Harivamsha Purana
252
अध्याय 252 / 318

Parva 3, Adhyāya 69

22 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ22 श्लोक

अध्याय 252

श्लोक 1

कश्यपाय अदितये देवेभ्यश्च भगवतः विष्णोः वरदानं, अदितेः गर्भात् प्राकट्यं नारायणस्तु भगवाञ्छ्रुत्वैतत् परमं स्तवम् ।ब्रह्मज्ञेन द्विजेन्द्रेण कश्यपेन समीरितम्

kaśyapāya aditaye devebhyaśca bhagavataḥ viṣṇoḥ varadānaṃ, aditeḥ garbhāt prākaṭyaṃ nārāyaṇastu bhagavāñchrutvaitat paramaṃ stavam | brahmajñena dvijendreṇa kaśyapena samīritam

श्लोक 1–3 का हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! ब्रह्मवेत्ता विप्रवर कश्यपद्वारा किये गये इस परमस्तवकों सुनकर गवान्‌ नारायणके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई; वे उन हहात्मा देवताओंसे मेघगर्जनाके समान खिग्ध-गम्भीर पष करते हुए हृष्ट-पुष्ठ पद और अक्षरवाली उत्तम ाणीमें बोले; उस समय आकाशसे केवल उनका न्दमात्र सुनायी देता था, दर्शन नहीं हो रहा था। करने, | करने और अन्यथा करनेमें भी समर्थ वे श्रीमान्‌ गगवान्‌ नारायण देव इस प्रकार कहने लगे

अध्याय 252

श्लोक 2

स्निग्धगम्भीरनिर्घोषजीमूतस्वननिःस्वनम् ।मनसा प्रीतियुक्तेन विबुधानां महात्मनाम्

snigdhagambhīranirghoṣajīmūtasvananiḥsvanam | manasā prītiyuktena vibudhānāṃ mahātmanām

अर्थ श्लोक 1 के साथ

अध्याय 252

श्लोक 3

उवाच वचनं सम्यग् हृष्टपुष्टपदाक्षरम् ।आकाशाच्छुश्रुवे शब्दो दर्शनं नोपलभ्यते ।श्रीमान् प्रीतमना देवः प्रोवाच प्रभुरीश्वरः

uvāca vacanaṃ samyag hṛṣṭapuṣṭapadākṣaram | ākāśācchuśruve śabdo darśanaṃ nopalabhyate | śrīmān prītamanā devaḥ provāca prabhurīśvaraḥ

अर्थ श्लोक 1 के साथ

अध्याय 252

श्लोक 4

प्रीतोऽस्मि वः सुरश्रेष्ठाः सर्वे मत्तो विनिश्चयम् ।वरं वृणुत भद्रं वो वरदोऽस्मि सुरोत्तमाः

prīto'smi vaḥ suraśreṣṭhāḥ sarve matto viniścayam | varaṃ vṛṇuta bhadraṃ vo varado'smi surottamāḥ

हिन्दी अर्थ

भगवान्‌ विष्णु बोले—सुरश्रेष्ठाण! तुम्हारा भला ! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ; तुम सब लोग मुझसे [निश्चित वर माँगो। श्रेष्ठ देवताओ! मैं तुम्हें वर नेके लिये उद्यत हूँ

अध्याय 252

श्लोक 5

यदैव भगवान् प्रीतः सर्वेषाममरोत्तमः ।तदैव कृतकृत्याः स्म त्वं हि नः परमा गतिः

yadaiva bhagavān prītaḥ sarveṣāmamarottamaḥ | tadaiva kṛtakṛtyāḥ sma tvaṃ hi naḥ paramā gatiḥ

हिन्दी अर्थ

कश्यपने कहा—प्रभो ! आप देवताओंमें उत्तम हैं; पाप जभी हम सबपर प्रसन्न हुए तभी हम कृतकृत्य हो ये, क्योंकि आप ही हमारी परम गति हैं

अध्याय 252

श्लोक 6

यदि प्रसन्नो भगवान् दातव्यो वा वरो यदि ।वासवस्यानुजो भ्राता ज्ञातीनां नन्दिवर्धनः ।अदित्यां वामनः श्रीमान् भगवानस्तु वै सुतः

yadi prasanno bhagavān dātavyo vā varo yadi | vāsavasyānujo bhrātā jñātīnāṃ nandivardhanaḥ | adityāṃ vāmanaḥ śrīmān bhagavānastu vai sutaḥ

हिन्दी अर्थ

यदि गवान्‌ हमपर प्रसन्न हैं अथवा यदि हमें वर देना उचित मझते हैं तो अदितिके गर्भसे पुत्ररूपमें उत्पन्न हो ीमानू भगवान्‌ वामनके नामसे विख्यात हों और इन्द्रके टे भाई होकर बन्धु-बान्धवोंका आनन्दवर्धन करें

अध्याय 252

श्लोक 7

अदितिर्देवमाता च एतमेवार्थमुत्तमम् ।पुत्रार्थे वरदं प्राह भगवन्तं वरार्थिनी

aditirdevamātā ca etamevārthamuttamam | putrārthe varadaṃ prāha bhagavantaṃ varārthinī

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! वरकी च्छा रखनेवाली देवमाता अदिति भी वरदायक गवान्‌ूसे पुत्रके लिये यही उत्तम मनोरथ प्रकट करती ई बोलीं

अध्याय 252

श्लोक 8

याचे त्वां पुत्रकामा वै भवान् पुत्रो भवत्विति ।निःश्रेयसाय सर्वेषां देवानां हि महात्मनाम्

yāce tvāṃ putrakāmā vai bhavān putro bhavatviti | niḥśreyasāya sarveṣāṃ devānāṃ hi mahātmanām

हिन्दी अर्थ

अदितिने कहा—भगवन्‌! मेरे मनमें पुत्रकी मना है। मैं आपसे यही प्रार्थथा करती हूँ कि आप मस्त महात्मा देवताओंके कल्याणके लिये मेरे पुत्र | जायेँ

अध्याय 252

श्लोक 9

भ्राता भर्ता च दाता च शरणं च भवस्व नः ।अदित्याः पुत्रतां याते त्वयि देवाः सवासवाः ।देवशब्दं वहिष्यन्ति कश्यपस्यात्मजो भव

bhrātā bhartā ca dātā ca śaraṇaṃ ca bhavasva naḥ | adityāḥ putratāṃ yāte tvayi devāḥ savāsavāḥ | devaśabdaṃ vahiṣyanti kaśyapasyātmajo bhava

हिन्दी अर्थ

देवता बोले—भगवन्‌! आप हमारे भ्राता, भर्ता भरण-पोषण करनेवाले), दाता और आश्रय हों। आप ब अदितिके पुत्र होंगे, तभी इन्द्रसहित समस्त देवता तरशब्द (देवता पदवी)-का भार वहन कर सकेंगे, त: आप कश्यपके पुत्र हो जाइये

अध्याय 252

श्लोक 10

ततस्तानब्रवीद् विष्णुर्देवान् कश्यपमेव च ।एवं भवतु भद्रं वो यथेष्टं काममाप्नुत

tatastānabravīd viṣṇurdevān kaśyapameva ca | evaṃ bhavatu bhadraṃ vo yatheṣṭaṃ kāmamāpnuta

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तब भगवान्‌ विष्णुने देवताओं तथा कश्यपजीसे कहा-'ऐसा ही होगा तुम्हारा कल्याण हो। तुम अपना अभीष्ट मनोरथ प्राप्त करो

अध्याय 252

श्लोक 11

सर्वेषामेव युष्माकं ये भविष्यन्ति शत्रवः ।मुहूर्तमपि ते सर्वे न स्थास्यन्ति ममाग्रतः

sarveṣāmeva yuṣmākaṃ ye bhaviṣyanti śatravaḥ | muhūrtamapi te sarve na sthāsyanti mamāgrataḥ

हिन्दी अर्थ

तुम सब लोगोंके जो शत्रु होंगे, वे सब-के-सब दो घड़ी भी मेरे सामने नहीं ठहर सकेंगे

अध्याय 252

श्लोक 12

हत्वासुरगणान् सर्वान् ये चान्ये देवशत्रवः ।करिष्ये देवताः सर्वा यज्ञभागाग्रभोजिनः

hatvāsuragaṇān sarvān ye cānye devaśatravaḥ | kariṣye devatāḥ sarvā yajñabhāgāgrabhojinaḥ

हिन्दी अर्थ

समस्त असुरों तथा अन्यान्य देवद्रोहियोंका वध करके मैं समस्त देवताओंको यज्ञभागका अग्रभोजी बना दूँगा

अध्याय 252

श्लोक 13

हव्यादांश्च सुरान् सर्वान् कव्यादांश्च पितॄनपि ।करिष्ये विबुधश्रेष्ठाः पारमेष्ठ्येन कर्मणा

havyādāṃśca surān sarvān kavyādāṃśca pitṝnapi | kariṣye vibudhaśreṣṭhāḥ pārameṣṭhyena karmaṇā

हिन्दी अर्थ

श्रेष्ठ देवताओ! मैं अपने परमेधरोचित कर्मके द्वारा सब देवताओंको हविष्यभोक्ता और पितरोंको भी कव्यभोजी ( श्राद्धभोक्ता) बना दूँगा

अध्याय 252

श्लोक 14

यथागतेन मार्गेण निवर्तध्वं सुरोत्तमाः ।देवमातुस्तथादित्याः कश्यपस्यामितात्मनः ।यथामनीषितं कर्ता गच्छध्वं स्वं स्वमालयम्

yathāgatena mārgeṇa nivartadhvaṃ surottamāḥ | devamātustathādityāḥ kaśyapasyāmitātmanaḥ | yathāmanīṣitaṃ kartā gacchadhvaṃ svaṃ svamālayam

हिन्दी अर्थ

सुरश्रेष्ठाण ! तुम जिस मार्गसे आये हो, उसीसे लौट जाओ ! मैं देवमाता अदिति तथा महात्मा कश्यपजीकी इच्छाके अनुसार कार्य करूँगा! तुम सब लोग अपने-अपने स्थानको जाओ

अध्याय 252

श्लोक 15

एवमुक्ते तु वचने विष्णुना प्रभविष्णुना ।देवाः प्रहृष्टमनसः पूजयन्ति स्म सर्वशः

evamukte tu vacane viṣṇunā prabhaviṣṇunā | devāḥ prahṛṣṭamanasaḥ pūjayanti sma sarvaśaḥ

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! प्रभावशाली विष्णुके ऐसी बात कहनेपर देवताओंका मन हर्षसे खिल उठा। वे सब प्रकारसे भगवान्‌की पूजा—भूरि- भूरि प्रशंसा करने लगे

अध्याय 252

श्लोक 16

विश्वेदेवा महात्मानः कश्यपोऽदितिरेव च ।साध्या मरुद्गणाश्चैव शक्रश्चैव महाबलः

viśvedevā mahātmānaḥ kaśyapo'ditireva ca | sādhyā marudgaṇāścaiva śakraścaiva mahābalaḥ

श्लोक 16–17 का हिन्दी अर्थ

महात्मा विश्वेदेवगण, कश्यप, अदिति, साध्य, मरुदूगण तथा. महाबली इन्द्र-ये सब उन वेगशाली दिव्यस्वरूप देवेश्वरको नमस्कार करके पूर्व दिशामें स्थित कश्यपजीके दिव्य एवं विशाल आश्रमकी ओर चल दिये

अध्याय 252

श्लोक 17

नमस्कृत्य सुरेशाय तस्मै देवाय रंहसे ।प्रयाताः प्राग्दिशं दिव्यं विपुलं कश्यपाश्रमम्

namaskṛtya sureśāya tasmai devāya raṃhase | prayātāḥ prāgdiśaṃ divyaṃ vipulaṃ kaśyapāśramam

अर्थ श्लोक 16 के साथ

अध्याय 252

श्लोक 18

गत्वा ते आश्रमं तत्र ब्रह्मर्षिगणसेवितम् ।चेरुः स्वाध्यायनियता अदित्या गर्भमीप्सवः

gatvā te āśramaṃ tatra brahmarṣigaṇasevitam | ceruḥ svādhyāyaniyatā adityā garbhamīpsavaḥ

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मर्षियोंद्वारा सेवित उस आश्रममें पहुँचकर वे देवता वहाँ नियमपूर्वक स्वाध्यायमें तत्पर रहकर अदितिके गर्भकी प्रतीक्षा करते हुए विचरने लगे

अध्याय 252

श्लोक 19

अदितिर्देवमाता च गर्भे दध्रेऽतितेजसम् ।भूतात्मानं महात्मानं दिव्यं वर्षसहस्रकम्

aditirdevamātā ca garbhe dadhre'titejasam | bhūtātmānaṃ mahātmānaṃ divyaṃ varṣasahasrakam

हिन्दी अर्थ

देवमाता अदितिने अत्यन्त तेजस्वी गर्भ धारण किया, जिसमें समस्त प्राणियोंके आत्मा परमात्मा श्रीहरिका निवास था। एक सहस््र दिव्य वर्षोंतक वे उस गर्भको धारण किये रहीं

अध्याय 252

श्लोक 20

पूर्णे वर्षसहस्रे तु प्रसूता गर्भमुत्तमम् ।सुराणां शरणं देवमसुराणां विनाशनम्

pūrṇe varṣasahasre tu prasūtā garbhamuttamam | surāṇāṃ śaraṇaṃ devamasurāṇāṃ vināśanam

हिन्दी अर्थ

सहस््र वर्ष पूर्ण होनेपर देवी अदितिने देवताओंके शरणदाता और असुरोंके विनाशक नारायणदेवको अपने उत्तम गर्भ (शिशु) -के रूपमें जन्म दिया

अध्याय 252

श्लोक 21

गर्भस्थेन तु देवेन परित्राताः सुरास्तदा ।आददानेन तेजांसि त्रैलोक्यस्य महात्मना

garbhasthena tu devena paritrātāḥ surāstadā | ādadānena tejāṃsi trailokyasya mahātmanā

हिन्दी अर्थ

गर्भमें रहते समय ही तीनों लोकोंके तेजको छीन लेनेवाले महात्मा नारायणदेवने तत्काल सब देवताओंकी रक्षा आरम्भ कर दी

अध्याय 252

श्लोक 22

तस्मिञ्जाते तु देवेशे त्रैलोक्यस्य सुखावहे ।भयदे दैत्यसङ्घानां सुराणां नन्दिवर्धने

tasmiñjāte tu deveśe trailokyasya sukhāvahe | bhayade daityasaṅghānāṃ surāṇāṃ nandivardhane

हिन्दी अर्थ

त्रिभुवनको सुख देनेवाले, दैत्यसमूहोंको भयभीत करनेवाले और देवताओंका आनन्द बढ़ानेवाले देवेश्वर श्रीहरिकि अदितिके गर्भसे प्रकट होते ही सर्वत्र आनन्द छा गया

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

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पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.