Harivamsha Purana
214
अध्याय 214 / 318

Parva 3, Adhyāya 31

19 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ19 श्लोक

अध्याय 214

श्लोक 1

बलेः यज्ञे वामनेन त्रिलोक्याः राज्यस्य हरणं, कालान्तरे देवेभिः बलेः राज्याभिषेककरणं निहते दैत्यसङ्घाते विष्णोश्चातिपराक्रमे ।दैतेया दानवेयाश्च किमिच्छन्ति पराक्रमात्

baleḥ yajñe vāmanena trilokyāḥ rājyasya haraṇaṃ, kālāntare devebhiḥ baleḥ rājyābhiṣekakaraṇaṃ nihate daityasaṅghāte viṣṇoścātiparākrame | daiteyā dānaveyāśca kimicchanti parākramāt

हिन्दी अर्थ

$थ्याय;———अ—ाणाण कीके राज्यका अपहरण तथा बलिका राज्याभिषेक जनमेजयने पूछा—मुने ! जब दैत्योंका समूह मारा या (अपने प्रयासमें निष्फल हो गया) और भगवान्‌ वष्णुका अतिशय पराक्रम विजयी (सफल) हो गया, तब त्य और दानव अब पराक्रमसे क्या पाना चाहते हैं ?

अध्याय 214

श्लोक 2

दानवा राज्यमिच्छन्ति पराक्रम्य महाबलाः ।तप इच्छन्ति सहिता देवाः सत्यपराक्रमाः

dānavā rājyamicchanti parākramya mahābalāḥ | tapa icchanti sahitā devāḥ satyaparākramāḥ

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजीने कहा—महाबली दानव पराक्रम करके तीनों लोकोंका) राज्य पाना चाहते हैं और सत्यपराक्रमी रेवता एक साथ होकर तप करना चाहते हैं

अध्याय 214

श्लोक 3

कथं कालस्य महतो हिरण्यकशिपुस्तदा ।यजते ब्रह्मणः क्षेत्रे प्राप्तैश्वर्यः स कामदः

kathaṃ kālasya mahato hiraṇyakaśipustadā | yajate brahmaṇaḥ kṣetre prāptaiśvaryaḥ sa kāmadaḥ

हिन्दी अर्थ

जनमेजयने पूछा—ब्रह्मन्‌! उस समय हिरण्यकशिपु वंशी राजा बलि)-को तो महान्‌ ऐश्वर्य प्राप्त था, वह रूसरोंको अभीष्ट वस्तुएँ देनेकी शक्ति रखता था। ऐसी रशामें उसने ब्रह्माजीके क्षेत्र (प्रयाग) -में दीर्घ कालतक पजज्ञ कैसे किया?

अध्याय 214

श्लोक 4

ईजे बहुसुवर्णेन राजसूयेन पार्थिवः ।क्रतुना दानवश्रेष्ठो वसुधायां महाबलः

īje bahusuvarṇena rājasūyena pārthivaḥ | kratunā dānavaśreṣṭho vasudhāyāṃ mahābalaḥ

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजीने कहा—राजन्‌! महाबलशाली शनवश्रेष्ठ राजा बलिने पृथ्वीपर बहुत-सी सुवर्णराशिमयी क्षिणासे युक्त राजसूय यज्ञका अनुष्ठान किया

अध्याय 214

श्लोक 5

गङ्गायमुनयोर्मध्ये यदभूद् विपुलं तपः ।समेयुस्तत्र सहिता यजमाने महासुरे

gaṅgāyamunayormadhye yadabhūd vipulaṃ tapaḥ | sameyustatra sahitā yajamāne mahāsure

श्लोक 5–6 का हिन्दी अर्थ

भारत ! डरा और यमुनाके मध्यभाग प्रयागमें, जहाँ की हुई तपस्या ई गुनी बढ़ जाती है, जब महान्‌ असुर बलि यज्ञ करने नंगा, उस समय वहाँ बहुत-से वेदवेत्ता ब्राह्मण, महान्‌ ततमें तत्पर रहनेवाले यति तथा योगधर्मसे सिद्ध हुए भन्य महात्मा एक साथ पधारे

अध्याय 214

श्लोक 6

ब्राह्मणा वेदविद्वांसो महाव्रतपरायणाः ।यतयश्चापरे सिद्धा योगधर्मेण भारत

brāhmaṇā vedavidvāṃso mahāvrataparāyaṇāḥ | yatayaścāpare siddhā yogadharmeṇa bhārata

अर्थ श्लोक 5 के साथ

अध्याय 214

श्लोक 7

मुनयो वालखिल्याश्च धन्या धर्मेण शोभिताः ।बहवो हि द्विजा मुख्या नित्यधर्मपरायणाः

munayo vālakhilyāśca dhanyā dharmeṇa śobhitāḥ | bahavo hi dvijā mukhyā nityadharmaparāyaṇāḥ

श्लोक 7–8 का हिन्दी अर्थ

धर्मसे सुशोभित गनेवाले धन्य बालखिल्य मुनि, सदा धर्मपरायण हुत-से श्रेष्ठ द्विज तथा ब्राह्मणों द्वारा पूजनीय सहसों हहाभाग ऋषि भी उस यज्ञमें पधारे थे । वहाँ जहाँ- हाँसे भेंटमें आया हुआ महान्‌ वैभव एकत्र किया जा हा था

अध्याय 214

श्लोक 8

ऋषयश्च महाभागा विप्रैः पूज्याः सहस्रशः ।विपुलैरत्र विभवैर्हियमाणैस्ततस्ततः

ṛṣayaśca mahābhāgā vipraiḥ pūjyāḥ sahasraśaḥ | vipulairatra vibhavairhiyamāṇaistatastataḥ

अर्थ श्लोक 7 के साथ

अध्याय 214

श्लोक 9

शुक्रस्तु सह पुत्रेण दैत्यं याजयते प्रभुः ।हिरण्यकशिपुं मध्ये गणानां ज्वलनप्रभः

śukrastu saha putreṇa daityaṃ yājayate prabhuḥ | hiraṇyakaśipuṃ madhye gaṇānāṃ jvalanaprabhaḥ

हिन्दी अर्थ

पुत्रसहित प्रभावशाली महात्मा शुक्राचार्य, तो अग्निके समान तेजस्वी थे, नरेशगणोंके बीचमें उस त्यराज बलिका यज्ञ करा रहे थे

अध्याय 214

श्लोक 10

हिरण्यकशिपुश्चैव व्याजहार सरस्वतीम् ।कामाद् वरं ददातीति तद् वै सम्प्रतिपद्यताम्

hiraṇyakaśipuścaiva vyājahāra sarasvatīm | kāmād varaṃ dadātīti tad vai sampratipadyatām

हिन्दी अर्थ

उस समय बलिने स्‍चकसे यह बात कही—'यह यजमान आपको इच्छानुसार र दे रहा है, आप इसे ग्रहण करें '

अध्याय 214

श्लोक 11

विष्णुर्वामनरूपेण भिक्षां तां प्रतिगृह्णति ।हिरण्यकशिपोर्हस्ताद् द्वे पदे पदमेव च

viṣṇurvāmanarūpeṇa bhikṣāṃ tāṃ pratigṛhṇati | hiraṇyakaśiporhastād dve pade padameva ca

हिन्दी अर्थ

तब साक्षात्‌ गगवान्‌ विष्णुने वामनरूपसे उपस्थित होकर राजा बलिके ाथसे वह तीन पग भूमिकी भिक्षा ग्रहण की

अध्याय 214

श्लोक 12

ततः क्रमितुमारेभे विष्णुः सत्यपराक्रमः ।त्रीँल्लोकान् मुनिभिः क्रान्तैर्दिव्यं वपुरधारयत्

tataḥ kramitumārebhe viṣṇuḥ satyaparākramaḥ | trī~llokān munibhiḥ krāntairdivyaṃ vapuradhārayat

हिन्दी अर्थ

तब सत्यपराक्रमी भगवान्‌ विष्णुने अपने विक्रमणों (डगों )-सी मुनियोंद्वारा प्रार्थनीय तीनों लोकोंको आक्रान्त करना (मापना) आरम्भ किया। उस समय उन्होंने दिव्य विराट रूप धारण कर लिया था

अध्याय 214

श्लोक 13

हृतराज्याश्च दैतेयाः पातालविवरं ययुः ।ससैन्यगणसम्बद्धाः सप्रासाः सासितोमराः

hṛtarājyāśca daiteyāḥ pātālavivaraṃ yayuḥ | sasainyagaṇasambaddhāḥ saprāsāḥ sāsitomarāḥ

श्लोक 13–14 का हिन्दी अर्थ

राज्यका अपहरण हो जानेपर दैत्य अपनी सेना, प्रास, खड्ग, तोमर, यन्त्र, लगुड, पताका, रथ, ध्वज, ढाल, कवच, कोश, आयुध और फरसे सब कुछ साथ लेकर पाताल- गुफाको लौट गये

अध्याय 214

श्लोक 14

सयन्त्रलगुडाश्चैव सपताकारथध्वजाः ।सचर्मवर्मकोशाश्च सायुधाः सपरश्वधाः

sayantralaguḍāścaiva sapatākārathadhvajāḥ | sacarmavarmakośāśca sāyudhāḥ saparaśvadhāḥ

अर्थ श्लोक 13 के साथ

अध्याय 214

श्लोक 15

तथेन्द्रविष्णुसहिताः सद्यस्तेऽभ्युत्थिता गणा ।अभ्यषिञ्चन् प्रमुदिता लोकानामधिपे सुराः

tathendraviṣṇusahitāḥ sadyaste'bhyutthitā gaṇā | abhyaṣiñcan pramuditā lokānāmadhipe surāḥ

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर (कुछ कालके बाद) इन्द्र तथा विष्णुके साथ दैत्यगण पुन: वहाँसे शीघ्र ही उठे। उस समय देवताओंने प्रसन्नतापूर्वक बलिको त्रिलोकेश्वरके पदपर अभिषिक्त कर दिया

अध्याय 214

श्लोक 16

स तान् स्वधामृतेनाशु पितृत्वे समतर्पयत् ।ब्रह्मा तदमृतं दिव्यं महेन्द्राय प्रयच्छति ।अक्षयं चाव्ययं चैव संवृतस्तेन कर्मणा

sa tān svadhāmṛtenāśu pitṛtve samatarpayat | brahmā tadamṛtaṃ divyaṃ mahendrāya prayacchati | akṣayaṃ cāvyayaṃ caiva saṃvṛtastena karmaṇā

हिन्दी अर्थ

बलिने उन देवताओंको पितृपदपर प्रतिष्ठित करके उन्हें शीघ्र ही स्वधामय अमृतसे तृतत किया । ब्रह्माजीने वह अक्षय एवं अविकारी अमृत महेन्द्रको दिया। बलिके उस कर्मसे देवेन्द्र सुरक्षित हो गये

अध्याय 214

श्लोक 17

ततः शङ्खमुपाध्मासीद् द्विषतां लोमहर्षणम् ।पितामहकरोद्भूतं जनितृ प्रथमे पदे

tataḥ śaṅkhamupādhmāsīd dviṣatāṃ lomaharṣaṇam | pitāmahakarodbhūtaṃ janitṛ prathame pade

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर इन्द्रने ब्रह्माजीके हाथसे प्रकट हुए दिव्य शड्खको, जो प्रमुख पदपर प्रतिष्ठित करनेवाला था, बजाया, वह शत्रुओंके रोंगटे खड़े कर देनेवाला था

अध्याय 214

श्लोक 18

तं श्रुत्वा शङ्खशब्दं तु त्रयो लोकाः समाहिताः ।निर्वृतिं परमां प्राप्ता इन्द्रं नाथमवाप्य च

taṃ śrutvā śaṅkhaśabdaṃ tu trayo lokāḥ samāhitāḥ | nirvṛtiṃ paramāṃ prāptā indraṃ nāthamavāpya ca

श्लोक 18–19 का हिन्दी अर्थ

उस शड्ख-ध्वनिको सुनकर तीनों लोकोंके प्राणियोंका मन एकाग्र हो गया। वे इन्द्रको अपना रक्षक पाकर परमानन्दमें निमग्र हो गये। अग्रिसे प्रकट हुए और प्रज्वलित पावकके समान प्रकाशित होनेवाले जो समस्त आयुध मन्दराचलके शिखरोंपर विद्यमान थे, उनसे संयुक्त हुए तीनों लोक बहुत ही संतुष्ट हुए

अध्याय 214

श्लोक 19

सर्वैः प्रहरणैश्चैव संयुक्ता वह्निसम्भवैः ।मन्दराग्रेषु विहितैर्ज्वलद्भिरिव पावकैः

sarvaiḥ praharaṇaiścaiva saṃyuktā vahnisambhavaiḥ | mandarāgreṣu vihitairjvaladbhiriva pāvakaiḥ

अर्थ श्लोक 18 के साथ

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

धर्म ग्रंथ निःशुल्क और विज्ञापन-रहित है। Dharma Granth is free and has no ads. इसे ऐसा बनाए रखने में सहयोग करेंHelp keep it that way → How it is funded

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.