Harivamsha Purana
267
अध्याय 267 / 318

Parva 3, Adhyāya 84

28 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ28 श्लोक

अध्याय 267

श्लोक 1

श्रीकृष्णस्य कैलासं प्रापयित्वा तत्र द्वादशवर्षेभ्यः कठोरतपश्चरणं ततः स भगवान्विष्णुर्मुनिभ्यस्तत्त्वमादितः ।कथयामास यद् वृत्तं पिशाचस्य महात्मनः

śrīkṛṣṇasya kailāsaṃ prāpayitvā tatra dvādaśavarṣebhyaḥ kaṭhoratapaścaraṇaṃ tataḥ sa bhagavānviṣṇurmunibhyastattvamāditaḥ | kathayāmāsa yad vṛttaṃ piśācasya mahātmanaḥ

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर भगवान्‌ श्रीकृष्णने मुनियोंसे महात्मा पिशाचका जो वृत्तान्त था, उसको आरम्भसे ही ठीक-ठीक कह सुनाया

अध्याय 267

श्लोक 2

तच्छ्रुत्वा मुनयः सर्वे विस्मयं परमं गताः ।अहोऽस्य कर्मणः पाकस्तव सन्दर्शनात्तत

tacchrutvā munayaḥ sarve vismayaṃ paramaṃ gatāḥ | aho'sya karmaṇaḥ pākastava sandarśanāttata

हिन्दी अर्थ

वह सुनकर सभी मुनियोंको बड़ा विस्मय हुआ। वे बोले—'प्रभो! आपके दर्शनसे इस पिशाचके कर्मका अद्भुत फल प्रकट हुआ

अध्याय 267

श्लोक 3

अर्चितो मुनिभिः सर्वैः प्रीतः प्रीतिमतां प्रियः ।ततः प्रभाते विमले सूर्ये चाभ्युदिते सति

arcito munibhiḥ sarvaiḥ prītaḥ prītimatāṃ priyaḥ | tataḥ prabhāte vimale sūrye cābhyudite sati

श्लोक 3–4 का हिन्दी अर्थ

तत्पश्चात्‌ प्रीतिमानोंके प्रियतम श्रीहरिकी उन समस्त मुनियोंने अर्चना की, इससे वे बड़े प्रसन्न हुए। फिर निर्मल प्रभातकालमें सूर्योदय होनेपर वे भगवान्‌ श्रीकृष्ण गरुड़पर आरूढ़ हो उत्तम कैलास पर्वतको चले गये। जाते समय वे उन श्रेष्ठ मुनियोंसे कह गये कि आपलोग भी वहाँ पधारियेगा

अध्याय 267

श्लोक 4

आरुह्य गरुडं विष्णुर्ययौ कैलासमुत्तमम् ।भवद्भिस्तत्र गन्तव्यमित्युक्त्वा मुनिसत्तमान्

āruhya garuḍaṃ viṣṇuryayau kailāsamuttamam | bhavadbhistatra gantavyamityuktvā munisattamān

अर्थ श्लोक 3 के साथ

अध्याय 267

श्लोक 5

यत्र विश्वेश्वराः सिद्धास्तपस्यन्ति यतव्रताः ।यत्र वैश्रवणः साक्षादुपास्ते शङ्करं सदा

yatra viśveśvarāḥ siddhāstapasyanti yatavratāḥ | yatra vaiśravaṇaḥ sākṣādupāste śaṅkaraṃ sadā

हिन्दी अर्थ

जहाँ इस विश्वपर शासन करनेवाले सिद्ध पुरुष ब्रतका पालन करते हुए तपस्या करते हैं, जहाँ साक्षात्‌ कुबेर सदा भगवान्‌ शड्टरकी उपासना करते हैं

अध्याय 267

श्लोक 6

यश्च तन्मानसं नाम सरो हंसालयं महत् ।यत्र भृङ्गीरिटिर्देवमुपास्ते शङ्करं शिवम्

yaśca tanmānasaṃ nāma saro haṃsālayaṃ mahat | yatra bhṛṅgīriṭirdevamupāste śaṅkaraṃ śivam

श्लोक 6–8 का हिन्दी अर्थ

जहाँ वह हंसोंका निवासस्थान मानस नामक महान्‌ सरोवर है। जहाँ भृज्नीरिटि नामक शिवपार्षद अपने आराध्यदेव कल्याणस्वरूप भगवान्‌ शड्टरकी उपासना करते हैं और गणपतिपद प्राप्त करके सदा महादेवजीके पास ही रहते हैं । जहाँ सिंह, सूअर, हाथी, बाघ और मृग सदा साथ- साथ खेलते और एक-दूसरेके हितमें तत्पर रहकर जंगलकी पैदावारपर ही संतोष करते हैं, जहाँ गड्ा आदि पमुद्रगामिनी नदियाँ प्रकट हुई हैं

अध्याय 267

श्लोक 7

गाणपत्यमवाप्याथ हरपार्श्वचरः सदा ।यत्र सिंहा वराहाश्च द्विपद्वीपिमृगैः सह

gāṇapatyamavāpyātha harapārśvacaraḥ sadā | yatra siṃhā varāhāśca dvipadvīpimṛgaiḥ saha

अर्थ श्लोक 6 के साथ

अध्याय 267

श्लोक 8

क्रीडन्ति वन्यरतयः परस्परहिते रताः ।यत्र नद्यः समुत्पन्ना गङ्गाद्याः सागरङ्गमाः

krīḍanti vanyaratayaḥ parasparahite ratāḥ | yatra nadyaḥ samutpannā gaṅgādyāḥ sāgaraṅgamāḥ

अर्थ श्लोक 6 के साथ

अध्याय 267

श्लोक 9

यत्र विश्वेश्वरः शम्भुरच्छिनद् ब्रह्मणः शिरः ।यत्रोत्पन्ना महावेत्रा भूतानां दण्डतां ययुः

yatra viśveśvaraḥ śambhuracchinad brahmaṇaḥ śiraḥ | yatrotpannā mahāvetrā bhūtānāṃ daṇḍatāṃ yayuḥ

हिन्दी अर्थ

जहाँ विश्वनाथ भगवान्‌ शड्रने ब्रह्माजीके सिरका उच्छेद किया था, जहाँ उत्पन्न हुए बड़े-बड़े बेंत प्राणियोंके लिये दण्डका काम देते हैं

अध्याय 267

श्लोक 10

उमया यत्र सहितः शङ्करो नीललोहितः ।ऋषिभिः प्रार्थितः पूर्वं ददौ यत्र गिरिः सुताम्

umayā yatra sahitaḥ śaṅkaro nīlalohitaḥ | ṛṣibhiḥ prārthitaḥ pūrvaṃ dadau yatra giriḥ sutām

श्लोक 10–14 का हिन्दी अर्थ

जहाँ उमासहित नीललोहित भगवान्‌ शड्डटर निवास करते हैं। पृथ्वीनाथ! जहाँ ूर्वकालमें ऋषियों के प्रार्थना करनेपर गिरिराज हिमवान्‌ने कल्याणकारी जगद्धाता भगवान्‌ शिवको अपनी पुत्री प्रदान की थी। जहाँ श्रीहरिने बहुत दिनोंतक कमलों, गतदलों तथा अपने नेत्रद्वारा भी जगदीश्वर शिवकी भाराधना करके उनसे सुदर्शन चक्र प्राप्त किया था। नहाँ सिद्ध और किन्नरगण गुफाका आश्रय लेकर अपनी प्रिरतमाओंके साथ क्रीडा करते, आनन्दित होते और उत्तम मधु पीते थे । जिस पर्वतको अपनी सारी भुजाओंसे उठाकर रावण दिग्विजयसे विरत हो गया था, उस महाशैल कैलासपर आरूढ़ हो यदुकुलको आनन्दित करनेवाले देवकीनन्दन श्रीहरि मानससरोवरके उत्तर तटपर गये

अध्याय 267

श्लोक 11

शङ्कराय जगद्धात्रे शिवाय जगतीपते ।यत्र लेभे हरिश्चक्रमुपास्य बहुभिर्दिनैः

śaṅkarāya jagaddhātre śivāya jagatīpate | yatra lebhe hariścakramupāsya bahubhirdinaiḥ

अर्थ श्लोक 10 के साथ

अध्याय 267

श्लोक 12

पुष्करैः शतपत्रैश्च नेत्रेण च जगत्पतिम् ।गुहां यत्र समाश्रित्य क्रीडन्ते सिद्धकिन्नराः

puṣkaraiḥ śatapatraiśca netreṇa ca jagatpatim | guhāṃ yatra samāśritya krīḍante siddhakinnarāḥ

अर्थ श्लोक 10 के साथ

अध्याय 267

श्लोक 13

प्रियाभिः सह मोदन्ते पिबन्ते मधु चोत्तमम् ।यमुद्धृत्य भुजैः सर्वैः पौलस्त्यो विरराम ह

priyābhiḥ saha modante pibante madhu cottamam | yamuddhṛtya bhujaiḥ sarvaiḥ paulastyo virarāma ha

अर्थ श्लोक 10 के साथ

अध्याय 267

श्लोक 14

तमारुह्य महाशैलं देवकीनन्दनो हरिः ।मानसस्योत्तरं तीरं जगाम यदुनन्दनः

tamāruhya mahāśailaṃ devakīnandano hariḥ | mānasasyottaraṃ tīraṃ jagāma yadunandanaḥ

अर्थ श्लोक 10 के साथ

अध्याय 267

श्लोक 15

तपश्चर्तुं किल हरिर्विष्णुः सर्वेश्वरः शिवः ।जटी चीरी जगन्नाथो मानुषं वपुरास्थितः

tapaścartuṃ kila harirviṣṇuḥ sarveśvaraḥ śivaḥ | jaṭī cīrī jagannātho mānuṣaṃ vapurāsthitaḥ

श्लोक 15–20 का हिन्दी अर्थ

वे सर्वेधर शिवस्वरूप विष्णु-हरि वहाँ तपस्या करनेके लिये गये थे। मानव-शरीरधारी जगन्नाथ श्रीकृष्ण सिरपर जटा और शरीरमें चीर ( वस्त्र) धारण किये तपस्याके लिये दृढ़ निश्चय करके पवित्र भूमिपर बैठे । इस प्रकार वेदस्वरूप गरुड़ नामक वाहनसे उतरकर श्रीहरिने वहाँ बारह वर्षोतक तपस्या करनेका विचार किया। जगदीश्वर श्रीकृष्णने वहाँ फाल्गुन माससे तपस्या आरम्भ की । वे शाक खाकर रहते, जप करते तथा वेदाध्ययनमें तत्पर रहते थे। राजन्‌ ! मानवरूपधारी जगदीश्वर श्रीहरि किस उद्देश्यसे इच्छानुसार तप करते थे, इसे हम नहीं जानते (सर्वसमर्थ ईश्वरके लिये पुत्रके उद्देश्यसे भी तपस्याकी कोई सड्ति नहीं है) । वास्तवमें ईश्वरका संकल्प प्राणिमात्रके लिये दुर्य है—वे क्या सोचकर कौन-सा कार्य करते हैं, यह जानना सभीके लिये कठिन है। भूतोंसे सेवित कैलास पर्वतपर उन दिनों श्रीकृष्णके तपस्या करते समय कश्यपकुमार गरुड़जी उत्तम तपमें लगे हुए उन वासुदेवके हवन-कर्मकी सिद्धिके लिये समिधाएँ जुटाया करते थे

अध्याय 267

श्लोक 16

तपसे धृतचित्तस्तु शुचौ भूमावुपाविशत् ।अवरुह्य ततो यानाद् गरुडाद्वेदसम्मितात्

tapase dhṛtacittastu śucau bhūmāvupāviśat | avaruhya tato yānād garuḍādvedasammitāt

अर्थ श्लोक 15 के साथ

अध्याय 267

श्लोक 17

द्वादशाब्दं तपश्चर्तुं मनो दध्रे ततो हरिः ।फाल्गुनेन तु मासेन समारेभे जगत्पतिः

dvādaśābdaṃ tapaścartuṃ mano dadhre tato hariḥ | phālgunena tu māsena samārebhe jagatpatiḥ

अर्थ श्लोक 15 के साथ

अध्याय 267

श्लोक 18

शाकभक्षः कृतजपो वेदाध्ययनतत्परः ।किमुद्दिश्य जगन्ताथस्तपश्चरति मानवः

śākabhakṣaḥ kṛtajapo vedādhyayanatatparaḥ | kimuddiśya jagantāthastapaścarati mānavaḥ

अर्थ श्लोक 15 के साथ

अध्याय 267

श्लोक 19

तं न विद्मो यथाकामं दुर्ज्ञेयेश्वरचिन्तना ।तपस्यति तदा विष्णौ पर्वते भूतसेविते

taṃ na vidmo yathākāmaṃ durjñeyeśvaracintanā | tapasyati tadā viṣṇau parvate bhūtasevite

अर्थ श्लोक 15 के साथ

अध्याय 267

श्लोक 20

गरुडः कश्यपसुत इन्धनानि समाचिनोत् ।होमार्थं वासुदेवस्य चरतस्तप उत्तमम्

garuḍaḥ kaśyapasuta indhanāni samācinot | homārthaṃ vāsudevasya caratastapa uttamam

अर्थ श्लोक 15 के साथ

अध्याय 267

श्लोक 21

चक्रराजोऽथ पुष्पाणि सञ्चिनोति तदा हरेः ।दिक्षु सर्वासु सर्वत्र ररक्ष जलजस्तदा

cakrarājo'tha puṣpāṇi sañcinoti tadā hareḥ | dikṣu sarvāsu sarvatra rarakṣa jalajastadā

श्लोक 21–22 का हिन्दी अर्थ

चक्रराज सुदर्शन श्रीहरिके लिये फूल चुनता था। पाज्ञजन्य शड्ड सम्पूर्ण दिशाओंमें सर्वत्र उनकी रक्षा करता था। नन्दक खड्ग बड़े यत्रसे बहुसंख्यक कुश लाया करता था| कौमोदकी नामक गदा भी उनकी आवश्यक परिचर्या किया करती थी

अध्याय 267

श्लोक 22

खड्ग आहृत्य यत्नेन कुशान् सुबहुशस्तदा ।गदा कौमोदकी चैव परिचर्या चकार ह

khaḍga āhṛtya yatnena kuśān subahuśastadā | gadā kaumodakī caiva paricaryā cakāra ha

अर्थ श्लोक 21 के साथ

अध्याय 267

श्लोक 23

धनुःप्रवरमत्युग्रं शार्ङ्ग दानवभीषणम् ।स्थितं हि पुरतस्तस्य यथेष्टं भृत्यवत् स्वयम्

dhanuḥpravaramatyugraṃ śārṅga dānavabhīṣaṇam | sthitaṃ hi puratastasya yatheṣṭaṃ bhṛtyavat svayam

हिन्दी अर्थ

धनुषोंमें श्रेष्ठ अत्यन्त उग्र शाज़ नामक धनुष, जो दानवोंको भयभीत करनेवाला था, सदा भगवान्‌के सामने भृत्यके समान इच्छानुसार स्वयं खड़ा रहता था

अध्याय 267

श्लोक 24

जुहोति भगवान् विष्णुरेधोभिर्बहुभिः सदा ।आज्यादिभिस्तदा हव्यैरग्निं सम्पूज्य माधवः

juhoti bhagavān viṣṇuredhobhirbahubhiḥ sadā | ājyādibhistadā havyairagniṃ sampūjya mādhavaḥ

श्लोक 24–26 का हिन्दी अर्थ

भगवान्‌ श्रीकृष्ण सदा बहुत-सी समिधाओंद्वारा आहुति देते थे। उस समय कर्मकुशल माधवने घृत आदि हवनीय पदार्थोद्धारा अग्िका पूजन करके संक्षेप और विस्तारके साथ अग्रिहोत्र कर्मको पूर्ण किया। पहले वे एक महीनेमें एक बार खाकर मनको संयम-नियममें रखते हुए तप करने लगे। फिर वे केशव प्रत्येक दूसरे महीनेपर एक बार अन्न ग्रहण करने लगे। इस तरह समय बढ़ाते हुए वे एक वर्षमें एक बार किसी एक ही अन्नका आहार करने लगे

अध्याय 267

श्लोक 25

सप्तार्चिषः समाप्तिं च समस्तव्यस्ततः कृती ।एकस्मिन्नेकदा मासे भुञ्जानो नियतात्मवान्

saptārciṣaḥ samāptiṃ ca samastavyastataḥ kṛtī | ekasminnekadā māse bhuñjāno niyatātmavān

अर्थ श्लोक 24 के साथ

अध्याय 267

श्लोक 26

द्वितीये त्वथ पर्याये भुञ्जन्नेकेन केशवः ।एकस्मिन् वत्सरे भुञ्जंस्तथैवैकेन केनचित्

dvitīye tvatha paryāye bhuñjannekena keśavaḥ | ekasmin vatsare bhuñjaṃstathaivaikena kenacit

अर्थ श्लोक 24 के साथ

अध्याय 267

श्लोक 27

समाप्य तत् तपः सर्वमेवमेव जगत्पतिः ।द्वादशाब्दे तथा पूर्णे ऊनमासे जगत्पतिः

samāpya tat tapaḥ sarvamevameva jagatpatiḥ | dvādaśābde tathā pūrṇe ūnamāse jagatpatiḥ

श्लोक 27–28 का हिन्दी अर्थ

मोडध्याय: + श्२५९ इसी नियमसे वह सारी तपस्या पूर्ण करके जब बारहवाँ वर्ष पूर्ण होनेमें केवल एक मासकी कमी रह गयी, तब वे जगदीश्वर जनार्दन सर्वव्यापी साक्षात्‌ सर्वेश्वर श्रीहरि अग्रिकी स्थापना करके मन्त्रपाठ- पूर्वक हवन करने लगे तथा आरण्यकका पाठ और उत्तम प्रणवका जप करते हुए भगवान्‌ शिवके ध्यानमें मगर हो गये

अध्याय 267

श्लोक 28

जुह्वन्नग्निं समास्थाय पठन् मन्त्रं जनार्दनः ।आरण्यकं पठन् विष्णुः साक्षात् सर्वेश्वरो हरिः ।आस्ते ध्यानपरस्तत्र पठन् प्रणवमुत्तमम्

juhvannagniṃ samāsthāya paṭhan mantraṃ janārdanaḥ | āraṇyakaṃ paṭhan viṣṇuḥ sākṣāt sarveśvaro hariḥ | āste dhyānaparastatra paṭhan praṇavamuttamam

अर्थ श्लोक 27 के साथ

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

धर्म ग्रंथ निःशुल्क और विज्ञापन-रहित है। Dharma Granth is free and has no ads. इसे ऐसा बनाए रखने में सहयोग करेंHelp keep it that way → How it is funded

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.