Harivamsha Purana
288
अध्याय 288 / 318

Parva 3, Adhyāya 105

27 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ27 श्लोक

अध्याय 288

श्लोक 1

हंसडिम्भकाभ्यां तपश्चरणं, वरप्राप्तिः, जनार्दनस्य सहितस्य तयोः विवाहः, तेषां त्रयाणां कुमाराणां धर्मनिष्ठा हंसश्च डिम्भकश्चैवं तपश्चर्तुं महामती ।मनश्चक्रतुरात्मांशौ शङ्करस्य नृपोत्तम

haṃsaḍimbhakābhyāṃ tapaścaraṇaṃ, varaprāptiḥ, janārdanasya sahitasya tayoḥ vivāhaḥ, teṣāṃ trayāṇāṃ kumārāṇāṃ dharmaniṣṭhā haṃsaśca ḍimbhakaścaivaṃ tapaścartuṃ mahāmatī | manaścakraturātmāṃśau śaṅkarasya nṛpottama

हिन्दी अर्थ

मो$ध्याय: स्‍्स्‍स्‍स्‍ण न दोनोंका विवाह तथा तीनों कुमारोंकी धर्मनिष्ठा वैशम्पायनजीने कहा—नृपश्रेष्ठ ! राजकुमार हंस गौर डिम्भक भगवान्‌ शंकरके अपने अंशसे उत्पन्न और रम बुद्धिमानू थे। उन दोनोंने तपस्या करनेका विचार कया

अध्याय 288

श्लोक 2

गत्वा तु हिमवत्पार्श्वं तपश्चक्रतुरञ्जसा ।उद्दिश्य शङ्करं शर्वं नीलग्रीवमुमापतिम्

gatvā tu himavatpārśvaṃ tapaścakraturañjasā | uddiśya śaṅkaraṃ śarvaṃ nīlagrīvamumāpatim

श्लोक 2–7 का हिन्दी अर्थ

नरेश्वर! हिमालयके पास जाकर वायु और जलका आहार करते हुए वे दोनों एकाग्र एवं संयतचित्त हो मनमें ह संकल्प लेकर कि ' हमें दिव्य पराक्रम और अस्त्र प्राप्त [ जायेँ' कल्याणकारी कष्टहारी नीलकण्ठ भगवान्‌ उमापतिकी सन्नताके उद्देश्यसे सानन्द तपस्या करने लगे॥ र-३े॥ वे दिन-रात देवाधिदेव ! शंकर ! हर ! शर्व ! शिवानन्द! नीलग्रीव ! उमापते ! वृषभध्वज ! विरूपाक्ष ! हर्यक्ष ! जगत्पते ! भक्तप्रिय! गिरीश! ईश! वासुदेव! शिव! अच्युत! सद्योजात ! महादेव ! देवदेव ! अन्तर्यामीरूपसे हृदयगुद्दामें शयन करनेवाले! भूतभावन! देवेश्वर ! ओज्ारस्वरूप ! सदाशिव ! आपको नमस्कार है, इत्यादि रूपसे भगवान्‌के नामोंद्वारा नित्य-निरन्तर कल्याणकारी भगवान्‌ भवकी स्तुति करते हुए उन्हीं भगवान्‌ विरूपाक्ष (शिव)- को हृदयमें धारण करके सुखपूर्वक तपस्यामें लगे रहे

अध्याय 288

श्लोक 3

वीर्यास्त्रे चैव नौ स्यातामित्याधाय तु मानसे ।एकाग्रौ प्रयतौ भूत्वा वाय्वम्बुप्राशिनौ नृप

vīryāstre caiva nau syātāmityādhāya tu mānase | ekāgrau prayatau bhūtvā vāyvambuprāśinau nṛpa

अर्थ श्लोक 2 के साथ

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श्लोक 4

नमस्ते देवदेवेति शङ्करेति दिवानिशम् ।हर शर्व शिवानन्द नीलग्रीव उमापते

namaste devadeveti śaṅkareti divāniśam | hara śarva śivānanda nīlagrīva umāpate

अर्थ श्लोक 2 के साथ

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श्लोक 5

वृषध्वज विरूपाक्ष हर्यक्ष जगतां पते ।भक्तप्रिय गिरीशेश वासुदेव शिवाच्युत

vṛṣadhvaja virūpākṣa haryakṣa jagatāṃ pate | bhaktapriya girīśeśa vāsudeva śivācyuta

अर्थ श्लोक 2 के साथ

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श्लोक 6

सद्योजात महादेव देवदेव गुहाशय ।भूतभावन देवेश प्रणवात्मन् सदाशिव

sadyojāta mahādeva devadeva guhāśaya | bhūtabhāvana deveśa praṇavātman sadāśiva

अर्थ श्लोक 2 के साथ

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श्लोक 7

इत्यादिनामभिर्नित्यं स्तुवन्तौ शङ्करं भवम् ।हृदि कृत्वा विरूपाक्षं तपस्तेपतुरञ्जसा

ityādināmabhirnityaṃ stuvantau śaṅkaraṃ bhavam | hṛdi kṛtvā virūpākṣaṃ tapastepaturañjasā

अर्थ श्लोक 2 के साथ

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श्लोक 8

निर्ममौ निरहङ्कारौ मौनव्रतसमास्थितौ ।वर्षाणीह तदा राजन् पञ्च चक्रतुरोजसा

nirmamau nirahaṅkārau maunavratasamāsthitau | varṣāṇīha tadā rājan pañca cakraturojasā

श्लोक 8–10 का हिन्दी अर्थ

राजन्‌! उनमें ममता और अहंकारका अभाव हो गया। वे मौनब्रतका आश्रय लेकर उन दिनों पाँच वर्षोतक उत्साहपूर्वक तपस्यामें लगे रहे। उन दोनोंके तप और संयमसे भगवान्‌ शंकरको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने उन दोनोंको अपने स्वरूपका दर्शन दिया। उस समय उनके श्रीअड्लॉंपर व्याघ्रचर्ममय वस्त्र शोभा पा रहा था। वे पापहारी, त्रिनेत्रधारी और कल्याणकारी उमावल्लभ भगवान्‌ शिव हाथमें त्रिशूल लिये वहाँ उपस्थित थे। चन्द्रार्धशेखर भगवान्‌ शिवको अपने सामने खड़ा देख वे दोनों प्रसन्नचित्त हो उन्हें बारम्बार नमस्कार करने लगे

अध्याय 288

श्लोक 9

ततः प्रीतोऽभवच्छर्वस्ताभ्यां संयमनेन च ।स ददौ दर्शनं नैजं व्याघ्रचर्माम्बरो हरः

tataḥ prīto'bhavaccharvastābhyāṃ saṃyamanena ca | sa dadau darśanaṃ naijaṃ vyāghracarmāmbaro haraḥ

अर्थ श्लोक 8 के साथ

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श्लोक 10

त्रियक्षः शङ्करः शर्वः शूलपाणिरुमापतिः ।अग्रतः संस्थितं शर्वं चन्द्रार्धकृतशेखरम् ।तौ दृष्ट्वा प्रीतमनसौ नमश्चक्रतुरञ्जसा

triyakṣaḥ śaṅkaraḥ śarvaḥ śūlapāṇirumāpatiḥ | agrataḥ saṃsthitaṃ śarvaṃ candrārdhakṛtaśekharam | tau dṛṣṭvā prītamanasau namaścakraturañjasā

अर्थ श्लोक 8 के साथ

अध्याय 288

श्लोक 11

वरं वरय भद्रं वां यथेच्छा वां तथास्तु वै ।तावूचतुस्तदा राजन् प्रीतस्त्वं भगवन् यदि

varaṃ varaya bhadraṃ vāṃ yathecchā vāṃ tathāstu vai | tāvūcatustadā rājan prītastvaṃ bhagavan yadi

श्लोक 11–12 का हिन्दी अर्थ

तब श्रीभगवान्‌ बोले—राजकुमारो! तुम दोनोंका कल्याण हो! तुम कोई वर माँगो ! तुम्हारी जैसी इच्छा हो, वह पूर्ण हो। राजन्‌ ! यह सुनकर वे दोनों बोले—' भगवन्‌ ! यदि आप प्रसन्न हैं तो हम आपकी कृपासे देवताओं और असुरोंके मुख्य-मुख्य सेनापतियों, यक्षों, गन्धर्वों और दानवोंके लिये भी अजेय हो जायेँ। सर्वात्मन्‌! यही हम दोनोंका पहला वर है

अध्याय 288

श्लोक 12

देवासुरचमूमुख्यैर्यक्षगन्धर्वदानवैः ।आवामजय्यौ सर्वात्मन्नेष नौ प्रथमो वरः

devāsuracamūmukhyairyakṣagandharvadānavaiḥ | āvāmajayyau sarvātmanneṣa nau prathamo varaḥ

अर्थ श्लोक 11 के साथ

अध्याय 288

श्लोक 13

द्वितीयो नौ विरूपाक्ष रौद्रास्त्राणां च सङ्ग्रहः ।माहेश्वरं तथा रौद्रमस्त्रं ब्रह्मशिरो महत्

dvitīyo nau virūpākṣa raudrāstrāṇāṃ ca saṅgrahaḥ | māheśvaraṃ tathā raudramastraṃ brahmaśiro mahat

हिन्दी अर्थ

विरूपाक्ष ! हमारा दूसरा वर यह है कि हमारे पास सभी भयंकर अस्त्रोंका संग्रह हो। माहेश्वरास्त्र, रौद्रास्त्र तथा महान्‌ ब्रह्मशिर नामक अस्त्र हमें उपलब्ध हों

अध्याय 288

श्लोक 14

अभेद्यं कवचं दिव्यमच्छेद्यं चापि कार्मुकम् ।परशुं च तथा शर्व सदा रक्षार्थमेव च

abhedyaṃ kavacaṃ divyamacchedyaṃ cāpi kārmukam | paraśuṃ ca tathā śarva sadā rakṣārthameva ca

हिन्दी अर्थ

शर्व ! अभेद्य कवच, दिव्य एवं अच्छेद्य धनुष और परशु -ये सदा हमें रक्षाके लिये सुलभ हों

अध्याय 288

श्लोक 15

सहायौ द्वौ महादेव भूतौ युद्धे हि गच्छताम् ।एवमस्त्विति देवेश आह भृङ्गिरिटी हरः

sahāyau dvau mahādeva bhūtau yuddhe hi gacchatām | evamastviti deveśa āha bhṛṅgiriṭī haraḥ

श्लोक 15–17 का हिन्दी अर्थ

महादेव! युद्धमें आपके दो-दो भूत हमारी सहायताके लिये जाया करें ।' तब देवेधर हरने ' ऐसा ही होगा', यह कहकर अपने दो पार्षद भूद्धि और रिटिसे तथा कुण्डोदर एवं समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर रहनेवाले विरूपाक्षसे कहा—'तुम दोनों दो-दो करके दो भूतेश्वर हो, तुम युद्धके अवसरपर सदा घोर-से-घोर संग्राममें इन दोनों बलशाली वीरोंकी सहायताके लिये अवश्य पहुँच जाना।' ऐसा कहकर भगवान्‌ शर्व वहीं अन्तर्धान हो गये॥ श

अध्याय 288

श्लोक 16

कुण्डोदरं विरूपाक्षं सर्वप्राणिहिते रतम् ।युवामथ च भूतेशौ सहायौ सततं रणे

kuṇḍodaraṃ virūpākṣaṃ sarvaprāṇihite ratam | yuvāmatha ca bhūteśau sahāyau satataṃ raṇe

अर्थ श्लोक 15 के साथ

अध्याय 288

श्लोक 17

सङ्ग्रामं गच्छतां घोरमेतयोर्बलशालिनोः ।इत्युक्त्वा भगवाञ्छर्वस्तत्रैवान्तरधीयत

saṅgrāmaṃ gacchatāṃ ghorametayorbalaśālinoḥ | ityuktvā bhagavāñcharvastatraivāntaradhīyata

अर्थ श्लोक 15 के साथ

अध्याय 288

श्लोक 18

ततस्तौ वीर्यसम्पन्नौ हंसो डिम्भक एव च ।कृतास्त्रौ शस्त्रसम्पन्नौ चापिनौ वीर्यवत्तरौ

tatastau vīryasampannau haṃso ḍimbhaka eva ca | kṛtāstrau śastrasampannau cāpinau vīryavattarau

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर बल और पराक्रमसे सम्पन्न हंस और डिम्भक सम्पूर्ण अस्त्रोंके ज्ञाता, अस्त्र-शस्त्रोंके सल्चयसे युक्त, धनुर्धर एवं अत्यन्त बलवान्‌ हो गये

अध्याय 288

श्लोक 19

आमुक्तकवचौ वीरावजय्यौ देवदानवैः ।अत्यन्तभक्तौ देवेशे शङ्करे नीललोहिते

āmuktakavacau vīrāvajayyau devadānavaiḥ | atyantabhaktau deveśe śaṅkare nīlalohite

हिन्दी अर्थ

कवच बाँधकर वे दोनों वीर जब युद्धमें खड़े होते, 'उस समय देवता और दानवोंके लिये भी उन्हें जीतना असम्भव हो जाता था। नीललोहित भगवान्‌ शंकरमें उन दोनोंकी बड़ी भक्ति थी

अध्याय 288

श्लोक 20

नित्योत्सवकरौ देवे भस्मोद्धूलनशोभिनौ ।कृतत्रिपुण्ड्रकौ नित्यं जटायुक्तशिरोधरौ

nityotsavakarau deve bhasmoddhūlanaśobhinau | kṛtatripuṇḍrakau nityaṃ jaṭāyuktaśirodharau

हिन्दी अर्थ

वे महादेवजीके लिये नित्य उत्सव रचाते, अपने अड्डोंमें भस्म लगाकर सुशोभित होते, ललागमें त्रिपुण्ड लगाते और सदा सिरपर जटाएँ धारण करते थे

अध्याय 288

श्लोक 21

रुद्राक्षार्पितसर्वाङ्गौ व्याघ्रचर्माम्बरावृतौ ।नमः शिवाय शान्ताय महादेवाय धीमते

rudrākṣārpitasarvāṅgau vyāghracarmāmbarāvṛtau | namaḥ śivāya śāntāya mahādevāya dhīmate

श्लोक 21–22 का हिन्दी अर्थ

सारे अग़ोंमें रुद्राक्ष धारण करते, अपने अड्ोंको व्याघ्रचर्मसे आच्छादित करते और 'परमबुद्धिमान्‌ शान्तस्वरूप महान्‌ देव शिवको नमस्कार है' इत्यादि नामोंद्वारा महादेव शिवकी स्तुति करते थे। इस प्रकार वे दोनों अपनी भीगी जटाओंमें जल धारण करके साक्षात्‌ गड़ाधर महादेवके दो विग्रहोंके समान शोभा पाते थे

अध्याय 288

श्लोक 22

इत्यादिभिर्महादेवं स्तुवन्तौ नामभिः शिवम् ।साक्षादिव महादेवौ रेजतुर्जलधारिणौ

ityādibhirmahādevaṃ stuvantau nāmabhiḥ śivam | sākṣādiva mahādevau rejaturjaladhāriṇau

अर्थ श्लोक 21 के साथ

अध्याय 288

श्लोक 23

ततः स्वभवनं गत्वा पितुः पादावगृह्यताम् ।पितुश्च सख्युर्बलिनौ मातुश्च चरणौ तदा

tataḥ svabhavanaṃ gatvā pituḥ pādāvagṛhyatām | pituśca sakhyurbalinau mātuśca caraṇau tadā

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर उन दोनों बलवान्‌ वीरोंने अपने घर जाकर पिताके चरण पकड़े, पिताके सखा मित्रसहके पैर छुये और माताके चरणोंमें प्रणाम किया

अध्याय 288

श्लोक 24

जनार्दनोऽपि धर्मात्मा कालेन महता नृप ।विद्यापारं महाबुद्धिर्युक्तेनासावुपेयिवान्

janārdano'pi dharmātmā kālena mahatā nṛpa | vidyāpāraṃ mahābuddhiryuktenāsāvupeyivān

हिन्दी अर्थ

नरेश्वर! परम बुद्धिमान धर्मात्मा जनार्दनने भी दीर्घकालतक अध्ययन करके योगयुक्त होकर सम्पूर्ण विद्याओंमें पारज्ञत योग्यता प्राप्त की

अध्याय 288

श्लोक 25

स च विष्णुं हृषीकेशं पीतकौशेयवाससम् ।ब्रह्मतत्त्वपरो नित्यमुपास्ते विजितेन्द्रियः

sa ca viṣṇuṃ hṛṣīkeśaṃ pītakauśeyavāsasam | brahmatattvaparo nityamupāste vijitendriyaḥ

हिन्दी अर्थ

वह अपनी इन्द्रियोंको वशमें करके ब्रह्मतत्त्वके चिन्तनमें तत्पर रहकर नित्य-निरन्तर इन्द्रियोंके प्रेरक, रेशमी पीताम्बरधारी भगवान्‌ विष्णुकी उपासना करता था

अध्याय 288

श्लोक 26

हंसश्च डिम्भकश्चैव कृतदारो बभूवतुः ।जनार्दनोऽपि धर्मात्मा कृतदारो बभूव ह

haṃsaśca ḍimbhakaścaiva kṛtadāro babhūvatuḥ | janārdano'pi dharmātmā kṛtadāro babhūva ha

हिन्दी अर्थ

हंस और डिम्भकके विवाह हो गये, फिर धर्मात्मा जनार्दनने भी पत्नीका पाणिग्रहण किया

अध्याय 288

श्लोक 27

सर्वे ते यज्ञनिरताः पञ्चयज्ञपरास्तथा ।स्वदारनिरताः सर्वे गुरुशुश्रूषणे रताः ।धर्म एव परं श्रेय इति ते मेनिरे नृप

sarve te yajñaniratāḥ pañcayajñaparāstathā | svadāraniratāḥ sarve guruśuśrūṣaṇe ratāḥ | dharma eva paraṃ śreya iti te menire nṛpa

हिन्दी अर्थ

वे सब-के-सब यज्में तत्पर, पश्टयज्ञरायण और अपनी ही पत्नीमें अनुरक्त रहकर गुरुजनोंकी सेवामें संलग्न रहते थे। नरेश्वर! वे यह मानते थे कि “धर्म ही परम कल्याण करने वाला है'

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

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पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.