Harivamsha Purana
283
अध्याय 283 / 318

Parva 3, Adhyāya 100

44 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ44 श्लोक

अध्याय 283

श्लोक 1

श्रीकृष्णस्य द्वारकायां आगमनं, पौण्ड्रकेन सह तस्य वार्तालापं ततः प्रभाते विमले भगवान् देवकीसुतः ।गन्तुमैच्छज्जगन्नाथः पुरं बदरिकाश्रमात्

śrīkṛṣṇasya dvārakāyāṃ āgamanaṃ, pauṇḍrakena saha tasya vārtālāpaṃ tataḥ prabhāte vimale bhagavān devakīsutaḥ | gantumaicchajjagannāthaḥ puraṃ badarikāśramāt

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर निर्मल प्रभातकाल आनेपर देवकीनन्दन भगवान्‌ जगन्नाथने बदरिकाश्रमसे अपनी द्वारकापुरीको जानेकी इच्छा की

अध्याय 283

श्लोक 2

नमस्कृत्य मुनीन् सर्वान् ययौ द्वारवतीं नृप ।आरुह्य गरुडं विष्णुर्वेगेन महता प्रभुः

namaskṛtya munīn sarvān yayau dvāravatīṃ nṛpa | āruhya garuḍaṃ viṣṇurvegena mahatā prabhuḥ

हिन्दी अर्थ

नरेधर! समस्त मुनियोंको नमस्कार करके भगवान्‌ श्रीकृष्ण गरुड़पर आरूढ़ हो बड़े वेगसे द्वारकापुरीकी ओर चल दिये

अध्याय 283

श्लोक 3

सुमहाञ्छुश्रुवे शब्दस्तेषां युद्धं प्रकुर्वताम् ।गच्छता देवदेवेन पुरीं द्वारवतीं नृप

sumahāñchuśruve śabdasteṣāṃ yuddhaṃ prakurvatām | gacchatā devadevena purīṃ dvāravatīṃ nṛpa

हिन्दी अर्थ

राजन्‌ ! द्वारकापुरीकी ओर जाते हुए देवाधिदेव श्रीकृष्णने वहाँ युद्ध करते हुए उन समस्त योद्धाओंका महान्‌ कोलाहल सुना

अध्याय 283

श्लोक 4

अचिन्तयज्जगन्नाथः को न्वयं शब्द उत्थितः ।सङ्ग्रामसम्भवो घोर आर्यशैनेयसंयुतः

acintayajjagannāthaḥ ko nvayaṃ śabda utthitaḥ | saṅgrāmasambhavo ghora āryaśaineyasaṃyutaḥ

हिन्दी अर्थ

उसे सुनकर जगदीश्वर श्रीकृष्ण सोचने लगे—“यह कैसा युद्धजनक घोर शब्द प्रकट हो रहा है, जिसमें भैया बलराम और सात्यकिकी भी गर्जना मिली हुई है'

अध्याय 283

श्लोक 5

व्यक्तमागतवान् पौण्ड्रो नगरीं द्वारकामनु ।तेन युद्धं समभवत् पौण्ड्रकेण दुरात्मना

vyaktamāgatavān pauṇḍro nagarīṃ dvārakāmanu | tena yuddhaṃ samabhavat pauṇḍrakeṇa durātmanā

श्लोक 5–6 का हिन्दी अर्थ

है। उसी दुरात्मा पौण्ड्रकके साथ यादवों एवं वृष्णिवीरों- का युद्ध हो रहा है । परस्पर युद्ध करनेवाले इन्हीं योद्धाओंका यह महान्‌ शब्द प्रकट हो रहा है। इसमें कोई अन्यथा विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है'

अध्याय 283

श्लोक 6

यदूनां वृष्णिवीराणां युद्ध्यतामितरेतरम् ।शब्दोऽयं सुमहान् व्यक्तो नात्र कार्या विचारणा

yadūnāṃ vṛṣṇivīrāṇāṃ yuddhyatāmitaretaram | śabdo'yaṃ sumahān vyakto nātra kāryā vicāraṇā

अर्थ श्लोक 5 के साथ

अध्याय 283

श्लोक 7

इत्येवं चिन्तयित्वा तु दध्मौ शङ्खं महारवम् ।पाञ्चजन्यं हरिः साक्षात् प्रीणयन् वृष्णिपुङ्गवान्

ityevaṃ cintayitvā tu dadhmau śaṅkhaṃ mahāravam | pāñcajanyaṃ hariḥ sākṣāt prīṇayan vṛṣṇipuṅgavān

हिन्दी अर्थ

ऐसा सोचकर साक्षात्‌ श्रीहरिने वृष्णिशिरोमणि वीरोंको प्रसन्न करते हुए महान्‌ शब्द करनेवाले पाझ्ञजन्य श्जुको बजाया

अध्याय 283

श्लोक 8

रोदसी पूरयामास तेन शब्देन केशवः ।यादवा वृष्णयश्चैव श्रुत्वा शङ्खस्य ते रवम्

rodasī pūrayāmāsa tena śabdena keśavaḥ | yādavā vṛṣṇayaścaiva śrutvā śaṅkhasya te ravam

श्लोक 8–11 का हिन्दी अर्थ

केशवने उस शड्डुध्वनिसे पृथ्वी और आकाशको परिपूर्ण कर दिया। उस शड्डुनादको सुनकर यादव और वृष्णिवंशी परस्पर कहने लगे—' निश्चय ही भगवान्‌ श्रीकृष्ण पधार रहे हैं । यह पाज्जन्यकी ही ध्वनि सुनायी पड़ती है '। राजन्‌ ! यादवों और वृष्णिवंशियोंको इस बातका टूढ़ निश्चय हो गया। वे वृष्णि और यादव निर्भय हो गये। उसी क्षण पक्षियोंमें श्रेष्ठ गरुड़ दिखायी दिये। तदनन्तर यादवेश्वर देवकीनन्दन श्रीकृष्णका दर्शन हुआ। सूत और मागधजन उन जगदी श्वरके सामने गये

अध्याय 283

श्लोक 9

व्यक्तमायाति भगवान् पाञ्चजन्यरवो ह्ययम् ।इति ते मेनिरे राजन् वृष्णयो यादवास्तथा

vyaktamāyāti bhagavān pāñcajanyaravo hyayam | iti te menire rājan vṛṣṇayo yādavāstathā

अर्थ श्लोक 8 के साथ

अध्याय 283

श्लोक 10

निर्भयाः समपद्यन्त वृष्णयो यादवाश्च ते ।तस्मिन्नेव क्षणे दृष्टस्तार्क्ष्यश्च पततां वरः

nirbhayāḥ samapadyanta vṛṣṇayo yādavāśca te | tasminneva kṣaṇe dṛṣṭastārkṣyaśca patatāṃ varaḥ

अर्थ श्लोक 8 के साथ

अध्याय 283

श्लोक 11

ततश्च देवकीसूनुर्दृष्टस्तैर्यादवेश्वरः ।सूताश्च मागधाश्चैव पुरो यान्ति जगत्पतेः

tataśca devakīsūnurdṛṣṭastairyādaveśvaraḥ | sūtāśca māgadhāścaiva puro yānti jagatpateḥ

अर्थ श्लोक 8 के साथ

अध्याय 283

श्लोक 12

स्तुत्या स्तुतं हरिं विष्णुमीश्वरं कमलेक्षणम् ।गताश्च यादवाः सर्वे परिवव्रुर्जनार्दनम्

stutyā stutaṃ hariṃ viṣṇumīśvaraṃ kamalekṣaṇam | gatāśca yādavāḥ sarve parivavrurjanārdanam

हिन्दी अर्थ

जिनकी स्तुति की गयी थी, उन कमलनयन सर्वव्यापी ईश्वर जनार्दन हरिके पास समस्त यादव गये और उन्हें घेरकर खड़े हो गये

अध्याय 283

श्लोक 13

कृष्णस्तु गरुडं भूयो गच्छ त्वं नाकमुत्तमम् ।इत्युक्त्वा गरुडं विष्णुर्विसृज्य यदुनन्दनः

kṛṣṇastu garuḍaṃ bhūyo gaccha tvaṃ nākamuttamam | ityuktvā garuḍaṃ viṣṇurvisṛjya yadunandanaḥ

श्लोक 13–15 का हिन्दी अर्थ

इसके बाद यदुनन्दन भगवान्‌ श्रीकृष्णने पुन: गरुड़से कहा—' तुम उत्तम स्वर्गलोकको जाओ ' ऐसा कहकर उन्होंने गरुड़को तो बिदा कर दिया और पुन: दारुकसे कहा—सामर्थ्यशाली सारथे! तुम मेरा रथ ले आओ ' । तब ' बहुत अच्छा' कहकर सारथि तुरंत रथ ले आया और बोला—' भगवन्‌ ! देव ! यह रथ उपस्थित है। इसके अतिरिक्त मेरे लिये क्या आज्ञा है?' ऐसा कहकर दारुक रथ ले आया और भगवान्‌को प्रणाम करके उनके पामने खड़ा हो गया

अध्याय 283

श्लोक 14

दारुकं पुनराहेदं रथमानय मे प्रभो ।स तथेति प्रतिज्ञाय रथमादाय सत्वरम्

dārukaṃ punarāhedaṃ rathamānaya me prabho | sa tatheti pratijñāya rathamādāya satvaram

अर्थ श्लोक 13 के साथ

अध्याय 283

श्लोक 15

रथोऽयं भगवन् देव किमतः कृत्यमस्ति मे ।इत्युक्त्वा रथमादाय प्रणम्याग्रे स्थितो हरेः

ratho'yaṃ bhagavan deva kimataḥ kṛtyamasti me | ityuktvā rathamādāya praṇamyāgre sthito hareḥ

अर्थ श्लोक 13 के साथ

अध्याय 283

श्लोक 16

गतेऽथ गरुडे विष्णू रथमारुह्य सत्वरम् ।यत्र युद्धं समभवत् तत्र याति स्म केशवः

gate'tha garuḍe viṣṇū rathamāruhya satvaram | yatra yuddhaṃ samabhavat tatra yāti sma keśavaḥ

हिन्दी अर्थ

गरुड़के चले जानेपर क्रेशव श्रीकृष्ण तुरंत रथपर आरूढ़ हुए और जहाँ युद्ध हो रहा था, वहाँ गये

अध्याय 283

श्लोक 17

तत्र गत्वा महाराज युध्यतां च महात्मनाम् ।पाञ्चजन्यं महाशस्त्रं दध्मौ यदुवृषोत्तमः

tatra gatvā mahārāja yudhyatāṃ ca mahātmanām | pāñcajanyaṃ mahāśastraṃ dadhmau yaduvṛṣottamaḥ

हिन्दी अर्थ

महाराज! वहाँ जाकर यदुकुलतिलक श्रीकृष्णने उन जूझते हुए महामनस्वी वीरोंके बीचमें पाज्जजन्य नामक महान्‌ शड्डू बजाया

अध्याय 283

श्लोक 18

पौण्ड्रोऽथ वासुदेवस्तु कृष्णं दृष्ट्वा रणोत्सुकम् ।सात्यकिं पृष्ठतः कृत्वा वासुदेवमुपागमत्

pauṇḍro'tha vāsudevastu kṛṣṇaṃ dṛṣṭvā raṇotsukam | sātyakiṃ pṛṣṭhataḥ kṛtvā vāsudevamupāgamat

हिन्दी अर्थ

पौण्ड्क वासुदेव श्रीकृष्णको युद्धके लिये उत्सुक देख पात्यकिको पीछे करके उन वसुदेवनन्दनके समीप चला

अध्याय 283

श्लोक 19

क्रुद्धोऽथ सात्यकी राजन् वारयामास पौण्ड्रकम् ।न गन्तव्यमितो राजन्नैष धर्मः सनातनः

kruddho'tha sātyakī rājan vārayāmāsa pauṇḍrakam | na gantavyamito rājannaiṣa dharmaḥ sanātanaḥ

हिन्दी अर्थ

राजन्‌ ! यह देख क्रोधमें भरे हुए सात्यकिने पौण्ड्रकको पका और कहा-'राजन्‌ ! तुम्हें यहाँसे नहीं जाना चाहिये। यह सनातन धर्म नहीं है

अध्याय 283

श्लोक 20

जित्वा मां गच्छ राजेन्द्र परं योद्धुं महारणे ।क्षत्रियोऽसि महावीर स्थिते मयि रणोत्सुके

jitvā māṃ gaccha rājendra paraṃ yoddhuṃ mahāraṇe | kṣatriyo'si mahāvīra sthite mayi raṇotsuke

हिन्दी अर्थ

राजेन्द्र! इस मपहासमरमें मुझे परास्त करके तुम दूसरेसे युद्ध करनेके लिये जाओ | महावीर ! तुम क्षत्रिय हो, जबतक मैं युद्धके लिये उत्सुक हूँ, तबतक तुम्हें अन्यत्र नहीं जाना चाहिये

अध्याय 283

श्लोक 21

एष ते गर्वमखिलं नाशयिष्यामि संयुगे ।इत्युक्त्वा चाग्रतस्तस्थौ गच्छतो यादवेश्वरः

eṣa te garvamakhilaṃ nāśayiṣyāmi saṃyuge | ityuktvā cāgratastasthau gacchato yādaveśvaraḥ

श्लोक 21–22 का हिन्दी अर्थ

मैं अभी युद्धस्थलमें तुम्हारा सारा घमंड चूर किये देता हूँ'। ऐसा कहकर शिनिके पोते यादवेधर सात्यकि श्रीकृष्णके देखते-देखते जाते हुए पौण्ड्रकके आगे खड़े हो गये तो भी वह सात्यकिकी अवहेलना करके श्रीकृष्णकी ओर चल दिया

अध्याय 283

श्लोक 22

पौण्ड्रस्य शिनिनप्ता तु पश्यतः केशवस्य ह ।अवज्ञाय शिनेः पौत्रं कृष्णमेव जगाम ह

pauṇḍrasya śininaptā tu paśyataḥ keśavasya ha | avajñāya śineḥ pautraṃ kṛṣṇameva jagāma ha

अर्थ श्लोक 21 के साथ

अध्याय 283

श्लोक 23

निर्भर्त्स्य सहसा भूयः सात्यकिः क्रोधमूर्च्छितः ।गदया प्राहरत् पौण्ड्रं वासुदेवस्य पश्यतः

nirbhartsya sahasā bhūyaḥ sātyakiḥ krodhamūrcchitaḥ | gadayā prāharat pauṇḍraṃ vāsudevasya paśyataḥ

हिन्दी अर्थ

तब क्रोधसे भरे हुए पात्यकिने सहसा उसे डाँटकर भगवान्‌ श्रीकृष्णके देखते- देखते पुन: पौण्ड़्कपर गदासे प्रहार किया

अध्याय 283

श्लोक 24

यथाप्राणं यथायोगं सात्यकिः सत्यविक्रमः ।दृष्ट्वाथ भगवानेवं सात्यकिं प्रशशंस ह

yathāprāṇaṃ yathāyogaṃ sātyakiḥ satyavikramaḥ | dṛṣṭvātha bhagavānevaṃ sātyakiṃ praśaśaṃsa ha

हिन्दी अर्थ

पतत्यपराक्रमी सात्यकिने पूरी सावधानी और शक्तिका उपयोग करके पौण्ड्कपर गदा चलायी थी । यह देखकर भगवान्‌ श्रीकृष्णने सात्यकिकी भूरि-भूरि प्रशंसा की

अध्याय 283

श्लोक 25

निवार्य सात्यकिं कृष्णो यथेष्टं क्रियतामसौ ।उपारमद् यथायोगं सात्यकिः कृष्णवारितः

nivārya sātyakiṃ kṛṣṇo yatheṣṭaṃ kriyatāmasau | upāramad yathāyogaṃ sātyakiḥ kṛṣṇavāritaḥ

हिन्दी अर्थ

तत्पश्चात्‌ 'वह जैसा चाहे वैसा ही करे' यह कहकर श्रीकृष्णने सात्यकिको रोक दिया। श्रीकृष्णके रोकनेपर पात्यकि यथावसर युद्धसे विरत हो गये

अध्याय 283

श्लोक 26

स ततः पौण्ड्रको राजा वासुदेवमुवाच ह ।भो भो यादव गोपाल इदानीं क्व गतो भवान्

sa tataḥ pauṇḍrako rājā vāsudevamuvāca ha | bho bho yādava gopāla idānīṃ kva gato bhavān

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर जा पौण्ड्रकने भगवान्‌ श्रीकृष्णसे कहा-*ओ यादव! ओ गोपाल! इस समय तुम कहाँ चले गये थे ?

अध्याय 283

श्लोक 27

त्वां द्रष्टुमथ सम्प्राप्तो वासुदेवोऽस्मि साम्प्रतम् ।हत्वा त्वां सबलं कृष्ण बलैर्बहुभिरन्वितः

tvāṃ draṣṭumatha samprāpto vāsudevo'smi sāmpratam | hatvā tvāṃ sabalaṃ kṛṣṇa balairbahubhiranvitaḥ

श्लोक 27–31 का हिन्दी अर्थ

मैं इस समय तुमसे ही मिलने आया हूँ। आजकल मैं ही वासुदेव नामसे विख्यात हूँ। श्रीकृष्ण! मैं बहुत-सी पेनाओंके साथ हूँ। इस समय सेनासहित तुम्हारा वध करके मैं अकेला ही इस भूतलपर वासुदेव रहूँगा। पविन्द! तुम्हारा जो विख्यात, उत्तम प्रभासे युक्त और पहान्‌ चक्र है, उसका मेरे इस चक्रसे अभी नाश हो जायगा। इसके लिये मुझे खेद है । माधव! परंतु रणभूमिमें अब तुम्हें ' मे पास चक्र है' ऐसा सोचकर उसके ब्लका घमंड नहीं होना चाहिये; क्योंकि आज मैं समस्त कत्रियोंके देखते-देखते तुम्हारे उस सारे बलका नाश कर डालूँगा। *जनार्दन! तुम मुझे शारज्जी भी समझो। केवल ुम्हीं शाड्ी नामसे यहाँ शेष हो, ' ऐसा न समझो । माधव ! परे पास शड्डू है—ऐसा समझकर तुम्हें अब उसके बलका भी घमंड नहीं करना चाहिये; क्योंकि मैं श्डी भी हूँ, गदाधर भी हूँ और चक्रपाणि भी हूँ

अध्याय 283

श्लोक 28

अहमेको भविष्यामि वासुदेवो महीतले ।यच्चकं तव गोविन्द प्रथितं सुप्रभं महत्

ahameko bhaviṣyāmi vāsudevo mahītale | yaccakaṃ tava govinda prathitaṃ suprabhaṃ mahat

अर्थ श्लोक 27 के साथ

अध्याय 283

श्लोक 29

अनेन मम चक्रेण पीडितोऽस्मि च तद्रणे ।चक्रमस्तीति तद्वीर्यं तव माधव साम्प्रतम्

anena mama cakreṇa pīḍito'smi ca tadraṇe | cakramastīti tadvīryaṃ tava mādhava sāmpratam

अर्थ श्लोक 27 के साथ

अध्याय 283

श्लोक 30

नाशयिष्यामि तत् सर्वं सर्वक्षत्रस्य पश्यतः ।शार्ङ्गीति मां विजानीहि न त्वं शार्ङ्गीति शिष्यसे

nāśayiṣyāmi tat sarvaṃ sarvakṣatrasya paśyataḥ | śārṅgīti māṃ vijānīhi na tvaṃ śārṅgīti śiṣyase

अर्थ श्लोक 27 के साथ

अध्याय 283

श्लोक 31

शङ्खमस्तीति तद्वीर्यं तव माधव साम्प्रतम् ।शङ्खी चाहं गदी चाहं चक्री चाहं जनार्दन

śaṅkhamastīti tadvīryaṃ tava mādhava sāmpratam | śaṅkhī cāhaṃ gadī cāhaṃ cakrī cāhaṃ janārdana

अर्थ श्लोक 27 के साथ

अध्याय 283

श्लोक 32

मामेव हि सदा ब्रूयुर्जानन्तो वीर्यशालिनः ।आदौ त्वं बलवद् वृद्धान्हत्वा स्त्रीबालकान्बहून

māmeva hi sadā brūyurjānanto vīryaśālinaḥ | ādau tvaṃ balavad vṛddhānhatvā strībālakānbahūna

श्लोक 32–33 का हिन्दी अर्थ

जगतमें जो पराक्रमशाली और ज्ञानी पुरुष हैं, वे अब सदा पुझे ही श्जु, चक्र और गदा धारण करनेवाला कहेंगे। पहलेकी बात है, तुमने बलवानोंमें बढ़े-चढ़े कुछ कंसके भनुचरोंका, स्त्री (पूतना) -का तथा बहुत-से बालकोंका 'छ: गर्भोिका कंसद्वारा) वध करके कुछ गौओं (वत्सासुर, भरिष्टासुर आदि)-का भी वध किया था। इसीसे तुम्हें भपनी वीरतापर बड़ा गर्व है। यदि मेरे सामने खड़े रह ये तो तुम्हारे उस गर्वको मैं चूर्ण कर दूँगा

अध्याय 283

श्लोक 33

गाश्च हत्वा महागर्वस्तव सम्प्रति वर्तते ।तत् तेऽहं व्यपनेष्यामि यदि तिष्ठसि मत्पुरः

gāśca hatvā mahāgarvastava samprati vartate | tat te'haṃ vyapaneṣyāmi yadi tiṣṭhasi matpuraḥ

अर्थ श्लोक 32 के साथ

अध्याय 283

श्लोक 34

शस्त्रं गृहाण गोच्चिन्द्र यदि योद्धुं व्यवस्थितः ।इत्युक्त्वा बाणमादाय तस्थौ पार्श्वं जगत्पतेः

śastraṃ gṛhāṇa goccindra yadi yoddhuṃ vyavasthitaḥ | ityuktvā bāṇamādāya tasthau pārśvaṃ jagatpateḥ

हिन्दी अर्थ

गोविन्द! यदि तुम युद्धके लिये खड़े हो तो अस्त्र ग्रहण करो।' ऐसा कहकर पौण्ड्रक बाण हाथमें लेकर जगदीश्वर श्रीहरिकि पास खड़ा हो गया

अध्याय 283

श्लोक 35

एतद् वचनमाकर्ण्य वासुदेवेन भाषितम् ।स्मितं कृत्वा हरिः कृष्णो बभाषे पौण्ड्रकं नृपम्

etad vacanamākarṇya vāsudevena bhāṣitam | smitaṃ kṛtvā hariḥ kṛṣṇo babhāṣe pauṇḍrakaṃ nṛpam

श्लोक 35–36 का हिन्दी अर्थ

मिथ्या वासुदेवके इस कथनको सुनकर भगवान्‌ श्रीकृष्ण मुसकराये और उस पौण्ड्रक नरेशसे इस प्रकार बोले—'नरेश्वर! तुम इच्छानुसार जो-जो चाहो कहो। मैं सदा पातकी ही हूँ। मैंने सर्वथा गोहत्या, बालहत्या और स्त्रीहत्या की है

अध्याय 283

श्लोक 36

कामं वद नृप त्वं हि पातक्यस्मि सदा नृप ।गोघाती बालघाती च स्त्रीहन्ता सर्वथा नृप

kāmaṃ vada nṛpa tvaṃ hi pātakyasmi sadā nṛpa | goghātī bālaghātī ca strīhantā sarvathā nṛpa

अर्थ श्लोक 35 के साथ

अध्याय 283

श्लोक 37

चक्री भव गदी राजञ्छार्ङ्गी च सततं भव ।नामधेयं वृथा मह्यं वासुदेवेति च प्रभो

cakrī bhava gadī rājañchārṅgī ca satataṃ bhava | nāmadheyaṃ vṛthā mahyaṃ vāsudeveti ca prabho

हिन्दी अर्थ

राजन्‌ ! तुम सदा चक्र, गदा और शा धनुष धारण करनेवाले बने रहो। प्रभो ! मेरा वासुदेव यह मिथ्या नाम भी लिये रहो

अध्याय 283

श्लोक 38

शार्ङ्गी चक्री गदी शङ्खीत्येवमादि वृथा मम ।किं तु वक्ष्यामि किञ्चित्तु शृणुष्व यदि मन्यसे

śārṅgī cakrī gadī śaṅkhītyevamādi vṛthā mama | kiṃ tu vakṣyāmi kiñcittu śṛṇuṣva yadi manyase

हिन्दी अर्थ

शार््ची, चक्री, गदी और श्जी आदि जो मेंरे नाम हैं, उनका भी व्यर्थ भार लिये रहो; परंतु मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूँ, यदि ठीक समझो, तो सुनो

अध्याय 283

श्लोक 39

क्षत्रिया बलिनो ये तु स्थिते मयि जगत्पतौ ।तथानुब्रुवते त्वां हि जीवत्येव मयि प्रभो

kṣatriyā balino ye tu sthite mayi jagatpatau | tathānubruvate tvāṃ hi jīvatyeva mayi prabho

हिन्दी अर्थ

प्रभो! मुझ न जगदीधरके जीते-जी ही बलवान्‌ क्षत्रिय तुम्हें वैसे (मेरे-जैसे) नामॉंद्वारा पुकारते हैं

अध्याय 283

श्लोक 40

यन्मे चक्रं महाघोरमसुरान्तकरं महत् ।तत्तुल्यं तव चक्रं तु वृत्ततो न तु वीर्यतः ।आयुधेष्वथ सर्वत्र शब्दसादृश्यमस्ति ते

yanme cakraṃ mahāghoramasurāntakaraṃ mahat | tattulyaṃ tava cakraṃ tu vṛttato na tu vīryataḥ | āyudheṣvatha sarvatra śabdasādṛśyamasti te

हिन्दी अर्थ

मेरा जो असुरोंका अन्त करनेवाला महाघोर एवं महान्‌ चक्र है, तुम्हारा चक्र केवल गोलायीमें उसकी समानता करता है, शक्तिमें नहीं। तुम्हारे सम्पूर्ण आयुधोंमें भी मुझसे नाममात्रकी समता है, शक्तित: नहीं

अध्याय 283

श्लोक 41

गोपोऽहं सर्वदा राजन् प्राणिनां प्राणदः सदा ।गोप्ता सर्वेषु लोकेषु शास्ता दुष्टस्य सर्वदा

gopo'haṃ sarvadā rājan prāṇināṃ prāṇadaḥ sadā | goptā sarveṣu lokeṣu śāstā duṣṭasya sarvadā

हिन्दी अर्थ

राजन्‌! मैं सर्वदा गोप हूँ, अर्थात्‌ प्राणियोंका सदा प्राणदान करनेवाला हूँ, सम्पूर्ण लोकोंका रक्षक तथा सर्वदा दुष्ोंका शासक हूँ

अध्याय 283

श्लोक 42

कत्थनं सर्वकार्यं हि जित्वा शत्रून् नृपाधम ।अजित्वा किं भवान् ब्रूते स्थिते मयि च शस्त्रिणि

katthanaṃ sarvakāryaṃ hi jitvā śatrūn nṛpādhama | ajitvā kiṃ bhavān brūte sthite mayi ca śastriṇi

हिन्दी अर्थ

नृपाधम! तुम्हें शत्रुओंको जीतकर ही सब प्रकारसे बड़ी-बड़ी बातें बनानी चाहिये। जब मैं शस्त्र लेकर तुम्हारे सामने खड़ा हूँ, तब तुम मुझे पराजित किये बिना ऐसी बातें क्यों कहते हो 2

अध्याय 283

श्लोक 43

हत्वा मां ब्रूहि राजेन्द्र यदि शक्तोऽसि पौण्ड्रक ।स्थितोऽहं चक्रमाश्रित्य रथी चापी गदासिमान्

hatvā māṃ brūhi rājendra yadi śakto'si pauṇḍraka | sthito'haṃ cakramāśritya rathī cāpī gadāsimān

हिन्दी अर्थ

राजेन्द्र पौण्ड्क ! यदि तुममें शक्ति हो तो मुझे मारकर अपनी प्रशंसा करो। मैं रथ, धनुष, गदा और खड्गसे युक्त हो चक्र लेकर तुम्हारे सामने खड़ा हूँ

अध्याय 283

श्लोक 44

रथमारुह्य युद्धाय सन्नद्धो भव मानद ।इत्युक्त्वा भगवान् विष्णुः सिंहनादं व्यनीनदत्

rathamāruhya yuddhāya sannaddho bhava mānada | ityuktvā bhagavān viṣṇuḥ siṃhanādaṃ vyanīnadat

हिन्दी अर्थ

मानद! रथपर आरूढ़ हो युद्धके लिये तैयार हो जाओ।' ऐसा कहकर भगवान्‌ श्रीकृष्ण जोर-जोरसे सिंहनाद करने लगे

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

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आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.