Harivamsha Purana
285
अध्याय 285 / 318

Parva 3, Adhyāya 102

24 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ24 श्लोक

अध्याय 285

श्लोक 1

एकलव्यस्य द्वीपान्तरगमनं, भगवता श्रीकृष्णेन यादवानां स्वयात्रायाः सङ्क्षिप्त वृत्तान्तकथनं, अन्तःपुरे रुक्मिणीं सत्यभामां च मिलित्वा ताभ्यां सन्तोषप्रदानं निषादेशं ततो रामः शक्त्या वीर्यवतां वरः ।आजघान स्तनद्वन्द्वे सिंहनादं व्यनीनदत्

ekalavyasya dvīpāntaragamanaṃ, bhagavatā śrīkṛṣṇena yādavānāṃ svayātrāyāḥ saṅkṣipta vṛttāntakathanaṃ, antaḥpure rukmiṇīṃ satyabhāmāṃ ca militvā tābhyāṃ santoṣapradānaṃ niṣādeśaṃ tato rāmaḥ śaktyā vīryavatāṃ varaḥ | ājaghāna stanadvandve siṃhanādaṃ vyanīnadat

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर बलवानोंमें श्रेष्ठ बलरामजीने शक्तिसे निषादराज एकलव्यकी छातीमें प्रहार किया और फिर सिंहके समान गर्जना की

अध्याय 285

श्लोक 2

ततः क्रुद्धो निषादेशो रामं मत्तं महाबलम् ।गदया लोकविख्यातो जघान स्तनवक्षसि

tataḥ kruddho niṣādeśo rāmaṃ mattaṃ mahābalam | gadayā lokavikhyāto jaghāna stanavakṣasi

हिन्दी अर्थ

तब क्रोधमें भरे हुए लोक- विख्यात निषादराजने महाबली एवं बलके मदसे उन्मत्त हुए बलरामजीकी छातीमें गदासे चोट पहुँचायी

अध्याय 285

श्लोक 3

आहतः स तु तेनाशु बलभद्रो महाबलः ।उभाभ्यां चैव रामस्तु कराभ्यां वृष्णिपुङ्गवः

āhataḥ sa tu tenāśu balabhadro mahābalaḥ | ubhābhyāṃ caiva rāmastu karābhyāṃ vṛṣṇipuṅgavaḥ

श्लोक 3–4 का हिन्दी अर्थ

उसके द्वारा आहत होकर महाबली वृष्णिपुज्नव वीर बलभद्र एवं बलरामने दोनों हाथोंसे अपनी ओर आती हुई उस प्राणहारिणी महाभयंकर गदाको पकड़कर एकलव्यपर आक्रमण किया। यह देखकर निषादराज एकलव्य मगर आदि जलजन्तुओंके निवासस्थान समुद्रकी ओर भागा

अध्याय 285

श्लोक 4

गदां गृह्य महाघोरामायान्तीं प्राणहारिणीम् ।दुद्रावाथ निषादेशः समुद्रं मकरालयम्

gadāṃ gṛhya mahāghorāmāyāntīṃ prāṇahāriṇīm | dudrāvātha niṣādeśaḥ samudraṃ makarālayam

अर्थ श्लोक 3 के साथ

अध्याय 285

श्लोक 5

धावत्येवं तदा राज्ञि एकलव्ये निषादपे ।धावत्येवं च रामोऽपि यत्र यातो निषादपः

dhāvatyevaṃ tadā rājñi ekalavye niṣādape | dhāvatyevaṃ ca rāmo'pi yatra yāto niṣādapaḥ

हिन्दी अर्थ

निषादराज एकलव्यके इस प्रकार भागनेपर बलरामजी भी उसका पीछा करने लगे। वह जहाँ-जहाँ गया, वहाँ-वहाँ वे भी गये

अध्याय 285

श्लोक 6

सागरं स प्रविश्याशु गत्वा योजनपञ्चकम् ।भीत एव तदा राजन्नेकलव्यो निषादपः

sāgaraṃ sa praviśyāśu gatvā yojanapañcakam | bhīta eva tadā rājannekalavyo niṣādapaḥ

हिन्दी अर्थ

राजन्‌ ! समुद्रमें घुसकर निषादराज एकलव्य पाँच योजन दूर चला गया और वहाँ बलभद्रजीसे डरता हुआ ही निवास करने लगा

अध्याय 285

श्लोक 7

कञ्चिद् द्वीपान्तरं राजन् प्रविश्य न्यवसत् तदा ।इत्थं रामो निषादेशं जिगाय यदुनन्दनः

kañcid dvīpāntaraṃ rājan praviśya nyavasat tadā | itthaṃ rāmo niṣādeśaṃ jigāya yadunandanaḥ

हिन्दी अर्थ

नरेश्वर! किसी दूसरे द्वीपमें प्रवेश करके वह वहीं रहने लगा; इस प्रकार यदुनन्दन अलरामजीने निषादराजपर विजय पायी

अध्याय 285

श्लोक 8

तां सभां मणिरत्नाढ्यां प्रविवेश हलायुधः ।सात्यकिर्युद्धसंसक्तस्तां सभां प्रविवेश ह

tāṃ sabhāṃ maṇiratnāḍhyāṃ praviveśa halāyudhaḥ | sātyakiryuddhasaṃsaktastāṃ sabhāṃ praviveśa ha

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर हलायुध बलरामजीने मणि तथा रत्ोंसे विभूषित उस पुधर्मा-सभामें प्रवेश किया। युद्धमें फँसे हुए सात्यकि भी उससे विरत हो सभामें लौट आये

अध्याय 285

श्लोक 9

अन्ये च यादवा राजन् यथायोगमुपस्थिताः ।आसीनेषु च सर्वेषु वृष्णिवीरेषु सर्वतः

anye ca yādavā rājan yathāyogamupasthitāḥ | āsīneṣu ca sarveṣu vṛṣṇivīreṣu sarvataḥ

श्लोक 9–10 का हिन्दी अर्थ

राजन्‌! अन्य यादव भी यथावसर वहाँ उपस्थित हुए। जब सभी तृष्णिवंशी वीर वहाँ सब ओर बैठ गये, तब देवकीनन्दन भगवान्‌ केशवने योग्यताके अनुसार सभी वृष्णिवंशियोंका भभिवादन करके उस समय यह बात कही—

अध्याय 285

श्लोक 10

अभिवाद्य यथायोगं वृष्णीन् सर्वांश्च केशवः ।उवाच वचनं काले भगवान् देवकीसुतः

abhivādya yathāyogaṃ vṛṣṇīn sarvāṃśca keśavaḥ | uvāca vacanaṃ kāle bhagavān devakīsutaḥ

अर्थ श्लोक 9 के साथ

अध्याय 285

श्लोक 11

दृष्टं कैलासशिखरं शङ्करो नीललोहितः ।स तु मह्यं यदुवराः प्रीतिमांश्च ददौ वरम्

dṛṣṭaṃ kailāsaśikharaṃ śaṅkaro nīlalohitaḥ | sa tu mahyaṃ yaduvarāḥ prītimāṃśca dadau varam

हिन्दी अर्थ

यदुवरो ! मैंने कैलासशिखरका दर्शन किया। वहाँ गीललोहित भगवान्‌ शड्रने मुझे प्रसन्न होकर वर दिया दे

अध्याय 285

श्लोक 12

तत्र देवाः समायाता मुनयश्च तपोधनाः ।दृष्ट्वा मां शङ्करश्चैव प्रीतः स्तुत्वा समाययौ

tatra devāḥ samāyātā munayaśca tapodhanāḥ | dṛṣṭvā māṃ śaṅkaraścaiva prītaḥ stutvā samāyayau

हिन्दी अर्थ

वहाँ देवता और तपोधन मुनि भी पधारे थे। भगवान्‌ शड्र मुझसे मिलकर प्रसन्न हुए और मेरी स्तुति करके लौट गये

अध्याय 285

श्लोक 13

अत्यद्भुतं मया दृष्टं रात्रौ यादवसत्तमाः ।पिशाचौ द्वौ महाघोरौ वदन्तौ मामिकां कथाम्

atyadbhutaṃ mayā dṛṣṭaṃ rātrau yādavasattamāḥ | piśācau dvau mahāghorau vadantau māmikāṃ kathām

श्लोक 13–17 का हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तब उन सभी वृष्णिवंशियोंने देवाधिदेव भगवान्‌ श्रीकृष्णकी भूरि-भूरि प्रशंसा की। श्रीकेशवका आश्रय लेकर वे वृष्णिवंशी सर्वथा कृतकृत्य हो गये। तत्पश्चात्‌ वे सभी यादव अपने-अपने घरको चले गये

अध्याय 285

श्लोक 14

मृगयां चक्रतुस्तौ तु चिन्तयन्तौ तु मां सदा ।दृष्ट्वा मां तौ तु राजेन्द्राः प्रीतिमन्तौ तपस्विनौ

mṛgayāṃ cakratustau tu cintayantau tu māṃ sadā | dṛṣṭvā māṃ tau tu rājendrāḥ prītimantau tapasvinau

अर्थ श्लोक 13 के साथ

अध्याय 285

श्लोक 15

भक्तिनम्रौ महात्मानौ प्रणामं चक्रतुस्तदा ।ततोऽहं सर्वथा प्रीतस्तौ नीतौ स्वर्गमुत्तमम्

bhaktinamrau mahātmānau praṇāmaṃ cakratustadā | tato'haṃ sarvathā prītastau nītau svargamuttamam

अर्थ श्लोक 13 के साथ

अध्याय 285

श्लोक 16

तोषयित्वा महादेवं मया चाद्य समागतम् ।ततस्ते वृष्णयः सर्वे देवदेवं शशंसिरे

toṣayitvā mahādevaṃ mayā cādya samāgatam | tataste vṛṣṇayaḥ sarve devadevaṃ śaśaṃsire

अर्थ श्लोक 13 के साथ

अध्याय 285

श्लोक 17

सर्वथा कृतकृत्यास्ते वृष्षयः केशवाश्रयाः ।यादवाः सर्व एवैते स्वं स्वं जग्मुर्यथालयम्

sarvathā kṛtakṛtyāste vṛṣṣayaḥ keśavāśrayāḥ | yādavāḥ sarva evaite svaṃ svaṃ jagmuryathālayam

अर्थ श्लोक 13 के साथ

अध्याय 285

श्लोक 18

अभ्यन्तरे जगन्नाथः प्रविश्य हरिरीश्वरः ।रुक्मिणीसत्यभामाभ्यामाचचक्षे यथाभवत्

abhyantare jagannāthaḥ praviśya harirīśvaraḥ | rukmiṇīsatyabhāmābhyāmācacakṣe yathābhavat

हिन्दी अर्थ

फिर जगन्नाथ सर्वेश्वर श्रीहरिने भी अन्तःपुरमें प्रवेश करके रुक्मिणी और सत्यभामासे जो जैसे घटित हुई थीं, वे सारी बातें बतायीं

अध्याय 285

श्लोक 19

ते प्रीते प्रीतियुक्तेन केशवेन समन्विते ।एतत् ते सर्वमाख्यातं केशवस्य विचेष्टितम्

te prīte prītiyuktena keśavena samanvite | etat te sarvamākhyātaṃ keśavasya viceṣṭitam

हिन्दी अर्थ

वे दोनों प्रीतियुक्त केशवके साथ वह सब सुनकर बहुत प्रसन्न हुईं। इस प्रकार मैंने तुमसे भगवान्‌ श्रीकृष्णकी सारी लीलाएँ कह सुनायीं

अध्याय 285

श्लोक 20

शशास पृथिवीं कृत्स्नां दुष्टान् हत्वा महाबलान् ।नरकं घोरकर्माणं पौण्ड्रकं नृपसत्तमम्

śaśāsa pṛthivīṃ kṛtsnāṃ duṣṭān hatvā mahābalān | narakaṃ ghorakarmāṇaṃ pauṇḍrakaṃ nṛpasattamam

श्लोक 20–21 का हिन्दी अर्थ

श्रीकृष्णने महाबली दुष्टांका वध करके सारी पृथ्वीका शासन किया। बड़े-बड़े मुनियोंसे पूजित हुए उन देवेश्वरने घोर कर्म करनेवाले नरकासुरको, नृपश्रेष्ठ पौण्ड्रकको, हयग्रीव और निशुम्भको तथा सुन्द और उपसुन्दको मारकर मुनियों एवं ब्राह्मणोंकी रक्षा की

अध्याय 285

श्लोक 21

हयग्रीवं निशुम्भं च तथा सुन्दोपसुन्दकौ ररक्ष विप्रान् देवेशो मुनीन् मुनिवरार्चितः

hayagrīvaṃ niśumbhaṃ ca tathā sundopasundakau rarakṣa viprān deveśo munīn munivarārcitaḥ

अर्थ श्लोक 20 के साथ

अध्याय 285

श्लोक 22

विप्रेभ्यश्च ददौ वित्तं गाश्च दत्त्वा स केशवः ।अग्निहोत्रं प्रयुञ्जानो ब्राह्मणांश्च सुतपर्यन्

viprebhyaśca dadau vittaṃ gāśca dattvā sa keśavaḥ | agnihotraṃ prayuñjāno brāhmaṇāṃśca sutaparyan

हिन्दी अर्थ

भगवान्‌ केशव ब्राह्मणोंको गौएँ देकर उनके लिये धन भी देते थे, अग्रिहोत्र करते और ब्राह्मणोंको भोजन आदिसे तृतत करते थे

अध्याय 285

श्लोक 23

मुनींश्च ब्रह्मचर्येण देवान् यज्ञैरनेकधा ।स्वधया च पितॄन् सर्वान् प्रीणयन्नेव सर्वदा

munīṃśca brahmacaryeṇa devān yajñairanekadhā | svadhayā ca pitṝn sarvān prīṇayanneva sarvadā

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक वेदोंके स्वाध्यायसे मुनियोंको, अनेक प्रकारके यज्ञोंद्वारा देवताओंको तथा स्वधाकर्म (श्राद्ध तर्पण)-से समस्त पितरोंको सदा तृप्त करते रहते थे

अध्याय 285

श्लोक 24

तस्मिञ्छासति देवेशे राज्यं निष्कण्टकं प्रभो ।सुखमेव प्रजाः सर्वा जीवन्ति ब्राह्मणादयः

tasmiñchāsati deveśe rājyaṃ niṣkaṇṭakaṃ prabho | sukhameva prajāḥ sarvā jīvanti brāhmaṇādayaḥ

हिन्दी अर्थ

प्रभो! देवेश्वर श्रीकृष्णके निष्कण्टक राज्य शासन करते समय ब्राह्मण आदि सारी प्रजाएँ सुखपूर्वक ही जीवन-निर्वाह करती थीं

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

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व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

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आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

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Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.