Harivamsha Purana
266
अध्याय 266 / 318

Parva 3, Adhyāya 83

32 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ32 श्लोक

अध्याय 266

श्लोक 1

घण्टाकर्णेन भगवन्तं श्रीकृष्णं उपहारसमर्पणं, भगवता तं वरप्रदानं, मृतस्य ब्राह्मणस्य जीवनदानं विहस्य विकृतं भूयः प्रनृत्य च यथाबलम् ।ब्राह्मणस्य हतस्याथ शवमादाय सत्वरः

ghaṇṭākarṇena bhagavantaṃ śrīkṛṣṇaṃ upahārasamarpaṇaṃ, bhagavatā taṃ varapradānaṃ, mṛtasya brāhmaṇasya jīvanadānaṃ vihasya vikṛtaṃ bhūyaḥ pranṛtya ca yathābalam | brāhmaṇasya hatasyātha śavamādāya satvaraḥ

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! पुन: विकट भट्हास और यथाशक्ति नृत्य करके वह पिशाच तुरंत ही एक मारे गये ब्राह्मणका शव लेकर आया

अध्याय 266

श्लोक 2

द्विधाकृत्य महाघोरं पिशितं केशशाड्वलम् ।ततः खण्डं समादाय अद्भिरभ्युक्ष्य यत्नतः

dvidhākṛtya mahāghoraṃ piśitaṃ keśaśāḍvalam | tataḥ khaṇḍaṃ samādāya adbhirabhyukṣya yatnataḥ

श्लोक 2–3 का हिन्दी अर्थ

फेशोंसे युक्त उस महाघोर मांसके दो टुकड़े करके [क॒ टुकड़ेको लेकर उसने यत्रपूर्वक जलसे धोया, त्पश्वात्‌ उसे एक सुन्दर पात्रमें रखकर देवेश्वर ननार्दनको नमस्कार करके वह हाथ जोड़ प्रणतभावसे बड़ा हो गया और इस प्रकार बोला—

अध्याय 266

श्लोक 3

विधाय पात्रे सुशुभे नमस्कृत्य जनार्दनम् ।इदं प्रोवाच देवेशं प्राञ्जलिः प्रणतः स्थितः

vidhāya pātre suśubhe namaskṛtya janārdanam | idaṃ provāca deveśaṃ prāñjaliḥ praṇataḥ sthitaḥ

अर्थ श्लोक 2 के साथ

अध्याय 266

श्लोक 4

गृहाण मे जगन्नाथ भक्ष्यं योग्यं तव प्रभो ।भवादृशैर्जगन्नाथ ग्राह्यं सर्वात्मना हरे

gṛhāṇa me jagannātha bhakṣyaṃ yogyaṃ tava prabho | bhavādṛśairjagannātha grāhyaṃ sarvātmanā hare

हिन्दी अर्थ

जगन्नाथ! प्रभो! यह भक्ष्य आपके योग्य है। इसे ग्रहण कीजिये। जगदीश्वर ! हरे ! आप-जैसे प्रभुओंको भक्तकी पह भेंट सम्पूर्ण हृदयसे स्वीकार करनी चाहिये

अध्याय 266

श्लोक 5

भक्तिनम्रा वयं विष्णो नात्र कार्या विचारणा ।दत्तं यद् भक्तिनम्रेण ग्राह्यं तत् स्वामिना हरे

bhaktinamrā vayaṃ viṣṇo nātra kāryā vicāraṇā | dattaṃ yad bhaktinamreṇa grāhyaṃ tat svāminā hare

हिन्दी अर्थ

विष्णो! हम भक्तिभावसे आपके प्रति विनम्र हैं, इस विषयमें आपको कोई अन्यथा विचार नहीं करना त्राहिये। हरे! भक्तिभावसे विनीत होकर सेवकने जो स्तु अर्पित की है, उसे स्वामीको अवश्य ग्रहण करना चाहिये

अध्याय 266

श्लोक 6

नवं सुसंस्कृतं भक्ष्यं ब्रह्मण्यं शवमुत्तमम् ।अस्माकं पिशिताशानां शास्त्रे नियतमेव हि

navaṃ susaṃskṛtaṃ bhakṣyaṃ brahmaṇyaṃ śavamuttamam | asmākaṃ piśitāśānāṃ śāstre niyatameva hi

हिन्दी अर्थ

यह तुरंतका मारा हुआ, संस्कार- पम्पन्न, भक्षण करने योग्य, ब्राह्मणका उत्तम शव है। स्त्रमें हम पिशाचोंके लिये इसके भोजनका विधान ही

अध्याय 266

श्लोक 7

तस्माद् गृहाण भगवन् यदि दोषो न विद्यते ।इत्युक्त्वा विकृतं भूयो विहस्य स तु कामतः

tasmād gṛhāṇa bhagavan yadi doṣo na vidyate | ityuktvā vikṛtaṃ bhūyo vihasya sa tu kāmataḥ

श्लोक 7–9 का हिन्दी अर्थ

अत: भगवन्‌! यदि कोई दोष न हो तो भाप इसे ग्रहण करें।' ऐसा कहकर पुन: विकट भट्टहास करके उसने इच्छानुसार वह शवका न छूने गोग्य टुकड़ा उस समय भगवान्‌को देनेकी इच्छा की, ससे भगवान्‌ श्रीकृष्ण उसपर बहुत प्रसन्न हुए। उन्हों ने नन-ही-मन उसकी प्रशंसा करते हुए कहा-' अहो! सके मनमें मेरे प्रति सर्वत्र सेह और करुणा विद्यमान ।' मनमें ऐसा सोचकर यदुकुलतिलक श्रीकृष्णने ससे कहा—॥ ७-+

अध्याय 266

श्लोक 8

दातुमैच्छत् तदा खण्डमस्पृश्यं तु शवस्य ह ।ततः प्रीतोऽभवत् तस्मै मनसा पूजयच्च तम्

dātumaicchat tadā khaṇḍamaspṛśyaṃ tu śavasya ha | tataḥ prīto'bhavat tasmai manasā pūjayacca tam

अर्थ श्लोक 7 के साथ

अध्याय 266

श्लोक 9

अहोऽस्य स्नेहकारुण्यं मयि सर्वत्र वर्तते ।इति सञ्चिन्त्य मनसा प्रोवाच यदुपुङ्गवः

aho'sya snehakāruṇyaṃ mayi sarvatra vartate | iti sañcintya manasā provāca yadupuṅgavaḥ

अर्थ श्लोक 7 के साथ

अध्याय 266

श्लोक 10

अलमेतेन सर्वत्र पिशाच पिशिताशन ।अस्पृश्य मादृशैरेतद् ब्राह्मण्यं शवमुत्तमम्

alametena sarvatra piśāca piśitāśana | aspṛśya mādṛśairetad brāhmaṇyaṃ śavamuttamam

हिन्दी अर्थ

कच्चा मांस खानेवाले पिशाच ! र्वत्र इस मांसका ही उपयोग या समर्पण व्यर्थ है। जसे तुम ब्राह्मणका उत्तम शव बता रहे हो, यह मुझ- से लोगोंके लिये छूने योग्य भी नहीं है

अध्याय 266

श्लोक 11

ब्राह्मणः सर्वथा पूज्यो जन्तुभिर्धर्मकाङ्क्षिभिः ।पिशाचा घोरकर्माणो यतन्ते ब्रह्महिंसने

brāhmaṇaḥ sarvathā pūjyo jantubhirdharmakāṅkṣibhiḥ | piśācā ghorakarmāṇo yatante brahmahiṃsane

हिन्दी अर्थ

धर्मकी मभिलाषा रखनेवाले जीवोंके लिये ब्राह्मण सर्वथा [जनीय है। घोर कर्म करनेवाले पिशाच ही ब्राह्मणकी हैंसाके लिये प्रयत्न करते हैं'

अध्याय 266

श्लोक 12

न हन्तव्याः सदा विप्रास्तद्धिंसा नरकावहा ।तस्मादस्पृश्यमस्माभिर्नात्र कार्या विचारणा

na hantavyāḥ sadā viprāstaddhiṃsā narakāvahā | tasmādaspṛśyamasmābhirnātra kāryā vicāraṇā

हिन्दी अर्थ

5ध्याय; + श्२५५ “ब्राह्मणोंकी हिंसा कदापि नहीं करनी चाहिये; क्योंकि वह नरकमें ले जानेवाली है, अत: यह शव हमारे लिये सर्वथा अस्पृश्य है। इस विषयमें तुम्हें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये

अध्याय 266

श्लोक 13

भक्त्या प्रीतोऽस्मि भद्रं ते मनो निर्मलमेतया ।मनःशुद्ध्यै कृतो यत्नस्ततः प्रीतोऽस्मि मांसप

bhaktyā prīto'smi bhadraṃ te mano nirmalametayā | manaḥśuddhyai kṛto yatnastataḥ prīto'smi māṃsapa

हिन्दी अर्थ

मांस खानेवाले पेशाच! तुम्हारा भला हो! मैं तुम्हारी भक्तिसे बहुत पसन्न हूँ; क्योंकि इससे मन निर्मल हो जाता है। तुमने मन:शुद्धिकि लिये यत्र किया है। इसलिये मैं तुमपर पसन्न हूँ

अध्याय 266

श्लोक 14

अस्मत्सङ्कीर्तनाच्छश्वच्छुद्धं हि करणं तव ।अतीव मनसा प्रीत इत्युक्त्वा भगवान्हरिः

asmatsaṅkīrtanācchaśvacchuddhaṃ hi karaṇaṃ tava | atīva manasā prīta ityuktvā bhagavānhariḥ

श्लोक 14–15 का हिन्दी अर्थ

मेरे नामोंका निरन्तर कीर्तन करनेसे म्हारा अन्त:करण शुद्ध हो गया। इसलिये मैं मनसे म्हारे ऊपर अधिक प्रसन्न हूँ।' ऐसा कहकर भगवान्‌ विष्णु हरिने उस समय अपने कोमल हाथसे उस पशाचके सारे अड्लोंका स्पर्श किया। ऐसा करके उन रायणदेवने उसे पापसे मुक्त कर दिया

अध्याय 266

श्लोक 15

पस्पर्शाङ्गं तदा विष्णुः पिशाचस्याथ सर्वतः ।करेण मृदुना देवः पापान्निर्मोचयद्धरिः

pasparśāṅgaṃ tadā viṣṇuḥ piśācasyātha sarvataḥ | kareṇa mṛdunā devaḥ pāpānnirmocayaddhariḥ

अर्थ श्लोक 14 के साथ

अध्याय 266

श्लोक 16

ततस्तस्याभवद् रूपं कामरूपसमप्रभम् ।दीर्घकुञ्चितकेशाढ्यो दीर्घबाहुः सुलोचनः

tatastasyābhavad rūpaṃ kāmarūpasamaprabham | dīrghakuñcitakeśāḍhyo dīrghabāhuḥ sulocanaḥ

हिन्दी अर्थ

नके स्पर्श करते ही उस पिशाचका रूप कामदेवके प्रमान कान्तिमान्‌ हो गया। उसके सिरपर लम्बे-लम्बे मुँघराले केश शोभा देने लगे। भुजाएँ बड़ी-बड़ी और त्र सुन्दर हो गये

अध्याय 266

श्लोक 17

समाङ्गुलिः समनखः समवक्त्रः समुन्नसः ।पद्माक्षः पद्मवर्णाभः पद्मकेशरभूषणः

samāṅguliḥ samanakhaḥ samavaktraḥ samunnasaḥ | padmākṣaḥ padmavarṇābhaḥ padmakeśarabhūṣaṇaḥ

हिन्दी अर्थ

अँगुलियाँ समान और सुन्दर ही गयीं। नख भी समानरूपसे सुन्दर दिखायी देने नगे। उसके समान और सुडौल मुखमें केवल नासिका ँची थी। आँखें प्रफुल्ल कमलके समान मनोहर दिखायी रती थीं। अड्ञकान्ति नील-कमलके समान श्याम थी। हह कमलकेसररूपी आभूषणोंसे विभूषित था

अध्याय 266

श्लोक 18

केयूरी चाङ्गदी चैव कौशेयवसनस्तदा ।ज्ञानवान्सत्त्वसम्पन्नः साक्षादिन्द्र इवापरः

keyūrī cāṅgadī caiva kauśeyavasanastadā | jñānavānsattvasampannaḥ sākṣādindra ivāparaḥ

हिन्दी अर्थ

सकी भुजाओंमें केयूर और अड्भद नामक आभूषण भा दे रहे थे। शरीरपर रेशमी पीताम्बर सुशोभित भा। वह ज्ञानवान्‌ और सत्त्वसम्पन्न होकर साक्षात्‌ दूसरे न्द्रके समान शोभा पाता था

अध्याय 266

श्लोक 19

गन्धर्व इव गायंस्तु सिद्धः सिद्ध इव स्वयम् ।साक्षात्स्पृष्टं तदा विष्णोः करेण मृदुपूर्वकम्

gandharva iva gāyaṃstu siddhaḥ siddha iva svayam | sākṣātspṛṣṭaṃ tadā viṣṇoḥ kareṇa mṛdupūrvakam

श्लोक 19–20 का हिन्दी अर्थ

वह गन्धर्वके ममान गायक तथा साक्षात्‌ सिद्धके समान सिद्धियोंसे मम्पन्न था । उस समय साक्षात्‌ भगवान्‌ विष्णुके हाथका कोमल स्पर्श पाकर उस पिशाचका रूप जैसा अलौकिक गो गया था, वैसा रूप कालान्तरमें भी किसीका नहीं पा और आज भी मुनियोंको भी वैसा शरीर नहीं ाप्त होता है

अध्याय 266

श्लोक 20

न नूनं तादृशं रूपमासीत् कालान्तरेष्वपि ।अद्यापि नैव मुनयो लभन्ते तादृशं वपुः

na nūnaṃ tādṛśaṃ rūpamāsīt kālāntareṣvapi | adyāpi naiva munayo labhante tādṛśaṃ vapuḥ

अर्थ श्लोक 19 के साथ

अध्याय 266

श्लोक 21

कृत्वा सुबहुशो घोरं तपः परमदारुणम् ।यच्च लब्धं तदा तेन पिशाचेन नृपोत्तम

kṛtvā subahuśo ghoraṃ tapaḥ paramadāruṇam | yacca labdhaṃ tadā tena piśācena nṛpottama

हिन्दी अर्थ

नृपश्रेष्ठ! उस पिशाचने बारम्बार पर एवं परम दारुण तप करके उस समय जो दव्य रूप प्राप्त किया, वह अद्भुत था

अध्याय 266

श्लोक 22

को नु नाम जगन्नाथमाश्रितः सीदते नृप ।स हि सर्वत्र कल्याणो यो हि नित्यं जनार्दनम्

ko nu nāma jagannāthamāśritaḥ sīdate nṛpa | sa hi sarvatra kalyāṇo yo hi nityaṃ janārdanam

श्लोक 22–24 का हिन्दी अर्थ

नरेश्वर! गगदी धर भगवान्‌ जनार्दनका आश्रय लेकर कौन मनुष्य ष्ट पा सकता है। उसका सर्वत्र कल्याण ही होता '। भूपाल! जो प्रतिदिन उन भगवान्‌ विष्णुका ध्यान, तोत्रपाठ अथवा मन्त्रजप करता है, उसे कौन-सी वस्तु लभ नहीं है। तब दूसरे कामदेवके समान खड़े हुए ण्टाकर्णसे भगवानूने इस प्रकार कहा—'जबतक इन्द्र हेंगे, तबतक स्वर्गलोकमें तुम्हारा अक्षय निवास बना हेगा। तबतक तुम मेरे शासनसे स्वर्गमें ही रहो, अन्यत्र हीं

अध्याय 266

श्लोक 23

ध्यायन् पठञ्जपन्वापि तस्य किं नास्ति भूपते ।ततः प्रोवाच भगवान् स्थितं काममिवापरम्

dhyāyan paṭhañjapanvāpi tasya kiṃ nāsti bhūpate | tataḥ provāca bhagavān sthitaṃ kāmamivāparam

अर्थ श्लोक 22 के साथ

अध्याय 266

श्लोक 24

अक्षयः स्वर्गवासस्ते यावदिन्द्रो वसिष्यति ।तावत् स्वर्गी भवानस्तु शासनान्मम नान्यतः

akṣayaḥ svargavāsaste yāvadindro vasiṣyati | tāvat svargī bhavānastu śāsanānmama nānyataḥ

अर्थ श्लोक 22 के साथ

अध्याय 266

श्लोक 25

नष्टे शक्रे ततः स्वर्गात्सायुज्यं मम गच्छतु ।योऽयं भ्राता तव स्वर्गी यावदिन्द्रो भवेत्तदा

naṣṭe śakre tataḥ svargātsāyujyaṃ mama gacchatu | yo'yaṃ bhrātā tava svargī yāvadindro bhavettadā

हिन्दी अर्थ

इस इन्द्रके बदल जानेपर तुम स्वर्गसे पर उठकर मेरा सायुज्य प्राप्त कर लोगे। यह जो म्हारा भाई है, यह भी जबतक इन्द्र रहेंगे, तबतक वर्गीय सुखका उपभोग करेगा

अध्याय 266

श्लोक 26

वरं वरय भद्रं ते यस्ते मनसि वर्तते ।दातास्मि सर्वं सर्वत्र नात्र कार्या विचारणा

varaṃ varaya bhadraṃ te yaste manasi vartate | dātāsmi sarvaṃ sarvatra nātra kāryā vicāraṇā

हिन्दी अर्थ

तुम्हारा कल्याण ! तुम्हारे मनमें जो कामना हो उसके अनुसार कोई र माँगो। मैं सर्वत्र सब कुछ दे सकता हूँ, इस विषयमें गई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये '

अध्याय 266

श्लोक 27

यश्चेमं सङ्गमं देव संस्मरेन्नियतात्मवान् ।भक्तिस्तस्याचला देव त्वयि भूयाज्जनार्दन

yaścemaṃ saṅgamaṃ deva saṃsmarenniyatātmavān | bhaktistasyācalā deva tvayi bhūyājjanārdana

हिन्दी अर्थ

घण्टाकर्ण बोला—देव! जनार्दन ! जो अपने मनको यममें रखकर हम दोनोंके इस समागमके प्रसज्का मरण करे, उसकी आपके प्रति अविचल भक्ति

अध्याय 266

श्लोक 28

मनःशुद्धिर्भवेत्तस्य मा भूत् कलुषता हरे ।कालुष्यं मनसस्तस्य मा भूदेष वरो मम

manaḥśuddhirbhavettasya mā bhūt kaluṣatā hare | kāluṣyaṃ manasastasya mā bhūdeṣa varo mama

हिन्दी अर्थ

हरे! उसके मनकी शुद्धि हो जाय, उसमें लिनता न रह जाय। उस पुरुषके मनका सारा कालुष्य पट जाय, यह मेरा वर है

अध्याय 266

श्लोक 29

एवमस्त्विति देवेशः स्वर्गं गच्छेति केशवः ।इन्द्रातिथिर्भवानस्तु त्वां प्रतीक्ष्य हरिः स्थितः

evamastviti deveśaḥ svargaṃ gaccheti keśavaḥ | indrātithirbhavānastu tvāṃ pratīkṣya hariḥ sthitaḥ

हिन्दी अर्थ

यह सुनकर देवेश्वर शवने कहा-“' ऐसा ही होगा, अब तुम स्वर्गको जाओ, न्द्रके अतिथि बनो, इन्द्रदेव तुम्हारी प्रतीक्षामें खड़े '

अध्याय 266

श्लोक 30

इत्युक्त्वा भगवान् कृष्ण उत्थाप्य ब्राह्मणं तदा ।तेन स्तुतो जगन्नाथः पूजयित्वा च तं द्विजम्

ityuktvā bhagavān kṛṣṇa utthāpya brāhmaṇaṃ tadā | tena stuto jagannāthaḥ pūjayitvā ca taṃ dvijam

श्लोक 30–31 का हिन्दी अर्थ

ऐसा कहकर भगवान्‌ श्रीकृष्णने उस समय स मरे हुए ब्राह्मणको जिलाकर उठा दिया, तब उस ाह्मणने उनका स्तवन किया, फिर वे जगदीश्वर गोविन्द स ब्राह्मणका आदर-सत्कार करके उसे विदा दे, उस थानसे वहीं लौट गये, जहाँ वे सिद्ध-मुनिगण अग्रिहोत्रमें गे हुए थे

अध्याय 266

श्लोक 31

ततो विसृज्य गोविन्दस्तस्माद् देशादुपागमत् ।यत्र ते मुनयः सिद्धा अग्निहोत्रसमन्विताः

tato visṛjya govindastasmād deśādupāgamat | yatra te munayaḥ siddhā agnihotrasamanvitāḥ

अर्थ श्लोक 30 के साथ

अध्याय 266

श्लोक 32

स च स्वर्गी गतः स्वर्गमाज्ञया केशवस्य ह ।तस्मात्पठ सदा राजन्मनःशुद्धिं यदीच्छसि ।मनश्च शुद्धं भवति पठतस्ते जगत्पते

sa ca svargī gataḥ svargamājñayā keśavasya ha | tasmātpaṭha sadā rājanmanaḥśuddhiṃ yadīcchasi | manaśca śuddhaṃ bhavati paṭhataste jagatpate

हिन्दी अर्थ

वह स्वर्गलोकका अधिकारी ण्टाकर्ण भगवान्‌ श्रीकृष्णकी आज्ञासे स्वर्गलोकको बला गया। अत: राजन्‌ ! यदि तुम अपने मनकी शुद्धि आाहते हो तो सदा इस प्रसड़्का पाठ करो। जगत्पते ! सका पाठ करनेसे तुम्हारा मन निश्चय ही शुद्ध हो ायगा

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

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Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.