Harivamsha Purana
244
अध्याय 244 / 318

Parva 3, Adhyāya 61

44 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ44 श्लोक

अध्याय 244

श्लोक 1

वरुणस्य विप्रचित्तेः सार्द्धं युद्धं पराजयं च विप्रचित्तिस्तु वरुणं दैत्यानामादिरव्ययम् ।जघानेषुगणैः क्रुद्धो दीप्तैरिव महोरगैः

varuṇasya vipracitteḥ sārddhaṃ yuddhaṃ parājayaṃ ca vipracittistu varuṇaṃ daityānāmādiravyayam | jaghāneṣugaṇaiḥ kruddho dīptairiva mahoragaiḥ

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! दैत्योंके आदि पुरुष विप्रचित्तिने अविनाशी देवता वरुणकों क्रोधपूर्वक अपने बाणसमूहोंसे घायल कर दिया। उसके वे बाण तेजस्वी सर्पोंक॑ समान जान पड़ते थे

अध्याय 244

श्लोक 2

स दह्यमानो दैत्येन दीप्तैः शरगभस्तिभिः ।नाभ्यजानत कर्तव्यं सङ्ग्रामे स जलेश्वरः

sa dahyamāno daityena dīptaiḥ śaragabhastibhiḥ | nābhyajānata kartavyaṃ saṅgrāme sa jaleśvaraḥ

हिन्दी अर्थ

वह दैत्य जब बाणरूपी दीसिंमान्‌ किरणोंसे वरुणकों दग्ध करने लगा, उस समय संग्राममें खडे हुए जलेश्वर वरुण यह भी न समझ सके कि अब मुझे क्या करना चाहिये

अध्याय 244

श्लोक 3

सर्वलोकेश्वरस्येव परमेष्ठी प्रजापतिः ।न शक्नोत्यग्रतः स्थातुं विप्रचित्तेर्जलाधिपः

sarvalokeśvarasyeva parameṣṭhī prajāpatiḥ | na śaknotyagrataḥ sthātuṃ vipracitterjalādhipaḥ

हिन्दी अर्थ

जैसे सर्वलोकेथ्र परमात्माके समक्ष प्रजापति परमेष्ठी नहीं ठहर सकते, इसी प्रकार दानवराज विप्रचित्तिके आगे जलके स्वामी वरुण नहीं ठहर सके

अध्याय 244

श्लोक 4

वज्रो नाम महाव्यूहो निर्भयः सर्वतोमुखः ।तं व्यूह्य प्रत्ययुध्यन्त दानवा देववाहिनीम्

vajro nāma mahāvyūho nirbhayaḥ sarvatomukhaḥ | taṃ vyūhya pratyayudhyanta dānavā devavāhinīm

हिन्दी अर्थ

वर नामक महान्‌ व्यूहका मुख सब ओर होता है, वह सर्वथा निर्भय हुआ करता है। उसी व्यूहका आश्रय लेकर दानव-योद्धा देवसेनाके साथ युद्ध करने लगे

अध्याय 244

श्लोक 5

वह्निज्वालासमं तत्र रविमण्डलसन्निभम् ।मुखमाभाति दैत्यस्य विप्रचित्तेर्महात्मनः

vahnijvālāsamaṃ tatra ravimaṇḍalasannibham | mukhamābhāti daityasya vipracittermahātmanaḥ

हिन्दी अर्थ

महामनस्वी विप्रचित्ति नामक दैत्यका मुख वहाँ अग्रिज्वाला तथा सूर्यमण्डलके समान प्रकाशित होता था

अध्याय 244

श्लोक 6

वरुणस्तु महातेजा विप्रचित्तिं महासुरम् ।प्रदहन्निव तेजोभिर्जिगीषुः प्रत्यवैक्षत

varuṇastu mahātejā vipracittiṃ mahāsuram | pradahanniva tejobhirjigīṣuḥ pratyavaikṣata

हिन्दी अर्थ

महातेजस्वी वरुणने विजयकी इच्छा मनमें लेकर विप्रचित्ति नामक महानू असुरकी ओर इस प्रकार देखा, मानो वे अपने तेजसे उसको दग्ध कर डालेंगे

अध्याय 244

श्लोक 7

स्रग्दाममालाभरणः केयूराङ्गदभूषणः ।जग्राह परिघं दैत्यः कैलासशिखरोपमम्

sragdāmamālābharaṇaḥ keyūrāṅgadabhūṣaṇaḥ | jagrāha parighaṃ daityaḥ kailāsaśikharopamam

हिन्दी अर्थ

दैत्य विप्रचित्ति फूलोंके हार तथा सुवर्ण आदिकी मालाओंसे अलंकृत था। उसकी भुजाओंमें केयूर तथा अज्ञद नामक आभूषण शोभा दे रहे थे। उसने कैलासशिखरके समान एक परिघ हाथमें लिया

अध्याय 244

श्लोक 8

पिनद्धं काञ्चनैः पट्टैर्हेममालिनमायसम् ।यमदण्डोपमं घोरं दैत्यानां भयनाशनम्

pinaddhaṃ kāñcanaiḥ paṭṭairhemamālinamāyasam | yamadaṇḍopamaṃ ghoraṃ daityānāṃ bhayanāśanam

हिन्दी अर्थ

उसपर सोनेके पत्र जड़े हुए थे। वह परिघ लोहेका बना हुआ था और सोनेकी मालासे अलंकृत था। देखनेमें यमदण्डके समान भयंकर था, किंतु दैत्योंके भयका नाश करनेवाला था

अध्याय 244

श्लोक 9

भ्रामयामास सङ्क्रुद्धो महाशक्रध्वजोपमम् ।विननाद विवृत्तास्यो विप्रचित्तिर्महासुरः

bhrāmayāmāsa saṅkruddho mahāśakradhvajopamam | vinanāda vivṛttāsyo vipracittirmahāsuraḥ

हिन्दी अर्थ

महान्‌ असुर विप्रचित्तिने अत्यन्त कुपित होकर इन्द्रध्वजके समान उस विशाल परिघको घुमाया और मुँह फैलाकर बड़ी जोर-जोरसे गर्जना की

अध्याय 244

श्लोक 10

स कण्ठस्थेन निष्केण भुजस्थैरपि चाङ्गदैः ।कुण्डलाभ्यां विचित्राभ्यां भ्राजते काञ्चनस्रजा

sa kaṇṭhasthena niṣkeṇa bhujasthairapi cāṅgadaiḥ | kuṇḍalābhyāṃ vicitrābhyāṃ bhrājate kāñcanasrajā

हिन्दी अर्थ

उसके कण्ठमें सुवर्णमय पदक, भुजाओंमें बाजूबंद, कानोंमें विचित्र कुण्डल तथा वक्ष:स्थलपर सोनेके हार सुशोभित थे, जिनसे वह दानव प्रकाशित हो रहा था

अध्याय 244

श्लोक 11

दानवो भूषणैर्भाति परिघेणायसेन च ।यथेन्द्रधनुषा मेघः सविद्युत्स्तनयित्नुमान्

dānavo bhūṣaṇairbhāti parigheṇāyasena ca | yathendradhanuṣā meghaḥ savidyutstanayitnumān

हिन्दी अर्थ

लोहेके परिघ और सोनेके आभूषणों से युक्त वह दानव इन्द्रधनुष, विद्युत्‌ और गर्जनासे युक्त मेघके समान शोभा पा रहा था

अध्याय 244

श्लोक 12

प्रस्फुरन् परिघास्त्रेण वातस्कन्धान्महास्वनः ।जज्वाल च सधूमार्चिः साङ्कर्षण इवानलः

prasphuran parighāstreṇa vātaskandhānmahāsvanaḥ | jajvāla ca sadhūmārciḥ sāṅkarṣaṇa ivānalaḥ

हिन्दी अर्थ

परिघ नामक अस्त्रसे वायुसमूहोंको संचालित करते हुए जोर-जोरसे सिंहनाद करनेवाला वह दैत्य धूम और ज्वालाओंसहित प्रलयकालीन अग्िके समान प्रज्वलित हो उठा

अध्याय 244

श्लोक 13

विद्याधरगणैः सार्धं गन्धर्वनगरैरपि ।सह चैवामरावत्या सिद्धलोकैस्तथा सह

vidyādharagaṇaiḥ sārdhaṃ gandharvanagarairapi | saha caivāmarāvatyā siddhalokaistathā saha

श्लोक 13–14 का हिन्दी अर्थ

विद्याधरगण, गन्धर्वनगर, अमरावती पुरी तथा सिद्धलोकोंके साथ ग्रह-नक्षत्रोंसहित एवं सूर्य और चन्द्रमासे विभूषित आकाश उस दैत्यराजके परिघसे उद्भ्रान्त होकर चक्कर- सा काटने लगा

अध्याय 244

श्लोक 14

ग्रहनक्षत्रसहितं सार्कचन्द्रविभूषितम् ।दैत्येन्द्रपरिघोद्धूतं भ्रमतीव नभस्तलम्

grahanakṣatrasahitaṃ sārkacandravibhūṣitam | daityendraparighoddhūtaṃ bhramatīva nabhastalam

अर्थ श्लोक 13 के साथ

अध्याय 244

श्लोक 15

दुरासदः सुसञ्जज्ञे परिघाभरणक्षमः ।सुरेन्धनोऽसुरेन्द्राग्निर्युगान्ताग्निरिवोत्थितः

durāsadaḥ susañjajñe parighābharaṇakṣamaḥ | surendhano'surendrāgniryugāntāgnirivotthitaḥ

हिन्दी अर्थ

परिघको धारण करने और सब ओर घुमानेमें समर्थ वह दैत्य दुर्जय हो गया था। अग्रिके समान तेजस्वी वह असुरराज विप्रचित्ति प्रलयकालकी आगके समान उठ खड़ा हुआ था, देवता उसकी आँचसे ईँधनकी भाँति जल रहे थे

अध्याय 244

श्लोक 16

त्रिदशा वरुणश्चैव न शेकुः स्पन्दितुं भयात् ।तत्रासीन्निर्भयस्त्वेकः कौशिको वासवः प्रभुः

tridaśā varuṇaścaiva na śekuḥ spandituṃ bhayāt | tatrāsīnnirbhayastvekaḥ kauśiko vāsavaḥ prabhuḥ

हिन्दी अर्थ

देवता और वरुण उसके भयके मारे हिल-डुल भी न सके । वहाँ एकमात्र सामर्थ्यशाली कौशिक इन्द्र ही निर्भय खड़े रहे

अध्याय 244

श्लोक 17

भास्करप्रतिमं घोरं परिघं रौद्रदर्शनम् ।पातयामास सेनायां जलेशस्य स दानवः

bhāskarapratimaṃ ghoraṃ parighaṃ raudradarśanam | pātayāmāsa senāyāṃ jaleśasya sa dānavaḥ

हिन्दी अर्थ

उस दानवने उस सूर्यतुल्य तेजस्वी घोर परिघको, जो देखनेमें बड़ा ही भयंकर था, जलेश्वर वरुणकी सेनामें गिराया

अध्याय 244

श्लोक 18

पतता तेन सङ्ग्रामे जलेशस्य महात्मनः ।भूतानां शतसाहस्रं परिघेण समाहतम् ।तेषां गात्राणि चासाद्य व्यशीर्यन्त सहस्रशः

patatā tena saṅgrāme jaleśasya mahātmanaḥ | bhūtānāṃ śatasāhasraṃ parigheṇa samāhatam | teṣāṃ gātrāṇi cāsādya vyaśīryanta sahasraśaḥ

हिन्दी अर्थ

संग्रामभूमिमें वहाँ गिरते हुए उस परिघने महात्मा वरुणके एक लाख भूतोंको हताहत कर दिया। उस परिघसे टकराकर उनके शरीरोंके सहस्रों टुकड़े हो गये

अध्याय 244

श्लोक 19

विशीर्यमाणं विबभावुल्काशतमिवाम्बरे ।भूयश्चैनं तदाऽऽभ्राम्य वरुणाय न्यपातयत्

viśīryamāṇaṃ vibabhāvulkāśatamivāmbare | bhūyaścainaṃ tadā''bhrāmya varuṇāya nyapātayat

हिन्दी अर्थ

जीर्ण-शीर्ण होते हुए वरुणके सैनिक आकाशमें सैकड़ों उल्काओंके समान प्रतीत हो रहे थे। तदनन्तर विप्रचित्तिने पुन: उस परिघको घुमाकर वरुणपर दे मारा

अध्याय 244

श्लोक 20

पात्यमाने तदा तस्मिञ्छरीरे वारुणे तदा ।स भिन्नः परिघो घोरो देवगात्रे व्यशीर्यत

pātyamāne tadā tasmiñcharīre vāruṇe tadā | sa bhinnaḥ parigho ghoro devagātre vyaśīryata

हिन्दी अर्थ

मोड वरुणके शरीरपर पड़ते ही उस परिघके टुकड़े- टुकड़े हो गये। वह भयंकर परिघ वरुणदेवके शरीरसे टकराकर टूक-टूक हो गया

अध्याय 244

श्लोक 21

शीर्यमाणस्य चूर्णानि खद्योता इव चाम्बरे ।स तु तेन प्रहारेण न चचाल जलाधिपः

śīryamāṇasya cūrṇāni khadyotā iva cāmbare | sa tu tena prahāreṇa na cacāla jalādhipaḥ

श्लोक 21–23 का हिन्दी अर्थ

जीर्ण-शीर्ण होकर गिरते हुए उस परिघके चूर्ण आकाशमें खद्योतोंके समान प्रकाशित होते थे। उस प्रहारसे जलेधर वरुण विचलित नहीं हुए। परिघकी मार खाकर भी वे युद्धमें वज़से आहत हुए पर्वतकी भाँति स्थिरभावसे खड़े रहे। युद्धस्थलमें अपने सैनिकोंके भग्र एवं घायल होनेपर अमर्षशील जलेश्वर वरुणको दो घड़ीतक बड़ा क्षोभ रहा। वे अमित पराक्रमी वरुण अमर्षमें भर गये

अध्याय 244

श्लोक 22

परिघेण हतः सङ्ख्ये यथा वज्रहतोऽचलः ।स्वसैन्येष्वपि भग्नेषु भिन्नदेहेषु चाहवे

parigheṇa hataḥ saṅkhye yathā vajrahato'calaḥ | svasainyeṣvapi bhagneṣu bhinnadeheṣu cāhave

अर्थ श्लोक 21 के साथ

अध्याय 244

श्लोक 23

मुहूर्तमगमत् क्षोभमपाम्पतिरमर्षणः ।सोऽमर्षं च समापन्नो वरुणोऽमितविक्रमः

muhūrtamagamat kṣobhamapāmpatiramarṣaṇaḥ | so'marṣaṃ ca samāpanno varuṇo'mitavikramaḥ

अर्थ श्लोक 21 के साथ

अध्याय 244

श्लोक 24

सर्वसंहारमकरोत् स्वपक्षस्यारिमर्दनः ।स सागरैश्चतुर्भिश्च वृतो दीप्तैश्च पन्नगैः

sarvasaṃhāramakarot svapakṣasyārimardanaḥ | sa sāgaraiścaturbhiśca vṛto dīptaiśca pannagaiḥ

श्लोक 24–25 का हिन्दी अर्थ

तत्पश्चात्‌ शत्रुमर्दन वरुणने अपने पक्षके सभी लोगोंको पूर्णत: संगठित किया। वे जलमय शरीर धारण करके शड्डों और मुक्तामणियोंसे विभूषित हुए। उस समय चारों समुद्र उन्हें घेरकर खड़े हो गये। तेजस्वी सर्पोने भी उनका साथ दिया। उनके श्वेत वस्त्र हवासे हिल रहे थे तथा वे नाना प्रकारके रत्लोंसे अलंकृत थे

अध्याय 244

श्लोक 25

शङ्खमुक्तामणिचितो बिभ्रत्तोयमयं वपुः ।पाण्डुरोद्भूतवसनो नानारत्नविभूषितः

śaṅkhamuktāmaṇicito bibhrattoyamayaṃ vapuḥ | pāṇḍurodbhūtavasano nānāratnavibhūṣitaḥ

अर्थ श्लोक 24 के साथ

अध्याय 244

श्लोक 26

वरुणः पाशधृक्छ्रीमान् कूर्ममीनसमाकुलः ।वरुणस्तु तदा क्रुद्धस्तान्निरीक्ष्य स्वसैनिकान्

varuṇaḥ pāśadhṛkchrīmān kūrmamīnasamākulaḥ | varuṇastu tadā kruddhastānnirīkṣya svasainikān

श्लोक 26–27 का हिन्दी अर्थ

कछुओं और मत्स्योंसे व्याप्त हुए पाशधारी श्रीमान्‌ वरुणदेवने कुपित हो अपने सैनिकोंकी ओर देखकर कहा-वीरो! तुमलोग दानवोंके वधकी इच्छासे युद्ध | करो। मैं इस दानवका वध करूँगा। तुमलोग भय _ छोड़कर युद्धमें डटे रहो'

अध्याय 244

श्लोक 27

उवाच दृष्ट्वा युध्यध्वं दानवानां जिघांसया ।अहमेनं हनिष्यामि भयं मुक्त्वा तु युध्यत

uvāca dṛṣṭvā yudhyadhvaṃ dānavānāṃ jighāṃsayā | ahamenaṃ haniṣyāmi bhayaṃ muktvā tu yudhyata

अर्थ श्लोक 26 के साथ

अध्याय 244

श्लोक 28

ततस्ते पन्नगाः सर्वे महार्णवजलाश्रयाः ।जघ्नुर्दैत्यान् रणमुखे नदन्तो जयगृद्धिनः

tataste pannagāḥ sarve mahārṇavajalāśrayāḥ | jaghnurdaityān raṇamukhe nadanto jayagṛddhinaḥ

हिन्दी अर्थ

तब महासागरके _ जलमें निवास करनेवाले समस्त सर्प विजयकी अभिलाषासे सिंहनाद करते हुए युद्धके मुहानेपर दैत्योंका संहार करने लगे

अध्याय 244

श्लोक 29

ते तु नालीकनाराचैर्गदाभिर्मुसलैस्तथा ।अभ्यघ्नन् दानवान् हृष्टा मुदिता वरुणानुगाः

te tu nālīkanārācairgadābhirmusalaistathā | abhyaghnan dānavān hṛṣṭā muditā varuṇānugāḥ

हिन्दी अर्थ

हर्ष और उल्लासमें भरे हुए वरुणके उन सैनिकोंने नालीक, नाराच, गदा और मुसलोंद्वारा दानवोंको मारना आरम्भ किया

अध्याय 244

श्लोक 30

विप्रचित्तिस्तु सङ्क्रुद्धो महाबलपराक्रमः ।पन्नगानां शरीराणि व्यधमद् युद्धदुर्मदः

vipracittistu saṅkruddho mahābalaparākramaḥ | pannagānāṃ śarīrāṇi vyadhamad yuddhadurmadaḥ

हिन्दी अर्थ

तब महान्‌ बल और पराक्रमसे सम्पन्न रणदुर्मद विप्रचित्ति अत्यन्त कुपित हो सर्पोके शरीरोंका विनाश करने लगा

अध्याय 244

श्लोक 31

गरुडेनापि चास्त्रेण पन्नगान् दानवोत्तमः ।समरे घातयामास गरुडैः पन्नगाशनैः

garuḍenāpi cāstreṇa pannagān dānavottamaḥ | samare ghātayāmāsa garuḍaiḥ pannagāśanaiḥ

श्लोक 31–34 का हिन्दी अर्थ

उस दानव- शिरोमणिने गरुडास्त्रका प्रयोग करके सर्पभोजी गरुड़ोंद्वारा समराड्णमें सर्पोका संहार करा दिया

अध्याय 244

श्लोक 32

स शरैः सूर्यसङ्काशैः शातकुम्भविभूषितैः ।पन्नगान् समरे वीरः प्रममाथ सुदुर्जयान्

sa śaraiḥ sūryasaṅkāśaiḥ śātakumbhavibhūṣitaiḥ | pannagān samare vīraḥ pramamātha sudurjayān

अर्थ श्लोक 31 के साथ

अध्याय 244

श्लोक 33

समरे भिन्नगात्रास्ते पन्नगाः शरपीडिताः ।पेतुर्मथितसर्वाङ्गा गजा इव महागजैः

samare bhinnagātrāste pannagāḥ śarapīḍitāḥ | peturmathitasarvāṅgā gajā iva mahāgajaiḥ

अर्थ श्लोक 31 के साथ

अध्याय 244

श्लोक 34

तपन्तं तमिवादित्यं दीप्तैर्बाणगभस्तिभिः ।अभ्यधावत सङ्क्रुद्धः समरे वरुणः प्रभुः

tapantaṃ tamivādityaṃ dīptairbāṇagabhastibhiḥ | abhyadhāvata saṅkruddhaḥ samare varuṇaḥ prabhuḥ

अर्थ श्लोक 31 के साथ

अध्याय 244

श्लोक 35

ततस्तु दानवास्तत्र भिन्नदेहाः सहस्रशः ।व्यथिता विद्रवन्ति स्म दिशो दश विचेतसः

tatastu dānavāstatra bhinnadehāḥ sahasraśaḥ | vyathitā vidravanti sma diśo daśa vicetasaḥ

हिन्दी अर्थ

फिर तो उनके द्वारा शरीर छिन्न-भिन्न हो जानेके कारण वहाँ पीड़ित हुए सहस्रों दानव अचेत-से होकर दसों दिशाओंमें भागने लगे

अध्याय 244

श्लोक 36

इन्द्रस्यार्थे पराक्रम्य वरुणस्त्यक्तजीवितः ।विनर्दमानो युयुधे समरे पाशभृद्वरः

indrasyārthe parākramya varuṇastyaktajīvitaḥ | vinardamāno yuyudhe samare pāśabhṛdvaraḥ

हिन्दी अर्थ

पाशधारियोंमें श्रेष्ठ वरुणदेव जीवनका मोह छोड़कर पराक्रमपूर्वक गर्जना करते हुए समरभूमिमें इन्द्रके लिये युद्ध करने लगे

अध्याय 244

श्लोक 37

वरुणः पन्नगाश्चैव मुष्टिभिः समरोत्कटाः ।अभ्यवर्तन्त समरे विप्रचित्तिं महासुरम्

varuṇaḥ pannagāścaiva muṣṭibhiḥ samarotkaṭāḥ | abhyavartanta samare vipracittiṃ mahāsuram

हिन्दी अर्थ

वरुण और सर्प युद्धमें उन्मत्त होकर लड़नेवाले थे; वे शत्रुओंपर मुक्कोंका प्रहार करते हुए संग्रामभूमिमें महान्‌ असुर विप्रचित्तिका सामना करने लगे

अध्याय 244

श्लोक 38

ततोऽस्त्रैश्च शिलाभिश्च प्राहरत् स बलोत्कटः ।व्यपोहत महातेजा विप्रचित्तिर्महासुरः

tato'straiśca śilābhiśca prāharat sa balotkaṭaḥ | vyapohata mahātejā vipracittirmahāsuraḥ

हिन्दी अर्थ

तत्पश्चात्‌ उत्कट बलशाली, महातेजस्वी महान्‌ असुर विप्रचित्तिने अस्त्रों और शिलाओंद्वारा प्रहार किया और शत्रु ओंको मार भगाया

अध्याय 244

श्लोक 39

ततः पावकसङ्काशैः स मुक्तैः शीघ्रगामिभिः ।वरुणस्य महावेगान् बिभेद समरे हयान्

tataḥ pāvakasaṅkāśaiḥ sa muktaiḥ śīghragāmibhiḥ | varuṇasya mahāvegān bibheda samare hayān

हिन्दी अर्थ

उसने अपने धनुषसे छूटे हुए अग्ितुल्य तेजस्वी एवं शीघ्रगामी बाणोंद्वारा वरुणके महान्‌ वेगशाली घोड़ोंको समराज्णमें क्षत-विक्षत कर दिया

अध्याय 244

श्लोक 40

कर्मणा तेन महता विप्रचित्तेर्महात्मनः ।अग्नेराज्याहुतस्येव तेजः समभिवर्धत

karmaṇā tena mahatā vipracittermahātmanaḥ | agnerājyāhutasyeva tejaḥ samabhivardhata

हिन्दी अर्थ

जैसे घीकी आहुति देनेसे अग्रिका तेज बढ़ता है, उसी प्रकार उस महान्‌ कर्मसे महामनस्वी विप्रचित्तिका तेज एवं प्रताप बढ़ने लगा

अध्याय 244

श्लोक 41

स शरैः सूर्यसङ्काशैः सुमुक्तैः शीघ्रगामिभिः ।वारुणीं तां महासेनां निर्ममन्थ महाबलः

sa śaraiḥ sūryasaṅkāśaiḥ sumuktaiḥ śīghragāmibhiḥ | vāruṇīṃ tāṃ mahāsenāṃ nirmamantha mahābalaḥ

हिन्दी अर्थ

उस महाबली दानवने भली भाँति छोड़े गये शीघ्रगामी एवं सूर्यतुल्य तेजस्वी बाणोंद्वारा वरुणदेवकी उस विशाल सेनाको मथ डाला

अध्याय 244

श्लोक 42

क्षीणास्त्रां सायकाक्रान्तां शरजालेन मोहिताम् ।शूलशक्त्यृष्टिभिन्नां च चकार रुधिरोक्षिताम्

kṣīṇāstrāṃ sāyakākrāntāṃ śarajālena mohitām | śūlaśaktyṛṣṭibhinnāṃ ca cakāra rudhirokṣitām

हिन्दी अर्थ

उसने वरुणके सैनिकोंके अस्त्र-शस्त्र काट डाले, उन्हें सायकोंसे आक्रान्त कर दिया; वे सब-के-सब उसके बाणजालसे आच्छादित होकर मोहके वशीभूत हो गये, विप्रचित्तिन उन सबको शूल, शक्ति और ऋषि आदि शस्त्रोंसे घायल करके खूनसे लथपथ कर दिया

अध्याय 244

श्लोक 43

स शेरैर्वह्निसङ्काशैः सुमुक्तैर्नतपर्वभिः ।वरुणस्य महावेगान् बिभेद समरे हयान्

sa śerairvahnisaṅkāśaiḥ sumuktairnataparvabhiḥ | varuṇasya mahāvegān bibheda samare hayān

हिन्दी अर्थ

उस दानवने उत्तम रीतिसे छोड़े गये झुकी हुई गाँठवाले अग्रितुल्य तेजस्वी बाणोंद्वारा समरभूमिमें वरुण देवताके महान्‌ वेगशाली घोड़ोंको घायल कर दिया

अध्याय 244

श्लोक 44

अभिद्रुतोऽथ दैत्येन ससैन्यः सलिलाधिपः ।महेन्द्रं शरणं प्राप्तो विप्रचित्तेर्भयार्दितः

abhidruto'tha daityena sasainyaḥ salilādhipaḥ | mahendraṃ śaraṇaṃ prāpto vipracitterbhayārditaḥ

हिन्दी अर्थ

उस दैत्यने जलके स्वामी वरुणको सेनासहित वहाँसे भाग जानेको विवश कर दिया। वे विप्रचित्तिके भयसे पीड़ित हो देवराज इन्द्रकी शरणमें चले गये

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

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Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.