Harivamsha Purana
219
अध्याय 219 / 318

Parva 3, Adhyāya 36

61 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ61 श्लोक

अध्याय 219

श्लोक 1

जगतेः सृष्ट्याः वर्णनं जगत्स्रष्टुमना देवश्चिन्तयामास पूर्वजः ।तस्य चिन्तयतो वक्त्रान्निःसृतः पुरुषः किल

jagateḥ sṛṣṭyāḥ varṇanaṃ jagatsraṣṭumanā devaścintayāmāsa pūrvajaḥ | tasya cintayato vaktrānniḥsṛtaḥ puruṣaḥ kila

श्लोक 1–5 का हिन्दी अर्थ

तुम अपने 'वरूपका विभाग करो।' ऐसा कहकर वे भगवान्‌ वहीं प्न्तर्धान हो गये। भारत! जैसे दीपक बुझ जाय उसी कार शरीरसहित अन्तर्हित हुए उन भगवान्‌की कहीं कोई गति नहीं है। तदनन्तर भगवान्‌के मुखसे [कट हुए प्रभावशाली पुरुष भगवान्‌ हिरण्यगर्भ, जिनका नाम वेदमन्त्रोंमें सुना गया है, भगवान्‌की कही ई पूर्वोक्त वाणीपर बास्म्बार विचार करने लगे। ये री सम्पूर्ण भुवनोंके अधिपति प्रजापति सबसे पहले त्पन्न हुए थे। अत: तभीसे यज्ञका प्रथम भाग उन्हींको दया जाता है ॥ रे—

अध्याय 219

श्लोक 2

ततः स पुरुषो देवं किं करोमीत्युपस्थितः ।प्रत्युवाच स्मितं कृत्वा देवदेवो जगत्पतिः

tataḥ sa puruṣo devaṃ kiṃ karomītyupasthitaḥ | pratyuvāca smitaṃ kṛtvā devadevo jagatpatiḥ

अर्थ श्लोक 1 के साथ

अध्याय 219

श्लोक 3

विभजात्मानमित्युक्त्वा गतोऽन्तर्धानमीश्वरः ।अन्तर्हितस्य देवस्य सशरीरस्य भारत

vibhajātmānamityuktvā gato'ntardhānamīśvaraḥ | antarhitasya devasya saśarīrasya bhārata

अर्थ श्लोक 1 के साथ

अध्याय 219

श्लोक 4

प्रशान्तस्येव दीपस्य गतिस्तस्य न विद्यते ।ततस्तेनेरितां वाणीं सोऽन्वचिन्तयत प्रभुः

praśāntasyeva dīpasya gatistasya na vidyate | tatasteneritāṃ vāṇīṃ so'nvacintayata prabhuḥ

अर्थ श्लोक 1 के साथ

अध्याय 219

श्लोक 5

हिरण्यगर्भो भगवान् य एष छन्दसि श्रुतः ।एष प्रजापतिः पूर्वमभवद् भुवनाधिपः

hiraṇyagarbho bhagavān ya eṣa chandasi śrutaḥ | eṣa prajāpatiḥ pūrvamabhavad bhuvanādhipaḥ

अर्थ श्लोक 1 के साथ

अध्याय 219

श्लोक 6

तदा प्रभृति तस्याद्यो यज्ञभागो विधीयते ।विभजात्मानमित्युक्तस्तेनास्मि सुमहात्मना

tadā prabhṛti tasyādyo yajñabhāgo vidhīyate | vibhajātmānamityuktastenāsmi sumahātmanā

श्लोक 6–10 का हिन्दी अर्थ

प्रजापति मन-ही-मन बोले—उन परमात्माने मुझसे कहा है कि तुम अपने स्वरूपका विभाग करो; रंतु मुझे अपने स्वरूपका विभाग कैसे करना होगा, स विषयमें मुझे महान्‌ संदेह है। ऐसा सोचते हुए उन गगवान्‌के मुखसे '3%' इस स्वरका उच्चारण हुआ। न्होंने उस शब्दका पृथ्वी, आन्तरिक्ष और स्वर्ग—तीनों नोकोंमें उच्चारण किया । इस प्रकार ' 3०' का जप करते ए उन देवाधिदेव प्रजापतिके हृदयसे पुन: उनके [नका सारभूत वषट्कार प्रकट हुआ। इसके बाद भूमि, मन्तरिक्ष एवं स्वर्गकी सारभूता 'भू:, भुवः, स्व: '—| तीन पवित्र महाव्याहवतियाँ प्रकट हुई, जो महास्मृतिमयी । तदनन्तर वेदोंमें श्रेष्ठ देवी गायत्री प्रकट हुईं, पो चौबीस अक्षरोंसे युक्त होती हैं । भगवान्‌ ब्रह्मा उस दका स्मरण करके दिव्य सावित्री-मन्त्रको प्रकट कया

अध्याय 219

श्लोक 7

कथमात्मा विभज्यः स्यात् संशयो ह्यत्र मे महान् ।इति चिन्तयतस्तस्य ओमित्येवोत्थितः स्वरः

kathamātmā vibhajyaḥ syāt saṃśayo hyatra me mahān | iti cintayatastasya omityevotthitaḥ svaraḥ

अर्थ श्लोक 6 के साथ

अध्याय 219

श्लोक 8

स भूमावन्तरिक्षे च नाके च कृतवांस्ततः ।तं चैवाभ्यसतस्तस्य मनःसारमयः पुनः

sa bhūmāvantarikṣe ca nāke ca kṛtavāṃstataḥ | taṃ caivābhyasatastasya manaḥsāramayaḥ punaḥ

अर्थ श्लोक 6 के साथ

अध्याय 219

श्लोक 9

हृदयाद् देवदेवस्य वषट्कारः समुत्थितः ।भूम्यन्तरिक्षकानां च भूर्भुवःसुवरात्मिकाः ।महास्मृतिमयाः पुण्या महाव्याहृतयोऽभवन्

hṛdayād devadevasya vaṣaṭkāraḥ samutthitaḥ | bhūmyantarikṣakānāṃ ca bhūrbhuvaḥsuvarātmikāḥ | mahāsmṛtimayāḥ puṇyā mahāvyāhṛtayo'bhavan

अर्थ श्लोक 6 के साथ

अध्याय 219

श्लोक 10

छन्दसां प्रवरा देवी चतुर्विंशाक्षराभवत् ।तत्पदं संस्मरन् दिव्यां सावित्रीमकरोत् प्रभुः

chandasāṃ pravarā devī caturviṃśākṣarābhavat | tatpadaṃ saṃsmaran divyāṃ sāvitrīmakarot prabhuḥ

अर्थ श्लोक 6 के साथ

अध्याय 219

श्लोक 11

ऋक्सामाथर्वयजुषश्चतुरो भगवान् प्रभुः ।चकार निखिलान् वेदान् ब्रह्मयुक्तेन कर्मणा

ṛksāmātharvayajuṣaścaturo bhagavān prabhuḥ | cakāra nikhilān vedān brahmayuktena karmaṇā

श्लोक 11–14 का हिन्दी अर्थ

फिर प्रभावशाली भगवान्‌ प्रजापतिने हायुक्त कर्मके द्वारा ऋक, साम, अधथर्व और यजु गमक चारों वेदोंका पूर्णत: प्रादुर्भाव किया

अध्याय 219

श्लोक 12

ततस्तस्यैव मनसः सनः सनक एव च ।सनातनश्च भगवान् वरदश्च सनन्दनः

tatastasyaiva manasaḥ sanaḥ sanaka eva ca | sanātanaśca bhagavān varadaśca sanandanaḥ

अर्थ श्लोक 11 के साथ

अध्याय 219

श्लोक 13

सनत्कुमारश्च विभुस्तत्र जज्ञे सनातनः ।मानसाश्चैव पूर्वाद्या इत्येते षण्महर्षयः

sanatkumāraśca vibhustatra jajñe sanātanaḥ | mānasāścaiva pūrvādyā ityete ṣaṇmaharṣayaḥ

अर्थ श्लोक 11 के साथ

अध्याय 219

श्लोक 14

ब्रह्माणं कपिलं चैव षडेतांश्चैव योगिनः ।यतयो योगतन्त्रेषु यान् स्तुवन्ति द्विजातयः

brahmāṇaṃ kapilaṃ caiva ṣaḍetāṃścaiva yoginaḥ | yatayo yogatantreṣu yān stuvanti dvijātayaḥ

अर्थ श्लोक 11 के साथ

अध्याय 219

श्लोक 15

ततो मरीचिमत्रिं च पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम् ।भृगुमङ्गिरसं चैव मनुं चैव प्रजापतिम्

tato marīcimatriṃ ca pulastyaṃ pulahaṃ kratum | bhṛgumaṅgirasaṃ caiva manuṃ caiva prajāpatim

श्लोक 15–16 का हिन्दी अर्थ

तत्पश्चात्‌ कल्याणकारी भगवान्‌ ब्रह्माने मरीचि, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, भूगु, अड्जिरा तथा प्रजापति मनु—इन आठ मानसपुत्र महर्षियोंकी सृष्टि की, जो सम्पूर्ण भूतों तथा देवताओं, असुरों और राक्षसोंके भी पिता थे

अध्याय 219

श्लोक 16

पितॄंश्च सर्वभूतानां देवतासुररक्षसाम् ।महर्षीनसृजच्छम्भुरष्टावेतांश्च मानसान्

pitṝṃśca sarvabhūtānāṃ devatāsurarakṣasām | maharṣīnasṛjacchambhuraṣṭāvetāṃśca mānasān

अर्थ श्लोक 15 के साथ

अध्याय 219

श्लोक 17

एते युगसहस्रान्ते याश्चैषामभवन् प्रजाः ।कल्पे निःशेषमुक्ते तु ततो गच्छन्ति निर्वृतिम्

ete yugasahasrānte yāścaiṣāmabhavan prajāḥ | kalpe niḥśeṣamukte tu tato gacchanti nirvṛtim

हिन्दी अर्थ

सहस्र युग व्यतीत होनेपर ये तथा इनकी जो प्रजाएँ होती हैं, वे सारा-का-सारा कल्प पूर्णत: समाप्त हो जानेपर निर्वृति (परमानन्दमय मोक्ष) -को प्राप्त हो जाती हैं

अध्याय 219

श्लोक 18

भूयो वर्षसहस्रान्ते उत्पत्तिस्तु विधीयते ।एतेषामेव देवानां प्रजाकर्तृषु वै तदा

bhūyo varṣasahasrānte utpattistu vidhīyate | eteṣāmeva devānāṃ prajākartṛṣu vai tadā

हिन्दी अर्थ

फिर सहस््र वर्षके पश्चात्‌ इन्हींकी देवसंतानोंकी सृष्टिके लिये उत्पत्ति होती है

अध्याय 219

श्लोक 19

किं तु कर्मविशेषेण देवतानां युगे युगे ।नामजन्मविशेषाश्च तथैव युगपर्यये

kiṃ tu karmaviśeṣeṇa devatānāṃ yuge yuge | nāmajanmaviśeṣāśca tathaiva yugaparyaye

हिन्दी अर्थ

किंतु प्रत्येक कल्पमें युगका परिवर्तन होनेपर कर्म विशेषसे इन देवताओंके नाम और जन्ममें कुछ अन्तर आ जाता है

अध्याय 219

श्लोक 20

अङ्गुष्ठाद् दक्षिणाद् दक्ष उत्पन्नो भगवानृषिः ।तस्यैव तु पुनर्भार्या वामाङ्गुष्ठादजायत

aṅguṣṭhād dakṣiṇād dakṣa utpanno bhagavānṛṣiḥ | tasyaiva tu punarbhāryā vāmāṅguṣṭhādajāyata

हिन्दी अर्थ

ब्रह्माजीके दाहिने अज़ुष्ठसे भगवान्‌ दक्ष ऋषि उत्पन्न हुए और बायेंसे फिर उन्हींकी पत्नीका प्रादुर्भाव हुआ

अध्याय 219

श्लोक 21

तस्य तत्राभवन् कन्या विश्रुता लोकमातरः ।याभिर्व्याप्तास्त्रयो लोकाः प्रजाभिर्मनुजाधिप

tasya tatrābhavan kanyā viśrutā lokamātaraḥ | yābhirvyāptāstrayo lokāḥ prajābhirmanujādhipa

हिन्दी अर्थ

नरेश्वर! दक्षके उस धर्मपत्नीके गर्भसे बहुत-सी विख्यात कन्याएँ उत्पन्न हुईं, जो सम्पूर्ण लोकोंकी जननी हैं । उनकी प्रजाओंसे तीनों लोक भरे हुए हैं

अध्याय 219

श्लोक 22

अदितिं च दितिं कालां दनायुं सिंहिकां मुनिम् ।प्राधां क्रोधां च सुरभिं विनतां सुरसां तथा

aditiṃ ca ditiṃ kālāṃ danāyuṃ siṃhikāṃ munim | prādhāṃ krodhāṃ ca surabhiṃ vinatāṃ surasāṃ tathā

श्लोक 22–31 का हिन्दी अर्थ

दक्षने अपनी पुत्री अदिति, दिति, काला; दनायु, सिंहिका, मुनि, प्राधा, क्रोधा, सुरभि, विनता, सुरसा, दनु तथा कद्रू-इन तेरह कन्याओंका विवाह महर्षि कश्यपजीके साथ कर दिया। भारत! कालकी भावी गतिको जाननेवाली अपनी अन्तरात्मा एवं मनके द्वारा प्रजावर्गका चिन्तन करके दक्षने अरुन्धती, वसु, यामी, लम्बा, भानु, मरुत्वती, संकल्पा, मुहूर्ता, साध्या और विश्वा—ये दस कन्याएँ ब्रह्मपुत्र मनुको अर्पित कर दीं। तदनन्तर जिनके सारे अड्ज निर्दोष, नेत्र कमलके समान प्रफुल्ल तथा मुख पूर्णचन्द्रके समान आह्वादजनक थे, वे दिव्य, मनोरम तथा उत्तम गन्धवाली कोर्ति, लक्ष्मी, धृति, पुष्टि, बुद्धि, मेधा, क्षमा, मति, लजा और वसु-ये दस कन्याएँ दक्षने धर्मको दे दीं । अत्रिके एक पुत्र हुआ, जिसका स्वरूप याय; * १०६३ लमय था। वही चन्द्रमा हुआ। चन्द्रमा ग्रहोंके स्वामी, हस्त्रों किरणोंसे सुशोभित तथा अन्धकारका नाश करनेवाले । प्राचेतस दक्षने उन्हें अध्विनी, रोहिणी आदि उत्तम त्ताईस कन्याएँ ब्याह दीं, जो सब-की-सब नक्षत्रवाचक मोंसे युक्त थीं। इनके गर्भसे कश्यप, मनु, धर्म और न्द्रमाद्वारा होनेवाले पुत्र-पौन्नोंका मेरेद्वारा वर्णन किया ता है, उसे सुनो। अर्यमा, वरुण, मित्र, पूषा, धाता, द्र त्वष्टा, भग, अंशु, सविता और पर्जन्य—ये बारह कभावन देवता कश्यपके अंश और अदितिके गर्भसे त्पन्न हुए (ये ही बारह आदित्य कहलाते हैं) ॥ २र—

अध्याय 219

श्लोक 23

दनुं कद्रूं च दुहितॄः प्रददौ कश्यपाय तु ।प्रजां सञ्चिन्त्य मनसा गतिज्ञेनान्तरात्मना

danuṃ kadrūṃ ca duhitṝḥ pradadau kaśyapāya tu | prajāṃ sañcintya manasā gatijñenāntarātmanā

अर्थ श्लोक 22 के साथ

अध्याय 219

श्लोक 24

अरुन्धतीं वसुं यामीं लम्बां भानुं मरुत्वतीम् ।सङ्कल्पां च मुहूर्तां च साध्यां विश्वां च भारत

arundhatīṃ vasuṃ yāmīṃ lambāṃ bhānuṃ marutvatīm | saṅkalpāṃ ca muhūrtāṃ ca sādhyāṃ viśvāṃ ca bhārata

अर्थ श्लोक 22 के साथ

अध्याय 219

श्लोक 25

मनवे ब्रह्मपुत्राय कन्या दक्षो ददौ दश ।ततः सर्वानवद्याङ्ग्यः कन्याः कमललोचनाः

manave brahmaputrāya kanyā dakṣo dadau daśa | tataḥ sarvānavadyāṅgyaḥ kanyāḥ kamalalocanāḥ

अर्थ श्लोक 22 के साथ

अध्याय 219

श्लोक 26

पूर्णचन्द्रानना दिव्या गन्धवत्यो मनोरमाः ।कीर्तिं लक्ष्मीं धृतिं पुष्टिं बुद्धिं मेधां क्षमां तथा

pūrṇacandrānanā divyā gandhavatyo manoramāḥ | kīrtiṃ lakṣmīṃ dhṛtiṃ puṣṭiṃ buddhiṃ medhāṃ kṣamāṃ tathā

अर्थ श्लोक 22 के साथ

अध्याय 219

श्लोक 27

मतिं लज्जां वसुं चैव दक्षो धर्माय वै ददौ ।अत्रेस्तु तनयो जातस्तस्य तोयात्मकः शशी

matiṃ lajjāṃ vasuṃ caiva dakṣo dharmāya vai dadau | atrestu tanayo jātastasya toyātmakaḥ śaśī

अर्थ श्लोक 22 के साथ

अध्याय 219

श्लोक 28

पुत्रो ग्रहाणामधिपः सहस्रांशुस्तमिस्रहा ।तस्मै नक्षत्रयोगिन्यः सप्तविंशतिरुत्तमाः

putro grahāṇāmadhipaḥ sahasrāṃśustamisrahā | tasmai nakṣatrayoginyaḥ saptaviṃśatiruttamāḥ

अर्थ श्लोक 22 के साथ

अध्याय 219

श्लोक 29

रोहिणीप्रमुखाः कन्या दक्षः प्राचेतसो ददौ ।एतासां पुत्रपौत्रं च प्रोच्यमानं मया शृणु

rohiṇīpramukhāḥ kanyā dakṣaḥ prācetaso dadau | etāsāṃ putrapautraṃ ca procyamānaṃ mayā śṛṇu

अर्थ श्लोक 22 के साथ

अध्याय 219

श्लोक 30

कश्यपस्य मनोश्चैव धर्मस्य शशिनस्तथा ।अर्यमा वरुणो मित्रः पूषा धाता पुरन्दरः

kaśyapasya manoścaiva dharmasya śaśinastathā | aryamā varuṇo mitraḥ pūṣā dhātā purandaraḥ

अर्थ श्लोक 22 के साथ

अध्याय 219

श्लोक 31

त्वष्टा भगोंऽशुः सविता पर्जन्यश्चेति विश्रुताः ।अदित्यां जज्ञिरे देवाः कश्यपाल्लोकभावनाः

tvaṣṭā bhagoṃ'śuḥ savitā parjanyaśceti viśrutāḥ | adityāṃ jajñire devāḥ kaśyapāllokabhāvanāḥ

अर्थ श्लोक 22 के साथ

अध्याय 219

श्लोक 32

दित्याः पुत्रद्वयं जज्ञे कश्यपादिति नः श्रुतम् ।हिरण्यकशिपुश्चैव हिरण्याक्षश्च वीर्यवान् ।द्वावप्यमितविक्रान्तौ तपसा कश्यपोपमौ

dityāḥ putradvayaṃ jajñe kaśyapāditi naḥ śrutam | hiraṇyakaśipuścaiva hiraṇyākṣaśca vīryavān | dvāvapyamitavikrāntau tapasā kaśyapopamau

हिन्दी अर्थ

मारे सुननेमें आया है कि पहले कश्यपट्वारा तिके गर्भसे दो पुत्र उत्पन्न हुए थे-हिरण्यकशिपु तथा राक्रमी हिरण्याक्ष । ये दोनों ही अनन्त पराक्रमी थे और पस्याद्वारा कश्यपजीकी समानता करते थे

अध्याय 219

श्लोक 33

हिरण्यकशिपोः पुत्राः पञ्चैव सुमहाबलाः ।प्रह्रादश्चैव संह्रादस्तथानुह्राद एव च

hiraṇyakaśipoḥ putrāḥ pañcaiva sumahābalāḥ | prahrādaścaiva saṃhrādastathānuhrāda eva ca

श्लोक 33–34 का हिन्दी अर्थ

रण्यकशिपुके पाँच ही महाबली पुत्र थे, जिनके नाम प॒ प्रकार हैं—प्रह्वाद, संहाद, अनुह्ाद, पराक्रमी हृद और पाँचवाँ अनुहहद। इनमें प्रह्वाद बड़े थे और उनसे टे अनुह्ाद थे

अध्याय 219

श्लोक 34

ह्रदश्चैव तु विक्रान्तः पञ्चमोऽनुह्रदस्तथा प्रह्रादः पूर्वजस्तेषामनुह्रादस्तथा परः

hradaścaiva tu vikrāntaḥ pañcamo'nuhradastathā prahrādaḥ pūrvajasteṣāmanuhrādastathā paraḥ

अर्थ श्लोक 33 के साथ

अध्याय 219

श्लोक 35

प्रह्रादस्य त्रयः पुत्रा विक्रान्ताः सुमहाबलाः ।विरोचनश्च जम्भश्च सुजम्भश्चेति विश्रुताः

prahrādasya trayaḥ putrā vikrāntāḥ sumahābalāḥ | virocanaśca jambhaśca sujambhaśceti viśrutāḥ

हिन्दी अर्थ

प्रहमादके विरोचन, जम्भ और सुजम्भ—ये तीन परम पराक्रमी, महाबली और विख्यात पुत्र हुए

अध्याय 219

श्लोक 36

बलिर्विरोचनसुतो बाण एको बलेः सुतः ।बाणस्य चेन्द्रदमनः पुत्रः परपुरञ्जयः

balirvirocanasuto bāṇa eko baleḥ sutaḥ | bāṇasya cendradamanaḥ putraḥ parapurañjayaḥ

हिन्दी अर्थ

विरोचनके पुत्र बलि हुए पर बलिका एकमात्र पुत्र बाणासुर हुआ। बाणके भी क ही पुत्र हुआ, जिसका नाम था इन्द्रदमन। वह न्ुओंकी नगरीपर विजय पानेवाला था

अध्याय 219

श्लोक 37

दनोः पुत्रास्तु बहवो वंशे ख्याता महासुराः ।विप्रचित्तिः प्रथमजस्तेषां राजा बभूव ह

danoḥ putrāstu bahavo vaṃśe khyātā mahāsurāḥ | vipracittiḥ prathamajasteṣāṃ rājā babhūva ha

हिन्दी अर्थ

दनुके हुत-से पुत्र हुए, जो अपने वंशके विख्यात महासुर थे। न सबमें विप्रचित्ति बड़ा था; अत: वही उनका राजा आ

अध्याय 219

श्लोक 38

गणः प्रजज्ञे क्रोधायाः पुत्रपौत्रमनन्तकम् ।रौद्राः क्रोधवशा नाम क्रूरकर्माण एव च

gaṇaḥ prajajñe krodhāyāḥ putrapautramanantakam | raudrāḥ krodhavaśā nāma krūrakarmāṇa eva ca

हिन्दी अर्थ

क्रोधासे एक समुदाय प्रकट हुआ, जिसके त्र-पौत्रोंकी संख्या अनन्त है। वह समुदाय या गण धवश नामसे प्रसिद्ध है। क्रोधवश नामवाले भयड्ूर सुर क्रूर कर्म करनेवाले होते हैं

अध्याय 219

श्लोक 39

सिंहिका सुषुवे राहुं ग्रहं चन्द्रार्कमर्दनम् ।ग्रस्तारं चैव चन्द्रस्य सूर्यस्य च विनाशनम्

siṃhikā suṣuve rāhuṃ grahaṃ candrārkamardanam | grastāraṃ caiva candrasya sūryasya ca vināśanam

हिन्दी अर्थ

सिंहिकाने राहु मक ग्रहको जन्म दिया, जो चन्द्रमा और सूर्यका मर्दन रनेवाला है । वही ग्रहणके द्वारा चन्द्रमाको ग्रस लेनेवाला र सूर्यको भी अदृश्य कर देनेवाला है

अध्याय 219

श्लोक 40

कालायाः कालकल्पस्तु गणः परमदारुणः ।अभवद् दीप्तसूर्याक्षो नीलमेघसमप्रभः

kālāyāḥ kālakalpastu gaṇaḥ paramadāruṇaḥ | abhavad dīptasūryākṣo nīlameghasamaprabhaḥ

हिन्दी अर्थ

कालासे गल-सदृश अत्यन्त भयंकर गण प्रकट हुआ, जिसे ललेय कहते हैं। इस समुदायके नेत्र सूर्यके समान जस्वी होते हैं। इनकी अज्ञकान्ति नील मेघके समान गली है

अध्याय 219

श्लोक 41

सहस्रशीर्षा शेषश्च वासुकिस्तक्षकस्तथा ।बहूनां कद्रुपुत्राणामेते प्राधान्यमागताः

sahasraśīrṣā śeṣaśca vāsukistakṣakastathā | bahūnāṃ kadruputrāṇāmete prādhānyamāgatāḥ

हिन्दी अर्थ

कद्ूके बहुत-से पुत्र हुए, जिनमें सहस्तर नवाले शेषनाग, वासुकि और तक्षक-ये प्रधान माने थे हैं

अध्याय 219

श्लोक 42

धर्मात्मानो वेदविदः सदा प्राणिहिते रताः ।लोकतन्त्रधराश्चैव वरदाः कामरूपिणः

dharmātmāno vedavidaḥ sadā prāṇihite ratāḥ | lokatantradharāścaiva varadāḥ kāmarūpiṇaḥ

हिन्दी अर्थ

ये धर्मात्मा, वेदवेत्ता तथा सदा ही प्राणियोंके तमें तत्पर रहनेवाले हैं । लोकतन्त्रको धारण करनेवाले ददायक तथा इच्छानुसार रूप धारण करनेमें समर्थ ॥ '

अध्याय 219

श्लोक 43

तार्क्ष्यश्चारिष्टनेमिश्च गरुडश्च महाबलः ।अरुणश्चारुणिश्चैव विनतायाः सुताः स्मृताः

tārkṣyaścāriṣṭanemiśca garuḍaśca mahābalaḥ | aruṇaścāruṇiścaiva vinatāyāḥ sutāḥ smṛtāḥ

हिन्दी अर्थ

तार्क्य, अरिष्टनेमि, महाबली गरुड, अरुण र आरुणि—ये विनताके पुत्र माने गये हैं

अध्याय 219

श्लोक 44

इमाश्चाप्सरसः पुण्या विविधाः पुण्यलक्षणाः ।सुषुवेऽष्टौ महाभागा प्राधा देवर्षिपूजिता

imāścāpsarasaḥ puṇyā vividhāḥ puṇyalakṣaṇāḥ | suṣuve'ṣṭau mahābhāgā prādhā devarṣipūjitā

हिन्दी अर्थ

देवर्षियोंद्वारा सम्मानित महाभागा प्राधाने पतित्र, नाना प्रकारके रूप-रंगवाली तथा पुण्यमय लक्षणोंसे युक्त निम्नाड्डित आठ अप्सराओंको उत्पन्न किया

अध्याय 219

श्लोक 45

अनवद्यां मनुं वंशामनूनामरुणप्रियाम् ।अनुगां सुभगां भासीं स्त्रियः प्राधा व्यजायत

anavadyāṃ manuṃ vaṃśāmanūnāmaruṇapriyām | anugāṃ subhagāṃ bhāsīṃ striyaḥ prādhā vyajāyata

हिन्दी अर्थ

अनवद्या, मनु, वंशा, अनूना, अरुणप्रिया, अनुगा, सुभगा और भासी—इन आठ कन्याओंको प्राधाने जन्म दिया

अध्याय 219

श्लोक 46

अलम्बुषा मिश्रकेशी पुण्डरीका तिलोत्तमा ।सुरूपा लक्षणा क्षेमा तथा रम्भा मनोरमा

alambuṣā miśrakeśī puṇḍarīkā tilottamā | surūpā lakṣaṇā kṣemā tathā rambhā manoramā

श्लोक 46–48 का हिन्दी अर्थ

अलम्बुषा, मिश्रकेशी, पुण्डरीका, तिलोतमा, सुरूपा, लक्षणा, क्षेमा, रम्भा, मनोरमा, असिता, सुबाहु, सुवृत्ता, सुमुखी, सुप्रिया, सुगन्धा, सुरसा प्रमाधिनी, काश्या और शारद्वती-ये अप्सराएँ मुनिकी संतानें बतायी गयी हैं । विधा, वसु, भरणी नामवाली कन्याएँ तथा सुविख्यात गन्धर्व भी मुनिकी ही संतति हैं

अध्याय 219

श्लोक 47

असिता च सुबाहुश्च सुवृत्ता सुमुखी तथा ।सुप्रिया च सुगन्धा च सुरसा च प्रमाथिनी

asitā ca subāhuśca suvṛttā sumukhī tathā | supriyā ca sugandhā ca surasā ca pramāthinī

अर्थ श्लोक 46 के साथ

अध्याय 219

श्लोक 48

काश्या शारद्वती चैव मौनेयाप्सरसः स्मृताः ।विश्वा वसुर्भरण्यश्च गन्धर्वाश्चैव विश्रुताः

kāśyā śāradvatī caiva mauneyāpsarasaḥ smṛtāḥ | viśvā vasurbharaṇyaśca gandharvāścaiva viśrutāḥ

अर्थ श्लोक 46 के साथ

अध्याय 219

श्लोक 49

मेनका सहजन्या च पर्णिका पुञ्जिकस्थला ।घृतस्थला घृताची च विश्वाची चोर्वशी तथा

menakā sahajanyā ca parṇikā puñjikasthalā | ghṛtasthalā ghṛtācī ca viśvācī corvaśī tathā

श्लोक 49–52 का हिन्दी अर्थ

मेनका, सहजन्या, पर्णिका, पुज्ञिकस्थला, घृतस्थला, घृताची, विश्वाची, उर्वशी, अनुम्लोचा तथा प्रम्लोचा—ये दस अप्सराएँ मनोवती तथा अन्य वेदवर्णित अप्सराएँ प्रजापतिके संकल्पसे उत्पन्न हुई हैं। ये समस्त भुवनोंमें प्रिय मानी गयी हैं। अमृत, ब्राह्मण, गौएँ तथा रुद्र-ये चार सुरभिकी संतानें हैं, यह पुराणका महत्त्वपूर्ण निश्चय है। यहाँतक कश्यपकी संतानोंका वर्णन किया गया है, अब मुझसे मनुके बंशका वर्णन सुनो

अध्याय 219

श्लोक 50

अनुम्लोचेत्यभिख्याता प्रम्लोचेति च ता दश ।मनोवती चापि तथा वैदिक्योऽप्सरसस्तथा

anumlocetyabhikhyātā pramloceti ca tā daśa | manovatī cāpi tathā vaidikyo'psarasastathā

अर्थ श्लोक 49 के साथ

अध्याय 219

श्लोक 51

प्रजापतेस्तु सङ्कल्पात् सम्भूता भुवनप्रियाः ।अमृतं ब्राह्मणा गावो रुद्राश्चेति चतुष्टयम्

prajāpatestu saṅkalpāt sambhūtā bhuvanapriyāḥ | amṛtaṃ brāhmaṇā gāvo rudrāśceti catuṣṭayam

अर्थ श्लोक 49 के साथ

अध्याय 219

श्लोक 52

सुरभ्यपत्यमित्येतत् पुराणे निश्चयो महान् ।एतद् वै कश्यपापत्यं मनोर्वंशं निबोध मे

surabhyapatyamityetat purāṇe niścayo mahān | etad vai kaśyapāpatyaṃ manorvaṃśaṃ nibodha me

अर्थ श्लोक 49 के साथ

अध्याय 219

श्लोक 53

सङ्क्षेपेणैव तत् सर्वं कीर्तयिष्यामि तेऽनघ ।विश्वेदेवास्तु विश्वायाः साध्या साध्यान् व्यजायत

saṅkṣepeṇaiva tat sarvaṃ kīrtayiṣyāmi te'nagha | viśvedevāstu viśvāyāḥ sādhyā sādhyān vyajāyata

हिन्दी अर्थ

निष्पाप नरेश! वह सब मैं संक्षेपसे ही कहूँगा। विश्वेदेव विश्वाकी संतान हैं, साध्यादेवीने साध्य नामक देवोंको जन्म दिया

अध्याय 219

श्लोक 54

मरुत्वत्यां मरुत्वन्तो वसोस्तु वसवः स्मृताः ।भानोस्तु भानवस्तात मुहूर्ताश्च मुहूर्तजाः

marutvatyāṃ marutvanto vasostu vasavaḥ smṛtāḥ | bhānostu bhānavastāta muhūrtāśca muhūrtajāḥ

हिन्दी अर्थ

मरुत्वतीके गर्भसे मरुत्वान्‌ उत्पन्न हुए, वसुके पुत्र वसुके नामसे ही प्रसिद्ध हैं। तात! भानुके पुत्र भानु और मुहूर्ताके पुत्र मुहूत हैं

अध्याय 219

श्लोक 55

लम्बा घोषं विजज्ञेऽथ नागवीथी च जामिजा ॥ पृथिव्यां विषमं सर्वं मरुत्वत्यामजायत

lambā ghoṣaṃ vijajñe'tha nāgavīthī ca jāmijā || pṛthivyāṃ viṣamaṃ sarvaṃ marutvatyāmajāyata

हिन्दी अर्थ

लम्बाने घोषको जन्म दिया, जामिसे नागवीथी उत्पन्न हुई, पृथ्वीमें जो कुछ विषम है, वह सब मरुत्वतीसे उत्पन्न हुआ

अध्याय 219

श्लोक 56

सङ्कल्पायास्तु कौरव्य जज्ञे सङ्कल्प एव च ॥ धर्मस्य पुत्रो लक्ष्म्यास्तु कामो जज्ञे जगत्प्रभुः

saṅkalpāyāstu kauravya jajñe saṅkalpa eva ca || dharmasya putro lakṣmyāstu kāmo jajñe jagatprabhuḥ

हिन्दी अर्थ

कुरुनन्दन ! संकल्पाके गर्भसे संकल्प नामवाला ही पुत्र हुआ। धर्म और उनकी पत्नी लक्ष्मीसे काम नामक पुत्रका जन्म हुआ, जो सम्पूर्ण जगत्पर अपनी प्रभुता स्थापित किये हुए है

अध्याय 219

श्लोक 57

यशो हर्षश्च कामस्य रत्यां पुत्रद्वयं स्मृतम् ॥ सोमस्य पुत्रो रोहिण्यां जज्ञे वर्चा महाप्रभः

yaśo harṣaśca kāmasya ratyāṃ putradvayaṃ smṛtam || somasya putro rohiṇyāṃ jajñe varcā mahāprabhaḥ

हिन्दी अर्थ

काम और उसकी पत्नी रतिसे दो पुत्र उत्पन्न हुए—यश और हर्ष। सोमके रोहिणीके गर्भसे महान्‌ कान्तिमान्‌ वर्चा नामक पुत्रका जन्म हुआ

अध्याय 219

श्लोक 58

उदयन्नेव भगवान्वर्चस्वी येन जायते ॥ पुरूरवाश्च भगवातुर्वशी येन युज्यते

udayanneva bhagavānvarcasvī yena jāyate || purūravāśca bhagavāturvaśī yena yujyate

हिन्दी अर्थ

यह वर्चा वही है, जिससे उदय लेते ही भगवान्‌ सोम वर्चस्वी (तेज:पुज्नसे परिपूर्ण) हो जाते हैं। उस वर्चा या बुधसे ऐश्वर्यशाली पुरूरवाका जन्म हुआ, जिनके साथ उर्वशीने प्रेमसम्बन्ध स्थापित किया था

अध्याय 219

श्लोक 59

एवं पुत्रसहस्राणि स्त्रीणां चैव परस्परम् ॥ एतावत्तु जगन्मूलं यत्र लोकाः प्रतिष्ठिताः

evaṃ putrasahasrāṇi strīṇāṃ caiva parasparam || etāvattu jaganmūlaṃ yatra lokāḥ pratiṣṭhitāḥ

हिन्दी अर्थ

ध्याय: + १०६५ इस प्रकार स्त्रियों और पुरुषोंके परस्पर संयोगसे हहस्त्रों पुत्र और कन्याएँ उत्पन्न हुईं। इतना ही जगत्‌का [ल है, जिसपर सम्पूर्ण लोक प्रतिष्ठित है

अध्याय 219

श्लोक 60

प्रजापतिस्तु भगवान् गुणतः प्रेक्ष्य देहिनः ॥ आधिपत्येषु युक्तेषु नियोजयति योगवित्

prajāpatistu bhagavān guṇataḥ prekṣya dehinaḥ || ādhipatyeṣu yukteṣu niyojayati yogavit

हिन्दी अर्थ

योगवेत्ता गगवान्‌ प्रजापतिने गुणकी दृष्टिसे समस्त देहधारियोंपर ष्टिपात करके उन सबको यथायोग्य प्रभुत्वपर प्रतिष्ठित क्रिया

अध्याय 219

श्लोक 61

दिशो दश क्षितिमृषयोऽर्णवान्नगान्दुमौषधीरुरगसरित्सुरासुरान् ॥ प्रजापतिर्भुवनसृजो नभोभुवः क्रियामखानथ कृतवान् गिरींश्च सः

diśo daśa kṣitimṛṣayo'rṇavānnagāndumauṣadhīruragasaritsurāsurān || prajāpatirbhuvanasṛjo nabhobhuvaḥ kriyāmakhānatha kṛtavān girīṃśca saḥ

हिन्दी अर्थ

उन प्रजापतिने दसों दिशा, पृथ्वी, ऋषि, मुद्र, पर्वत, वृक्ष, ओषधि, सर्प, नदी, देवता, असुर, गोकसख्रष्टा मरीचि आदि, आकाश, भूरलॉक, क्रिया, यज्ञ था पर्वतमाला—इन सबकी सृष्टि की है

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.