Harivamsha Purana
30
अध्याय 30 / 318

Parva 1, Adhyāya 30

49 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ49 श्लोक

अध्याय 30

श्लोक 1

नहुष एवं ययातेः वंशस्य वर्णनम्, ययातेः चरित्रं नहुष एवं ययाति के वंश का वर्णन तथा ययाति का चरित्र उत्पन्नाः पितृकन्यायां विरजायां महौजसः ।नहुषस्य तु दायादाः षडिन्द्रोपमतेजसः

nahuṣa evaṃ yayāteḥ vaṃśasya varṇanam, yayāteḥ caritraṃ nahuṣa evaṃ yayāti ke vaṃśa kā varṇana tathā yayāti kā caritra utpannāḥ pitṛkanyāyāṃ virajāyāṃ mahaujasaḥ | nahuṣasya tu dāyādāḥ ṣaḍindropamatejasaḥ

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्‌ ! नहुषके उनकी पत्नी पितृकन्या विरजाके गर्भसे छः महाबली पुत्र उत्पन्न हुए, जो इन्द्रके समान तेजस्वी थे

अध्याय 30

श्लोक 2

यतिर्ययातिः संयातिरायातिः पाञ्चिको भवः ।सुयातिः षष्ठस्तेषां वै ययातिः पार्थिवोऽभवत् ।यतिर्ज्येष्ठस्तु तेषां वै ययातिस्तु ततः परम्

yatiryayātiḥ saṃyātirāyātiḥ pāñciko bhavaḥ | suyātiḥ ṣaṣṭhasteṣāṃ vai yayātiḥ pārthivo'bhavat | yatirjyeṣṭhastu teṣāṃ vai yayātistu tataḥ param

हिन्दी अर्थ

उनके नाम इस प्रकार हैं—यति, ययाति, संयाति, आयाति, पाँचवाँ भव और छठा सुयाति । इनमेंसे ययाति ही राजा हुए। इन छः भाइयोंमें सबसे बड़े थे यति और उनके बाद ययाति उत्पन्न हुए थे

अध्याय 30

श्लोक 3

ककुत्स्थकन्यां गां नाम लेभे परमधार्मिकः ।यतिस्तु मोक्षमास्थाय ब्रह्मभूतोऽभवन्मुनिः

kakutsthakanyāṃ gāṃ nāma lebhe paramadhārmikaḥ | yatistu mokṣamāsthāya brahmabhūto'bhavanmuniḥ

हिन्दी अर्थ

परम धर्मात्मा यतिने ककुत्स्थकी कन्या गौको पत्नीरूपमें प्राप्त किया था। वे मोक्षधर्मका आश्रय ले ब्रह्मस्वरूप मुनि हो गये

अध्याय 30

श्लोक 4

तेषां ययातिः पञ्चानां विजित्य वसुधामिमाम् ।देवयानीमुशनसः सुतां भार्यामवाप सः ।शर्मिष्ठामासुरीं चैव तनयां वृषपर्वणः

teṣāṃ yayātiḥ pañcānāṃ vijitya vasudhāmimām | devayānīmuśanasaḥ sutāṃ bhāryāmavāpa saḥ | śarmiṣṭhāmāsurīṃ caiva tanayāṃ vṛṣaparvaṇaḥ

हिन्दी अर्थ

शेष पाँच भाइयोंमें ययातिने इस पृथ्वीको जीतकर शुक्राचार्यकी पुत्री देवयानी तथा असुरराज वृषपर्वाकी कन्या शर्मिष्ठाको भी पत्नीके रूपमें प्राप्त किया

अध्याय 30

श्लोक 5

यदुं च तुर्वसुं चैव देवयानी व्यजायत ।द्रुह्युं चानुं च पूरुं च शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी

yaduṃ ca turvasuṃ caiva devayānī vyajāyata | druhyuṃ cānuṃ ca pūruṃ ca śarmiṣṭhā vārṣaparvaṇī

हिन्दी अर्थ

देवयानीने यदु और तुर्बसुको जन्म दिया तथा वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठाने द्रद्मु, अनु तथा पूरु—ये तीन पुत्र उत्पन्न किये

English

⁹⁷ Hymns recited at the time of the celebration of a religious

अध्याय 30

श्लोक 6

तस्मै शक्रो ददौ प्रीतो रथं परमभास्वरम् ।असङ्गं काञ्चनं दिव्यं दिव्यैः परमवाजिभिः

tasmai śakro dadau prīto rathaṃ paramabhāsvaram | asaṅgaṃ kāñcanaṃ divyaṃ divyaiḥ paramavājibhiḥ

श्लोक 6–7 का हिन्दी अर्थ

ययातिपर प्रसन्न होकर इन्द्रने उन्हें एक अत्यन्त प्रकाशमान रथ प्रदान किया, जिसमें मनके समान वेगशाली, दिव्य, उत्तम एवं श्वेतवर्णके अश्व जुते हुए थे। वह दिव्य रथ सोनेका बना हुआ था। उसकी गति कहीं भी अवरुद्ध नहीं होती थी। उसी रथके द्वारा वे अपनी भार्याको ब्याहकर लाये थे। उस श्रेष्ठ रथके द्वारा दुर्घष राजा ययातिने छः रातोंमें ही सम्पूर्ण पृथ्वी तथा देवताओं और दानवोंको भी जीत लिया था

English

⁹⁸ A sacrificial post or pillar usually made of bamboos or the wood of the Khadira to which the victim at a sacrifice is bound.

अध्याय 30

श्लोक 7

युक्तं मनोजवैः शुभ्रैर्येन भार्यामुवाह सः ।स तेन रथमुख्येन षड्रात्रेनाजयन्महीम् ।ययातिर्युधि दुर्धर्षस्तथा देवान् सदानवान्

yuktaṃ manojavaiḥ śubhrairyena bhāryāmuvāha saḥ | sa tena rathamukhyena ṣaḍrātrenājayanmahīm | yayātiryudhi durdharṣastathā devān sadānavān

अर्थ श्लोक 6 के साथ

अध्याय 30

श्लोक 8

स रथः पौरवाणां तु सर्वेषामभवत् तदा ।यावत्तु वसुनाम्नो वै कौरवाज्जनमेजय

sa rathaḥ pauravāṇāṃ tu sarveṣāmabhavat tadā | yāvattu vasunāmno vai kauravājjanamejaya

हिन्दी अर्थ

जनमेजय! कुरुवंशी राजा वसुतक सभी पौरव नरेशोंके पास वह रथ परम्परया प्राप्त होकर विद्यमान था

अध्याय 30

श्लोक 9

कुरोः पुत्रस्य राजेन्द्र राज्ञः पारीक्षितस्य ह ।जगाम स रथो नाशं शापाद् गार्ग्यस्य धीमतः

kuroḥ putrasya rājendra rājñaḥ pārīkṣitasya ha | jagāma sa ratho nāśaṃ śāpād gārgyasya dhīmataḥ

हिन्दी अर्थ

राजेन्द्र! कुरुवंशी परीक्षित्‌-कुमार इन्द्रोत जनमेजयको बुद्धिमान गार्ग्यका शाप प्राप्त होनेके कारण वह रथ उनके यहाँसे अदृश्य हो गया

अध्याय 30

श्लोक 10

गार्ग्यस्य हि सुतं बालं स राजा जनमेजयः ।वाक्छूरं हिंसयामास ब्रह्महत्यामवाप सः

gārgyasya hi sutaṃ bālaṃ sa rājā janamejayaḥ | vākchūraṃ hiṃsayāmāsa brahmahatyāmavāpa saḥ

हिन्दी अर्थ

बात | यह थी कि गार्ग्यके एक बालक पुत्र था, जो बड़ा ही वाचाल था। उसे इन्द्रोत नामवाले राजा जनमेजयने मार डाला। इससे उन्हें ब्रह्महत्या प्राप्त हुई

अध्याय 30

श्लोक 11

स लोहगन्धी राजर्षिः परिधावन्नितस्ततः ।पौरजानपदैस्त्यक्तो न लेभे शर्म कर्हिचित्

sa lohagandhī rājarṣiḥ paridhāvannitastataḥ | paurajānapadaistyakto na lebhe śarma karhicit

हिन्दी अर्थ

पुरवासियों तथा जनपदके लोगोंने उन्हें त्याग दिया। उनके शरीरसे लोहेकी-सी गन्ध आती थी। (अथवा वे पतितके समान जान पड़ते थे।) राजर्षि इन्द्रोत इधर-उधर भागते-फिरते थे, किंतु कहीं भी उन्हें शान्ति नहीं मिलती थी

English

¹⁰³ Those who perform sacrifices.

अध्याय 30

श्लोक 12

ततः स दुःखसन्तप्तो नालभत्संविदं क्वचित् ।इन्द्रोतः शौनकं राजा शरणं प्रत्यपद्यत

tataḥ sa duḥkhasantapto nālabhatsaṃvidaṃ kvacit | indrotaḥ śaunakaṃ rājā śaraṇaṃ pratyapadyata

हिन्दी अर्थ

जब कहीं भी स्वस्थ होनेका उपाय नहीं सूझा, तब दुःखसे संतप्त हुए राजा इन्द्रोत शौनक मुनिकी शरणमें गये

अध्याय 30

श्लोक 13

याजयामास चेन्द्रोतं शौनको जनमेजयम् ।अश्वमेधेन राजानं पावनार्थं द्विजोत्तमः

yājayāmāsa cendrotaṃ śaunako janamejayam | aśvamedhena rājānaṃ pāvanārthaṃ dvijottamaḥ

हिन्दी अर्थ

द्विजश्रेष्ठ शौनकने राजा इन्द्रोत जनमेजयको शुद्ध करनेके लिये उनसे अश्वमेथ यज्ञका अनुष्ठान करवाया

अध्याय 30

श्लोक 14

स लोहगन्धो व्यनशत् तस्यावभृथमेत्य ह ।स च दिव्यो रथो राजन् वसोश्चेदिपतेस्तदा ।दत्तः शक्रेण तुष्टेन लेभे तस्माद् बृहद्रथः

sa lohagandho vyanaśat tasyāvabhṛthametya ha | sa ca divyo ratho rājan vasoścedipatestadā | dattaḥ śakreṇa tuṣṭena lebhe tasmād bṛhadrathaḥ

हिन्दी अर्थ

उस यज्ञके अन्तमें अवभूथ स्तान कर लेनेपर इन्द्रोतका पाप दूर हो गया और उनके शरीरसे जो लोहेकी-सी गन्ध आती थी, वह मिट गयी । राजन्‌! तत्पश्चात्‌ इन्द्रने संतुष्ट होकर वह दिव्य रथ चेदिराज उपरिचर वसुको दे दिया । फिर वसुसे वह रथ मगधराज बृहद्रथको मिला

English

¹⁰⁵ A measure of time equal to thirty Kalas or four minutes.

अध्याय 30

श्लोक 15

बृहद्रथात्क्रमेणैव गतो बार्हद्रथं नृपम् ।ततो हत्वा जरासन्धं भीमस्तं रथमुत्तमम्

bṛhadrathātkrameṇaiva gato bārhadrathaṃ nṛpam | tato hatvā jarāsandhaṃ bhīmastaṃ rathamuttamam

श्लोक 15–18 का हिन्दी अर्थ

बृहद्रथसे क्रमश: वह रथ उनके पुत्र राजा जरासंधको प्रात हुआ। तत्पश्चात्‌ू कौरव- कुलको आनन्दित करनेवाले भीमसेनने जरासंधको मारकर वह उत्तम रथ प्रसन्नतापूर्वक भगवान्‌ श्रीकृष्णको दे दिया। राजन्‌ ! नहुषनन्दन राजा ययातिने समुद्र और सातों द्वीपोंसहित सारी पृथ्वीको जीतकर उसके पाँच भाग किये और उन्हें अपने पाँचों पुत्रोंगें बाँट दिया। उन बुद्धिमान्‌ नरेशने दक्षिण-पूर्व दिशा तुर्वसुको, पश्चिममें द्ुह्मुको और उत्तर दिशामें अनुको अभिषिक्त करके पूर्वोत्तर दिशाके (ईशानकोण) राज्यपर ज्येष्ठ पुत्र यदुको नियुक्त कर दिया

अध्याय 30

श्लोक 16

प्रददौ वासुदेवाय प्रीत्या कौरवनन्दनः ।सप्तद्वीपां ययातिस्तु जित्वा पृध्वी ससागराम्

pradadau vāsudevāya prītyā kauravanandanaḥ | saptadvīpāṃ yayātistu jitvā pṛdhvī sasāgarām

अर्थ श्लोक 15 के साथ

अध्याय 30

श्लोक 17

व्यभजत् पञ्चधा राजन् पुत्राणां नाहुषस्तदा ।दिशि दक्षिणपूर्वस्यां तुर्वसुं मतिमान् नृपः

vyabhajat pañcadhā rājan putrāṇāṃ nāhuṣastadā | diśi dakṣiṇapūrvasyāṃ turvasuṃ matimān nṛpaḥ

अर्थ श्लोक 15 के साथ

अध्याय 30

श्लोक 18

प्रतीच्यामुत्तरस्यां च द्रुह्युं चानुं च नाहुषः ।दिशि पूर्वोत्तरस्यां वै यदुं ज्येष्ठं न्ययोजयत्

pratīcyāmuttarasyāṃ ca druhyuṃ cānuṃ ca nāhuṣaḥ | diśi pūrvottarasyāṃ vai yaduṃ jyeṣṭhaṃ nyayojayat

अर्थ श्लोक 15 के साथ

अध्याय 30

श्लोक 19

मध्ये पूरुं च राजानमभ्यषिञ्चत नाहुषः ।तैरियं पृथिवी सर्वा सप्तद्वीपा सपत्तना

madhye pūruṃ ca rājānamabhyaṣiñcata nāhuṣaḥ | tairiyaṃ pṛthivī sarvā saptadvīpā sapattanā

श्लोक 19–20 का हिन्दी अर्थ

इसके बाद नहुषनन्दन ययातिने मध्यदेशके राज्य-सिंहासनपर पूरुका अभिषेक किया। नृपश्रेष्ठ ! वे तथा उनके वंशज आज भी सातों द्वीपों और नगरोंसहित इस सारी पृथ्वीका अपने-अपने प्रदेशके अनुसार धर्मपूर्वक पालन करते हैं। अब आगे मैं उनकी संतानोंका वर्णन करूँगा

अध्याय 30

श्लोक 20

यथाप्रदेशमद्यापि धर्मेण प्रतिपाल्यते ।प्रणास्तेषां पुरस्तात्तु वक्ष्यामि नृपसत्तम

yathāpradeśamadyāpi dharmeṇa pratipālyate | praṇāsteṣāṃ purastāttu vakṣyāmi nṛpasattama

अर्थ श्लोक 19 के साथ

अध्याय 30

श्लोक 21

धनुर्न्यस्य पृषत्कांश्च पञ्चभिः पुरुषर्षभैः ।जरावानभवद् राजा भारमावेश्य बन्धुषु

dhanurnyasya pṛṣatkāṃśca pañcabhiḥ puruṣarṣabhaiḥ | jarāvānabhavad rājā bhāramāveśya bandhuṣu

हिन्दी अर्थ

पाँच पुरुषप्रवर पुत्रोंसे कृतकृत्य हो राजा ययातिने राज्यका भार अपने उन बन्धु-बान्धवॉंपर रखकर धनुष और बाणोंका भी त्याग कर दिया। तत्पश्चात्‌ उन्हें जरावस्थाने काबूमें कर लिया

अध्याय 30

श्लोक 22

निःक्षिप्तशस्त्रः पृथिवीं निरीक्ष्य पृथिवीपतिः ।प्रीतिमानभवद् राजा ययातिरपराजितः ।एवं विभज्य पृथिवीं ययातिर्यदुमब्रवीत्

niḥkṣiptaśastraḥ pṛthivīṃ nirīkṣya pṛthivīpatiḥ | prītimānabhavad rājā yayātiraparājitaḥ | evaṃ vibhajya pṛthivīṃ yayātiryadumabravīt

हिन्दी अर्थ

किसीसे परास्त न होनेवाले पृथ्वीपति राजा ययाति अस्त्र-शस्त्रोंका त्याग करके पृथ्वीको सुव्यवस्थित देख बड़े प्रसन्न हुए। इस तरह भूमण्डलका विभाग करके ययातिने यदुसे कहा—

अध्याय 30

श्लोक 23

जरां मे प्रतिगृह्णीष्व पुत्र कृत्यान्तरेण वै ।तरुणस्तव रूपेण चरेयं पृथिवीमिमाम् ।जरां त्वयि समाधाय तं यदुः प्रत्युवाच ह

jarāṃ me pratigṛhṇīṣva putra kṛtyāntareṇa vai | taruṇastava rūpeṇa careyaṃ pṛthivīmimām | jarāṃ tvayi samādhāya taṃ yaduḥ pratyuvāca ha

हिन्दी अर्थ

बेटा! यह दूसरा कार्य उपस्थित हुआ है, जिसके लिये मुझे तुम्हारी युवावस्था चाहिये । तुम मेरा बुढ़ापा ग्रहण करो और मैं तुममें अपनी वृद्धावस्था स्थापित करके तुम्हारे रूपसे तरुण होकर इस पृथ्वीपर विचरण करूँ।' तब यदुने उन्हें यों उत्तर दिया—

English

¹⁰⁵ A measure of time equal to thirty Kalas or four minutes.

अध्याय 30

श्लोक 24

अनिर्दिष्टा मया भिक्षा ब्राह्मणस्य प्रतिश्रुता ।अनपाकृत्य तां राजन् न ग्रहीष्यामि ते जराम्

anirdiṣṭā mayā bhikṣā brāhmaṇasya pratiśrutā | anapākṛtya tāṃ rājan na grahīṣyāmi te jarām

हिन्दी अर्थ

महाराज! मैंने एक ब्राह्मणको मुँहमाँगी भिक्षा देनेकी प्रतिज्ञा कर ली है, अभीतक उसने यह स्पष्टरूपसे बताया नहीं है कि 'मुझे अमुक वस्तु चाहिये।' मैं जबतक उसकी भिक्षाका ऋण उतार न दूँ, तबतक आपका बुढ़ापा नहीं ले सकूँगा

English

¹⁰⁵ A measure of time equal to thirty Kalas or four minutes.

अध्याय 30

श्लोक 25

जरायां बहवो दोषाः पानभोजनकारिताः ।तस्माज्जरां न ते राजन् ग्रहीतुमहमुत्सहे

jarāyāṃ bahavo doṣāḥ pānabhojanakāritāḥ | tasmājjarāṃ na te rājan grahītumahamutsahe

हिन्दी अर्थ

राजन्‌! बुढ़ापेमें खान-पानसम्बन्धी बहुत-से दोष हैं, अत: मैं आपका बुढ़ापा नहीं ग्रहण करूँगा

English

¹⁰⁵ A measure of time equal to thirty Kalas or four minutes.

अध्याय 30

श्लोक 26

सन्ति ते बहवः पुत्रा मत्तः प्रियतरा नृप ।प्रतिग्रहीतुं धर्मज्ञ पुत्रमन्यं वृणीष्व वै

santi te bahavaḥ putrā mattaḥ priyatarā nṛpa | pratigrahītuṃ dharmajña putramanyaṃ vṛṇīṣva vai

हिन्दी अर्थ

नरेश्वर! आपके तो बहुत-से पुत्र हैं, जो मुझसे भी बढ़कर प्रिय हैं; अत: धर्मज्ञ महाराज! जरावस्था ग्रहण करनेके लिये किसी दूसरे पुत्रका वरण कीजिये '

English

¹⁰⁵ A measure of time equal to thirty Kalas or four minutes.

अध्याय 30

श्लोक 27

स एवमुक्तो यदुना राजा कोपसमन्वितः ।उवाच वदतां श्रेष्ठो ययातिर्गर्हयन् सुतम्

sa evamukto yadunā rājā kopasamanvitaḥ | uvāca vadatāṃ śreṣṭho yayātirgarhayan sutam

हिन्दी अर्थ

यदुके ऐसा कहनेपर वक्ताओंमें श्रेष्ठ राजा ययाति कुपित हो उठे और अपने उस पुत्रकी निन्‍्दा करते हुए बोले-

English

¹⁰⁵ A measure of time equal to thirty Kalas or four minutes.

अध्याय 30

श्लोक 28

क आश्रयस्तवान्योऽस्ति को वा धर्मो विधीयते ।मामनादृत्य दुर्बुद्धे यदहं तव देशिकः

ka āśrayastavānyo'sti ko vā dharmo vidhīyate | māmanādṛtya durbuddhe yadahaṃ tava deśikaḥ

हिन्दी अर्थ

दुर्बुद्धे! मेरा अनादर करके तेरा दूसरा कौन-सा आश्रय है? अथवा तू किस धर्मका पालन कर रहा है? मैं तो तेरा गुरु हूँ (फिर मेरी आज्ञाका उल्लज्लन कैसे कर रहा है ?)'

अध्याय 30

श्लोक 29

एवमुक्त्वा यदुं तात शशापैनं स मन्युमान् ।अराज्ञ्या ते प्रजा मूढ भवित्रीति नराधम

evamuktvā yaduṃ tāta śaśāpainaṃ sa manyumān | arājñyā te prajā mūḍha bhavitrīti narādhama

हिन्दी अर्थ

तात! अपने पुत्र यदुसे ऐसा कहकर कुपित हुए राजा ययातिने उसे शाप दे दिया-'मूढ! नराधम! तेरी संतान सदा राज्यसे वद्चित रहेगी

अध्याय 30

श्लोक 30

स तुर्वसुं च द्रुह्युं चाप्यनुं च भरतर्षभ ।एवमेवाब्रवीद् राजा प्रत्याख्यातश्च तैरपि

sa turvasuṃ ca druhyuṃ cāpyanuṃ ca bharatarṣabha | evamevābravīd rājā pratyākhyātaśca tairapi

हिन्दी अर्थ

भरतश्रेष्ठ ! तदनन्तर राजा ययातिने क्रमश: तुर्वसु, द्रृह्मु और अनुको भी बुलाकर उनसे ऐसी ही बात कही, परंतु उन्होंने भी उनकी बात माननेसे इन्कार कर दिया

अध्याय 30

श्लोक 31

शशाप तानतिक्रुद्धो ययातिरपराजितः ।यथा ते कथितं पूर्वं मया राजर्षिसत्तमः

śaśāpa tānatikruddho yayātiraparājitaḥ | yathā te kathitaṃ pūrvaṃ mayā rājarṣisattamaḥ

हिन्दी अर्थ

तब किसीसे भी पराजित न होनेवाले राजर्षिशिरोमणि ययातिने अत्यन्त कुपित हो उनको भी वैसा ही शाप दिया जैसा यदुके प्रसज्भमें पहले तुम्हें बताया गया है

अध्याय 30

श्लोक 32

एवं शप्त्वा सुतान् सर्वांश्चतुरः पूरुपूर्वजान् ।तदेव वचनं राजा पूरुमप्याह भारत

evaṃ śaptvā sutān sarvāṃścaturaḥ pūrupūrvajān | tadeva vacanaṃ rājā pūrumapyāha bhārata

हिन्दी अर्थ

भारत! इस प्रकार पूरुसे पहले उत्पन्न हुए अपने चारों पुत्रोंको शाप देकर राजा ययातिने पूरुके सामने भी वही प्रस्ताव रखा

अध्याय 30

श्लोक 33

तरुणस्तव रूपेण चरेयं पृथिवीमिमाम् ।जरां त्वयि समाधाय त्वं पूरो यदि मन्यसे

taruṇastava rūpeṇa careyaṃ pṛthivīmimām | jarāṃ tvayi samādhāya tvaṃ pūro yadi manyase

हिन्दी अर्थ

पूरो! यदि तुम स्वीकार करो तो मैं अपने बुढ़ापेका भार तुमपर रखकर तुम्हारे रूपसे तरुण होकर इस पृथ्वीपर विचरूँ'

English

¹⁰⁵ A measure of time equal to thirty Kalas or four minutes.

अध्याय 30

श्लोक 34

स जरां प्रतिजग्राह पितुः पूरुः प्रतापवान् ।ययातिरपि रूपेण पूरोः पर्यचरन्महीम्

sa jarāṃ pratijagrāha pituḥ pūruḥ pratāpavān | yayātirapi rūpeṇa pūroḥ paryacaranmahīm

हिन्दी अर्थ

यह सुनकर प्रतापी पूरुने पिताका बुढ़ापा ले लिया और ययाति भी पूरुके रूपसे तरुण हो इस पृथ्वीपर विचरने लगे

English

¹⁰⁵ A measure of time equal to thirty Kalas or four minutes.

अध्याय 30

श्लोक 35

स मार्गमाणः कामानामन्तं भरतसत्तम ।विश्वाच्या सहितो रेमे वने चैत्ररथे प्रभुः

sa mārgamāṇaḥ kāmānāmantaṃ bharatasattama | viśvācyā sahito reme vane caitrarathe prabhuḥ

श्लोक 35–36 का हिन्दी अर्थ

इतनेपर भी जब उन्हें कामोपभोगसे तृप्ति नहीं हुई, तब उन नरेशने घर आकर पूरुसे अपना बुढ़ापा ले लिया

English

¹⁰⁵ A measure of time equal to thirty Kalas or four minutes.

अध्याय 30

श्लोक 36

यदावितृष्णः कामानां भोगेषु स नराधिपः ।तदा पूरोः सकाशाद्वै स्वां जरां प्रत्यपद्यत

yadāvitṛṣṇaḥ kāmānāṃ bhogeṣu sa narādhipaḥ | tadā pūroḥ sakāśādvai svāṃ jarāṃ pratyapadyata

अर्थ श्लोक 35 के साथ

अध्याय 30

श्लोक 37

तत्र गाथा महाराज शृणु गीता ययातिना ।याभिः प्रत्याहरेत्कामान् सर्वतोऽङ्गानि कूर्मवत्

tatra gāthā mahārāja śṛṇu gītā yayātinā | yābhiḥ pratyāharetkāmān sarvato'ṅgāni kūrmavat

हिन्दी अर्थ

महाराज! वहाँ ययातिने जो गाथाएँ गायीं (उद्वार प्रकट किये), उन्हें सुनो। उनपर ध्यान देनेसे मनुष्य सब भोगोंकी ओरसे अपने मनको उसी प्रकार हटा सकता है जैसे कछुआ अपने अड्डोंको सब ओरसे समेट लेता है

English

¹⁰⁵ A measure of time equal to thirty Kalas or four minutes.

अध्याय 30

श्लोक 38

न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति ।हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते

na jātu kāmaḥ kāmānāmupabhogena śāmyati | haviṣā kṛṣṇavartmeva bhūya evābhivardhate

हिन्दी अर्थ

ययातिने कहा—' भोगोंकी इच्छा उन्हें भोगनेसे कभी शान्त नहीं होती; अपितु घीसे आगकी भाँति और भी बढ़ती ही जाती है

English

¹⁰⁵ A measure of time equal to thirty Kalas or four minutes.

अध्याय 30

श्लोक 39

यत् पृथिव्यां व्रीहियवं हिरण्यं पशवः स्त्रियः ।नालमेकस्य तत् सर्वमिति पश्यन्न मुह्यति

yat pṛthivyāṃ vrīhiyavaṃ hiraṇyaṃ paśavaḥ striyaḥ | nālamekasya tat sarvamiti paśyanna muhyati

हिन्दी अर्थ

इस पृथ्वीपर जितने भी धान, जौ, सुवर्ण, पशु तथा स्त्रियाँ हैं, वे सब एक पुरुषके लिये भी पर्याप्त नहीं हैं। ऐसा समझकर विद्वान्‌ पुरुष मोहमें नहीं पड़ता

अध्याय 30

श्लोक 40

यदा भावं न कुरुते सर्वभूतेषु पापकम् ।कर्मणा मनसा वाचा ब्रह्म सम्पद्यते तदा

yadā bhāvaṃ na kurute sarvabhūteṣu pāpakam | karmaṇā manasā vācā brahma sampadyate tadā

हिन्दी अर्थ

जब जीव मन, वाणी और क्रियाद्वारा किसी भी प्राणीके प्रति पापबुद्धि नहीं करता, तब वह ब्रह्मभावको प्रात हो जाता है

English

¹⁰⁵ A measure of time equal to thirty Kalas or four minutes.

अध्याय 30

श्लोक 41

यदानेभ्यो न बिभ्येत यदाचास्मान्न बिभ्यति ।यदा नेच्छति न द्वेष्टि ब्रह्म सम्पद्यते तदा

yadānebhyo na bibhyeta yadācāsmānna bibhyati | yadā necchati na dveṣṭi brahma sampadyate tadā

हिन्दी अर्थ

जब वह दूसरे प्राणियोंसे नहीं डरता, जब उससे भी दूसरे प्राणी नहीं डरते तथा जब वह इच्छा-द्वेषसे परे हो जाता है, उस समय ब्रह्मभावको प्राप्त होता है

अध्याय 30

श्लोक 42

या दुस्त्यजा दुर्मतिभिर्या न जीर्यति जीर्यतः ।योऽसौ प्राणान्तिको रोगस्तां तृष्णां त्यजतः सुखम्

yā dustyajā durmatibhiryā na jīryati jīryataḥ | yo'sau prāṇāntiko rogastāṃ tṛṣṇāṃ tyajataḥ sukham

हिन्दी अर्थ

खोटी बुद्धिवाले पुरुषोंद्वारा जिसका त्याग होना कठिन है, जो मनुष्यके बूढ़े होनेपर भी स्वयं बूढ़ी नहीं होती तथा जो प्राण-नाशक रोगके समान है, उस तृष्णाका त्याग करनेवालेको ही सुख मिलता है

English

¹⁰⁵ A measure of time equal to thirty Kalas or four minutes.

अध्याय 30

श्लोक 43

जीर्यन्ति जीर्यतः केशा दन्ता जीर्यन्ति जीर्यतः ।जीविताशा धनाशा च जीर्यतोऽपि न जीर्यति

jīryanti jīryataḥ keśā dantā jīryanti jīryataḥ | jīvitāśā dhanāśā ca jīryato'pi na jīryati

हिन्दी अर्थ

बूढ़े होनेवाले मनुष्यके बाल पक जाते हैं, उसके दाँत भी टूटने लगते हैं, परंतु धन और जीवनकी आशा उस मनुष्यके जीर्ण होनेपर भी जीर्ण (शिथिल) नहीं होती

अध्याय 30

श्लोक 44

यच्च कामसुखं लोके यच्च दिव्यं महत्सुखम् ।तृष्णाक्षयसुखस्यैते नार्हतः षोडशीं कलाम्

yacca kāmasukhaṃ loke yacca divyaṃ mahatsukham | tṛṣṇākṣayasukhasyaite nārhataḥ ṣoḍaśīṃ kalām

हिन्दी अर्थ

संसारमें जो कामजनित सुख है तथा जो दिव्य महान्‌ सुख हैं, वे सब मिलकर तृष्णा-क्षयसे होनेवाले सुखके सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं हो सकते'

अध्याय 30

श्लोक 45

एवमुक्त्वा स राजर्षिः सदारः प्राविशद्वनम् ।कालेन महता वापि चचार विपुलं तपः

evamuktvā sa rājarṣiḥ sadāraḥ prāviśadvanam | kālena mahatā vāpi cacāra vipulaṃ tapaḥ

हिन्दी अर्थ

ऐसा कहकर राजर्षि ययाति स्त्री- सहित वनमें चले गये। वहाँ बहुत समयतक उन्होंने भारी तपस्या की

अध्याय 30

श्लोक 46

भृगुतुङ्गे तपस्तप्त्वा तपसोऽन्ते महातपाः ।अनश्नन् देहमुत्सृज्य सदारः स्वर्गमाप्तवान्

bhṛgutuṅge tapastaptvā tapaso'nte mahātapāḥ | anaśnan dehamutsṛjya sadāraḥ svargamāptavān

हिन्दी अर्थ

उन महातपस्वी नरेशने भूगुतुज्ठ॒ नामक शिखरपर तपस्या करके स्त्रीसहित उपवासके द्वारा देहको त्याग दिया और स्वर्गलोक प्राप्त किया

अध्याय 30

श्लोक 47

तस्य वंशे महाराज पञ्च राजर्षिसत्तमाः ।यैर्व्याप्ता पृथिवी सर्वा सूर्यस्येव गभस्तिभिः

tasya vaṃśe mahārāja pañca rājarṣisattamāḥ | yairvyāptā pṛthivī sarvā sūryasyeva gabhastibhiḥ

हिन्दी अर्थ

महाराज! उनके वंशमें यदु आदि पाँच राजर्षिशिरोमणि हुए, जिनके वंशजोंसे यह सारी पृथ्वी उसी प्रकार व्याप्त है, जैसे सूर्यकी किरणोंसे वह व्याप्त होती है

English

¹⁰⁵ A measure of time equal to thirty Kalas or four minutes.

अध्याय 30

श्लोक 48

यदोस्तु शृणु राजर्षेर्वंशं राजर्षिसत्कृतम् ।यत्र नारायणो जज्ञे हरिर्वृष्णिकुलोद्वहः

yadostu śṛṇu rājarṣervaṃśaṃ rājarṣisatkṛtam | yatra nārāyaṇo jajñe harirvṛṣṇikulodvahaḥ

हिन्दी अर्थ

राजर्षि यदुका वंश समस्त राजर्षियों द्वारा सम्मानित है। तुम उसका वर्णन सुनो। उसी वंशमें वृष्णिकुलभूषण श्रीकृष्णके रूपमें श्रीनारायण हरिका अवतार (प्रादुर्भाव) हुआ था

English

¹⁰⁵ A measure of time equal to thirty Kalas or four minutes.

अध्याय 30

श्लोक 49

धन्यः प्रजावानायुष्मान् कीर्तिमांश्च भवेन्नरः ।ययातेश्चरितं पुण्यं पठञ्छृण्वन् नराधिप

dhanyaḥ prajāvānāyuṣmān kīrtimāṃśca bhavennaraḥ | yayāteścaritaṃ puṇyaṃ paṭhañchṛṇvan narādhipa

हिन्दी अर्थ

शढ७ न नरेश्वर! जो मनुष्य ययातिके इस पुण्यमय चरित्रको पढ़ता और सुनता है, वह धनसम्पन्न, संतानवान्‌, दीर्घायु तथा यशस्वी होता है

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.