Harivamsha Purana
227
अध्याय 227 / 318

Parva 3, Adhyāya 44

28 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ28 श्लोक

अध्याय 227

श्लोक 1

दैत्येभिः हिरण्यकशिपुना च नृसिंहोपरि विभिन्नानां अस्त्राणां प्रहारः प्रह्रादस्य च तच्छ्रुत्वा हिरण्यकशिपुर्वचः ।उवाच दानवान् सर्वान् सगणांश्च गणाधिपः

daityebhiḥ hiraṇyakaśipunā ca nṛsiṃhopari vibhinnānāṃ astrāṇāṃ prahāraḥ prahrādasya ca tacchrutvā hiraṇyakaśipurvacaḥ | uvāca dānavān sarvān sagaṇāṃśca gaṇādhipaḥ

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमसेजय! प्रह्मादकी तरह बात सुनकर दैत्यगणोंके अधिपति हिरण्यकशिपुने ाणोंसहित सम्पूर्ण दानवोंसे यह बात कही—

अध्याय 227

श्लोक 2

मृगेन्द्रो गृह्यतां शीघ्रमपूर्वां तनुमास्थितः ।यदि वा संशयः कश्चिद् वध्यतां वनगोचरः

mṛgendro gṛhyatāṃ śīghramapūrvāṃ tanumāsthitaḥ | yadi vā saṃśayaḥ kaścid vadhyatāṃ vanagocaraḥ

हिन्दी अर्थ

दैत्यो! अपूर्व शरीर धारण करके आये हुए इस त्नचारी मृगेन्द्र (सिंह)-को शीघ्र ही पकड़ लो अथवा यदि कोई संशय (प्राण-संकट) उपस्थित हो तो इसका वध कर डालो'

अध्याय 227

श्लोक 3

तच्छुत्वा दानवाः सर्वे मृगेन्द्रं भीमविक्रमम् ।परिक्षिपन्तो मुदितास्त्रासयामासुरोजसा

tacchutvā dānavāḥ sarve mṛgendraṃ bhīmavikramam | parikṣipanto muditāstrāsayāmāsurojasā

हिन्दी अर्थ

यह आदेश पुनकर वे समस्त दानव प्रसन्न हो उस भयड्र पराक्रमी सिंहपर अस्त्र-शस्त्रोंका प्रहार करते हुए उसे बलपूर्वक त्रास देने लगे

अध्याय 227

श्लोक 4

सिंहनादं नदित्वा तु पुनः सिंहो महाबलः ।बभञ्ज तां सभां रम्यां व्यादितास्य इवान्तकः

siṃhanādaṃ naditvā tu punaḥ siṃho mahābalaḥ | babhañja tāṃ sabhāṃ ramyāṃ vyāditāsya ivāntakaḥ

हिन्दी अर्थ

तब उस महाबली सिंहने मुँह बाये हुए कालकी भाँति बार्म्बार सिंहनाद करके उस रमणीय सभा-भवनको तोड़ डाला

अध्याय 227

श्लोक 5

सभायां भज्यमानायां हिरण्यकशिपुः स्वयम् ।चिक्षेपास्त्राणि सिंहस्य रोषव्याकुललोचनः

sabhāyāṃ bhajyamānāyāṃ hiraṇyakaśipuḥ svayam | cikṣepāstrāṇi siṃhasya roṣavyākulalocanaḥ

हिन्दी अर्थ

प्रभा-भवनमें तोड़-फोड़ आरम्भ होनेपर हिरण्यकशिपुके नेत्र रोषसे व्याकुल हो गये, अत: उसने स्वयं भी उस अलौकिक सिंहपर नाना प्रकारके अस्त्र चलाये

अध्याय 227

श्लोक 6

सर्वास्त्राणामथ श्रेष्ठं दण्डमस्त्रं सुभैरवम् ।कालचक्रं तथात्युग्रं विष्णुचक्रं तथैव च

sarvāstrāṇāmatha śreṣṭhaṃ daṇḍamastraṃ subhairavam | kālacakraṃ tathātyugraṃ viṣṇucakraṃ tathaiva ca

श्लोक 6–16 का हिन्दी अर्थ

सब अस्त्रोंमें श्रेष्ठ जो अत्यन्त भयड्र दण्डास्त्र था, उसको भी चलाया। उसके सिवा अत्यन्त उम्र क्रालचक्र, विष्णुचक्र, धर्मचक्र, महाचक्र, अजितचक्र, योर ऐन्द्रचक्र, ऋषिचफक्र, ब्रह्मचक्र, जिसकी गड़गड़ाहटकी तीनों लोकोंमें भूरि-भूरि प्रशंसा की जाती है, वह विचित्र अशनि, सूखी-गीली दो प्रकारकी अशनि, भयानक रौद्रास्त्-शूल, कड्लाल, मूसल, ब्रह्मशिर नामक अस्त्र, ब्रह्मास्त्र, ऐषीकास्त्र, ऐन्द्रास्त्र, आग्रेयास्त्र, शैशिरास्त्र, वायव्यास्त्र, मथनास्त्र, कपालास्त्र, किड्टरास्त्र, अप्रतिम शक्ति, क्रौज्लास्त्र, हयग्रीवास्त्र, सौम्यास्त्र, अनुपम पैशाचास्त्र, अद्भुत सर्पास्त्र, मोहनास्त्र, शोषणास्त्र, संतापनास्त्र, विलापनास्त्र, जुम्भणास्त्र, प्रापणास्त्र, अत्यन्त दारुण त्वाष््टा्तर, अक्षोभ्य कालमुद्र, महाबलवान्‌ क्षोभणास्त्र, संवर्तनास्त्र, सम्मोहनास्त्र, मायाधरास्त्र तथा प्रिय गान्धर्वास्त्र, खड्गरत्र नन्दक, प्रस्वापनास्त्र, प्रमथनास्त्र, उत्तम वारुणास्त्र तथा जिसकी गति कहीं भी कुण्ठित नहीं होती, वह पाशुपतास्त्र-इन सभी अस्त्रोंको उस समय हिरण्यकशिपुने भगवान्‌ नरसिंहपर वारी- वारीसे चलाया, मानो वह प्रज्वलित अग्रिको आहुति दे रहा हो

अध्याय 227

श्लोक 7

धर्मचक्रं महच्चक्रमजितं नाम नामतः ।चक्रमैन्द्रं तथा घोरमृषिचक्रं तथैव च

dharmacakraṃ mahaccakramajitaṃ nāma nāmataḥ | cakramaindraṃ tathā ghoramṛṣicakraṃ tathaiva ca

अर्थ श्लोक 6 के साथ

अध्याय 227

श्लोक 8

पैतामहं तथा चक्रं त्रैलोक्यमहितस्वनम् ।विचित्रमशनीं चैव शुष्कार्द्रं चाशनिद्वयम्

paitāmahaṃ tathā cakraṃ trailokyamahitasvanam | vicitramaśanīṃ caiva śuṣkārdraṃ cāśanidvayam

अर्थ श्लोक 6 के साथ

अध्याय 227

श्लोक 9

रौद्रं तदुग्रं शूलं च कङ्कालं मुसलं तथा ।अस्त्रं ब्रह्मशिरश्चैव ब्राह्ममस्त्रं तथैव च

raudraṃ tadugraṃ śūlaṃ ca kaṅkālaṃ musalaṃ tathā | astraṃ brahmaśiraścaiva brāhmamastraṃ tathaiva ca

अर्थ श्लोक 6 के साथ

अध्याय 227

श्लोक 10

ऐषीकमस्त्रमैन्द्रं च आग्नेयं शैशिरं तथा ।वायव्यं मथनं नाम कापालमथ किङ्करम्

aiṣīkamastramaindraṃ ca āgneyaṃ śaiśiraṃ tathā | vāyavyaṃ mathanaṃ nāma kāpālamatha kiṅkaram

अर्थ श्लोक 6 के साथ

अध्याय 227

श्लोक 11

तथा चाप्रतिमां शक्तिं क्रौञ्चमस्त्रं तथैव च ।अस्त्रं हयशिरश्चैव सौम्यमस्त्रं तथैव च

tathā cāpratimāṃ śaktiṃ krauñcamastraṃ tathaiva ca | astraṃ hayaśiraścaiva saumyamastraṃ tathaiva ca

अर्थ श्लोक 6 के साथ

अध्याय 227

श्लोक 12

पैशाचमस्त्रममितं सार्प्यमस्त्रं तथाद्भुतम् ।मोहनं शोषणं चैव सन्तापनविलापने

paiśācamastramamitaṃ sārpyamastraṃ tathādbhutam | mohanaṃ śoṣaṇaṃ caiva santāpanavilāpane

अर्थ श्लोक 6 के साथ

अध्याय 227

श्लोक 13

जृम्भणं प्रापणं चैव त्वाष्ट्रं चैव सुदारुणम् ।कालमुद्गरमक्षोभ्यं क्षोभणं तु महाबलम्

jṛmbhaṇaṃ prāpaṇaṃ caiva tvāṣṭraṃ caiva sudāruṇam | kālamudgaramakṣobhyaṃ kṣobhaṇaṃ tu mahābalam

अर्थ श्लोक 6 के साथ

अध्याय 227

श्लोक 14

संवर्तनं मोहनं च तथा मायाधरं परम् ।गान्धर्वमस्त्रं दयितमसिरत्नं च नन्दकम्

saṃvartanaṃ mohanaṃ ca tathā māyādharaṃ param | gāndharvamastraṃ dayitamasiratnaṃ ca nandakam

अर्थ श्लोक 6 के साथ

अध्याय 227

श्लोक 15

प्रस्वापनं प्रमथनं वारुणं चास्त्रमुत्तमम् ।अस्त्रं पाशुपतं चैव यस्याप्रतिहता गतिः

prasvāpanaṃ pramathanaṃ vāruṇaṃ cāstramuttamam | astraṃ pāśupataṃ caiva yasyāpratihatā gatiḥ

अर्थ श्लोक 6 के साथ

अध्याय 227

श्लोक 16

एतान्यस्त्राणि सर्वाणि हिरण्यकशिपुस्तदा ।चिक्षेप नारसिंहस्य दीप्तस्याग्नेर्यथाहुतिः

etānyastrāṇi sarvāṇi hiraṇyakaśipustadā | cikṣepa nārasiṃhasya dīptasyāgneryathāhutiḥ

अर्थ श्लोक 6 के साथ

अध्याय 227

श्लोक 17

अस्त्रैः प्रज्वलितैः सिंहमावृणोदसुराधिपः ।विवस्वान् घर्मसमये हिमवन्तमिवांशुभिः

astraiḥ prajvalitaiḥ siṃhamāvṛṇodasurādhipaḥ | vivasvān gharmasamaye himavantamivāṃśubhiḥ

हिन्दी अर्थ

रिंशो 5ध्याय: + १०८५ असुरेधवर हिरण्यकशिपुने तेजसे प्रज्वलित हुए अस्त्रोंद्वारा भगवान्‌ नरसिंहको ढक दिया, ठीक वैसे ही, जैसे ग्रीष्म-ऋतुमें भगवान्‌ सूर्य हिमालयको अपनी किरणों से आच्छादित कर देते हैं

अध्याय 227

श्लोक 18

स ह्यमर्षानिलोद्भूतो दैत्यानां सैन्यसागरः ।क्षणेनाप्लावयत् सिंहं मैनाकमिव सागरः

sa hyamarṣānilodbhūto daityānāṃ sainyasāgaraḥ | kṣaṇenāplāvayat siṃhaṃ mainākamiva sāgaraḥ

हिन्दी अर्थ

दैत्योंके सैन्यरूपी समुद्रने रोषरूपी वायुके वेगसे उद्देलित होकर क्षणभरमें भगवान्‌ नरसिंहको उसी तरह आप्लावित-सा कर दिया, जैसे सागर मैनाकको अपने जलसे डुबो देता है

अध्याय 227

श्लोक 19

प्रासैः पाशैस्तथा शूलैर्गदाभिर्मुसलैस्तथा ।वज्रैरशनिकल्पैश्च शिलाभिश्च महाद्रुमैः

prāsaiḥ pāśaistathā śūlairgadābhirmusalaistathā | vajrairaśanikalpaiśca śilābhiśca mahādrumaiḥ

श्लोक 19–21 का हिन्दी अर्थ

प्रास, पाश, शूल, गदा, मूसल, वत्र, अशनि, शिला, बड़े- बड़े वृक्ष, मुद्रर, कूटपाश, शूल, ओखली, पर्वत, प्रज्वलित शतघ्नी तथा अत्यन्त भयड्र दण्ड आदि अस्त्रोंद्वारा दैत्य उन्हें सब ओरसे घेरकर मारने लगे। परंतु उस समय उन तेजस्वी महात्मा नरसिंहके शरीरका थोड़ा-सा भी भाग क्षत-विक्षत नहीं हुआ

अध्याय 227

श्लोक 20

मुद्गरैः कूटपाशैश्च शूलोलूखलपर्वतैः ।शतघ्नीभिश्च दीप्ताभिर्दण्डैरपि सुदारुणैः

mudgaraiḥ kūṭapāśaiśca śūlolūkhalaparvataiḥ | śataghnībhiśca dīptābhirdaṇḍairapi sudāruṇaiḥ

अर्थ श्लोक 19 के साथ

अध्याय 227

श्लोक 21

परिवार्य समन्तात् तु निघ्नन्नस्त्रैर्हरिं तदा ।स्वल्पमप्यस्य न क्षुण्णमूर्जितस्य महात्मनः

parivārya samantāt tu nighnannastrairhariṃ tadā | svalpamapyasya na kṣuṇṇamūrjitasya mahātmanaḥ

अर्थ श्लोक 19 के साथ

अध्याय 227

श्लोक 22

ते दानवाः पाशगृहीतहस्ता महेन्द्रवज्राशनितुल्यवेगाः ।समन्ततोऽभ्युद्यतबाहुशस्त्राः स्थितास्त्रिशीर्षा इव पन्नगेन्द्राः

te dānavāḥ pāśagṛhītahastā mahendravajrāśanitulyavegāḥ | samantato'bhyudyatabāhuśastrāḥ sthitāstriśīrṣā iva pannagendrāḥ

हिन्दी अर्थ

उन दानवोंने अपने हाथोंमें पाश ले रखे थे। उनका वेग इन्द्रके वज् और अशनिके समान था। वे सब ओर अस्त्र-शस्त्र लिये दोनों बँहिं ऊपर उठाये खड़े थे, इसलिये तीन फनवाले श्रेष्ठ सर्पोके समान जान पड़ते थे

अध्याय 227

श्लोक 23

सुवर्णमालाकुलभूषिताङ्गा नानाङ्गदाभोगपिनद्धगात्राः ।मुक्तावलीदामविभूषिताङ्गा हंसा इवाभान्ति विशालपक्षाः

suvarṇamālākulabhūṣitāṅgā nānāṅgadābhogapinaddhagātrāḥ | muktāvalīdāmavibhūṣitāṅgā haṃsā ivābhānti viśālapakṣāḥ

हिन्दी अर्थ

उनके अज्ज॒स्वर्ण-मालाओंके समुदायसे विभूषित थे, नाना प्रकारके अद्धद (बाजूबंद) आदि आभूषण उनके विभिन्न अड्लोंसे जुड़े हुए थे और मोतियोंके हार उनके समस्त अड्लोंकी शोभा बढ़ा रहे थे। उस अवस्थामें वे दैत्य विशाल पंखवाले हंसोंके समान सुशोभित होते थे

अध्याय 227

श्लोक 24

तेषां तु वायुप्रतिमौजसां वै केयूरमालावलयोत्कटानि ।तान्युत्तमाङ्गान्यभितो विभान्ति प्रभातसूर्यांशुसमप्रभाणि

teṣāṃ tu vāyupratimaujasāṃ vai keyūramālāvalayotkaṭāni | tānyuttamāṅgānyabhito vibhānti prabhātasūryāṃśusamaprabhāṇi

हिन्दी अर्थ

उन वायुके समान बलशाली दैत्योंके उत्तम अड्ध बाजूबंद, हार और वलय (कड़े) आदि आभूषणोंसे अलंकृत हो प्रभातकालके सूर्यकी किरणोंके समान कान्तिमान्‌ एवं शोभासम्पन्न हो रहे थे

अध्याय 227

श्लोक 25

तैः प्रक्षिपद्भिर्ज्वलितानलोपमैर्महास्त्रपूगैः स समावृतो बभौ ।गिरिर्यथा सन्ततवर्षिभिर्घनैः कृतान्धकारोऽद्भुतकन्दरद्रुमः

taiḥ prakṣipadbhirjvalitānalopamairmahāstrapūgaiḥ sa samāvṛto babhau | giriryathā santatavarṣibhirghanaiḥ kṛtāndhakāro'dbhutakandaradrumaḥ

हिन्दी अर्थ

जैसे निरन्तर वर्षा करनेवाले घने बादलोंसे पर्वतपर अन्धकार छा जाता है तथा उसकी कन्दराएँ और वृक्ष अद्भुत रूप धारण कर लेते हैं, उसी प्रकार अपने ऊपर फेंके जानेवाले प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी बड़े-बड़े अस्त्रोंके समूहोंसे आच्छादित हुए भगवान्‌ नरसिंह अन्धकाराच्छन्न एवं अद्भुत प्रतीत होते थे

अध्याय 227

श्लोक 26

तैर्हन्यमानोऽपि महास्त्रजालैः सर्वैस्तदा दैत्यगणैः समेतैः ।नाकम्पताजौ भगवान् प्रतापवान् स्थितः प्रकृत्या हिमवानिवाचलः

tairhanyamāno'pi mahāstrajālaiḥ sarvaistadā daityagaṇaiḥ sametaiḥ | nākampatājau bhagavān pratāpavān sthitaḥ prakṛtyā himavānivācalaḥ

हिन्दी अर्थ

उस समय सब दैत्य एकत्र होकर बड़े- बड़े अस्त्रोंके समुदायसे उनपर आघात कर रहे थे तो भी वे प्रतापी भगवान्‌ नूसिंह उस युद्धस्थलमें कम्पित नहीं हुए। वे स्वभावसे ही हिमालय पर्वतकी भाँति अविचलभावसे खड़े रहे

अध्याय 227

श्लोक 27

सन्तापितास्ते नरसिंहरूपिणा दितेः सुताः पावकदीप्ततेजसा ।भयाद् विचेलुः पवनोद्धता यथा महोर्मयः सागरवारिसम्भवाः

santāpitāste narasiṃharūpiṇā diteḥ sutāḥ pāvakadīptatejasā | bhayād viceluḥ pavanoddhatā yathā mahormayaḥ sāgaravārisambhavāḥ

हिन्दी अर्थ

नूसिंहरूपधारी भगवान्‌का तेज अग्निके समान प्रज्जलित हो रहा था, उनसे संतापित हुए दैत्य भयसे विचलित हो उठे, मानो प्रचण्ड वायुके थपेड़े खाकर महासागरके जलमें बड़ी-बड़ी तरंगें उठने लगी हों

अध्याय 227

श्लोक 28

शतैर्धनुर्भिः सुमहातिवेगा युगान्तकालप्रतिमाञ्छरौघान् ।एकायनस्था मुमुचुर्नृसिंहे महासुराः क्रोधविदीपिताङ्गाः

śatairdhanurbhiḥ sumahātivegā yugāntakālapratimāñcharaughān | ekāyanasthā mumucurnṛsiṃhe mahāsurāḥ krodhavidīpitāṅgāḥ

हिन्दी अर्थ

वे महानू असुर अत्यन्त वेगशाली थे, उनके सारे अज्ञ क्रोधसे जल रहे थे, अत: वे सौ धनुषोंकी दूरीपर एक स्थानमें खड़े हो उन नृसिंहदेवपर प्रलयकालकी अग्रिके समान तेजस्वी बाणसमूहों को छोड़ने लगे

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

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Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.