Harivamsha Purana
276
अध्याय 276 / 318

Parva 3, Adhyāya 93

25 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ25 श्लोक

अध्याय 276

श्लोक 1

नारदेन श्रीकृष्णस्य समीपे गमनं, पौण्ड्रकस्य द्वारकोपरि आक्रमणं ततः क्रुद्धौ महाराज पौण्ड्रो मदबलान्वितः ।नारदं विप्रवर्यं तं प्रोवाच नृपसंसदि

nāradena śrīkṛṣṇasya samīpe gamanaṃ, pauṇḍrakasya dvārakopari ākramaṇaṃ tataḥ kruddhau mahārāja pauṇḍro madabalānvitaḥ | nāradaṃ vipravaryaṃ taṃ provāca nṛpasaṃsadi

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—महाराज! तदनन्तर बलके मदसे उन्मत्त रहनेवाला पौण्ड्रक कुपित हो उस राजसभामें विप्रवर नारदजीसे बोला—

अध्याय 276

श्लोक 2

किमिदं प्राह विप्रर्षे राजाहं च द्विजैः सह ।गच्छ त्वं काममथ वा मुने शापप्रदः सदा

kimidaṃ prāha viprarṣe rājāhaṃ ca dvijaiḥ saha | gaccha tvaṃ kāmamatha vā mune śāpapradaḥ sadā

श्लोक 2–5 का हिन्दी अर्थ

ब्रह्मरे ! आप यह क्या कहते हैं ? मैं राजा हूँ और इन ब्राह्मणोंके साथ हूँ। मुने! आप सदा शाप देनेवाले हैं, अत: अपनी इच्छाके अनुसार यहाँसे चले जाइये। महाबुद्धे! मैं आपसे डरता हूँ, अतः चाहें तो अभी चले जाइये! । नृपश्रेष्ठ पौण्ड्कके ऐसा कहनेपर आकाशचारी नारदजी चुपचाप वहाँसे उस स्थानको चले गये, जहाँ भगवान्‌ श्रीकृष्ण थे। श्रीकृष्णके पास जाकर उन्होंने उनसे उसकी सारी बातें कह सुनायीं। उन्हें सुनकर भगवान्‌ श्रीकृष्णने कहा-'द्विजश्रेष्ठ ! पौण्ड्रक जैसा चाहे बकता रहे, कल मैं उसका घमंड दूर कर दूँगा'

अध्याय 276

श्लोक 3

भीतस्त्वत्तो महाबुद्धे गच्छ त्वं काममद्य हि ।इत्युक्तो नृपवर्येण तूष्णीमेव स नारदः

bhītastvatto mahābuddhe gaccha tvaṃ kāmamadya hi | ityukto nṛpavaryeṇa tūṣṇīmeva sa nāradaḥ

अर्थ श्लोक 2 के साथ

अध्याय 276

श्लोक 4

जगामाकाशगमनो यत्र तिष्ठति केशवः ।स गत्वा विष्णुसङ्काशं विष्णोः सर्वं शशंस ह

jagāmākāśagamano yatra tiṣṭhati keśavaḥ | sa gatvā viṣṇusaṅkāśaṃ viṣṇoḥ sarvaṃ śaśaṃsa ha

अर्थ श्लोक 2 के साथ

अध्याय 276

श्लोक 5

तच्छ्रुत्वा भगवान् विष्णुर्यथेष्टं वदतामिति ।दर्प तस्यापनेष्यामि श्वोभूते द्विजसत्तम

tacchrutvā bhagavān viṣṇuryatheṣṭaṃ vadatāmiti | darpa tasyāpaneṣyāmi śvobhūte dvijasattama

अर्थ श्लोक 2 के साथ

अध्याय 276

श्लोक 6

इत्युक्त्वा विररामैव तस्मिन् बदरिकाश्रमे ।ततः पौण्ड्रो महाबाहुर्बलैर्बहुभिरीश्वरः

ityuktvā virarāmaiva tasmin badarikāśrame | tataḥ pauṇḍro mahābāhurbalairbahubhirīśvaraḥ

हिन्दी अर्थ

ऐसा कहकर उस बदरिकाश्रममें भगवान्‌ श्रीकृष्ण चुप हो रहे। इधर सामर्थ्यशाली महाबाहु पौण्ड्रकने बहुत- सी सेनाओंके साथ द्वारकापुरीको प्रस्थान किया

अध्याय 276

श्लोक 7

अश्वैरनेकसाहस्रैर्गजैर्बहुभिरन्वितः ।अस्त्रकोटिसमायुक्तः स राजा सत्यसङ्गरः

aśvairanekasāhasrairgajairbahubhiranvitaḥ | astrakoṭisamāyuktaḥ sa rājā satyasaṅgaraḥ

हिन्दी अर्थ

अनेक सहस्र अध्ों, बहुसंख्यक हाथियों और करोड़ों अस्त्र-शस्त्रोंसे संयुक्त हुआ वह सत्यप्रतिज्ञ राजा द्वारकाकी ओर प्रस्थित हुआ

अध्याय 276

श्लोक 8

अनेकशतसाहस्रैः पत्तिभिश्च समन्वितः ।एकलव्यप्रभृतिभी राजभिश्च समन्ततः

anekaśatasāhasraiḥ pattibhiśca samanvitaḥ | ekalavyaprabhṛtibhī rājabhiśca samantataḥ

हिन्दी अर्थ

उसके साथ कई लाख पैदल सैनिक थे। एकलबव्य आदि राजा उसे सब ओरसे घेरकर चलते थे

अध्याय 276

श्लोक 9

अष्टौ रथसहस्राणि नागानामयुतं तथा ।अर्बुदं पत्तिसङ्घानां तद्बलं समपद्यत

aṣṭau rathasahasrāṇi nāgānāmayutaṃ tathā | arbudaṃ pattisaṅghānāṃ tadbalaṃ samapadyata

हिन्दी अर्थ

आठ हजार रथ, दस हजार हाथी और एक अर्बुद (दस करोड़) पैदल सैनिकोंसे वह सारी सेना सम्पन्न थी

अध्याय 276

श्लोक 10

एतेन च बलेनाजौ प्रस्फुरन् नृपसत्तमः ।विरराज महाराज उदयस्थो महारविः

etena ca balenājau prasphuran nṛpasattamaḥ | virarāja mahārāja udayastho mahāraviḥ

हिन्दी अर्थ

महाराज! इस विशाल सेनासे युद्ध-स्थलमें प्रकाशित होनेवाला नृपश्रेष्ठ पौण्ड्रक उदय- गिरिपर प्रकाशमान महासूर्यके समान शोभा पा रहा था

अध्याय 276

श्लोक 11

स ययौ मध्यरात्रेण नगरीं द्वारकामनु ।पत्तयो दीपिकाहस्ता रात्रौ तमसि दारुणे

sa yayau madhyarātreṇa nagarīṃ dvārakāmanu | pattayo dīpikāhastā rātrau tamasi dāruṇe

हिन्दी अर्थ

उसने आधी रातके समय द्वारकापुरीपर धावा किया। रातके उस भयंकर अन्धकारमें पैदल सैनिकोंने हाथोंमें जलती हुई मशालें ले रखी थीं

अध्याय 276

श्लोक 12

ययुर्विविधशूस्त्रौघाः सम्पतन्तो महाबलाः ।द्वारकां वीर्यसम्पन्नां महाघोरां नृपोत्तमाः

yayurvividhaśūstraughāḥ sampatanto mahābalāḥ | dvārakāṃ vīryasampannāṃ mahāghorāṃ nṛpottamāḥ

हिन्दी अर्थ

वे महाबली श्रेष्ठ नरेश नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न हो पराक्रमशालिनी महाघोर द्वारकापुरीपर आक्रमण करनेके लिये जा रहे थे

अध्याय 276

श्लोक 13

रथं महान्तमारुह्य शस्त्रौघैश्च समावृतम् ।पट्टिशासिसमाकीर्णं गदापरिघसङ्कुलम्

rathaṃ mahāntamāruhya śastraughaiśca samāvṛtam | paṭṭiśāsisamākīrṇaṃ gadāparighasaṅkulam

श्लोक 13–16 का हिन्दी अर्थ

नरेश्वर! पराक्रमी एवं बलवान्‌ राजा पौण्ड्रक भी मशालें साथ लेकर एक विशाल रथपर आरूढ़ हो द्वारकापुरीकी और प्रस्थित हुआ। वह रथ नाना प्रकारके गस्त्रसमूहोंसे भरा हुआ था। पट्टिश, खड्ग, गदा और परिघोंसे परिपूर्ण था, शक्ति, तोमर, बाण, खड्ग और प्राससे सम्पन्न था, अनेक ध्वज उसकी शोभा बढ़ा हे थे। घुँपुरू लगी हुई झालरोंसे उस रथको सजाया या था। उसमें धनुष और गदाएँ यथास्थान रखी गयी थीं। वह महाघोर महारौद्र विशाल रथ प्रलयकालीन पेघ एवं महावाद्यके समान गम्भीर ध्वनि करनेवाला था। उसका स्वरूप अग्रि और सूर्यके तुल्य प्रकाशमान था

अध्याय 276

श्लोक 14

शक्तितोमरसङ्कीर्णं ध्वजमालासमाचितम् ।किङ्किणीजालसंयुक्तं शरासिप्राससंयुतम्

śaktitomarasaṅkīrṇaṃ dhvajamālāsamācitam | kiṅkiṇījālasaṃyuktaṃ śarāsiprāsasaṃyutam

अर्थ श्लोक 13 के साथ

अध्याय 276

श्लोक 15

महाघोरं महारौद्रं युगान्तजलदोपमम् ।धनुर्गदासमाकीर्णं महावाद्योपमं महत्

mahāghoraṃ mahāraudraṃ yugāntajaladopamam | dhanurgadāsamākīrṇaṃ mahāvādyopamaṃ mahat

अर्थ श्लोक 13 के साथ

अध्याय 276

श्लोक 16

अग्न्यर्कसदृशाकारं ययौ द्वारवतीमनु ।गृहीतदीपिको राजा वीर्यवान् बलवान् नृप

agnyarkasadṛśākāraṃ yayau dvāravatīmanu | gṛhītadīpiko rājā vīryavān balavān nṛpa

अर्थ श्लोक 13 के साथ

अध्याय 276

श्लोक 17

हन्तुमैच्छज्जगन्नाथं वृष्णींश्चैव समन्ततः ।आकर्षन् बलमुख्यांस्तान् राज्ञः सर्वान्महाद्युतिः

hantumaicchajjagannāthaṃ vṛṣṇīṃścaiva samantataḥ | ākarṣan balamukhyāṃstān rājñaḥ sarvānmahādyutiḥ

श्लोक 17–18 का हिन्दी अर्थ

महातेजस्वी राजा पौण्ड्रक जगदीश्वर श्रीकृष्णको तथा उनके चारों ओर खड़े होनेवाले रृष्णिवंशी वीरोंको मार डालना चाहता था। वह अपनी पेनाके मुख्य-मुख्य सभी राजाओंको अपने साथ खींच ने गया और नगरद्वारपर पहुँचकर वहाँ सेनाको यत्रपूर्वक थापित करके सब ओर खड़े हुए समस्त नरेशोंसे स प्रकार बोला—

अध्याय 276

श्लोक 18

पुरद्वारं समासाद्य बलं संस्थाप्य यत्नतः ।इदं प्रोवाच राजा तु नृपान् सर्वानवस्थितान्

puradvāraṃ samāsādya balaṃ saṃsthāpya yatnataḥ | idaṃ provāca rājā tu nṛpān sarvānavasthitān

अर्थ श्लोक 17 के साथ

अध्याय 276

श्लोक 19

ताड्यतामत्र भेरी तु नाम विश्राव्य मामकम् ।युध्यतां युध्यतामत्र देयं वा प्रतिदीयताम्

tāḍyatāmatra bherī tu nāma viśrāvya māmakam | yudhyatāṃ yudhyatāmatra deyaṃ vā pratidīyatām

श्लोक 19–20 का हिन्दी अर्थ

वीरो ! रणभेरी बजाओ और मेरा नाम सुनाकर कहो-यादवो! यहाँ आकर युद्ध करो! युद्ध करो! ! अथवा देने योग्य राजकीय कर प्रदान करो। महान्‌ पराक्रमी राजा पौण्ड्रक युद्धके लिये पधारे हैं और श्रीकृष्णके बाहुबलका आश्रय नेनेवाले तुम समस्त यादवोंका वध करना चाहते ''

अध्याय 276

श्लोक 20

आगतः पौण्ड्रको राजा युद्धार्थी वीर्यवत्तरः ।हन्तुकामः समग्रान् वः कृष्णबाहुबलाश्रयान्

āgataḥ pauṇḍrako rājā yuddhārthī vīryavattaraḥ | hantukāmaḥ samagrān vaḥ kṛṣṇabāhubalāśrayān

अर्थ श्लोक 19 के साथ

अध्याय 276

श्लोक 21

इति ते प्रेषिताः सर्वे समीयुः सूचकान् बहून् ।दीपिकाश्च प्रदीप्यन्ते बह्व्यः शतसहस्रशः

iti te preṣitāḥ sarve samīyuḥ sūcakān bahūn | dīpikāśca pradīpyante bahvyaḥ śatasahasraśaḥ

श्लोक 21–25 का हिन्दी अर्थ

इस प्रकार भेजे गये वे समस्त नरेश हुसंख्यक सूचकों (बाहर-भीतरके वृत्तान्तको जाननेवाले पादव भटों)-से मिले। उस समय बहुतेरी मशालें नाखोंकी संख्यामें जल रही थीं। युद्धकी लालसा खनेवाले राजाओंने इधर-उधर युद्ध छेड़ दिया था। हाँ पुरीके द्वारपर शस्त्रधारी क्षत्रिय सिंहनाद करते हुए स्त्रोंकी धारा बरसा रहे थे और कहते थे 'कहाँ है ष्णिवंशका श्रेष्ठ वीर ? कहाँ है राजा जगदीश्वर ? कहाँ ' वीर सात्यकि? कहाँ है कृतवर्मा और कहाँ है र्वयादवशिरोमणि बलभद्र ?' ऐसा कहते हुए वे समस्त ष्ठ राजा सब ओरसे बहुतेरे अस्त्र-शस्त्र, बाण और हुसंख्यक धनुष ले युद्धके लिये कमर कसकर गीहरिकी द्वारकापुरीपर धावा बोलने लगे

अध्याय 276

श्लोक 22

इतश्चेतश्च राजानो युध्यन्ते युद्धलालसाः ।पुरीं ते पुरतस्तत्र क्षत्रियाः शस्त्रिणस्तदा

itaścetaśca rājāno yudhyante yuddhalālasāḥ | purīṃ te puratastatra kṣatriyāḥ śastriṇastadā

अर्थ श्लोक 21 के साथ

अध्याय 276

श्लोक 23

सिंहनादं प्रकुर्वन्तः शस्त्रधारासमाकुलाः ।कुतोऽयं वृष्णिप्रवरः कुतो राजा जगत्पतिः

siṃhanādaṃ prakurvantaḥ śastradhārāsamākulāḥ | kuto'yaṃ vṛṣṇipravaraḥ kuto rājā jagatpatiḥ

अर्थ श्लोक 21 के साथ

अध्याय 276

श्लोक 24

कुतोऽयं सात्यकिर्वीरः कुतो हार्दिक्य एव च ।कुतो नु बलभद्रश्च सर्वयादवसत्तमः ।इत्येवं कथयन्तो वै राजानः सर्व एव ते

kuto'yaṃ sātyakirvīraḥ kuto hārdikya eva ca | kuto nu balabhadraśca sarvayādavasattamaḥ | ityevaṃ kathayanto vai rājānaḥ sarva eva te

अर्थ श्लोक 21 के साथ

अध्याय 276

श्लोक 25

आदाय शस्त्राणि बहूनि सर्वतः शरांश्च चापानि बहूनि सर्वे ।युद्धाय सन्नाहनिबद्धशो ययुर्हरेः पुरीं द्वारवतीं नृपोत्तमाः

ādāya śastrāṇi bahūni sarvataḥ śarāṃśca cāpāni bahūni sarve | yuddhāya sannāhanibaddhaśo yayurhareḥ purīṃ dvāravatīṃ nṛpottamāḥ

अर्थ श्लोक 21 के साथ

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

धर्म ग्रंथ निःशुल्क और विज्ञापन-रहित है। Dharma Granth is free and has no ads. इसे ऐसा बनाए रखने में सहयोग करेंHelp keep it that way → How it is funded

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.