Harivamsha Purana
265
अध्याय 265 / 318

Parva 3, Adhyāya 82

43 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ43 श्लोक

अध्याय 265

श्लोक 1

घण्टाकर्णेन भगवतः विष्णोः स्तुतिः पिशिताशो जगन्नाथं ददर्शाथ जगद्गुरुम् ।समाधौ च यथा दृष्टं भूमौ चापि तथा हरिम्

ghaṇṭākarṇena bhagavataḥ viṣṇoḥ stutiḥ piśitāśo jagannāthaṃ dadarśātha jagadgurum | samādhau ca yathā dṛṣṭaṃ bhūmau cāpi tathā harim

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर पेशाचने जगत्‌के स्वामी जगद्‌गुरु श्रीकृष्णका दर्शन क्रेया। समाधि-अवस्थामें उसने श्रीहरिके रूपकी जैसी ँकी की थी, उसी रूपमें उसने भूमिपर बैठे हुए ीकृष्णको देखा

अध्याय 265

श्लोक 2

अयं विष्णुरयं विष्णुरित्यूचे पिशिताशनः ।समाधौ च यथा दृष्टः सोऽयमत्रापि दृश्यते ।इत्युक्त्वा च पुनर्ब्रूते नृत्यन्निव हसन्निव

ayaṃ viṣṇurayaṃ viṣṇurityūce piśitāśanaḥ | samādhau ca yathā dṛṣṭaḥ so'yamatrāpi dṛśyate | ityuktvā ca punarbrūte nṛtyanniva hasanniva

हिन्दी अर्थ

उन्हें देखते ही वह मांसभक्षी पशाच बोल उठा—'ये ही विष्णु हैं, ये ही विष्णु हैं; योंकि समाधिमें वे मुझे जिस रूपमें दिखायी दिये , उसी रूपमें यहाँ भी उनका दर्शन हो रहा है।' सा कहकर वह पुन: नाचता और हँसता हुआ-सा हने लगा—

अध्याय 265

श्लोक 3

अयं स चक्री शरशार्ङ्गधन्वा गदी रथी सध्वजतूणपाणिः ।सहस्रमूर्धा सकलामरेशो जगत्प्रसूतिर्जगतां निवासः

ayaṃ sa cakrī śaraśārṅgadhanvā gadī rathī sadhvajatūṇapāṇiḥ | sahasramūrdhā sakalāmareśo jagatprasūtirjagatāṃ nivāsaḥ

हिन्दी अर्थ

ये ही वे चक्रधारी, शा़धनुष और बाण ग्रहण करनेवाले, गदाधारी, रथारूढ़ तथा त्ज एवं तरकस लिये रहनेवाले, सहस्र मस्तकवाले, वदेवेश्वर, जगत्स्ष्टा तथा तीनों लोकोंके निवासस्थान हरि हैं

अध्याय 265

श्लोक 4

विष्णुर्जिष्णुर्जगन्नाथः पुराणः पुरुषोत्तमः ।विश्वात्मा विश्वकर्ता यः सोऽयमेष सनातनः

viṣṇurjiṣṇurjagannāthaḥ purāṇaḥ puruṣottamaḥ | viśvātmā viśvakartā yaḥ so'yameṣa sanātanaḥ

हिन्दी अर्थ

जिन्हें विष्णु, जिष्णु, जगन्नाथ, पुराण- रुष, पुरुषोत्तम, विश्वात्मा और विधकर्ता कहा गया , वे सनातन परमात्मा ये ही हैं'

अध्याय 265

श्लोक 5

अस्यैव देवस्य हरेः स्तनान्तरे विराजते कौस्तुभरत्नदीपः ।यस्य प्रसादाज्जगदेतदादौ विराजते चन्द्रमसेव रात्रिः

asyaiva devasya hareḥ stanāntare virājate kaustubharatnadīpaḥ | yasya prasādājjagadetadādau virājate candramaseva rātriḥ

हिन्दी अर्थ

इन्हीं श्रीनारायणदेवके वक्ष:स्थलमें कौस्तुभमणि- पी दीप उद्भासित होता है। जिसके प्रसादसे यह जगत्‌ दिकालसे ही चन्द्रमासे रात्रिकी भाँति प्रकाशित हो रहा

अध्याय 265

श्लोक 6

योऽसौ पृथ्वीं दधाराशु दंष्ट्रया जलसञ्चयात् ।योऽयमेव हरिः साक्षाद् वाराहं वपुरास्थितः

yo'sau pṛthvīṃ dadhārāśu daṃṣṭrayā jalasañcayāt | yo'yameva hariḥ sākṣād vārāhaṃ vapurāsthitaḥ

हिन्दी अर्थ

जो वाराहरूपमें प्रकट हुए थे तथा जिन्होंने 'वीको अपनी दाढ़द्वारा एकार्णवकी जलराशिसे तत्काल हर निकाला और जलके ऊपर स्थापित किया, वे क्षात्‌ श्रीहरि ये ही हैं

अध्याय 265

श्लोक 7

बद्ध्वा तथा दानवमुग्रपौरुषं ददौ च शक्राय ततोऽनुराज्यम् ।बलिं बलादेव हरिः स वामनः स्तुतश्च भक्त्या मुनिभिः पुरातनैः

baddhvā tathā dānavamugrapauruṣaṃ dadau ca śakrāya tato'nurājyam | baliṃ balādeva hariḥ sa vāmanaḥ stutaśca bhaktyā munibhiḥ purātanaiḥ

हिन्दी अर्थ

उग्र पुरुषार्थवाले दानव लिको बलपूर्वक बाँधकर इन्हीं वामनरूपधारी श्रीहरिने त्रराज इन्द्रको त्रिलोकीका राज्य अर्पित किया। उस मय प्राचीन महर्षियोंने भक्तिभावसे इनकी स्तुति की

अध्याय 265

श्लोक 8

दंष्ट्राकरालः सुमहान् हत्वा यो दानवान् रणे ।निःशोकमखिलं लोकं चकारासौ जनार्दनः

daṃṣṭrākarālaḥ sumahān hatvā yo dānavān raṇe | niḥśokamakhilaṃ lokaṃ cakārāsau janārdanaḥ

हिन्दी अर्थ

इन्हीं जनार्दनने विकराल दाढ़वाले महान्‌ नृसिंहरूप कर रणभूमिमें दानवोंको मारा और समस्त संसारको करहित कर दिया

अध्याय 265

श्लोक 9

आदौ दधारैकभुजेन मन्दरं निर्जित्य सर्वानसुरान् महार्णवे ।ददौ च शक्राय सुधामयं महान् स एष साक्षादिह मामवस्थितः

ādau dadhāraikabhujena mandaraṃ nirjitya sarvānasurān mahārṇave | dadau ca śakrāya sudhāmayaṃ mahān sa eṣa sākṣādiha māmavasthitaḥ

हिन्दी अर्थ

जिन्होंने आदिकालमें एक ही थसे मन्दराचलको धारण किया और महासागरके तटपर मस्त असुरोंको परास्त करके इन्द्रको अमृत प्रदान या, वे ही ये साक्षात्‌ महाविष्णु यहाँ मेरें निकट राजमान हैं

अध्याय 265

श्लोक 10

यः शेते जलधौ नागे देव्या लक्ष्म्या सुखावहे ।हत्वा तौ दानवौ घोरौ मधुकैटभसंज्ञितौ

yaḥ śete jaladhau nāge devyā lakṣmyā sukhāvahe | hatvā tau dānavau ghorau madhukaiṭabhasaṃjñitau

हिन्दी अर्थ

जो प्रलयकालमें एकार्णवके जलमें धु और कैटभ नामक दो भयंकर दानवोंका वध करके षनागकी सुखदायिनी शय्यापर लक्ष्मीदेवीके साथ यन करते हैं (वे भगवान्‌ विष्णु ये ही हैं)

अध्याय 265

श्लोक 11

यमाहुराद्य विबुधा जगत्पतिं सर्वस्य धातारमजं जनित्रम् ।अणोरणीयांसमतिप्रमाणं स्थूलात्स्थविष्ठं हरिमेव विष्णुम्

yamāhurādya vibudhā jagatpatiṃ sarvasya dhātāramajaṃ janitram | aṇoraṇīyāṃsamatipramāṇaṃ sthūlātsthaviṣṭhaṃ harimeva viṣṇum

हिन्दी अर्थ

देवता न्हें सबका आदि, जगदीश्वर, सबका धारण-पोषण रनेवाले, अजन्मा, जन्मदाता, अणुसे भी अत्यन्त अणु, रम महान्‌, स्थूलसे भी स्थूलतम, हरि एवं विष्णु कहते (वे ये ही हैं )

अध्याय 265

श्लोक 12

यत्र स्थितमिदं सर्वं प्राप्ते लोकस्य नाशने ।आदौ यस्मात्समुत्पन्नं सोऽयं विष्णुरिति स्थितः

yatra sthitamidaṃ sarvaṃ prāpte lokasya nāśane | ādau yasmātsamutpannaṃ so'yaṃ viṣṇuriti sthitaḥ

हिन्दी अर्थ

लोकका संहार प्राप्त होनेपर यह रा विश्व जिनमें ही स्थित होता है तथा सृष्टिके प्रारम्भमें ननसे इसकी उत्पत्ति हुई है, वे ही ये भगवान्‌ विष्णु यहाँ राजमान हैं

अध्याय 265

श्लोक 13

यस्येच्छया सर्वमिदं प्रवृत्तं प्रवर्तते चापि जनार्दनस्य ।अयं स विष्णुः पुरुषोत्तमः शिवः प्रवर्तते मामिह यादवेश्वरः

yasyecchayā sarvamidaṃ pravṛttaṃ pravartate cāpi janārdanasya | ayaṃ sa viṣṇuḥ puruṣottamaḥ śivaḥ pravartate māmiha yādaveśvaraḥ

हिन्दी अर्थ

जिन जनार्दनकी इच्छासे यह सारा गत्‌ अपने-अपने कर्मोंमें प्रवृत्त हुआ है और हो रहा , वे शिवस्वरूप पुरुषोत्तम विष्णु ये यादवेश्वर श्रीकृष्ण हैं, जो यहाँ मेरे पास आये हैं

अध्याय 265

श्लोक 14

भृगोर्वंशे समुत्पन्नो जामदग्न्य इति श्रुतः ।शिष्यत्वं समवाप्यैव मृगव्याधस्य यः स्थितः

bhṛgorvaṃśe samutpanno jāmadagnya iti śrutaḥ | śiṣyatvaṃ samavāpyaiva mṛgavyādhasya yaḥ sthitaḥ

श्लोक 14–16 का हिन्दी अर्थ

जो भूगुकुलमें त्पन्न हो *जामदग्न्य' के नामसे विख्यात हुए तथा गव्याध नामक रुद्रदेवताका शिष्यत्व ग्रहण करके थत हैं। महादेवजीके शिष्यभूत जिन परशुरामजीने हासमरमें कुठारनामक शस्त्रद्वारा बलवान्‌ कृतवीर्यकुमार हखस्रबाहु अर्जुनको जो हाथी, घोड़े और रथोंकी सेनाएँ गथ लेकर चढ़ आया था, बलपूर्वक मार डाला; तत्पश्चात्‌ रुक्षेत्रमें आकर जिन्होंने पितरोंका श्राद्धकर्म सम्पन्न किया और इक्कीस बार इस जगत्‌को क्षत्रियोंसे सूना कर दिया वे ये ही भगवान्‌ श्रीकृष्ण हैं) '

अध्याय 265

श्लोक 15

जघान वीर्याद् बलिनं महारणे कुठारशस्त्रेण गिरीशशिष्यः ।सहस्रबाहुं कृतवीर्यसम्भवं हयैर्गजैश्चैव रथैश्च निर्गतम्

jaghāna vīryād balinaṃ mahāraṇe kuṭhāraśastreṇa girīśaśiṣyaḥ | sahasrabāhuṃ kṛtavīryasambhavaṃ hayairgajaiścaiva rathaiśca nirgatam

अर्थ श्लोक 14 के साथ

अध्याय 265

श्लोक 16

कुरुक्षेत्रं समासाद्य यश्चकार पितृक्रियाम् ।निःक्षत्रियमिमं लोकं कृतवानेकविंशतिः

kurukṣetraṃ samāsādya yaścakāra pitṛkriyām | niḥkṣatriyamimaṃ lokaṃ kṛtavānekaviṃśatiḥ

अर्थ श्लोक 14 के साथ

अध्याय 265

श्लोक 17

रघोरथ कुले जातो रामो नाम जनार्दनः ।सीतया च श्रिया युक्तो लक्ष्मणानुचरः कृती

raghoratha kule jāto rāmo nāma janārdanaḥ | sītayā ca śriyā yukto lakṣmaṇānucaraḥ kṛtī

श्लोक 17–18 का हिन्दी अर्थ

५ ८ द # 2 थकाकथक 2 «ता /। । २4 श्र५१ “तदनन्तर जनार्दनदेव रघुकुलमें उत्पन्न हो 'राम' नामसे विख्यात हुए। ' सीता! नामवाली लक्ष्मी देवीके साथ इनका सम्बन्ध स्थापित हुआ। इनके छोटे भाई लक्ष्मण सदा इनके ही अनुगामी बने रहे। ये बड़े पुण्यात्मा एवं विद्वान्‌ थे। इन रामरूपधारी जनार्दनने समुद्रमें सेतु बाँधकर अपने शीघ्रगामी बाणोंद्वारा राक्षसराज रावणका वध किया और विभीषणको राज्य देकर दस अश्वमेध यज्ञोंका अनुष्ठान किया (वे ही ये रामस्वरूप विष्णु यहाँ उपस्थित हैं )

अध्याय 265

श्लोक 18

कृत्वा च सेतुं जलधौ जनार्दनो हत्वा च रक्षःपतिमाशुगैः शरैः ।दत्त्वा च राज्यं स विभीषणाय दशाश्वमेधैरयजच्च योऽसौ

kṛtvā ca setuṃ jaladhau janārdano hatvā ca rakṣaḥpatimāśugaiḥ śaraiḥ | dattvā ca rājyaṃ sa vibhīṣaṇāya daśāśvamedhairayajacca yo'sau

अर्थ श्लोक 17 के साथ

अध्याय 265

श्लोक 19

वसुदेवकुले जातो वासुदेवेति शब्दितः ।गोकुले क्रीडते योऽसौ सङ्कर्षणसहायवान्

vasudevakule jāto vāsudeveti śabditaḥ | gokule krīḍate yo'sau saṅkarṣaṇasahāyavān

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर वे श्रीहरि वसुदेवकुलमें उत्पन्न हो वासुदेव नामसे विख्यात हुए और गोकुलमें भाँति-भाँतिकी लीलाएँ करने लगे। उस समय उनके बड़े भाई बलराम उनके सहायक थे

अध्याय 265

श्लोक 20

उत्तानशायी शिशुरूपधारी पीत्वा स्तनं पूतनिकाप्रदत्तम् ।व्यसुं चकाराशु जनार्दनस्तदा दनोः सुतां तामवसत् सुखं हरिः

uttānaśāyī śiśurūpadhārī pītvā stanaṃ pūtanikāpradattam | vyasuṃ cakārāśu janārdanastadā danoḥ sutāṃ tāmavasat sukhaṃ hariḥ

हिन्दी अर्थ

जब वे शिशुरूप धारण करके खाटपर उतान सोये हुए थे, उस समय उन जनार्दनने पूतनाके दिये हुए स्तनको पीकर उस दानवीको तत्काल प्राणहीन कर दिया। फिर वे श्रीहरि वहाँ सुखपूर्वक रहने लगे

अध्याय 265

श्लोक 21

पयःपानं तथा कुर्वन् भक्षयन् दधिपिण्डकम् ।दाम्ना बद्धोदरो विष्णुर्मात्रा रुषितया दृढम्

payaḥpānaṃ tathā kurvan bhakṣayan dadhipiṇḍakam | dāmnā baddhodaro viṣṇurmātrā ruṣitayā dṛḍham

हिन्दी अर्थ

जब कुछ बड़े हुए, तब दूध पीते हुए छिपकर दही और माखनके लौंदे खा जाते थे। तब एक दिन रोषमें भरी हुई मैया यशोदाने उन भगवान्‌ विष्णुकी कमरमें दृढ़तापूर्वक रस्सी बाँध दी

अध्याय 265

श्लोक 22

ततश्च दाम्ना सुदृढेन बद्धो जघान योऽसौ यमलार्जुनौ च ।क्रीडन् हरिर्गोकुलवासवासी गोपीभिरास्वाद्य मुखं स्तनं च

tataśca dāmnā sudṛḍhena baddho jaghāna yo'sau yamalārjunau ca | krīḍan harirgokulavāsavāsī gopībhirāsvādya mukhaṃ stanaṃ ca

हिन्दी अर्थ

उस सुदूढ़ बन्धनसे बँधे हुए उन दामोदरने जुड़वे अर्जुन नामक वृक्षोंको तोड़ डाला। गोकुलवासमें रहते हुए बालरूपधारी श्रीहरि गोपियोंके पाथ खेलते हुए कभी उनका स्तन पीते और कभी पुखका आस्वादन कर लेते थे

अध्याय 265

श्लोक 23

वृन्दावने वसन् विष्णुर्गोपैर्गोकुलवासिभिः ।तत्र हत्वा हयं राजन् विरराजांशुमानिव

vṛndāvane vasan viṣṇurgopairgokulavāsibhiḥ | tatra hatvā hayaṃ rājan virarājāṃśumāniva

हिन्दी अर्थ

वृन्दावनमें पोकुलवासी गोपोंके साथ रहते हुए श्रीहरि वहाँ अश्वरूपधारी केशीका वध करके सूर्यके समान शोभा पाने लगे

अध्याय 265

श्लोक 24

यः क्रीडते नागफणौ जनार्दनो निषेव्यमाणः सह गोपदारकैः ।महाह्रदे नागपतिं जगत्पतिर्ममर्द वीर्यातिशयं प्रदर्शयन्

yaḥ krīḍate nāgaphaṇau janārdano niṣevyamāṇaḥ saha gopadārakaiḥ | mahāhrade nāgapatiṃ jagatpatirmamarda vīryātiśayaṃ pradarśayan

हिन्दी अर्थ

जो जगदीश्रर जनार्दन गोपबालकोंसे पेवित हो नागके फनोंपर क्रीडा करते थे तथा जिन्होंने अपने अतिशय पराक्रमका परिचय देते हुए यमुनाके महान्‌ हृदमें नागराज कालियको रौंद डाला था (वे ही पे भगवान्‌ श्रीकृष्ण यहाँ उपस्थित हैं)

अध्याय 265

श्लोक 25

यो धेनुकं तालवने तत्फलैः सममच्छिनत् ।हत्वा दानवमुग्रं तं गोपान् विस्मापयत्यसौ

yo dhenukaṃ tālavane tatphalaiḥ samamacchinat | hatvā dānavamugraṃ taṃ gopān vismāpayatyasau

हिन्दी अर्थ

जिन्होंने तलवनमें तालफलोंके साथ ही भयंकर दानव धेनुकासुरका उच्छेद कर डाला और उसका वध करके गोपोंको भाश्चर्यमें डाल दिया (वे ही ये विष्णु यहाँ उपस्थित हें )

अध्याय 265

श्लोक 26

दधार यो गोधरमुग्रपौरुषान् महामतिर्मेघसमागमे सति ।विडम्बयञ्छक्रबलं प्रमोदयन् गोपांश्च गोपीश्च स गोकुलं हरिः

dadhāra yo godharamugrapauruṣān mahāmatirmeghasamāgame sati | viḍambayañchakrabalaṃ pramodayan gopāṃśca gopīśca sa gokulaṃ hariḥ

हिन्दी अर्थ

जिन परम बुद्धिमान्‌ श्रीहरिने संवर्तक मेघोंके घर आनेपर अपने उग्र पुरुषार्थसे गोवर्धनपर्वतको हाथपर उठा लिया और इन्द्रके बलकी विडम्बना करते हुए गोपों, गोपियों और गोकुलको आनन्दमग्र कर दिया वे ये ही हैं) '

अध्याय 265

श्लोक 27

गोपीनां स्तनमध्ये तु क्रीडते काममीश्वरः ।योऽसौ पिबंस्तदधरं मायामानुषदेहवान्

gopīnāṃ stanamadhye tu krīḍate kāmamīśvaraḥ | yo'sau pibaṃstadadharaṃ māyāmānuṣadehavān

हिन्दी अर्थ

हरि गोपियोंके वक्ष:स्थलपर उनके अधरामृतका पान रते हुए इच्छानुसार क्रीडा करते थे (वे ये ही )

अध्याय 265

श्लोक 28

गोपीभिरास्वाद्य मुखं विविक्ते शेते स्म रात्रौ सुखमेव केशवः ।स्तनान्तरेष्वेव तदा च तासां कामीव कान्ताधरपल्लवं पिबन्

gopībhirāsvādya mukhaṃ vivikte śete sma rātrau sukhameva keśavaḥ | stanāntareṣveva tadā ca tāsāṃ kāmīva kāntādharapallavaṃ piban

हिन्दी अर्थ

जो केशव रात्रिके समय वृन्दावनके एकान्त देशमें गोपियोंके साथ उनके मुखारविन्दका आस्वादन ररते हुए सुखपूर्वक सोते थे और कामी पुरुषोंके समान जनता (प्रेयसी )-के अधर-पल्लल-रसका पान करते हुए न गोपाज़नाओंके वक्ष:स्थलॉपर ही शयन करते थे (वे भु ये ही हैं)

अध्याय 265

श्लोक 29

अक्रूरेण समाहूतस्तेन गच्छन् हि यामुने ।जले यो ह्यर्चितस्तेन नागलोके स एव हि

akrūreṇa samāhūtastena gacchan hi yāmune | jale yo hyarcitastena nāgaloke sa eva hi

हिन्दी अर्थ

कंसके बुलानेपर अक्रूरजीके साथ ते हुए जिन श्रीहरिका यमुनाजीके जलमें प्रकट हुए गगलोकमें पूजन किया गया था और अक्रूरने यह बात त्यक्ष देखी थी, वे ही ये भगवान्‌ श्रीकृष्ण विराज रहे

अध्याय 265

श्लोक 30

ततश्च गच्छन्बलवाज्जनार्दनो हत्वा तमुग्रं रजकं बलात्पथि ।हृत्वा च वस्त्राणि यथेष्टमीश्वरो ययौ सरामो मथुरां पुरीं हरिः

tataśca gacchanbalavājjanārdano hatvā tamugraṃ rajakaṃ balātpathi | hṛtvā ca vastrāṇi yatheṣṭamīśvaro yayau sarāmo mathurāṃ purīṃ hariḥ

हिन्दी अर्थ

तत्पश्चात्‌ मथुराके मार्गपर चलते हुए बलरामसहित र्वसमर्थ बलवान्‌ जनार्दन श्रीहरिने उस उम्र स्वभाववाले गोबीको बलपूर्वक मारकर उसके हाथसे वस्त्र छीन नये और उन्हें धारण करके मथुरापुरीमें प्रवेश किया

अध्याय 265

श्लोक 31

लब्ध्वा च दामानि बहूनि कामदो दत्त्वा वरं माल्यकृते महान्तम् ।लब्ध्वानुलेपं सुरभिं च यादवः कुब्जां चकाराशु महार्हरूपाम्

labdhvā ca dāmāni bahūni kāmado dattvā varaṃ mālyakṛte mahāntam | labdhvānulepaṃ surabhiṃ ca yādavaḥ kubjāṃ cakārāśu mahārharūpām

हिन्दी अर्थ

आगे जाकर उन्हें बहुत-से फूलोंके हार प्रात हुए, तब च्छानुसार वर देनेवाले उन यदुनाथने मालीको महान्‌ र प्रदान किया। फिर कुब्जासे सुगन्धित अनुलेप पाकर न्होंने शीघ्र ही उसे परम सुन्दर रूपवती बना दिया

अध्याय 265

श्लोक 32

योऽसौ चापं समादाय मध्ये छित्त्वा महद्धनुः ।सिंहनादं महांश्चक्रे कल्पान्ते जलदो यथा

yo'sau cāpaṃ samādāya madhye chittvā mahaddhanuḥ | siṃhanādaṃ mahāṃścakre kalpānte jalado yathā

हिन्दी अर्थ

जन्होंने कंसका विशाल धनुष हाथमें लेकर उसे बीचसे गी तोड़ डाला और प्रलयकालके महान्‌ मेघकी भाँति म्भीर स्वरसे सिंहनाद किया (वे ये ही हैं)

अध्याय 265

श्लोक 33

हत्वा गजं घोरमुदग्ररूपं विषाणमादाय ततोऽनु केशवः ।ननर्त रङ्गे बहुरूपमीश्वरः कंसस्य दत्त्वा भयमुग्रवीर्यः

hatvā gajaṃ ghoramudagrarūpaṃ viṣāṇamādāya tato'nu keśavaḥ | nanarta raṅge bahurūpamīśvaraḥ kaṃsasya dattvā bhayamugravīryaḥ

हिन्दी अर्थ

त्पश्चात्‌ कुवलयापीड नामक प्रचण्ड रूपवाले भयंकर ाथीको मारकर उसके दाँत हाथमें लिये उग्र पराक्रमी गगवान्‌ केशव कंसको भय देते हुए रड़शालामें नाना [कारसे नृत्य करने लगे

अध्याय 265

श्लोक 34

योऽसौ हत्वा महामल्लं चाणूरं निहतद्विषम् ।यादवेभ्यो ददौ प्रीतिं कंसस्यैव तु पश्यतः

yo'sau hatvā mahāmallaṃ cāṇūraṃ nihatadviṣam | yādavebhyo dadau prītiṃ kaṃsasyaiva tu paśyataḥ

हिन्दी अर्थ

जिन्होंने शत्रुहन्ता चाणूर तमक महामल्लको कंसके सामने ही मारकर यादवोंको भानन्द प्रदान किया (वे ही ये श्रीहरि यहाँ उपस्थित )

अध्याय 265

श्लोक 35

जघान कंसं रिपुपक्षघातिनं पितृद्विषं यादवनामधेयम् ।संस्थाप्य राज्ये हरिरुग्रसेनं सान्दीपनं काश्यमुपागतो यः

jaghāna kaṃsaṃ ripupakṣaghātinaṃ pitṛdviṣaṃ yādavanāmadheyam | saṃsthāpya rājye harirugrasenaṃ sāndīpanaṃ kāśyamupāgato yaḥ

हिन्दी अर्थ

इसके बाद उन श्रीहरिने अपने पिताके साथ रष रखनेवाले, शत्रुपक्षघाती, यादवनामधारी कंसको मार डाला और उसके राज्यपर उग्रसेनको स्थापित करके वे विद्याध्ययनके लिये उन सान्दीपनि मुनिके समीप गये, जिनका जन्म काश्यगोत्र अथवा काशि-जनपदमें हुआ था परंतु जो अवन्तीपुरीमें रहते थे)

अध्याय 265

श्लोक 36

विद्यामवाप्य सकलां दत्त्वा पुत्रं महामुनेः ।साग्रजोऽथ जगामाशु मथुरां यादवीं पुरीम्

vidyāmavāpya sakalāṃ dattvā putraṃ mahāmuneḥ | sāgrajo'tha jagāmāśu mathurāṃ yādavīṃ purīm

हिन्दी अर्थ

४ विदा पापा पता 4 2 3956 पड ध्याय: + श्२५३ उनसे सम्पूर्ण विद्या पाकर उन महामुनिको उनका मरा हुआ पुत्र वापस दे वे बड़े भाई बलरामसहित शीघ्र ही यादवोंकी राजधानी मथुरापुरीको लौट गये

अध्याय 265

श्लोक 37

हत्वा निशुम्भं नरकं महामतिः कृत्वा स घोरं कदनं जनार्दनः ।ररक्ष विप्रान् मुनिवीरसङ्घान् देवांश्च सर्वाञ्जगतो जगत्पतिः

hatvā niśumbhaṃ narakaṃ mahāmatiḥ kṛtvā sa ghoraṃ kadanaṃ janārdanaḥ | rarakṣa viprān munivīrasaṅghān devāṃśca sarvāñjagato jagatpatiḥ

हिन्दी अर्थ

परम बुद्धिमान्‌ जगत्पति जनार्दनने निशुम्भ और नरकासुरका वध करके राक्षसोंका घोर संहार मचाकर ब्राह्मणों, मुनिसमूहों, वीरसमुदायों, समस्त देवताओं तथा जगत्‌की रक्षा की

अध्याय 265

श्लोक 38

स एष भगवान् विष्णुरद्य दृष्टो जनार्दनः ।कृतकृत्योऽस्मि सञ्जातः सायुज्यं प्राप्तवानहम्

sa eṣa bhagavān viṣṇuradya dṛṣṭo janārdanaḥ | kṛtakṛtyo'smi sañjātaḥ sāyujyaṃ prāptavānaham

हिन्दी अर्थ

वे ही ये भगवान्‌ विष्णु जनार्दन आज मुझे दिखायी दिये हैं । इनके दर्शनसे मैं कृतकृत्य हो गया। मुझे सायुज्य मोक्ष मिल गया

अध्याय 265

श्लोक 39

येन दृष्टो हरिः साक्षात्तस्य मुक्तिः करे स्थिता ।सोऽयमेष हरिः साक्षात् प्रत्यक्षमिह वर्तते

yena dṛṣṭo hariḥ sākṣāttasya muktiḥ kare sthitā | so'yameṣa hariḥ sākṣāt pratyakṣamiha vartate

हिन्दी अर्थ

जिसने साक्षात्‌ श्रीहरिका दर्शन कर लिया मुक्ति उसके हाथमें आ जाती है। यहाँ ये साक्षात्‌ श्रीहरि प्रत्यक्ष विद्यमान हैं

अध्याय 265

श्लोक 40

नूनं जन्मान्तरे पूर्वं धर्मः सञ्चित एव मे ।यस्य पाकः समुत्पन्नौ येनासौ दृश्यते मया

nūnaṃ janmāntare pūrvaṃ dharmaḥ sañcita eva me | yasya pākaḥ samutpannau yenāsau dṛśyate mayā

हिन्दी अर्थ

निश्चय ही पहले जन्मोंमें मेरे द्वारा धर्मका संचय भी हुआ ही है, जिसके फलका उदय हुआ है, जिससे मुझे इनका दर्शन प्राप्त हो रहा है

अध्याय 265

श्लोक 41

सर्वथा पुण्यवानस्मि नष्टसंसारबन्धनः ।किमस्मै दीयते वस्तु किं नु वक्ष्यामि साम्प्रतम् ।करिष्ये किमहं विष्णो वदस्वाद्य यथेप्सितम्

sarvathā puṇyavānasmi naṣṭasaṃsārabandhanaḥ | kimasmai dīyate vastu kiṃ nu vakṣyāmi sāmpratam | kariṣye kimahaṃ viṣṇo vadasvādya yathepsitam

श्लोक 41–42 का हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! ऐसा कहकर वह पिशाच बास्म्बार जोर-जोरसे गर्जना करने लगा। उसने विकट अट्रहास किया, फिर वह नृत्य करने लगा

अध्याय 265

श्लोक 42

इत्युक्त्वा विस्तरं नादं ननर्द बहुशस्तदा ।जहास विकृतं भूयो ननर्त पिशिताशनः

ityuktvā vistaraṃ nādaṃ nanarda bahuśastadā | jahāsa vikṛtaṃ bhūyo nanarta piśitāśanaḥ

अर्थ श्लोक 41 के साथ

अध्याय 265

श्लोक 43

नमो नमो हरे कृष्ण यादवेश्वर केशव ।प्रत्यक्षं च हरेस्तत्र ननर्त विविधं नृप

namo namo hare kṛṣṇa yādaveśvara keśava | pratyakṣaṃ ca harestatra nanarta vividhaṃ nṛpa

हिन्दी अर्थ

नरेश्वर! वहाँ भगवान्‌ श्रीकृष्णके सामने ही वह 'यादवेश्वर! केशव! कृष्ण! हरे! आपको नमस्कार है ! नमस्कार है! !' ऐसा कहकर नाना प्रकारसे नृत्य करने लगा

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.