Harivamsha Purana
228
अध्याय 228 / 318

Parva 3, Adhyāya 45

32 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ32 श्लोक

अध्याय 228

श्लोक 1

दैत्येभिः कृतानां प्रहाराणां रचितानां मायानां च निष्फलता स्वराः खरमुखाश्चैव मकराशीविषाननाः ।ईहामृगमुखाश्चान्ये वराहसदृशाननाः

daityebhiḥ kṛtānāṃ prahārāṇāṃ racitānāṃ māyānāṃ ca niṣphalatā svarāḥ kharamukhāścaiva makarāśīviṣānanāḥ | īhāmṛgamukhāścānye varāhasadṛśānanāḥ

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! उन दानवोंमें कुछ तो मुूर्तिमानू गधे ही थे और कुछ दानवोंके केवल मुख ही गधोंके समान थे। कितनोंके मुख मगरों और विषधर सर्पोके समान थे। किन्हींके मुख भेड़ियोंके पमान और किन्हींके सूअरोंके समान थे

अध्याय 228

श्लोक 2

बालसूर्यमुखाश्चैव धूमकेतुमुखास्तथा ।चन्द्रार्धचन्द्रवक्त्राश्च प्रदीप्ताग्निमुखास्तथा

bālasūryamukhāścaiva dhūmaketumukhāstathā | candrārdhacandravaktrāśca pradīptāgnimukhāstathā

हिन्दी अर्थ

कितनोंके पुख प्रात:कालके सूर्यकी भाँति अरुण कान्तिसे सुशोभित थे। कई दानव धूमकेतुके-से मुखवाले थे। कुछ दैत्योंके मुख पूर्ण चन्द्र, अर्ध चन्द्र तथा प्रज्वलित अग्रिके समान थे

अध्याय 228

श्लोक 3

हंसकुक्कुटवक्त्राश्च व्यादितास्या भयावहाः ।पञ्चास्या लेलिहानाश्च काकगृध्रमुखास्तथा

haṃsakukkuṭavaktrāśca vyāditāsyā bhayāvahāḥ | pañcāsyā lelihānāśca kākagṛdhramukhāstathā

हिन्दी अर्थ

किन्हींके मुख हंसोंके समान थे तो किन्हींके पुर्गोके समान। कितने ही दैत्य मुँह बाये रहते थे, अतः ्ड़े भयड्टर जान पड़ते थे, किन्हीं-किन्हींके पाँच मुख थे। कोई-कोई लपलपाती जिह्ासे अपने जबड़े चाटते ग्रे और कितने ही दैत्य कौओं तथा गीधोंके समान पुखवाले थे

अध्याय 228

श्लोक 4

विद्युज्जिह्वास्त्रिशीर्षाश्च तथोल्कासन्निभाननाः ।महाग्राहनिभाश्चान्ये दानवा बलदर्पिताः

vidyujjihvāstriśīrṣāśca tatholkāsannibhānanāḥ | mahāgrāhanibhāścānye dānavā baladarpitāḥ

हिन्दी अर्थ

किन्हींकी जिह्ठा बिजलीके समान चमकती रहती थी। किन्हींके तीन सिर थे। कोई-कोई उल्काके समान मुखवाले थे तथा बलके घमंडसे भरे हुए दूसरे बहुत-से दानव बड़े-बड़े ग्राहोंक समान मुख धारण करते थे

अध्याय 228

श्लोक 5

कैलासवपुषस्तस्य शरीरे शरवृष्टयः ।अवध्यस्य मृगेन्द्रस्य न व्यथां चक्रुराहवे

kailāsavapuṣastasya śarīre śaravṛṣṭayaḥ | avadhyasya mṛgendrasya na vyathāṃ cakrurāhave

हिन्दी अर्थ

भगवान्‌ नरसिंहका श्रीविग्रह फ्रैलास पर्वतके समान उज्ज्वल था। वे सर्वथा अवध्य थे । उनके शरीरमें दैत्योंद्वारा की गयी बाणोंकी वर्षाओंने निक भी पीड़ा उत्पन्न नहीं की

अध्याय 228

श्लोक 6

एवं भूयोऽपरान् घोरानसृजन्दानवाः शरान् ।मृगेन्द्रस्योरसि क्रुद्धा निःश्वसन्त इवोरगाः

evaṃ bhūyo'parān ghorānasṛjandānavāḥ śarān | mṛgendrasyorasi kruddhā niḥśvasanta ivoragāḥ

हिन्दी अर्थ

रैंशो5ध्याय: + १०८७ इसी तरह फुफकारते हुए सर्पोंक समान उन कुषपित | हुए दानवोंने भगवान्‌ नरसिंहकी छातीमें पुन: दूसरे-दूसरे घोर बाणोंका प्रहार किया

अध्याय 228

श्लोक 7

ते दानवशरा घोरा मृगेन्द्राय समीरिताः ।विलयं जग्मुराकाशे खद्योता इव पर्वते

te dānavaśarā ghorā mṛgendrāya samīritāḥ | vilayaṃ jagmurākāśe khadyotā iva parvate

हिन्दी अर्थ

भगवान्‌ नरसिंहपर चलाये गये दानवोंके वे घोर बाण पर्वतमें अदृश्य हो जानेवाले जुगुनुओंके समान आकाशमें ही विलीन हो गये

अध्याय 228

श्लोक 8

ततश्चक्राणि दिव्यानि दैत्याः क्रोधसमन्विताः ।मृगेन्द्रायाक्षिपन्त्याशु प्रज्वलन्तीव सर्वशः

tataścakrāṇi divyāni daityāḥ krodhasamanvitāḥ | mṛgendrāyākṣipantyāśu prajvalantīva sarvaśaḥ

हिन्दी अर्थ

तब क्रुद्ध हुए दैत्य उन नरसिंहदेवपर बड़ी शीघ्रताके साथ दिव्य चक्र चलाने लगे, जो सब ओरसे प्रज्वलित-से हो रहे थे

अध्याय 228

श्लोक 9

तैरासीद् गगनं चक्रैः सम्पतद्भिः समावृतम् ।युगान्ते सम्प्रकाशद्भिश्चन्द्रसूर्यग्रहैरिव

tairāsīd gaganaṃ cakraiḥ sampatadbhiḥ samāvṛtam | yugānte samprakāśadbhiścandrasūryagrahairiva

हिन्दी अर्थ

चलाये जाते हुए उन चक्रोंसे घिरा हुआ आकाश प्रलयकालमें प्रकाशित होनेवाले अनेकानेक चन्द्र, सूर्यादि ग्रहोंसे व्याप्त हुआ- सा प्रतीत होता था

अध्याय 228

श्लोक 10

तानि चक्राणि वदनं प्रविशन्ति विभान्ति वै ।मेघोदरदरीं घोरां चन्द्रसूर्यग्रहा इव

tāni cakrāṇi vadanaṃ praviśanti vibhānti vai | meghodaradarīṃ ghorāṃ candrasūryagrahā iva

हिन्दी अर्थ

वे चक्र भगवान्‌ नरसिंहके मुखमें प्रवेश करते चले जा रहे थे। उस समय वे मेघोंकी भयड्र उदर-दर्रीमें घुसनेवाले चन्द्रमा और सूर्य आदि ग्रहोंके समान जान पड़ते थे

अध्याय 228

श्लोक 11

तानि चक्राणि सर्वाणि मृगेन्द्रेण महात्मना ।निगीर्णानि प्रदीप्तानि पावकार्चिःसमानि वै

tāni cakrāṇi sarvāṇi mṛgendreṇa mahātmanā | nigīrṇāni pradīptāni pāvakārciḥsamāni vai

हिन्दी अर्थ

महात्मा नरसिंहने आगकी ज्वालाओंके समान प्रज्वलित होनेवाले वे सब चक्र निगल लिये

अध्याय 228

श्लोक 12

हिरण्यकशिपुर्दैत्यो भूयः प्रासृजदूर्जिताम् ।शक्तिं प्रज्वलितां घोरां हुताशनसमप्रभाम्

hiraṇyakaśipurdaityo bhūyaḥ prāsṛjadūrjitām | śaktiṃ prajvalitāṃ ghorāṃ hutāśanasamaprabhām

हिन्दी अर्थ

तब दैत्य हिरण्यकशिपुने पुन: प्रज्वलित अग्िके समान प्रभावाली एक प्रबल एवं भयड्र शक्ति छोड़ी

अध्याय 228

श्लोक 13

तामापतन्तीं सम्प्रेक्ष्य मृगेन्द्रः शक्तिमुत्तमाम् ।हुङ्कारेणैव रौद्रेण बभञ्ज भगवांस्तदा

tāmāpatantīṃ samprekṣya mṛgendraḥ śaktimuttamām | huṅkāreṇaiva raudreṇa babhañja bhagavāṃstadā

हिन्दी अर्थ

उस उत्तम शक्तिको अपनी ओर आती देख भगवान्‌ नरसिंहने भयड्र हुड्डारमात्रसे ही तत्काल उसके टुकड़े-टुकड़े कर डाले

अध्याय 228

श्लोक 14

रराज भग्ना सा शक्तिर्मृगेन्द्रेण महीतले ।सविस्फुलिङ्गा ज्वलिता महोल्केव नभश्च्युता

rarāja bhagnā sā śaktirmṛgendreṇa mahītale | savisphuliṅgā jvalitā maholkeva nabhaścyutā

हिन्दी अर्थ

भगवान्‌ नरसिंहद्वारा भग्र होकर पृथ्वीपर पड़ी हुई वह शक्ति आकाशसे गिरी हुई चिनगारियोंसहित प्रज्वलित विशाल उल्काके समान शोभा पाती थी

अध्याय 228

श्लोक 15

नाराचपङक्तिः सिंहस्य सृष्टा रेजे विदूरतः ।नीलोत्पलपलाशानां मालेवोज्ज्वलदर्शना

nārācapaṅaktiḥ siṃhasya sṛṣṭā reje vidūrataḥ | nīlotpalapalāśānāṃ mālevojjvaladarśanā

हिन्दी अर्थ

नरसिंहदेवको लक्ष्य करके दूरसे छोड़ी गयी बाणोंकी पंक्ति नील कमलदलोंकी उज्चल मालाके समान सुशोभित हो रही थी

अध्याय 228

श्लोक 16

गर्जित्वा तु यथाकामं विक्रम्य च यथासुखम् ।तत् सैन्यमुत्सारितवांस्तृणाग्राणीव मारुतः

garjitvā tu yathākāmaṃ vikramya ca yathāsukham | tat sainyamutsāritavāṃstṛṇāgrāṇīva mārutaḥ

हिन्दी अर्थ

तब भगवान्‌ नरसिंह इच्छानुसार गर्जना करके मौजसे इधर-उधर विचरण करके दैत्योंकी उस सेनाको उसी प्रकार उखाड़ फेंकने लगे जैसे वायु तिनकोंके अग्रभागको उड़ाती है

अध्याय 228

श्लोक 17

ततोऽश्मवर्षं दैत्येन्द्रा व्यसृजन्त नभोगताः ।नगमात्रैः शिलाखण्डैर्गिरिकूटैर्महाप्रभैः

tato'śmavarṣaṃ daityendrā vyasṛjanta nabhogatāḥ | nagamātraiḥ śilākhaṇḍairgirikūṭairmahāprabhaiḥ

हिन्दी अर्थ

तब आकाशपमें स्थित हुए वे दैत्यराज पत्थरोंकी वर्षा करने लगे। उनके एक-एक शिलाखण्ड वृक्षोंके बराबर होते थे । वे महान्‌ कान्तिमान्‌ पर्वत-शिखरोंका प्रहार करते थे

अध्याय 228

श्लोक 18

तदश्मवर्षं सिंहस्य गात्रे निपतितं महत् ।दिशो दश प्रकीर्णं हि खद्योतप्रकरो यथा

tadaśmavarṣaṃ siṃhasya gātre nipatitaṃ mahat | diśo daśa prakīrṇaṃ hi khadyotaprakaro yathā

हिन्दी अर्थ

भगवान्‌ नरसिंहके शरीरपर पड़ती हुई प्रस्तरोंकी वह विशाल वर्षा खद्योत- समूहोंकी भाँति दसों दिशाओंमें बिखरने लगी

अध्याय 228

श्लोक 19

तदश्मौघैर्दितिसुतास्तदा सिंहमरिन्दमम् ।प्राच्छादयन् यथा मेघा धाराभिरिव पर्वतम्

tadaśmaughairditisutāstadā siṃhamarindamam | prācchādayan yathā meghā dhārābhiriva parvatam

हिन्दी अर्थ

जैसे बादल अपनी धाराओंसे पर्वतको आच्छादित कर देते हैं, उसी प्रकार वे दैत्य उन प्रस्तरसमूहोंकी वर्षासे शत्रुदमन नरसिंहदेवको ढकने लगे

अध्याय 228

श्लोक 20

न च तं चालयामासुर्दैत्यौघा देवमास्थितम् ।भीमवेगा बलश्रेष्ठं समुद्रा इव पर्वतम्

na ca taṃ cālayāmāsurdaityaughā devamāsthitam | bhīmavegā balaśreṣṭhaṃ samudrā iva parvatam

हिन्दी अर्थ

जैसे भयंकर वेगवाले समुद्र बलमें बढ़े-चढ़े पर्वतको विचलित नहीं कर सकते, उसी प्रकार वे दैत्यसमूह वहाँ खड़े हुए नरसिंहदेवको पीछे न हटा सके

अध्याय 228

श्लोक 21

ततोऽश्मवर्षे निहते जलवर्षमनन्तरम् ।धाराभिरक्षमात्राभिः प्रादुरासीत् समन्ततः

tato'śmavarṣe nihate jalavarṣamanantaram | dhārābhirakṣamātrābhiḥ prādurāsīt samantataḥ

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर प्रस्तरोंकी वर्षा बंद हो जानेपर जलकाी वर्षा आरम्भ हुई, चारों ओर धुरोंके समान मोटी धाराओंके साथ घोर वर्षा होने लगी

अध्याय 228

श्लोक 22

नभसः प्रच्युता धारास्तिग्मवेगाः सहस्रशः ।आवृण्वन् सर्वतो व्योम दिशश्चोपदिशस्तथा

nabhasaḥ pracyutā dhārāstigmavegāḥ sahasraśaḥ | āvṛṇvan sarvato vyoma diśaścopadiśastathā

हिन्दी अर्थ

आकाशसे प्रचण्ड वेगवाली सहस्रों जलधाराएँ गिरने लगीं, उन्होंने आकाश, दिशा और विदिशाओंको भी सब ओरसे आवृत कर लिया

अध्याय 228

श्लोक 23

धाराणां सन्निपातेन वायोर्विस्फूर्जितेन च ।वर्धता चैव वर्षेण न प्राज्ञायत किञ्चन

dhārāṇāṃ sannipātena vāyorvisphūrjitena ca | vardhatā caiva varṣeṇa na prājñāyata kiñcana

हिन्दी अर्थ

जलकी धाराओंके गिरने, प्रचण्ड वायुके वेगपूर्वक बहने और वर्षाकी उत्तरोत्तर वृद्धि होनेसे कुछ भी सुझायी नहीं देता था

अध्याय 228

श्लोक 24

धारा दिवि च संसक्ता वसुधायां च सर्वशः ।न स्पृशन्ति स्म तं तत्र निपतन्त्योऽनिशं भुवि

dhārā divi ca saṃsaktā vasudhāyāṃ ca sarvaśaḥ | na spṛśanti sma taṃ tatra nipatantyo'niśaṃ bhuvi

हिन्दी अर्थ

जलकी धारा आकाशसे वसुधातक लगी हुई थी और सब ओर फैल रही थी। भूतलपर निरन्तर गिरती रहनेपर भी वे धाराएँ वहाँ नृसिंहदेवका स्पर्श नहीं कर पाती थीं

अध्याय 228

श्लोक 25

बाह्यतो ववृषे वर्षं नोपरिष्टात् तु तोयदः ।मृगेन्द्रप्रतिरूपस्य स्थितस्य युधि मायया

bāhyato vavṛṣe varṣaṃ nopariṣṭāt tu toyadaḥ | mṛgendrapratirūpasya sthitasya yudhi māyayā

हिन्दी अर्थ

वे मृगेन्द्रूपधारी भगवान्‌ विष्णु अपनी मायाके द्वारा युद्धस्थलमें खड़े थे। उस समय बाहरकी ओर तो जलकाी वर्षा होती थी, किंतु मेघ उनके ऊपर जल नहीं गिराते थे

अध्याय 228

श्लोक 26

हतेऽश्मवर्षे तुमुले जलवर्षे च शोषिते ।ससृजुर्दानवा मायामग्निं वायुं च सर्वशः

hate'śmavarṣe tumule jalavarṣe ca śoṣite | sasṛjurdānavā māyāmagniṃ vāyuṃ ca sarvaśaḥ

हिन्दी अर्थ

जब भयंकर पत्थरोंकी वर्षा नष्ट हो गयी और जलकी वर्षा भी सोख ली गयी, तब दानवोंने सब ओर मायामय अग्नि और वायुकी सृष्टि की

अध्याय 228

श्लोक 27

नभसः प्रच्युतश्चैव तिग्मवेगः समन्ततः ।ज्वालामाली महारौद्रो दीप्ततेजाः समन्ततः

nabhasaḥ pracyutaścaiva tigmavegaḥ samantataḥ | jvālāmālī mahāraudro dīptatejāḥ samantataḥ

हिन्दी अर्थ

आकाशसे चारों ओर प्रचण्ड वेगशाली, ज्वालामालाओंसे अलंकृत महाभयंकर तथा प्रज्वलित तेजसे युक्त अग्निकी वर्षा होने लगी

अध्याय 228

श्लोक 28

स सृष्टः पावकस्तेन दैत्येन्द्रेण महात्मना ।न शशाक महातेजा दग्धुमप्रतिमौजसम्

sa sṛṣṭaḥ pāvakastena daityendreṇa mahātmanā | na śaśāka mahātejā dagdhumapratimaujasam

हिन्दी अर्थ

उस महामनस्वी दैत्यराजके द्वारा उत्पादित हुआ वह महातेजस्वी पावक उन अनुपम शक्तिशाली नृसिंहदेवको दग्ध न कर सका

अध्याय 228

श्लोक 29

तमिन्द्रस्तोयदैः सार्धं सहस्राक्षोऽमितद्युतिः ।महता तोयवर्षेण शमयामास पावकम्

tamindrastoyadaiḥ sārdhaṃ sahasrākṣo'mitadyutiḥ | mahatā toyavarṣeṇa śamayāmāsa pāvakam

हिन्दी अर्थ

अमिततेजस्वी सहस्रलोचन इन्द्रने मेघोंके साथ आकर भारी जल-वर्षा करके उस अग्निको बुझा दिया

अध्याय 228

श्लोक 30

तस्यां प्रतिहतायां तु मायायां युधि दानवाः ।ससृजुर्घोरसङ्काशं तमस्तीव्रं समन्ततः

tasyāṃ pratihatāyāṃ tu māyāyāṃ yudhi dānavāḥ | sasṛjurghorasaṅkāśaṃ tamastīvraṃ samantataḥ

हिन्दी अर्थ

उस अग्रिमयी मायाके नष्ट हो जानेपर दानवोंने युद्धस्थलमें सब ओर घोर एवं तीव्र अन्धकारकी सृष्टि की

अध्याय 228

श्लोक 31

तमसा संवृते लोके दैत्येष्वात्तायुधेषु वै ।स्वतेजसा परिवृतो दिवाकर इवाबभौ

tamasā saṃvṛte loke daityeṣvāttāyudheṣu vai | svatejasā parivṛto divākara ivābabhau

हिन्दी अर्थ

जब सारा जगत्‌ू अन्धकारसे आच्छन्न हो गया और दैत्यलोग हाथमें हथियार लेकर युद्धके लिये उद्यत हो गये, उस समय भगवान्‌ नूसिंह अपने तेजसे सूर्यदेवकी भाँति प्रकाशित हो उठे

अध्याय 228

श्लोक 32

त्रिशिखां भ्रुकुटीं चास्य ददृशुर्दानवा रणे ।ललाटस्थां त्रिकूटस्थां गङ्गां त्रिपथगामिव

triśikhāṃ bhrukuṭīṃ cāsya dadṛśurdānavā raṇe | lalāṭasthāṃ trikūṭasthāṃ gaṅgāṃ tripathagāmiva

हिन्दी अर्थ

उस समय दानवोंने रणक्षेत्रमें भगवानूके ललाटठमें तीन शिखाओंसे युक्त भ्रुकुटि देखी, जो त्रिकूट पर्वतपर स्थित हुई त्रिपथगा गड़ाके समान सुशोभित होती थी

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
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Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.