Harivamsha Purana
284
अध्याय 284 / 318

Parva 3, Adhyāya 101

24 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ24 श्लोक

अध्याय 284

श्लोक 1

पौण्ड्रकस्य श्रीकृष्णेन सार्धं युद्धं, पौण्ड्रकस्य वधं ततः शरं समादाय वासुदेवः प्रतापवान् ।पौण्ड्रं जघान सहसा निशितेन शरेण ह

pauṇḍrakasya śrīkṛṣṇena sārdhaṃ yuddhaṃ, pauṇḍrakasya vadhaṃ tataḥ śaraṃ samādāya vāsudevaḥ pratāpavān | pauṇḍraṃ jaghāna sahasā niśitena śareṇa ha

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर प्रतापी भगवान्‌ वासुदेवने बाण लेकर सहसा उस पैने बाणके गारा पौण्ड्रकपर प्रहार किया

अध्याय 284

श्लोक 2

पौण्ड्रोऽथ वासुदेवस्तु शरैर्दशभिराशुगैः ।वासुदेवं जघानाशु वार्ष्णेयं वृष्णिनन्दनम्

pauṇḍro'tha vāsudevastu śarairdaśabhirāśugaiḥ | vāsudevaṃ jaghānāśu vārṣṇeyaṃ vṛṣṇinandanam

हिन्दी अर्थ

पौण्ड्रक वासुदेवने भी दस शीघ्रगामी बाणोंद्वारा वृष्णिवंशी एवं वृष्णिकुलनन्दन त्रासुदेवपर शीघ्र ही आघात किया

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श्लोक 3

दारुकं पञ्चविंशत्या हयान् दशभिरेव च ।सप्तत्या वासुदेवं तु यादवं वासुदेवकः

dārukaṃ pañcaviṃśatyā hayān daśabhireva ca | saptatyā vāsudevaṃ tu yādavaṃ vāsudevakaḥ

हिन्दी अर्थ

उस मिध्या त्रासुदेवने दारुकको पच्चीस, घोड़ोंको दस और यदुकुलतिलक श्रीकृष्णको सत्तर बाण मारे

अध्याय 284

श्लोक 4

ततः प्रहस्य सुचिरं केशवः केशिसूदनः ।धृष्टोऽसाविति मनसा सम्पूज्य यदुनन्दनः

tataḥ prahasya suciraṃ keśavaḥ keśisūdanaḥ | dhṛṣṭo'sāviti manasā sampūjya yadunandanaḥ

हिन्दी अर्थ

तब केशिहन्ता यदुनन्दन करेशवने देरतक हँसकर मन-ही-मन उसकी प्रशंसा करते हुए कहा—पौण्ड्रक बड़ा ढीठ है'

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श्लोक 5

आकृष्य शार्ङ्गं बलवान् सन्धाय रिपुसूदनः ।नाराचेन सुतीक्ष्णेन ध्वजं चिच्छेद केशवः

ākṛṣya śārṅgaṃ balavān sandhāya ripusūdanaḥ | nārācena sutīkṣṇena dhvajaṃ ciccheda keśavaḥ

हिन्दी अर्थ

उसके बाद शत्रुसूदन बलवान्‌ केशवने शा्जधनुषको खींचकर उसपर तीखे नाराचका संधान किया और उसके द्वारा गौण्ड्रककी ध्वजा काट डाली

अध्याय 284

श्लोक 6

सारथेश्च शिरः कायादाहृत्य यदुनन्दनः ।अश्वांश्च चतुरो हत्वा चतुर्भिः सायकोत्तमैः

sāratheśca śiraḥ kāyādāhṛtya yadunandanaḥ | aśvāṃśca caturo hatvā caturbhiḥ sāyakottamaiḥ

श्लोक 6–7 का हिन्दी अर्थ

तत्पश्चात्‌ यदुनन्दन ग्रीहरिने उसके सारधिके सिरको धड़से अलग करके तार उत्तम सायकोंद्वारा चारों घोड़ोंको मारकर उस [जाके रथको भी तोड़-फोड़ डाला तथा दोनों पार्धरक्षकोंको पायल करके उसके रथके पहियोंको तिल-तिल करके काट डाला और वे कुछ मुसकराते हुए-से खड़े हो ये

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श्लोक 7

रथं राज्ञः समाहत्य तदोभौ पार्ष्णिसारथी ।चक्रे च तिलशः कृत्वा हसन् किञ्चिदिव स्थितः

rathaṃ rājñaḥ samāhatya tadobhau pārṣṇisārathī | cakre ca tilaśaḥ kṛtvā hasan kiñcidiva sthitaḥ

अर्थ श्लोक 6 के साथ

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श्लोक 8

पौण्ड्रको वासुदेवस्तु रथादुत्प्लुत्य सत्वरः ।आदाय निशितं खङ्गं प्राहिणोत् केशवाय सः

pauṇḍrako vāsudevastu rathādutplutya satvaraḥ | ādāya niśitaṃ khaṅgaṃ prāhiṇot keśavāya saḥ

हिन्दी अर्थ

तब पौण्ड्रक वासुदेव तुरंत ही रथसे कूद डड़ा और एक तीखी तलवार लेकर उसने भगवान्‌ फेशवपर चला दी

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श्लोक 9

स खङ्गं शतधा कृत्वा तूष्णोमासीच्च केशवः ।ततः परं महाघोरं परिघं कालसम्मितम्

sa khaṅgaṃ śatadhā kṛtvā tūṣṇomāsīcca keśavaḥ | tataḥ paraṃ mahāghoraṃ parighaṃ kālasammitam

श्लोक 9–10 का हिन्दी अर्थ

भगवान्‌ केशव उस तलवारके मी टुकड़े करके चुपचाप रथपर बैठे रहे। तत्पश्चात्‌ ततापी पौण्ड्क वासुदेवने एक कालके समान महाघोर रिघ लेकर समस्त क्षत्रियोंके देखते-देखते उसे [ष्णिवीर भगवान्‌ वासुदेवपर चला दिया

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श्लोक 10

गृहीत्वा वासुदेवाय वासुदेवः प्रतापवान् ।प्राहिणोद् वृष्णिवीराय सर्वक्षत्रस्य पश्यतः

gṛhītvā vāsudevāya vāsudevaḥ pratāpavān | prāhiṇod vṛṣṇivīrāya sarvakṣatrasya paśyataḥ

अर्थ श्लोक 9 के साथ

अध्याय 284

श्लोक 11

तद् द्विधा जगतां नाथश्चकार यदुनन्दनः ।ततश्चक्रं महाघोरं सहस्रारं महाप्रभम्

tad dvidhā jagatāṃ nāthaścakāra yadunandanaḥ | tataścakraṃ mahāghoraṃ sahasrāraṃ mahāprabham

श्लोक 11–12 का हिन्दी अर्थ

ब॒जगदीश्वर यदुनन्दनने उस परिघके दो टुकड़े र दिये। महाराज! तत्पश्चात्‌ शत्रुसूदन पौण्ड्रकने हहाघोर परम कान्तिमान्‌ सहस्रों अरोंसे युक्त तीस पार लोहेके बने हुए क्षेपणीय चक्रको हाथमें लेकर गगवान्‌ श्रीकृष्णसे कहा—

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श्लोक 12

त्रिंशद्भारसमायुक्तमायसाख्यममित्रहा ।आदायाथ महाराज केशवं वाक्यमब्रवीत्

triṃśadbhārasamāyuktamāyasākhyamamitrahā | ādāyātha mahārāja keśavaṃ vākyamabravīt

अर्थ श्लोक 11 के साथ

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श्लोक 13

पश्येदं निशितं घोरं तव चक्रविनाशनम् ।अनेन तव गोविन्द दर्पं दर्पवतां वर

paśyedaṃ niśitaṃ ghoraṃ tava cakravināśanam | anena tava govinda darpaṃ darpavatāṃ vara

श्लोक 13–19 का हिन्दी अर्थ

दर्पवाले रुषों में श्रेष्ठ गोविन्द ! देखो, यह भयंकर एवं तीखा चक्र म्हारे चक्रका विनाश करनेवाला है। वार्ष्णेय! मैं इसी क्रसे समस्त क्षत्रियोंके देखते-देखते तुम्हारा सारा मंड चूर्ण कर दूँगा। हरे! कृष्ण! तुम्हारे उद्देश्यसे ही नि यह महाभयंकर दूसरा दुर्जय चक्र तैयार कराया है। यदि तुममें शक्ति हो तो इस विशाल चक्रको विदीर्ण करो'। ऐसा कहकर महाबली महापराक्रमी नृपश्रेष्ठ पौण्ड्रकने उस चक्रको सौ बार घुमाकर श्रीकृष्णपर चला दिया। तब महाबली और पराक्रमशाली श्रीकृष्ण उस स्थानसे नीचे उतर गये और उस चक्रको विफल करके महाघोर सिंहनाद करने लगे। पहले तो भगवान्‌ देवकीनन्दन उसका साहस देखकर विस्मित हो उठे और यह कहने लगे कि *अहो! पौण्ड्रकका दुः:सह पराक्रम और धैर्य अद्भुत है'। यही सब सोचकर जगन्नाथ श्रीकृष्ण अपने उत्तम रथसे उतर पड़े थे। तदनन्तर पौण्ड्रकने एक शिलाखण्ड लेकर भगवान्‌ श्रीकृष्णपर चलाया, किंतु यदुकुलतिलक श्रीकृष्णने वह शिला फिर उसीपर दे मारी

अध्याय 284

श्लोक 14

अपनेष्यामि वार्ष्णेय सर्वक्षत्रस्य पश्यतः ।त्वामुद्दिश्य महाघोरं कृतमन्यद् दुरासदम्

apaneṣyāmi vārṣṇeya sarvakṣatrasya paśyataḥ | tvāmuddiśya mahāghoraṃ kṛtamanyad durāsadam

अर्थ श्लोक 13 के साथ

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श्लोक 15

यदि शक्तो हरे कृष्ण दारयेदं महास्पदम् ।इत्युक्त्वा तच्छतगुणं भ्रामयित्वा महाबलः

yadi śakto hare kṛṣṇa dārayedaṃ mahāspadam | ityuktvā tacchataguṇaṃ bhrāmayitvā mahābalaḥ

अर्थ श्लोक 13 के साथ

अध्याय 284

श्लोक 16

चिक्षेपाथ महावीर्यः पौण्ड्रको नृपसत्तमः ।अवप्लुत्य ततो देशात् तदुत्सृज्य महाबलः

cikṣepātha mahāvīryaḥ pauṇḍrako nṛpasattamaḥ | avaplutya tato deśāt tadutsṛjya mahābalaḥ

अर्थ श्लोक 13 के साथ

अध्याय 284

श्लोक 27

सिंहनादं महाघोरं व्यनदद् वीर्यवांस्तदा ।ततो विस्मयमापन्नो भगवान् देवकीसुतः

siṃhanādaṃ mahāghoraṃ vyanadad vīryavāṃstadā | tato vismayamāpanno bhagavān devakīsutaḥ

अध्याय 284

श्लोक 18

अहो वीर्यमहो धैर्यमस्य पौण्ड्रस्य दुःसहम् ।इति मत्वा जगन्नाथ उत्थितश्च रथोत्तमात्

aho vīryamaho dhairyamasya pauṇḍrasya duḥsaham | iti matvā jagannātha utthitaśca rathottamāt

अर्थ श्लोक 13 के साथ

अध्याय 284

श्लोक 19

ततः शिलां समादाय प्रेषयामास केशवम् ।तां शिलां प्रेषयामास तस्मै यदुकुलोद्वहः

tataḥ śilāṃ samādāya preṣayāmāsa keśavam | tāṃ śilāṃ preṣayāmāsa tasmai yadukulodvahaḥ

अर्थ श्लोक 13 के साथ

अध्याय 284

श्लोक 20

पौण्ड्रेण सुचिरं कालं विक्रीड्य भगवान् हरिः ।ततश्चक्रं समादाय निशितं रक्तभोजनम्

pauṇḍreṇa suciraṃ kālaṃ vikrīḍya bhagavān hariḥ | tataścakraṃ samādāya niśitaṃ raktabhojanam

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार भगवान्‌ श्रीहरिने पौण्ड्कके साथ चिरकालतक युद्धका खेल करके अपना तीखा चक्र हाथमें लिया, जो दैत्योंके रक्तका आहार करनेवाला था

अध्याय 284

श्लोक 22

दैत्यमांसप्रदिग्धाङ्गं नारीगर्भविमोचनम् ।शातकुम्भमयं घोरं दैत्यदानवनाशनम् ॥ २१॥।सहस्रारं शतारं तदद्भुतं दैत्यभीषणम् ।ऐश्वर्यवर्म परमं नित्यं सुरगणार्चितम्

daityamāṃsapradigdhāṅgaṃ nārīgarbhavimocanam | śātakumbhamayaṃ ghoraṃ daityadānavanāśanam || 21||| sahasrāraṃ śatāraṃ tadadbhutaṃ daityabhīṣaṇam | aiśvaryavarma paramaṃ nityaṃ suragaṇārcitam

अध्याय 284

श्लोक 23

विष्णुः कृष्णस्तथा शार्ङ्गी नित्ययुक्तः सदा हरिः ।जघान तेन गोविन्दः पौण्ड्रकं नृपसत्तमम्

viṣṇuḥ kṛṣṇastathā śārṅgī nityayuktaḥ sadā hariḥ | jaghāna tena govindaḥ pauṇḍrakaṃ nṛpasattamam

हिन्दी अर्थ

सर्वव्यापी शा धनुर्धर पापहारी श्रीकृष्ण सदा उस अस्त्रसे युक्त रहते हैं। गोविन्दने उसी अस्त्रसे नृपग्रेष्ठ पौण्ड्कको मार डाला

अध्याय 284

श्लोक 24

तस्य देहं विदार्याशु चक्रं पिशितभोजनम् ।कृष्णस्याथ करं भूयः प्राप सर्वेश्वरस्य ह

tasya dehaṃ vidāryāśu cakraṃ piśitabhojanam | kṛṣṇasyātha karaṃ bhūyaḥ prāpa sarveśvarasya ha

हिन्दी अर्थ

उसके शरीरको विदीर्ण करके वह मांसभोजी चक्र पुन: शीघ्र ही सर्वेधर श्रीकृष्णके हाथमें आ गया

अध्याय 284

श्लोक 25

ततः स पौण्ड्रको राजा गतासुः प्रापतद् भुवि ।निहत्य भगवान् विष्णुर्दुर्विज्ञेयगतिः प्रभुः ।प्रतिपेदे सुधर्मां तु यादवैः पूजितो हरिः

tataḥ sa pauṇḍrako rājā gatāsuḥ prāpatad bhuvi | nihatya bhagavān viṣṇurdurvijñeyagatiḥ prabhuḥ | pratipede sudharmāṃ tu yādavaiḥ pūjito hariḥ

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर वह राजा पौण्ड्रक प्राणशून्य होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा। जिनके स्वरूपको समझना अत्यन्त कठिन है, वे सर्वसमर्थ भगवान्‌ विष्णु हरि पौण्ड्कका वध करके यादवोंसे पूजित हो सुधर्मा नामक . सभामें चले गये

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

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पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.