Harivamsha Purana
251
अध्याय 251 / 318

Parva 3, Adhyāya 68

7 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ7 श्लोक

अध्याय 251

श्लोक 1

कश्यपेन परमपुरुषस्य परमात्मनः स्तवनं नमोऽस्तु देवदेवेश एकशृङ्ग वराह वृषार्चिष वृषसिन्धो वृषाकपे सुरवृषभ सुरनिर्मित अनिर्मित भद्रकपिल विष्वक्सेन ध्रुव धर्म धर्मराज वैकुण्ठ त्रेतावर्त अनादिमध्यनिधन धनञ्जय शुचिश्रवः अग्निज वृष्णिज अज अजयामृतेशय सनातन विधातस्त्रिकाम त्रिधाम त्रिककुत् ककुद्मिन् दुन्दुभे महानाभ लोकनाभ पद्मनाभ विरिञ्चे वरिष्ठ बहुरूप विरूप विश्वरूपाक्षयाक्षर सत्याक्षर हंसाक्षर हव्यभुक् खण्डपरशो शुक्र मुञ्जकेश हंस महाहंस महदक्षर हृषीकेश सूक्ष्म परसूक्ष्म तुराषाड् विश्वमूर्ते सुराग्रज नील निस्तमो विरजस्तमोरजःसत्त्वधाम सर्वलोकप्रतिष्ठ शिपिविष्ट सुतपस्तपोऽग्र अग्र अग्रज धर्मनाभ गभस्तिनाभ धर्मनेमे सत्यधाम सत्याक्षर गभस्तिनेमे विपाप्मन् चन्द्ररथ त्वमेव समुद्रवासाः अजैकपात् सहस्रशीर्षं सहस्रसम्मित महाशीर्ष सहस्रदृक् सहस्रपात् अधोमुख महामुख महापुरुष पुरुषोत्तम सहस्रबाहो सहस्रमूर्ते सहस्रास्य सहस्राक्ष सहस्रभुज सहस्रभव सहस्रशस्त्वामाहुर्वेदाः

kaśyapena paramapuruṣasya paramātmanaḥ stavanaṃ namo'stu devadeveśa ekaśṛṅga varāha vṛṣārciṣa vṛṣasindho vṛṣākape suravṛṣabha suranirmita anirmita bhadrakapila viṣvaksena dhruva dharma dharmarāja vaikuṇṭha tretāvarta anādimadhyanidhana dhanañjaya śuciśravaḥ agnija vṛṣṇija aja ajayāmṛteśaya sanātana vidhātastrikāma tridhāma trikakut kakudmin dundubhe mahānābha lokanābha padmanābha viriñce variṣṭha bahurūpa virūpa viśvarūpākṣayākṣara satyākṣara haṃsākṣara havyabhuk khaṇḍaparaśo śukra muñjakeśa haṃsa mahāhaṃsa mahadakṣara hṛṣīkeśa sūkṣma parasūkṣma turāṣāḍ viśvamūrte surāgraja nīla nistamo virajastamorajaḥsattvadhāma sarvalokapratiṣṭha śipiviṣṭa sutapastapo'gra agra agraja dharmanābha gabhastinābha dharmaneme satyadhāma satyākṣara gabhastineme vipāpman candraratha tvameva samudravāsāḥ ajaikapāt sahasraśīrṣaṃ sahasrasammita mahāśīrṣa sahasradṛk sahasrapāt adhomukha mahāmukha mahāpuruṣa puruṣottama sahasrabāho sahasramūrte sahasrāsya sahasrākṣa sahasrabhuja sahasrabhava sahasraśastvāmāhurvedāḥ

हिन्दी अर्थ

ी5ध्याय: शीाजाा परमात्माका स्तवन कश्यपने कहा—देवदेवेश्वर ! आपको नमस्कार है। आप एक सींग धारण करनेवाले मत्स्य एवं वराहरूप हैं । धर्ममयी किरणोंसे प्रकाशित होते हैं। धर्मके सागर हैं। जलका वर्षण और शोषण करनेवाले सूर्य हैं। देवताओंमें श्रेष्ठ हैं। देवताओंके खरष्टा हैं। आपका किसी अन्यसे निर्माण नहीं हुआ है—आप नित्यसिद्ध हैं। कल्याणमय कपिलस्वरूप हैं। युद्धके लिये की हुई तैयारीमात्रसे ही आप दैत्यसेनाको तितर-बितर कर डालते हैं। आप ध्रुव, धर्म, धर्मराज एवं वैकुण्ठधामके अधिपति हैं। गाहपत्यादि त्रिविध अग्िके आवर्तक, आदि, मध्य और अन्तसे रहित, धनझय (अग्नि), पवित्र त्रीरतिवाले, अग्निज (कार्तिकेयस्वरूप), वृष्णिज ( श्रीकृष्ण), अजन्मा, अजय (अपराजित), अमृतेशय (जलमें शयन करनेवाले) और सनातन पुरुष हैं। आप ही विधाता, त्रकाम (तीनों लोकोंकी कामनाके विषय अथवा तीनों तरेदोंकी श्रुतियोंके लिये कमनीय), त्रिधाम (त्रिलोकीके भाश्रय), त्रिककुद्‌ (धर्म, ज्ञान और वैराग्यरूप तीन फेंधोंवाले ), ककुदी (मोटे कंधेवाले ), दुन्दुभे (विजयघोष करनेवाले वाद्यरूप), महानाभ (बड़ी नाभिवाले), नोकनाभ (अपने नाभिकमलसे सम्पूर्ण लोकको प्रकट करनेवाले ), पद्मनाभ (अपनी नाभिसे कमलको प्रकट करनेवाले ), विरिश्लि (ब्रह्मस्वरूप), वरिष्ठ (सर्वश्रेष्ठ ), हुरूपधारी, विरूप (विविध रूप धारण करनेवाले), वश्वरूप, अक्षय, अक्षर (अविनाशी), सत्याक्षर (सत्य [वं अविनाशी अथवा सत्य अक्षरवाले वेदरूप), साक्षर (अजपा मन्त्रूप), हव्यभोक्ता (अग्नि), खण्डपरशु शिव), शुक्र (बलवीर्यरूप), मुज्ञकेश (मूँजके समान फेशवाले), हंस और महाहंस हैं। महान्‌ अक्षर प्रणव, न्द्रियोंके प्रेरक, सूक्ष्म, परमसूक्ष्म, इन्द्र, विश्वरूप, रेवताओंके अग्रज, नीलवर्ण, तमोगुण और रजोगुणसे हित, तमोगुण, रजोगुण और सत्त्वगुणके आश्रय, सम्पूर्ण नोकोंमें प्रतिष्ठित, शिपिविष्ट (सूर्य-किरणोंमें स्थित हनेवाले), उत्तम तपस्यावाले, श्रेष्ठ तपोरूप, अग्र सबके आदि), अग्रज (सबसे प्रथम प्रकट), धर्मनाभ + ११९९ ( धर्मस्वरूप नाभिवाले), गभस्तिनाभ (किरणमयी नाभिवाले ), धर्मनेमि ( धर्मचक्रके प्रवर्तक), सत्यधाम (वैकुण्ठस्वरूप ), सत्याक्षर (वेदस्वरूप), गभस्तिनेमि ( रश्मिमण्डलसे प्रकाशित), पापरहित तथा चन्द्र (समग्र मन) -रूपी रथपर आरूढ़ परमेश्वर ! आप ही समुद्रवासा (समुद्ररूपी वस्त्र धारण करनेवाले) हैं। आप ही अजैकपात्‌ (ग्यारह रुद्रोंमेंसे एक अथवा पूर्वभाद्रपदानक्षत्र), सहस्रों पस्तकवाले, सहस्रसंख्यक, महान्‌ मस्तक धारण करनेवाले, सहस्रनेत्र, सहस्रचरण, अधोमुख, महामुख, महापुरुष, पुरुषोत्तम, सहस्रबाहु, सहस्रमूर्ति, सहस्रमुख, सहस्रलोचन, सहस्रभुज तथा सहस्रों रूपोंमें प्रकट होनेवाले हैं, वेद आपका सहस्रों प्रकारसे वर्णन करते हैं

अध्याय 251

श्लोक 2

विश्वेदेव विश्वसम्भव सर्वेषामेव देवानां सौभग आदौ गतिः विश्वं त्वमाप्यायनः विश्वं त्वामाहुः पुष्पहास परमवरदस्त्वमेव वौषट् ओङ्कार वषट्कार त्वामेकमाहुरग्र्यं मखभागप्राशिनम्

viśvedeva viśvasambhava sarveṣāmeva devānāṃ saubhaga ādau gatiḥ viśvaṃ tvamāpyāyanaḥ viśvaṃ tvāmāhuḥ puṣpahāsa paramavaradastvameva vauṣaṭ oṅkāra vaṣaṭkāra tvāmekamāhuragryaṃ makhabhāgaprāśinam

हिन्दी अर्थ

आप ही विश्वेदेवस्वरूप, विश्वको उत्पन्न करनेवाले, सम्पूर्ण देवताओंके सौभाग्यस्वरूप एवं धर्मरूप हैं। आप ही सम्पूर्ण विश्वको पुष्ठ एवं तुष्ट करनेवाले हैं। विद्वान्‌ पुरुष आपको ही विश्वरूप बताते हैं। आपका हास पुष्पोंके विकासकी भाँति सुशोभित होता है। आप ही सर्वोत्तम वरदायक देवता हैं। आप ही वौषट, ओड्ार और वषट्कार हैं । एकमात्र आपको ही सर्वश्रेष्ठ यज्ञभागका भोक्ता बताया गया है

अध्याय 251

श्लोक 3

शतधार सहस्रधार भूर्द भुवर्द स्वर्द भूर्भुवः स्वर्द त्वमेव भूतं भुवनं त्वं स्वधा त्वमेव ब्रह्मसख ब्रह्ममय ब्रह्मादिस्त्वमेव

śatadhāra sahasradhāra bhūrda bhuvarda svarda bhūrbhuvaḥ svarda tvameva bhūtaṃ bhuvanaṃ tvaṃ svadhā tvameva brahmasakha brahmamaya brahmādistvameva

हिन्दी अर्थ

आप ही शतधार और सहस्रधार (सैकड़ों, हजारों धाराओंमें अमृतकी वर्षा करनेवाले) सोम हैं । आप ही भूलॉक, भुवर्लोक और स्वरलॉकको देनेवाले हैं । आप उक्त तीनों लोकोंका एक साथ ही दान करनेके कारण भूर्भुव:स्वर्द (त्रिलोकप्रद) कहे गये हैं। आप ही भूत एवं भुवन हैं। आप ही स्वधा हैं । आप ही ब्रह्मसख (ब्रह्माजीके सखा) और ब्रह्ममय हैं तथा ब्रह्माजीके आदि कारण भी आप ही हैं

अध्याय 251

श्लोक 4

द्यौरसि पृथिव्यसि पूषासि मातरिश्वासि धर्मोऽसि मघवासि होता पोता नेता हन्ता मन्ता होम्यहोता परात्परस्त्वं होम्यस्त्वमेव

dyaurasi pṛthivyasi pūṣāsi mātariśvāsi dharmo'si maghavāsi hotā potā netā hantā mantā homyahotā parātparastvaṃ homyastvameva

हिन्दी अर्थ

आप ही दुलोक हैं, पृथ्वी हैं, पूषा नामक आदित्य हैं, मातरिश्वा (वायु) हैं, धर्म हैं, इन्द्र हैं, होता (हवनकर्ता), पोता (एक ऋत्विज), नेता (नायक अथवा अगुआ), हनता (दुष्टोंका वध करने वाले), मन्ता (सम्मान देनेवाले ), हवनीय पदार्थका होम करनेवाले, परात्पर परमात्मा तथा हवबनीय पदार्थरूप हैं

अध्याय 251

श्लोक 5

आपोऽसि विश्ववाग् धात्रा परमेण धाम्नः त्वमेव दिग्भ्यः स्रुक् स्रुग्भाण्डस्त्वं गण इष्टोऽसि इज्योऽसि ईड्योऽसि त्वष्टा त्वमसि समिद्धस्त्वमेव गतिर्गतिमतामसि मोक्षोऽसि योगोऽसि गुह्योऽसि सिद्धोऽसि धन्योऽसि धातासि परमोऽसि यज्ञोऽसि सोमोऽसि यूपोऽसि दक्षिणासि दीक्षासि विश्वमसि

āpo'si viśvavāg dhātrā parameṇa dhāmnaḥ tvameva digbhyaḥ sruk srugbhāṇḍastvaṃ gaṇa iṣṭo'si ijyo'si īḍyo'si tvaṣṭā tvamasi samiddhastvameva gatirgatimatāmasi mokṣo'si yogo'si guhyo'si siddho'si dhanyo'si dhātāsi paramo'si yajño'si somo'si yūpo'si dakṣiṇāsi dīkṣāsi viśvamasi

हिन्दी अर्थ

आप ही जल हैं। सम्पूर्ण विश्वकी वाणी हैं। विधाताने उत्तम यज्ञके निमित्त अग्रिकी तृप्तिके लिये दिशाओंसे जिस खुकूका संग्रह किया, वह आपका ही स्वरूप है। खुग्भाण्ड (खुुक्‌ आदि यज्ञसामग्री) भी आप ही हैं। आप ही गण (ऋत्विजोंका समुदाय) हैं । आपका ही यज्ञोॉद्वारा यजन किया गया है। आप ही इज्य (यज्ञॉद्वारा पूजनीय) हैं। ईड्य (स्तवनीय) हैं। आप ही त्वष्टा (विश्वकर्मा) हैं। आप ही प्रज्वलित अग्रि हैं। आप ही जड़म प्राणियोंकी गति हैं तथा आप ही मोक्ष हैं, योग हैं, गुह्म हैं, सिद्ध हैं, धन्य हैं, धाता हैं, परम (उत्कृष्ट) हैं, यज्ञ हैं, सोम हैं, यूप हैं, दक्षिणा हैं, दीक्षा हैं और सब कुछ हैं

अध्याय 251

श्लोक 6

स्थविष्ठ स्थविर विश्व तुराषाड् हिरण्यगर्भ हिरण्यनाभ हिरण्यनारायण नारायणान्तर नृणामयन आदित्यवर्ण आदित्यतेजः महापुरुष सुरोत्तम आदिदेव पद्मनाभ पद्मेशय पद्माक्ष पद्मगर्भ हिरण्याग्रकेश शुक्ल विश्वदेव विश्वतोमुख विश्वाक्ष विश्वसम्भव विश्वभुक्त्वमेव

sthaviṣṭha sthavira viśva turāṣāḍ hiraṇyagarbha hiraṇyanābha hiraṇyanārāyaṇa nārāyaṇāntara nṛṇāmayana ādityavarṇa ādityatejaḥ mahāpuruṣa surottama ādideva padmanābha padmeśaya padmākṣa padmagarbha hiraṇyāgrakeśa śukla viśvadeva viśvatomukha viśvākṣa viśvasambhava viśvabhuktvameva

हिन्दी अर्थ

आप अत्यन्त स्थूल और वृद्ध हैं, जाग्रतू-अवस्थाके अभिमानी विश्वसंज्ञक पुरुष हैं, इन्द्र हैं, हिरण्यगर्भ (ब्रह्मा) हैं। आपकी नाभिमें हिरण्य है—इसीलिये आप हिरण्यनारायण कहलाते हैं और आप अन्तर्यामी नारायण हैं, नरों (मनुष्यों >)-के अयन (आश्रय) हैं । आपका वर्ण आदित्यके समान कान्तिमानू हैं। आप सूर्वके समान तेजस्वी हैं, आप ही महापुरुष, सुर्श्रेष्ठ आदिदेव, पद्मनाभ (नाभिसे कमल उत्पन्न करनेवाले), कमलपर शयन करनेवाले और कमललोचन हैं। पद्मको ार्भसे प्रकट करनेके कारण पद्मगर्भ कहलाते हैं । आपके पुन्दर केश सुनहरे हैं। आपकी अद्भकान्ति भास्वरशुक्ल है। आप सम्पूर्ण देवस्वरूप हैं। आपके सब ओर मुख और सब ओर नेत्र हैं। आप ही इस विश्वके उत्पादक तथा जगत्‌के भोक्ता (रक्षक और संहारक) हैं

अध्याय 251

श्लोक 7

भूरिविक्रम चक्रक्रम त्रिभुवन सुविक्रम स्वविक्रम स्वर्विक्रम बभ्रुः सुविभुः प्रभाकरः शम्भुः स्वयम्भूश्च भूतादिर्भूतात्मन् महाभूत विश्वभुक् त्वमेव विश्वगोप्तासि विश्वम्भर पवित्रमसि हविर्विंशारद हविःकर्मा अमृतेन्धन सुरासुरगुरो महादिदेव नृदेव ऊर्ध्वकर्मन् पूतात्मन् अमृतेश दिवःस्पृग् विश्वस्यपते घृताच्यसि अनन्तकर्मन् द्रुहिणवंश स्ववंश विश्वपास्त्वं त्वमेव विश्वं बिभषिं वरार्थिनो नस्त्रायस्वेति

bhūrivikrama cakrakrama tribhuvana suvikrama svavikrama svarvikrama babhruḥ suvibhuḥ prabhākaraḥ śambhuḥ svayambhūśca bhūtādirbhūtātman mahābhūta viśvabhuk tvameva viśvagoptāsi viśvambhara pavitramasi havirviṃśārada haviḥkarmā amṛtendhana surāsuraguro mahādideva nṛdeva ūrdhvakarman pūtātman amṛteśa divaḥspṛg viśvasyapate ghṛtācyasi anantakarman druhiṇavaṃśa svavaṃśa viśvapāstvaṃ tvameva viśvaṃ bibhaṣiṃ varārthino nastrāyasveti

हिन्दी अर्थ

आपका पराक्रम बहुत है। आप चक्रका संचालन करनेवाले हैं । तीनों लोक आपके ही स्वरूप हैं। आपका विक्रम उत्तम है। विक्रम आपका स्वरूप है। आप स्वरलॉकको नाँघ जानेवाले हैं। आप बभ्चु (अग्नि एवं विष्णुरूप), पुविभु (व्यापक), प्रभाकर (सूर्यरूप), शम्भु (कल्याणमय शव), स्वयम्भू (ब्रह्मा), भूतादि (महत्तत्त अथवा सम्पूर्ण भूतोंके आदि कारण), भूतात्मा (समस्त प्राणियोंकि आत्मा), पहाभूत (परमात्मा अथवा पश्नमहाभूतस्वरूप), विश्वभोक्ता और विश्वपालक हैं। विश्वम्भर! आप पवित्र हैं। सात विर्यज्ञ-संस्थाओंके विशेषज्ञ हैं । हविष्यके होममें तत्पर हनेवाले हैं । अमृत (घी) -रूपी ईंधनसे प्रज्वलित होने- ताले अग्रि हैं। सुरासुरगुरो ! महादिदेव ! नरदेव ] आपके कर्म ऊर्ध्वगति प्रदान करनेवाले हैं। पूतात्मनू! आप अमृतपदके वामी हैं। दुलोकका स्पर्श करनेवाले हैं। विश्वपते! आप यृताची (घीकी आहुति डालनेवाली खुवा) हैं। आपके कर्म अनन्त हैं। ब्रह्मा आपके वंशज हैं। आप स्ववंश स्वयम्भू) हैं। आप ही विश्वके पालक हैं तथा आप री विश्वका धारण-पोषण करते हैं । हम वरकी अभिलाषा खनेवाले सेवकोंकी आप रक्षा करें

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.