Harivamsha Purana
240
अध्याय 240 / 318

Parva 3, Adhyāya 57

68 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ68 श्लोक

अध्याय 240

श्लोक 1

देवासुरसङ्ग्रामे कुजम्भस्य, असिलोम्नः वृत्रासुरस्य च उत्कर्षस्य वर्णनं, हरेः अश्विनीकुमाराभ्यां च पराजयः ततः सर्वाणि सैन्यानि देवराजस्य शासनात् ।अभ्यद्रवन्त दितिजान्नदन्तो भैरवान् रवान्

devāsurasaṅgrāme kujambhasya, asilomnaḥ vṛtrāsurasya ca utkarṣasya varṇanaṃ, hareḥ aśvinīkumārābhyāṃ ca parājayaḥ tataḥ sarvāṇi sainyāni devarājasya śāsanāt | abhyadravanta ditijānnadanto bhairavān ravān

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर देवराज द्रकी आज्ञासे सारी देवसेनाएँ भैरव-स्वरसे गर्जना रती हुई दैत्योंपर टूट पड़ीं

अध्याय 240

श्लोक 2

तं बलौघमपर्यन्तं देवानां सुदुरासदम् ।रथनागाश्वकलिलं शङ्खदुन्दुभिनिःस्वनम्

taṃ balaughamaparyantaṃ devānāṃ sudurāsadam | rathanāgāśvakalilaṃ śaṅkhadundubhiniḥsvanam

श्लोक 2–5 का हिन्दी अर्थ

देवताओंका वह न्यसमुदाय अनन्त एवं अत्यन्त दुर्जय था। उसमें रथ, [थी और घोड़े भरे हुए थे। शक्लों और दुन्दुभियोंका म्भीर घोष गूँज रहा था। उसका पार पाना बहुत कठिन [। उसपर सब ओरसे धूल छा रही थी। वह अक्षोभ्य न्यसागर आश्चर्यमय, अविश्वसनीय और अद्भुत तीत होता था। दैत्योंने आक्रमण करती हुई उस नाको देखा और जैसे तटभूमि समुद्रकों आगेको ढ़नेसे रोकती है, उसी प्रकार उसको रोका। घोड़े, म और हाथियोंसहित आगे बढ़ती हुई उस सारी नाको वेगपूर्वक रोककर बलवान्‌ कुजम्भ समराडणमें ड़ा हो गया। देवताओंके सैन्यसमुद्रको रोकनेके ये वह मेरुपर्वतके समान अविचल भावसे खड़ा

अध्याय 240

श्लोक 3

आपतन्तं सुदुष्पारं रजसा सर्वतोवृतम् ।सैन्यसागरमक्षोभ्यं वेलेव मकरालयम्

āpatantaṃ suduṣpāraṃ rajasā sarvatovṛtam | sainyasāgaramakṣobhyaṃ veleva makarālayam

अर्थ श्लोक 2 के साथ

अध्याय 240

श्लोक 4

तदाश्चर्यमपश्यन्त अश्रद्धेयमिवाद्भुतम् ।उदीर्णां पृतनां सर्वां साश्वां सरथकुञ्जराम्

tadāścaryamapaśyanta aśraddheyamivādbhutam | udīrṇāṃ pṛtanāṃ sarvāṃ sāśvāṃ sarathakuñjarām

अर्थ श्लोक 2 के साथ

अध्याय 240

श्लोक 5

आवार्य समरेऽतिष्ठत् कुजम्भस्तरसा बली ।सैन्यार्णवं देवतानां गिरिर्मेरुरिवाचलः

āvārya samare'tiṣṭhat kujambhastarasā balī | sainyārṇavaṃ devatānāṃ girirmerurivācalaḥ

अर्थ श्लोक 2 के साथ

अध्याय 240

श्लोक 6

अनीकिनीं कुजम्भस्तु गदया स न्यवारयत् ।सा तथा वारिता सेना विह्वलाभून्निरुद्यमा

anīkinīṃ kujambhastu gadayā sa nyavārayat | sā tathā vāritā senā vihvalābhūnnirudyamā

हिन्दी अर्थ

कुजम्भने अपनी गदासे उस सेनाको रोक या। इस प्रकार रोकी गयी वह सेना विह्लल एवं पोगशून्य हो गयी

अध्याय 240

श्लोक 7

तस्मिंस्तथा वर्तमाने सम्प्रहारे सुदारुणे ।असिलोमा तु बलवान् दानवो दानवाधिपः

tasmiṃstathā vartamāne samprahāre sudāruṇe | asilomā tu balavān dānavo dānavādhipaḥ

श्लोक 7–8 का हिन्दी अर्थ

वह भयंकर संग्राम उक्‍्तरूपसे न ही रहा था कि दनुकुलनन्दन बलवान्‌ दानवराज सिलोमा समूची देवसेनाके लिये धूमकेतु नामक पातग्रहके समान उठ खड़ा हुआ। जैसे अमोघ सूर्य को ताप देता है, उसी प्रकार उसने युद्धस्थलमें ताओंकी सेनाको तपाना आरम्भ किया

अध्याय 240

श्लोक 8

देवसैन्यस्य सर्वस्य धूमकेतुरिवोत्थितः ।तपत्यर्क इवामोघः सुरसैन्यानि संयुगे

devasainyasya sarvasya dhūmaketurivotthitaḥ | tapatyarka ivāmoghaḥ surasainyāni saṃyuge

अर्थ श्लोक 7 के साथ

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श्लोक 9

सहस्ररश्मिप्रतिमो दानवस्य रथोत्तमः ।शरैर्मेघ इवावर्षद् देवानीकं प्रतापवान्

sahasraraśmipratimo dānavasya rathottamaḥ | śarairmegha ivāvarṣad devānīkaṃ pratāpavān

हिन्दी अर्थ

उस ववका उत्तम रथ सूर्यके समान तेजस्वी था। वह पी दैत्य जलकी वर्षा करनेवाले मेघके समान ताओंकी सेनापर बाणोंकी वृष्टि करने लगा

अध्याय 240

श्लोक 10

शरौघरश्मिभिर्दीप्तैः प्रतप्तो घोरविक्रमः ।रौद्रः क्रूरो दुराधर्षो दुरापो ध्वजिनीमुखे

śaraugharaśmibhirdīptaiḥ pratapto ghoravikramaḥ | raudraḥ krūro durādharṣo durāpo dhvajinīmukhe

श्लोक 10–18 का हिन्दी अर्थ

भयंकर पराक्रमी दानव बाणसमूहरूपी दीसिमती रणोंसे तप रहा था। वह रौद्र, क्रूर, दुर्घई और य था। सेनाके मुहानेपर खड़ा हो वह प्रभावशाली मम देवताओंके साथ इस प्रकार युद्ध करने लगा, मी उन सबको अपना ग्रास बना लेगा। उसके बाण डर थे। उसका मुख भी बड़ा ही उग्र था। वह ।बली दानव एक विशाल गजराजपर आरूढ़ हो वताओंके मस्तकोंका चयन करता था (उन्हें काट राता था) । देवताओंकी सेनाको अपना ग्रास बनाते ए उस प्रतापी असुरके बाण ही उसकी दाढ़ थे। लवार ही उसकी जिह्मा थी। चक्र ही हाथ थे। तना डुआ धनुष ही उसका खुला हुआ मुख था। फरसे सके नख थे। मृदज़॒ आदि वादयोंकी ध्वनि ही सके दहाड़नेकी आवाज थी। इस प्रकार वह बलवान्‌ गनवशिरोमणि असिलोमा उस युद्धस्थलमें व्याघ्रके प्रमान खड़ा था। वह दानव दूसरे महामेघके समान ततीत होता था। प्रत्यज्ञाकी टंकार ही उसकी गर्जना पी। सुविख्यात बाणोंका महान्‌ समूह ही उसके द्वारा रसाये जानेवाले जलकी बूँदें थीं तथा उसका धनुष री इन्द्रधनुष एवं विद्युतका समुदाय था। जिसमें बाण भादि अस्त्रोंका प्रयोग होता था, वह संग्राम एक पयड्टर समुद्रके समान था। उसकी भुजाएँ ही उसमें पाह थीं। उसे पार करना अत्यन्त कठिन था। धनुष दी उस सागरकी छोटी-बड़ी लहरोंका समुदाय था। ब्राणोंका जो आवर्तन है, वही भँवरोंसे युक्त महान्‌ हृद था। गदा और तलवार उसमें मगरके समान थीं। वह रेखनेमें रौद्र प्रतीत होता था। धनुषकी प्रत्यज्ञा ही उस प्मुद्रकी वेला (तटभूमि) थी। शिक्षारूपी वायुके त्रेगसे उसमें ज्वार-सा उठता था। पैदल सैनिक उस पागरके मत्स्य थे। वह महान्‌ रणसागर योद्धाओंकि गर्जने और चीखने-चिल्लानेके गम्भीर घोषसे परिपूर्ण था। उस दारुण दानवराज असिलोमाने शत्रुपक्षके महारथी वीरों, घरोड़ों, हाथियों, पैदलों और बहुसंख्यक रथोंको तथा कितने ही देवताओंको भी सहसा उस समरसागरमें निमज्जित एवं आप्लावित कर दिया

अध्याय 240

श्लोक 11

युध्यते दैवतैः सार्धं ग्रसमान इव प्रभुः ।उग्रेषुरुग्रवदनः समारुह्य महागजम्

yudhyate daivataiḥ sārdhaṃ grasamāna iva prabhuḥ | ugreṣurugravadanaḥ samāruhya mahāgajam

अर्थ श्लोक 10 के साथ

अध्याय 240

श्लोक 12

सुराणामुत्तमाङ्गानि प्रचिनोति महाबलः ।ग्रसन् दैवतसैन्यानि शरदंष्ट्रः प्रतापवान्

surāṇāmuttamāṅgāni pracinoti mahābalaḥ | grasan daivatasainyāni śaradaṃṣṭraḥ pratāpavān

अर्थ श्लोक 10 के साथ

अध्याय 240

श्लोक 13

असिजिह्वश्चक्रहस्तश्चापव्यात्ताननोऽसुरः ।परश्वधनखः श्रीमान् मृदङ्गापूरितध्वनिः

asijihvaścakrahastaścāpavyāttānano'suraḥ | paraśvadhanakhaḥ śrīmān mṛdaṅgāpūritadhvaniḥ

अर्थ श्लोक 10 के साथ

अध्याय 240

श्लोक 14

तिष्ठते दानवश्रेष्ठः संयुगे व्याघ्रवद् बली ।मौर्वीघोषस्तनयित्नुः पृषत्कः प्रथितो महान्

tiṣṭhate dānavaśreṣṭhaḥ saṃyuge vyāghravad balī | maurvīghoṣastanayitnuḥ pṛṣatkaḥ prathito mahān

अर्थ श्लोक 10 के साथ

अध्याय 240

श्लोक 15

धनुर्विद्युद्गणश्चापो महामेघ इवापरः ।इष्वस्त्रसागरो घोरो बाहुग्राहो दुरासदः

dhanurvidyudgaṇaścāpo mahāmegha ivāparaḥ | iṣvastrasāgaro ghoro bāhugrāho durāsadaḥ

अर्थ श्लोक 10 के साथ

अध्याय 240

श्लोक 17

कार्मुकोर्मितरङ्गौघो बाणावर्तमहाह्रदः ।गदासिमकरो रौद्रो ज्यावेलः शिक्षयोद्धतः ११६॥ पदातिमीनः सुमहान् गर्जितोत्क्रुष्टघोषवान् ।हयान्गजान्पदातींश्च रथांश्च सहसा बहून्

kārmukormitaraṅgaugho bāṇāvartamahāhradaḥ | gadāsimakaro raudro jyāvelaḥ śikṣayoddhataḥ 116|| padātimīnaḥ sumahān garjitotkruṣṭaghoṣavān | hayāngajānpadātīṃśca rathāṃśca sahasā bahūn

अर्थ श्लोक 10 के साथ

अध्याय 240

श्लोक 18

न्यमज्जयत समरे परवीरान् महारथान् ।आप्लावयत् स देवौघान् दारुणो दानवेश्वरः

nyamajjayata samare paravīrān mahārathān | āplāvayat sa devaughān dāruṇo dānaveśvaraḥ

अर्थ श्लोक 10 के साथ

अध्याय 240

श्लोक 19

प्रावर्तत युधि श्रीमान्युधि श्रेष्ठो युधि स्थिरः ।अपश्यंस्त्रिदशाः सर्वे शुद्धजाम्बूनदप्रभम्

prāvartata yudhi śrīmānyudhi śreṣṭho yudhi sthiraḥ | apaśyaṃstridaśāḥ sarve śuddhajāmbūnadaprabham

श्लोक 19–25 का हिन्दी अर्थ

वह तेजस्वी दानव असिलोमा युद्धमें स्थिर रहनेवाला तथा युद्धस्थलका एक श्रेष्ठ वीर था। वह निरन्तर युद्धमें संलग्न रहा । समस्त देवताओंने देखा—उसकी अज्कान्ति तपाये हुए सुवर्णके समान प्रकाशित हो रही थी। वह कवच धारण करके वहाँ युद्ध करते समय प्रज्वलित अग्निके समान जान पड़ता था। वह दानव अपने तेजसे दोपहरके सूर्यकी भाँति देदीप्यमान हो रहा था। सम्पूर्ण भूतोंमेंसे कोई भी उसकी ओर आँख उठाकर देख नहीं पाता था। जैसे ग्रीष्म-कऋतुमें आग बढ़े और सूखे हुए घास-फूँसको शीघ्र ही जला देती है, उसी प्रकार वह दैत्य अपने तेजसे उन श्रेष्ठ देवताओंको मोउध्याय; * ११५५ दग्ध कर रहा था। देवताओं और दानवोंकी सेनाएँ बड़ी भयंकर गर्जनाएँ कर रही थीं। वे सारी सेनाएँ सब ओरसे परस्पर चढ़ आयीं और आपसभमें घोल- मेल हो गयीं। वे सभी सैनिक प्रचण्ड बलशाली और शूरवीर थे। हाथी, घोड़े तथा रथोंपर बैठे हुए वे उभय पक्षके वीर श्रेष्ठ बुद्धिका आश्रय लेकर उस महासमरका त्याग नहीं करते थे। देवता और दानव-जातिका वह युद्ध अमर्यादित तथा रोमाश्जकारी था। उस युद्धस्थलमें अधिक रक्त बहनेके कारण कीच मच गयी थी। उस महासमरमें भयरूपी ग्राहसे पीड़ित हुए देव- पैनिक न तो दिशाओंको जान पाते थे और न दानवोंके चलाये हुए नाना प्रकारके शस्त्रोंको ही समझ पाते थे

अध्याय 240

श्लोक 20

सन्नद्धं तत्र युध्यन्तं ज्वलन्तमिव पावकम् ।मध्यन्दिनगतं सूर्यं ज्वलन्तमिव तेजसा

sannaddhaṃ tatra yudhyantaṃ jvalantamiva pāvakam | madhyandinagataṃ sūryaṃ jvalantamiva tejasā

अर्थ श्लोक 19 के साथ

अध्याय 240

श्लोक 21

न शेकुः सर्वभूतानि दानवं प्रसमीक्षितुम् ।यथा प्ररूढं घर्मान्ते दहेत् कक्षं हुताशनः

na śekuḥ sarvabhūtāni dānavaṃ prasamīkṣitum | yathā prarūḍhaṃ gharmānte dahet kakṣaṃ hutāśanaḥ

अर्थ श्लोक 19 के साथ

अध्याय 240

श्लोक 22

तथा सुरवरान् दैत्यो दहति स्म सुतेजसा ।देवानां दानवानां च बलं नर्दति दारुणम्

tathā suravarān daityo dahati sma sutejasā | devānāṃ dānavānāṃ ca balaṃ nardati dāruṇam

अर्थ श्लोक 19 के साथ

अध्याय 240

श्लोक 23

विरूढमभवत् सर्वमाकुलं च समन्तत ।शूराश्च ते बलोदग्रा हस्त्यश्वरथधूर्गताः

virūḍhamabhavat sarvamākulaṃ ca samantata | śūrāśca te balodagrā hastyaśvarathadhūrgatāḥ

अर्थ श्लोक 19 के साथ

अध्याय 240

श्लोक 24

आर्यां बुद्धिं समास्थाय न त्यजन्ति महारणम् ।तदुत्पिञ्जलकं युद्धमभवद् रोमहर्षणम्

āryāṃ buddhiṃ samāsthāya na tyajanti mahāraṇam | tadutpiñjalakaṃ yuddhamabhavad romaharṣaṇam

अर्थ श्लोक 19 के साथ

अध्याय 240

श्लोक 25

देवदानवयोः सङ्ख्ये रुधिरस्रावकर्दमम् ।न दिशः प्रत्यजानन्त भयग्राहनिपीडिताः ।शस्त्रपातांश्च विविधान् दानवानां महारणे

devadānavayoḥ saṅkhye rudhirasrāvakardamam | na diśaḥ pratyajānanta bhayagrāhanipīḍitāḥ | śastrapātāṃśca vividhān dānavānāṃ mahāraṇe

अर्थ श्लोक 19 के साथ

अध्याय 240

श्लोक 26

अन्योन्यं मूढचित्तास्ते निजघ्नुर्व्याकुलीकृताः ।स्वान् परान्नाभिजानन्ति विमूढाः शस्त्रपाणयः

anyonyaṃ mūḍhacittāste nijaghnurvyākulīkṛtāḥ | svān parānnābhijānanti vimūḍhāḥ śastrapāṇayaḥ

हिन्दी अर्थ

उनके चित्तमें मोह छा गया था। वे याकुल होकर हाथमें शस्त्र ले एक-दूसरेको मार रहे पे और इतने मूढ़ हो गये थे कि अपने-परायेकी भी हहचान नहीं कर पाते थे

अध्याय 240

श्लोक 27

शिरोरुहेषु सङ्गृह्य कश्चिच्छूरस्य संयुगे ।शूरश्छिनत्ति मूर्धानं सन्दष्टौष्ठपुटाननम्

śiroruheṣu saṅgṛhya kaścicchūrasya saṃyuge | śūraśchinatti mūrdhānaṃ sandaṣṭauṣṭhapuṭānanam

हिन्दी अर्थ

कोई शूरवीर युद्धस्थलमें रूसरे शूरवीरके केश पकड़कर उसका मस्तक काट नेता था। वह मस्तक, जिसका मुख दाँतोंतले दबे हुए भोष्ठसे सुशोभित था

अध्याय 240

श्लोक 28

बाहुभिर्मुष्टिभिश्चैव वज्रकल्पैः सुदारुणैः ।प्रहरन्ति रणे वीरा आत्तशस्त्राः परस्परम्

bāhubhirmuṣṭibhiścaiva vajrakalpaiḥ sudāruṇaiḥ | praharanti raṇe vīrā āttaśastrāḥ parasparam

हिन्दी अर्थ

हाथोंमें हथियार लिये वीर णभूमिमें एक-दूसरेपर भुजाओं तथा अत्यन्त भयंकर ज्तुल्य मुक्कोंसे प्रहार करते थे

अध्याय 240

श्लोक 29

योधप्राणहरे रौद्रे स्वर्गद्वारेनपावृते ।सङ्कुले तुमुले युद्धे वर्तमाने महाभये

yodhaprāṇahare raudre svargadvārenapāvṛte | saṅkule tumule yuddhe vartamāne mahābhaye

श्लोक 29–30 का हिन्दी अर्थ

वह वर्तमान हाभयंकर तुमुल युद्ध उभय पक्षके योद्धाओंसे व्याप्त ग। वह रौद्र संग्राम सभी योद्धाओंके प्राण हर लेनेवाला था उनके लिये स्वर्गका खुला हुआ द्वार था। उस हासमरमें घुड्सवारने घुड़सवारपर, हाथीसवारने हाथीसवार- र और पैदल वीरने पैदल वीरपर आक्रमण किया। | सब-के-सब एक-दूसरेको मार डालनेकी इच्छासे मर्यादितरूपसे परस्पर टूट पड़े

अध्याय 240

श्लोक 30

हयो हयं गजो नागं वीरो वीरं महाहवे ।अभ्यद्रवज्जिघांसन्तो ह्यसमञ्जसमाहवे

hayo hayaṃ gajo nāgaṃ vīro vīraṃ mahāhave | abhyadravajjighāṃsanto hyasamañjasamāhave

अर्थ श्लोक 29 के साथ

अध्याय 240

श्लोक 31

असुराश्च सुराश्चैव विक्रमाख्या महारथाः ।जुहुवुः समरे प्राणान् निजघ्नुरितरेतरम्

asurāśca surāścaiva vikramākhyā mahārathāḥ | juhuvuḥ samare prāṇān nijaghnuritaretaram

हिन्दी अर्थ

बल-पराक्रमसे म्पन्न महारथी देवता और असुर एक-दूसरेको मारने और समराग्निमें प्राणोंकी आहुति देने लगे

अध्याय 240

श्लोक 32

मुक्तकेशा विकवचा विरथाश्छिन्नकार्मुकाः ।हस्तैः पादैश्च युध्यन्ते दानवास्त्रिदशैः सह

muktakeśā vikavacā virathāśchinnakārmukāḥ | hastaiḥ pādaiśca yudhyante dānavāstridaśaiḥ saha

हिन्दी अर्थ

जिनके थ नष्ट हो गये और धनुष कट गये थे, वे कवचरहित नव केश खोले हुए वहाँ देवताओंके साथ केवल हाथों पर पैरोंसे ही युद्ध करते थे

अध्याय 240

श्लोक 33

हरिस्तु निशितं भल्लं प्रेषयामास संयुगे ।स तस्य धनुषः कोटिं छित्त्वा भूमावपातयत्

haristu niśitaṃ bhallaṃ preṣayāmāsa saṃyuge | sa tasya dhanuṣaḥ koṭiṃ chittvā bhūmāvapātayat

हिन्दी अर्थ

इसी समय हरिने द्स्थलमें असिलोमापर एक तेज धारवाला भल्ल चलाया। स भल्लने उसके धनुषकी कोटिका छेदन करके उसे थ्वीपर गिरा दिया

अध्याय 240

श्लोक 34

पुनश्चापि पृषत्कानां शतानि नतपर्वणाम् ।प्राहिणोत् सहसा तस्य दानवेन्द्रस्य संयुगे

punaścāpi pṛṣatkānāṃ śatāni nataparvaṇām | prāhiṇot sahasā tasya dānavendrasya saṃyuge

हिन्दी अर्थ

तत्पश्चात्‌ उन्होंने पुन: रणभूमिमें स दानवराजको लक्ष्य करके सहसा झुकी हुई गाँठवाले । बाण चलाये

अध्याय 240

श्लोक 35

तस्य देहे विमुक्तास्ते मारुतेन समीरिताः ।मग्नार्धकाया विविशुः पन्नगा इव पर्वते

tasya dehe vimuktāste mārutena samīritāḥ | magnārdhakāyā viviśuḥ pannagā iva parvate

हिन्दी अर्थ

उनके छोड़े हुए वे बाण वायुसे प्रेरित हो उस गनवके शरीरमें उसी प्रकार घुस गये, जैसे पर्वतमें सर्प पुस जाते हैं। उन सभी बाणोंका आधा-आधा भाग सके शरीरमें धँस गया था

अध्याय 240

श्लोक 36

स तैर्निपतितैर्गात्रैः क्षरद्भिरसृगावली ।बभौ दैत्यो महाबाहुर्मेरुर्धातुमिवोत्सृजन् ।पुनश्चापि पृषत्कानां शतानि नतपर्वणाम्

sa tairnipatitairgātraiḥ kṣaradbhirasṛgāvalī | babhau daityo mahābāhurmerurdhātumivotsṛjan | punaścāpi pṛṣatkānāṃ śatāni nataparvaṇām

हिन्दी अर्थ

उन बाणोंकी मार डड़नेसे उसके सारे अज्ञलोंसे खूनकी धाराएँ बह चलीं। उस समय वह महाबाहु दैत्य गेरूकी धारा बहानेवाले पेरुगिरिके समान शोभा पाता था। तदनन्तर पुन: उसपर भुकी हुई गाँठवाले सौ बाणोंका प्रहार हुआ

अध्याय 240

श्लोक 37

ततोऽसिलोमा सङ्क्रुद्धः प्रगृह्यान्यन्महाधनुः ।रुक्मपुङ्खांश्च निशितान्प्रेषयामास सायकान्

tato'silomā saṅkruddhaḥ pragṛhyānyanmahādhanuḥ | rukmapuṅkhāṃśca niśitānpreṣayāmāsa sāyakān

हिन्दी अर्थ

तब असिलोमाको बड़ा क्रोध हुआ। उसने दूसरा विशाल धनुष लेकर हरिपर सोनेके पंखवाले बहुत-से पैने त्राणोंका प्रहार किया

अध्याय 240

श्लोक 38

तैस्तु मर्मसु विव्याध सर्पानलविषोपमैः ।गात्रं सछादयामास महाभ्रैरिव पर्वतम्

taistu marmasu vivyādha sarpānalaviṣopamaiḥ | gātraṃ sachādayāmāsa mahābhrairiva parvatam

हिन्दी अर्थ

वे बाण सर्प, अग्नि और वेषके समान प्राणनाशक थे। उनके द्वारा उसने हरिके पर्मस्थानोंमें आघात किया तथा बड़े-बड़े बादलोंसे पर्वतकी भाँति अपने उन बाणोंसे उनके शरीरको ढक दिया

अध्याय 240

श्लोक 39

भूयः सन्धाय च शरं मुमोचान्तकसन्निभम् ।सुपुङ्खं सूर्यसङ्काशं बाणमप्रतिमं रणे

bhūyaḥ sandhāya ca śaraṃ mumocāntakasannibham | supuṅkhaṃ sūryasaṅkāśaṃ bāṇamapratimaṃ raṇe

हिन्दी अर्थ

सके बाद उसने पुन: रणभूमिमें सुन्दर पंखयुक्त सूर्यसदूश तेजस्वी, अनुपम एवं कालके समान भयंकर बाणका पंधान करके उसे हरिपर छोड़ दिया

अध्याय 240

श्लोक 40

तेन बाणप्रहारेण संयुगे भीमकर्मणा ।मुमोह सहसा देवो भूमौ चापि पपात ह

tena bāṇaprahāreṇa saṃyuge bhīmakarmaṇā | mumoha sahasā devo bhūmau cāpi papāta ha

हिन्दी अर्थ

भयंकर कर्म करनेवाले उस दानवके उस बाणप्रहारसे युद्धस्थलमें हरिदेवता सहसा मुूर्च्छित हो गये और पृथ्वीपर गिर पड़े

अध्याय 240

श्लोक 41

ततो हाहाकृताः सर्वे देवे भूतलमाश्रिते ।जगत् सदेवमाविग्नं यथार्कपतनं तथा

tato hāhākṛtāḥ sarve deve bhūtalamāśrite | jagat sadevamāvignaṃ yathārkapatanaṃ tathā

हिन्दी अर्थ

हरिदेवके धराशायी होते ही सब लोग हाहाकार करने लगे। देवताओंसहित सारा जगत्‌ उद्धिग्न हो उठा, मानो साक्षात्‌ सूर्यदेव आकाशसे पृथ्वीपर टूट गिरे हों

अध्याय 240

श्लोक 42

परिवारं तु समरे तस्य हत्वा महासुरः ।एकत्रिंशत्सहस्राणि योधानां दानवोत्तमः

parivāraṃ tu samare tasya hatvā mahāsuraḥ | ekatriṃśatsahasrāṇi yodhānāṃ dānavottamaḥ

हिन्दी अर्थ

हरिको सब ओरसे घेरकर खड़े हुए जो सैनिक थे, उन सबको मारकर उस दानवराजने समराड़णमें देवपक्षके इकतीस हजार योद्धाओंका संहार कर डाला

अध्याय 240

श्लोक 43

जयश्रिया सेव्यमानो दीप्यमान इवाचलः ।प्रगृह्य कार्मुकं घोरं गतः शक्ररथं प्रति

jayaśriyā sevyamāno dīpyamāna ivācalaḥ | pragṛhya kārmukaṃ ghoraṃ gataḥ śakrarathaṃ prati

हिन्दी अर्थ

विजयश्रीसे सेवित हो दीप्तिमान्‌ पर्वतकी भाँति प्रतीत होनेवाला असिलोमा घोर धनुष लेकर इन्द्रके रथकी ओर चला गया

अध्याय 240

श्लोक 44

तथैव तु महायुद्धे ससैन्यावश्विनावुभौ ।प्रयुद्धौ सह वृत्रेण बलिना देवतारिणा

tathaiva tu mahāyuddhe sasainyāvaśvināvubhau | prayuddhau saha vṛtreṇa balinā devatāriṇā

हिन्दी अर्थ

इसी प्रकार उस महायुद्धमें सेनासहित दोनों अश्विनीकुमार बलवान्‌ देवद्रोही वृत्रासुरके साथ युद्ध कर रहे थे

अध्याय 240

श्लोक 45

बाणखड्गधनुष्पाणिः समरे त्यक्त जीवितः ।आसाद्य सोऽश्विनौ दैत्यः स्थितो गिरिरिवाचलः

bāṇakhaḍgadhanuṣpāṇiḥ samare tyakta jīvitaḥ | āsādya so'śvinau daityaḥ sthito giririvācalaḥ

हिन्दी अर्थ

वृत्रासुरके हाथमें बाण, खड्ग और धनुष थे। वह जीवनका मोह छोड़कर समरभूमिमें आया था। वह दैत्य दोनों अश्विनीकुमारोंके पास पहुँचकर पर्वतके समान अविचल भावसे खड़ा हो गया

अध्याय 240

श्लोक 46

ततः शङ्खमुपाध्माय द्विषतां लोमहर्षणम् ।ज्याघोषतलशब्दैश्च सर्वभूतान्यवेजयत्

tataḥ śaṅkhamupādhmāya dviṣatāṃ lomaharṣaṇam | jyāghoṣatalaśabdaiśca sarvabhūtānyavejayat

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर शत्रुओंके रोंगटे खड़े कर देनेवाले शद्भको बजाकर धनुषकी प्रत्यश्ञाके टड्लार-घोषसे उसने सम्पूर्ण प्राणियोंको कम्पित कर दिया

अध्याय 240

श्लोक 47

ततः संहृष्टरोमाणः शङ्खशब्दं विशुश्रुवुः ।यक्षराक्षसदेवौघा वृत्रस्यापि च निःस्वनम्

tataḥ saṃhṛṣṭaromāṇaḥ śaṅkhaśabdaṃ viśuśruvuḥ | yakṣarākṣasadevaughā vṛtrasyāpi ca niḥsvanam

हिन्दी अर्थ

उस समय यक्ष, राक्षस और देवताओंके समुदायने रोमाश्चित शरीरसे उस शड्गुकी ध्वनि और वृत्रासुरकी गर्जना सुनी

अध्याय 240

श्लोक 48

गदातोमरनिस्त्रिंशशूलशक्तिपरश्वधाः ।प्रगृहीता व्यराजन्त यक्षराक्षसबाहुभिः

gadātomaranistriṃśaśūlaśaktiparaśvadhāḥ | pragṛhītā vyarājanta yakṣarākṣasabāhubhiḥ

हिन्दी अर्थ

फिर तो यक्षों और राक्षसोंके हाथोंमें गदा, तोमर, खड्ग, शूल, शक्ति और फरसे शोभा पाने लगे

अध्याय 240

श्लोक 49

तैः प्रयुक्तान्महाकायैः शूलशक्तिपरश्वधान् ।भल्लैर्वृत्रः प्रचिच्छेद भीमवेगरवैस्तथा

taiḥ prayuktānmahākāyaiḥ śūlaśaktiparaśvadhān | bhallairvṛtraḥ praciccheda bhīmavegaravaistathā

हिन्दी अर्थ

ध्याय;: + ११५७ उन महाकाय यक्ष आदिके द्वारा छोड़े गये उन [ल, शक्ति और फरसोंको वृत्रासुरने भयंकर वेग गौर शब्दवाले भल्लोंसे काट डाला

अध्याय 240

श्लोक 50

अन्तरिक्षचराणां च भूमिस्थानां च गर्जताम् ।शरैर्विव्याध गात्राणि देवानां प्रियदर्शिनाम्

antarikṣacarāṇāṃ ca bhūmisthānāṃ ca garjatām | śarairvivyādha gātrāṇi devānāṃ priyadarśinām

हिन्दी अर्थ

अन्तरिक्षमें त्चरने और पृथ्वीपर खड़े होकर गर्जनिवाले प्रियदर्शी वताओंके सारे अज्लोंगें उस दैत्यने अपने बाणोंद्वारा हरी चोट पहुँचायी

अध्याय 240

श्लोक 51

वृत्रासुरभुजोत्सृष्टैर्बहुधा यक्षरक्षसाम् ।निकृत्तान्येव दृश्यन्ते शरीराणि शिरांसि च

vṛtrāsurabhujotsṛṣṭairbahudhā yakṣarakṣasām | nikṛttānyeva dṛśyante śarīrāṇi śirāṃsi ca

हिन्दी अर्थ

वृत्रासुरकी भुजाओंसे छोड़े ये उन अस्त्रोंद्वारा बहुधा यक्ष और राक्षसोंके शरीर था मस्तक करे हुए ही देखे जाते थे

अध्याय 240

श्लोक 52

अथ रक्तमहावृष्टिरभ्यवर्षत मेदिनीम् ।गदापरिघभिन्नानां देवानां गात्रसम्भवा

atha raktamahāvṛṣṭirabhyavarṣata medinīm | gadāparighabhinnānāṃ devānāṃ gātrasambhavā

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर थ्वीपर खूनकी बड़ी भारी वर्षा होने लगी। गदा और परिघसे घायल हुए देवताओंके शरीरसे ही ह रक्तवर्षा हो रही थी

अध्याय 240

श्लोक 53

प्रच्छादयन्तं बाणौघैर्वृत्रं भीमपराक्रमम् ।ददृशुः सर्वभूतानि भानुमन्तमिवांशुभिः

pracchādayantaṃ bāṇaughairvṛtraṃ bhīmaparākramam | dadṛśuḥ sarvabhūtāni bhānumantamivāṃśubhiḥ

हिन्दी अर्थ

अपने बाणसमूहों द्वार न्रुओंको आच्छादित करते हुए भयंकर पराक्रमी त्रासुरको समस्त प्राणियोंने अपने किरणजालसे सारे गत्‌को ढकनेवाले सूर्यदेवके समान देखा

अध्याय 240

श्लोक 54

तीक्ष्णरश्मिरिवादित्यः प्रतपन् सर्वदेवताः ।अविध्यद् बलवान् क्रुद्धः सायकैर्मर्मभेदिभिः

tīkṣṇaraśmirivādityaḥ pratapan sarvadevatāḥ | avidhyad balavān kruddhaḥ sāyakairmarmabhedibhiḥ

हिन्दी अर्थ

चण्ड किरणोंवाले सूर्यके समान सम्पूर्ण देवताओंको प देते हुए उस बलवान्‌ दैत्यने कुपित होकर मभिदी सायकोंद्वारा उन सबको घायल कर दिया

अध्याय 240

श्लोक 55

नदतो विविधान् नादानर्दितस्यापि सायकैः ।न मोहमसुरेन्द्रस्य ददृशुस्त्रिदशा रणे

nadato vividhān nādānarditasyāpi sāyakaiḥ | na mohamasurendrasya dadṛśustridaśā raṇe

हिन्दी अर्थ

त्रताओंके सायकोंसे पीड़ित होनेपर भी वह नाना क्ारसे सिंहनाद करता रहा। रणभूमिमें देवताओंने सुरराज वृत्रको कभी मोह या मूच्छमिं पड़ते नहीं व्रा

अध्याय 240

श्लोक 56

तेऽसिचर्मगदाभिश्च परिघप्रासतोमरैः ।परश्वधैश्च शूलैश्च प्रववर्षुर्महारथाः

te'sicarmagadābhiśca parighaprāsatomaraiḥ | paraśvadhaiśca śūlaiśca pravavarṣurmahārathāḥ

हिन्दी अर्थ

वे महारथी देवता उसके ऊपर ढाल, लवार, गदा, परिघ, प्रास, तोमर, फरसे और शूलोंकी पा करने लगे

अध्याय 240

श्लोक 57

ततो वृत्रः सुसङ्क्रुद्धस्तैस्तदाभ्यर्दितो बली ।अभ्यवर्षच्छितैर्बाणैस्तान् सर्वान् सत्यविक्रमः

tato vṛtraḥ susaṅkruddhastaistadābhyardito balī | abhyavarṣacchitairbāṇaistān sarvān satyavikramaḥ

हिन्दी अर्थ

उनके द्वारा इस प्रकार पीड़ित नेपर बलवान्‌ एवं सत्यपराक्रमी वृत्रासुर अत्यन्त पित हो उठा। उस समय उसने उन सब लोगोंपर मे बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी

अध्याय 240

श्लोक 58

तेन वित्रासिता देवा विप्रकीर्णमहायुधाः ।घोरमार्तस्वरं चक्रुर्वृत्रासुरभयार्दिताः

tena vitrāsitā devā viprakīrṇamahāyudhāḥ | ghoramārtasvaraṃ cakrurvṛtrāsurabhayārditāḥ

हिन्दी अर्थ

उसके रा आतड़ित हुए देवताओंके बड़े-बड़े आयुध हाथसे टकर बिखर गये। वृत्रासुरकके भयसे पीड़ित हुए देवता घोर आर्तनाद करने लगे

अध्याय 240

श्लोक 59

उत्सृज्य ते गदाशक्तिशूलर्ष्टिपरिघाशनीन् ।उत्तरां दिशमाजग्मुस्त्रासिता दृढधन्विना

utsṛjya te gadāśaktiśūlarṣṭiparighāśanīn | uttarāṃ diśamājagmustrāsitā dṛḍhadhanvinā

हिन्दी अर्थ

सुदूढ़ नुष धारण करनेवाले उस दैत्यसे त्रास पाकर वे ता गदा, शक्ति, शूल, ऋषि, परिघ और अशनि दि अस्त्रोंको त्यागकर उत्तर दिशाकी ओर आ पे

अध्याय 240

श्लोक 60

शूलशक्तिगदापाणिर्व्यूढोरस्को महाभुजः ।प्रावर्तत रणे वृत्रस्त्रासयानश्चराचरान्

śūlaśaktigadāpāṇirvyūḍhorasko mahābhujaḥ | prāvartata raṇe vṛtrastrāsayānaścarācarān

हिन्दी अर्थ

चौड़ी छातीवाला महाबाहु वृत्रासुर शूल, क्ते और गदा हाथमें लेकर चराचर प्राणियोंको स देता हुआ युद्धमें प्रवृत्त हुआ था

अध्याय 240

श्लोक 61

तत्रैकस्तु महाबाहुरसिशूलधरः प्रभुः ।अभ्यधावत दैत्येन्द्रं वृत्रमप्रतिमं रणे

tatraikastu mahābāhurasiśūladharaḥ prabhuḥ | abhyadhāvata daityendraṃ vṛtramapratimaṃ raṇe

हिन्दी अर्थ

उन नों अश्विनीकुमारोंमेंसे एक सामर्थ्यशाली महाबाहु सत्य हाथमें तलवार और त्रिशूल लिये रणक्षेत्रमें नुपम वीरता प्रकट करनेवाले दैत्यराज वृत्रासुरकी र. दौड़े

अध्याय 240

श्लोक 62

तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य निर्भिन्नमिव वारणम् ।वत्सदन्तैस्त्रिभिः पार्श्वे विव्याध सुरसत्तमम्

tamāpatantaṃ samprekṣya nirbhinnamiva vāraṇam | vatsadantaistribhiḥ pārśve vivyādha surasattamam

हिन्दी अर्थ

मदकी धारा बहानेवाले हाथीके समान सुरश्रेष्ठ नासत्यको आक्रमण करते देख वृत्रासुरने उनके पार्वभागमें तीन वत्सदन्त नामक बाणोंका प्रहार किया

अध्याय 240

श्लोक 63

सोऽपि विद्धो महेष्वासः शरैरमितविक्रमः ।गदां जग्राह बलवान् गदायुद्धविशारदः

so'pi viddho maheṣvāsaḥ śarairamitavikramaḥ | gadāṃ jagrāha balavān gadāyuddhaviśāradaḥ

हिन्दी अर्थ

तब नासत्यने वृत्रासुरको भी अपने बाणोंद्वारा घायल कर दिया। उनके बाणोंसे विद्ध हो अमित पराक्रमी, महा धनुर्धर, गदायुद्धविशारद बलवान्‌ वृत्रासुरने गदा हाथमें ले ली

अध्याय 240

श्लोक 64

तां प्रगृह्य गदां भीमामयःसारमयीं दृढाम् ।अश्विनं सहसाऽऽगम्य ताडयामास वीर्यवान्

tāṃ pragṛhya gadāṃ bhīmāmayaḥsāramayīṃ dṛḍhām | aśvinaṃ sahasā''gamya tāḍayāmāsa vīryavān

हिन्दी अर्थ

लोहेके सारतत्त्वकी बनी हुई उस सुदृढ़ एवं भयंकर गदाको लेकर वह पराक्रमी दैत्य सहसा अश्विनीकुमारके पास आया और आते ही उसने उनपर उस गदाका प्रहार किया

अध्याय 240

श्लोक 65

दीप्यमानं ततः शूलमश्वी सुविपुलं दृढम् ।प्रासृजद् वृत्रदैत्याय सहसा रोमहर्षणम्

dīpyamānaṃ tataḥ śūlamaśvī suvipulaṃ dṛḍham | prāsṛjad vṛtradaityāya sahasā romaharṣaṇam

हिन्दी अर्थ

तब अश्वी (नासत्य)-ने अत्यन्त विशाल सुदूढ़ दीसिंमान्‌ू और रोमाज्चकारी शूल लेकर सहसा उसे वृत्रासुरपर दे मारा

अध्याय 240

श्लोक 66

भङक्त्वा शूलं गदाग्रेण गदायुद्धविशारदः ।अश्विनं सहसाभ्येत्य गरुत्मानिव पन्नगम्

bhaṅaktvā śūlaṃ gadāgreṇa gadāyuddhaviśāradaḥ | aśvinaṃ sahasābhyetya garutmāniva pannagam

हिन्दी अर्थ

गदायुद्धमें कुशल वृत्रासुर गदाके अग्रभागसे उस शूलके टुकड़े-टुकड़े करके सहसा अश्विनीकुमारके पास आ पहुँचा, मानो गरुड़ सर्पके पास आ गये हों

अध्याय 240

श्लोक 67

सोऽन्तरिक्षात्समुत्पत्य विधूय महतीं गदाम् ।नासत्योपरि चिक्षेप गिरिशृङ्गोपमां बली

so'ntarikṣātsamutpatya vidhūya mahatīṃ gadām | nāsatyopari cikṣepa giriśṛṅgopamāṃ balī

हिन्दी अर्थ

उस बलवान्‌ वीरने अन्तरिक्षसे उछलकर पर्वतशिखरके समान उस विशाल गदाको घुमाकर नासत्यके ऊपर दे मारा

अध्याय 240

श्लोक 68

गदयाभिहतः सोऽश्वी त्यक्त्वा शूलमनुत्तमम् ।प्रयातः सहसा तत्र यत्र युध्यति वासवः

gadayābhihataḥ so'śvī tyaktvā śūlamanuttamam | prayātaḥ sahasā tatra yatra yudhyati vāsavaḥ

हिन्दी अर्थ

उस गदासे आहत होकर अश्वी (नासत्य) अपने परम उत्तम शूलको त्यागकर सहसा उस स्थानको भाग गये जहाँ इन्द्र युद्ध कर रहे थे

अध्याय 240

श्लोक 69

पराजित्य तु सङ्ग्रामे अश्विनं भीमविक्रमम् ।जयश्रिया सेव्यमानो वृत्रो युद्धे व्यवस्थितः

parājitya tu saṅgrāme aśvinaṃ bhīmavikramam | jayaśriyā sevyamāno vṛtro yuddhe vyavasthitaḥ

हिन्दी अर्थ

भयंकर पराक्रमी अश्वीको युद्धमें पराजित करके विजयलक्ष्मीसे सेवित वृत्रासुर उस समरभूमिमें स्थिरभावसे खड़ा हो गया

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.