Harivamsha Purana
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अध्याय 31 / 318

Parva 1, Adhyāya 31

61 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ61 श्लोक

अध्याय 31

श्लोक 1

पूरोः वंशपरम्परावर्णनं पूरुकी वंशपरम्पराका वर्णन पूरोर्वंशमहं ब्रह्मञ्छ्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ।द्रुह्योश्चानोर्यदोश्चैव तुर्वसोश्च पृथक् पृथक्

pūroḥ vaṃśaparamparāvarṇanaṃ pūrukī vaṃśaparamparākā varṇana pūrorvaṃśamahaṃ brahmañchrotumicchāmi tattvataḥ | druhyoścānoryadoścaiva turvasośca pṛthak pṛthak

हिन्दी अर्थ

ोध्याय: आया म्पराका वर्णन जनमेजयने कहा—ब्रह्मन्‌! मैं पूरु, द्रह्मु, अनु, यदु और तुर्वसुके वंशका पृथक्‌-पृथकू यथार्थ वर्णन सुनना चाहता हूँ

अध्याय 31

श्लोक 2

वृष्णिवंशप्रसङ्गेन स्वं वशं पूर्वमेव तु ।विस्तरेणानुपूर्व्या च तद् भवान्वक्तुमर्हति

vṛṣṇivaṃśaprasaṅgena svaṃ vaśaṃ pūrvameva tu | vistareṇānupūrvyā ca tad bhavānvaktumarhati

हिन्दी अर्थ

वृष्णिवंशके प्रसंगसे इन सबका वर्णन मुझे सुनना है; परंतु सबसे पहले मैं अपने ही वंश (पूरुकुल)-का क्रमश: विस्तारपूर्वक वर्णन सुनना चाहता हूँ। अत: आप पहले उसीका वर्णन करें

अध्याय 31

श्लोक 3

शृणु पूरोर्महाराज वंशमुत्तमपौरुषम् ।विस्तरेणानुपूर्व्या च यत्र जातोऽसि पार्थिव

śṛṇu pūrormahārāja vaṃśamuttamapauruṣam | vistareṇānupūrvyā ca yatra jāto'si pārthiva

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी बोले—महाराज! उत्तम पराक्रमसे सम्पन्न पूरुवंशका, जिसमें तुम्हारा जन्म हुआ है, मैं क्रमानुसार विस्तारपूर्वक वर्णन करता हूँ। पृथ्वीनाथ! तुम इसे सुनो

अध्याय 31

श्लोक 4

हन्त ते कीर्तयिष्यामि पूरोर्वंशमनुत्तमम् ।द्रुह्योश्चानोर्यदोश्चैव तुर्वसोश्च नराधिप

hanta te kīrtayiṣyāmi pūrorvaṃśamanuttamam | druhyoścānoryadoścaiva turvasośca narādhipa

हिन्दी अर्थ

नरेध्र! मैं बड़े हर्षके साथ तुमसे परम उत्तम पूरुवंशका वर्णन करूँगा। फिर द्रुह्म, अनु, यदु तथा तुर्बसुके वंशका कीर्तन किया जायगा

अध्याय 31

श्लोक 5

पूरोः पुत्रो महावीर्यो राजाऽऽसीज्जनमेजयः ।प्रचिन्वांस्तु सुतस्तस्य यः प्राचीमजयद् दिशम्

pūroḥ putro mahāvīryo rājā''sījjanamejayaḥ | pracinvāṃstu sutastasya yaḥ prācīmajayad diśam

हिन्दी अर्थ

पूरुके महापराक्रमी पुत्र राजा जनमेजय हुए। उनके पुत्रका नाम प्रचिन्वान्‌ था, जिन्होंने पूर्वदिशाको जीता था

अध्याय 31

श्लोक 6

प्रचिन्वतः प्रवीरोऽभून्मनस्युस्तस्य चात्मजः ।राजा चाभयदो नाम मनस्योरभवत् सुतः

pracinvataḥ pravīro'bhūnmanasyustasya cātmajaḥ | rājā cābhayado nāma manasyorabhavat sutaḥ

हिन्दी अर्थ

प्रचिन्वान्‌के पुत्र प्रवीर और प्रवीरके मनस्यु हुए, मनस्युके पुत्र राजा अभयद थे

अध्याय 31

श्लोक 7

तथैवाभयदस्यासीत् सुधन्वा तु महीपतिः ।सुधन्वनो बहुगवः शम्यातिस्तस्य चात्मजः

tathaivābhayadasyāsīt sudhanvā tu mahīpatiḥ | sudhanvano bahugavaḥ śamyātistasya cātmajaḥ

हिन्दी अर्थ

अभयदके पुत्रका नाम सुधन्वा था, जो इस पृथ्वीका अधिपति हुआ। सुधन्वाके बहुगव और बहुगवके पुत्र शम्याति हुए

अध्याय 31

श्लोक 8

शम्यातेस्तु रहस्याती रौद्राश्वस्तस्य चात्मजः ।रौद्राश्वस्य घृताच्यां वै दशाप्सरसि सूनवः

śamyātestu rahasyātī raudrāśvastasya cātmajaḥ | raudrāśvasya ghṛtācyāṃ vai daśāpsarasi sūnavaḥ

हिन्दी अर्थ

शम्यातिके रहस्याति और रहस्यातिके पुत्र रौद्राध हुए। रौद्राध्रके घृताची अप्सराके गर्भसे दस पुत्र हुए

अध्याय 31

श्लोक 9

ऋचेयुः प्रथमस्तेषां कृकणेयुस्तथैव च ।कक्षेयुः स्थण्डिलेयुश्च सन्नतेयुस्तथैव च

ṛceyuḥ prathamasteṣāṃ kṛkaṇeyustathaiva ca | kakṣeyuḥ sthaṇḍileyuśca sannateyustathaiva ca

श्लोक 9–10 का हिन्दी अर्थ

उनके नाम इस प्रकार हैं—ऋचेयु अपने सभी भाइयोंमें ज्येष्ठ थे। उनके बाद कृकणेयु, कक्षेयु, स्थण्डिलेयु, सन्नतेयु, दशार्णयु, जलेयु, महायशस्वी स्थलेयु, धनेयु और वनेयु थे। इनके सिवा रौद्राध्रके दस कन्याएँ भी थीं, जो पुत्रिका-धर्मके अनुसार ब्याही जानेवाली थीं

अध्याय 31

श्लोक 10

दशार्णेयुर्जलेयुश्च स्थलेयुश्च महायशाः ।धनेयुश्च वनेयुश्च पुत्रिकाश्च दश स्त्रियः

daśārṇeyurjaleyuśca sthaleyuśca mahāyaśāḥ | dhaneyuśca vaneyuśca putrikāśca daśa striyaḥ

अर्थ श्लोक 9 के साथ

अध्याय 31

श्लोक 11

रुद्रा शूद्रा च भद्रा च मलदा मलहा तथा ।खलदा चैव राजेन्द्र नलदा सुरसापि च ।तथा गोचपला तु स्त्रीरत्नकूटा च ता दश

rudrā śūdrā ca bhadrā ca maladā malahā tathā | khaladā caiva rājendra naladā surasāpi ca | tathā gocapalā tu strīratnakūṭā ca tā daśa

हिन्दी अर्थ

राजेन्द्र ! उन कन्याओंके नाम इस प्रकार हैं-रद्रा, शूद्रा, भद्रा, मलदा, मलहा, खलदा, नलदा, सुरसा, गोचपला तथा स्त्रीरत्तकूटा—वे कुल मिलाकर दस थीं

अध्याय 31

श्लोक 12

ऋषिर्जातोऽत्रिवंशे तु तासां भर्ता प्रभाकरः ।रुद्रायां जनयामास सुतं सोमं यशस्विनम्

ṛṣirjāto'trivaṃśe tu tāsāṃ bhartā prabhākaraḥ | rudrāyāṃ janayāmāsa sutaṃ somaṃ yaśasvinam

हिन्दी अर्थ

अत्रिकुलमें उत्पन्न महर्षि प्रभाकर उन सबके पति हुए। उन्होंने रुद्राके गर्भसे यशस्वी सोमको पुत्ररूपमें उत्पन्न किया

अध्याय 31

श्लोक 13

स्वर्भानुना हते सूर्ये पतमाने दिवो महीम् ।तमोऽभिभूते लोके च प्रभा येन प्रवर्तिता

svarbhānunā hate sūrye patamāne divo mahīm | tamo'bhibhūte loke ca prabhā yena pravartitā

हिन्दी अर्थ

राहुसे आहत होकर जब सूर्य आकाशसे पृथ्वीपर गिरने लगे और समस्त संसारमें अन्धकार छा गया, उस समय प्रभाकरने ही अपनी प्रभा फैलायी

English

¹¹⁵ The three Kalas are the present, past and future.

अध्याय 31

श्लोक 14

स्वस्ति तेऽस्त्विति चोक्तो वै पतमानो दिवाकरः ।वचनात् तस्य विप्रर्षेर्न पपात दिवो महीम्

svasti te'stviti cokto vai patamāno divākaraḥ | vacanāt tasya viprarṣerna papāta divo mahīm

हिन्दी अर्थ

महर्षिने गिरते हुए सूर्यको * तुम्हारा कल्याण हो' यह कहकर आशीर्वाद दिया। उन ब्रह्मर्षकि इस वचनसे सूर्यदेव पृथ्वीपर नहीं गिरे

English

¹¹⁶ The three-fold actions are those partaking of the quality of goodness, darkness, and ignorance respectively.

अध्याय 31

श्लोक 15

अत्रिश्रेष्ठानि गोत्राणि यश्चकार महातपाः ।यज्ञेष्वत्रेर्धनं चैव सुरैर्यस्य प्रवर्तितम्

atriśreṣṭhāni gotrāṇi yaścakāra mahātapāḥ | yajñeṣvatrerdhanaṃ caiva surairyasya pravartitam

हिन्दी अर्थ

महातपस्वी प्रभाकरने सब गोत्रोंमें अत्रिगोत्रकी ही श्रेष्ठता स्थापित की। अत्रिके यज्ञोंमें उन्हींके प्रभावसे देवताओंने धन प्रस्तुत किया था

अध्याय 31

श्लोक 16

स तासु जनयामास पुत्रिकासु सनामकान् ।दश पुत्रान् महात्मा स तपस्युग्रे रतान्सदा

sa tāsu janayāmāsa putrikāsu sanāmakān | daśa putrān mahātmā sa tapasyugre ratānsadā

हिन्दी अर्थ

महात्मा प्रभाकरने रौद्राश्रकी पुत्रिका-धर्मके अनुसार प्राप्त हुई कन्याओंके गर्भसे एक- से ही नामवाले दस पुत्रोंको जन्म दिया, जो सदा उग्र तपस्यामें तत्पर रहनेवाले थे

अध्याय 31

श्लोक 17

ते तु गोत्रकरा राजन्नृषयो वेदपारगाः ।स्वस्त्यात्रेया इति ख्याताः किं त्वत्रिधनवर्जिताः

te tu gotrakarā rājannṛṣayo vedapāragāḥ | svastyātreyā iti khyātāḥ kiṃ tvatridhanavarjitāḥ

हिन्दी अर्थ

राजन्‌ ! वे सब-के- सब वेदोंके पारड्त विद्वान्‌ तथा गोत्र-प्रवर्तक ऋषि हुए। स्वस्त्यात्रेय नामसे उनकी ख्याति हुई, परंतु वे अत्रिगोत्री पिताके धनसे वश्धित रहे (क्योंकि पुत्रिका-धर्मके अनुसार वे अपने नानाके पुत्र थे)

अध्याय 31

श्लोक 18

कक्षेयोस्तनयाश्चासंस्त्रय एव महारथाः ।सभानरश्चाक्षुषश्च परमन्युस्तथैव च

kakṣeyostanayāścāsaṃstraya eva mahārathāḥ | sabhānaraścākṣuṣaśca paramanyustathaiva ca

हिन्दी अर्थ

कशक्षेयुके सभानर, चाक्षुष और परमन्यु—ये तीन पुत्र उत्पन्न हुए। तीनों ही महारथी थे

अध्याय 31

श्लोक 19

सभानरस्य पुत्रस्तु विद्वान् कालानलो नृपः ।कालानलस्य धर्मज्ञः सृञ्जयो नाम वै सुतः

sabhānarasya putrastu vidvān kālānalo nṛpaḥ | kālānalasya dharmajñaḥ sṛñjayo nāma vai sutaḥ

हिन्दी अर्थ

सभानरका पुत्र विद्वान्‌ राजा कालानल हुआ। कालानलका धर्मज्ञ पुत्र सूझय नामसे विख्यात हुआ

English

¹²¹ (In anatomy) the blood before it receives the red particles, the

अध्याय 31

श्लोक 20

सृञ्जयस्याभवत् पुत्रो वीरो राजा पुरञ्जयः ।जनमेजयो महाराज पुरञ्जयसुतोऽभवत्

sṛñjayasyābhavat putro vīro rājā purañjayaḥ | janamejayo mahārāja purañjayasuto'bhavat

हिन्दी अर्थ

सृझयके पुत्र वीर राजा पुरज्ञय हुए। महाराज ! पुरज्ञयका पुत्र जनमेजय हुआ

अध्याय 31

श्लोक 21

जनमेजयस्य राजर्षेर्महाशालोऽभवत् सुतः ।देवेषु स परित्रातः प्रतिष्ठितयशा भुवि

janamejayasya rājarṣermahāśālo'bhavat sutaḥ | deveṣu sa paritrātaḥ pratiṣṭhitayaśā bhuvi

हिन्दी अर्थ

राजर्षि जनमेजयके पुत्र महाशाल हुए, जो देवताओंमें भी विख्यात थे और इस पृथ्वीपर भी उनका यश फैला हुआ था

अध्याय 31

श्लोक 22

महामना नाम सुतो महाशालस्य धार्मिकः ।जज्ञे वीरः सुरगणैः पूजितः सुमहायशाः

mahāmanā nāma suto mahāśālasya dhārmikaḥ | jajñe vīraḥ suragaṇaiḥ pūjitaḥ sumahāyaśāḥ

हिन्दी अर्थ

महाशालके धार्मिक पुत्रका नाम महामना था। वे एक वीर पुत्रके रूपमें उत्पन्न हुए थे। महायशस्वी महामनाका देवता भी सम्मान करते थे

अध्याय 31

श्लोक 23

महामनास्तु पुत्रौ द्वौ जनयामास भारत ।उशीनरं च धर्मज्ञं तितिक्षुं च महाबलम्

mahāmanāstu putrau dvau janayāmāsa bhārata | uśīnaraṃ ca dharmajñaṃ titikṣuṃ ca mahābalam

हिन्दी अर्थ

भरतनन्दन ! महामनाने दो पुत्रोंको जन्म दिया—धर्मज्ञ उशीनर और महाबली तितिक्षु

English

O king, in the days of yore in the golden age, the first of the Daityas born, Hiranyakesipu, an enemy of the gods, practised most excellent penances (40). Observing the vow of silence and steadfastly carrying it on he alone, placed in the midst of water, spent eleven thousand and five hundred years (41). O sinless one, thereupon Brahmā was pleased with his self-control, equanimity of mind, asceticism and observance of rules and the vow of celibacy (42). O great king then the lord of all, the divine self-sprung Brahmā, the foremost of all, having the knowledge of Brahman, himself, in his effulgent and sun like car drawn by swans, came to him encircled by all the Adityas, Vasus, Sādhyas, Maruds, gods, Rudras, Viswas, Yakshas, Rakshas, Kinnaras, rivers, oceans, stars, Muhurthas, creatures ranging in the sky, planets, celestial saints, old ascetic Siddhas, the seven Rishis, the great royal saints and Apsaras. He then said to the Daitya:—"O you of firm vows, you are a disciple of mine. I have been pleased with your asceticism. Pray for a boon; may you fare well and acquire your wished-for objects (43–48)."

अध्याय 31

श्लोक 24

उशीनरस्य पत्न्यस्तु पञ्च राजर्षिवंशजाः ।नृगा कृमी नवा दर्वा पञ्चमी च दृषद्वती

uśīnarasya patnyastu pañca rājarṣivaṃśajāḥ | nṛgā kṛmī navā darvā pañcamī ca dṛṣadvatī

हिन्दी अर्थ

उशीनरकी पाँच पत्नियाँ थीं, जो राजर्षियोंके कुलमें उत्पन्न हुई थीं। उनके नाम इस प्रकार हैं—नृगा, कृमी, नवा, दर्वा और पाँचवीं दृषद्वती

English

Hiranyakasipu said;—O grand-father, I pray for this boon, that the gods, Asuras, Gandharvas, Yakshas, Nāgas, Rakshasas, men and goblins may not by any means kill me and that the Rishis, when enraged, may not imprecate a curse on me, and that the weapons, mountains, trees, dry or wet articles or any other things may not bring about my destruction. Let him alone be my destroyer who will be able, with his servants and army, to kill me only with the strokes of his arms. I, myself, shall be the moon, the sun, the air, the fire, air, ether, the stars, the ten quarters, desire, anger, Varuna, Vāsava, Yama, the lord of riches and Yaksha, the king of Kimpurushas (49-54).

अध्याय 31

श्लोक 25

उशीनरस्य पुत्रास्तु पञ्च तासु कुलोद्वहाः ।तपसा वै सुमहता जाता वृद्धस्य भारत

uśīnarasya putrāstu pañca tāsu kulodvahāḥ | tapasā vai sumahatā jātā vṛddhasya bhārata

हिन्दी अर्थ

उनके गर्भसे उशीनरके पाँच पुत्र हुए, जो अपने वंशकी मर्यादाको ऊँचे उठानेवाले थे। भारत! वे अपने वृद्ध पिताके महान्‌ तपसे उत्पन्न हुए थे

अध्याय 31

श्लोक 26

नृगायास्तु नृगः पुत्रः कृम्यां कृमिरजायत ।नवायास्तु नवः पुत्रो दर्वायाः सुव्रतोऽभवत्

nṛgāyāstu nṛgaḥ putraḥ kṛmyāṃ kṛmirajāyata | navāyāstu navaḥ putro darvāyāḥ suvrato'bhavat

हिन्दी अर्थ

श्र नृगाके पुत्र नृूग थे, कृमीके गर्भसे कृमिका जन्म हुआ था, नवाके पुत्र नव तथा दर्वाकि सुब्रत हुए

English

The Gods said—"O lord, by this boon the Asura will oppress us. Be thou propitiated and concert a measure for his destruction" (60). Hearing those words beneficial unto all the lord Prajapati, the omniscient, self-sprung Deity, the invisible and immortal creator of Havy, Kavya and all other creatures said to the gods (61–62). "Forsooth he must attain to the fruits of his asceticism. After he enjoys them the lord Vishnu will kill him." Hearing these words from the lotus-sprung Deity all the gods, filled with delight, repaired to their respective celestial habitations (63–64). As soon as he obtained the boon the Daitya Hiranyakasipu, elated with the pride thereof, began oppressing all the creatures (65). He first of all carried his work of oppression on the great, truthful and self-controlled Munis of firm vows living in the hermitages (66). Having vanquished all the gods of the three worlds and having brought them all under subjection the Daitya Hiranyakasipu lived in the celestial region (67). As long as he, elated with pride, lived in the celestial region the gods could not partake of the sacrificial offerings and the Daityas were entitled thereto (68).

अध्याय 31

श्लोक 27

दृषद्वत्यास्तु सञ्जज्ञे शिबिरौशीनरो नृपः ।शिबेस्तु शिबयस्तात यौधेयास्तु नृगस्य ह

dṛṣadvatyāstu sañjajñe śibirauśīnaro nṛpaḥ | śibestu śibayastāta yaudheyāstu nṛgasya ha

हिन्दी अर्थ

तात ! दृषद्वतीके गर्भसे उशीनरकुमार राजा शिबिका जन्म हुआ। शिबिको शिबिदेशका राज्य मिला और नृगको यौधेय प्रदेशका

अध्याय 31

श्लोक 28

नवस्य नवराष्ट्रं तु कृमेस्तु कृमिला पुरी ।सुव्रतस्य तथाम्बष्ठा शिबिपुत्रान्निबोध मे

navasya navarāṣṭraṃ tu kṛmestu kṛmilā purī | suvratasya tathāmbaṣṭhā śibiputrānnibodha me

हिन्दी अर्थ

नवको नवराष्ट्र तथा कृमिको कृमिलापुरीका राज्य प्राप्त हुआ। सुब्रतके अधिकारमें अम्बष्ट देश आया। अब शिबिके पुत्रोंका वर्णन सुनो

अध्याय 31

श्लोक 29

शिबेश्च पुत्राश्चत्वारो वीरास्त्रैलोक्यविश्रुताः ।वृषदर्भः सुवीरश्च मद्रकः कैकयस्तथा

śibeśca putrāścatvāro vīrāstrailokyaviśrutāḥ | vṛṣadarbhaḥ suvīraśca madrakaḥ kaikayastathā

हिन्दी अर्थ

शिबिके चार वीर पुत्र हुए—वृषदर्भ, सुवीर, मद्रक तथा कैकय । ये चारों राजकुमार तीनों लोकोंमें विख्यात थे

अध्याय 31

श्लोक 30

तेषां जनपदाः स्फीताः केकया मद्रकास्तथा ।वृषदर्भाः सुवीराश्च तितिक्षोस्तु प्रजाः शृणु

teṣāṃ janapadāḥ sphītāḥ kekayā madrakāstathā | vṛṣadarbhāḥ suvīrāśca titikṣostu prajāḥ śṛṇu

हिन्दी अर्थ

इनके समृद्धिशाली जनपद भी इन्हींके नामसे प्रसिद्ध होकर वृषदर्भ, सुवीर, मद्रक तथा केकय कहलाये। अब तितिक्षुकी संततिका वर्णन सुनो

अध्याय 31

श्लोक 31

तैतिक्षवोऽभवद् राजा पूर्वस्यां दिशि भारत ।उषद्रथो महाबाहुस्तस्य फेनः सुतोऽभवत्

taitikṣavo'bhavad rājā pūrvasyāṃ diśi bhārata | uṣadratho mahābāhustasya phenaḥ suto'bhavat

हिन्दी अर्थ

भारत! तितिक्षुके पुत्र महाबाहु राजा उषद्रथ हुए, जो पूर्व दिशाके अधिपति थे। इनके पुत्रका नाम फेन था

English

Vishnu said:—O ye immortals, do ye renounce your fear. I promise you safety. O gods, you will, in no time, acquire as before the celestial region. I will slay this king of Dānavas, elated with pride, who is unslayable even by the immortals (73–74).

अध्याय 31

श्लोक 32

फेनात् तु सुतपा जज्ञे सुतः सुतपसो बलिः ।जातो मानुषयोनौ तु स राजा काञ्चनेषुधिः

phenāt tu sutapā jajñe sutaḥ sutapaso baliḥ | jāto mānuṣayonau tu sa rājā kāñcaneṣudhiḥ

हिन्दी अर्थ

फेनसे सुतपाका जन्म हुआ। सुतपाके पुत्र बलि थे। दानवराज बलि ही मनुष्ययोनिमें जन्म लेकर राजा बलिके नामसे विख्यात हुए। वे सोनेका तरकस रखते थे

अध्याय 31

श्लोक 33

महायोगी स तु बलिर्बभूव नृपतिः पुरा ।पुत्रानुत्पादयामास पञ्च वंशकरान् भुवि

mahāyogī sa tu balirbabhūva nṛpatiḥ purā | putrānutpādayāmāsa pañca vaṃśakarān bhuvi

हिन्दी अर्थ

पूर्वकालमें राजा बलि महान्‌ योगी थे। उन्होंने इस भूतलपर वंशकी वृद्धि करनेवाले पाँच पुत्र उत्पन्न किये

अध्याय 31

श्लोक 34

अङ्गः प्रथमतो जज्ञे वङ्गः सुह्यस्तथैव च ।पुण्ड्रः कलिङ्गश्च तथा बालेयं क्षत्रमुच्यते

aṅgaḥ prathamato jajñe vaṅgaḥ suhyastathaiva ca | puṇḍraḥ kaliṅgaśca tathā bāleyaṃ kṣatramucyate

हिन्दी अर्थ

उनमें सबसे पहले अद्भकी उत्पत्ति हुई। तत्पश्चात्‌ क्रमशः वड्ध, सुह्म, पुण्ड़ तथा कलिड्ध उत्पन्न हुए। ये सब लोग बालेय क्षत्रिय कहलाते हैं

अध्याय 31

श्लोक 35

बालेया ब्राह्मणाश्चैव तस्य वंशकरा भुवि ।बलेस्तु ब्रह्मणा दत्ता वराः प्रीतेन भारत

bāleyā brāhmaṇāścaiva tasya vaṃśakarā bhuvi | balestu brahmaṇā dattā varāḥ prītena bhārata

श्लोक 35–38 का हिन्दी अर्थ

बलिके कुलमें बालेय ब्राह्मण भी हुए, जो इस भूतलपर उनके वंशकी वृद्धि करनेवाले थे। भरतनन्दन ! ब्रह्माजीने बलिपर प्रसन्न होकर उन्हें निम्नाड्डित वर दिये थे-'तुम महायोगी होओगे, तुम्हारी आयु एक कल्पकी होगी, तुम युद्धमें अजेय होओगे, धर्ममें तुम्हारी प्रधानता होगी, तुम तीनों लोकोंकी देखभाल करोगे (अथवा तुम तीनों लोकोंकी सभी बातें प्रत्यक्षकी भाँति देखोगे) । तुम्हारी संतति श्रेष्ठ समझी जायगी, बलमें तुम्हारी समानता करनेवाला कोई न होगा, तुम धर्मतत्त्वके ज्ञाता होओगे तथा भूतलपर चारों वर्णोको नियन्त्रणमें रखकर उन्हें मर्यादाके भीतर स्थापित करोगे।' भगवान्‌ ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर राजा बलिको बड़ी शान्ति मिली

अध्याय 31

श्लोक 36

महायोगित्वमायुश्च कल्पस्य परिमाणतः ।सङ्ग्रामे वाप्यजेयत्वं धर्मे चैव प्रधानता

mahāyogitvamāyuśca kalpasya parimāṇataḥ | saṅgrāme vāpyajeyatvaṃ dharme caiva pradhānatā

अर्थ श्लोक 35 के साथ

अध्याय 31

श्लोक 37

त्रैलोक्यदर्शनं चैव प्राधान्यं प्रसवे तथा ।बले चाप्रतिमत्वं वै धर्मतत्त्वार्थदर्शनम्

trailokyadarśanaṃ caiva prādhānyaṃ prasave tathā | bale cāpratimatvaṃ vai dharmatattvārthadarśanam

अर्थ श्लोक 35 के साथ

अध्याय 31

श्लोक 38

चतुरो नियतान् वर्णोस्त्वं च स्थापयिता भुवि ।इत्युक्तो विभुना राजा बलिः शान्तिं परा ययौ

caturo niyatān varṇostvaṃ ca sthāpayitā bhuvi | ityukto vibhunā rājā baliḥ śāntiṃ parā yayau

अर्थ श्लोक 35 के साथ

अध्याय 31

श्लोक 39

तस्य ते तनयाः सर्वे क्षेत्रजा मुनिपुङ्गवात् ।सम्भूता दीर्घतपसो सुदेष्णायां महौजसः

tasya te tanayāḥ sarve kṣetrajā munipuṅgavāt | sambhūtā dīrghatapaso sudeṣṇāyāṃ mahaujasaḥ

हिन्दी अर्थ

उनके वे सभी पुत्र क्षेत्रज थे। मुनिवर दीर्घतपाद्वारा रानी सुदेष्णाके गर्भसे प्रकट हुए थे। उनका बल महान्‌ था

अध्याय 31

श्लोक 40

बलिस्तानभिषिच्येह पञ्च पुत्रानकल्मषान् ।कृतार्थः सोऽपि योगात्मा योगमाश्रित्य स प्रभुः

balistānabhiṣicyeha pañca putrānakalmaṣān | kṛtārthaḥ so'pi yogātmā yogamāśritya sa prabhuḥ

श्लोक 40–41 का हिन्दी अर्थ

राजा बलिने उन पाँचों निष्पाप पुत्रोंको विभिन्न राज्योंपर अभिषिक्त करके अपनेको कृतार्थ माना । उनका मन सदा योगमें लगा रहता था। वे योगका आश्रय ले समस्त प्राणियोंके लिये अजेय हो गये थे। कालकी प्रतीक्षा करते हुए सर्वत्र विचरते थे । राजन्‌ ! दीर्घकालके पश्चात्‌ उन्हें अपना स्थान (सुतललोक) उपलब्ध हुआ

अध्याय 31

श्लोक 41

अधृष्यः सर्वभूतानां कालापेक्षी चरन्नपि ।कालेन महता राजन् स्वं च स्थानमुपागमत्

adhṛṣyaḥ sarvabhūtānāṃ kālāpekṣī carannapi | kālena mahatā rājan svaṃ ca sthānamupāgamat

अर्थ श्लोक 40 के साथ

अध्याय 31

श्लोक 42

तेषां जनपदाः पञ्च अङ्गा वङ्गाः ससुह्यकाः ।कलिङ्गाः पुण्ड्रकाश्चैव प्रजास्त्वङ्गस्य मे शृणु

teṣāṃ janapadāḥ pañca aṅgā vaṅgāḥ sasuhyakāḥ | kaliṅgāḥ puṇḍrakāścaiva prajāstvaṅgasya me śṛṇu

हिन्दी अर्थ

उनके पाँच पुत्रोंक अधिकारमें जो जनपद थे, उनके नाम इस प्रकार हैं—अद्भ, वड्ध, सुह्य, कलिड् और पुण्ड्रक । अब तुम मुझसे अज्ञकी संतानोंका वर्णन सुनो

अध्याय 31

श्लोक 43

अङ्गपुत्रो महानासीद् राजेन्द्रो दधिवाहनः ।दधिवाहनपुत्रस्तु राजा दिविरथोऽभवत्

aṅgaputro mahānāsīd rājendro dadhivāhanaḥ | dadhivāhanaputrastu rājā diviratho'bhavat

हिन्दी अर्थ

अआज्ञके पुत्र महानू राजाधिराज दधिवाहन थे और दथिवाहनके पुत्र राजा दिविरथ हुए॥ '

अध्याय 31

श्लोक 44

पुत्रो दिविरथस्यासीच्छक्रतुल्यपराक्रमः ।विद्वान् धर्मरथो नाम तस्य चित्ररथः सुतः

putro divirathasyāsīcchakratulyaparākramaḥ | vidvān dharmaratho nāma tasya citrarathaḥ sutaḥ

हिन्दी अर्थ

दिविरथके पुत्र इन्द्रतुल्य पराक्रमी और विद्वान्‌ थे। उनका नाम धर्मरथ था। धर्मरथके पुत्र चित्ररथ हुए

English

¹²³ A food for gods.

अध्याय 31

श्लोक 45

तेन चित्ररथेनाथ तदा विष्णुपदे गिरौ ।यजता सह शक्रेण सोमः पीतो महात्मना

tena citrarathenātha tadā viṣṇupade girau | yajatā saha śakreṇa somaḥ pīto mahātmanā

हिन्दी अर्थ

राजा चित्ररथ जब विष्णुपद पर्वतपर यज्ञ करते थे, उस समय उन महामना नरेशने इन्द्रके साथ बैठकर सोमपान किया था

English

¹²⁶ A winnowing basket.

अध्याय 31

श्लोक 46

अथ चित्ररथस्यापि पुत्रो दशरथोऽभवत् ।लोमपाद इति ख्यातो यस्य शान्ता सुताभवत्

atha citrarathasyāpi putro daśaratho'bhavat | lomapāda iti khyāto yasya śāntā sutābhavat

हिन्दी अर्थ

चित्ररथके पुत्र दशरथ हुए, जिनका दूसरा नाम लोमपाद था तथा शान्ता जिनकी पुत्री थी

English

¹²⁷ A wooden pestle used for cleaning rice.

अध्याय 31

श्लोक 47

तस्य दाशरथिर्वीरश्चतुरङ्गो महायशाः ।ऋष्यशृङ्गप्रसादेन जज्ञे कुलविवर्धनः

tasya dāśarathirvīraścaturaṅgo mahāyaśāḥ | ṛṣyaśṛṅgaprasādena jajñe kulavivardhanaḥ

हिन्दी अर्थ

उन लोमपाद या दशरथके पुत्र महायशस्वी वीर चतुरज़ हुए जो ऋष्यशरुद्ध मुनिकी कृपासे उत्पन्न हुए थे। चतुरड्ध अपने कुलकी वृद्धि करनेवाले थे

English

¹²⁸ Offering of oblation.

अध्याय 31

श्लोक 48

चतुरङ्गस्य पुत्रस्तु पृथुलाक्ष इति स्मृतः ।पृथुलाक्षसुतो राजा चम्पो नाम महायशाः

caturaṅgasya putrastu pṛthulākṣa iti smṛtaḥ | pṛthulākṣasuto rājā campo nāma mahāyaśāḥ

हिन्दी अर्थ

चतुरज़के पुत्र पृथुलाक्ष कहे गये हैं। पृथुलाक्षके पुत्र महायशस्वी राजा चम्प हुए

English

¹²⁹ Members of a sacrifice.

अध्याय 31

श्लोक 49

चम्पस्य तु पुरी चम्पा या मालिन्यभवत्पुरा ।पूर्णभद्रप्रसादेन हर्यङ्गोऽस्य सुतोऽभवत्

campasya tu purī campā yā mālinyabhavatpurā | pūrṇabhadraprasādena haryaṅgo'sya suto'bhavat

हिन्दी अर्थ

चम्पकी राजधानी चम्पा थी, जो पहले मालिनीके नामसे प्रसिद्ध थी। चम्पके पुत्र हर्यज् हुए, जो पूर्णभद्र नामक मुनिकी कृपासे उत्पन्न हुए थे

अध्याय 31

श्लोक 50

ततो वैभाण्डकिस्तस्य वारणं शक्रवारणम् ।अवतारयामास महीं मन्त्रैर्वाहनमुत्तमम्

tato vaibhāṇḍakistasya vāraṇaṃ śakravāraṇam | avatārayāmāsa mahīṃ mantrairvāhanamuttamam

हिन्दी अर्थ

विभाण्डकपुत्र ऋष्यश्रद्धने हर्यज़्की सवारीके लिये इन्द्रके उत्तम वाहन गजराज ऐरावतको मन्त्रोंद्वारा स्वर्गसे भूतलपर उतारा था

अध्याय 31

श्लोक 51

हर्यङ्गस्य तु दायादो राजा भद्ररथः स्मृतः ।पुत्रो भद्ररथस्यासीद् बृहत्कर्मा प्रजेश्वरः

haryaṅgasya tu dāyādo rājā bhadrarathaḥ smṛtaḥ | putro bhadrarathasyāsīd bṛhatkarmā prajeśvaraḥ

हिन्दी अर्थ

हर्यज्के पुत्र राजा भद्ररथ कहे गये हैं। भद्ररथके पुत्र राजा बृहत्कर्मा थे

अध्याय 31

श्लोक 52

बृहद्दर्भः सुतस्तस्य तस्माज्जज्ञे बृहन्मना ।बृहन्मनास्तु राजेन्द्र जनयामास वै सुतम्

bṛhaddarbhaḥ sutastasya tasmājjajñe bṛhanmanā | bṛhanmanāstu rājendra janayāmāsa vai sutam

श्लोक 52–53 का हिन्दी अर्थ

बृहत्कर्माके पुत्र बृह्दर्भ थे, उनसे बृहन्मनाका जन्म हुआ। राजेन्द्र ! बृहन्मनाने जयद्रथ नामक पुत्रको जन्म दिया, जिससे राजा दृढरथकी उत्पत्ति हुई। जनमेजय ! दृढरथके पुत्र विश्वजित्‌ हुए

अध्याय 31

श्लोक 53

नाम्ना जयद्रथं नाम यस्माद् दृढरथो नृपः ।आसीद् दृढरथस्यापि विश्वजिज्जनमेजय

nāmnā jayadrathaṃ nāma yasmād dṛḍharatho nṛpaḥ | āsīd dṛḍharathasyāpi viśvajijjanamejaya

अर्थ श्लोक 52 के साथ

English

¹³¹ A ladle or spoon.

अध्याय 31

श्लोक 54

दायादस्तस्य कर्णस्तु विकर्णस्तस्य चात्मजः ।तस्य पुत्रशतं त्वासीदङ्गानां कुलवर्धनम्

dāyādastasya karṇastu vikarṇastasya cātmajaḥ | tasya putraśataṃ tvāsīdaṅgānāṃ kulavardhanam

हिन्दी अर्थ

विश्वजित्‌के पुत्र कर्ण तथा कर्णके पुत्र विकर्ण हुए। विकर्णके सौ पुत्र थे, जो अज़वंशकी वृद्धि करनेवाले थे

अध्याय 31

श्लोक 55

बृहद्दर्भसुतो यस्तु राज्ञा नाम्ना बृहन्मनाः ।तस्य पत्नीद्वयं चासीच्चैद्यस्यैते सुते शुभे ।यशोदेवी च सत्या च ताभ्यां वंशस्तु भिद्यते

bṛhaddarbhasuto yastu rājñā nāmnā bṛhanmanāḥ | tasya patnīdvayaṃ cāsīccaidyasyaite sute śubhe | yaśodevī ca satyā ca tābhyāṃ vaṃśastu bhidyate

हिन्दी अर्थ

बृह्दर्भका जो बृहन्मना नामसे प्रसिद्ध पुत्र था, उसकी दो पत्नियाँ थीं। ये दोनों ही चेदिराजकी सुन्दरी कन्याएँ थीं। एकका नाम यशोदेवी था और दूसरीका सत्या। उन दोनोंके द्वारा उस वंशमें भेद हो गया अर्थात्‌ दोनोंकी पृथक्‌-पृथक्‌ वंश-परम्परा चली

अध्याय 31

श्लोक 56

जयद्रथस्तु राजेन्द्र यशोदेव्यां व्यजायत ।ब्रह्मक्षत्रोत्तरः सत्यां विजयो नाम विश्रुतः

jayadrathastu rājendra yaśodevyāṃ vyajāyata | brahmakṣatrottaraḥ satyāṃ vijayo nāma viśrutaḥ

हिन्दी अर्थ

श्५९ राजेन्द्र! बृहन्मनाका जो जयद्रथ नामक पुत्र था, वह यशोदेवीके गर्भसे उत्पन्न हुआ था तथा उनका दूसरा पुत्र, जो विजय नामसे विख्यात था, सत्याके पेटसे पैदा हुआ था। वह शान्ति आदि गुणोंमें ब्राह्मणोंसे और शौर्य आदि गु्णोंमें क्षत्रियोंसे भी उत्कृष्ट था

English

¹³² The room opposite to that which contains the materials for an oblation and in which the family and friends of the sacrificer

अध्याय 31

श्लोक 57

विजयस्य धृतिः पुत्रस्तस्य पुत्रो धृतव्रतः ।धृतव्रतस्य पुत्रस्तु सत्यकर्मा महायशाः

vijayasya dhṛtiḥ putrastasya putro dhṛtavrataḥ | dhṛtavratasya putrastu satyakarmā mahāyaśāḥ

हिन्दी अर्थ

विजयका पुत्र धृति और धृतिका पुत्र धृतब्रत था। धृतब्रतके पुत्र महायशस्वी सत्यकर्मा हुए

अध्याय 31

श्लोक 58

सत्यकर्मसुतश्चापि सूतस्त्वधिरथस्तु वै ।यः कर्णं प्रतिजग्राह ततः कर्णस्तु सूतजः

satyakarmasutaścāpi sūtastvadhirathastu vai | yaḥ karṇaṃ pratijagrāha tataḥ karṇastu sūtajaḥ

हिन्दी अर्थ

सत्यकर्माका पुत्र अधिरथ नामक सूत हुआ, जिसने कर्णको गोद लिया था। इसीलिये कर्णको सूतपुत्र कहा जाता है

अध्याय 31

श्लोक 59

एतत् ते कथितं सर्वं कर्णं प्रति महाबलम् ।कर्णस्य वृषसेनस्तु वृषस्तस्यात्मजः स्मृतः

etat te kathitaṃ sarvaṃ karṇaṃ prati mahābalam | karṇasya vṛṣasenastu vṛṣastasyātmajaḥ smṛtaḥ

हिन्दी अर्थ

राजन्‌! यह सब मैंने तुम्हें महाबली कर्णके विषयमें बताया है । कर्णका पुत्र वृषसेन हुआ और वृषसेनका पुत्र वृष कहा गया है

अध्याय 31

श्लोक 60

एतेऽङ्गवंशजाः सर्वे राजानः कीर्तिता मया ।सत्यव्रता महात्मानः प्रज्ञावन्तो महारथाः

ete'ṅgavaṃśajāḥ sarve rājānaḥ kīrtitā mayā | satyavratā mahātmānaḥ prajñāvanto mahārathāḥ

हिन्दी अर्थ

ये सब अज्भवंशी राजा मेरे द्वारा बताये गये हैं, जो सत्यब्रती, महात्मा, पुत्रवान्‌ तथा महारथी थे

अध्याय 31

श्लोक 61

ऋचेयोस्तु महाराज रौद्राश्वतनयस्य ह ।शृणु वंशमनुप्रोक्तं यत्र जातोऽसि पार्थिव

ṛceyostu mahārāja raudrāśvatanayasya ha | śṛṇu vaṃśamanuproktaṃ yatra jāto'si pārthiva

हिन्दी अर्थ

महाराज! पृथ्वीनाथ! अब मैं रौद्राधकुमार ऋचेयुके वंशका वर्णन करूँगा, जिसमें तुम्हारा जन्म हुआ है। तुम इसे सुनो

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.