Harivamsha Purana
290
अध्याय 290 / 318

Parva 3, Adhyāya 107

30 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ30 श्लोक

अध्याय 290

श्लोक 1

सेनासहितस्य हंसडिम्भकाभ्यां पुष्करतटे विश्रमणं, महर्षेः कश्यपस्य वैष्णवसत्रस्य दर्शनं, दुर्वासादीनां यतीनां समुदाये गत्वा तेषां प्रति स्वाश्रद्धायाः प्रदर्शनं जनार्दनश्च धर्मात्मा हंसो डिम्भक एव च ।सदः प्रविश्य सत्रस्य नमश्चक्रुर्मुनीश्वरान्

senāsahitasya haṃsaḍimbhakābhyāṃ puṣkarataṭe viśramaṇaṃ, maharṣeḥ kaśyapasya vaiṣṇavasatrasya darśanaṃ, durvāsādīnāṃ yatīnāṃ samudāye gatvā teṣāṃ prati svāśraddhāyāḥ pradarśanaṃ janārdanaśca dharmātmā haṃso ḍimbhaka eva ca | sadaḥ praviśya satrasya namaścakrurmunīśvarān

श्लोक 1–2 का हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! उस समय धर्मात्मा जनार्दन, हंस और डिम्भकने उस यज्ञमण्डपमें प्रवेश करके उन मुनी श्वरोंको प्रणाम किया ॥ श ॥ शिष्यों- सहित उन महात्त्मा मुनियोंने अर्घ्य, पाद्य तथा आसन आदि देकर वहाँ पधारे हुए उन अतिथियोंका यत्पूर्वक सत्कार किया

अध्याय 290

श्लोक 2

तानागतान् महात्मानो मुनयः शिष्यसंयुताः ।अर्घ्यपाद्यासनादीनि चक्रुः पूजां प्रयत्नतः

tānāgatān mahātmāno munayaḥ śiṣyasaṃyutāḥ | arghyapādyāsanādīni cakruḥ pūjāṃ prayatnataḥ

अर्थ श्लोक 1 के साथ

अध्याय 290

श्लोक 3

तौ नृपौ स च विप्रेन्द्रः सपर्यां प्रतिगृह्य च ।प्रीतात्मानो महात्मान आसते ससुखं नृप

tau nṛpau sa ca viprendraḥ saparyāṃ pratigṛhya ca | prītātmāno mahātmāna āsate sasukhaṃ nṛpa

हिन्दी अर्थ

नरे्वर! वे दोनों राजकुमार और वह विप्रवर जनार्दन तीनों महामनस्वी पुरुष वह सत्कार ग्रहण करके मन-ही-मन प्रसन्न होकर वहाँ सुखपूर्वक बैठे

अध्याय 290

श्लोक 4

ततो हंसो बभाषे तान् मुनीन् संयतवाङ्नृप ।पिता हि नौ मुनिश्रेष्ठा यष्टुमैच्छत् ससाधनम्

tato haṃso babhāṣe tān munīn saṃyatavāṅnṛpa | pitā hi nau muniśreṣṭhā yaṣṭumaicchat sasādhanam

हिन्दी अर्थ

राजन्‌! तत्पश्चात्‌ वाणीको संयममें रखनेवाले हंसने उन मुनियोंसे कहा—' मुनिश्रेष्ठाण ! हम दोनोंके पिता साधनसहित राजसूय यज्ञ करनेकी इच्छा रखते हैं

अध्याय 290

श्लोक 5

गन्तव्यं तत्र युष्माभिः सत्रान्ते मुनिसत्तमाः ।राजसूयेन यज्ञेन कृत्वा दिग्विजयं वयम्

gantavyaṃ tatra yuṣmābhiḥ satrānte munisattamāḥ | rājasūyena yajñena kṛtvā digvijayaṃ vayam

श्लोक 5–6 का हिन्दी अर्थ

मुनिवरो! इस सत्रके अन्तमें आपलोगोंको मेरे पिताके उस यज्ञमें पधारना चाहिये । ब्राह्मणो ! हमलोग दिग्विजय करके अपने पिता धर्मात्मा नरेशसे राजसूय यज्ञका अनुष्ठान करायेंगे । उसमें शिष्यों तथा अग्रिहोत्र आदि सामग्रियोंसहित आप सभी श्रेष्ठ ब्राह्मण अवश्य पधारें

अध्याय 290

श्लोक 6

याजपिष्यामहे विप्राः पितरं धार्मिकं नृपम् ।आयान्तु तत्र विप्रेन्द्राः सशिष्याः सपरिच्छदाः

yājapiṣyāmahe viprāḥ pitaraṃ dhārmikaṃ nṛpam | āyāntu tatra viprendrāḥ saśiṣyāḥ saparicchadāḥ

अर्थ श्लोक 5 के साथ

अध्याय 290

श्लोक 7

वयमद्यैव सहितौ दिशो जेष्यामहे वयम् ।शक्ता वयमिहैवैतत् कर्तुं सैनिकसञ्चयैः

vayamadyaiva sahitau diśo jeṣyāmahe vayam | śaktā vayamihaivaitat kartuṃ sainikasañcayaiḥ

श्लोक 7–9 का हिन्दी अर्थ

हम दोनों भाई सदा एक साथ रहनेवाले हैं । हमारे साथ जनार्दनजी भी हैं। हम तीनों आज ही दिग्विजय प्रारम्भ कर देंगे। यों तो अपने सैनिकसमूहोंद्वारा हमलोग ही इस यज्ञका अनुष्ठान कर सकते हैं; क्योंकि हमारे सामने युद्धमें दानव और देवता भी नहीं ठहर सकते। हमने कैलासवासी महादेवजीसे यत्रपूर्वक वर प्राप्त किया है। हम शत्रुसमूहोंके लिये अजेय हैं और हमारे पास नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र हैं।' ऐसा कहकर बलके मदसे उन्मत्त हुआ हंस चुप हो गया

अध्याय 290

श्लोक 8

आवयोः पुरतः स्थातुं न शक्ता देवदानवाः ।कैलासनिलयाद् देवाद् वरं लब्धाः स्म यत्नतः

āvayoḥ purataḥ sthātuṃ na śaktā devadānavāḥ | kailāsanilayād devād varaṃ labdhāḥ sma yatnataḥ

अर्थ श्लोक 7 के साथ

अध्याय 290

श्लोक 9

अजय्यौ शत्रुसङ्घानामस्त्राणि विविधानि च ।इत्युक्त्वा विररामैव हंसो मदबलान्वितः

ajayyau śatrusaṅghānāmastrāṇi vividhāni ca | ityuktvā virarāmaiva haṃso madabalānvitaḥ

अर्थ श्लोक 7 के साथ

अध्याय 290

श्लोक 10

यदि स्यात् तत्र गच्छामो वयं शिष्यैर्नृपोत्तम ।आस्महे वान्यथा राजन्नित्यूचुः किल तापसाः

yadi syāt tatra gacchāmo vayaṃ śiṣyairnṛpottama | āsmahe vānyathā rājannityūcuḥ kila tāpasāḥ

हिन्दी अर्थ

मुनि बोले—नृपश्रेष्ठ! यदि आपका यज्ञ होगा तो हम शिष्योंसहित उसमें अवश्य चलेंगे। राजन्‌ ! अन्यथा (यदि वह यज्ञ नहीं हुआ तो) हम यहीं रहेंगे। ऐसा उन तपस्वी मुनियोंने उत्तर दिया

अध्याय 290

श्लोक 11

ततो देशान् महाराज गन्तुं निश्चितमानसौ ।पुष्करस्योत्तरं तीरं दुर्वासा यत्र तिष्ठति

tato deśān mahārāja gantuṃ niścitamānasau | puṣkarasyottaraṃ tīraṃ durvāsā yatra tiṣṭhati

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—महाराज! तदनन्तर उस स्थानसे जानेका निश्चय करके वे दोनों पुष्करके उत्तर तटपर गये, जहाँ दुर्वासामुनि रहते थे

अध्याय 290

श्लोक 12

यतयो नियता भूत्वा मन्त्रब्रह्मनिषेविणः ।ब्रह्मसूत्रपदे सक्तास्तदर्थालोकतत्पराः

yatayo niyatā bhūtvā mantrabrahmaniṣeviṇaḥ | brahmasūtrapade saktāstadarthālokatatparāḥ

हिन्दी अर्थ

वहाँ यतिंगण शौच-संतोष आदि नियमोंमें तत्पर रहकर मन्त्रमय ब्रह्म (प्रणव )-का जप एवं उसके अर्थका चिन्तन करते थे। ब्रह्मसूत्रके पदोंके स्वाध्यायमें संलग् रहकर उनके अर्थ (ब्रह्म)-के साक्षात्कारके लिये यत्रशील रहते थे

अध्याय 290

श्लोक 13

निर्ममा निरहङ्काराः कौपीनाच्छादनव्रताः ।तमात्मानं जगद्योनिं विष्णुं विश्वेश्वरं विभुम्

nirmamā nirahaṅkārāḥ kaupīnācchādanavratāḥ | tamātmānaṃ jagadyoniṃ viṣṇuṃ viśveśvaraṃ vibhum

श्लोक 13–19 का हिन्दी अर्थ

उनमें ममता और अहंकारका सर्वथा अभाव था। वे नियमपूर्वक कौपीन तथा आच्छादन वस्त्र धारण करते थे। जो सबके आत्मा, जगत्‌की उत्पत्तिके कारण, सर्वव्यापी, सम्पूर्ण विश्वके नियन्ता, विभु, ब्रह्मस्वरूप, शुभ, शान्त, अक्षर (अविनाशी), सब ओर मुखवाले, वेदान्तस्वरूप, अव्यक्त, अनन्त, सनातन, कल्याणमय, नित्ययुक्त, विरूपाक्ष (रुद्ररूप), सम्पूर्ण भूतोंके आधार, अनामय, सर्वतोमुख, दुर्बासाजीके द्वारा सदा उपासनीय, वेदान्तैक- रस तथा गुरुस्वरूप हैं, उन परमात्मदेवका वे यतिगण अपने मनसे सदा ही चिन्तन करते थे। प्रभो ! वे हंस और परमहंससंज्ञक संन्यासी मुनिवर दुर्वासाके शिष्य थे। उन्होंने तर्कयुक्त बुद्धिकि द्वारा परमार्थका निश्चय कर लिया था और ज्ञानके आलोकसे उनका अन्त:करण निर्मल हो गया था। उन दोनों महामनस्वी राजकुमारोंने वहाँ पहुँचकर ऊर्ध्वरता (नैष्टिक ब्रह्मचारी ) परम बुद्धिमान्‌ श्३११ एवं परमपदके अनुसंधानमें लगे हुए दुर्वासामुनिका दर्शन केया । वे दुर्वासामुनि यदि कुपित हो जायँँ तो इन सम्पूर्ण नोकोंको दग्ध करनेमें समर्थ हैं। कुपितावस्थामें देवता भी उनका दर्शन करनेका कभी साहस नहीं कर सकते। त्रे सदा रोषमूर्ति माने गये हैं । उन्हें विश्वरूपधारी रुद्रात्मा त्रताया गया है

अध्याय 290

श्लोक 14

ब्रह्मरूपं शुभं शान्तमक्षरं सर्वतोमुखम् ।वेदान्तमूर्तिमव्यक्तमनन्तं शाश्वतं शिवम्

brahmarūpaṃ śubhaṃ śāntamakṣaraṃ sarvatomukham | vedāntamūrtimavyaktamanantaṃ śāśvataṃ śivam

अर्थ श्लोक 13 के साथ

अध्याय 290

श्लोक 15

नित्ययुक्तं विरूपाक्षं भूताधारमनामयम् ।ध्यायन्तः सर्वदा देवं मनसा सर्वतोमुखम्

nityayuktaṃ virūpākṣaṃ bhūtādhāramanāmayam | dhyāyantaḥ sarvadā devaṃ manasā sarvatomukham

अर्थ श्लोक 13 के साथ

अध्याय 290

श्लोक 16

दुर्वाससा सदोपास्यं वेदान्तैकरसं गुरुम् ।तर्कनिश्चिततत्त्वार्था ज्ञाननिर्मलचेतसः

durvāsasā sadopāsyaṃ vedāntaikarasaṃ gurum | tarkaniścitatattvārthā jñānanirmalacetasaḥ

अर्थ श्लोक 13 के साथ

अध्याय 290

श्लोक 17

हंसाः परमहंसाश्च शिष्या दुर्वाससः प्रभो ।गत्वा तत्र महात्मानौ तौ दृष्ट्वा तूर्ध्वरेतसम्

haṃsāḥ paramahaṃsāśca śiṣyā durvāsasaḥ prabho | gatvā tatra mahātmānau tau dṛṣṭvā tūrdhvaretasam

अर्थ श्लोक 13 के साथ

अध्याय 290

श्लोक 18

दुर्वाससं महाबुद्धिं विचिन्वानं परं पदम् ।क्रुद्धो यदि स दुर्वासा दग्धुं लोकानिमान् क्षमः

durvāsasaṃ mahābuddhiṃ vicinvānaṃ paraṃ padam | kruddho yadi sa durvāsā dagdhuṃ lokānimān kṣamaḥ

अर्थ श्लोक 13 के साथ

अध्याय 290

श्लोक 19

देवा अपि च यं द्रष्टुं क्रुद्धं वै न क्षमाः सदा ।रोषमूर्तिः सदा यस्तु रुद्रात्मा विश्वरूपधृक्

devā api ca yaṃ draṣṭuṃ kruddhaṃ vai na kṣamāḥ sadā | roṣamūrtiḥ sadā yastu rudrātmā viśvarūpadhṛk

अर्थ श्लोक 13 के साथ

अध्याय 290

श्लोक 20

रक्तकौपीनवसनो हंसः परम एव च ।दृष्ट्वैनं च तयोरेवं बुद्धिरासीन्महामते

raktakaupīnavasano haṃsaḥ parama eva ca | dṛṣṭvainaṃ ca tayorevaṃ buddhirāsīnmahāmate

हिन्दी अर्थ

वे गेरुए रंगका कौपीन वस्त्र धारण किये हुए थे और परमहंसस्वरूपमें स्थित थे। पहामते ! उनका दर्शन करके उन दोनों राजकुमारोंके पनमें यह विचार उत्पन्न हुआ—

अध्याय 290

श्लोक 21

को नामासौ महाभूतः काषायी वर्णवित्तमः ।कश्चायमाश्रमो नाम विहाय च गृहाश्रमम्

ko nāmāsau mahābhūtaḥ kāṣāyī varṇavittamaḥ | kaścāyamāśramo nāma vihāya ca gṛhāśramam

हिन्दी अर्थ

यह कौन महाभूत ै, जो काषायवस्त्र पहने हुए है, वर्ण-विभागके विद्वानोंमें प्रह श्रेष्ठ जान पड़ता है (क्योंकि इसमें किसी भी वर्णके चिह्न नहीं हैं !) तथा गृहस्थाश्रमको छोड़कर यह आश्रम भी कौन-सा है ?

अध्याय 290

श्लोक 22

गृहस्थ एव धर्मात्मा गृहस्थो धर्मवित्तमः ।गृहस्थो धर्मरूपस्तु गृहस्थो वर्ण एव च

gṛhastha eva dharmātmā gṛhastho dharmavittamaḥ | gṛhastho dharmarūpastu gṛhastho varṇa eva ca

हिन्दी अर्थ

गृहस्थ ही धर्मात्मा होता है, तहस्थ ही धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ है, गृहस्थ ही धर्मस्वरूप है तथा तहस्थ ही चातुर्वर्ण्यमय है

अध्याय 290

श्लोक 23

गृहस्थश्च सदा माता प्राणिनां जीवनं खदा ।तं विनान्येन रूपेण वर्तते योऽतिमूर्खवत्

gṛhasthaśca sadā mātā prāṇināṃ jīvanaṃ khadā | taṃ vinānyena rūpeṇa vartate yo'timūrkhavat

हिन्दी अर्थ

गृहस्थ सदा सभी प्राणियोंका माताके समान पालन करनेवाला और सर्वदा उनके जीवनकी रक्षा करनेवाला है। उस आश्रमको छोड़कर जो दूसरे रूपसे बर्ताव करता है, वह अत्यन्त मूर्खके समान है

अध्याय 290

श्लोक 24

उन्मत्तोऽयं विरूपोऽयमथवा मूर्ख एव च ।ध्यायन्निव सदा चायमास्ते वञ्चयितापि वा

unmatto'yaṃ virūpo'yamathavā mūrkha eva ca | dhyāyanniva sadā cāyamāste vañcayitāpi vā

हिन्दी अर्थ

यह तो कोई पागल, विचित्र रूपधारी अथवा मूर्ख ही है। यह ध्यान करता हुआ-सा बैठा है; परंतु ठग ही जान पड़ता है

अध्याय 290

श्लोक 25

किमेते प्राकृतज्ञाना ध्यायन्त इति किञ्चन ।वयमेतान् दुरारोहानाश्रमान्तरकल्पकान्

kimete prākṛtajñānā dhyāyanta iti kiñcana | vayametān durārohānāśramāntarakalpakān

श्लोक 25–26 का हिन्दी अर्थ

ये प्राकृत ज्ञानवाले मनुष्य क्यों कुछ ध्यान-सा कर रहे हैं, इनके लिये उन्नतिके पथपर आरूढ़ होना सर्वथा कठिन है। ये दूसरे आश्रमोंकी कल्पना करनेवाले हैं। हम इन समस्त मन्दबुद्धि द्विजोंको, जो मूढ़ ज्ञानमें तत्पर हैं, बलपूर्वक गृहस्थाश्रमके भीतर स्थापित करेंगे

अध्याय 290

श्लोक 26

स्थापयिष्यामहे सर्वान् मन्दबुद्धीनिमान् गृहे ।बलादेव द्विजानेतान् मूढविज्ञानतत्परान्

sthāpayiṣyāmahe sarvān mandabuddhīnimān gṛhe | balādeva dvijānetān mūḍhavijñānatatparān

अर्थ श्लोक 25 के साथ

अध्याय 290

श्लोक 27

असद्ग्राहगृहीताश्च बालिशान् दुर्मतीनिमान् ।एषां शास्ता च को मूढो न विप्रो वयमत्र ह

asadgrāhagṛhītāśca bāliśān durmatīnimān | eṣāṃ śāstā ca ko mūḍho na vipro vayamatra ha

श्लोक 27–30 का हिन्दी अर्थ

क्योंकि ये मूर्ख लोग दुराग्रहसे गृहीत हैं और इनकी बुद्धि खोटी है। इन सबको उपदेश देनेवाला यह कौन मूर्ख बैठा है ? यह ब्राह्मण तो नहीं है! अब हमलोग यहाँ आ गये हैं तो पहले इनके इस गुरुको ही धर्मके मार्गपर स्थापित करके फिर संतोषपूर्वक यहाँसे घरको जायँगे।' नरेधर! ऐसा निश्चय करके ब्राह्मण जनार्दनके साथ वे दोनों वीर राजा मोह अथवा भाग्यक्षयके कारण उन संयतचित्त यतिके पास गये। राजेन्द्र ! नृुपशिरोमणे ! वहाँ जाकर क्रोधमें भरे हुए उन दोनों राजाओंने इन्द्रियातीत दुर्वासा तथा नियमपरायण यतियोंसे इस प्रकार कहा

अध्याय 290

श्लोक 28

धर्म्ये वर्त्मनि संस्थाप्य पुनर्यास्याव निर्वृतौ ।इति सञ्चिन्त्य तौ वीरौ विप्रेण सहितौ नृप

dharmye vartmani saṃsthāpya punaryāsyāva nirvṛtau | iti sañcintya tau vīrau vipreṇa sahitau nṛpa

अर्थ श्लोक 27 के साथ

अध्याय 290

श्लोक 29

जनार्दनेन राजानौ मोहाद् भाग्यक्षयान्नृप ।समीपं तस्य राजेन्द्र यतेः संयतचेतसः

janārdanena rājānau mohād bhāgyakṣayānnṛpa | samīpaṃ tasya rājendra yateḥ saṃyatacetasaḥ

अर्थ श्लोक 27 के साथ

अध्याय 290

श्लोक 30

गत्वा च प्रोचतुरुभौ दुर्वाससमतीन्द्रियम् ।यतींश्च नियतान् क्रुद्धौ राजानौ राजसत्तम

gatvā ca procaturubhau durvāsasamatīndriyam | yatīṃśca niyatān kruddhau rājānau rājasattama

अर्थ श्लोक 27 के साथ

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

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आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

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भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

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शोध टिप्पणीResearch note

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पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.