Harivamsha Purana
212
अध्याय 212 / 318

Parva 3, Adhyāya 29

21 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ21 श्लोक

अध्याय 212

श्लोक 1

तपसःप्रभावेण देवानां उत्कर्षं संयुज्य तपसा देवाः किमकुर्वंस्ततः परम् ।न हि तद् विद्यते लोके तपसा यन्न लभ्यते

tapasaḥprabhāveṇa devānāṃ utkarṣaṃ saṃyujya tapasā devāḥ kimakurvaṃstataḥ param | na hi tad vidyate loke tapasā yanna labhyate

हिन्दी अर्थ

[2—अुऊअ>>_. 'वताओंका उत्कर्ष जनमेजयने पूछा—मुने! तदनन्तर देवताओंने तपस्यासे संयुक्त होकर क्या किया? संसारमें ऐसा कोई कार्य नहीं है, जो तपस्यासे सुलभ न हो

अध्याय 212

श्लोक 2

अथ दीक्षां समास्थाय सर्वे विष्णुमया गणाः ।पुष्करादग्निमुद्धृत्य प्रणीय च यथाविधि

atha dīkṣāṃ samāsthāya sarve viṣṇumayā gaṇāḥ | puṣkarādagnimuddhṛtya praṇīya ca yathāvidhi

श्लोक 2–3 का हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजीने कहा—राजन्‌! तदनन्तर सभी विष्णुस्वरूप ब्राह्मणणणोंने यज्ञकी दीक्षा ले पुष्करसे अग्िको उद्धृत करके उनकी विधिवत्‌ स्थापना करनेके पश्चात्‌ वेदाज्ञासे प्रेरित हो मन्त्रोक्त विधिसे मन्त्रपूत हविष्यद्वारा जैसा विधान है, उसी प्रकार हवन किया

अध्याय 212

श्लोक 3

वहुवुर्मन्त्रविधिना ब्राह्मणा मन्त्रचोदिताः ।हविषा मन्त्रपूतेन यथा वै विधिरेव च

vahuvurmantravidhinā brāhmaṇā mantracoditāḥ | haviṣā mantrapūtena yathā vai vidhireva ca

अर्थ श्लोक 2 के साथ

अध्याय 212

श्लोक 4

स चाग्निर्विधिवत्तत्र वर्धते ब्रह्मतेजसा ।तेजोभिर्बहुलीभूतः प्रभुः पुरुषविग्रहः

sa cāgnirvidhivattatra vardhate brahmatejasā | tejobhirbahulībhūtaḥ prabhuḥ puruṣavigrahaḥ

हिन्दी अर्थ

वे अग्रिदेव वहाँ ब्रह्मतेजसे सम्पन्न हो विधिवत्‌ बढ़ने लगे। महान्‌ तेजकी राशिसे युक्त होकर ते प्रभु अग्रिदेव पुरुषरूपमें प्रकट हो गये॥ '

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श्लोक 5

ब्रह्मदण्ड इति ख्यातो वपुषा निर्दहन्निव ।दिव्यरूपप्रहरणो ह्यसिचर्मधनुर्धरः

brahmadaṇḍa iti khyāto vapuṣā nirdahanniva | divyarūpapraharaṇo hyasicarmadhanurdharaḥ

हिन्दी अर्थ

उस समय उनका नाम 'ब्रह्मदण्ड' रखा गया। वे अपने तेजस्वी शरीरसे दूसरोंको दग्ध करते हुए-से जान पड़ते थे। उनका स्वरूप और आयुध सभी दिव्य थे। वे ढाल, तलवार, धनुष तथा खड्ग और खेटक लिये हुए थे

अध्याय 212

श्लोक 6

सगदो लाङ्गली चक्री शरी चर्मी परश्वधी ।शूली वज्री स्वङ्गपाणिः शक्तिमान् वरकार्मुकः

sagado lāṅgalī cakrī śarī carmī paraśvadhī | śūlī vajrī svaṅgapāṇiḥ śaktimān varakārmukaḥ

श्लोक 6–7 का हिन्दी अर्थ

गदा, हल, चक्र, बाण, चर्म, फरसा, शूल, वर, खड्ग, शक्ति, श्रेष्ठ धनुष, मुसल और लाज़ल—इन सब अस्त्रोंको नारायणने धारण किया था। महाबली नर हल और मुसल लिये हुए थे

अध्याय 212

श्लोक 7

विष्णुश्चक्रधरः खड्गी मुसली लाङ्गलायुधः ।नरो लाङ्गलमालम्ब्य मुसलं च महाबलः

viṣṇuścakradharaḥ khaḍgī musalī lāṅgalāyudhaḥ | naro lāṅgalamālambya musalaṃ ca mahābalaḥ

अर्थ श्लोक 6 के साथ

अध्याय 212

श्लोक 8

वज्रमिन्द्रस्तपोयोगाच्छतपर्याणमक्षिपत् ।रुद्रः शूलं पिनाकं च मनसाधारयद् भुवि

vajramindrastapoyogācchataparyāṇamakṣipat | rudraḥ śūlaṃ pinākaṃ ca manasādhārayad bhuvi

हिन्दी अर्थ

देवराज इन्द्रने तपस्याके प्रभावसे शतपर्वा व्र प्रात किया था, जिसका वे प्रयोग किया करते हैं । रुद्रदेवने भूतलपर केवल शूल तथा पिनाक धारण कर रखा था

अध्याय 212

श्लोक 9

मृत्युर्दण्डं पाशमापः कालः शक्तिमगृह्णत ।जग्राह परशुं त्वष्टा कुबेरश्च परश्वधम्

mṛtyurdaṇḍaṃ pāśamāpaḥ kālaḥ śaktimagṛhṇata | jagrāha paraśuṃ tvaṣṭā kuberaśca paraśvadham

हिन्दी अर्थ

मृत्युने दण्ड, वरुणने पाश तथा कालने शक्ति ले रखी थी। त्वष्टाने परशु और कुबेरने फरसा ग्रहण किया था

अध्याय 212

श्लोक 10

निर्विकारैः समायुक्ताः शतशोऽथ सहस्रशः ।विश्वकर्मा च त्वष्टा च चक्राते ह्यायुधं बहु

nirvikāraiḥ samāyuktāḥ śataśo'tha sahasraśaḥ | viśvakarmā ca tvaṣṭā ca cakrāte hyāyudhaṃ bahu

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार सब देवता सैकड़ों और हजारों निर्विकार (निर्दोष) अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न थे। विश्वकर्मा तथा त्वष्टा—ये दोनों उनके लिये बहुत-से आयुधोंका निर्माण करते थे

अध्याय 212

श्लोक 11

इन्द्रायाग्निरथं प्रादात् सूर्याय च प्रतापिने ।परमात्मा ददौ कृष्णो रुद्राय च महात्मने

indrāyāgnirathaṃ prādāt sūryāya ca pratāpine | paramātmā dadau kṛṣṇo rudrāya ca mahātmane

हिन्दी अर्थ

परमात्मा भगवान्‌ विष्णुने इन्द्रको, प्रतापी सूर्यको तथा महात्मा रुद्रको अग्रिमय रथ प्रदान किया

अध्याय 212

श्लोक 12

छन्दोभिरेव त्वष्टा च स चकाराथ वाहिनीं विश्वकर्मा विमानानि चकार बहुभिः क्रमैः

chandobhireva tvaṣṭā ca sa cakārātha vāhinīṃ viśvakarmā vimānāni cakāra bahubhiḥ kramaiḥ

हिन्दी अर्थ

त्वष्टाने वेदोक्त सरणिसे ही वाहिनीका निर्माण किया। विश्वकर्माने अनेक क्रमोंद्वारा बहुत-से विमान बनाये

अध्याय 212

श्लोक 13

शरीरांशं समुद्धृत्य विष्णुः सत्यपराक्रमः ।पुष्करात् पर्वणि वनात् पृतनार्थं प्रवर्तयन्

śarīrāṃśaṃ samuddhṛtya viṣṇuḥ satyaparākramaḥ | puṣkarāt parvaṇi vanāt pṛtanārthaṃ pravartayan

हिन्दी अर्थ

सत्यपराक्रमी भगवान्‌ विष्णुने पर्वके दिन पुष्कर वनसे अपने शरीरका ही अंश निकालकर दिया और उसे सेना बनानेके लिये प्रेरणा दी

अध्याय 212

श्लोक 14

द्यां चैव सूर्यऋक्षाणां वाचा वै समकल्पयत् ।यथा स पूज्यः सङ्ग्रामे शत्रून् निर्बिभिदे रणे

dyāṃ caiva sūryaṛkṣāṇāṃ vācā vai samakalpayat | yathā sa pūjyaḥ saṅgrāme śatrūn nirbibhide raṇe

हिन्दी अर्थ

सूर्य तथा ग्रह-नक्षत्रोंकी स्थितिके लिये भगवान्‌ने वाणीद्वारा दुलोककी रचना की । जिससे उस द्युलोकमें रहकर देवपूज्य इन्द्रने संग्राममें अपने शत्रुओंको विदीर्ण किया था

अध्याय 212

श्लोक 15

स तं दण्डं समुचितं निर्विकारं समाहितम् ।ब्रह्मा जग्राह विधिना अन्तर्धानगतः प्रभुः

sa taṃ daṇḍaṃ samucitaṃ nirvikāraṃ samāhitam | brahmā jagrāha vidhinā antardhānagataḥ prabhuḥ

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मा रूपमें प्रकट हुए भगवान्‌ विष्णुने इन्द्रद्वारा असुरोंपर गिराये गये उस दण्डको उचित और निर्विकार-अवस्थामें पाकर उसे विधिपूर्वक ग्रहण किया और उन सबकी दृष्टिसे वे अदृश्य हो गये

अध्याय 212

श्लोक 16

स्वैः प्रभावैश्च विधिना सोऽस्त्रग्रामं चतुर्विधम् ।ऐन्द्रमाग्नेयवायव्ये रौद्रं रौद्रेण वर्चसा

svaiḥ prabhāvaiśca vidhinā so'stragrāmaṃ caturvidham | aindramāgneyavāyavye raudraṃ raudreṇa varcasā

हिन्दी अर्थ

उन्होंने अपने प्रभावसे चार प्रकारके अस्त्रसमुदाय—ऐन्द्र, आग्नेय, वायव्य तथा भयंकर तेजसे युक्त रौद्रकी रचना की

अध्याय 212

श्लोक 17

एभिर्विकारैः संयुक्ता दितेः पुत्रा महाबलाः ।तपसा शिक्षया चैव स्वास्त्रैः प्रहरणैरपि

ebhirvikāraiḥ saṃyuktā diteḥ putrā mahābalāḥ | tapasā śikṣayā caiva svāstraiḥ praharaṇairapi

हिन्दी अर्थ

दितिके महाबली पुत्र भी तपस्या, शिक्षा और अपने आयुधोंसे युक्त होनेपर भी इन काम आदि विकारोंके वशीभूत हो गये

अध्याय 212

श्लोक 18

बलेन चतुरङ्गेण वीर्येण सुसमाहिताः ।अप्रधृष्या रणे सर्वे समपद्यन्त वै तदा

balena caturaṅgeṇa vīryeṇa susamāhitāḥ | apradhṛṣyā raṇe sarve samapadyanta vai tadā

हिन्दी अर्थ

वे सब-के-सब उस समय चतुरड्जिणी सेना और पराक्रमसे संयुक्त हो युद्धभूमिमें दुर्जय हो गये थे

अध्याय 212

श्लोक 19

ते विहाय गुहामध्यं सभाण्डोपस्करे रथे ।मन्दरस्य गिरेः पादे विचेरुर्वसुधातले

te vihāya guhāmadhyaṃ sabhāṇḍopaskare rathe | mandarasya gireḥ pāde vicerurvasudhātale

हिन्दी अर्थ

वे गुहाओंके मध्यभागको त्यागकर सामानोंसे भरे हुए रथपर बैठकर मन्दराचलकी उपत्यकामें पृथ्वीपर ही विचरने लगे

अध्याय 212

श्लोक 20

चतुरङ्गं बलं सर्वं संहृत्य तमसः प्रभुः ।विष्णुरेव महायोगांश्चचार वसुधातले

caturaṅgaṃ balaṃ sarvaṃ saṃhṛtya tamasaḥ prabhuḥ | viṣṇureva mahāyogāṃścacāra vasudhātale

हिन्दी अर्थ

याय: * श्०्३९ तब तमोगुणके कार्यभूत असुरोंकी उस सारी चतुरद्धिणी सेनाका संहार करके प्रभावशाली भगवान्‌ विष्णुने ही. भूतलपर बड़े-बड़े योगोंका आचरण किया

अध्याय 212

श्लोक 21

भूयोऽन्यत्तप आसेदुश्चरन्तो ब्राह्मणैः सह ।तैश्च सर्वैः सुरगणैर्धर्मचीरनिवासिभिः

bhūyo'nyattapa āseduścaranto brāhmaṇaiḥ saha | taiśca sarvaiḥ suragaṇairdharmacīranivāsibhiḥ

हिन्दी अर्थ

फिर धर्ममय और चीरमय वस्त्र धारण करनेवाले ब्राह्मणों और समस्त देवताओंके साथ विचरते हुए असुर दूसरी तपस्या करने लगे

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

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सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
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अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

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व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

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आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

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