Harivamsha Purana
275
अध्याय 275 / 318

Parva 3, Adhyāya 92

22 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ22 श्लोक

अध्याय 275

श्लोक 1

पौण्ड्रकस्य अन्तिके नारदस्यागमनं, तस्य सार्धं वार्तालापः ततः कैलासशिखरान्निर्गतो मुनिसत्तमः ।नारदः सर्वलोकज्ञः पौण्ड्रस्य नगरं प्रति

pauṇḍrakasya antike nāradasyāgamanaṃ, tasya sārdhaṃ vārtālāpaḥ tataḥ kailāsaśikharānnirgato munisattamaḥ | nāradaḥ sarvalokajñaḥ pauṇḍrasya nagaraṃ prati

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर सम्पूर्ण लोकोंके ज्ञाता मुनिश्रेष्ठ नारद कैलासशिखरसे निकलकर पौण्ड्रकके नगरकी ओर चल दिये

अध्याय 275

श्लोक 2

अवतीर्य नभोभागात् प्रत्यागम्य नरोत्तमम् ।द्वाःस्थेन च समाज्ञप्तः प्रविवेश गृहोत्तमम्

avatīrya nabhobhāgāt pratyāgamya narottamam | dvāḥsthena ca samājñaptaḥ praviveśa gṛhottamam

हिन्दी अर्थ

आकाशसे उतरकर द्वारपालसे राजाज्ञा प्राप्त करके उन्होंने राजाके उत्तम भवनमें प्रवेश किया और वे उस नर्त्रेष्ठ पौण्ड्रकसे मिले

अध्याय 275

श्लोक 3

अर्घ्यादिसमुदाचारं नृपाल्लब्ध्वा महामुनिः ।निषसादासने शुभ्रे ह्यास्तृते शुभवाससा

arghyādisamudācāraṃ nṛpāllabdhvā mahāmuniḥ | niṣasādāsane śubhre hyāstṛte śubhavāsasā

हिन्दी अर्थ

राजासे अर्ध्य आदि अतिथि-सत्कार पाकर वे महामुनि सुन्दर वस्त्र बिछे हुए शुभ्र आसनपर विराजमान हुए

अध्याय 275

श्लोक 4

कुशलं पृष्टवान्भूयो नृपः स मुनिसत्तमम् ।उवाच नारदं भूयः पौण्ड्रको बलगर्वितः

kuśalaṃ pṛṣṭavānbhūyo nṛpaḥ sa munisattamam | uvāca nāradaṃ bhūyaḥ pauṇḍrako balagarvitaḥ

हिन्दी अर्थ

तत्पश्चात्‌ बलके घमंडमें भरे हुए राजा पौण्ड्रकने पहले तो मुनिश्रेष्ठ नारदसे कुशल- समाचार पूछा, फिर इस प्रकार कहना आरम्भ किया—

अध्याय 275

श्लोक 5

भवान् सर्वत्र कुशलः सर्वकार्येषु पण्डितः ।प्रथितो देवसिद्धेषु गन्धर्वेषु महात्मसु

bhavān sarvatra kuśalaḥ sarvakāryeṣu paṇḍitaḥ | prathito devasiddheṣu gandharveṣu mahātmasu

श्लोक 5–7 का हिन्दी अर्थ

विप्रवर! आप सर्वत्र कुशल हैं, समस्त कार्योमें पण्डित हैं। देवताओं, सिद्धों और महात्मा गन्धर्वोमें आपकी ख्याति है। आप बिना किसी बाधाके सर्वत्र जा सकते हैं। सदा सब जगह आपकी पहुँच है। इस ब्रह्माण्डमें कोई भी स्थान आपके लिये अगम्य नहीं है। नारदजी! यह तो बताइये, आप जहाँ-जहाँ गये हैं, वहाँ-वहाँ यह तप:सिद्ध और लोकमें विख्यात बलशाली पौण्ड्रक ही *वासुदेव' नामसे विख्यात है न ?

अध्याय 275

श्लोक 6

सर्वत्रगो निराबाधो गत्वा सर्वत्र सर्वदा ।अगम्यं तव विप्रेन्द्र ब्रह्माण्डे न हि किञ्चन ।नारदेदं वद त्वं हि यत्र यत्र गतो भवान्

sarvatrago nirābādho gatvā sarvatra sarvadā | agamyaṃ tava viprendra brahmāṇḍe na hi kiñcana | nāradedaṃ vada tvaṃ hi yatra yatra gato bhavān

अर्थ श्लोक 5 के साथ

अध्याय 275

श्लोक 7

तत्र तत्र तपःसिद्धो लोके प्रथितवीर्यवान् ।पौण्ड्र एव च विख्यातो वासुदेवेति शब्दितः

tatra tatra tapaḥsiddho loke prathitavīryavān | pauṇḍra eva ca vikhyāto vāsudeveti śabditaḥ

अर्थ श्लोक 5 के साथ

अध्याय 275

श्लोक 8

शङ्खी चक्री गदी शार्ङ्गी खड्गी तूणी तनुत्रवान् ।विजेता राजसिंहानां दाता सर्वस्य सर्वदा

śaṅkhī cakrī gadī śārṅgī khaḍgī tūṇī tanutravān | vijetā rājasiṃhānāṃ dātā sarvasya sarvadā

हिन्दी अर्थ

मैं ही शड्ुधारी, चक्रपाणि, गदाधर और शा धनुर्धर हूँ। तलवार और तरकस लेकर कवच धारण करके अनेकानेक राजसिंहोंपर विजय पानेवाला मैं ही हूँ। मैं ही सदा सबको सब कुछ देनेवाला हूँ

अध्याय 275

श्लोक 9

भोक्ता राज्यस्य सर्वस्य शास्ता राजा बलाद् बली ।अजेयः शत्रुसैन्यानां रक्षिता स्वजनस्य च

bhoktā rājyasya sarvasya śāstā rājā balād balī | ajeyaḥ śatrusainyānāṃ rakṣitā svajanasya ca

हिन्दी अर्थ

मैं समस्त राज्यका भोक्ता और बलपूर्वक शासन करनेवाला बलवान्‌ राजा हूँ, शत्रुसैनिकोंके लिये अजेय तथा स्वजनोंका रक्षक हूँ

अध्याय 275

श्लोक 10

योऽद्य गोपकनामासौ वासुदेवेति शब्दितः ।तस्य वीर्यबले न स्तो नाम्नोऽस्य मम धारणे

yo'dya gopakanāmāsau vāsudeveti śabditaḥ | tasya vīryabale na sto nāmno'sya mama dhāraṇe

हिन्दी अर्थ

आजकल जो वह गोप वासुदेव नामसे विख्यात हो रहा है, उसमें इतना बल और पराक्रम नहीं है, जिससे वह मेरा नाम धारण कर सके

अध्याय 275

श्लोक 11

स हि गोपो वृथा बाल्याद्धारयत्येव नाम मे ।इदं निश्चिनु विप्रेन्द्र एक एव भवाम्यहम्

sa hi gopo vṛthā bālyāddhārayatyeva nāma me | idaṃ niścinu viprendra eka eva bhavāmyaham

श्लोक 11–13 का हिन्दी अर्थ

वह ग्वाला अज्ञानवश व्यर्थ ही मेरा नाम धारण करता है। विप्रवर! आप निश्चितरूपसे यह जान लीजिये कि मैं उस बलवान्‌ यादवको जीतकर अकेला ही इस जगतमें वासुदेव रहूँगा। समस्त वृष्णिवंशियोंको बलपूर्वक पराजित करके श्रीकृष्णकी निवासभूता द्वारकापुरीको नष्ट कर डालूँगा। महामते ! मैं स्वयं तो युद्ध करूँगा ही, ये समस्त बलवान्‌ राजा भी मेरी ओरसे युद्धके लिये आये हैं'

अध्याय 275

श्लोक 13

वासुदेवो जगत्यस्मिन् निर्जित्य बलिनं यदुम् ।वृष्णीन्सर्वान् बलात् क्षिप्त्वा निहनिष्ये च तां पुरीम् ॥ द्वारकां विष्णुनिलयां योद्धा चाहं महामते ।एते च बलिनः सर्वे नृपा मम समागताः

vāsudevo jagatyasmin nirjitya balinaṃ yadum | vṛṣṇīnsarvān balāt kṣiptvā nihaniṣye ca tāṃ purīm || dvārakāṃ viṣṇunilayāṃ yoddhā cāhaṃ mahāmate | ete ca balinaḥ sarve nṛpā mama samāgatāḥ

अर्थ श्लोक 11 के साथ

अध्याय 275

श्लोक 14

अश्वाश्च वेगिनः सन्ति रथा वायुजवा मम ।उष्ट्रा मत्ताः सहस्रं च गजा नियुतमेव च

aśvāśca veginaḥ santi rathā vāyujavā mama | uṣṭrā mattāḥ sahasraṃ ca gajā niyutameva ca

श्लोक 14–16 का हिन्दी अर्थ

मेरे पास बहुत-से वेगशाली अधथ्च हैं, वायुके समान वेगशाली रथ हैं, सहस््रों मतवाले ऊँट और लाखों मदमत्त हाथी हैं। इस विशाल सेनाके साथ रणभूमिमें मैं श्रीकृष्णका वध कर डालूँगा। विप्रवर! ब्रह्मन्‌! आप प्रत्येक नगरमें मेरे लिये सदा ऐसी ही बात कहें। नारद बाबा! इस समय इन्द्रके समक्ष भी आपको सदा मेरे बल-पराक्रमकी ही बात करनी चाहिये। विभो! तपोधन! यही मेरी प्रार्थना है। मैं आपको नमस्कार करता हूँ

अध्याय 275

श्लोक 15

एतेनाहं बलेनाजौ हनिष्ये केशवं रणे ।तस्मादेवं सदा विप्र वद ब्रह्मन् पुरे मम

etenāhaṃ balenājau haniṣye keśavaṃ raṇe | tasmādevaṃ sadā vipra vada brahman pure mama

अर्थ श्लोक 14 के साथ

अध्याय 275

श्लोक 16

इन्द्रस्यापि सदा विप्र वद नारद साम्प्रतम् ।प्रार्थनैषा मम विभो नमस्ये त्वां तपोधन

indrasyāpi sadā vipra vada nārada sāmpratam | prārthanaiṣā mama vibho namasye tvāṃ tapodhana

अर्थ श्लोक 14 के साथ

अध्याय 275

श्लोक 17

सर्वत्रगः सदा चास्मि यावद् ब्रह्माण्डसंस्थितिः ।आचार्यः सर्वकार्येषु गमने केनचिन्नृप

sarvatragaḥ sadā cāsmi yāvad brahmāṇḍasaṃsthitiḥ | ācāryaḥ sarvakāryeṣu gamane kenacinnṛpa

हिन्दी अर्थ

नारदजीने कहा—नरेधर! जहाँतक ब्रह्माण्डकी स्थिति है, मैं सदा सर्वत्र जा सकता हूँ। किसी भी पुरुषको अपने समस्त कार्योके लिये मेरी शरण लेनी चाहिये। सर्वत्र जानेकी कलामें तो मैं आचार्य ही हूँ

अध्याय 275

श्लोक 18

किं नु वक्तुं तथा राजन्नुत्सहे नृपसत्तम ।महीं शासति देवेशे चक्रपाणौ जनार्दने

kiṃ nu vaktuṃ tathā rājannutsahe nṛpasattama | mahīṃ śāsati deveśe cakrapāṇau janārdane

श्लोक 18–19 का हिन्दी अर्थ

राजन्‌! नृपश्रेष्ठ! तुम जैसा चाहते हो, वैसी बात कहनेका उत्साह मैं कैसे कर सकता हूँ! जबतक बन्धु-बान्धवोंसहित समस्त दुष्टांका वध करके सर्वत्र जा सकनेवाले सर्वव्यापी देव, देवेधर, चक्रपाणि जनार्दन इस पृथ्वीका शासन कर रहे हैं, तबतक उन श्रीहरिके रहते हुए दूसरा कौन वासुदेव कहला सकता है

अध्याय 275

श्लोक 19

विष्णौ सर्वत्रगे देवे दुष्टान् हत्वा सबान्धवान् ।वासुदेवेति को नाम तिष्ठत्यस्मिन् हराविति

viṣṇau sarvatrage deve duṣṭān hatvā sabāndhavān | vāsudeveti ko nāma tiṣṭhatyasmin harāviti

अर्थ श्लोक 18 के साथ

अध्याय 275

श्लोक 20

को नाम वक्तुमेवेदं कृष्णे शासति गोमती ।अज्ञानाद् वक्तुमेवं च समर्थाः प्राकृता जनाः

ko nāma vaktumevedaṃ kṛṣṇe śāsati gomatī | ajñānād vaktumevaṃ ca samarthāḥ prākṛtā janāḥ

हिन्दी अर्थ

सूर्य-किरणोंसे प्रकाशित होनेवाले द्युलोक और भूलोकपर जबतक श्रीकृष्णका शासन चल रहा है, तबतक कौन मनुष्य ऐसी बात कह सकता है कि 'पौण्ड्रक वासुदेव है'। तुम्हारे-जैसे मूढ़ मनुष्य ही अज्ञानवश ऐसी बात कहनेमें समर्थ हो सकते हैं

अध्याय 275

श्लोक 21

हरिः सर्वत्रगो विष्णुर्दर्पं ते व्यपनेष्यति ।अचिन्त्यविभवो विष्णुः शार्ङ्गधन्वा गदाधरः

hariḥ sarvatrago viṣṇurdarpaṃ te vyapaneṣyati | acintyavibhavo viṣṇuḥ śārṅgadhanvā gadādharaḥ

हिन्दी अर्थ

सर्वत्र जानेकी क्षमता रखनेवाले, अचिन्त्य वैभवशाली, पापहारी, सर्वव्यापी, शा धन्वा, गदाधर विष्णु तुम्हारे घमंडको दूर कर देंगे

अध्याय 275

श्लोक 22

आदिदेवः पुराणात्मा दर्प ते व्यपनेष्यति ।हास्यमेतन्महाराज यच्च वै तत्र संस्थितम्

ādidevaḥ purāṇātmā darpa te vyapaneṣyati | hāsyametanmahārāja yacca vai tatra saṃsthitam

हिन्दी अर्थ

महाराज! आदिदेव, पुराणपुरुष श्रीकृष्ण तुम्हारे दर्पका दलन कर देंगे। तुम जो कुछ सोचते या कहते हो, यह उपहासकी बात है। राजन्‌ ! श्रीकृष्णके पास जो शार- धनुष और महाभयंकर खड्ग है, उनका तुम्हारे इन अस्त्रोंसे उच्छेद नहीं हो सकता। इस समय तुम्हारे लिये यह महान्‌ हासका समय आ पहुँचा है

अध्याय 275

श्लोक 23

शार्ङ्ग खड्गं तथा राजन् महाघोरं न दाप्यते ।अतीव ह्रासकालोऽयं तव सम्प्रति वर्तते

śārṅga khaḍgaṃ tathā rājan mahāghoraṃ na dāpyate | atīva hrāsakālo'yaṃ tava samprati vartate

अर्थ श्लोक 22 के साथ

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

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आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

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Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.