च

ādityā vasavo rudrā aśvinau marutastathā | gaganaṃ bhūrdiśaścaiva salilaṃ jyotireva ca

हिन्दी अर्थ

ये ही आदित्य, वसु, रुद्र, अश्विनीकुमार, मरुद्रण, आकाश, भूमि, दिशा, जल और तेज हैं

English

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अध्याय 183

श्लोक 30

एष धाता विधाता च संहर्ता चैव नित्यशः ।सत्यं धर्मस्तपश्चैव ब्रह्मा चैव पितामहः

eṣa dhātā vidhātā ca saṃhartā caiva nityaśaḥ | satyaṃ dharmastapaścaiva brahmā caiva pitāmahaḥ

हिन्दी अर्थ

ये ही धाता, विधाता और नित्यसंहर्ता हैं। सत्य, धर्म, तपस्या तथा पितामह ब्रह्मा भी ये ही हैं

अध्याय 183

श्लोक 31

अनन्तश्चैव नागानां रुद्राणां शङ्करः स्मृतः ।जङ्गमाजङ्गमं चैव जगन्नारायणोद्भवम्

anantaścaiva nāgānāṃ rudrāṇāṃ śaṅkaraḥ smṛtaḥ | jaṅgamājaṅgamaṃ caiva jagannārāyaṇodbhavam

हिन्दी अर्थ

ये नागोंमें अनन्त और स्द्रोंगें शड्डर माने गये हैं। यह समस्त चराचर जगत्‌ इन नारायणदेवसे ही प्रकट हुआ है

English

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अध्याय 183

श्लोक 32

एतस्माच्च जगत् सर्वं प्रसूयेत जनार्दनात् ।जगच्च सर्वं देवेशे तं नमस्कुरु भारत

etasmācca jagat sarvaṃ prasūyeta janārdanāt | jagacca sarvaṃ deveśe taṃ namaskuru bhārata

हिन्दी अर्थ

इन जनार्दनसे ही सम्पूर्ण जगत्‌की उत्पत्ति होती है। भारत! देवेश्वर श्रीकृष्णमें ही सम्पूर्ण जगत्‌ विद्यमान है। तुम उन्हें नमस्कार करो

अध्याय 183

श्लोक 33

पूज्यश्च सततं सर्वैर्देवैरेष सनातनः ।इत्युक्तं बाणयुद्धं ते माहात्म्यं केशवस्य तु

pūjyaśca satataṃ sarvairdevaireṣa sanātanaḥ | ityuktaṃ bāṇayuddhaṃ te māhātmyaṃ keśavasya tu

हिन्दी अर्थ

ये सनातन पुरुष श्रीकृष्ण ही सदा सम्पूर्ण देवताओंके लिये पूजनीय हैं। इस प्रकार मैंने तुमसे बाणासुरके युद्ध और फ्रेशवके माहात्म्यका वर्णन किया

अध्याय 183

श्लोक 34

वंशप्रतिष्ठामतुलां श्रवणादेव लप्स्यसे ।ये चेदं धारयिष्यन्ति बाणयुद्धमनुत्तमम्

vaṃśapratiṣṭhāmatulāṃ śravaṇādeva lapsyase | ye cedaṃ dhārayiṣyanti bāṇayuddhamanuttamam

श्लोक 34–39 का हिन्दी अर्थ

तुम इसके श्रवणमात्रसे अनुपम वंशप्रतिष्ठा प्राप्त करोगे। जो लोग बाणासुरके इस परम उत्तम युद्धप्रसंग और केशवके पाहात्म्यको अपने मनमें धारण करेंगे, उनके पास अधर्मका प्रवेश नहीं होगा। तात जनमेजय! इस यज्ञकी समासिपर तुम्हारे प्रश्नके अनुसार मैंने भगवान्‌ विष्णुकी इस सम्पूर्ण लीलाका वर्णन किया है। नरेथ्रर ! जो इस सम्पूर्ण आश्चर्यमय पर्वकों धारण करता है, या है, उसमें सबसे बढ़कर धन्य कौन है? यह नारदजीकी । ह समस्त पापोंसे मुक्त होकर भगवान्‌ विष्णुके लोकमें ता है। जो प्रतिदिन सबेरे उठकर एकाग्रचित्त हो पका कीर्तन करता है, उसके लिये इहलोक और रलोकमें कुछ भी दुर्लभ नहीं है। इस प्रसंगका अपने घिकारके अनुसार पाठ या श्रवण करनेसे ब्राह्मण म्पूर्ण वेदोंका ज्ञाता होता है, क्षत्रियको युद्धमें विजय प्त होती है, वैश्य धनसे सम्पन्न होता है और शुूद्र पपनी सम्पूर्ण कामनाएँ प्राप्त कर लेता है। उसे किसी ही अशुभ या अमड्लकी प्राप्ति नहीं होती तथा वह र्घायु होता है

अध्याय 183

श्लोक 35

केशवस्य च माहात्म्यं नाधर्मस्तान्भजिष्यति ।एषा तु वैष्णवी चर्या मया कार्त्स्न्येन कीर्तिता

keśavasya ca māhātmyaṃ nādharmastānbhajiṣyati | eṣā tu vaiṣṇavī caryā mayā kārtsnyena kīrtitā

अर्थ श्लोक 34 के साथ

अध्याय 183

श्लोक 36

पृच्छतस्तात यज्ञेऽस्मिन् निवृत्ते जनमेजय ।आश्चर्यपर्व निखिलं यो हीदं धारयेन्नृप

pṛcchatastāta yajñe'smin nivṛtte janamejaya | āścaryaparva nikhilaṃ yo hīdaṃ dhārayennṛpa

अर्थ श्लोक 34 के साथ

अध्याय 183

श्लोक 37

सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोकं स गच्छति ।कल्य उत्थाय यो नित्यं कीर्तयेत् सुसमाहितः

sarvapāpavinirmukto viṣṇulokaṃ sa gacchati | kalya utthāya yo nityaṃ kīrtayet susamāhitaḥ

अर्थ श्लोक 34 के साथ

English

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अध्याय 183

श्लोक 38

न तस्य दुर्लभं किञ्चिदिह लोके परत्र च ।ब्राह्मणः सर्ववेदी स्यात् क्षत्रियो विजयी भवेत्

na tasya durlabhaṃ kiñcidiha loke paratra ca | brāhmaṇaḥ sarvavedī syāt kṣatriyo vijayī bhavet

अर्थ श्लोक 34 के साथ

अध्याय 183

श्लोक 39

वैश्यो धनसमृद्धः स्याच्छूद्रः कामानवाप्नुयात् ।नाशुभं प्राप्नुयात्किञ्चिद् दीर्घमायुर्लभेत सः

vaiśyo dhanasamṛddhaḥ syācchūdraḥ kāmānavāpnuyāt | nāśubhaṃ prāpnuyātkiñcid dīrghamāyurlabheta saḥ

अर्थ श्लोक 34 के साथ

अध्याय 183

श्लोक 40

इति पारीक्षितो राजा वैशम्पायनभाषितम् ।श्रुतवानचलो भूत्वा हरिवंशं द्विजोत्तमाः

iti pārīkṣito rājā vaiśampāyanabhāṣitam | śrutavānacalo bhūtvā harivaṃśaṃ dvijottamāḥ

हिन्दी अर्थ

सौतिजी कहते हैं—विप्रवरो ! इस प्रकार परीक्षित्‌के त्र राजा जनमेजयने स्थिरचित्त होकर वैशम्पायनके द्वारा हे गये हरिवंशका श्रवण किया

अध्याय 183

श्लोक 41

एवं शौनक सङ्क्षेपाद् विस्तरेण तथैव च ।प्रोक्ता वै सर्ववंशास्ते किं भूयः श्रोतुमिच्छसि

evaṃ śaunaka saṅkṣepād vistareṇa tathaiva ca | proktā vai sarvavaṃśāste kiṃ bhūyaḥ śrotumicchasi

हिन्दी अर्थ

शौनक! इस कार मैंने संक्षेप और विस्तारके साथ सभी वंशोंका वर्णन कया है, अब तुम और क्या सुनना चाहते हो 2

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.