अध्याय 251
श्लोक 1
कश्यपेन परमपुरुषस्य परमात्मनः स्तवनं नमोऽस्तु देवदेवेश एकशृङ्ग वराह वृषार्चिष वृषसिन्धो वृषाकपे सुरवृषभ सुरनिर्मित अनिर्मित भद्रकपिल विष्वक्सेन ध्रुव धर्म धर्मराज वैकुण्ठ त्रेतावर्त अनादिमध्यनिधन धनञ्जय शुचिश्रवः अग्निज वृष्णिज अज अजयामृतेशय सनातन विधातस्त्रिकाम त्रिधाम त्रिककुत् ककुद्मिन् दुन्दुभे महानाभ लोकनाभ पद्मनाभ विरिञ्चे वरिष्ठ बहुरूप विरूप विश्वरूपाक्षयाक्षर सत्याक्षर हंसाक्षर हव्यभुक् खण्डपरशो शुक्र मुञ्जकेश हंस महाहंस महदक्षर हृषीकेश सूक्ष्म परसूक्ष्म तुराषाड् विश्वमूर्ते सुराग्रज नील निस्तमो विरजस्तमोरजःसत्त्वधाम सर्वलोकप्रतिष्ठ शिपिविष्ट सुतपस्तपोऽग्र अग्र अग्रज धर्मनाभ गभस्तिनाभ धर्मनेमे सत्यधाम सत्याक्षर गभस्तिनेमे विपाप्मन् चन्द्ररथ त्वमेव समुद्रवासाः अजैकपात् सहस्रशीर्षं सहस्रसम्मित महाशीर्ष सहस्रदृक् सहस्रपात् अधोमुख महामुख महापुरुष पुरुषोत्तम सहस्रबाहो सहस्रमूर्ते सहस्रास्य सहस्राक्ष सहस्रभुज सहस्रभव सहस्रशस्त्वामाहुर्वेदाः
kaśyapena paramapuruṣasya paramātmanaḥ stavanaṃ namo'stu devadeveśa ekaśṛṅga varāha vṛṣārciṣa vṛṣasindho vṛṣākape suravṛṣabha suranirmita anirmita bhadrakapila viṣvaksena dhruva dharma dharmarāja vaikuṇṭha tretāvarta anādimadhyanidhana dhanañjaya śuciśravaḥ agnija vṛṣṇija aja ajayāmṛteśaya sanātana vidhātastrikāma tridhāma trikakut kakudmin dundubhe mahānābha lokanābha padmanābha viriñce variṣṭha bahurūpa virūpa viśvarūpākṣayākṣara satyākṣara haṃsākṣara havyabhuk khaṇḍaparaśo śukra muñjakeśa haṃsa mahāhaṃsa mahadakṣara hṛṣīkeśa sūkṣma parasūkṣma turāṣāḍ viśvamūrte surāgraja nīla nistamo virajastamorajaḥsattvadhāma sarvalokapratiṣṭha śipiviṣṭa sutapastapo'gra agra agraja dharmanābha gabhastinābha dharmaneme satyadhāma satyākṣara gabhastineme vipāpman candraratha tvameva samudravāsāḥ ajaikapāt sahasraśīrṣaṃ sahasrasammita mahāśīrṣa sahasradṛk sahasrapāt adhomukha mahāmukha mahāpuruṣa puruṣottama sahasrabāho sahasramūrte sahasrāsya sahasrākṣa sahasrabhuja sahasrabhava sahasraśastvāmāhurvedāḥ
हिन्दी अर्थ
ी5ध्याय: शीाजाा परमात्माका स्तवन कश्यपने कहा—देवदेवेश्वर ! आपको नमस्कार है। आप एक सींग धारण करनेवाले मत्स्य एवं वराहरूप हैं । धर्ममयी किरणोंसे प्रकाशित होते हैं। धर्मके सागर हैं। जलका वर्षण और शोषण करनेवाले सूर्य हैं। देवताओंमें श्रेष्ठ हैं। देवताओंके खरष्टा हैं। आपका किसी अन्यसे निर्माण नहीं हुआ है—आप नित्यसिद्ध हैं। कल्याणमय कपिलस्वरूप हैं। युद्धके लिये की हुई तैयारीमात्रसे ही आप दैत्यसेनाको तितर-बितर कर डालते हैं। आप ध्रुव, धर्म, धर्मराज एवं वैकुण्ठधामके अधिपति हैं। गाहपत्यादि त्रिविध अग्िके आवर्तक, आदि, मध्य और अन्तसे रहित, धनझय (अग्नि), पवित्र त्रीरतिवाले, अग्निज (कार्तिकेयस्वरूप), वृष्णिज ( श्रीकृष्ण), अजन्मा, अजय (अपराजित), अमृतेशय (जलमें शयन करनेवाले) और सनातन पुरुष हैं। आप ही विधाता, त्रकाम (तीनों लोकोंकी कामनाके विषय अथवा तीनों तरेदोंकी श्रुतियोंके लिये कमनीय), त्रिधाम (त्रिलोकीके भाश्रय), त्रिककुद् (धर्म, ज्ञान और वैराग्यरूप तीन फेंधोंवाले ), ककुदी (मोटे कंधेवाले ), दुन्दुभे (विजयघोष करनेवाले वाद्यरूप), महानाभ (बड़ी नाभिवाले), नोकनाभ (अपने नाभिकमलसे सम्पूर्ण लोकको प्रकट करनेवाले ), पद्मनाभ (अपनी नाभिसे कमलको प्रकट करनेवाले ), विरिश्लि (ब्रह्मस्वरूप), वरिष्ठ (सर्वश्रेष्ठ ), हुरूपधारी, विरूप (विविध रूप धारण करनेवाले), वश्वरूप, अक्षय, अक्षर (अविनाशी), सत्याक्षर (सत्य [वं अविनाशी अथवा सत्य अक्षरवाले वेदरूप), साक्षर (अजपा मन्त्रूप), हव्यभोक्ता (अग्नि), खण्डपरशु शिव), शुक्र (बलवीर्यरूप), मुज्ञकेश (मूँजके समान फेशवाले), हंस और महाहंस हैं। महान् अक्षर प्रणव, न्द्रियोंके प्रेरक, सूक्ष्म, परमसूक्ष्म, इन्द्र, विश्वरूप, रेवताओंके अग्रज, नीलवर्ण, तमोगुण और रजोगुणसे हित, तमोगुण, रजोगुण और सत्त्वगुणके आश्रय, सम्पूर्ण नोकोंमें प्रतिष्ठित, शिपिविष्ट (सूर्य-किरणोंमें स्थित हनेवाले), उत्तम तपस्यावाले, श्रेष्ठ तपोरूप, अग्र सबके आदि), अग्रज (सबसे प्रथम प्रकट), धर्मनाभ + ११९९ ( धर्मस्वरूप नाभिवाले), गभस्तिनाभ (किरणमयी नाभिवाले ), धर्मनेमि ( धर्मचक्रके प्रवर्तक), सत्यधाम (वैकुण्ठस्वरूप ), सत्याक्षर (वेदस्वरूप), गभस्तिनेमि ( रश्मिमण्डलसे प्रकाशित), पापरहित तथा चन्द्र (समग्र मन) -रूपी रथपर आरूढ़ परमेश्वर ! आप ही समुद्रवासा (समुद्ररूपी वस्त्र धारण करनेवाले) हैं। आप ही अजैकपात् (ग्यारह रुद्रोंमेंसे एक अथवा पूर्वभाद्रपदानक्षत्र), सहस्रों पस्तकवाले, सहस्रसंख्यक, महान् मस्तक धारण करनेवाले, सहस्रनेत्र, सहस्रचरण, अधोमुख, महामुख, महापुरुष, पुरुषोत्तम, सहस्रबाहु, सहस्रमूर्ति, सहस्रमुख, सहस्रलोचन, सहस्रभुज तथा सहस्रों रूपोंमें प्रकट होनेवाले हैं, वेद आपका सहस्रों प्रकारसे वर्णन करते हैं