Harivamsha Purana
289
अध्याय 289 / 318

Parva 3, Adhyāya 106

17 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ17 श्लोक

अध्याय 289

श्लोक 1

हंसडिम्भकाभ्यां मृगया ततः कदाचित् तौ वीरौ मृगयामाटतुः किल ।जनार्दनेन सहितौ रथैरश्वैर्गजैरपि

haṃsaḍimbhakābhyāṃ mṛgayā tataḥ kadācit tau vīrau mṛgayāmāṭatuḥ kila | janārdanena sahitau rathairaśvairgajairapi

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर किसी समय वे दोनों वीर हंस और डिम्भक जनार्दनको साथ ले रथ, हाथी और अध्वोंद्वारा शिकार खेलनेके लिये गये

अध्याय 289

श्लोक 2

वनं गत्वा तु तौ वीरौ सिंहव्याघ्रांश्च जघ्नतुः ।शितैर्बाणैर्महाराज वराहानथ सर्वशः

vanaṃ gatvā tu tau vīrau siṃhavyāghrāṃśca jaghnatuḥ | śitairbāṇairmahārāja varāhānatha sarvaśaḥ

हिन्दी अर्थ

महाराज! वनमें जाकर वे दोनों वीर अपने पैने बाणोंद्वारा सिंहों, व्याघ्रों और वराहोंका सब प्रकारसे वध करने लगे

अध्याय 289

श्लोक 3

व्यालानन्यान् मृगान् हिंस्राञ्छ्वभिश्च सहितौ नृप ।एष आयाति विपुलो वराहो दीर्घलोचनः

vyālānanyān mṛgān hiṃsrāñchvabhiśca sahitau nṛpa | eṣa āyāti vipulo varāho dīrghalocanaḥ

श्लोक 3–7 का हिन्दी अर्थ

नरेश्र! सर्पों तथा अन्यान्य हिंसक पशुओंका कुत्तोंके साथ रहकर उन दोनों भाइयोंने वध किया। नृपश्रेष्ठ! उस समय शिकार खेलते हुए इधर- उधर दौड़नेवाले क्षत्रियों और व्याधोंका यह महान्‌ शब्द सब ओर सुनायी देता था, *यह बड़े-बड़े नेत्रोंबाला विशाल वराह आ रहा है। यह सिंह जा रहा है, इसे बाणद्वारा काट डालो । यह दूसरा भैंसा जा रहा है, इसके सींगमें सर्प गुँथ गया है। ये मृग अपने बच्चोंके साथ बाधाका अनुभव करते हुए भाग रहे हैं । यह खरगोशोंका महान्‌ समुदाय भयभीत होकर सर्वत्र भटक रहा है। यह छोटा बच्चा स्तन पी रहा है, इसे नहीं मारना चाहिये, ऐसा. करनेमें ही भलाई है। इन सबको कुत्तोंसे घेरकर जीवित ही पकड़ लेना चाहिये' इत्यादि

अध्याय 289

श्लोक 4

एनं वाणेन सञ्छिन्धि याति चायं मृगाधिपः ।अयमन्योऽथ महिषः शृङ्गप्रोतसरीसृपः

enaṃ vāṇena sañchindhi yāti cāyaṃ mṛgādhipaḥ | ayamanyo'tha mahiṣaḥ śṛṅgaprotasarīsṛpaḥ

अर्थ श्लोक 3 के साथ

अध्याय 289

श्लोक 5

एते खलु मृगाः सार्धं शावैर्बाधन्ति सर्वशः ।एतद् भ्रमति सर्वत्र भीतं शशकुलं महत्

ete khalu mṛgāḥ sārdhaṃ śāvairbādhanti sarvaśaḥ | etad bhramati sarvatra bhītaṃ śaśakulaṃ mahat

अर्थ श्लोक 3 के साथ

अध्याय 289

श्लोक 6

शावं स्तनं पिबत्साधु न हन्तव्यमिदं शुभम् ।ग्रहीतव्यमिदं सर्वं निरुध्य श्वगणैरिह

śāvaṃ stanaṃ pibatsādhu na hantavyamidaṃ śubham | grahītavyamidaṃ sarvaṃ nirudhya śvagaṇairiha

अर्थ श्लोक 3 के साथ

अध्याय 289

श्लोक 7

इत्यादिशब्दः सुमहान् मृगयां कुर्वतां नृप ।क्षत्रियाणां नृपश्रेष्ठ व्याधानां चैव धावताम्

ityādiśabdaḥ sumahān mṛgayāṃ kurvatāṃ nṛpa | kṣatriyāṇāṃ nṛpaśreṣṭha vyādhānāṃ caiva dhāvatām

अर्थ श्लोक 3 के साथ

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श्लोक 8

हत्वा मृगान् सुबहुशो व्याघ्रान् सिंहान् नृपोत्तमौ ।श्रमं च जग्मतुर्वीरौ मध्यं याते दिवाकरे

hatvā mṛgān subahuśo vyāghrān siṃhān nṛpottamau | śramaṃ ca jagmaturvīrau madhyaṃ yāte divākare

हिन्दी अर्थ

नृपश्रेष्ठ वीर हंस और डिम्भक दोपहर होते-होते बहुत-से हिंसक पशुओं, व्याप्रों और सिंहोंको मारकर अधिक श्रमके कारण थक गये

अध्याय 289

श्लोक 9

अलं हि मृगयास्माकं श्रमः समुपजायते ।इत्यूचतुर्महाराज पुष्करं जग्मतुः सरः

alaṃ hi mṛgayāsmākaṃ śramaḥ samupajāyate | ityūcaturmahārāja puṣkaraṃ jagmatuḥ saraḥ

हिन्दी अर्थ

महाराज! वे दोनों बोले-* अब शिकार बंद किया जाय, हमें थकावट हो रही है।' यों कहकर वे पुष्कर सरोवरकी ओर चले गये

अध्याय 289

श्लोक 10

सरःसमीपमागम्य मुनिसिद्धनिषेवितम् ।वीजन् मारुतसानूपं श्रमात् तत्र सुखस्थितौ

saraḥsamīpamāgamya munisiddhaniṣevitam | vījan mārutasānūpaṃ śramāt tatra sukhasthitau

हिन्दी अर्थ

सरोवरके तटपर आकर वे दोनों परिश्रमके कारण वहाँ सुखपूर्वक बैठ गये। वह स्थान मुनियों और सिद्धोंसे सेवित था तथा उस सजल प्रदेशमें मंद-मंद वायु इस प्रकार चल रही थी मानो व्यजन डुला रही हो

अध्याय 289

श्लोक 11

ततो जनाः सरः सर्वे विगाह्य श्रमकर्षिताः ।बिसान् प्रवालान् पद्मानां भक्षयामासुरार्तवत्

tato janāḥ saraḥ sarve vigāhya śramakarṣitāḥ | bisān pravālān padmānāṃ bhakṣayāmāsurārtavat

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर परिश्रमसे थके हुए सब लोग उस सरोवरमें स्रान करके भूखसे पीड़ित हुएकी भाँति भसीड़ और 'कमलगट्टा खाने लगे

अध्याय 289

श्लोक 12

जनार्दनेन सहितौ हंसो डिम्भक एव च ।सरः क्वचित् समाश्रित्य श्रमं सन्त्यज्य तिष्ठतः

janārdanena sahitau haṃso ḍimbhaka eva ca | saraḥ kvacit samāśritya śramaṃ santyajya tiṣṭhataḥ

हिन्दी अर्थ

जनार्दनसहित हंस और डिम्भक भी उस सरोवरके किसी तटका आश्रय लेकर अपना परिश्रम दूर करके बैठे हुए थे

अध्याय 289

श्लोक 13

विश्रम्य सरसस्तीरे तदाऽऽसाते सुखं नृपौ ।अशृण्वातां परं ब्रह्म मुनिमुख्यैः समीरितम्

viśramya sarasastīre tadā''sāte sukhaṃ nṛpau | aśṛṇvātāṃ paraṃ brahma munimukhyaiḥ samīritam

हिन्दी अर्थ

सरोवरके तटपर विश्राम लेकर वे दोनों नरेश वहाँ सुखपूर्वक बैठे ही थे कि उसी समय प्रधान-प्रधान मुनियोंद्वारा उच्चारित उत्तम वेदवाणी उन्हें सुनायी दी

अध्याय 289

श्लोक 14

मध्यन्दिनं तथा सर्वैः सवनं सस्वरं नृपौ ।ततः प्रीतौ नृपौ भूत्वा श्रुत्वा वेदध्वनिं तदा

madhyandinaṃ tathā sarvaiḥ savanaṃ sasvaraṃ nṛpau | tataḥ prītau nṛpau bhūtvā śrutvā vedadhvaniṃ tadā

श्लोक 14–17 का हिन्दी अर्थ

तमो5ध्याय: + श्३०९ उन राजकुमारोंने मध्यंदिन सबनके समय सबके साथ सस्वर वेदपाठ सुना। उस समय उस वेदध्वनिको सुनकर वे दोनों नरेश बड़े प्रसन्न हुए और मुनियों- द्वारा किये गये उस यज्ञको देखनेकी इच्छा करने लगे। महाराज! तदनन्तर मृगोंसहित उस सारी सेनाको वहीं ठहराकर स्वयं दो बड़े-बड़े धनुष और कुछ बाण लेकर जनार्दनसहित वे दोनों वीर हंस और डिम्भक पैदल ही उन महर्षि काश्यपके आश्रममें गये, जो जप और होममें तत्पर रहनेवाले मुनियोंके साथ वैष्णव सत्रका अनुष्ठान कर रहे थे

अध्याय 289

श्लोक 15

ऐच्छेतां तौ तदा द्रष्टुं यज्ञं मुनिकृतं तदा ।स्थापयित्वा ततः सेनां सर्वां मृगसमन्विताम्

aicchetāṃ tau tadā draṣṭuṃ yajñaṃ munikṛtaṃ tadā | sthāpayitvā tataḥ senāṃ sarvāṃ mṛgasamanvitām

अर्थ श्लोक 14 के साथ

अध्याय 289

श्लोक 16

आदाय च महाचापे शरान् कतिचिदेव च ।जनार्दनस्तदा वीरौ हंसो डिम्भक एव च

ādāya ca mahācāpe śarān katicideva ca | janārdanastadā vīrau haṃso ḍimbhaka eva ca

अर्थ श्लोक 14 के साथ

अध्याय 289

श्लोक 17

पदातिनौ महाराज जग्मतुश्चाश्रमं किल ।महर्षेः काश्यपस्याथ सत्रं वैष्णवसंज्ञकम् ।यजतो मुनिभिः सार्धं जपहोमपरायणैः

padātinau mahārāja jagmatuścāśramaṃ kila | maharṣeḥ kāśyapasyātha satraṃ vaiṣṇavasaṃjñakam | yajato munibhiḥ sārdhaṃ japahomaparāyaṇaiḥ

अर्थ श्लोक 14 के साथ

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

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6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
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व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

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