Harivamsha Purana
277
अध्याय 277 / 318

Parva 3, Adhyāya 94

31 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ31 श्लोक

अध्याय 277

श्लोक 1

यादववीरेभिः पौण्ड्रकस्य सैन्यस्य एवं एकलव्येन यादवसैन्यस्य संहारं ततश्च यादवाः सर्वे दृष्ट्वा सैनिकसञ्चयम् ।रात्रौ व व्यसनं प्राप्तं महाशस्त्रसमाकुलम्

yādavavīrebhiḥ pauṇḍrakasya sainyasya evaṃ ekalavyena yādavasainyasya saṃhāraṃ tataśca yādavāḥ sarve dṛṣṭvā sainikasañcayam | rātrau va vyasanaṃ prāptaṃ mahāśastrasamākulam

श्लोक 1–4 का हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर मस्त यादवोंने देखा कि शत्रुसैनिकोंका बड़ा भारी माव हो रहा है। वे सब-के-सब महान्‌ अस्त्र- प्त्रोंसे सम्पन्न हैं और प्रचण्ड वायुसे उमड़े हुए नयकालके समुद्रकी भाँति दिखायी देते हैं। विशेषत: त्रके समय यह महान्‌ संकट प्रात हुआ है। यह वर और सोचकर वे समस्त यादव युद्धकी लालसासे स्त्र-शस्त्र लेकर कमर कसकर तैयार हो गये। उन भी शस्त्रयोधी यादवोंने अपने हाथोंमें मशालें ले रखी । सात्यकि, बलभद्र, हार्दिक्य (कृतवर्मा), निशठ, म॒बुद्धिमान्‌ उद्धव, महाबली उग्रसेन तथा अन्य ब् यादववीर कवच बाँधने लगे

अध्याय 277

श्लोक 2

महावातसमुद्भूतं कल्पान्ते सागरोपमम् ।सन्नद्धाः समपद्यन्त शस्त्रिणो युद्धलालसाः

mahāvātasamudbhūtaṃ kalpānte sāgaropamam | sannaddhāḥ samapadyanta śastriṇo yuddhalālasāḥ

अर्थ श्लोक 1 के साथ

अध्याय 277

श्लोक 3

गृहीतदीपिकाः सर्वे यादवाः शस्त्रयोधिनः ।सात्यकिर्बलभद्रश्च हार्दिक्यो निशठस्तथा

gṛhītadīpikāḥ sarve yādavāḥ śastrayodhinaḥ | sātyakirbalabhadraśca hārdikyo niśaṭhastathā

अर्थ श्लोक 1 के साथ

अध्याय 277

श्लोक 4

उद्धवोऽथ महाबुद्धिरुग्रसेनो महाबलः ।अन्ये च यादवाः सर्वे कवचप्रग्रहे रताः

uddhavo'tha mahābuddhirugraseno mahābalaḥ | anye ca yādavāḥ sarve kavacapragrahe ratāḥ

अर्थ श्लोक 1 के साथ

अध्याय 277

श्लोक 6

समस्तयुद्धकुशला रात्रौ सन्नाहयोधिनः ।शस्त्रिणः खड्गिनश्चैव सर्वे शस्त्रसमाकुलाः ॥ lद्क़्‍५॥ युद्धाय समपद्यन्त बहवो बाहुशालिनः ।रथिनो गजिनश्चैव सादिनः सायुधास्तथा

samastayuddhakuśalā rātrau sannāhayodhinaḥ | śastriṇaḥ khaḍginaścaiva sarve śastrasamākulāḥ || ldq‍5|| yuddhāya samapadyanta bahavo bāhuśālinaḥ | rathino gajinaścaiva sādinaḥ sāyudhāstathā

हिन्दी अर्थ

वे बहुसंख्यक हुशाली वीर युद्धके लिये उद्यत हो गये। उनके थ रथी, हाथीसवार, घुड़सवार और शस्त्रधारी पैदल द्वा भी थे

अध्याय 277

श्लोक 7

नित्ययुक्ता महात्मानो धन्विनः पुरुषोत्तमाः ।निर्ययुर्नगरात् तूर्णं दीपिकाभिः समन्ततः

nityayuktā mahātmāno dhanvinaḥ puruṣottamāḥ | niryayurnagarāt tūrṇaṃ dīpikābhiḥ samantataḥ

हिन्दी अर्थ

वे नित्य उद्यत रहनेवाले, महामनस्वी, ुर्धर, पुरुष-प्रवर वीर सब ओरसे मशालोंके साथ त नगरसे बाहर निकले

अध्याय 277

श्लोक 8

कुतः पौण्ड्रक इत्येवं वदन्तः सर्वसात्वताः ।दीपिकादीपितो देशो निस्तमाः समपद्यत

kutaḥ pauṇḍraka ityevaṃ vadantaḥ sarvasātvatāḥ | dīpikādīpito deśo nistamāḥ samapadyata

हिन्दी अर्थ

वे समस्त यादव यह हते हुए निकले कि “कहाँ है पौण्ड्रक ?' मशालोंसे कराशित हुआ वह देश सर्वथा अन्धकाररहित हो रा

अध्याय 277

श्लोक 9

ततो वितिमिरो देशः समन्तात् प्रत्यपद्यत ।युद्धं समभवद् घोरं वृष्णिभिः शत्रुभिः सह

tato vitimiro deśaḥ samantāt pratyapadyata | yuddhaṃ samabhavad ghoraṃ vṛṣṇibhiḥ śatrubhiḥ saha

हिन्दी अर्थ

तत्पश्चातू वह स्थान सब ओरसे अन्धकारशून्य 'गया। उस समय वहाँ शत्रुओंके साथ वृष्णिवंशियोंका र युद्ध आरम्भ हो गया

अध्याय 277

श्लोक 10

ततो महान् समभवत् सन्नादो रोमहर्षणः ।हया हयैः समायुक्ताः गजाश्च गजयूथपैः

tato mahān samabhavat sannādo romaharṣaṇaḥ | hayā hayaiḥ samāyuktāḥ gajāśca gajayūthapaiḥ

श्लोक 10–12 का हिन्दी अर्थ

फिर तो महान्‌ लाहल होने लगा, जो रोंगटे खड़े कर देनेवाला ।। घोड़े घोड़ोंसे, गजराज गजराजोंसे, रथ रथोंसे और वार सवारोंसे भिड़ गये। खड्गधारी वीर खड्गधारियोंसे र गदाधारी गदाधारियोंसे लड़ने लगे। उस रणभूमिमें भयपक्षके सैनिकोंका परस्पर बड़ा भयंकर घोल- ल हो गया। उन महामनस्वी वीरोंके गर्जन-तर्जनका ब्द महाप्रलयके समय उमड़े हुए समुद्रों की गर्जनाके मान जान पड़ता था

अध्याय 277

श्लोक 11

रथा रथैः समायुक्ताः सादिभिः सादिनस्तथा ।खड्गिनः खड्गिभिः सार्धं गदिभिर्गदिनस्तथा

rathā rathaiḥ samāyuktāḥ sādibhiḥ sādinastathā | khaḍginaḥ khaḍgibhiḥ sārdhaṃ gadibhirgadinastathā

अर्थ श्लोक 10 के साथ

अध्याय 277

श्लोक 12

परस्परव्यतीकारो रण आसीत् सुदारुणः ।महाप्रलयसङ्क्षोभः शब्दस्तेषां महात्मनाम्

parasparavyatīkāro raṇa āsīt sudāruṇaḥ | mahāpralayasaṅkṣobhaḥ śabdasteṣāṃ mahātmanām

अर्थ श्लोक 10 के साथ

अध्याय 277

श्लोक 13

धावन्तः प्रहरन्त्येतान् घ्नन्त्येतान् सर्वतो नृपान् ।अयमेष महाबाहुः खड्गी पतति वीर्यवान्

dhāvantaḥ praharantyetān ghnantyetān sarvato nṛpān | ayameṣa mahābāhuḥ khaḍgī patati vīryavān

श्लोक 13–14 का हिन्दी अर्थ

दोनों ओरके योद्धा धावा करके विपक्षी सैनिकोंपर प्रहार करते और इन समस्त नरेशोंको घायल करते थे। (वहाँ आपसमें इस प्रकारकी चर्चाएँ होती थीं) “यह खड्‌्ग धारी महाबाहु पराक्रमी वीर धराशायी हो रहा है। यह अत्यन्त दारुण बाण बड़ा ही भयंकर है। यह गदाधारी महापराक्रमी नरेश हम सब लोगोंको पीड़ा दे रहा है

अध्याय 277

श्लोक 14

अयमेष शरो घोरो वर्ततेऽतिसुदारुणः ।गदी चायं महावीर्यः सर्वान् नो बाधते नृपः

ayameṣa śaro ghoro vartate'tisudāruṇaḥ | gadī cāyaṃ mahāvīryaḥ sarvān no bādhate nṛpaḥ

अर्थ श्लोक 13 के साथ

अध्याय 277

श्लोक 15

अयं रथी शरी चापी गदी तूणी तनुत्रवान् ।पट्टिशी सर्वतो याति कुन्तपाणिरयं बली

ayaṃ rathī śarī cāpī gadī tūṇī tanutravān | paṭṭiśī sarvato yāti kuntapāṇirayaṃ balī

हिन्दी अर्थ

यह धनुष, बाण, गदा, तरकस, कवच, पट्टिश और कुन्त धारण करनेवाला बलवान्‌ रथी वीर रणभूमिमें सब ओर विचर रहा है

अध्याय 277

श्लोक 16

अयमत्र महाशूली संश्रितः सर्वतो दिशम् ।गजोऽयं सविषाणाग्रो वर्तते सर्वतः प्रति

ayamatra mahāśūlī saṃśritaḥ sarvato diśam | gajo'yaṃ saviṣāṇāgro vartate sarvataḥ prati

हिन्दी अर्थ

यह महाशूलधारी योद्धा यहाँ सारी दिशाओंमें चक्कर लगाता है। यह हाथी अपने दाँतोंका अग्रभाग सामने किये सब ओर दौड़ लगाता है'

अध्याय 277

श्लोक 17

अतिसर्वत्रगः शूरो वेगवान् वातसन्निभः ।शराञ्च्छरैः समाहन्ति दण्डान् दण्डैर्जगत्पते

atisarvatragaḥ śūro vegavān vātasannibhaḥ | śarāñccharaiḥ samāhanti daṇḍān daṇḍairjagatpate

हिन्दी अर्थ

राजन्‌ ! कोई-कोई वेगशाली शूरवीर वायुके समान अत्यन्त तीव्र गतिसे सर्वत्र जा पहुँचता और अपने बाणोंसे शत्रुओंके बाणोंका तथा दण्डोंसे उनके दण्डोंका नाश कर देता था

अध्याय 277

श्लोक 18

कुन्तान् कुन्तैः समाजघ्नुर्गदाभिश्च गदास्तथा ।परिघान् परिघैः सार्धं शूलाञ्च्छूलैः समन्ततः

kuntān kuntaiḥ samājaghnurgadābhiśca gadāstathā | parighān parighaiḥ sārdhaṃ śūlāñcchūlaiḥ samantataḥ

हिन्दी अर्थ

कितने ही योद्धा कुन्तों ( भालों ) -से कुन्तोंका, गदाओंसे गदाओंका, परिघोंसे परिघोंका, साथ ही सब ओर शूलोंसे शूलोंका उच्छेद कर डालते थे

अध्याय 277

श्लोक 19

एवं तेषां महाराज कुर्वतां रणमुत्तमम् ।सङ्ग्रामः सुमहानासीच्छब्दश्चापि महानभूत्

evaṃ teṣāṃ mahārāja kurvatāṃ raṇamuttamam | saṅgrāmaḥ sumahānāsīcchabdaścāpi mahānabhūt

हिन्दी अर्थ

महाराज जनमेजय! इस प्रकार उत्तम युद्ध करते हुए उन योद्धाओंमें बड़ा भारी संग्राम छिड़ गया और महान्‌ कोलाहल होने लगा

अध्याय 277

श्लोक 20

भूतानि सुबहून्याजौ शब्दवन्ति महान्ति च ।प्रादुरासन् सहस्राणि शङ्खानां भीमनिःस्वनः

bhūtāni subahūnyājau śabdavanti mahānti ca | prādurāsan sahasrāṇi śaṅkhānāṃ bhīmaniḥsvanaḥ

हिन्दी अर्थ

उस युद्धस्थलमें बहुत-से बड़े-बड़े प्राणी भाँति-भाँतिके शब्द करते हुए सहस््रोंकी संख्यामें प्रकट हो गये। वहाँ हीनेवाली श्ोंकी ध्वनि बड़ी भयंकर प्रतीत होती थी

अध्याय 277

श्लोक 21

रात्रौ प्रादुरभूच्छब्दः सङ्ग्रामे रोमहर्षणः ।वर्तमाने महायुद्धे वृष्णीनां चैव तैः सह

rātrau prādurabhūcchabdaḥ saṅgrāme romaharṣaṇaḥ | vartamāne mahāyuddhe vṛṣṇīnāṃ caiva taiḥ saha

श्लोक 21–25 का हिन्दी अर्थ

त्रिमें उस संग्रामके भीतर बड़ा रोमाज्ञकारी शब्द प्रकट होने लगा। शत्रुओंके साथ होनेवाले वृष्णिवंशियोंके उस पहायुद्धमें कितने ही भूपाल कालके ग्रास बनकर पृथ्वीपर गर पड़े। कितने ही महापराक्रमी राजा हाथमें शस्त्र लिये ही एक-दूसरेसे सटे हुए गिरते और सिरके बाल बिखेरे धराशायी हो जाते थे। कितने ही योद्धा कवच विदीर्ण हो जानेके कारण सहस्रों टुकड़े होकर गर पड़ते थे। एक-दूसरेके वधकी इच्छावाले कितने ही महामनस्वी योद्धा परस्पर अस्त्र-शस्त्रोंका प्रहार करके सब ओरसे शरीरके क्षत-विक्षत हो जानेपर पाणशून्य होकर गिर पड़ते और यमराजके राष्ट्रकी वृद्धि करते थे। राजन्‌ ! इस प्रकार युद्धमें भाग लेनेवाले बे सब नरेश वहाँ मारे गये

अध्याय 277

श्लोक 22

केचिद् ग्रस्ताः समापेतुः पृथिव्यां पृथिवीक्षितः ।केचिच्च पतिताः क्लिष्टाः विप्रकीर्णशिरोरुहाः

kecid grastāḥ samāpetuḥ pṛthivyāṃ pṛthivīkṣitaḥ | kecicca patitāḥ kliṣṭāḥ viprakīrṇaśiroruhāḥ

अर्थ श्लोक 21 के साथ

अध्याय 277

श्लोक 23

पेतुरुर्व्यां महावीर्या राजानः शस्त्रपाणयः ।केचित् तु भिन्नवर्माणः समापेतुः सहस्रधा

petururvyāṃ mahāvīryā rājānaḥ śastrapāṇayaḥ | kecit tu bhinnavarmāṇaḥ samāpetuḥ sahasradhā

अर्थ श्लोक 21 के साथ

अध्याय 277

श्लोक 24

परस्परं समाश्रित्य परस्परवधैषिणः ।न्यस्तशस्त्रा महात्मानः समन्तात् क्षतविग्रहाः

parasparaṃ samāśritya parasparavadhaiṣiṇaḥ | nyastaśastrā mahātmānaḥ samantāt kṣatavigrahāḥ

अर्थ श्लोक 21 के साथ

अध्याय 277

श्लोक 25

पेतुर्गतासवः केचिद् यमराष्ट्रविवर्धनाः ।एवं ते निहता राजन् योधिताः सर्व एव तु

peturgatāsavaḥ kecid yamarāṣṭravivardhanāḥ | evaṃ te nihatā rājan yodhitāḥ sarva eva tu

अर्थ श्लोक 21 के साथ

अध्याय 277

श्लोक 26

एतस्मिन्नन्तरे शूर एकलव्यो निषादपः ।धनुर्गृह्य महाघोरं कालान्तकयमोपमः

etasminnantare śūra ekalavyo niṣādapaḥ | dhanurgṛhya mahāghoraṃ kālāntakayamopamaḥ

श्लोक 26–28 का हिन्दी अर्थ

इसी बीचमें नेषादोंका अधिपति शूरवीर एकलव्य, जो काल, अन्तक पर यमके समान भयंकर था, महाघोर धनुष लेकर हस्रों बाणोंद्वारा यादवोंको पीड़ा देने लगा । उसने सैकड़ों खे और मर्मभेदी बाणोंसे वृष्णिवंशियोंकी सारी सेनाको र गिराया। हाथोंमें अस्त्र-शस्त्र लेकर जूझनेवाले अत्यन्त लशाली क्षत्रियोंको भी धराशायी कर दिया

अध्याय 277

श्लोक 28

शरैरनेकसाहस्रैरर्दयामास यादवान् ।परःशतैः शराणां तु निशितैर्मर्मभेदिभिः ॥ २७॥।वृष्णीनां च बलं सर्वं पोथयामास सर्वतः ।युद्ध्यतः शस्त्रपाणींश्च क्षत्रियान् वीर्यवत्तरान्

śarairanekasāhasrairardayāmāsa yādavān | paraḥśataiḥ śarāṇāṃ tu niśitairmarmabhedibhiḥ || 27||| vṛṣṇīnāṃ ca balaṃ sarvaṃ pothayāmāsa sarvataḥ | yuddhyataḥ śastrapāṇīṃśca kṣatriyān vīryavattarān

अर्थ श्लोक 26 के साथ

अध्याय 277

श्लोक 29

निशठं पञ्चविंशत्या शराणां नतपर्वणाम् ।सारणं दशभिर्विद्ध्वा हार्दिक्यं पञ्चभिः शरैः

niśaṭhaṃ pañcaviṃśatyā śarāṇāṃ nataparvaṇām | sāraṇaṃ daśabhirviddhvā hārdikyaṃ pañcabhiḥ śaraiḥ

श्लोक 29–30 का हिन्दी अर्थ

सने झुकी हुई गाँठवाले पच्चीस बाणोंसे निशठको, दस णॉसे सारणको, पाँचसे कृतवर्माको, नब्बे बाणोंसे उग्रसेनको था सात सायकोंद्वारा वसुदेवको भी उग्रतापूर्वक घायल ररके दस बाणोंसे उद्धवको और पाँच सायकोंसे अक्रूरको ही बींध डाला

अध्याय 277

श्लोक 30

उग्रसेनं नवत्याशु वसुदेवं च सप्तभिः ।उद्धवं दशभिश्चैव ह्यक्रूरं पञ्चभिः शरैः

ugrasenaṃ navatyāśu vasudevaṃ ca saptabhiḥ | uddhavaṃ daśabhiścaiva hyakrūraṃ pañcabhiḥ śaraiḥ

अर्थ श्लोक 29 के साथ

अध्याय 277

श्लोक 31

एवमेकैकशः सर्वे निहता निशितैः शरैः ।विद्राव्य यादवीं सेनां नाम विश्राव्य वीर्यवान्

evamekaikaśaḥ sarve nihatā niśitaiḥ śaraiḥ | vidrāvya yādavīṃ senāṃ nāma viśrāvya vīryavān

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार एक-एक करके स पराक्रमी वीरने तीखे बाणोंद्वारा सभी यादव-वीरोंको [यल कर दिया तथा यादवी सेनाको भगाकर वह अपना मम सुनाते हुए इस प्रकार कहने लगा—

अध्याय 277

श्लोक 32

एकलव्यो यदुवृषान् वीर्यवान् बलवानहम् ।इदानीं सात्यकिर्वीरः क्व यास्यति महाबलः

ekalavyo yaduvṛṣān vīryavān balavānaham | idānīṃ sātyakirvīraḥ kva yāsyati mahābalaḥ

हिन्दी अर्थ

मैं बलवान्‌ व॑ पराक्रमी वीर एकलबव्य हूँ। इस समय महाबली वीर ात्यकि मुझसे बचकर कहाँ जायँगे ? बलके मदसे उन्मत्त हनेवाले साक्षात्‌ हलधर हाथमें गदा लिये कहाँ जा रहे ?' इस प्रकार वह यदुकुलके श्रेष्ठ वीरोंको ललकारकर हता और अपने सिंहनादसे सिंहोंको भी विस्मित-सा कये देता था

अध्याय 277

श्लोक 33

मदमत्तो हली साक्षात् क्व यातीह गदाधरः ।इत्याह सिंहनादेन सिंहान् विस्मापयन्निव

madamatto halī sākṣāt kva yātīha gadādharaḥ | ityāha siṃhanādena siṃhān vismāpayanniva

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

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पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.