Harivamsha Purana
213
अध्याय 213 / 318

Parva 3, Adhyāya 30

32 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ32 श्लोक

अध्याय 213

श्लोक 1

पृथोः राज्याभिषेकं, दैत्यानां देवतानां च मन्दराचलस्य मन्थनदण्डेन समुद्रस्य मन्थनं, समुद्रात् अन्येभिः रत्नैः सह अमृतस्य प्राकट्यं, राहोः शिरस्य छेदनं ब्रह्मन् खिले वर्तमाने निर्मर्यादे महाग्रहे ।अविनाशे च भूतानां कथमासन् प्रजास्तदा

pṛthoḥ rājyābhiṣekaṃ, daityānāṃ devatānāṃ ca mandarācalasya manthanadaṇḍena samudrasya manthanaṃ, samudrāt anyebhiḥ ratnaiḥ saha amṛtasya prākaṭyaṃ, rāhoḥ śirasya chedanaṃ brahman khile vartamāne nirmaryāde mahāgrahe | avināśe ca bhūtānāṃ kathamāsan prajāstadā

हिन्दी अर्थ

याय:—ााणण द्वारा मन्दराचलके मन्थनदण्डद्वारा समुद्रका करा प्राकट्य और राहुके सिरका छेदन जनमेजयने पूछा—ब्रह्मनू! जब लोहेकी कीलके प्रमान हृदयमें कसक पैदा करनेवाला, मर्यादाशून्य महान्‌ प्रह (अज्ञान) विद्यमान था और प्राणियोंके मोक्षकी कोई पम्भावना नहीं रह गयी थी, उस समय सारी प्रजाएँ कैसे हती थीं ?

अध्याय 213

श्लोक 2

अभ्यषिञ्चत्पृथुं वैन्यं पुरा राज्ये प्रजापतिः ।राज्याय ऋषिभिः सार्धं प्रजाधर्मपरायणः

abhyaṣiñcatpṛthuṃ vainyaṃ purā rājye prajāpatiḥ | rājyāya ṛṣibhiḥ sārdhaṃ prajādharmaparāyaṇaḥ

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी बोले—राजन्‌ ! पूर्वकालमें प्रजापालन- रूप धर्ममें तत्पर रहनेवाले प्रजापतिने ऋषियोंको साथ लेकर वेनकुमार पृथुका प्रजाजनोंके राज्यपर राजोचित कर्म करनेके लिये अभिषेक कर दिया

अध्याय 213

श्लोक 3

एष नः परमो राजा सानुरागो व्यजायत ।त्रेतायां सम्प्रवृत्तायामन्योन्यमनुजल्पिरे

eṣa naḥ paramo rājā sānurāgo vyajāyata | tretāyāṃ sampravṛttāyāmanyonyamanujalpire

श्लोक 3–4 का हिन्दी अर्थ

उस समय पतत्ययुग समाप्त होकर त्रेताका आरम्भ हुआ था। ऐसे परमयमें पृथुको अपना संरक्षक पाकर सारी प्रजा आपसमें कहने लगी—' ये हमारे सर्वोत्तम राजा हैं । हमपर अनुराग होनेसे ही ये हमलोगोंके राजा हुए हैं । हमें जीविकावृत्ति देनेवाले ये ही हैं। ये अनेक प्रकारके शिल्पकर्मोकि प्रवर्तक होंगे । अपने सत्यप्राप्त (भगवदर्पित) कर्मसे ये प्रमस्त प्राणियोंके जीवन-निर्माता होंगे

अध्याय 213

श्लोक 4

एष नो वृत्तिदाता च शिल्पानां च प्रवर्तिता ।निर्माता सर्वभूतानां सत्यप्राप्तेन कर्मणा

eṣa no vṛttidātā ca śilpānāṃ ca pravartitā | nirmātā sarvabhūtānāṃ satyaprāptena karmaṇā

अर्थ श्लोक 3 के साथ

अध्याय 213

श्लोक 5

एतस्मिन्नन्तरे देवा गन्धमादनसानुषु ।बहुभिर्नियमैः श्रान्ता निषण्णा गिरिसानुषु

etasminnantare devā gandhamādanasānuṣu | bahubhirniyamaiḥ śrāntā niṣaṇṇā girisānuṣu

हिन्दी अर्थ

इसी पमय अनेक प्रकारके नियमोंके पालनसे थके हुए देवता न्धमादन पर्वतके शिखरोंपर बैठे थे

अध्याय 213

श्लोक 6

अथ गन्धं समासाद्य समन्ताद् देवदानवाः ।माथवे समये प्राप्ते तेन गन्धेन दर्पिताः

atha gandhaṃ samāsādya samantād devadānavāḥ | māthave samaye prāpte tena gandhena darpitāḥ

हिन्दी अर्थ

वैशाखमास एवं वसन्त-ऋतुका समय प्राप्त था, वहाँ बैठे हुए देवताओं और दैत्योंको सब ओरसे एक दिव्य सुगन्धका अनुभव डुआ। वे उस गन्धसे मदमत्त हो गये

अध्याय 213

श्लोक 7

पुष्पमात्रस्य यद् वीर्यं मारुतेन विसर्पितम् ।मनोग्राहि सुखं सर्वं पार्थिवं गन्धमुत्तमम्

puṣpamātrasya yad vīryaṃ mārutena visarpitam | manogrāhi sukhaṃ sarvaṃ pārthivaṃ gandhamuttamam

हिन्दी अर्थ

वह किसी फूलमात्रकी प्रबल गन्ध थी, जो हवाने फैलायी थी। वह पनको बरबस खेींचे लेती थी । पूर्णत: सुखदायिनी थी। पृथ्वीतलकी वह सबसे उत्कृष्ट गन्ध थी

अध्याय 213

श्लोक 8

ते दैत्यास्तेन गन्धेन किञ्चिद् विस्मयमागताः ।प्रसन्नमनसो भूत्वा परं सौख्यमुपागताः

te daityāstena gandhena kiñcid vismayamāgatāḥ | prasannamanaso bhūtvā paraṃ saukhyamupāgatāḥ

हिन्दी अर्थ

उस सुगन्धसे दैत्योंको कुछ विस्मय हुआ। उनका मन प्रसन्न हो गया और उन्हें बड़ा सुख मिला

अध्याय 213

श्लोक 9

ऊचुश्च सहिताः सर्वे तेन गन्धेन दर्पिताः ।पुष्पमात्रस्य यद् वीर्यं किं तस्य फलतो भवेत्

ūcuśca sahitāḥ sarve tena gandhena darpitāḥ | puṣpamātrasya yad vīryaṃ kiṃ tasya phalato bhavet

हिन्दी अर्थ

उस गन्धसे उन्मत्त हो वे सब एक साथ होकर बोले—“जिसके फूलमात्रमें ऐसी शक्ति है, उसके फलसे न जाने क्या होगा?

अध्याय 213

श्लोक 10

अनुमानेन विज्ञेया विविधाः कर्मबुद्धयः ।शुभाश्चैवाशुभाश्चैव बुद्धिप्राणेन देहिनाम्

anumānena vijñeyā vividhāḥ karmabuddhayaḥ | śubhāścaivāśubhāścaiva buddhiprāṇena dehinām

हिन्दी अर्थ

कर्मविषयक बुद्धियाँ नाना प्रकारकी होती हैं । उन्हें अनुमानसे जानना चाहिये। उनमेंसे कुछ तो शुभ (मोक्षसाधक) होती हैं और कुछ अशुभ ( भोगसाधक) । देहधारियोंको बुद्धिकि बलसे उनको समझना चाहिये

अध्याय 213

श्लोक 11

तस्माद् वयं पयोमध्ये ओषध्यो निर्मथामहे ।मन्दरेण विशालेन बलिना कामरूपिणा

tasmād vayaṃ payomadhye oṣadhyo nirmathāmahe | mandareṇa viśālena balinā kāmarūpiṇā

हिन्दी अर्थ

अत: हमलोग समुद्रके जलके भीतर ओषधियोंको डालकर इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले विशाल एवं बलवान्‌ मन्दराचलके द्वारा उसका मन्थन करें

अध्याय 213

श्लोक 12

समुद्रमभिसंरम्भान्मथ्नीमः सोमजं जलम् ।पीत्वा च सहिताः सर्वे प्रस्थिताः कामरूपिणः

samudramabhisaṃrambhānmathnīmaḥ somajaṃ jalam | pītvā ca sahitāḥ sarve prasthitāḥ kāmarūpiṇaḥ

हिन्दी अर्थ

हम सब एक साथ अमृतकी प्राप्तिकि लिये उद्यमशील हों और उत्साहपूर्वक समुद्रका मन्थन करें। इससे हमें सोमज जल अर्थात्‌ अमृत प्राप्त होगा, जिसे पीकर हम इच्छानुसार रूप धारण करनेमें समर्थ (एवं अमर) हो जायँगे

अध्याय 213

श्लोक 13

विष्णुरेवाग्रणीस्तेषां भविष्यति महाबलः ।दिवं च वसुधां चैव भोक्ष्यामः सह शत्रुभिः

viṣṇurevāgraṇīsteṣāṃ bhaviṣyati mahābalaḥ | divaṃ ca vasudhāṃ caiva bhokṣyāmaḥ saha śatrubhiḥ

हिन्दी अर्थ

महाबली विष्णु ही उन देवताओंकी ओरसे अगुआ होंगे। हम (अमृत पान करके अमर हो) अपने शत्रुओं (देवताओं) -के साथ स्वर्ग तथा भूतलका सुख भोगेंगे

अध्याय 213

श्लोक 14

समूलपत्रशाखाश्च सपुष्पाः फलशालिनः ।सर्वे ग्रहांश्च गृह्णीमः सुधां च वसुधातले

samūlapatraśākhāśca sapuṣpāḥ phalaśālinaḥ | sarve grahāṃśca gṛhṇīmaḥ sudhāṃ ca vasudhātale

हिन्दी अर्थ

मूल (पिता), पत्र ( भार्या), शाखा ( भाई) तथा पुष्प (संतान) आदि समस्त परिवारके साथ हम सब लोग अभीष्ट फलके भागी होंगे। इस वसुधापर ही हम सुधा पान करेंगे और ग्रहों (अपने भागों )-को ग्रहण करेंगे '

अध्याय 213

श्लोक 15

उद्धृत्य गिरिपादेभ्यो गन्धमादनसानुजान् ।प्रभाष्य वचनं दैत्या मन्दरस्य प्रकम्पने

uddhṛtya giripādebhyo gandhamādanasānujān | prabhāṣya vacanaṃ daityā mandarasya prakampane

श्लोक 15–16 का हिन्दी अर्थ

इस प्रकार वे महापराक्रमी दैत्य मन्दराचलको हिलाने या उखाड़नेकी बातें करके पार्शवर्ती पर्वतोंसे तथा गन्धमादनके शिखरोंपर पैदा हुए वृक्षोंको उखाड़कर अपनी विशाल भुजाओंद्वारा मन्दर पर्वतको निश्चितरूपसे उठानेके लिये दौड़े और पृथ्वीको कम्पित करने लगे

अध्याय 213

श्लोक 16

समुद्धर्तुं प्रधावन्तः कम्पयन्ति स्म मेदिनीम् ।निश्चयेन महावीर्या बाहुभिः परिणाहिभिः

samuddhartuṃ pradhāvantaḥ kampayanti sma medinīm | niścayena mahāvīryā bāhubhiḥ pariṇāhibhiḥ

अर्थ श्लोक 15 के साथ

अध्याय 213

श्लोक 17

न शक्नुस्ते सूमुद्धर्तुं शैलेन्द्रं दनुवंशजाः ।निपेतुर्जानुभिर्घृष्टा विपुले पर्वतान्तरे

na śaknuste sūmuddhartuṃ śailendraṃ danuvaṃśajāḥ | nipeturjānubhirghṛṣṭā vipule parvatāntare

हिन्दी अर्थ

परंतु वे दानव गिरिराज मन्दरको किसी तरह भी उखाड़ न सके। उनके घुटने घिस गये और वे उस विशाल पर्वतके भीतर गिर पड़े

अध्याय 213

श्लोक 18

समाधायात्मनाऽऽत्मानं तपसा दग्धकिल्बिषाः ।पितामहं प्रपद्यन्ते शिरोभिः कामरूपिभिः

samādhāyātmanā''tmānaṃ tapasā dagdhakilbiṣāḥ | pitāmahaṃ prapadyante śirobhiḥ kāmarūpibhiḥ

हिन्दी अर्थ

तपस्याके द्वारा उनके पाप दग्ध हो गये थे। वे आप ही अपने मनको धीरज दे अपने दिव्य मस्तक ब्रह्माजीके चरणोंमें झुकाकर उनकी शरणमें गये

अध्याय 213

श्लोक 19

तेषां मनोऽभिलषितं ब्रह्मा सर्वत्रगो वशी ।ज्ञात्वा बहुविधैर्वाक्यैर्व्याजहार सरस्वतीम्

teṣāṃ mano'bhilaṣitaṃ brahmā sarvatrago vaśī | jñātvā bahuvidhairvākyairvyājahāra sarasvatīm

श्लोक 19–20 का हिन्दी अर्थ

ब्रह्माजी सर्वत्र गमन करनेवाले तथा सबको वशमें रखनेवाले हैं। उनकी बुद्धि सदा समस्त लोकोंके हितचिन्तनमें ही लगी रहती है। वे उन दैत्योंका मनोरथ जानकर लोकहितकी कामनासे नाना प्रकारके वाक्यों तथा उत्तम वर्ण- सम्पत्तिसे युक्त वाणी बोले। सशरीर होकर भी उन्होंने अशरीर वाणीका प्रयोग किया

अध्याय 213

श्लोक 20

अशरीरां शरीरस्थः परया वर्णसम्पदा ।सर्वलोकमतिर्ब्रह्मा लोकानां हितकाम्यया

aśarīrāṃ śarīrasthaḥ parayā varṇasampadā | sarvalokamatirbrahmā lokānāṃ hitakāmyayā

अर्थ श्लोक 19 के साथ

अध्याय 213

श्लोक 21

आदित्यैर्वसुभिश्चैव रुद्रैश्च समरुद्गणैः ।देवैर्यक्षैः सगन्धर्वैः किन्नरैश्च प्रगायिभिः

ādityairvasubhiścaiva rudraiśca samarudgaṇaiḥ | devairyakṣaiḥ sagandharvaiḥ kinnaraiśca pragāyibhiḥ

श्लोक 21–23 का हिन्दी अर्थ

(उन्होंने कहा—) आदित्य, वसु, रुद्र, मरुदूण, देवता, यक्ष, गन्धर्व और गानपरायण किन्नर—ये सब एक साथ मिलकर अमृतके लिये प्रयत्न करें तो विविध धातुओंसे रज्ित इस महातेजस्वी पर्वतको उठा सकते हैं। समस्त देवता और असुर उस महापर्वतको उखाड़कर हिमवान्‌ पर्वतके सारभूत रसको लता-वेलोंके रूपमें अपने हाथमें आया हुआ देखेंगे

अध्याय 213

श्लोक 22

समेत्य सहितैः सर्वैः शक्य उद्धरितुं गिरिः ।अमृतार्थे महातेजा धातुभिः समरञ्जितः

sametya sahitaiḥ sarvaiḥ śakya uddharituṃ giriḥ | amṛtārthe mahātejā dhātubhiḥ samarañjitaḥ

अर्थ श्लोक 21 के साथ

अध्याय 213

श्लोक 23

सुरासुरगणाः सर्वे समुत्पाट्य महागिरिम् ।हस्तारूढाः प्रपश्यन्ति वीरुधो हिमवद्रसम्

surāsuragaṇāḥ sarve samutpāṭya mahāgirim | hastārūḍhāḥ prapaśyanti vīrudho himavadrasam

अर्थ श्लोक 21 के साथ

अध्याय 213

श्लोक 24

एतच्छुत्वा च वचनं सर्वेषामन्तिके तदा ।दैतेया बाहुबलिनो मनोभिर्वाग्भिरैव च

etacchutvā ca vacanaṃ sarveṣāmantike tadā | daiteyā bāhubalino manobhirvāgbhiraiva ca

श्लोक 24–25 का हिन्दी अर्थ

उस समय सबके निकट खड़े हुए बाहुबलशाली दैत्य ब्रह्माजीका यह वचन सुनकर मन और वाणी आदिके द्वारा उस कार्यके साधनमें प्रवृत्त हुए। जहाँ एक साथ हुए देवताओं और दानवोंद्वारा वह मन्थनदण्ड डाला गया था, उस लवण-समुद्रके वे खिलौने बन गये। उसके जलसे बास्म्बार इधर-उधर आन्दोलित होने लगे

अध्याय 213

श्लोक 25

विक्रीडभूता बहुधा बभूवुर्लवणाम्भसः ।यत्र पुष्करविन्यस्तः सहितैर्देवदानवैः

vikrīḍabhūtā bahudhā babhūvurlavaṇāmbhasaḥ | yatra puṣkaravinyastaḥ sahitairdevadānavaiḥ

अर्थ श्लोक 24 के साथ

अध्याय 213

श्लोक 26

सुरासुरगणाः सर्वे सहिता लवणाम्भसः ।मन्दरं पुष्करं कृत्वा नेत्रं वासुकिमेव च

surāsuragaṇāḥ sarve sahitā lavaṇāmbhasaḥ | mandaraṃ puṣkaraṃ kṛtvā netraṃ vāsukimeva ca

श्लोक 26–27 का हिन्दी अर्थ

समस्त देवता और असुरोंने एक साथ लवणसमुद्रके जलमें मन्दराचलको मथानीके रूपमें डालकर वासुकति नागको मथानी बनाया और ओषधियोंसहित समुद्रजलका एक सहस््र वर्षोतक मन्थन किया। ओषधियोंके योगसे वहाँका जल दूधरूप होकर अमृत बन गया

अध्याय 213

श्लोक 27

समाः सहस्रं मथितं जलमोषधिभिः सह ।क्षीरभूतं समायोगादमृतं समपद्यत

samāḥ sahasraṃ mathitaṃ jalamoṣadhibhiḥ saha | kṣīrabhūtaṃ samāyogādamṛtaṃ samapadyata

अर्थ श्लोक 26 के साथ

अध्याय 213

श्लोक 28

तज्जह्रुरसुराः पूर्वमाक्रान्ता लोभमन्युना ।धन्वन्तरिस्तथा मद्यं श्रीर्देवी कौस्तुभो मणिः

tajjahrurasurāḥ pūrvamākrāntā lobhamanyunā | dhanvantaristathā madyaṃ śrīrdevī kaustubho maṇiḥ

श्लोक 28–29 का हिन्दी अर्थ

(कलशमें सब्चित हुए) उस अमृतको पहले असुरोंने हर लिया, क्योंकि वे लोभ और क्रोधके वशीभूत हो रहे थे। पहले तो सब ओरसे उस समुद्रके जलसे धन्वन्तरि, मद्य, श्रीदेवी, कौस्तुभमणि तथा निर्मल चन्द्रमा प्रकट हुए। इसके बाद परम सुन्दर उच्चैःश्रवा नामक अश्व निकला। तत्पश्चात्‌ * अमृत' का प्रादुर्भाव हुआ

अध्याय 213

श्लोक 29

शशाङ्को विमलश्चापि समुत्तस्थुः समन्ततः ।उच्चैःश्रवा हयो रम्यः पीयूषं तदनन्तरम्

śaśāṅko vimalaścāpi samuttasthuḥ samantataḥ | uccaiḥśravā hayo ramyaḥ pīyūṣaṃ tadanantaram

अर्थ श्लोक 28 के साथ

अध्याय 213

श्लोक 30

पश्चाद् देवास्तदातुमुद्यता राहुमब्रुवन् ।न तु केचित्पिबन्ति स्म दैत्या नैव च दानवाः

paścād devāstadātumudyatā rāhumabruvan | na tu kecitpibanti sma daityā naiva ca dānavāḥ

हिन्दी अर्थ

(जब दैत्योंन उसे अपने अधिकारमें कर लिया) तब देवता उसे लेनेके लिये राहुके विषयमें इस प्रकार कहने लगे-कोई भी दैत्य और दानव अभी अमृतका पान नहीं करते हैं (किंतु यह राहु उसे पीनेकी चेष्टा कर रहा है)

अध्याय 213

श्लोक 31

चिच्छेदाथ हरिः सङ्ख्ये राहोश्चक्रेण कं तदा ।अनिर्मुक्तं पितृगणैर्मुनिभिश्च सनातनैः

cicchedātha hariḥ saṅkhye rāhoścakreṇa kaṃ tadā | anirmuktaṃ pitṛgaṇairmunibhiśca sanātanaiḥ

श्लोक 31–32 का हिन्दी अर्थ

तब श्रीहरिने युद्धमें अपने चक्रसे तत्काल राहुका सिर काट लिया। सनातन मुनियों और पितृगणोंने उस अमृतको नहीं छोड़ा था। इसी बीचमें स्वयं पृथ्वीदेवीने ब्रह्माजीकी आज्ञा पाकर इन्द्रके हाथसे वह अमृत ले लिया। वे ब्रह्माजीके शिष्यभावको प्राप्त हुई थीं। अमृत लेनेके पश्चात्‌ वे चली गयीं

अध्याय 213

श्लोक 32

तदिन्द्रहस्तादमृतं जहार पृथिवी स्वयम् ।जगामाङ्कगता देवी ब्रह्मवाक्यप्रचोदिता

tadindrahastādamṛtaṃ jahāra pṛthivī svayam | jagāmāṅkagatā devī brahmavākyapracoditā

अर्थ श्लोक 31 के साथ

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

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Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.