Harivamsha Purana
205
अध्याय 205 / 318

Parva 3, Adhyāya 22

28 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ28 श्लोक

अध्याय 205

श्लोक 1

दक्षेण स्वार्द्धाङ्गेन स्त्री भूत्वा अनेकाः कन्यानां उत्पत्तिः, तेषां धर्माय, कश्यपाय, सोमाय च दानं, कश्यपस्य दक्षकन्यानां च सन्ततीनां वर्णनं, देवलोके जन्मगृहीतॄणां योग्यता साध्वहं श्रोतुमिच्छामि त्रेतायां ब्राह्मणोत्तम ।यज्ज्ञात्वा सर्वविद्यानां परं पश्येयमव्ययम्

dakṣeṇa svārddhāṅgena strī bhūtvā anekāḥ kanyānāṃ utpattiḥ, teṣāṃ dharmāya, kaśyapāya, somāya ca dānaṃ, kaśyapasya dakṣakanyānāṃ ca santatīnāṃ varṇanaṃ, devaloke janmagṛhītṝṇāṃ yogyatā sādhvahaṃ śrotumicchāmi tretāyāṃ brāhmaṇottama | yajjñātvā sarvavidyānāṃ paraṃ paśyeyamavyayam

हिन्दी अर्थ

जनमेजय बोले—ब्राह्मणशिरोमणे ! त्रेतायुगके प्रवृत्ति- रूप (यज्ञादि) धर्ममें जो समीचीन तत्त्व है, उसे मैं सुनना चाहता हूँ, जिसे जानकर (आचरणमें लाकर) मैं समस्त विद्याओंके परम लक्ष्य अविनाशी ब्रह्मका साक्षात्कार कर सकूँ

अध्याय 205

श्लोक 2

दक्षस्तु पुनरालम्ब्य स्त्रीभावं पुरुषोत्तमः ।योगाद् योगेश्वरात्मानं निषण्णो गिरिमूर्धनि

dakṣastu punarālambya strībhāvaṃ puruṣottamaḥ | yogād yogeśvarātmānaṃ niṣaṇṇo girimūrdhani

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजीने कहा—राजन्‌! पुरुषोत्तम दक्ष योगबलसे स्त्रीशरीरको प्राप्त हो गये। वह स्त्रीशरीर उन योगेश्वर दक्षका अपना ही स्वरूप था। उस स्वरूपका अवलम्बन करके वे एक पर्वतके शिखरपर बैठे थे

अध्याय 205

श्लोक 3

सुजानुः पीनजघना सुभ्रूरः पद्मनिभानना ।रक्तान्तनयना कान्ता सर्वभूतमनोरमा

sujānuḥ pīnajaghanā subhrūraḥ padmanibhānanā | raktāntanayanā kāntā sarvabhūtamanoramā

हिन्दी अर्थ

उस स्त्रीके घुटने सुन्दर, जघनप्रदेश स्थूल, भौंहें मनोहर, मुख प्रफुल्ल कमलके समान कान्तिमान्‌ तथा दोनों नेत्रोंके कोये लाल थे। वह समस्त भूतोंके मनको मोहनेवाली नारी कमनीय कान्तिसे युक्त थी

अध्याय 205

श्लोक 4

दक्षः प्राचेतसस्तस्यां कन्यायां जनयत् प्रभुः ।देहार्धयोगविधिना कन्याः पद्मनिभाननाः

dakṣaḥ prācetasastasyāṃ kanyāyāṃ janayat prabhuḥ | dehārdhayogavidhinā kanyāḥ padmanibhānanāḥ

हिन्दी अर्थ

भगवान्‌ प्राचेतस दक्षने देहार्ध-संयोगकी विधिसे उस अधड्ञिजनित नारीके गर्भसे प्रफुल्ल कमलके समान मनोहर मुखवाली बहुत- सी कन्याओंको उत्पन्न किया

अध्याय 205

श्लोक 5

दक्षः पुरुषरूपेण स्त्रीरूपमपहाय वै ।दर्शने सर्वभूतानां कान्तः कान्ततरोऽभवत्

dakṣaḥ puruṣarūpeṇa strīrūpamapahāya vai | darśane sarvabhūtānāṃ kāntaḥ kāntataro'bhavat

हिन्दी अर्थ

तत्पश्चात्‌ उस स्त्रीरूपका परित्याग करके दक्ष पुन: पुरुषरूपसे स्थित हो गये। उस समय वे समस्त प्राणियोंकी दृष्टिमें परम कान्तिमान्‌ एवं कमनीय प्रतीत होते थे

अध्याय 205

श्लोक 6

ताः कन्याः प्रददौ दक्षः स्वयं प्राचेतसः प्रभुः ।ब्रह्मदेयेन विधिना ब्रह्मप्राप्तेन भारत

tāḥ kanyāḥ pradadau dakṣaḥ svayaṃ prācetasaḥ prabhuḥ | brahmadeyena vidhinā brahmaprāptena bhārata

हिन्दी अर्थ

भारत! इसके बाद स्वयं प्राचेतस भगवान्‌ दक्षने उन कन्याओंका वेदोक्त ब्राह्मविधिसे विवाह कर दिया

अध्याय 205

श्लोक 7

प्रददौ दश धर्माय कश्यपाय त्रयोदश ।सप्तविंशति सोमाय पत्नीहेतोः समाहितः

pradadau daśa dharmāya kaśyapāya trayodaśa | saptaviṃśati somāya patnīhetoḥ samāhitaḥ

हिन्दी अर्थ

उन्होंने एकाग्रचित होकर धर्मको दस, क्श्यपको तेरह और सोमको सत्ताईस कन्याएँ इसलिये दीं कि वे इन्हें अपनी धर्मपत्नी बना लें

अध्याय 205

श्लोक 8

दक्षो दत्त्वाथ ताः कन्या ब्रह्मक्षेत्रं प्रपद्य च ।ब्रह्मणाध्युषितं पुण्यं समाहितमना मुनिः

dakṣo dattvātha tāḥ kanyā brahmakṣetraṃ prapadya ca | brahmaṇādhyuṣitaṃ puṇyaṃ samāhitamanā muniḥ

हिन्दी अर्थ

उन कन्याओंका दान करनेके पश्चात्‌ दक्ष मुनि ब्रह्माजीके क्षेत्र प्रयागमें आये, जहाँ ब्रह्माजी पहले निवास करते ग्रे और इसीलिये जो परम पुण्यदायक तीर्थ हो गया था। वहाँ आकर वे मनको एकाग्र करके परमात्माका चिन्तन करने लगे

अध्याय 205

श्लोक 9

तप्यमानो मृगैः सार्धं चचार वसुधां नृप ।तृणमूलफलैर्वृद्धो वृद्धश्च तपसासकृत्

tapyamāno mṛgaiḥ sārdhaṃ cacāra vasudhāṃ nṛpa | tṛṇamūlaphalairvṛddho vṛddhaśca tapasāsakṛt

हिन्दी अर्थ

नरेश्वर! तदनन्तर दक्ष तपस्यामें पंलग्र हो मृगोंके साथ इस वसुधापर विचरने लगे। त्रे तण और फल-मूलसे ही अपने शरीरका पोषण करते थे। उनके तपकी निरन्तर वृद्धि हो रही थी

अध्याय 205

श्लोक 10

मृगास्तु तस्य मोदन्ति फलं मोदन्ति ब्राह्मणाः ।दीक्षिताः पुण्यकर्माणस्तपसा दग्धकिल्बिषाः

mṛgāstu tasya modanti phalaṃ modanti brāhmaṇāḥ | dīkṣitāḥ puṇyakarmāṇastapasā dagdhakilbiṣāḥ

हिन्दी अर्थ

उनकी तपस्याके प्रभावसे मृग बड़े प्रसन्न थे (क्योंकि उस तपसे सर्वत्र अहिंसाभावका प्रसार हो रहा था) । पज्नमें दीक्षित हो पुण्य कर्म करनेवाले तथा तपस्यासे अपने पापोंको दग्ध कर देनेवाले ब्राह्मण दक्षके उस अहिंसाप्रधान तपका वैर-त्यागरूप फल प्रत्यक्ष देखकर आनन्दमग्न रहते थे

अध्याय 205

श्लोक 11

सङ्ग्रामकाले कालज्ञः शरीरादिपतिर्मुनिः ।कर्मयज्ञकृतां तात सिद्धिं पश्यति लक्षणात्

saṅgrāmakāle kālajñaḥ śarīrādipatirmuniḥ | karmayajñakṛtāṃ tāta siddhiṃ paśyati lakṣaṇāt

हिन्दी अर्थ

योगीको अपने चित्तपर विजय प्राप्त करनेके लिये जो संग्राम (तत्परतापूर्ण पाधन) करना पड़ता है, उसका अवसर आनेपर क्रालगतिके ज्ञाता तथा शरीर, इन्द्रिय आदिपर शासन करनेवाले मुनिवर दक्षको कर्मयज्ञजनित सिद्धि निकट देखायी देने लगी; क्योंकि उस सिद्धिका सूचक लक्षण प्रकट हो रहा था

अध्याय 205

श्लोक 12

दानमानप्रवीराश्च निरुद्वेगा निरामिषाः ।मृगैः सह जरां यान्ति सपत्नीकाः सुपुत्रिणः

dānamānapravīrāśca nirudvegā nirāmiṣāḥ | mṛgaiḥ saha jarāṃ yānti sapatnīkāḥ suputriṇaḥ

हिन्दी अर्थ

जो दूसरोंको दान और मान देनेमें प्रमुख वीर हैं, जिनका उद्बेग सर्वथा शान्त हो या है, जो आमिष आदि भोगोंका परित्याग कर चुके हें तथा जो श्रेष्ठ पुत्रोंके पिता हैं, ऐसे गृहस्थ द्विज अपनी पत्नीके साथ उस वनमें जाकर मृगोंके साथ वृद्धावस्थाको प्राप्त होते थे

अध्याय 205

श्लोक 13

ब्राह्मणाः स्तोत्रसंसिद्धा जनित्रे प्रथमे पदे ।ब्रह्मणाध्युषितत्वाच्च ब्रह्मक्षेत्रमिहोच्यते

brāhmaṇāḥ stotrasaṃsiddhā janitre prathame pade | brahmaṇādhyuṣitatvācca brahmakṣetramihocyate

हिन्दी अर्थ

वेदाध्ययनसे सिद्ध हुए ब्राह्मण वहाँ सबके उत्पादक प्रथम पद—परब्रह्म परमात्मामें प्रतिष्ठित ते थे और ब्रह्माजी भी उस स्थानमें निवास कर चुके पे; इसीलिये यहाँ प्रयागको ब्रह्मक्षेत्र कहते हैं (आध्यात्मिक दृष्टिसे ब्रह्मकी उपलब्धिका स्थान होनेके कारण यह गरीर ही ब्रह्मक्षेत्र है)

अध्याय 205

श्लोक 14

यतिभिः कर्मभिर्मुक्तैर्जितक्रोधैर्जितेन्द्रियैः ।चरद्भिर्वसुधां विप्रैरकिञ्चनपथैषिभिः

yatibhiḥ karmabhirmuktairjitakrodhairjitendriyaiḥ | caradbhirvasudhāṃ viprairakiñcanapathaiṣibhiḥ

हिन्दी अर्थ

जो कर्मोके बन्धनसे मुक्त हैं, क्रोधपर विजय पा चुके हैं और इन्द्रियोंको वशमें कर चुके हैं, वे अ्किंचन (परिग्रहशून्य) पथपर चलनेकी इच्छा- वाले और भूतलपर विचरते रहनेवाले संन्यासी ब्राह्मण इस क्षेत्र (प्रयाग अथवा शरीर)-को ब्रह्मक्षेत्र कहते हैं

अध्याय 205

श्लोक 15

या प्रजा सर्वमारूढा मानसी ब्रह्मचारिणी ।सैवैषा व्यक्तिमापन्ना स्वभावदुरतिक्रमा

yā prajā sarvamārūḍhā mānasī brahmacāriṇī | saivaiṣā vyaktimāpannā svabhāvaduratikramā

हिन्दी अर्थ

जो प्रजा हृदयाकाशमें स्थित सर्वस्वरूप ब्रह्ममें आरूढ़ थी, ब्रह्ममें ही विचरनेके कारण ब्रह्मचारिणी कहलाती थी और मानसिक संकल्पमें स्थित होनेसे मानसी कही जाती थी, वही यह स्वभाव (संस्कार या प्रारब्ध)-से दुर्लड्टय होकर अव्यक्तावस्थासे व्यक्तावस्थाको प्रात हुई है

अध्याय 205

श्लोक 16

अव्यक्ता व्यक्तमापन्ता स्वभावाद् दुरतिक्रमा ।व्यक्ताव्यक्तगतिश्चैषा कालधर्मान्महीपते

avyaktā vyaktamāpantā svabhāvād duratikramā | vyaktāvyaktagatiścaiṣā kāladharmānmahīpate

हिन्दी अर्थ

जो अव्यक्त थी, वही स्वभावसे दुर्लड्थ होकर व्यक्तावस्थाको प्राप्त हो गयी। राजन्‌! कालधर्मसे यह सारी प्रजा व्यक्त और अव्यक्तरूपमें परिणत होती रहती है

अध्याय 205

श्लोक 17

स्थावरा जङ्गमाश्चैव स्थूलसूक्ष्माश्च भारत ।कालयोगेन योगज्ञा भवन्ति न भवन्ति च

sthāvarā jaṅgamāścaiva sthūlasūkṣmāśca bhārata | kālayogena yogajñā bhavanti na bhavanti ca

हिन्दी अर्थ

भारत ! कालयोगसे स्थावर-जंगम, स्थूल और सूक्ष्म सभी प्राणी योगज्ञ होते हैं और नहीं भी होते हैं

अध्याय 205

श्लोक 18

एताश्चैताः प्रजाः सर्वा दक्षकन्यासु जज्ञिरे ।कश्यपेनाव्ययेनेह संयुक्ताः कालधर्मणा

etāścaitāḥ prajāḥ sarvā dakṣakanyāsu jajñire | kaśyapenāvyayeneha saṃyuktāḥ kāladharmaṇā

हिन्दी अर्थ

ये सारी प्रजाएँ महर्षि कश्यपके द्वारा दक्षकन्याओंके गर्भसे उत्पन्न हुई हैं। ये सब-की-सब कालरूप धर्मवाले अक्षय स्वभावसे संयुक्त हैं

अध्याय 205

श्लोक 19

आदित्या वसवो रुद्रा विश्वेदेवा मरुद्गणाः ।नागाश्चानेकशिरसः साध्या वै पन्नगास्तथा

ādityā vasavo rudrā viśvedevā marudgaṇāḥ | nāgāścānekaśirasaḥ sādhyā vai pannagāstathā

श्लोक 19–23 का हिन्दी अर्थ

राजन्‌! आदित्य, वसु, रुद्र, विश्वेदेव, मरुद्ण, अनेक सिरवाले नाग, साध्य, सर्प, गन्धर्व, किन्नर, यक्ष, सुपर्ण, गरुड़, सुन्दर वस्त्रधारी किन्नर, अन्यान्य पशुगणोंके साथ गौएँ, मनुष्य, चराचर प्राणी, पृथ्वीको धारण करनेवाले पर्वत, हाथी, सिंह, व्याघ्र, पंखधारी घोड़े, मैंडे, सींगवाले बैल और मृग, चार दाँतवाले तथा कमलकी-सी कान्तिवाले शुभलक्षण गजराज, समस्त लक्षणोंसे सम्पन्न और इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले अन्यान्य प्राणी—इन सबकी उत्पत्ति महर्षि कश्यप और उनकी पत्नी दक्षकन्याओंसे हुई है

अध्याय 205

श्लोक 20

गन्धर्वाः किन्नरा यक्षाः सुपर्णाश्च तथापरे ।गरुत्मान् सह यक्षैश्च किन्नराश्च सुवाससः

gandharvāḥ kinnarā yakṣāḥ suparṇāśca tathāpare | garutmān saha yakṣaiśca kinnarāśca suvāsasaḥ

अर्थ श्लोक 19 के साथ

अध्याय 205

श्लोक 21

गावः पशुगणैः सार्धं नराश्च वसुधाधिप ।चराचराश्च वसुधाधर्तारश्च धराधराः

gāvaḥ paśugaṇaiḥ sārdhaṃ narāśca vasudhādhipa | carācarāśca vasudhādhartāraśca dharādharāḥ

अर्थ श्लोक 19 के साथ

अध्याय 205

श्लोक 22

गजाः सिंहाश्च व्याघ्राश्च हयाः पक्षधरास्तथा ।खड्गा विषाणिनश्चैव वृषभाश्च मृगास्तथा

gajāḥ siṃhāśca vyāghrāśca hayāḥ pakṣadharāstathā | khaḍgā viṣāṇinaścaiva vṛṣabhāśca mṛgāstathā

अर्थ श्लोक 19 के साथ

अध्याय 205

श्लोक 23

चतुर्विषाणा नागेन्द्राः पद्माभा वर्णतः शुभाः ।सर्वलक्षणसम्पन्नाः प्राणिनः कामरूपिणः

caturviṣāṇā nāgendrāḥ padmābhā varṇataḥ śubhāḥ | sarvalakṣaṇasampannāḥ prāṇinaḥ kāmarūpiṇaḥ

अर्थ श्लोक 19 के साथ

अध्याय 205

श्लोक 24

तेषां रूपैस्तथा गात्रैस्तैः शीलैस्तैः पराक्रमैः ।मुनयः पुनरुद्भूता धर्मक्षेत्रे सनातने

teṣāṃ rūpaistathā gātraistaiḥ śīlaistaiḥ parākramaiḥ | munayaḥ punarudbhūtā dharmakṣetre sanātane

हिन्दी अर्थ

धर्मकी सनातन प्रसवभूमि भारतवर्षमें जो मुनि पुनः उत्पन्न हुए, वे पूर्व-कल्पके ऋषि-मुनियोंके रूप, शरीर, शील और पराक्रमसे सम्पन्न हुए

अध्याय 205

श्लोक 25

क्षेत्रज्ञा मानसे लोके धर्मिणो वेदगोचराः ।यत्रोद्भूताः सुराः सर्वे दिवि लोके प्रतिष्ठिताः

kṣetrajñā mānase loke dharmiṇo vedagocarāḥ | yatrodbhūtāḥ surāḥ sarve divi loke pratiṣṭhitāḥ

हिन्दी अर्थ

वेदोक्त मार्गपर चलनेवाले धर्मात्मा क्षेत्रज्ञ (आत्मनिष्ठ पुरुष मानस लोक (मन:- कल्पित बाह्य या आध्यन्तर जगत्‌ू)-में देवतारूपसे प्रकट हुए होते हैं और वे सब-के-सब दिव्य- लोकमें प्रतिष्ठित हो जाते हैं

अध्याय 205

श्लोक 26

ये चान्ये तपसा सिद्धा गृहस्था मनुजाधिप ।ब्रह्मचर्येण संसिद्धाः परिचर्यां गता गुरोः

ye cānye tapasā siddhā gṛhasthā manujādhipa | brahmacaryeṇa saṃsiddhāḥ paricaryāṃ gatā guroḥ

श्लोक 26–28 का हिन्दी अर्थ

पडध्याय: + १००९ नरेश्वर! जो दूसरे गृहस्थ तपस्यासे सिद्ध होते हैं अथवा जो ब्रह्मचारी गुरुकी सेवा करके ब्रह्मचर्य- पालनके द्वारा सिद्धिलाभ करते हैं और पृथ्वीनाथ ! जो सिद्धिके लिये योगमार्गको अपनाये हुए हैं, जो द्विज सत्कर्मके लिये अधिक क्लेश सहन करके जीबविका पाते हैं, जो खेतोंमें बाल बीनकर या बाजार उठ जानेपर वहाँ गिरे हुए अन्नके दाने चुनकर जीवन- निर्वाह करनेके लिये विख्यात हैं और पत्नीके साथ रहकर दृढ़तापूर्वक धर्मके पालनमें लगे रहते हैं; इन सबने उत्तम ब्रतका पालन किया है; अत: ये सब-के-सब आकाशचारी देवता होते हैं

अध्याय 205

श्लोक 27

ये च योगगतिं प्राप्ताः सिद्धिहेतोर्महीपते ।क्लेशाधिकैः कर्मजन्यैर्वृत्तिं लप्स्यन्ति वै द्विजाः

ye ca yogagatiṃ prāptāḥ siddhihetormahīpate | kleśādhikaiḥ karmajanyairvṛttiṃ lapsyanti vai dvijāḥ

अर्थ श्लोक 26 के साथ

अध्याय 205

श्लोक 28

शिलोञ्छवृत्तयः ख्याताः सपत्नीका दृढव्रताः ।सर्वे त्वेते दिविचरा भवन्ति चरितव्रताः

śiloñchavṛttayaḥ khyātāḥ sapatnīkā dṛḍhavratāḥ | sarve tvete divicarā bhavanti caritavratāḥ

अर्थ श्लोक 26 के साथ

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

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व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

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Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.