Harivamsha Purana
218
अध्याय 218 / 318

Parva 3, Adhyāya 35

50 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ50 श्लोक

अध्याय 218

श्लोक 1

भगवता वराहेण विभिन्नासु दिक्षु पर्वतानां नदीनां च निर्माणं तस्योपरि जलौघस्य महती नौरिव स्थिता ।विततत्वात्तु देहस्य न ययौ सम्प्लवं मही

bhagavatā varāheṇa vibhinnāsu dikṣu parvatānāṃ nadīnāṃ ca nirmāṇaṃ tasyopari jalaughasya mahatī nauriva sthitā | vitatatvāttu dehasya na yayau samplavaṃ mahī

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्‌ ! उस जलराशिके ऊपर विशाल नौकाके समान पृथ्वी स्थित हो गयी । इसका आकार बहुत बड़ा है, इसलिये यह जलमें डूब न सकी

अध्याय 218

श्लोक 2

ततः स चिन्तयामास प्रविभागं क्षितेर्विभुः ।समुच्छ्रयं च सर्वेषां पर्वतानां नदीषु च

tataḥ sa cintayāmāsa pravibhāgaṃ kṣitervibhuḥ | samucchrayaṃ ca sarveṣāṃ parvatānāṃ nadīṣu ca

श्लोक 2–3 का हिन्दी अर्थ

तदनन्तर भगवान्‌ने पृथ्वीके विभागका चिन्तन किया । समस्त पर्वतोंकी ऊँचाई, नदियोंके मार्गको सूचित करनेवाली रेखा, वे कितने योजन दूरतक बहेंगी-इसके प्रमाण, उनकी गति पूर्वकी ओर होगी या दक्षिणकी ओर, इसके निश्चय, उनके प्रवाह तथा विशेषत: उन नदियोंके माहात्म्यके विषयमें उन्होंने बास्म्बार विचार किया

अध्याय 218

श्लोक 3

विलेखनं प्रमाणं च गतिं प्रस्रवमेव च ।माहात्म्यं च विशेषं च नदीनामन्वचिन्तयत्

vilekhanaṃ pramāṇaṃ ca gatiṃ prasravameva ca | māhātmyaṃ ca viśeṣaṃ ca nadīnāmanvacintayat

अर्थ श्लोक 2 के साथ

अध्याय 218

श्लोक 4

चतुरन्तां धरां कृत्वा तथा चैव महार्णवम् ।मध्ये पृथिव्याः सौवर्णमकरोन्मेरुपर्वतम्

caturantāṃ dharāṃ kṛtvā tathā caiva mahārṇavam | madhye pṛthivyāḥ sauvarṇamakaronmeruparvatam

हिन्दी अर्थ

चार समुद्र जिसके अन्तमें हैं (अथवा जो चतुर्दलपद्मके भाकारवाली है), उस पृथ्वीकी इस रूपमें स्थापना करके उन्होंने महासागरका भी निर्माण किया, फिर पृथ्वीके पध्यभागमें सुवर्णमय मेरुपर्वतकी स्थापना की

अध्याय 218

श्लोक 5

प्राचीं दिशमथो गत्वा चकारोदयपर्वतम् ।शतयोजनविस्तारं सहस्रं च समुच्छ्रयम्

prācīṃ diśamatho gatvā cakārodayaparvatam | śatayojanavistāraṃ sahasraṃ ca samucchrayam

हिन्दी अर्थ

इसके तराद पूर्व-दिशामें जाकर उन्होंने उदयाचलकी सृष्टि की, जिसका विस्तार सौ योजन और ऊँचाई सहस््र योजन है

अध्याय 218

श्लोक 6

जातरूपमयैः शृङ्गैस्तरुणादित्यसन्निभैः ।आत्मतेजोगुणमयैर्वेदिकाभोगकल्पितम्

jātarūpamayaiḥ śṛṅgaistaruṇādityasannibhaiḥ | ātmatejoguṇamayairvedikābhogakalpitam

हिन्दी अर्थ

वह सुवर्णमय शिखरोंसे सुशोभित है । उसके वे शिखर प्रात:कालके सूर्यके समान तेजस्वी हैं । वे अपने दी तेजोमय गुणोंसे उद्धासित होते हैं । उस पर्वतका निर्माण स प्रकार हुआ है, मानो कोई विशाल वेदी हो

अध्याय 218

श्लोक 7

विविधांश्च महास्कन्धान् काञ्चनान् पुष्करेक्षणः ।नित्यपुष्पफलान् वृक्षान् कृतवांस्तत्र पर्वते

vividhāṃśca mahāskandhān kāñcanān puṣkarekṣaṇaḥ | nityapuṣpaphalān vṛkṣān kṛtavāṃstatra parvate

हिन्दी अर्थ

फमलनयन श्रीहरिने उस पर्वतपर बड़े-बड़े तनेवाले नाना पकारके सुवर्णमय वृक्ष भी बनाये हैं, जो सदा फूल और फलोंसे सम्पन्न रहते हैं

अध्याय 218

श्लोक 8

शतयोजनविस्तारं ततस्त्रिगुणमायतम् ।चकार स महादेवः पुनः सौमनसं गिरिम्

śatayojanavistāraṃ tatastriguṇamāyatam | cakāra sa mahādevaḥ punaḥ saumanasaṃ girim

हिन्दी अर्थ

इसके बाद उन महान्‌ देवता श्रीहरिने सौमनस गिरिका निर्माण किया, जिसकी चौड़ाई मौ योजन और लम्बाई तीन सौ योजन है

अध्याय 218

श्लोक 9

नानारत्नसहस्राणां कृत्वा तत्र सुसञ्चयम् ।वेदिकां बहुवर्णां च सन्ध्याभ्राभामकल्पयत्

nānāratnasahasrāṇāṃ kṛtvā tatra susañcayam | vedikāṃ bahuvarṇāṃ ca sandhyābhrābhāmakalpayat

हिन्दी अर्थ

वहाँ नाना [कारके सहसों रलोंका संचय करके अनेक रंगकी वेदिका ननायी, जो संध्याकालके बादलोंकी भाँति प्रकाशित होती पी

अध्याय 218

श्लोक 10

सहस्रशृङ्गं च गिरिं नानामणिशिलातलम् ।कृतवान् वृक्षगहनं षष्टियोजनमुच्छ्रितम्

sahasraśṛṅgaṃ ca giriṃ nānāmaṇiśilātalam | kṛtavān vṛkṣagahanaṃ ṣaṣṭiyojanamucchritam

हिन्दी अर्थ

तत्पश्चात्‌ भगवानूने सहस्रशुज्ध नामक पर्वतका नर्माण किया, जो नाना प्रकारकी मणिमयी शिलाओंसे मलंकृत था। घने वृक्षोंका वन उसकी शोभा बढ़ाता था। हह पर्वत साठ योजन ऊँचा था

अध्याय 218

श्लोक 11

आसनं तत्र परमं सर्वभूतनमस्कृतम् ।कृतवानात्मनः स्थानं विश्वकर्मा प्रजापतिः

āsanaṃ tatra paramaṃ sarvabhūtanamaskṛtam | kṛtavānātmanaḥ sthānaṃ viśvakarmā prajāpatiḥ

हिन्दी अर्थ

सम्पूर्ण विश्व जनका कर्म है, उन प्रजापालक श्रीहरिने वहाँ अपने लिये [क स्थान बनाया; जो उनका सम्पूर्ण भूतोंसे सम्मानित त्तम आसन है

अध्याय 218

श्लोक 12

शिशिरं च महाशैलं तुषारचयसन्निभम् ।चकार दुर्गगहनं कन्दरान्तरमण्डितम्

śiśiraṃ ca mahāśailaṃ tuṣāracayasannibham | cakāra durgagahanaṃ kandarāntaramaṇḍitam

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर भगवानूने हिमराशि- 'दूश महापर्वत हिमालयका निर्माण किया, जो दुर्गम एवं हन है । वह बहुत-सी कन्दराओंसे अलंकृत होता है

अध्याय 218

श्लोक 13

शिशिरप्रभवां चैव नदीं द्विजगणायुताम् ।चकार पुलिनोपेतां वसुधारामिति श्रुतिः

śiśiraprabhavāṃ caiva nadīṃ dvijagaṇāyutām | cakāra pulinopetāṃ vasudhārāmiti śrutiḥ

हिन्दी अर्थ

उन्होंने हिमालयसे प्रकट होनेवाली एक दिव्य नदीकी पी सृष्टि की, जिसका नाम वसुधारा (गड्ा) है। असंख्य देज उसका सेवन करते हैं। उसके तट विशाल हैं

अध्याय 218

श्लोक 14

सा नदी निखिलां प्राचीं पुण्यां मुखशतैश्चिताम् ।शोभयत्यमृतप्रख्यैर्मुक्ताशङ्खविभूषितैः

sā nadī nikhilāṃ prācīṃ puṇyāṃ mukhaśataiścitām | śobhayatyamṛtaprakhyairmuktāśaṅkhavibhūṣitaiḥ

हिन्दी अर्थ

हह नदी सारी पुण्यमयी पूर्व दिशाको अपने सैकड़ों त्रोतोंसे व्याप्त करके उसकी शोभा बढ़ाती है। उसके वे त्रोत मोती और शड्डके समान उज्ज्वल आभासे अलंकृत [वं अमृतके तुल्य मधुर जलसे परिपूर्ण हैं

अध्याय 218

श्लोक 15

नित्यपुष्पफलोपेतैश्छादयद्भिः सुसंवृतैः ।भूषिताभ्यधिकैः कान्तैः सा नदी तीरजैर्द्रुमैः

nityapuṣpaphalopetaiśchādayadbhiḥ susaṃvṛtaiḥ | bhūṣitābhyadhikaiḥ kāntaiḥ sā nadī tīrajairdrumaiḥ

हिन्दी अर्थ

वही दी अपने तटपर उत्पन्न हुए अधिक कमनीय वृक्षोंसे वभूषित है। वे वृक्ष सदा फूल और फलोंसे सम्पन्न, घन तथा दूरतक छाया करनेवाले हैं

अध्याय 218

श्लोक 16

कृत्वा प्राचीविभागं च दक्षिणायामथो दिशि ।चकार पर्वतं दिव्यं सर्वकाञ्चनराजतम्

kṛtvā prācīvibhāgaṃ ca dakṣiṇāyāmatho diśi | cakāra parvataṃ divyaṃ sarvakāñcanarājatam

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार र्व दिशाका विभाग करके उन्होंने दक्षिण दिशामें एक देव्य पर्वतकी सृष्टि की, जो सारा-का-सारा सुवर्णमय [व॑ रजतमय प्रतीत होता है

अध्याय 218

श्लोक 17

एकतः सूर्यसङ्काशमेकतः शशिसन्निभम् ।स बिभ्रच्छुशुभेऽतीव द्वौ वर्णौ पर्वतोत्तमः

ekataḥ sūryasaṅkāśamekataḥ śaśisannibham | sa bibhracchuśubhe'tīva dvau varṇau parvatottamaḥ

हिन्दी अर्थ

वह एक ओरसे ूर्यके समान सुनहरी प्रभासे प्रकाशित होता है और र्सरी ओरसे चन्द्रमाके सदूश चाँदी-जैसी कान्तिसे सुशोभित ता है। इस प्रकार दो तरहके रंग धारण करनेवाले उस रष्ठ पर्वतकी बड़ी शोभा होती है

अध्याय 218

श्लोक 18

तेजसा युगपद् व्याप्तं सूर्याचन्द्रमसाविव ।वपुष्मन्तमथो तत्र भानुमन्तं महागिरिम्

tejasā yugapad vyāptaṃ sūryācandramasāviva | vapuṣmantamatho tatra bhānumantaṃ mahāgirim

श्लोक 18–22 का हिन्दी अर्थ

वह एक ही पथ द्विविध तेजसे व्याप्त होकर एकत्र हुए सूर्य और नन्द्रमाके समान जान पड़ता है। वह महान्‌ पर्वत मूर्तिमान्‌ ूर्य-सा प्रतीत होता है। सम्पूर्ण मनोवाज्छित फलोंसे पमम्पन्न, रमणीय एवं मनोरम वृक्ष उसे सब ओरसे घेरे ए हैं । इसके बाद भगवान्‌ने हाथीके समान आकारवाले [क पर्वतका निर्माण किया, जिसका विस्तार अनेक पोजनका था। उसमें सब ओर सुवर्णमयी गुफाएँ शोभा तती थीं । तत्पश्चात्‌ उन्होंने वृषभके समान आकृतिवाले ऋषभ नामक पर्वतकी सृष्टि की, जो सुवर्ण एवं काझ्ननमय क्षोंसे सम्पन्न था। अपने फूलोंके कारण वह पर्वत ँसता हुआ-सा जान पड़ता था। तदनन्तर भगवानूने गरिराज महेन्द्रका निर्माण किया, जो सौ योजन ऊँचा मौर सुवर्णमय शिखरोंसे सुशोभित था। उसके विशाल क्ष सुन्दर फूलोंसे भरे रहते थे। वह पर्वत पृथ्वीपर र्तिमान्‌ प्रतिक्षोभ-सा प्रतीत होता था

अध्याय 218

श्लोक 19

सर्वकामफलैर्वृक्षैर्वृतं रम्यैर्मनोरमैः ।चकार कुञ्जरं चैव कुञ्जरप्रतिमाकृतिम्

sarvakāmaphalairvṛkṣairvṛtaṃ ramyairmanoramaiḥ | cakāra kuñjaraṃ caiva kuñjarapratimākṛtim

अर्थ श्लोक 18 के साथ

अध्याय 218

श्लोक 20

सर्वतः काञ्चनगुहं बहुयोजनविस्तृतम् ।ऋषभप्रतिमं चैव ऋषभं नाम पर्वतम्

sarvataḥ kāñcanaguhaṃ bahuyojanavistṛtam | ṛṣabhapratimaṃ caiva ṛṣabhaṃ nāma parvatam

अर्थ श्लोक 18 के साथ

अध्याय 218

श्लोक 21

हेमकाञ्चनवृक्षाढ्यं पुष्पहासं स सृष्टवान् ।महेन्द्रमथ शैलेन्द्रं शतयोजनमुच्छ्रितम्

hemakāñcanavṛkṣāḍhyaṃ puṣpahāsaṃ sa sṛṣṭavān | mahendramatha śailendraṃ śatayojanamucchritam

अर्थ श्लोक 18 के साथ

अध्याय 218

श्लोक 22

जातरूपमयैः शृङ्गैः सपुष्पितमदाद्रुमम् ।मेदिन्यां कृतवान् देवः प्रतिक्षोभमिवाचलम्

jātarūpamayaiḥ śṛṅgaiḥ sapuṣpitamadādrumam | medinyāṃ kṛtavān devaḥ pratikṣobhamivācalam

अर्थ श्लोक 18 के साथ

अध्याय 218

श्लोक 23

नानारत्नसमाकीर्णं सूर्येन्दुसदृशप्रभम् ।चकार मलयं चाद्रिं चित्रपुष्पितपादपम्

nānāratnasamākīrṇaṃ sūryendusadṛśaprabham | cakāra malayaṃ cādriṃ citrapuṣpitapādapam

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर ्रीहरिने नाना प्रकारके रत्ोंसे व्याप्त और सूर्य-चन्द्रमाके परमान कान्तिमान्‌ मलय नामक पर्वतकी सृष्टि की, हाँ विचित्र फूलोंसे भरे हुए वृक्ष लहलहा रहे थे

अध्याय 218

श्लोक 24

मैनाकं च महाशैलं शिलाजालसमावृतम् ।दक्षिणस्यां दिशि शुभं चकाराचलमायतम्

mainākaṃ ca mahāśailaṃ śilājālasamāvṛtam | dakṣiṇasyāṃ diśi śubhaṃ cakārācalamāyatam

हिन्दी अर्थ

सके बाद उन्होंने दक्षिण दिशामें एक सुन्दर और विस्तृत पर्वत महाशैल मैनाककी रचना की, जो शिलासमूहोँसे याप्त था

अध्याय 218

श्लोक 25

सहस्रशिरसं विन्ध्यं नानाद्रुमलताकुलम् ।नदीं च विपुलावर्तां पुलिनश्रोणिभूषिताम्

sahasraśirasaṃ vindhyaṃ nānādrumalatākulam | nadīṃ ca vipulāvartāṃ pulinaśroṇibhūṣitām

श्लोक 25–28 का हिन्दी अर्थ

तत्पश्चातू नाना प्रकारके वृक्षों और नताओंसे व्याप्त सहस्तर शिखरवाले विन्ध्यगिरिकी सृष्टि की, साथ ही वहाँसे प्रकट होनेवाली एक नदीका भी नर्माण किया, जो तटरूपी नितम्ब भागसे विभूषित थी। समें बड़ी भँवरें उठ रही थीं। उसका जल दूधके परमान स्वच्छ था। वह पयोधारा (नर्मदा)-के नामसे विख्यात हुई। जलसे भरी हुई वह दिव्य एवं रमणीय दी सैकड़ों तीर्थोंसे सुशोभित थी और अपने मज़लकारी नलसे दक्षिण दिशाको पवित्र एवं आप्लावित कर रही पी । इस प्रकार दक्षिण दिशाको प्रतिष्ठित करके भगवान्‌ श्विम दिशामें चले आये । वहाँ उन्होंने सौ योजन ऊँचे ौलराज अस्ताचलका निर्माण किया, जो बहुत बढ़े हुए विचित्र एवं सुवर्णमय शिखरोंसे सुशोभित था

अध्याय 218

श्लोक 26

क्षीरसङ्काशसलिलां पयोधारामिति श्रुतिः ।सुरम्यां तोयकलिलां विहितां दक्षिणां दिशम्

kṣīrasaṅkāśasalilāṃ payodhārāmiti śrutiḥ | suramyāṃ toyakalilāṃ vihitāṃ dakṣiṇāṃ diśam

अर्थ श्लोक 25 के साथ

अध्याय 218

श्लोक 27

दिव्यां तीर्थशतोपेतां प्लावयन्तीं शुभाम्भसा ।दिशं याम्यां प्रतिष्ठाप्य प्रतीचीं दिशमागमत्

divyāṃ tīrthaśatopetāṃ plāvayantīṃ śubhāmbhasā | diśaṃ yāmyāṃ pratiṣṭhāpya pratīcīṃ diśamāgamat

अर्थ श्लोक 25 के साथ

अध्याय 218

श्लोक 28

अकरोत् तत्र शैलेन्द्रं शतयोजनमुच्छ्रितम् ।शोभितं शिखरैश्चित्रैः सुप्रवृद्धैर्हिरण्मयैः

akarot tatra śailendraṃ śatayojanamucchritam | śobhitaṃ śikharaiścitraiḥ supravṛddhairhiraṇmayaiḥ

अर्थ श्लोक 25 के साथ

अध्याय 218

श्लोक 29

काञ्चनीभिः शिलाभिश्च गुहाभिश्चविभूषितम् ।समाकुलं सूर्यनिभैः शालैस्तालैश्च भास्वरैः

kāñcanībhiḥ śilābhiśca guhābhiścavibhūṣitam | samākulaṃ sūryanibhaiḥ śālaistālaiśca bhāsvaraiḥ

हिन्दी अर्थ

पनेकी शिलाएँ और गुफाएँ उसकी शोभा बढ़ा रही थीं । ूर्यके समान प्रकाशित होनेवाले साखू और ताड़के वृक्ष हाँ सब ओर फैले हुए थे

अध्याय 218

श्लोक 30

शुशुभे जातरूपैश्च श्रीमद्भिश्चित्रवेदिकैः ।षष्टिं गिरिसहस्राणि तत्रासौ संन्यवेशयत्

śuśubhe jātarūpaiśca śrīmadbhiścitravedikaiḥ | ṣaṣṭiṃ girisahasrāṇi tatrāsau saṃnyaveśayat

श्लोक 30–32 का हिन्दी अर्थ

शो भाशाली विचित्र वेदिकाओंसे युक्त सुवर्णमय शिखर उसकी वृद्धि कर रहे थे। वहाँ भगवानूने साठ हजार पर्वत साये थे, जो अपने शरीर और कान्तिसे मेरुपर्वतकी मानता करते थे। तदनन्तर भगवान्‌ने जलकी सहस््रों गराएँ बहानेवाले एक मेरु-सदूश पर्वतको स्थापित किया, ऐ पुण्यतीर्थके गुणोंसे सम्पन्न था, जिसका विस्तार साठ जन था, उसकी ऊँचाई भी उतनी ही थी

अध्याय 218

श्लोक 31

मेरुप्रतिमरूपाणि वपुषा प्रभया सह ।सहस्रजलधारं च पर्वतं मेरुसन्निभम्

merupratimarūpāṇi vapuṣā prabhayā saha | sahasrajaladhāraṃ ca parvataṃ merusannibham

अर्थ श्लोक 30 के साथ

अध्याय 218

श्लोक 32

पुण्यतीर्थगुणोपेतं भगवान् संन्यवेशयत् ।षष्टियोजनविस्तारं तावदेव समुच्छ्रितम्

puṇyatīrthaguṇopetaṃ bhagavān saṃnyaveśayat | ṣaṣṭiyojanavistāraṃ tāvadeva samucchritam

अर्थ श्लोक 30 के साथ

अध्याय 218

श्लोक 33

आत्मरूपोपमं तत्र वाराहं नाम नामतः ।निवेशयामास गिरिं दिव्यं वैदूर्यपर्वतम्

ātmarūpopamaṃ tatra vārāhaṃ nāma nāmataḥ | niveśayāmāsa giriṃ divyaṃ vaidūryaparvatam

हिन्दी अर्थ

हीं उन्होंने अपने रूपके समान वाराह नामक दिव्य वतको बसाया, जो वैदूर्यमणिसे सम्पन्न था

अध्याय 218

श्लोक 34

राजताः काञ्चनाश्चैव यत्र दिव्याः शिलोच्चयाः ।तत्रैव चक्रसदृशं चक्रवन्तं महाबलम्

rājatāḥ kāñcanāścaiva yatra divyāḥ śiloccayāḥ | tatraiva cakrasadṛśaṃ cakravantaṃ mahābalam

श्लोक 34–41 का हिन्दी अर्थ

उस वतपर सोने और चाँदीके दिव्य शिलाखण्ड हैं, वहीं गगवानूने चक्रसदृश महाबली चक्रवान्‌ गिरिकी स्थापना भी, जो सहस्रों शिखरोंसे सम्पन्न एवं विशाल था। इसके प॒वा उन्होंने वहाँ एक रजतमय श्रेष्ठ पर्वतको स्थापित कया, जिसका स्वरूप श्ुके समान उज्वल था; इसीलिये सका नाम शड्डू रखा गया। वह श्रेतवर्णके वृक्षोंसे व्याप्त [। उस महान्‌ पर्वतके अग्रभागमें उन्होंने रसम्भूत वर्ण तथा पुष्पमय हाससे सुशोभित पारिजात नामक त्रशाल वृक्षको स्थापित किया। पश्चिम दिशामें भगवान्‌ आराहने अत्यन्त जलसे भरी हुई एक शुभ एवं पुण्य दीकी भी सृष्टि की, जो घृतधाराके नामसे विख्यात है। स प्रकार पश्चिम दिशामें पर्वतोंके विभाग करके उन्होंने त्तर दिशामें सुवर्णके समान कान्तिमान्‌ पर्वत बसाये, जो गुणोंमें उत्कृष्ट थे। तत्पश्चात्‌ उन्होंने सूर्यके समान तेजस्वी तथा सुवर्णमय धातुओंसे ढँके हुए सौम्यगिरिकी सृष्टि की, जो आकाशके बराबर ऊँचा और सौम्य था। वह देश सूर्यके प्रकाशित न रहनेपर भी उस पर्वतकी प्रभासे ही प्रकाशित होता रहता है। उस पर्वतकी शोभा तपते हुए सूर्यके द्वारा और अधिक उद्दीस हो उठती है। जैसे मध्याह-कालिक सूर्यके समीप श्रीहीन हुए चन्द्रमा सूक्ष्म दिखायी देते हैं, उसी प्रकार उस पर्वतके सामने तपते हुए सूर्य भी फीके पड़कर सूक्ष्म लक्षणोंसे लक्षित होते हैं, ऐसा जानना चाहिये

अध्याय 218

श्लोक 35

सहस्रकूटं विपुलं भगवान् संन्यवेशयत् ।शङ्खप्रतिमरूपं च राजतं पर्वतोत्तमम्

sahasrakūṭaṃ vipulaṃ bhagavān saṃnyaveśayat | śaṅkhapratimarūpaṃ ca rājataṃ parvatottamam

अर्थ श्लोक 34 के साथ

अध्याय 218

श्लोक 36

सितद्रुमसमाकीर्णं शङ्खं नाम न्यवेशयत् ।सुवर्णं रत्नसम्भूतं पारिजातं महाद्रुमम्

sitadrumasamākīrṇaṃ śaṅkhaṃ nāma nyaveśayat | suvarṇaṃ ratnasambhūtaṃ pārijātaṃ mahādrumam

अर्थ श्लोक 34 के साथ

अध्याय 218

श्लोक 37

महतः पर्वतस्याग्रे पुष्पहासं न्यवेशयत् ।शुभामतिरसां चैव घृतधारामिति श्रुतिः

mahataḥ parvatasyāgre puṣpahāsaṃ nyaveśayat | śubhāmatirasāṃ caiva ghṛtadhārāmiti śrutiḥ

अर्थ श्लोक 34 के साथ

अध्याय 218

श्लोक 38

वराहः सरितं पुण्यां प्रतीच्यामकरोत् प्रभुः ।प्रतीच्यां संविधिं कृत्वा पर्वतान्काञ्चनोज्ज्वलान्

varāhaḥ saritaṃ puṇyāṃ pratīcyāmakarot prabhuḥ | pratīcyāṃ saṃvidhiṃ kṛtvā parvatānkāñcanojjvalān

अर्थ श्लोक 34 के साथ

अध्याय 218

श्लोक 39

गुणोत्तरानुत्तरस्यां संन्यवेशयदग्रतः ।ततः सौम्यगिरिं सौम्यमन्तरिक्षप्रमाणतः

guṇottarānuttarasyāṃ saṃnyaveśayadagrataḥ | tataḥ saumyagiriṃ saumyamantarikṣapramāṇataḥ

अर्थ श्लोक 34 के साथ

अध्याय 218

श्लोक 40

रुक्मधातुप्रतिच्छन्नमकरोद् भास्करोपमम् ।स तु देशो विसूर्योऽपि तस्य भासा प्रकाशते

rukmadhātupraticchannamakarod bhāskaropamam | sa tu deśo visūryo'pi tasya bhāsā prakāśate

अर्थ श्लोक 34 के साथ

अध्याय 218

श्लोक 41

तस्य लक्ष्म्यधिकं भाति तपसा रविणा यथा ।सूक्ष्मलक्षणविज्ञेयस्तपतीव दिवाकरः

tasya lakṣmyadhikaṃ bhāti tapasā raviṇā yathā | sūkṣmalakṣaṇavijñeyastapatīva divākaraḥ

अर्थ श्लोक 34 के साथ

अध्याय 218

श्लोक 42

सहस्रशिखरं चैव नानातीर्थसमाकुलम् ।चकार रत्नसङ्कीर्णं भूयोऽस्तं नाम पर्वतम्

sahasraśikharaṃ caiva nānātīrthasamākulam | cakāra ratnasaṅkīrṇaṃ bhūyo'staṃ nāma parvatam

हिन्दी अर्थ

इसके बाद उन्होंने सहस्रों शिखरोंसे सुशोभित तथा नाना प्रकारके तीर्थोंसे व्याप्त रत्पूर्ण अस्तेगिरिका पुन: निर्माण किया

अध्याय 218

श्लोक 43

मनोहरगुणोपेतं मन्दरं चाचलोत्तमम् ।उद्दामपुष्पगन्धं च पर्वतं गन्धमादनम्

manoharaguṇopetaṃ mandaraṃ cācalottamam | uddāmapuṣpagandhaṃ ca parvataṃ gandhamādanam

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर मनोहर गुणोंसे सम्पन्न श्रेष्ठ मन्दराचलका तथा उद्दाम पुष्पगन्धसे भरे हुए गन्धमादन _पर्वतका निर्माण किया

अध्याय 218

श्लोक 44

चकार तस्य शृङ्गेषु सुवर्णरससम्भवं जम्बूं जाम्बूनदमयीमनन्ताद्भुतदर्शनाम्

cakāra tasya śṛṅgeṣu suvarṇarasasambhavaṃ jambūṃ jāmbūnadamayīmanantādbhutadarśanām

हिन्दी अर्थ

गन्धमादनके शिखरोंपर सुवर्णरसको प्रकट करनेवाले जम्बूवृक्षका निर्माण किया, जो जाम्बूनदमय (सुवर्णमय), अनन्त और अद्भुत दिखायी देता है

अध्याय 218

श्लोक 45

गिरिं त्रिशिखरं चैव तथा पुष्करपर्वतम् ।शुभ्रं पाण्डुरमेघाभं कैलासं च नगोत्तमम्

giriṃ triśikharaṃ caiva tathā puṣkaraparvatam | śubhraṃ pāṇḍurameghābhaṃ kailāsaṃ ca nagottamam

हिन्दी अर्थ

इसके बाद तीन शिखरवाले त्रिकूटगिरि, पुष्कर पर्वत तथा श्रेत बादलोंके समान उज्ज्वल कान्तिवाले गिरिश्रेष्ठ कैलासका निर्माण किया

अध्याय 218

श्लोक 46

हिमवन्तं च शैलेन्द्रं दिव्यधातुविभूषितम् ।निवेशयामास हरिर्वाराहीं तनुमास्थितः

himavantaṃ ca śailendraṃ divyadhātuvibhūṣitam | niveśayāmāsa harirvārāhīṃ tanumāsthitaḥ

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर वाराहरूप धारण करनेवाले श्रीहरिने दिव्य धातुओंसे विभूषित गिरिराज हिमवान्‌को स्थापित किया॥ '

अध्याय 218

श्लोक 47

नदीं सर्वगुणोपेतामुत्तरस्यां दिशि प्रभुः ।मधुधारां स कृतवान् दिव्यामृषिशताकुलाम्

nadīṃ sarvaguṇopetāmuttarasyāṃ diśi prabhuḥ | madhudhārāṃ sa kṛtavān divyāmṛṣiśatākulām

हिन्दी अर्थ

इसके सिवा उन भगवान्‌ने उत्तर दिशामें सर्वगुणसम्पन्न दिव्य नदी मधुधाराकी सृष्टि की, जो सैकड़ों ऋषियोंसे सेवित है

अध्याय 218

श्लोक 48

सर्वे चैव क्षितिधराः सपक्षाः कामरूपिणः ।तदा कृता भगवता विचित्राः परमेष्ठिना

sarve caiva kṣitidharāḥ sapakṣāḥ kāmarūpiṇaḥ | tadā kṛtā bhagavatā vicitrāḥ parameṣṭhinā

हिन्दी अर्थ

उस समय परमेष्ठी भगवान्‌ श्रीहरिने सभी पर्वतोंको पंखयुक्त, इच्छानुसार रूप धारण करनेकी शक्तिसे सम्पन्न तथा विचित्र बनाया था

अध्याय 218

श्लोक 49

स कृत्वा प्रविभागं तु पृथिव्या लोकभावनः ।देवासुराणामुत्पत्तौ कृतवान् बुद्धिमक्षयाम्

sa kṛtvā pravibhāgaṃ tu pṛthivyā lokabhāvanaḥ | devāsurāṇāmutpattau kṛtavān buddhimakṣayām

हिन्दी अर्थ

इस तरह लोकभावन भगवान्‌ने पृथ्वीका विभाग करके देवताओं और असुरोंकी उत्पत्तिके लिये अपनी अक्षय बुद्धिका प्रयोग किया

अध्याय 218

श्लोक 50

सर्वासु दिक्षु क्षतजोपमाक्ष- श्चकार शैलान्विविधाभिधानान् ।हिताय लोकस्य स लोकनाथः पुण्याश्च नद्यः सलिलोपगूढाः

sarvāsu dikṣu kṣatajopamākṣa- ścakāra śailānvividhābhidhānān | hitāya lokasya sa lokanāthaḥ puṇyāśca nadyaḥ salilopagūḍhāḥ

हिन्दी अर्थ

रक्तके समान लाल नेत्रवाले उन लोकनाथ भगवान्‌ नारायणने समस्त जगत्‌के हितके लिये सम्पूर्ण दिशाओंमें भाँति- भाँतिके नामवाले पर्वतों और जलसे भरी हुई पवित्र नदियोंकी सृष्टि की

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.