Harivamsha Purana
206
अध्याय 206 / 318

Parva 3, Adhyāya 23

49 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ49 श्लोक

अध्याय 206

श्लोक 1

ब्रह्मणः महायज्ञस्य वर्णनं पितामहं पुरस्कृत्य मेरुपृष्ठे समाहिताः ।जटाजिनधरा विप्रास्त्यक्तक्रोधा जितेन्द्रियाः

brahmaṇaḥ mahāyajñasya varṇanaṃ pitāmahaṃ puraskṛtya merupṛṣṭhe samāhitāḥ | jaṭājinadharā viprāstyaktakrodhā jitendriyāḥ

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! मेरुपर्वतकी घाटीपर पितामह ब्रह्माजीको आगे करके कुछ एकाग्रचित्त ब्राह्मण विराजमान हुए, जो जटा और मृगचर्म धारण किये हुए थे। उन्होंने क्रोधको त्याग दिया था और इन्द्रियोर विजय पा ली थी

अध्याय 206

श्लोक 2

पर्वतान्तरसंसिद्धे बहुपादपसंवृते ।धातुसंरञ्जितशिले समे निस्तृणकण्टके

parvatāntarasaṃsiddhe bahupādapasaṃvṛte | dhātusaṃrañjitaśile same nistṛṇakaṇṭake

श्लोक 2–3 का हिन्दी अर्थ

पर्वतकी वह घाटी दूसरे पर्वतोंसे घिरी हुई थी। वहाँ बहुत-से वृक्ष शोभा दे रहे थे। वहाँकी शिलाएँ अनेक प्रकारकी धातुओंसे रैगी हुई थीं। उस समतल प्रदेशमें तृण और कण्टकोंका सर्वथा अभाव था। ब्रह्मका ज्ञान करानेवाले तीनों बेदोंके पाँच स्वरोंसे उस पर्वतशिखरकी बड़ी शोभा हो रही थी। वहाँ बैठे हुए वे ब्राह्मण मन्त्रजपरूपी यज्ञमें सदा तत्पर रहनेवाले थे। ब्रतके पालन और परहितके साधनमें उनकी सदा ही प्रवृत्ति थी

अध्याय 206

श्लोक 3

त्रयाणां ब्रह्मवेदानां पञ्चस्वरविराजिते ।मन्त्रयज्ञपरा नित्यं नित्यं व्रतहिते रताः

trayāṇāṃ brahmavedānāṃ pañcasvaravirājite | mantrayajñaparā nityaṃ nityaṃ vratahite ratāḥ

अर्थ श्लोक 2 के साथ

अध्याय 206

श्लोक 4

एकमेवाग्निमाधाय सर्वे ब्राह्मणपुङ्गवाः ।बिभिदुर्मन्त्रविषयैः सुसमाहितमानसाः

ekamevāgnimādhāya sarve brāhmaṇapuṅgavāḥ | bibhidurmantraviṣayaiḥ susamāhitamānasāḥ

हिन्दी अर्थ

वे समस्त ब्राह्मणशिरोमणि वहाँ एक ही अग्िकी स्थापना करके एकाग्रचित्त हो उसकी उपासना करते थे। उन्होंने मन्त्रप्रतिपाद्य विषयोंकी दृष्टिसे उस अग्रिके अनेक भेद किये

अध्याय 206

श्लोक 5

त्रिधा प्रणीतो ज्वलनो मुनिभिर्वेदपारगैः ।अतस्ते तत्त्वमापन्ना यदेकस्त्रिविधः कृतः

tridhā praṇīto jvalano munibhirvedapāragaiḥ | ataste tattvamāpannā yadekastrividhaḥ kṛtaḥ

हिन्दी अर्थ

ही यहाँ पाँच स्वर कहे गये हैं, जिनके नाम इस प्रकार हैं—उदात्त, वेदोंके पारड्त विद्वान्‌ मुनियोंने उस अग्रिको तीन पगोंमें विभक्त करके स्थापित किया (उन तीनों भग्ियोंके नाम ये हैं—आहवनीय, गाहपत्य और क्षिणाग्रि ) । उनके द्वारा एक ही अग्रिकी तीन स्वरूपोंमें भभिव्यक्ति हुई, इसलिये उन्हें तत््वका बोध प्राप्त डुआ

अध्याय 206

श्लोक 6

एक एव महानग्निर्हविषा सम्प्रवर्तते ।स्वधाकारेण धर्मज्ञ मन्त्राणां कार्यसिद्धये

eka eva mahānagnirhaviṣā sampravartate | svadhākāreṇa dharmajña mantrāṇāṃ kāryasiddhaye

हिन्दी अर्थ

धर्मज्ञ जनमेजय! एक ही अग्ि मन्त्रोक्त ार्योंकी सिद्धिके लिये स्वधारूप हविष्यके सेवनसे हहानू होकर सम्यक्‌-रूपसे प्रज्वलित होता है

अध्याय 206

श्लोक 7

स्वयं च दक्षः सम्प्राप्तो भगवान् भूतसत्कृतः ।ब्रह्मा ब्राह्मणनिर्माता सर्वभूतपितामहः

svayaṃ ca dakṣaḥ samprāpto bhagavān bhūtasatkṛtaḥ | brahmā brāhmaṇanirmātā sarvabhūtapitāmahaḥ

हिन्दी अर्थ

हाँ समस्त प्राणियोंद्वारा सम्मानित स्वयं भगवान्‌ दक्ष धारे, जो ब्रह्मा अर्थात्‌ ब्राह्मण हैं। उन्होंने ब्राह्मणोंकी ष्टि की है तथा वे सम्पूर्ण भूतोंके पितामह हैं

अध्याय 206

श्लोक 8

दण्डी चर्मी शरी खड्गी शिखी पद्मनिभाननः ।अभवन्न्यस्तसन्तापो जितक्रोधो जितेन्द्रियः

daṇḍī carmī śarī khaḍgī śikhī padmanibhānanaḥ | abhavannyastasantāpo jitakrodho jitendriyaḥ

हिन्दी अर्थ

नके हाथोंमें दण्ड, बाण, ढाल और तलवार-अये मायुध शोभा पाते थे। उन्होंने शिखा धारण कर रखी गी। उनका मुख कमलके समान कान्तिमान्‌ था। वे तापरहित, क्रोधको जीतनेवाले तथा जितेन्द्रिय थे

अध्याय 206

श्लोक 9

यजते पुष्करे ब्रह्मा मेधया सह सङ्गतः ।इन्द्रप्रोक्तानि सामानि गीयन्ते ब्रह्मवादिभिः

yajate puṣkare brahmā medhayā saha saṅgataḥ | indraproktāni sāmāni gīyante brahmavādibhiḥ

हिन्दी अर्थ

हाँ पुष्करतीर्थमें ब्रह्माजी मेधाके साथ बैठकर यज्ञ करने गे और बहुत-से ब्रह्मवादी मुनि इन्द्रकधथित साममन्त्रोंका न करने लगे

अध्याय 206

श्लोक 10

घृतं क्षीरं यवा व्रीहिः सर्वं परमकं हविः ।वेदप्रोक्तं मखे न्यस्तं कल्पितं ब्रह्मणः पदे

ghṛtaṃ kṣīraṃ yavā vrīhiḥ sarvaṃ paramakaṃ haviḥ | vedaproktaṃ makhe nyastaṃ kalpitaṃ brahmaṇaḥ pade

हिन्दी अर्थ

उस यज्ञमें घृत, खीर, जौ, चावल गादि सब उत्तमोत्तम हविष्य, जिसका वेदमें वर्णन किया या है, ब्रह्माजीके निकट सजाकर रखा गया था

अध्याय 206

श्लोक 11

निर्मथ्यारणिमाग्नेयीं शमीगर्भसमुत्थिताम् ।स ब्रह्मा प्रथमं तस्मिन्नग्निमयं प्रवर्तयत्

nirmathyāraṇimāgneyīṃ śamīgarbhasamutthitām | sa brahmā prathamaṃ tasminnagnimayaṃ pravartayat

हिन्दी अर्थ

मीके गर्भसे उत्पन्न हुई अग्रिसम्बन्धिनी अरणीका न्थन करके ब्रह्माजीने उस यज्ञमें एक दूसरे ही प्रधान ग्रिको प्रकट किया

अध्याय 206

श्लोक 12

न ह्यल्पं विहितं द्रव्यं यथाग्निर्यज्ञकर्मणि ।प्रवर्तयेद् विभागैर्वा हुतद्रव्यमयं बलम्

na hyalpaṃ vihitaṃ dravyaṃ yathāgniryajñakarmaṇi | pravartayed vibhāgairvā hutadravyamayaṃ balam

हिन्दी अर्थ

जैसे यज्ञकर्ममें मन्थनसे कट हुए अग्रिदेवको स्थापित करके उन्हें ही हवनीय दार्थकी आहुति देनेका विधान है, उसी प्रकार वहाँ लल्प द्रव्य देनेकी विधि नहीं है। यज्ञ करनेवाले पुरुषकों ाहिये कि वह हुत द्रव्यमय बलको विभागपूर्वक प्रकट रे

अध्याय 206

श्लोक 13

फलानि तैः प्रयुक्तानि हवींषि विततेऽध्वरे ।प्रयुञ्जते प्रयोगज्ञा मुनयो ब्रह्मवादिनः

phalāni taiḥ prayuktāni havīṃṣi vitate'dhvare | prayuñjate prayogajñā munayo brahmavādinaḥ

हिन्दी अर्थ

उस विशाल यज्ञमें जिन-जिन विहित विष्योंका उपयोग किया गया, उनके द्वारा उनके थायोग्य फल भी प्रकट हुए। प्रयोगके ज्ञाता ब्रह्मवादी नि ही उन हविष्योंका प्रयोग करते थे

अध्याय 206

श्लोक 14

षण्मासांश्चतुरो वेदान् सम्बभाषे बृहस्पतिः ।ब्रह्मणो वितते यज्ञे परया ब्रह्मसम्पदा

ṣaṇmāsāṃścaturo vedān sambabhāṣe bṛhaspatiḥ | brahmaṇo vitate yajñe parayā brahmasampadā

हिन्दी अर्थ

उत्तम ह्म-सम्पत्तिसे युक्त ब्रह्माजीके उस विस्तृत यज्ञमें देवगुरु हस्पतिने छ: मासतक चारों वेदोंका प्रवचन किया

अध्याय 206

श्लोक 15

शिक्षाक्षरसमेताया मधुरायाः समन्ततः ।सानुस्वरितरामायाः सरस्वत्याः प्रभाषते

śikṣākṣarasametāyā madhurāyāḥ samantataḥ | sānusvaritarāmāyāḥ sarasvatyāḥ prabhāṣate

हिन्दी अर्थ

_ उपनिषदू और कर्मकाण्डके द्वारा अत्यन्त रमणीय था शिक्षाके अक्षरोंसे युक्त मधुर वेदवाणीका सब ओर वचन करते थे

अध्याय 206

श्लोक 16

तेन ब्राह्मणशब्देन ब्रह्मप्रोक्तेन भारत ।विभाति स मखो व्यक्तं ब्रह्मलोक इवापरः

tena brāhmaṇaśabdena brahmaproktena bhārata | vibhāti sa makho vyaktaṃ brahmaloka ivāparaḥ

हिन्दी अर्थ

भारत! ब्राह्मण-मन्त्रोंके पाठ और वेदोंके उस प्रवचनसे वह विशाल यज्ञमण्डप निश्चय दूसरे ब्रह्मलोकके समान शोभा पाता था

अध्याय 206

श्लोक 17

मखो ब्रह्ममुखोत्तीर्णो ब्रह्मशब्दैरनामयैः ।प्रयोगैः सम्प्रयुक्तः स जल्पन्निव विवर्धते

makho brahmamukhottīrṇo brahmaśabdairanāmayaiḥ | prayogaiḥ samprayuktaḥ sa jalpanniva vivardhate

हिन्दी अर्थ

ब्रह्माजीके मुखसे प्रकट ( अथवा ब्रह्माजीकी प्रधानतामें सम्पादित) हुआ वह यज्ञ अनामय (अप्रामाणिकताकी आशड्भासे रहित) वेदके शब्दों और श्रुतिके अनुसार विनियुक्त (प्रयुक्त) हुए मन्त्रोंद्वारा सम्यकू-रूपसे अनुष्ठानमें लाया जाकर बोलता हुआ-सा उत्तरोत्तर वृद्धिको प्राप्त हो रहा था

अध्याय 206

श्लोक 18

समिद्भिः सोमकलशैः पात्रैश्चैव बहिश्चरैः ।यवैर्व्रीहिभिराज्यैश्च पूर्णैश्च जलभाजनैः

samidbhiḥ somakalaśaiḥ pātraiścaiva bahiścaraiḥ | yavairvrīhibhirājyaiśca pūrṇaiśca jalabhājanaiḥ

हिन्दी अर्थ

उस यज्में समिधाएँ, सोमरस रखनेके लिये कलश, खुकू, खुवा आदि यज्ञपात्र, बाह्यपात्र, जौ, ब्रीहि, घृत तथा जलसे भरे हुए पात्र रखे हुए थे, जिनसे उस यज्ञकी बड़ी शोभा हो रही थी

अध्याय 206

श्लोक 19

कर्म प्राप्तैश्च वसुभिः कर्मभिश्च परान्वितैः ।गोभिः पयस्विनीभिश्च परिवत्सैश्च कोमलैः

karma prāptaiśca vasubhiḥ karmabhiśca parānvitaiḥ | gobhiḥ payasvinībhiśca parivatsaiśca komalaiḥ

हिन्दी अर्थ

सब ओरसे प्राप्त हुए सुवर्ण आदि रतों, परमात्माको समर्पित करके किये गये इष्टि आदि कर्मों, दूधके लिये लायी गयी दुधारू गौओं और उनके कोमल बछड़ोंसे सुशोभित हुए उस यज्ञकी उत्तरोत्तर वृद्धि हो रही थी

अध्याय 206

श्लोक 20

ब्रह्मवृद्धो वयोवृद्धस्तपोवृद्धश्च भारत ।ब्रह्मज्ञानमयो देवो विद्यया सह सङ्गतः

brahmavṛddho vayovṛddhastapovṛddhaśca bhārata | brahmajñānamayo devo vidyayā saha saṅgataḥ

हिन्दी अर्थ

भारत! वेदमन्त्रोंकी ध्वनिसे, दक्षिणारूपी वयसे तथा तपस्या (ज्ञान)-से बढ़े हुए वे ब्रह्मज्ञामय यज्ञदेव विद्या (यज्ञकर्मकी अज्ञभूत उद्दीथ आदिकी उपासना)-से संयुक्त हो उत्तरोत्तर बढ़ रहे थे

अध्याय 206

श्लोक 21

मानसैश्च क्रियामूर्तिर्ये च भूताः स्वयं नृप ।ब्रह्मा जुहोति तांस्तस्मान्मरुद्भिः सहितस्तदा

mānasaiśca kriyāmūrtirye ca bhūtāḥ svayaṃ nṛpa | brahmā juhoti tāṃstasmānmarudbhiḥ sahitastadā

हिन्दी अर्थ

नरेश्वर! उस समय यज्ञात्मा ब्रह्मा मरुद्रणोंके साथ रहकर मन:कल्पित समिधा आदि उपकरणोंसे युक्त जो स्वयं उनसे प्रकट हुए घृत आदि हबनीय पदार्थ थे, उनकी अग्रिमें आहुति देने लगे

अध्याय 206

श्लोक 22

तेजोमूर्तिधरै रूपैर्न च तत्कर्मणास्पृशत् ।बेदप्रोक्तेन विधिना सर्वप्राणभृतां नृप

tejomūrtidharai rūpairna ca tatkarmaṇāspṛśat | bedaproktena vidhinā sarvaprāṇabhṛtāṃ nṛpa

हिन्दी अर्थ

जनमेजय ! वेदोक्त विधिसे किया गया और तेजोमय (चिन्मय) मूर्ति धारण करनेवाले द्रव्य- देवता आदि याग-सम्बन्धी रूपोंसे युक्त हुआ ब्रह्माजीका वह यज्ञ समस्त प्राणियोंके कर्मसे अछूता रह गया (अर्थात्‌ उनका यज्ञकर्म सबसे उत्कृष्ट था)

अध्याय 206

श्लोक 23

निर्मथ्यारणिमाग्नेयीं शमीगर्भसमुत्थिताम् ।क्रतुना यजते पूर्णमग्निष्टोमेन स प्रभुः

nirmathyāraṇimāgneyīṃ śamīgarbhasamutthitām | kratunā yajate pūrṇamagniṣṭomena sa prabhuḥ

हिन्दी अर्थ

वे भगवान्‌ ब्रह्मा शमीगर्भ (अश्वत्थ)-से उत्पन्न हुई अग्रिसम्बन्धिनी अरणिका मन्थन करके (प्रकट की हुई अग्िमें ही ) अग्निष्टोम यागद्वारा पूर्ण विधिके साथ यजन कर रहे थे

अध्याय 206

श्लोक 24

सदस्यैस्तत्सदो व्यक्तं शुशुभे यज्ञकर्मणि ।जल्पन्ति मधुरा वाचःसानुसाराः क्रियास्तथा

sadasyaistatsado vyaktaṃ śuśubhe yajñakarmaṇi | jalpanti madhurā vācaḥsānusārāḥ kriyāstathā

हिन्दी अर्थ

उस यज्ञकर्मके सम्पादनकालमें सदस्योंसे भरा हुआ वह यज्ञसभाका मण्डप बड़ी शोभा पा रहा था। वहाँ सब लोग बड़ी मधुर वाणी बोलते थे तथा _ सहायकोंसहित सारी क्रियाएँ सम्पन्न हो रही थीं

अध्याय 206

श्लोक 25

कर्मभिश्च तपोयुक्तैर्वेदवेदाङ्गपारगैः ।सूर्येन्दुसदृशै राजन् विरराज महाक्रतुः

karmabhiśca tapoyuktairvedavedāṅgapāragaiḥ | sūryendusadṛśai rājan virarāja mahākratuḥ

हिन्दी अर्थ

राजन्‌ ! वह महायज्ञ वेद-वेदाज्ोंके पारज्ञत विद्वान्‌ तथा सूर्य और चन्द्रमाके समान तेजस्वी ब्राह्मणोंद्वारा किये गये तपोयुक्त कर्मोद्वारा बड़ी शोभा पा रहा था

अध्याय 206

श्लोक 26

ब्रह्मघोषेण महता ब्रह्मावास इवापरः ।वसुधामिव सम्प्राप्तैः सर्वैरेव दिवौकसैः

brahmaghoṣeṇa mahatā brahmāvāsa ivāparaḥ | vasudhāmiva samprāptaiḥ sarvaireva divaukasaiḥ

हिन्दी अर्थ

वेदों - के महान्‌ घोषसे वह यज्ञशाला दूसरे ब्रह्मलोककी भाँति जान पड़ती थी। उस समय सारे देवता भूतलपर आये प्रतीत होते थे

अध्याय 206

श्लोक 27

वेदवेदाङ्गविद्भिश्च विनीतैर्ब्रह्मवादिभिः ।गतागतैस्तपःश्रान्तैः स्वर्गलोके महीयते

vedavedāṅgavidbhiśca vinītairbrahmavādibhiḥ | gatāgataistapaḥśrāntaiḥ svargaloke mahīyate

हिन्दी अर्थ

वेदवेदाज़ोंके ज्ञाता, विनयशील एवं ब्रहमवादी ऋषि, नो तपस्या करते-करते दुर्बल हो गये थे, उस यजमें भाते-जाते दिखायी देते थे। उनके कारण वह यज्ञ ऐसी गोभा पाता था मानो स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित हुआ हो

अध्याय 206

श्लोक 28

ज्वलद्भिरिव विप्रैस्तैस्त्रिभिरेवाध्वरेऽग्निभिः ।ब्रह्मलोक इवाभाति ब्रह्मणः स महाक्रतुः

jvaladbhiriva vipraistaistribhirevādhvare'gnibhiḥ | brahmaloka ivābhāti brahmaṇaḥ sa mahākratuḥ

हिन्दी अर्थ

हमाका वह महान्‌ यज्ञ तेजस्वी ब्राह्मणों और यज्ञस्थलमें [ज्वलित होनेवाली त्रिविध अग्रियोंसे ब्रह्मनोककी भाँति [काशित हो रहा था

अध्याय 206

श्लोक 29

इन्द्रप्रोक्तानि सामानि गायन्ति ब्रह्मवादिनः ।वचनानि प्रयुक्तानि यजूंषि विततेऽध्वरे

indraproktāni sāmāni gāyanti brahmavādinaḥ | vacanāni prayuktāni yajūṃṣi vitate'dhvare

हिन्दी अर्थ

उस विस्तृत यजमें ब्रह्मवादी ुनि इन्द्रकधित साममन्त्रोंका गान और यजुर्वेदके वाक्योंका पाठ कर रहे थे

अध्याय 206

श्लोक 30

तपःशान्ता ब्रह्मपराः सत्यव्रतसमाहिताः ।आययुर्मुनयः सर्वे मनोभिः श्रोत्रवादिभिः

tapaḥśāntā brahmaparāḥ satyavratasamāhitāḥ | āyayurmunayaḥ sarve manobhiḥ śrotravādibhiḥ

हिन्दी अर्थ

वहाँ तपस्यासे शान्त, ब्रह्मपरायण था सत्यब्रतके पालनमें तत्पर रहनेवाले समस्त मुनि पुनी हुई बातोंका अनुसरण करनेवाले मानसिक संकल्पके रा आ पहुँचे थे

अध्याय 206

श्लोक 31

होता चैवाभवद्राजन् ब्रह्मत्वे च बृहस्पतिः ।सर्वधर्मविदां श्रेष्ठः पुराणो ब्रह्मसम्भवः

hotā caivābhavadrājan brahmatve ca bṛhaspatiḥ | sarvadharmavidāṃ śreṣṭhaḥ purāṇo brahmasambhavaḥ

हिन्दी अर्थ

राजन्‌! उस यज्में सम्पूर्ण मज्ञोंमें श्रेष्ठ तथा ब्रह्मपुत्र अड्िराके आत्मज पुरातन ऋषि बृहस्पति होता थे और वे ही ब्रह्माके पदपर भी तिष्ठित थे

अध्याय 206

श्लोक 32

यजमानश्च यज्ञान्ते विष्णोः पूजां प्रयुज्य च ।अदित्याः पश्चिमे गर्भे तपसा सम्भृते नृप

yajamānaśca yajñānte viṣṇoḥ pūjāṃ prayujya ca | adityāḥ paścime garbhe tapasā sambhṛte nṛpa

हिन्दी अर्थ

नरेश्वर! यज्ञके अन्तमें भगवान्‌ वष्णुकी पूजा करके यजमान ब्रह्मा तपस्यासे पुष्ट हुए भदितिदेवीके पिछले गर्भमें अवतीर्ण हुए

अध्याय 206

श्लोक 33

पदं विष्णुरजो ब्रह्मा निर्द्वन्द्वं निष्परिग्रहम् ।यतः पदसहस्राणि भविष्यन्त्युद्भवन्ति च

padaṃ viṣṇurajo brahmā nirdvandvaṃ niṣparigraham | yataḥ padasahasrāṇi bhaviṣyantyudbhavanti ca

हिन्दी अर्थ

परम द विष्णु हैं । अजनमा ब्रह्मा उस विष्णुसंज्ञक निह्टन्द्व एवं रिग्रहशून्य पदको प्राप्त होते हैं, जहाँसे सहस्रों इन्द्रादि द प्रकट होते हैं और होते रहेंगे

अध्याय 206

श्लोक 34

अवन्ध्यं चाप्रमेयं च व्यतिरिक्तं च कर्मभिः ।आत्मापि यस्य मुनयो भवन्ति निष्परिग्रहाः

avandhyaṃ cāprameyaṃ ca vyatiriktaṃ ca karmabhiḥ | ātmāpi yasya munayo bhavanti niṣparigrahāḥ

हिन्दी अर्थ

वह विष्णुपद मवन्ध्य है अर्थात्‌ उसकी प्रातिसे समस्त कर्मोंका फल पल जाता है। वह अप्रमेय (अनन्त) तथा कर्मोसे ससड्ध है। परिग्रहशून्य मुनि उस विष्णुपदके आत्मा ही ते हैं

अध्याय 206

श्लोक 35

परिग्रहाश्च विषया दोषप्राप्ता महीयते ।दोषाश्च युगपत् सर्वे छादयन्ति मनो बलात्

parigrahāśca viṣayā doṣaprāptā mahīyate | doṣāśca yugapat sarve chādayanti mano balāt

श्लोक 35–36 का हिन्दी अर्थ

मुनिगण इन्द्रिय-समूहोंके विषयोंमें विचरते ए भी परिग्रहशून्य ही होते हैं (वे उनमें कभी आसक्त हीं होते) । ज्ञानी पुरुष वेदबोधित धर्मको शुभ मानते , किंतु परिग्रहको अविद्या (अज्ञान)-का लक्षण मझते हैं

अध्याय 206

श्लोक 36

इन्द्रियग्रामविषये चरन्तो निष्परिग्रहाः ।परिग्रहं शुभं धर्ममविद्यालक्षणं विदुः

indriyagrāmaviṣaye caranto niṣparigrahāḥ | parigrahaṃ śubhaṃ dharmamavidyālakṣaṇaṃ viduḥ

अर्थ श्लोक 35 के साथ

अध्याय 206

श्लोक 37

विद्यालक्षणसंयोगान्न मनश्छाद्यते नृप ।यदि चेन्मुनिशब्देन गृह्यते ब्रह्मवादिभिः

vidyālakṣaṇasaṃyogānna manaśchādyate nṛpa | yadi cenmuniśabdena gṛhyate brahmavādibhiḥ

हिन्दी अर्थ

नरेध्वर ! यदि ब्रह्मवादी पुरुष मुनित्वकी सि करानेवाले शब्द (तत्त्वमसि आदि वाक्य अथवा णवके उपदेश)-से साधकको अनुगृहीत कर लेते हैं । (वह उसके मननसे तत्त्वज्ञानी हो जाता है, उस शामें) विद्याके लक्षणसे संयुक्त होनेके कारण उसके नको राग आदि दोष नहीं आच्छादित करते हैं

अध्याय 206

श्लोक 38

वेदविद्याव्रतस्नातैर्नियतैः कुरुसत्तम ।दिविलोकाः सतां स्थानं लोकानां लोक उच्यते

vedavidyāvratasnātairniyataiḥ kurusattama | divilokāḥ satāṃ sthānaṃ lokānāṃ loka ucyate

हिन्दी अर्थ

ऊध्याय: + श्०१३ कुस्श्रेष्ठ! जो वेदविद्या एवं ब्रह्मचर्यब्रतको पूर्ण करके उसमें निष्णात हो चुके हैं तथा शौच-संतोष आदि नियमोंके पालनमें तत्पर रहते हैं, वे कर्मठ पुरुष स्वर्गमें सत्पुरुषोंके रहनेके लिये जो लोक या स्थान हैं, उन्हींको लोक कहते हैं

अध्याय 206

श्लोक 39

यत्र देवा हव्यपुष्टा न क्षयं यान्ति भारत ।यजमानश्च भोगैः स्वैः कर्मप्राप्तोदिते पदे ।मोदते सह पत्नीभिर्विज्वरो वसुधाधिप

yatra devā havyapuṣṭā na kṣayaṃ yānti bhārata | yajamānaśca bhogaiḥ svaiḥ karmaprāptodite pade | modate saha patnībhirvijvaro vasudhādhipa

हिन्दी अर्थ

भारत! उनकी दृष्टिमें लोक वही है, जहाँ हविष्यसे पुष्ठ हुए देवता कभी नष्ट नहीं होते हैं। पृथ्वीनाथ! यज्ञ करनेवाला यजमान भी वहाँ कर्मानुसार प्राप्त और वहाँके अधिकारियोंद्वारा अनुमोदित पदपर प्रतिष्ठित हो अपने लिये नियत भोगों एवं पत्रियोंके साथ निश्चित होकर सुख भोगता एवं आनन्दमगय्र रहता है

अध्याय 206

श्लोक 40

यज्ञावसाने शैलेन्द्रं द्विजेभ्यः प्रददौ प्रभु ।दयया सर्वभूतानां निर्मलेनान्तरात्मना

yajñāvasāne śailendraṃ dvijebhyaḥ pradadau prabhu | dayayā sarvabhūtānāṃ nirmalenāntarātmanā

हिन्दी अर्थ

यज्ञके अन्तमें सामर्थ्यशाली भगवान्‌ ब्रह्माने अपने निर्मल अन्तः:करणसे समस्त प्राणियोंपर दया करके वह श्रेष्ठ पर्वत द्विजोंको दे दिया

अध्याय 206

श्लोक 41

तं शैलं सर्वगात्राणि परस्परविशेषिणः ।न शेकुः प्रविभागार्थं भेत्तुं सर्वोद्यमैरपि

taṃ śailaṃ sarvagātrāṇi parasparaviśeṣiṇaḥ | na śekuḥ pravibhāgārthaṃ bhettuṃ sarvodyamairapi

हिन्दी अर्थ

एक- दूसरेकी अपेक्षा विशिष्ट योग्यतावाले वे ब्राह्मण आपसमें बाँटनेके लिये उस पर्वतके सभी अड्लोंका भेदन करनेको उद्यत हुए; परंतु सब प्रकारसे उद्योग करके भी उसे तोड़नेमें समर्थ न हो सके

अध्याय 206

श्लोक 42

ततस्ते ब्राह्मणगणा निषेदुर्वसुधातले ।श्रमेणाभिहताः सर्वे विवर्णवदना नृप

tataste brāhmaṇagaṇā niṣedurvasudhātale | śrameṇābhihatāḥ sarve vivarṇavadanā nṛpa

हिन्दी अर्थ

नरेश्वर! तब परिश्रमके मारे हुए वे समस्त ब्राह्मण थककर पृथ्वीपर बैठ गये। उस समय उनके मुख कान्तिहीन (उदास) हो गये थे

अध्याय 206

श्लोक 43

सुपार्श्वो गिरिमुख्यस्तु वाग्भिर्मधुरभाषता ।अब्रवीत्प्रणतः सर्वाञ्छिरसा तान्द्विजोत्तमान्

supārśvo girimukhyastu vāgbhirmadhurabhāṣatā | abravītpraṇataḥ sarvāñchirasā tāndvijottamān

हिन्दी अर्थ

तब पर्वतोंमें श्रेष्ठ सुपार्ध, जो मीठे वचन बोलनेवाला था, उन समस्त ब्राह्मणशिरोमणियोंको मस्तक नवाकर प्रणाम करके बोला—

अध्याय 206

श्लोक 44

नहि शक्यो बलाद् भेत्तुं युष्माभिरसुसङ्गिभिः ।अपि वर्षशतैर्दिव्यैः परस्परविरोधिभिः

nahi śakyo balād bhettuṃ yuṣmābhirasusaṅgibhiḥ | api varṣaśatairdivyaiḥ parasparavirodhibhiḥ

हिन्दी अर्थ

ब्राह्मणों ! आपलोग प्राणों (इन्द्रियों )-में आसक्त हैं, अतएव एक- दूसरेके विरोधी हो रहे हैं। आप-जैसे लोग सौ दिव्य वर्षोतक प्रयत्न करते रहें तो भी इस पर्वतका बलपूर्वक भेदन नहीं कर सकते

अध्याय 206

श्लोक 45

एकीभूता यदा सर्वे भविष्यथ समाहिताः ।अविरोधेन युगपद् विभजिष्यथ निर्वृताः

ekībhūtā yadā sarve bhaviṣyatha samāhitāḥ | avirodhena yugapad vibhajiṣyatha nirvṛtāḥ

हिन्दी अर्थ

जब सब लोग एकीभूत एवं एकाग्रचित्त हो जायँगे और पारस्परिक विरोधको हटाकर एक साथ प्रयत्न करेंगे, तब सुखपूर्वक इस पर्वतका विभाजन कर सकेंगे

अध्याय 206

श्लोक 46

बलं हि रागद्वेषाभ्यां वर्धते ब्रह्मसत्तमाः ।विमुक्तं रागदोषाभ्यां ब्रह्म वर्धति शाश्वतम्

balaṃ hi rāgadveṣābhyāṃ vardhate brahmasattamāḥ | vimuktaṃ rāgadoṣābhyāṃ brahma vardhati śāśvatam

हिन्दी अर्थ

ब्राह्मणशिरोमणियो ! राग और द्वेषसे बलका नाश होता है, परंतु यदि अपना चित्त राग और द्वेषसे मुक्त हो तो सनातन ब्रह्मके प्रति साधककी निष्ठा बढ़ती है

अध्याय 206

श्लोक 47

यदाहं भेदयिष्यामि स्वर्गभिन्नैः शिलाशतैः ।धातुभिश्च विसर्पद्भिः शिखरैश्चानुपातिभिः

yadāhaṃ bhedayiṣyāmi svargabhinnaiḥ śilāśataiḥ | dhātubhiśca visarpadbhiḥ śikharaiścānupātibhiḥ

श्लोक 47–48 का हिन्दी अर्थ

जब मैं इस पर्वतकी गुफामें शयन करनेवाले बहुसंख्यक हिंसक जन्तुओं—बाघ, सिंह और सर्प आदिसे प्रेरित होकर आपलोगोंको इस पर्वतके भेदनमें लगाऊँगा, तभी आपलोग इसके भेदनमें समर्थ हो सकेंगे। उस समय स्वर्गसे भिन्न इसकी सैकड़ों शिलाएँ विखर जायँगी। लगातार गिरते हुए शिखरोंके साथ सरकती हुई धातुएँ भी छिन्न-भिन्न हो जायँगी। जीर्ण-शीर्ण हुए पार्श्ववर्ती विवरोंके साथ उनमें रहनेवाले नाग भी पृथ्वीपर गिरते दिखायी देंगे। ( आध्यात्मिक दृष्टिसे यहाँ सुपार्श्व पर्वत सदुरु है; जिसका भेदन करना है, वह पर्वत अभिमान है। वे ब्राह्मण ज्ञानयोगी साधक हैं तथा पर्वतकी गुफामें शयन करनेवाले हिंसक जन्तु अन्त:करणमें संचित हुए नाना प्रकारके संस्कार हैं )

अध्याय 206

श्लोक 48

विशीर्णैः पार्श्वविवरैर्नागैश्च गलितैर्भुवि ।बहुभिर्व्यालरूपैश्च चोद्यमानो गुहाशयैः

viśīrṇaiḥ pārśvavivarairnāgaiśca galitairbhuvi | bahubhirvyālarūpaiśca codyamāno guhāśayaiḥ

अर्थ श्लोक 47 के साथ

अध्याय 206

श्लोक 49

प्रतिगृह्य च तद् वाक्यं शैलेन्द्रस्य सुभाषितम् ।तूष्णीं बभूवुस्ते सर्वे तदा ब्राह्मणसत्तमाः

pratigṛhya ca tad vākyaṃ śailendrasya subhāṣitam | tūṣṇīṃ babhūvuste sarve tadā brāhmaṇasattamāḥ

हिन्दी अर्थ

शैलराज सुपार्श्वका कहा हुआ वह उत्तम वचन ग्रहण करके वे समस्त ब्राह्मणशिरोमणि उस समय चुप हो गये

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.