Harivamsha Purana
256
अध्याय 256 / 318

Parva 3, Adhyāya 73

45 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ45 श्लोक

अध्याय 256

श्लोक 1

रुक्मिण्या देव्या भगवन्तं श्रीकृष्णं पुत्राय प्रार्थना, भगवता तां आश्वासयित्वा कैलासगमनस्य विचारस्य प्रकटनं किमर्थं भगवान् विष्णुर्देवदेवो जनार्दनः ।गतः कैलासशिखरमालयं शङ्करस्य च

rukmiṇyā devyā bhagavantaṃ śrīkṛṣṇaṃ putrāya prārthanā, bhagavatā tāṃ āśvāsayitvā kailāsagamanasya vicārasya prakaṭanaṃ kimarthaṃ bhagavān viṣṇurdevadevo janārdanaḥ | gataḥ kailāsaśikharamālayaṃ śaṅkarasya ca

हिन्दी अर्थ

अन्तर्गत भविष्यपर्वसों वासनावतारविकयक रा हुआ ॥ ७२ /॥ प5ध्याय: स्स्‍्स्‍्स्‍्स्‍्स्‍्स्‍्स्‍्स्‍्ससाण पुत्रके लिये प्रार्थना और भगवान्‌का जानेका विचार प्रकट करना जनमेजयने पूछा—मुने! देवताओंके भी देवता, सर्वव्यापी भगवान्‌ जनार्दद किस लिये शड्रजीके निवास-स्थान कैलासशिखरपर गये थे ?

अध्याय 256

श्लोक 2

नारदाद्यैस्तपोवृद्धैर्मुनिभिस्तत्त्वदर्शिभिः ।तत्र दृष्टो महादेवः शङ्करो नीललोहितः

nāradādyaistapovṛddhairmunibhistattvadarśibhiḥ | tatra dṛṣṭo mahādevaḥ śaṅkaro nīlalohitaḥ

हिन्दी अर्थ

तपस्यामें बढ़े -चढ़े तत्त्वदर्शी नारद आदि मुनियोंने ही वहाँ नील- लोहित वर्णवाले कल्याणकारी महादेवजीका दर्शन किया है

अध्याय 256

श्लोक 3

केशवेन पुरा विप्र कुर्वता तप उत्तमम् ।अर्चितो देवदेवेन शङ्करश्चेति नः श्रुतम्

keśavena purā vipra kurvatā tapa uttamam | arcito devadevena śaṅkaraśceti naḥ śrutam

हिन्दी अर्थ

विप्रवर! हमारे सुननेमें यह भी आया है कि पूर्वकालमें उत्तम तप करते हुए देवाधिदेव केशवने वहाँ भगवान्‌ शड्रका पूजन किया था

अध्याय 256

श्लोक 4

देवौ तत्र जगन्नाथौ दृष्टवन्तौ पुरातनौ ।अर्चयाञ्चक्रिरे देवा इन्द्राद्याः शङ्करं हरिम्

devau tatra jagannāthau dṛṣṭavantau purātanau | arcayāñcakrire devā indrādyāḥ śaṅkaraṃ harim

हिन्दी अर्थ

वहाँ दोनों पुरातन देवता जगदीश्वर श्रीहरि और हरने एक-दूसरेका दर्शन किया था। इन्द्र आदि देवताओंने वहाँ आकर भगवान्‌ शड्डर तथा श्रीहरिकी अर्चना की थी

अध्याय 256

श्लोक 5

तौ हि देवौ महादेवावेकीभूतौ द्विधा कृतौ ।एकात्मानौ जगद्योनी सृष्टिसंहारकारकौ

tau hi devau mahādevāvekībhūtau dvidhā kṛtau | ekātmānau jagadyonī sṛṣṭisaṃhārakārakau

हिन्दी अर्थ

कहते हैं कि वे दोनों महान्‌ देवता एक ही हैं, किंतु दो स्वरूपोंमें विभक्त हो गये हैं। उनका आत्मा (स्वरूप) एक ही है, तो भी कार्यभेदसे भिन्न-भिन्न शरीर धारण करते हैं। दोनों ही जगत्‌की उत्पत्तिके कारण हैं और दोनों ही सृष्टि, पालन एवं संहार करनेवाले हैं

अध्याय 256

श्लोक 6

परस्परसमावेशाज्जगतः पालने स्थितौ ।तयोस्तत्र यथावृत्तं कैलासे पर्वतोत्तमे

parasparasamāveśājjagataḥ pālane sthitau | tayostatra yathāvṛttaṃ kailāse parvatottame

हिन्दी अर्थ

वे परस्पर समाविष्ट होकर जगत्‌के पालन- कर्ममें स्थित रहते हैं। उत्तम पर्वत कैलासपर एकत्र हुए उन दोनोंका जैसा वृत्तान्त हो, वह बताइये

अध्याय 256

श्लोक 7

ऋषयः किमचेष्टन्त दृष्ट्वा तौ पुरुषोत्तमौ ।एतत् सर्वमशेषेण वक्तुमर्हसि सत्तम

ṛṣayaḥ kimaceṣṭanta dṛṣṭvā tau puruṣottamau | etat sarvamaśeṣeṇa vaktumarhasi sattama

हिन्दी अर्थ

साधुशिरोमणे ! उन दोनों पुरुषोत्तमोंको देखकर ऋषियों ने कैसी चेष्टा की? यह सब वृत्तान्त पूर्णरूपसे बतानेकी कृपा करें

अध्याय 256

श्लोक 8

यथा गतो हरिर्विष्णुः कृष्णो जिष्णुः पुरातनः ।यथा च शङ्करः साक्षात्कृतवान्नागभूषणः ।एतत् सर्वं विप्रवर्य ब्रूहि तत्त्वेन यत्नतः

yathā gato harirviṣṇuḥ kṛṣṇo jiṣṇuḥ purātanaḥ | yathā ca śaṅkaraḥ sākṣātkṛtavānnāgabhūṣaṇaḥ | etat sarvaṃ vipravarya brūhi tattvena yatnataḥ

हिन्दी अर्थ

विप्रवर ! सर्वव्यापी, पापहारी, पुरातन पुरुष और विजयशील सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीकृष्ण जिस प्रकार कैलासपर्वतपर गये और सर्पमय आभूषणोंसे विभूषित भगवान्‌ शड्डरने जिस प्रकार उनका साक्षात्कार किया, यह सब मुझे यत्तपूर्वक ठीक-ठीक बताइये

अध्याय 256

श्लोक 9

शृणुष्वावहितो राजन् यथा कृष्णो गतो नगम् ।यथा च दृष्टो देवेशः शङ्करो वृषवाहनः

śṛṇuṣvāvahito rājan yathā kṛṣṇo gato nagam | yathā ca dṛṣṭo deveśaḥ śaṅkaro vṛṣavāhanaḥ

श्लोक 9–10 का हिन्दी अर्थ

बैशम्पायनजी कहते है—राजन्‌!! नरश्रेष्ठ ! भगवान्‌ श्रीकृष्ण जिस प्रकार कैलासपर्वतपर गये, जिस प्रकार उन्होंने देवेश्वर वृषभवाहन भगवान्‌ शड्रका दर्शन किया, जिस तरह वे तपस्यामें संलग्र हुए, जिस प्रकार वे मुनिलोग वहाँ गये और जिस तरह उन दोनों देवताओंका वृत्तान्त वहाँ घटित हुआ, वह सब सावधान होकर सुनो

अध्याय 256

श्लोक 10

यथा चचार स तपो यथा ते मुनयो गताः ।एवं तयोर्यथावृत्तं तथा शृणु नरोत्तम

yathā cacāra sa tapo yathā te munayo gatāḥ | evaṃ tayoryathāvṛttaṃ tathā śṛṇu narottama

अर्थ श्लोक 9 के साथ

अध्याय 256

श्लोक 11

द्वैपायनोऽथ भगवान् यथा प्रोवाच मां तथा ।नमस्कृत्य प्रवक्ष्यामि केशवं खगवाहनम्

dvaipāyano'tha bhagavān yathā provāca māṃ tathā | namaskṛtya pravakṣyāmi keśavaṃ khagavāhanam

श्लोक 11–18 का हिन्दी अर्थ

भगवान्‌ वेदव्यासने यह प्रसज्ध जिस प्रकार मुझसे कहा था, उसी प्रकार मैं गरुड़वाहन भगवान्‌ केशवको नमस्कार करके अपनी बुद्धि और शक्तिके अनुसार कहूँगा। उत्तम ब्रतका पालन करनेवाले नरेश! तुम यत्तपूर्वक सुनो। जिसमें सेवा करनेका भाव न हो, जो नृशंस तथा तपस्यासे दूर रहनेवाला हो और जिसने कुछ भी अध्ययन न किया हो, ऐसे पुरुषको पुण्यात्मा विद्वान्‌ इस पवित्र प्रसंगका उपदेश कभी न दे। यह विषय स्वर्गप्रद, यशोवर्धक, धनकी प्राप्ति करानेवाला तथा सदा ही बुद्धिको शुद्ध करने- वाला है, यह (भगवान्‌ विष्णु और शिवकी एकता) वेदार्थका निश्चित सिद्धान्त है और पुण्यात्मा पुरुषोंके लिये सदा ही चिन्तन करने योग्य है । अनेक आरण्यक- ग्रन्थों (उपनिषदों)-ने इसका अनुमोदन किया है। श्२२३ दपरायण नारद आदि तपोधन मुनि नित्य इसका सेवन चिन्तन) करते हैं। भगवान्‌ विष्णु और शिव दोनों ल्याणकारी देवताओंके कैलासपर्वतपर एकत्र होनेका ह अत्यन्त अद्भुत वृत्तान्त परम पुण्यमय है। राजन्‌! रक आदि असुरसमूहों तथा अन्यान्य राजाओंके मारे नेपर जब थोड़े-से ही शत्रु शेष रह गये, उन दिनों छ्णिवंशियोंके साथ द्वारकापुरीमें निवास करते हुए, सर्वसमर्थ गन्नाथ पुरुषोत्तम श्रीहरि पृथ्वीका सदा शासन करने गे । भगवान्‌ श्रीकृष्ण रुक्मिणीदेवीसे संयुक्त होकर उस गरमें निवास करते थे

अध्याय 256

श्लोक 12

यथाशक्ति यथाप्रज्ञं शृणु यत्नेन सुव्रत ।न चाशुश्रूषवे वाच्यं नृशंसायातपस्विने

yathāśakti yathāprajñaṃ śṛṇu yatnena suvrata | na cāśuśrūṣave vācyaṃ nṛśaṃsāyātapasvine

अर्थ श्लोक 11 के साथ

अध्याय 256

श्लोक 13

नानधीताय वक्तव्यं पुण्यं पुण्यवता सदा ।स्वर्ग्यं यशस्यं धन्यं च बुद्धिशुद्धिकरं सदा

nānadhītāya vaktavyaṃ puṇyaṃ puṇyavatā sadā | svargyaṃ yaśasyaṃ dhanyaṃ ca buddhiśuddhikaraṃ sadā

अर्थ श्लोक 11 के साथ

अध्याय 256

श्लोक 14

ध्येयं पुण्यात्मनां नित्यमिदं वेदार्थनिश्चितम् ।अनेकारण्यसंयुक्तं सेवन्ते नित्यमीदृशम्

dhyeyaṃ puṇyātmanāṃ nityamidaṃ vedārthaniścitam | anekāraṇyasaṃyuktaṃ sevante nityamīdṛśam

अर्थ श्लोक 11 के साथ

अध्याय 256

श्लोक 15

मुनयो वेदनिरता नारदाद्यास्तपोधनाः ।अत्यद्भुतं महापुण्यं वृत्तं कैलासपर्वते

munayo vedaniratā nāradādyāstapodhanāḥ | atyadbhutaṃ mahāpuṇyaṃ vṛttaṃ kailāsaparvate

अर्थ श्लोक 11 के साथ

अध्याय 256

श्लोक 16

शिवयोर्देवयोस्तत्र हरेश्चैव भवस्य ह ।हतेष्वसुरसङ्घेषु नरकादिषु भूमिप

śivayordevayostatra hareścaiva bhavasya ha | hateṣvasurasaṅgheṣu narakādiṣu bhūmipa

अर्थ श्लोक 11 के साथ

अध्याय 256

श्लोक 17

हतेष्वथ नृपेष्वेवं किञ्चिच्छिष्टेषु शत्रुषु ।शासति स्म सदा विष्णुः पृथिवीं पुरुषोत्तमः

hateṣvatha nṛpeṣvevaṃ kiñcicchiṣṭeṣu śatruṣu | śāsati sma sadā viṣṇuḥ pṛthivīṃ puruṣottamaḥ

अर्थ श्लोक 11 के साथ

अध्याय 256

श्लोक 18

द्वारवत्यां जगन्नाथो वसन् वृष्णिभिरीश्वरः ।रुक्मिण्या सङ्गतो देवो वसंस्तत्र पुरे हरिः

dvāravatyāṃ jagannātho vasan vṛṣṇibhirīśvaraḥ | rukmiṇyā saṅgato devo vasaṃstatra pure hariḥ

अर्थ श्लोक 11 के साथ

अध्याय 256

श्लोक 19

कदाचिच्च तया सार्धं शेते रात्रौ जगत्पतिः ।विहरंश्च यथायोगं प्रीतः प्रीतियुजा तया

kadācicca tayā sārdhaṃ śete rātrau jagatpatiḥ | viharaṃśca yathāyogaṃ prītaḥ prītiyujā tayā

हिन्दी अर्थ

एक दिनकी बात , जगदीश्वर श्रीकृष्ण प्रीतिमती रुक्मिणीदेवीके साथ रातमें थोचित विहार करते हुए प्रसन्नतापूर्वक सो रहे थे

अध्याय 256

श्लोक 20

अथोवाच तदा देवी रुक्मिणी रुक्मभूषणा ।पुत्रमिच्छामि देवेश त्वत्तो माधव नन्दनम्

athovāca tadā devī rukmiṇī rukmabhūṣaṇā | putramicchāmi deveśa tvatto mādhava nandanam

हिन्दी अर्थ

स समय सुवर्णमय आभूषणोंसे विभूषित हुई रुक्मिणीदेवीने गवानूसे कहा—' देवेश्वर ! माधव ! मैं आपसे आनन्ददायक त्र प्राप्त करना चाहती हूँ

अध्याय 256

श्लोक 21

बलिनं रूपसम्पन्नं त्वयैव सदृशं प्रभो ।वृष्णीनामपि नेतारं वीर्यवन्तं तपोनिधिम्

balinaṃ rūpasampannaṃ tvayaiva sadṛśaṃ prabho | vṛṣṇīnāmapi netāraṃ vīryavantaṃ taponidhim

हिन्दी अर्थ

प्रभो ! वह पुत्र आपके । समान रूपवानू, बलवान, पराक्रमी, तपोनिधि तथा ष्णिकुलका नेता हो

अध्याय 256

श्लोक 22

सर्वशास्त्रार्थकुशलं राजविद्यापुरस्कृतम् ।एवमादिगुणैर्युक्तं दातुमर्हसि सत्तम

sarvaśāstrārthakuśalaṃ rājavidyāpuraskṛtam | evamādiguṇairyuktaṃ dātumarhasi sattama

हिन्दी अर्थ

वह सभी शास्त्रोंके अर्थज्ञानमें पुण तथा राजविद्या (ब्रह्मविद्या )-के ज्ञाताओंमें अग्रगण्य [। सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ पतिदेव ! आप मुझे ऐसे ही गुणोंसे म्पन्न पुत्र प्रदान कीजिये

अध्याय 256

श्लोक 23

त्वयि सर्वस्य दातृत्वं नित्यमेव प्रतिष्ठितम् ।त्वं हि सर्वस्य कर्ता च दाता भोक्ता जगत्पतिः

tvayi sarvasya dātṛtvaṃ nityameva pratiṣṭhitam | tvaṃ hi sarvasya kartā ca dātā bhoktā jagatpatiḥ

हिन्दी अर्थ

आपमें सदा ही सब छछ देनेकी शक्ति विद्यमान है; क्योंकि आप ही सबके र्ता, दाता, भोक्ता और जगदीश्वर हैं

अध्याय 256

श्लोक 24

विशेषतस्तु भृत्यानां शुश्रूषानियतात्मनाम् ।वक्तव्यं किमु देवेश यदि भक्तास्मि केशव

viśeṣatastu bhṛtyānāṃ śuśrūṣāniyatātmanām | vaktavyaṃ kimu deveśa yadi bhaktāsmi keśava

श्लोक 24–25 का हिन्दी अर्थ

देवेश्वर ! शव ! विशेषत: जो आपके भृत्य हैं, सदा नियमपूर्वक ापकी सेवामें मन लगाये रहते हैं, उन्हें आप अभीष्ट स्तु प्रदान करें, इसके लिये तो कहना ही क्या है। वदेव ! जगत्पते ! जनार्दन! यदि मैं आपकी भक्त हूँ और पका मुझपर अनुग्रह है तो आप मुझे पराक्रमी पुत्र दान करें'

अध्याय 256

श्लोक 25

अनुग्रहो यदि स्यान्मे देवदेव जगत्पते ।दातुमर्हसि पुत्रं त्वं वीर्यवन्तं जनार्दन

anugraho yadi syānme devadeva jagatpate | dātumarhasi putraṃ tvaṃ vīryavantaṃ janārdana

अर्थ श्लोक 24 के साथ

अध्याय 256

श्लोक 26

इत्युक्तो देवदेवेशः प्रियया प्रीयमाणया ।तया महिष्या रुक्मिण्या रुक्मिशत्रुर्यदूद्वहः

ityukto devadeveśaḥ priyayā prīyamāṇayā | tayā mahiṣyā rukmiṇyā rukmiśatruryadūdvahaḥ

श्लोक 26–27 का हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! अपनी प्रसन्न ई प्यारी रानी रुक्मिणीदेवीके ऐसा कहनेपर रुक्मीके त्रु, यदुकुलतिलक, देवदेवेधवर, यादवपति श्रीकृष्णने क्मिणीसे यह समयोचित बात कही—' भामिनि! म जैसा चाहती हो, वैसा ही पुत्र मैं तुम्हें प्रदान रूँगा

अध्याय 256

श्लोक 27

प्रोवाच वचनं काले रुक्मिणीं यादवेश्वरः ।दातास्मि तादृशं पुत्रं यं त्वमिच्छसि भामिनि

provāca vacanaṃ kāle rukmiṇīṃ yādaveśvaraḥ | dātāsmi tādṛśaṃ putraṃ yaṃ tvamicchasi bhāmini

अर्थ श्लोक 26 के साथ

अध्याय 256

श्लोक 28

नित्यं भक्तासि मे देवि नात्र कार्या विचारणा ।अवश्यं तव दास्यामि पुत्रं शत्रुनिबर्हणम्

nityaṃ bhaktāsi me devi nātra kāryā vicāraṇā | avaśyaṃ tava dāsyāmi putraṃ śatrunibarhaṇam

हिन्दी अर्थ

देवि! तुम सदा ही मेरी भक्त हो, समें कुछ विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है। मैं ववश्य ही तुम्हें शत्रुनाशक पुत्र प्रदान करूँगा

अध्याय 256

श्लोक 29

पुत्रेण लोकाञ्जयति सतां कामदुघा हि ये ।नरकं पुदिति ख्यातं दुःखं च नरकं विदुः

putreṇa lokāñjayati satāṃ kāmadughā hi ye | narakaṃ puditi khyātaṃ duḥkhaṃ ca narakaṃ viduḥ

हिन्दी अर्थ

हस्थ पुरुष पुत्रद्धारा उन लोकोंपर विजय पाता है, जो रुषोंको उनकी इच्छाके अनुसार फल देनेवाले होते हैं । रक 'पुत्‌' नामसे विख्यात है, दुःखको भी नरक ही ना गया है

अध्याय 256

श्लोक 30

पुदस्त्राणात् ततः पुत्रमिहेच्छति परत्र च ।अनन्ताः पुत्रिणो लोकाः पुरुषस्य प्रिये शुभाः

pudastrāṇāt tataḥ putramihecchati paratra ca | anantāḥ putriṇo lokāḥ puruṣasya priye śubhāḥ

हिन्दी अर्थ

उस पुतू-नामक नरक या दु:खसे वह पिता- पाताका परित्राण करता है, इसलिये सारा जगत्‌ इहलोक और परलोकके लिये पुत्रकी अभिलाषा रखता है । प्रिये ! पुत्रवानू पुरुषके लिये अनन्त शुभ लोक विद्यमान हैं

अध्याय 256

श्लोक 31

पतिर्जायां प्रविशति गर्भो भूत्वा स मातरम् ।तस्यां पुनर्नवो भूत्वा दशमे मासि जायते

patirjāyāṃ praviśati garbho bhūtvā sa mātaram | tasyāṃ punarnavo bhūtvā daśame māsi jāyate

हिन्दी अर्थ

पति ही गर्भ बनकर पत्नीके भीतर प्रवेश करता है, उस गर्भकी वह माता (जननी) होती है। उसके गर्भमें नूतन शरीर धारण करके वह (पति) पुन: दसवें मासमें जन्म लेता है

अध्याय 256

श्लोक 32

पुत्रवन्तं बिभेतीन्द्रः किं नु तेनाशितं भवेत् ।नापुत्रो विन्दते लोकान् कुपुत्राद् वन्ध्यता वरा

putravantaṃ bibhetīndraḥ kiṃ nu tenāśitaṃ bhavet | nāputro vindate lokān kuputrād vandhyatā varā

हिन्दी अर्थ

पुत्रवान्‌को देखकर इन्द्र भी डरते हैं। वे सोचते हैं, पता नहीं यह मेरे किस तैभवका उपभोग करेगा? पुत्रहीन मनुष्य पुण्यलोकोंको नहीं पाता है; परंतु कुपुत्र पैदा करनेकी अपेक्षा तो बाँझ [ह जाना ही अच्छा है

अध्याय 256

श्लोक 33

कुपुत्रो नरके यस्मात् सुपुत्रात् स्वर्ग एव हि ।तस्माद् विनीतं सत्पुत्रं श्रुतवन्तं दयापरम्

kuputro narake yasmāt suputrāt svarga eva hi | tasmād vinītaṃ satputraṃ śrutavantaṃ dayāparam

हिन्दी अर्थ

कुपुत्र नरकमें गिसता है और सुपुत्रसे स्वर्ग भी सुलभ होता है। अत: विनयशील, विद्वान्‌ और दयालु सत्पुत्रकी इच्छा करनी चाहिये

अध्याय 256

श्लोक 34

विद्यया विनयो यस्माद् विद्यायुक्तं सुधार्मिकम् ।इच्छेत् पुत्रं पुत्रकामः पुरुषो यत्नवान् बुधः

vidyayā vinayo yasmād vidyāyuktaṃ sudhārmikam | icchet putraṃ putrakāmaḥ puruṣo yatnavān budhaḥ

हिन्दी अर्थ

वेद्यासे विनयकी प्राप्ति होती है, अतः पुत्रकी क्रामनावाला प्रयलशील विद्वान्‌ पुरुष विद्यायुक्त परम धार्मिक पुत्र पानेकी इच्छा करे

अध्याय 256

श्लोक 35

तस्माद् दास्यामि ते पुत्रं विद्यावन्तं सुधार्मिकम् ।एष गच्छामि पुत्रार्थं कैलासं पर्वतोत्तमम्

tasmād dāsyāmi te putraṃ vidyāvantaṃ sudhārmikam | eṣa gacchāmi putrārthaṃ kailāsaṃ parvatottamam

हिन्दी अर्थ

अत: मैं तुम्हें विद्वान्‌ एवं परम धर्मात्मा पुत्र प्रदान करूँगा। पुत्रकी ्राप्तिके लिये मैं अभी उत्तम पर्वत कैलासको जा रहा हूँ

अध्याय 256

श्लोक 36

तत्रोपास्य महादेवं शङ्करं नीललोहितम् ।ततो लब्धास्मि पुत्रं ते भवाद् भूतहिते रतात्

tatropāsya mahādevaṃ śaṅkaraṃ nīlalohitam | tato labdhāsmi putraṃ te bhavād bhūtahite ratāt

हिन्दी अर्थ

वहाँ नीललोहित वर्णवाले महान्‌ देवता भगवान्‌ शड्टरकी उपासना करके प्राणियोंके हितमें तत्पर रहनेवाले भगवान्‌ शिवसे तुम्हारे लिये पुत्र प्राप्त करूँगा

अध्याय 256

श्लोक 37

तपसा ब्रह्मचर्येण भवं शङ्करमव्ययम् ।तोषयित्वा विरूपाक्षमादिदेवमजं विभुम्

tapasā brahmacaryeṇa bhavaṃ śaṅkaramavyayam | toṣayitvā virūpākṣamādidevamajaṃ vibhum

हिन्दी अर्थ

तपस्या और ब्रहमचर्य-पालनके द्वारा पबके उत्पादक अविनाशी अजनमा सर्वव्यापी आदिदेव वरूपाक्ष भगवान्‌ शड्रको संतुष्ट करके मैं उनसे पुत्र होनेका वर प्राप्त करूँगा

अध्याय 256

श्लोक 38

गमिष्याम्यहमद्यैव द्रष्टुं शङ्करमव्ययम् ।स च मे दास्यते पुत्रं तोषितस्तपसा मया

gamiṣyāmyahamadyaiva draṣṭuṃ śaṅkaramavyayam | sa ca me dāsyate putraṃ toṣitastapasā mayā

हिन्दी अर्थ

मैं आज ही अविनाशी भगवान्‌ शड्रका दर्शन करनेके लिये जाऊँगा। मेरे द्वारा केये गये तपसे संतुष्ट होकर वे मुझे पुत्र देंगे

अध्याय 256

श्लोक 39

तत्र गत्वा महादेवं नमस्कृत्य सहोमया ।प्रविश्य बदरीं पुण्यां मुनिजुष्टां तपोमयीम्

tatra gatvā mahādevaṃ namaskṛtya sahomayā | praviśya badarīṃ puṇyāṃ munijuṣṭāṃ tapomayīm

श्लोक 39–40 का हिन्दी अर्थ

वहाँ जाकर उमासहित महादेवजीको नमस्कार करके उन्हें पंतुष्ठ करूँगा । वहाँ पहुँचनेसे पहले मैं मुनियोंद्वारा सेवित पपोमयी पुण्यभूमि बदरीमें प्रवेश करूँगा, जो अग्रिहोत्रके भूमसे व्याप्त है। वह दिव्य भूमि सदा गज़ाजीके जलसे लावित रहती है। वहाँ पशु और पक्षियोंके समुदाय सब ओर विचरते हैं और सैकड़ों सिंह तथा व्याघ्र भरे रहते हें

अध्याय 256

श्लोक 40

अग्निहोत्राकुलां दिव्यां गङ्गाम्बुप्लावितां सदा ।मृगपक्षिसमायुक्तां सिंहद्वीपिशताकुलाम्

agnihotrākulāṃ divyāṃ gaṅgāmbuplāvitāṃ sadā | mṛgapakṣisamāyuktāṃ siṃhadvīpiśatākulām

अर्थ श्लोक 39 के साथ

अध्याय 256

श्लोक 41

बदरीफलसम्पूर्णा वानरक्षोभितद्रुमाम् ।वेत्रारूढमहावृक्षां कदलीखण्डमण्डिताम्

badarīphalasampūrṇā vānarakṣobhitadrumām | vetrārūḍhamahāvṛkṣāṃ kadalīkhaṇḍamaṇḍitām

हिन्दी अर्थ

वह स्थान बेरके फलोंसे परिपूर्ण है। तरानर वहाँके वृक्षोंको कम्पित करते रहते हैं। वहाँके वशाल वृक्षॉपर बेंतकी लताएँ फैली होती हैं । जहाँ-तहाँ केलोंके बगीचे उस स्थानकी शोभा बढ़ाते हैं '

अध्याय 256

श्लोक 42

मुनिभिर्वेदतत्त्वार्थविचारनिपुणैः सदा ।वेदनिश्चिततत्त्वार्थैः प्रमाणकुशलैर्युताम्

munibhirvedatattvārthavicāranipuṇaiḥ sadā | vedaniścitatattvārthaiḥ pramāṇakuśalairyutām

हिन्दी अर्थ

मोडध्याय: + १२२५ वेदके सुनिश्चित सिद्धान्तके ज्ञाता और प्रमाणकुशल मुनि सदा वहाँ निवास करते हैं

अध्याय 256

श्लोक 43

इदमेकमिदं तत्त्वमिति निश्चितमानसैः ।उपास्यमानामन्यत्र सिद्धैः सिद्धार्थतत्परैः

idamekamidaṃ tattvamiti niścitamānasaiḥ | upāsyamānāmanyatra siddhaiḥ siddhārthatatparaiḥ

हिन्दी अर्थ

यह एकमात्र अद्वितीय तत्त्व है, यही परमार्थ है, इस प्रकार मनसे निश्चय करनेवाले सिद्धार्थथरायण सिद्धजन जहाँ-तहाँ उस भूमिकी उपासना करते हैं

अध्याय 256

श्लोक 44

इतिहासपुराणज्ञैः सेव्यमानां महर्षिभिः ।गच्छद्भिः स्वर्गनिलयं परित्यज्य कलेवरम्

itihāsapurāṇajñaiḥ sevyamānāṃ maharṣibhiḥ | gacchadbhiḥ svarganilayaṃ parityajya kalevaram

हिन्दी अर्थ

इतिहास- पुराणके ज्ञाता महर्षि, जो शरीर छोड़नेके बाद स्वर्गलोकको जानेवाले हैं, उस भूमिका सेवन करते हैं

अध्याय 256

श्लोक 45

प्रसिद्धां महतीं देवीं यास्यामि सुकृतालयाम् ।इत्युक्त्वा विररामैव देवदेवो जनार्दनः

prasiddhāṃ mahatīṃ devīṃ yāsyāmi sukṛtālayām | ityuktvā virarāmaiva devadevo janārdanaḥ

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार उस प्रसिद्ध पुण्यस्थली दिव्य एवं विशाल बदरीपुरीको जाऊँगा'—ऐसा कहकर देवाधिदेव भगवान्‌ जनार्दन चुप हो गये

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.