Harivamsha Purana
231
अध्याय 231 / 318

Parva 3, Adhyāya 48

28 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ28 श्लोक

अध्याय 231

श्लोक 1

वामनावतारस्योपक्रमः, बलेः अभिषेकं, दैत्येभिः तं त्रैलोक्यविजयस्य अनुरोधं च नृसिंह एष कथितो भूयोऽयं वामनोऽपरः ।यत्र वामनमास्थाय रूपं रूपविदां वरः

vāmanāvatārasyopakramaḥ, baleḥ abhiṣekaṃ, daityebhiḥ taṃ trailokyavijayasya anurodhaṃ ca nṛsiṃha eṣa kathito bhūyo'yaṃ vāmano'paraḥ | yatra vāmanamāsthāya rūpaṃ rūpavidāṃ varaḥ

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! यह सिंहावतारकी कथा कही गयी। अब दूसरे वामन- भवतारका वर्णन किया जाता है। इस अवतारमें ूपवेत्ताओंमें श्रेष्ठ श्रीहरिनि वामनरूप धारण करके रेवताओंका कार्य सिद्ध किया था

अध्याय 231

श्लोक 2

बलेर्बलवतो यज्ञे बलिना विष्णुना पुरा ।विक्रमैस्त्रिभिराक्रम्य त्रैलोक्यमखिलं हृतम्

balerbalavato yajñe balinā viṣṇunā purā | vikramaistribhirākramya trailokyamakhilaṃ hṛtam

हिन्दी अर्थ

पूर्वकालमें पर्वशक्तिमान्‌ू भगवान्‌ विष्णु (वामनरूप धारण करके) बलवान्‌ बलिके यज्ञमें गये। वहाँ उन्होंने अपने तीन री पगोंसे नापकर सारी त्रिलोकीका राज्य हर लिया

अध्याय 231

श्लोक 3

समुद्रवसना चोर्वीं नानानगविभूषिता ।हृत्वा दत्ता सुरेन्द्राय शक्राय प्रभविष्णुना

samudravasanā corvīṃ nānānagavibhūṣitā | hṛtvā dattā surendrāya śakrāya prabhaviṣṇunā

हिन्दी अर्थ

प्रभावशाली श्रीहरिने नाना प्रकारके पर्वतोंसे वभूषित तथा समुद्ररूपी वस्त्रसे आच्छादित यह पृथ्वी बलिसे लेकर देवराज इन्द्रको दे दी

अध्याय 231

श्लोक 4

अत्र मे संशयो ब्रह्मन्नत्र कौतूहलं महत् ।कथं नारायणो देवो वामनत्वमुपागतः

atra me saṃśayo brahmannatra kautūhalaṃ mahat | kathaṃ nārāyaṇo devo vāmanatvamupāgataḥ

हिन्दी अर्थ

जनमेजयने पूछा—ब्रह्मन्‌! इस विषयमें मुझे संदेह है, साथ ही महान्‌ कौतूहल भी है। भगवान्‌ नारायणदेव वामन कैसे हो गये?

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श्लोक 5

यः पुराणे पुराणात्मा भुत्वा नारायणः प्रभुः ।पद्मनाभो महाबाहुर्लोकानां प्रकृतिर्ध्रुवः

yaḥ purāṇe purāṇātmā bhutvā nārāyaṇaḥ prabhuḥ | padmanābho mahābāhurlokānāṃ prakṛtirdhruvaḥ

श्लोक 5–8 का हिन्दी अर्थ

जिन्हें पुराणमें पुराणात्मा (पुरातन पुरुष एवं अन्तर्यामी आत्मा) कहा गया है, जो सर्वसमर्थ होकर एकार्णवके जलमें नारायणके रूपमें शयन करते हैं, जिनकी नाभिसे ब्रह्मा्ड-कमल प्रकट हुआ, जो समस्त लोकोंकी प्रकृति (उपादानकारण) हैं, जिन्हें श्रुव (नित्य) कहा गया है, जो आदि, मध्य और अन्तसे रहित हैं, तीनों लोकोंके आदिकारण हैं, सनातन, देवाधिदेव और सुराध्यक्ष हैं, सच्चिदानन्दस्वरूप और विशववन्दित हैं, हव्य और कव्यको वहन करनेवाले, श्रीसम्पन्न, यज्ञ और श्राद्के भोक्ता तथा अविनाशी परमात्मा हैं, वे सर्वव्यापी भगवान्‌ विष्णु देवमाता अदितिके गर्भमें कैसे आये ? तथा जो इन्द्रके भी ख्रष्टा हैं, वे इन्द्रके छोटे भाई कैसे हुए? यदि वे देवदेवेश्वर अदितिके गर्भसे उत्पन्न हो ही गये, तब उन वामनदेवको विष्णुत्व (व्यापकत्व) कैसे प्राप्त हुआ ? मेरे इस प्रश्नका उत्तर देते हुए आप परमात्मा नारायणदेवके वामनावतारकी कथा मुझसे कहिये

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श्लोक 6

अनादिमध्यनिधनस्त्रैलोक्यादिः सनातनः ।देवदेवः सुराध्यक्षः कृष्णो लोकनमस्कृतः

anādimadhyanidhanastrailokyādiḥ sanātanaḥ | devadevaḥ surādhyakṣaḥ kṛṣṇo lokanamaskṛtaḥ

अर्थ श्लोक 5 के साथ

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श्लोक 7

हव्यकव्यवहः श्रीमान्हव्यकव्यभुगव्ययः ।अदित्या देवमातुश्च कथं गर्भेऽभवत् प्रभुः ।स्रष्टा यो वासवस्यापि स कथं वासवानुजः

havyakavyavahaḥ śrīmānhavyakavyabhugavyayaḥ | adityā devamātuśca kathaṃ garbhe'bhavat prabhuḥ | sraṣṭā yo vāsavasyāpi sa kathaṃ vāsavānujaḥ

अर्थ श्लोक 5 के साथ

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श्लोक 8

प्रसूतो देवदेवेशो विष्णुत्वं प्राप्तवान्कथम् ।एतदाचक्ष्व मे विप्र प्रादुर्भावं महात्मनः

prasūto devadeveśo viṣṇutvaṃ prāptavānkatham | etadācakṣva me vipra prādurbhāvaṃ mahātmanaḥ

अर्थ श्लोक 5 के साथ

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श्लोक 9

शृणु राजन्कथं दिव्यामर्चितामृषिपुङ्गवैः ।पुराणैः कविभिः प्रोक्तां ब्रह्मोक्तां ब्राह्मणेरिताम्

śṛṇu rājankathaṃ divyāmarcitāmṛṣipuṅgavaiḥ | purāṇaiḥ kavibhiḥ proktāṃ brahmoktāṃ brāhmaṇeritām

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजीने कहा—राजन्‌! यह दिव्य कथा बड़े-बड़े ऋषियोंद्वारा पूजित है । पुराणों तथा त्रिकालदर्शी विद्वानोंद्वारा वर्णित है। वेदमन्त्रोंद्वारा प्रतिपादित तथा ब्राह्मणोंद्वारा कथित है । तुम ध्यान देकर इसे सुनो

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श्लोक 10

मारीचस्य सुरेशस्य कश्यपस्य प्रजापतेः ।अदितिर्दितिर्द्वे भार्ये भगिन्यौ जनमेजय

mārīcasya sureśasya kaśyapasya prajāpateḥ | aditirditirdve bhārye bhaginyau janamejaya

हिन्दी अर्थ

जनमेजय ! मरीचिपुत्र देवेश्वर प्रजापति कश्यपकी भार्याऑमेंसे दो प्रधान थीं—अदिति और दिति। वे दोनों आपसमें सगी बहनें थीं

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श्लोक 11

अदित्यां जज्ञिरे देवाः कश्यपस्य महात्मनः ।धातार्यमा च मित्रश्च वरुणोऽंशो भगस्तथा

adityāṃ jajñire devāḥ kaśyapasya mahātmanaḥ | dhātāryamā ca mitraśca varuṇo'ṃśo bhagastathā

श्लोक 11–12 का हिन्दी अर्थ

अदितिके गर्भसे महात्मा कश्यपट्वारा देवता उत्पन्न हुए। धाता, अर्यमा, मित्र, वरुण, अंश, भग, इन्द्र, विवस्वान्‌, पूषा, दसवें पर्जन्य, ग्यारहवें त्वष्ट और बारहवें विष्णु कहे गये हैं

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श्लोक 12

इन्द्रो विवस्वान्पूषा च पर्जन्यो दशमस्तथा ।तथैकादशमस्त्वष्टा द्वादशो विष्णुरुच्यते

indro vivasvānpūṣā ca parjanyo daśamastathā | tathaikādaśamastvaṣṭā dvādaśo viṣṇurucyate

अर्थ श्लोक 11 के साथ

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श्लोक 13

दित्यां जातो हि बलवान्हिरण्यकशिपुः प्रभुः ।तस्यानुजस्य दैत्येन्द्रो हिरण्याक्षः प्रतापवान्

dityāṃ jāto hi balavānhiraṇyakaśipuḥ prabhuḥ | tasyānujasya daityendro hiraṇyākṣaḥ pratāpavān

हिन्दी अर्थ

दितिके गर्भसे बलवान्‌ एवं सामर्थ्यशाली हिरण्यकशिपु तथा उसका छोटा भाई प्रतापी दैत्यराज हिरण्याक्ष-ये दो पुत्र उत्पन्न हुए

अध्याय 231

श्लोक 14

हिरण्यकशिपोः पुत्राः पञ्च घोरपराक्रमाः ।प्रह्रादश्चानुह्रादश्च जम्भः संह्राद एव च

hiraṇyakaśipoḥ putrāḥ pañca ghoraparākramāḥ | prahrādaścānuhrādaśca jambhaḥ saṃhrāda eva ca

हिन्दी अर्थ

हिरण्यकशिपुके पाँच पुत्र हुए, जो भयंकर पराक्रमी थे, उनके नाम इस प्रकार हैं- प्रह्नाद, अनुह्ाद, संहवाद, पराक्रमी हृद और पाँचवाँ अनुहद

अध्याय 231

श्लोक 15

विरोचनश्च प्राह्लादिस्तस्य पुत्रो बलिः स्मृतः ।पुत्रपौत्रं च बलवत्तेषामक्षयमव्ययम्

virocanaśca prāhlādistasya putro baliḥ smṛtaḥ | putrapautraṃ ca balavatteṣāmakṣayamavyayam

हिन्दी अर्थ

प्रह्ादका पुत्र विरोचन और विरोचनका पुत्र बलि हुआ। उन सबके पुत्र-पौत्र बड़े बलवान्‌, अक्षय और अविनाशी परम्परावाले थे

अध्याय 231

श्लोक 16

तेजस्विनां सुरारीणां दैत्येन्द्राणां मनस्विनाम् ।गणाः सुबहुशो राजन्देशे देशे सहस्रशः

tejasvināṃ surārīṇāṃ daityendrāṇāṃ manasvinām | gaṇāḥ subahuśo rājandeśe deśe sahasraśaḥ

हिन्दी अर्थ

राजन्‌ ! उन तेजस्वी और मनस्वी देवद्रोही दैत्यराजोंके सहस्रों समुदाय देश- देशमें विद्यमान हैं

अध्याय 231

श्लोक 17

ते दृष्ट्वा नारसिंहेन हिरण्यकशिपुं हतम् ।दैत्या देववधार्थाय बलिमिन्द्रं प्रचक्रिरे

te dṛṣṭvā nārasiṃhena hiraṇyakaśipuṃ hatam | daityā devavadhārthāya balimindraṃ pracakrire

हिन्दी अर्थ

भगवान्‌ नृसिंहने हिरण्यकशिपुका वध कर दिया, यह देख दैत्योंने देवताओंका वध करनेके लिये राजा बलिको अपना इन्द्र बनाया

अध्याय 231

श्लोक 18

दृष्ट्वा धर्मपरं नित्यं सत्यवाक्यं जितेन्द्रियम् ।शौर्याध्ययनसंपन्नं सर्वज्ञानविशारदम्

dṛṣṭvā dharmaparaṃ nityaṃ satyavākyaṃ jitendriyam | śauryādhyayanasaṃpannaṃ sarvajñānaviśāradam

श्लोक 18–20 का हिन्दी अर्थ

बलि सदा धर्ममें तत्पर रहनेवाले, सत्यवादी, जितेन्द्रिय, शौर्य और स्वाध्यायसे सम्पन्न, सर्वज्ञानविशारद, परावरतत्त्वके ज्ञाता, तत्त्वदर्शी, अविनाशी, तेजस्वी तथा हिरण्यकशिपुके समान ही शक्तिशाली दैत्य थे, उनके इन गुणोंको देखकर उस समय समस्त दैत्योंने विरोचनकुमार बलिको दिव्य अभिषेकके द्वारा दैत्येन्द्रदपर प्रतिष्ठित करके उनका पूजन किया॥ १८-+

अध्याय 231

श्लोक 19

परावरगृहीतार्थं तत्त्वदर्शिनमव्ययम् ।तेजस्विनं सुररिपुं हिरण्यकशिपुं यथा

parāvaragṛhītārthaṃ tattvadarśinamavyayam | tejasvinaṃ suraripuṃ hiraṇyakaśipuṃ yathā

अर्थ श्लोक 18 के साथ

अध्याय 231

श्लोक 20

अभिषेकेण दिव्येन बलिं वैरोचनिं तथा ।दैत्याधिपत्ये दितिजास्तदा सर्वेऽभ्यपूजयन्

abhiṣekeṇa divyena baliṃ vairocaniṃ tathā | daityādhipatye ditijāstadā sarve'bhyapūjayan

अर्थ श्लोक 18 के साथ

अध्याय 231

श्लोक 21

अभिषिक्तस्तदा दैत्यैर्बलिर्बलवतां वरः ।ब्रह्मणा चैव तुष्टेन हिरण्यकशिपोः पदे

abhiṣiktastadā daityairbalirbalavatāṃ varaḥ | brahmaṇā caiva tuṣṭena hiraṇyakaśipoḥ pade

श्लोक 21–22 का हिन्दी अर्थ

दैत्योंद्वारा बलवानोंमें श्रेष्ठ बलिका अभिषेक हो जानेपर संतुष्ट हुए ब्रह्माजीने भी असुरगणोंके साथ समस्त तीर्थोंके जलसे भरे हुए सोनेके बड़े-बड़े कलशोंद्वारा विरोचनकुमार बलिका हिरण्यकशिपुके राज्यपर अभिषेक कर दिया

अध्याय 231

श्लोक 22

अभिषिक्तोऽसुरगणैर्बलिर्वैरोचनिस्तदा ।काञ्चनैः कलशैः स्फीतैः सर्वतीर्थाम्बुसंवृतैः

abhiṣikto'suragaṇairbalirvairocanistadā | kāñcanaiḥ kalaśaiḥ sphītaiḥ sarvatīrthāmbusaṃvṛtaiḥ

अर्थ श्लोक 21 के साथ

अध्याय 231

श्लोक 23

जयशब्दं ततश्चक्रुरभिषिक्तस्य दानवाः ।बलेरतुलवीर्यस्य सिंहासनगतस्य वै

jayaśabdaṃ tataścakrurabhiṣiktasya dānavāḥ | baleratulavīryasya siṃhāsanagatasya vai

हिन्दी अर्थ

अभिषिक्त होकर जब अनुपम पराक्रमी बलि सिंहासनपर आसीन हुए, तब समस्त दानवोंने उनकी जय-जयकार की

अध्याय 231

श्लोक 24

कृत्वेन्द्रं दानवाः सर्वे बलिं बलवतां वरम् ।तपो विज्ञापयामासुः शिरोभिः पतिताः क्षितौ

kṛtvendraṃ dānavāḥ sarve baliṃ balavatāṃ varam | tapo vijñāpayāmāsuḥ śirobhiḥ patitāḥ kṣitau

हिन्दी अर्थ

बलवानोंमें श्रेष्ठ बलिको इन्द्र बनाकर समस्त दानवोंने पृथ्वीपर मस्तक टेककर उन्हें प्रणाम किया और इस प्रकार अपना अभिप्राय निवेदन किया

अध्याय 231

श्लोक 25

विदितं तव दैत्येन्द्र हिरण्यकशिपो यथा ।त्रैलोक्यमासीदखिलं जगत्स्थावरजङ्गमम्

viditaṃ tava daityendra hiraṇyakaśipo yathā | trailokyamāsīdakhilaṃ jagatsthāvarajaṅgamam

हिन्दी अर्थ

दैत्य बोले—दैत्यराज! आपको यह ज्ञात ही होगा कि पहले चराचर प्राणियोंसहित यह सारा त्रिभुवन हिरण्यकशिपुके अधिकारमें था

अध्याय 231

श्लोक 26

पितामहं तु हत्वा ते सुरेश्वरनिषूदन ।हृतं तदैव त्रैलोक्यं शक्रश्चैवाभिषेचितः

pitāmahaṃ tu hatvā te sureśvaraniṣūdana | hṛtaṃ tadaiva trailokyaṃ śakraścaivābhiṣecitaḥ

हिन्दी अर्थ

सुरेधरनिषूदन ! देवताओंने आपके पितामहका वध करके तत्काल ही तीनों लोकोंका राज्य हर लिया और इन्द्रको उसपर अभिषिक्त कर दिया

अध्याय 231

श्लोक 27

तत्पितामहराज्यं त्वं प्रत्याहर्तुमिहार्हसि ।अस्माभिः सहितो नाथ त्रैलोक्यमिदमव्ययम् ।प्रत्यानयस्व भद्रं ते राज्यं पैतामहं प्रभो

tatpitāmaharājyaṃ tvaṃ pratyāhartumihārhasi | asmābhiḥ sahito nātha trailokyamidamavyayam | pratyānayasva bhadraṃ te rājyaṃ paitāmahaṃ prabho

श्लोक 27–28 का हिन्दी अर्थ

अत: नाथ! अब आप हमारे साथ चलकर अपने पितामहका राज्य—यह प्रवाहरूपसे सदा बना रहनेवाला त्रिभुवन वापस लौटाइये । प्रभो ! आपका कल्याण हो, आप अपने पितामहके राज्यपर पुन: अधिकार कर लीजिये

अध्याय 231

श्लोक 28

असुरगणसहस्रसंवृतस्त्वं जय दिवि देवगनान्महानुभावान् ।अमितबलपराक्रमोऽसि राजन्नतिशयसे स्वगुणैः पितामहं स्वं

asuragaṇasahasrasaṃvṛtastvaṃ jaya divi devaganānmahānubhāvān | amitabalaparākramo'si rājannatiśayase svaguṇaiḥ pitāmahaṃ svaṃ

अर्थ श्लोक 27 के साथ

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

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व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

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Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.