Harivamsha Purana
29
अध्याय 29 / 318

Parva 1, Adhyāya 29

82 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ82 श्लोक

अध्याय 29

श्लोक 1

अनेनसः वंशवर्णनम्, धन्वन्तरेः काशिराजस्य धन्वस्य पुत्ररूपेण अवतरणम्, दिवोदास्य राज्यकाले शिवाज्ञया गणेश्वर निकुम्भेन वाराणसीं जनशून्यं कर्तुं प्रयत्नम्, तत्र शिवपार्वत्योः निवासं, दिवोदासस्य वाराणस्योपरि अधिकारः एवं अलर्कस्य प्रशंसा अनेना के वंश का वर्णन, धन्वन्तरि का काशिराज धन्व के यहाँ पुत्ररूप में अवतार, दिवोदास के राज्यकाल में भगवान् शिव की आज्ञा से गणेश्वर निकुम्भ के द्वारा वाराणसी को जनशून्य वनाने का प्रयत्न, वहाँ शिव और पार्वती का निवास, दिवोदास का वाराणसी पर अधिकार और अलर्क की प्रशंसा रम्भोऽनपत्यस्तत्रासीद् वंशं वक्ष्याम्यनेनसः ।अनेनसः सुतो राजा प्रतिक्षत्रो महायशाः

anenasaḥ vaṃśavarṇanam, dhanvantareḥ kāśirājasya dhanvasya putrarūpeṇa avataraṇam, divodāsya rājyakāle śivājñayā gaṇeśvara nikumbhena vārāṇasīṃ janaśūnyaṃ kartuṃ prayatnam, tatra śivapārvatyoḥ nivāsaṃ, divodāsasya vārāṇasyopari adhikāraḥ evaṃ alarkasya praśaṃsā anenā ke vaṃśa kā varṇana, dhanvantari kā kāśirāja dhanva ke yahā~ putrarūpa meṃ avatāra, divodāsa ke rājyakāla meṃ bhagavān śiva kī ājñā se gaṇeśvara nikumbha ke dvārā vārāṇasī ko janaśūnya vanāne kā prayatna, vahā~ śiva aura pārvatī kā nivāsa, divodāsa kā vārāṇasī para adhikāra aura alarka kī praśaṃsā rambho'napatyastatrāsīd vaṃśaṃ vakṣyāmyanenasaḥ | anenasaḥ suto rājā pratikṣatro mahāyaśāḥ

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! आयुपुत्र रम्भके कोई संतान नहीं हुई। अब मैं अनेनाके वंशका वर्णन करूँगा। अनेनाके पुत्र महायशस्वी राजा प्रतिक्षत्र हुए

अध्याय 29

श्लोक 2

प्रतिक्षत्रसुतश्चापि सृञ्जयो नाम विश्रुतः ।सृञ्जयस्य जयः पुत्रो विजयस्तस्य चात्मजः

pratikṣatrasutaścāpi sṛñjayo nāma viśrutaḥ | sṛñjayasya jayaḥ putro vijayastasya cātmajaḥ

हिन्दी अर्थ

प्रतिक्षत्रके पुत्र सूज्य नामसे विख्यात हुए। सूज्यके पुत्र जय और जयके पुत्र विजय हुए

अध्याय 29

श्लोक 3

विजयस्य कृतिः पुत्रस्तस्य हर्यश्वतः सुतः ।हर्यश्वतसुतो राजा सहदेवः प्रतापवान्

vijayasya kṛtiḥ putrastasya haryaśvataḥ sutaḥ | haryaśvatasuto rājā sahadevaḥ pratāpavān

हिन्दी अर्थ

विजयके पुत्र कृति, कृतिके हर्यश्र और हर्यश्रके पुत्र प्रतापी राजा सहदेव हुए

अध्याय 29

श्लोक 4

सहदेवस्य धर्मात्मा नदीन इति विश्रुतः ।नदीनस्य जयत्सेनो जयत्सेनस्य सङ्कृतिः

sahadevasya dharmātmā nadīna iti viśrutaḥ | nadīnasya jayatseno jayatsenasya saṅkṛtiḥ

हिन्दी अर्थ

सहदेवका धर्मात्मा पुत्र नदीन नामसे विख्यात हुआ । नदीनका पुत्र जयत्सेन और जयत्सेनका संकृति था

अध्याय 29

श्लोक 5

सङ्कृतेरपि धर्मात्मा क्षत्रधर्मा महायशाः ।अनेनसः समाख्याताः क्षत्रवृद्धस्य मे शृणु

saṅkṛterapi dharmātmā kṣatradharmā mahāyaśāḥ | anenasaḥ samākhyātāḥ kṣatravṛddhasya me śṛṇu

हिन्दी अर्थ

संकृतिके पुत्र महायशस्वी धर्मात्मा क्षत्रधर्मा हुए। यहाँतक अनेनाके पुत्रोंका वर्णन हुआ। अब मुझसे क्षत्रवृद्धकी संततिका वर्णन सुनो

अध्याय 29

श्लोक 6

क्षत्रवृद्धात्मजस्तत्र सुनहोत्रो महायशाः ।सुनहोत्रस्य दायादास्त्रयः परमधार्मिकाः

kṣatravṛddhātmajastatra sunahotro mahāyaśāḥ | sunahotrasya dāyādāstrayaḥ paramadhārmikāḥ

श्लोक 6–7 का हिन्दी अर्थ

क्षत्रवृद्धके पुत्र महायशस्वी सुनहोत्र हुए। सुनहोत्रके परम धार्मिक तीन पुत्र थे-काश, शल और प्रभावशाली गृत्समद। गृत्समदके पुत्र शुनक हुए, जिससे शौनक- वंशका विस्तार हुआ

अध्याय 29

श्लोक 7

ञ्ज्रात्रस्य दायादास्त्रयः परमधाआमकाः तं ६॥ काशः शलश्च द्वावेतौ तथा गृत्समदः प्रभुः ।पुत्रो गृत्समदस्यापि शुनको यस्य शौनकाः

ñjrātrasya dāyādāstrayaḥ paramadhāāmakāḥ taṃ 6|| kāśaḥ śalaśca dvāvetau tathā gṛtsamadaḥ prabhuḥ | putro gṛtsamadasyāpi śunako yasya śaunakāḥ

अर्थ श्लोक 6 के साथ

अध्याय 29

श्लोक 8

ब्राह्मणाः क्षत्रियाश्चैव वैश्याः शूद्रास्तथैव च ।शलात्मजश्चार्ष्टिषेणस्तनयस्तस्य काशकः

brāhmaṇāḥ kṣatriyāścaiva vaiśyāḥ śūdrāstathaiva ca | śalātmajaścārṣṭiṣeṇastanayastasya kāśakaḥ

हिन्दी अर्थ

शौनक-वंशमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद सभी वर्णोंके लोग हुए। शलके पुत्रका नाम आर्ट्िषिण था। उनके पुत्र काशक हुए

अध्याय 29

श्लोक 9

काशस्य काशयो राजन् पुत्रो दीर्घतपास्तथा ।धन्वस्तु दीर्घतपसो विद्वान् धन्वन्तरिस्ततः

kāśasya kāśayo rājan putro dīrghatapāstathā | dhanvastu dīrghatapaso vidvān dhanvantaristataḥ

हिन्दी अर्थ

राजन्‌ ! काशके वंशज (पुत्र) काशि कहलाये। इनमें दीर्घतपा सबसे प्रथम पुत्र थे। दीर्घतपाके धन्व और धन्वसे विद्वान्‌ धन्वन्तरिका प्रादुर्भाव हुआ

अध्याय 29

श्लोक 10

तपसोऽन्ते सुमहतो जातो वृद्धस्य धीमतः ।पुनर्धन्वन्तरिर्देवो मानुषेष्विह जज्ञिवान्

tapaso'nte sumahato jāto vṛddhasya dhīmataḥ | punardhanvantarirdevo mānuṣeṣviha jajñivān

हिन्दी अर्थ

अपनी महान्‌ तपस्या पूरी करके अन्तमें धन्वन्तरिदेवने बुद्धिमान्‌ एवं वृद्ध राजा धन्वके यहाँ इस मनुष्यरूपमें पुन: जन्म प्रहण किया

अध्याय 29

श्लोक 11

कथं धन्वन्तरिर्देवो मानुषेष्विह जज्ञिवान् ।एतद् वेदितुमिच्छामि तन्मे ब्रूहि यथातथम्

kathaṃ dhanvantarirdevo mānuṣeṣviha jajñivān | etad veditumicchāmi tanme brūhi yathātatham

श्लोक 11–14 का हिन्दी अर्थ

जनमेजयने पूछा—ब्रह्मनू! धन्वन्तरिदेव इस मनुष्यलोकमें किस प्रकार उत्पन्न हुए? यह मैं जानना चाहता हूँ। अत: यह प्रसड्ज मुझे ठीक-ठीक बताइये

अध्याय 29

श्लोक 12

धन्वन्तरेः सम्भवोऽयं श्रूयतां भरतर्षभ ।जातः स हि समुद्रात्तु मथ्यमाने पुरामृते

dhanvantareḥ sambhavo'yaṃ śrūyatāṃ bharatarṣabha | jātaḥ sa hi samudrāttu mathyamāne purāmṛte

अर्थ श्लोक 11 के साथ

अध्याय 29

श्लोक 13

उत्पन्नः कलशात् पूर्वं सर्वतश्च श्रिया वृतः ।अभ्यसन्सिद्धिकार्ये हि विष्णुं दृष्ट्वा हि तस्थिवान्

utpannaḥ kalaśāt pūrvaṃ sarvataśca śriyā vṛtaḥ | abhyasansiddhikārye hi viṣṇuṃ dṛṣṭvā hi tasthivān

अर्थ श्लोक 11 के साथ

अध्याय 29

श्लोक 14

अब्जस्त्वमिति होवाच तस्मादब्जस्तु स स्मृतः ।अब्जः प्रोवाच विष्णुं वै तव पुत्रोऽस्मि वै प्रभो

abjastvamiti hovāca tasmādabjastu sa smṛtaḥ | abjaḥ provāca viṣṇuṃ vai tava putro'smi vai prabho

अर्थ श्लोक 11 के साथ

अध्याय 29

श्लोक 15

विधत्स्व भागं स्थानं च मम लोके सुरेश्वर ।एवमुक्तः स दृष्ट्वा वै तथ्यं प्रोवाच तं प्रभुः

vidhatsva bhāgaṃ sthānaṃ ca mama loke sureśvara | evamuktaḥ sa dṛṣṭvā vai tathyaṃ provāca taṃ prabhuḥ

हिन्दी अर्थ

भगवान्‌ विष्णुने उनसे कहा—“तुम अप्‌ अर्थात्‌ जलसे प्रकट हुए हो, इसलिये अब्ज हो।' उनके ऐसा कहनेसे वे अब्ज कहलाने लगे। उस समय अब्जने भगवान्‌ विष्णुसे कहा-'प्रभो! मैं आपका पुत्र हूँ। सुरेधर ! मेरे लिये यज्ञभागकी व्यवस्था कीजिये और लोकमें मेरे लिये कोई स्थान दीजिये।' उनके ऐसा कहनेपर भगवान्‌ विष्णुने उनकी ओर देखकर यह यथार्थ बात कही—

अध्याय 29

श्लोक 16

कृतो यज्ञविभागो हि यज्ञियैर्हि सुरैः पुरा ।देवेषु विनियुक्तं हि विद्धि होत्रं महर्षिभिः

kṛto yajñavibhāgo hi yajñiyairhi suraiḥ purā | deveṣu viniyuktaṃ hi viddhi hotraṃ maharṣibhiḥ

हिन्दी अर्थ

पूर्वकालमें यज्ञसम्बन्धी देवताओंने यज्ञका विभाग कर लिया है। महर्षियोंने हवनीय पदार्थोका देवताओंके लिये ही विनियोग किया है। इस बातको तुम अच्छी तरह समझ लो

अध्याय 29

श्लोक 17

न शक्यमुपहोमा वै तुभ्यं कर्तुं कदाचन ।अर्वाग्भूतोऽसि देवानां पुत्र त्वं तु नहीश्वरः

na śakyamupahomā vai tubhyaṃ kartuṃ kadācana | arvāgbhūto'si devānāṃ putra tvaṃ tu nahīśvaraḥ

हिन्दी अर्थ

बेटा! तुम्हें छोटे- मोटे उपहोम कभी नहीं अर्पित किये जा सकते (क्योंकि वे तुम्हारे योग्य नहीं हैं) । तुम देवताओंसे पीछे उत्पन्न हुए हो। अतः तुम्हारे लिये वेद-विरुद्ध यज्ञभागकी कल्पना नहीं की जा सकती और वैदिक यज्ञभाग पानेके तुम अधिकारी नहीं हो

अध्याय 29

श्लोक 18

द्वितीयायां तु सम्भूत्यां लोके ख्यातिं गमिष्यसि ।अणिमादिश्च ते सिद्धिर्गर्भस्थस्य भविष्यति

dvitīyāyāṃ tu sambhūtyāṃ loke khyātiṃ gamiṣyasi | aṇimādiśca te siddhirgarbhasthasya bhaviṣyati

हिन्दी अर्थ

दूसरे जन्ममें तुम संसारमें विख्यात होओगे। वहाँ गर्भावस्थामें ही तुम्हें अणिमा आदि सिद्धि प्रात हो जायगी

अध्याय 29

श्लोक 19

तेनैव त्वं शरीरेण देवत्वं प्राप्स्यसे प्रभो ।चरुमन्त्रैर्व्रतैर्जाप्यैर्यक्ष्यन्ति त्वां द्विजातयः

tenaiva tvaṃ śarīreṇa devatvaṃ prāpsyase prabho | carumantrairvratairjāpyairyakṣyanti tvāṃ dvijātayaḥ

हिन्दी अर्थ

प्रभो ! तुम उसी शरीरसे देवत्व प्राप्त कर लोगे और ब्राह्मणलोग चरु, मन्त्र, व्रत एवं जपनीय मन्त्रोंद्वारा तुम्हारा यजन करेंगे

अध्याय 29

श्लोक 20

अष्टधा त्वं पुनश्चैवमायुर्वेदं विधास्यसि ।अवश्यभावी ह्यर्थोऽयं प्राग्दृष्टस्त्वब्जयोनिना

aṣṭadhā tvaṃ punaścaivamāyurvedaṃ vidhāsyasi | avaśyabhāvī hyartho'yaṃ prāgdṛṣṭastvabjayoninā

हिन्दी अर्थ

फिर तुम उस जन्ममें आयुर्वेदको आठ भागोंमें विभक्त करके उसे आठ अजड्लोंसे युक्त* बना दोगे, यह बात अवश्य होनेवाली है। कमलयोनि ब्रह्माजीने इसे पहलेसे ही देख लिया है'

अध्याय 29

श्लोक 21

द्वितीयं द्वापरं प्राप्य भविता त्वं न संशयः ।इमं तस्मै वरं दत्त्वा विष्णुरन्तर्दधे पुनः

dvitīyaṃ dvāparaṃ prāpya bhavitā tvaṃ na saṃśayaḥ | imaṃ tasmai varaṃ dattvā viṣṇurantardadhe punaḥ

हिन्दी अर्थ

हुश्चिकित्सा येषु संत्रिता ॥ वज्िचिकित्सा, ५-शल्यचिकित्सा, ६-दंप्राचिकित्सा, ७-जराचिकित्सा गाय, बाल आदि जो आठ अड्ध हैं, उनपर ही चिकित्सा अवलम्बित ते हैं । बालकों के रोगोंका विचार और उन्हें दूर करनेके उपाय आदि नेवाली पीड़ाको समझना और विभिन्न प्रकारके उपचारोंद्वारा उसे दूर दूर करनेकी चेष्टा एवं विधि ऊर्ध्वाज़चिकित्सा कहलाती है। अस्त्र- नेकी जो क्रिया है, उसे शल्यचिकित्सा कहते हैं । सर्पदंशन आदि “दूसरा द्वापर आनेपर तुम संसारमें प्रकट होओगे, इसमें संशय नहीं है।' धन्वन्तरिको यह वर देकर भगवान्‌ विष्णु फिर अन्तर्धान हो गये

अध्याय 29

श्लोक 22

द्वितीये द्वापरं प्राप्ते सौनहोत्रिः स काशिराट् ।पुत्रकामस्तपस्तेपे धन्यो दीर्घं तपस्तदा

dvitīye dvāparaṃ prāpte saunahotriḥ sa kāśirāṭ | putrakāmastapastepe dhanyo dīrghaṃ tapastadā

हिन्दी अर्थ

जब दूसरा द्वापर आया, तब सुनहोत्रके पुत्र काशिराज धन्व पुत्रकी कामनासे दीर्घकालीन तपस्या करने लगे

अध्याय 29

श्लोक 23

प्रपद्ये देवतां तां तु या मे पुत्रं प्रदास्यति ।अब्जं देवं सुतार्थाय तदाऽऽराधितवान्नृपः

prapadye devatāṃ tāṃ tu yā me putraṃ pradāsyati | abjaṃ devaṃ sutārthāya tadā''rādhitavānnṛpaḥ

हिन्दी अर्थ

उन्होंने मन-ही-मन सोचा कि 'मैं उस देवताकी शरण लूँ, जो मुझे पुत्र प्रदान करेगा।' ऐसा विचारकर राजाने पुत्रके लिये अब्जदेव (भगवान्‌ धन्वन्तरि)-की आराधना की

अध्याय 29

श्लोक 24

ततस्तुष्टः स भगवानब्जः प्रोवाच तं नृपम् ।यदिच्छसि वरं ब्रूहि तत् ते दास्यामि सुव्रत

tatastuṣṭaḥ sa bhagavānabjaḥ provāca taṃ nṛpam | yadicchasi varaṃ brūhi tat te dāsyāmi suvrata

हिन्दी अर्थ

उस आराधनासे संतुष्ट होकर भगवान्‌ अब्ज राजा धन्वसे बोले-'उत्तम ब्रतका पालन करनेवाले नरेश! तुम जो वर प्राप्त करना चाहते हो, उसे बताओ। वह मैं तुम्हें दूँगा

अध्याय 29

श्लोक 25

भगवन् यदि तुष्टस्त्वं पुत्रो मे ख्यातिमान् भव ।तथेति समनुज्ञाय तत्रैवान्तरधीयत

bhagavan yadi tuṣṭastvaṃ putro me khyātimān bhava | tatheti samanujñāya tatraivāntaradhīyata

हिन्दी अर्थ

राजा बोले—भगवन्‌! यदि आप मुझसे संतुष्ट हैं तो मेरे पुत्र हो जायँ और इसी रूपमें आपकी ख्याति हो। तब “तथास्तु' कहकर भगवान्‌ धन्वन्तरि वहीं अन्तर्धान हो गये

अध्याय 29

श्लोक 26

तस्य गेहे समुत्पन्नो देवो धन्वन्तरिस्तदा ।काशिराजो महाराज सर्वरोगप्रणाशनः

tasya gehe samutpanno devo dhanvantaristadā | kāśirājo mahārāja sarvarogapraṇāśanaḥ

हिन्दी अर्थ

महाराज ! तदनन्तर धन्वन्तरिदेव धन्वके घरमें अवतीर्ण हुए। काशिराज धन्वन्तरि समस्त रोगोंका नाश करनेमें समर्थ थे

अध्याय 29

श्लोक 27

आयुर्वेदं भरद्वाजात्प्राप्येह भिषजां क्रियाम् ।तमष्टधा पुनर्व्यस्य शिष्येभ्यः प्रत्यपादयत्

āyurvedaṃ bharadvājātprāpyeha bhiṣajāṃ kriyām | tamaṣṭadhā punarvyasya śiṣyebhyaḥ pratyapādayat

हिन्दी अर्थ

उन्होंने मुनिवर भरद्वाजसे आयुर्वेद तथा चिकित्साकर्मका ज्ञान प्राप्त करके उसे आठ भागोंमें विभक्त किया और उन सबकी विस्तृत विवेचना की। फिर बहुतसे शिष्योंको उस अष्टाज्युक्ता आयुर्वेदकी शिक्षा दी

अध्याय 29

श्लोक 28

धन्वन्तरेस्तु तनयः केतुमानिति विश्रुतः ।अथ केतुमतः पुत्रो वीरो भीमरथः स्मृतः

dhanvantarestu tanayaḥ ketumāniti viśrutaḥ | atha ketumataḥ putro vīro bhīmarathaḥ smṛtaḥ

हिन्दी अर्थ

धन्वन्तरिके पुत्र केतुमान्‌ नामसे विख्यात हुए। केतुमान्‌के वीर पुत्रका नाम भीमरथ था

अध्याय 29

श्लोक 29

सुतो भीमरथस्यापि दिवोदासः प्रजेश्वरः ।दिवोदासस्तु धर्मात्मा वाराणस्यधिपोऽभवत्

suto bhīmarathasyāpi divodāsaḥ prajeśvaraḥ | divodāsastu dharmātmā vārāṇasyadhipo'bhavat

हिन्दी अर्थ

भीमरथके पुत्र धर्मात्मा राजा दिवोदास हुए, जो वाराणसीपुरीके स्वामी थे

अध्याय 29

श्लोक 30

एतस्मिन्नेव काले तु पुरीं वाराणसीं नृप ।शून्यां निवासयामास क्षेमको नाम राक्षसः

etasminneva kāle tu purīṃ vārāṇasīṃ nṛpa | śūnyāṃ nivāsayāmāsa kṣemako nāma rākṣasaḥ

हिन्दी अर्थ

नेश्वर! राजा दिवोदासके राज्यकालमें ही शापवश वाराणसीपुरी जनशून्य हो गयी थी, जिसे पीछे भगवान्‌ रुद्रका अनुचर क्षेमक नामक राक्षसने बसाया था

अध्याय 29

श्लोक 31

शप्ता हि सा मतिमता निकुम्भेन महात्मना ।शून्या वर्षसहस्रं वै भवित्री नात्र संशयः

śaptā hi sā matimatā nikumbhena mahātmanā | śūnyā varṣasahasraṃ vai bhavitrī nātra saṃśayaḥ

हिन्दी अर्थ

भगवान्‌ रुद्रके पार्षद बुद्धिमान्‌ महात्मा निकुम्भने यह शाप दे दिया था कि 'वाराणसीपुरी एक हजार वर्षोतक जनशून्य बनी रहेगी। इसमें संशय नहीं है'

English

¹⁴⁰ A name of fire. Other words have been explained in previous notes.

अध्याय 29

श्लोक 32

तस्यां तु शप्तमात्रायां दिवोदासः प्रजेश्वरः ।विषयान्ते पुरीं रम्यां गोमत्यां संन्यवेशयत्

tasyāṃ tu śaptamātrāyāṃ divodāsaḥ prajeśvaraḥ | viṣayānte purīṃ ramyāṃ gomatyāṃ saṃnyaveśayat

हिन्दी अर्थ

उस पुरीके शापग्रस्त हो जानेपर राजा दिवोदासने अपने राज्यकी सीमापर गोमती नदीके किनारे एक रमणीय नगरी बसायी

English

¹⁴⁰ A name of fire. Other words have been explained in previous notes.

अध्याय 29

श्लोक 33

भद्रश्रेण्यस्य पूर्वं तु पुरी वाराणसीत्यभूत् ।भद्रश्रेण्यस्य पुत्राणां शतमुत्तमधन्विनाम्

bhadraśreṇyasya pūrvaṃ tu purī vārāṇasītyabhūt | bhadraśreṇyasya putrāṇāṃ śatamuttamadhanvinām

श्लोक 33–35 का हिन्दी अर्थ

चकित्सा है। रसायन आदिके द्वारा बुढ़ापाको रोकना या उसे दूर थे श्३९ पहले वाराणसीपुरी (यदुवंशी महिष्मान्‌के पुत्र) भद्रश्रेण्यके अधिकारमें थी। भद्रश्रेण्यके सौ पुत्र थे, जो श्रेष्ठ धनुर्धर माने जाते थे, नर्श्रेष्ठ दिवोदासने उन सबको मारकर वहाँ अपना राज्य स्थापित किया। उन महाबली नरेशने भद्रश्रेण्यके उस राज्यका बलपूर्वक अपहरण कर लिया॥ ३३े-रेड॥ जनमेजयने पूछा—मुने ! वाराणसी तो सिद्धिक्षेत्र (मोक्षधाम) है. और प्रभावशाली निकुम्भ बड़े _ धर्मात्मा हैं। फिर उन्होंने उस पुरीको शाप किसलिये दिया ?

अध्याय 29

श्लोक 34

हत्वा निवेशयामास दिवोदासो नरर्षभः ।भद्रश्रेण्यस्य तद् राज्यं हृतं तेन बलीयसा

hatvā niveśayāmāsa divodāso nararṣabhaḥ | bhadraśreṇyasya tad rājyaṃ hṛtaṃ tena balīyasā

अर्थ श्लोक 33 के साथ

अध्याय 29

श्लोक 35

वाराणसीं निकुम्भस्तु किमर्थं शप्तवान् प्रभुः ।निकुम्भकश्च धर्मात्मा सिद्धिक्षेत्रं शशाप यः

vārāṇasīṃ nikumbhastu kimarthaṃ śaptavān prabhuḥ | nikumbhakaśca dharmātmā siddhikṣetraṃ śaśāpa yaḥ

अर्थ श्लोक 33 के साथ

अध्याय 29

श्लोक 36

दिवोदासस्तु राजर्षिर्नगरीं प्राप्य पार्थिवः ।वसति स्म महातेजाः स्फीतायां तु नराधिपः

divodāsastu rājarṣirnagarīṃ prāpya pārthivaḥ | vasati sma mahātejāḥ sphītāyāṃ tu narādhipaḥ

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजीने कहा—राजन्‌ ! महातेजस्वी नरेश्वर राजर्षि दिवोदास वाराणसी नगरीको पाकर वहाँके राजा हो गये। वे उस समृद्धिशालिनी नगरीमें सदा ही निवास करते थे

अध्याय 29

श्लोक 37

एतस्मिनेव काले तु कृतदारो महेश्वरः ।देव्याः स प्रियकामस्तु न्यवसच्छ्वशुरन्तिके

etasmineva kāle tu kṛtadāro maheśvaraḥ | devyāḥ sa priyakāmastu nyavasacchvaśurantike

हिन्दी अर्थ

इन्हीं दिनों भगवान्‌ श्र विवाह करके देवी पार्वतीका प्रिय करनेकी इच्छासे अपने श्वशुरके पास ही निवास करते थे

अध्याय 29

श्लोक 38

देवाज्ञया पार्षदा ये त्वधिरूपास्तपोधनाः ।पूर्वोक्तैरुपदेशैश्च तोषयन्ति स्म पार्वतीम्

devājñayā pārṣadā ye tvadhirūpāstapodhanāḥ | pūrvoktairupadeśaiśca toṣayanti sma pārvatīm

हिन्दी अर्थ

उस समय महादेवजीकी आज्ञासे उनके सुयोग्य पार्षद, जो तपस्याके धनी थे, उनके पहले दिये हुए उपदेशके अनुसार पार्वतीदेवीको संतुष्ट करते रहते थे

अध्याय 29

श्लोक 39

हृष्यते वै महादेवी मेना नैव प्रहृष्यति ।जुगुप्सत्यसकृत् तां वै दैवीं देवं तथैव सा

hṛṣyate vai mahādevī menā naiva prahṛṣyati | jugupsatyasakṛt tāṃ vai daivīṃ devaṃ tathaiva sā

हिन्दी अर्थ

इससे महादेवी पार्वती तो प्रसन्न रहती थीं, परंतु उनकी माता मेनाको संतोष नहीं होता था। वे महादेवी पार्वती तथा भगवान्‌ शड्टरकी बारम्बार निन्‍दा ही करती थीं

अध्याय 29

श्लोक 40

सपार्षदस्त्वनाचारस्तव भर्ता महेश्वरः ।दरिद्रः सर्वदैवासौ शीलं तस्य न वर्तते

sapārṣadastvanācārastava bhartā maheśvaraḥ | daridraḥ sarvadaivāsau śīlaṃ tasya na vartate

हिन्दी अर्थ

उन्होंने एक दिन कहा-*उमे! तेरे पति महादेव और उनके पार्षद सभी अनाचारी हैं। साथ ही वे भोलेनाथ सदाके दरिद्र हैं। शील तो उनमें नाममात्रको भी नहीं है '

अध्याय 29

श्लोक 41

मात्रा तथोक्ता वरदा स्त्रीस्वभावाच्च चुक्रुधे ।स्मितं कृत्वा च वरदा भवपार्श्वमथागमत्

mātrā tathoktā varadā strīsvabhāvācca cukrudhe | smitaṃ kṛtvā ca varadā bhavapārśvamathāgamat

हिन्दी अर्थ

वरदायिनी उमा माताके ऐसा कहनेपर स्त्रीस्वभाववश कुपित हो उठीं और किश्चितू मुसकराकर महादेवजीके पास आरयीं

अध्याय 29

श्लोक 42

विवर्णवदना देवी महादेवमभाषत ।नेह वत्स्याम्यहं देव नय मां स्वं निकेतनम्

vivarṇavadanā devī mahādevamabhāṣata | neha vatsyāmyahaṃ deva naya māṃ svaṃ niketanam

हिन्दी अर्थ

उस समय उनका मुख मलिन हो रहा था। निकट आकर देवीने महादेवजीसे कहा-''देव! अब मैं यहाँ (नैहरमें) नहीं रहूँगी। आप मुझे अपने घर ले चलें'

अध्याय 29

श्लोक 43

त्रधृह्मन्दक्त्रप्ययखम।आङ्कर ॥ तथा कर्तुं महादेवः सर्वलोकानवैक्षत ।वासार्थं रोचयामास पृथिव्यां कुरुनन्दन

tradhṛhmandaktrapyayakhama|āṅkara || tathā kartuṃ mahādevaḥ sarvalokānavaikṣata | vāsārthaṃ rocayāmāsa pṛthivyāṃ kurunandana

श्लोक 43–48 का हिन्दी अर्थ

कुरुनन्दन! पार्वतीजीके कथनानुसार कार्य करनेके लिये महादेवजीने सम्पूर्ण लोकोंपर दृष्टिपात किया। उन महातेजस्वी महेश्वरने पृथ्वीपर अपने रहनेके लिये सिद्धिक्षेत्र वाराणसीपुरीको पसंद किया। परंतु उस नगरीमें राजा दिवोदास निवास करते हैं, यह जानकर महादेवजीने अपने पास खड़े हुए निकुम्भसे इस प्रकार कहा- गणेश्वर ! तुम जाकर वाराणसीपुरीको मनुष्योंसे सूनी कर दो; परंतु इसके लिये कोमल उपायसे ही. काम लेना, क्योंकि वे राजा दिवोदास बड़े बलवान्‌ हैं ' । तब निकुम्भने वाराणसी पुरीमें जाकर कण्डुक नाईको स्वप्रमें दर्शन दिया और कहा-* अनघ! तू नगरकी सीमापर मेरी प्रतिमा बनाकर मेरे लिये निवासस्थानकी व्यवस्था कर। ऐसा करनेसे मैं तेरा कल्याण करूँगा ।' नरेधर ! तब उस नाईने स्वप्रमें जैसा कहा गया था उसके अनुसार सब कुछ किया और कराया

अध्याय 29

श्लोक 44

वाराणसीं महातेजाः सिद्धिक्षेत्रं महेश्वरः ।दिवोदासेन तां ज्ञात्वा निविष्टां नगरीं भवः

vārāṇasīṃ mahātejāḥ siddhikṣetraṃ maheśvaraḥ | divodāsena tāṃ jñātvā niviṣṭāṃ nagarīṃ bhavaḥ

अर्थ श्लोक 43 के साथ

अध्याय 29

श्लोक 45

पार्श्वे तिष्ठन्तमाहूय निकुम्भमिदमब्रवीत् ।गणेश्वर पुरीं गत्वा शून्यां वाराणसीं कुरु

pārśve tiṣṭhantamāhūya nikumbhamidamabravīt | gaṇeśvara purīṃ gatvā śūnyāṃ vārāṇasīṃ kuru

अर्थ श्लोक 43 के साथ

अध्याय 29

श्लोक 46

मृदुनैवाभ्युपायेन ह्यतिवीर्यः स पार्थिवः ।ततो गत्वा निकुम्भस्तु पुरीं वाराणसीं तदा

mṛdunaivābhyupāyena hyativīryaḥ sa pārthivaḥ | tato gatvā nikumbhastu purīṃ vārāṇasīṃ tadā

अर्थ श्लोक 43 के साथ

अध्याय 29

श्लोक 47

स्वप्ने निदर्शयामास कण्डुकं नाम नापितम् ।श्रेयस्तेऽहं करिष्यामि स्थानं मे रोचयानघ

svapne nidarśayāmāsa kaṇḍukaṃ nāma nāpitam | śreyaste'haṃ kariṣyāmi sthānaṃ me rocayānagha

अर्थ श्लोक 43 के साथ

अध्याय 29

श्लोक 48

मद्रूपां प्रतिमां कृत्या नगर्यन्ते तथैव च ।ततः स्वप्ने यथोद्दिष्टं सर्वं कारितवान् नृप

madrūpāṃ pratimāṃ kṛtyā nagaryante tathaiva ca | tataḥ svapne yathoddiṣṭaṃ sarvaṃ kāritavān nṛpa

अर्थ श्लोक 43 के साथ

अध्याय 29

श्लोक 49

पुरीद्वारे तु विज्ञाप्य राजानं च यथाविधि ।पूजां तु महतीं तस्य नित्यमेव प्रयोजयत्

purīdvāre tu vijñāpya rājānaṃ ca yathāvidhi | pūjāṃ tu mahatīṃ tasya nityameva prayojayat

हिन्दी अर्थ

राजाको सूचना देकर उसने नगरके द्वारपर विधिपूर्वक निकुम्भ-प्रतिमाकी स्थापना की। फिर वह प्रतिदिन बड़े समारोहके साथ उस प्रतिमाकी पूजा करने लगा

अध्याय 29

श्लोक 50

गन्धैश्च धूपमाल्यैश्च प्रोक्षणीयैस्तथैव च ।अन्नपानप्रयोगैश्च अत्यद्भुतमिवाभवत्

gandhaiśca dhūpamālyaiśca prokṣaṇīyaistathaiva ca | annapānaprayogaiśca atyadbhutamivābhavat

हिन्दी अर्थ

गन्ध, पुष्प, माला, धूप, प्रोक्षणीय जल तथा अन्न-पान आदि अर्पण करके वह नाई निकुम्भकी पूजा करता था। यह वहाँ अत्यन्त अद्भुत-सी बात हुई

अध्याय 29

श्लोक 51

एवं सम्पूज्यते तत्र नित्यमेव गणेश्वरः ।ततो वरसहस्रं तु नागराणां प्रयच्छति ।पुत्रान्हिरण्यमायुश्च सर्वान् कामांस्तथैव च

evaṃ sampūjyate tatra nityameva gaṇeśvaraḥ | tato varasahasraṃ tu nāgarāṇāṃ prayacchati | putrānhiraṇyamāyuśca sarvān kāmāṃstathaiva ca

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार वहाँ नित्य ही निकुम्भ नामक गणेशकी पूजा होती और वे नागरिकोंको पहलों वर प्रदान करते थे । पुत्र, सुबर्ण, आयु तथा सम्पूर्ण मनोवाज्छित वस्तुएँ सबको देते थे

अध्याय 29

श्लोक 52

राज्ञस्तु महिषी श्रेष्ठा सुयशा नाम विश्रुता ।पुत्रार्थमागता देवी साध्वी राज्ञा प्रचोदिता

rājñastu mahiṣī śreṣṭhā suyaśā nāma viśrutā | putrārthamāgatā devī sādhvī rājñā pracoditā

हिन्दी अर्थ

राजा दिवोदासकी श्रेष्ठ महारानी सुयशा नामसे विख्यात थीं । राजाकी आज्ञा लेकर वे साध्वी महारानी पुत्रकी कामनासे वहाँ आरयीं

अध्याय 29

श्लोक 53

पूजां तु विपुलां कृत्वा देवी पुत्रमयाचत ।पुनः पुनरथागत्य बहुशः पुत्रकारणात्

pūjāṃ tu vipulāṃ kṛtvā devī putramayācata | punaḥ punarathāgatya bahuśaḥ putrakāraṇāt

हिन्दी अर्थ

त्रहाँ जाकर बड़े विस्तारके साथ पूजा करके देवी सुयशाने निकुम्भसे पुत्रके लिये याचना की। उन्होंने बारम्बार भाकर पूजन किया और अनेक बार पुत्रके लिये प्रार्थना की

अध्याय 29

श्लोक 54

न प्रयच्छति पुत्रं हि निकुम्भः कारणेन हि ।राजा तु यदि नः कुप्येत्कार्यसिद्धिस्ततो भवेत्

na prayacchati putraṃ hi nikumbhaḥ kāraṇena hi | rājā tu yadi naḥ kupyetkāryasiddhistato bhavet

हिन्दी अर्थ

परंतु निकुम्भ कारणवश उन्हें पुत्र नहीं देते थे । उन्होंने सोचा—* यदि राजा किसी तरह हमपर कुपित ही जाय तो हमारा काम बन जाय'

अध्याय 29

श्लोक 55

अथ दीर्घेण कालेन क्रोधो राजानमाविशत् ।भूत एष महान्द्वारि नागराणां प्रयच्छति

atha dīrgheṇa kālena krodho rājānamāviśat | bhūta eṣa mahāndvāri nāgarāṇāṃ prayacchati

श्लोक 55–58 का हिन्दी अर्थ

तदनन्तर रीर्घकालके पश्चात्‌ राजाके मनमें क्रोध हुआ। वे सोचने नगे—' मेरे नगरके द्वारपर बैठा हुआ यह महान्‌ भूत प्रसन्न होकर नागरिकोंको सैकड़ों प्रकारके वर देता है, परंतु तुझे क्यों नहीं देता ? सदा मेरी ही नगरीमें, मेरे ही लोग सकी नित्य पूजा करते हैं। मैंने भी देवीको पुत्र प्रदान केरनेके लिये बार-बार निवेदन किया; परंतु यह कृतध्न त जाने किस कारणसे मुझे पुत्र नहीं दे रहा है। अतः अब यह विशेषत: मुझसे सत्कार पानेके योग्य नहीं हा। इसलिये इस दुरात्माके स्थानका मैं नाश कर ूँगा'

अध्याय 29

श्लोक 56

प्रीतो वरान् वै शतशो मम किं न प्रयच्छति ।मामकैः पूज्यते नित्यं नगर्यां मे सदैव हि

prīto varān vai śataśo mama kiṃ na prayacchati | māmakaiḥ pūjyate nityaṃ nagaryāṃ me sadaiva hi

अर्थ श्लोक 55 के साथ

अध्याय 29

श्लोक 57

विज्ञापितो मयात्यर्थं देव्या मे पुत्रकारणात् ।न ददाति च पुत्रं मे कृतघ्नः केन हेतुना

vijñāpito mayātyarthaṃ devyā me putrakāraṇāt | na dadāti ca putraṃ me kṛtaghnaḥ kena hetunā

अर्थ श्लोक 55 के साथ

अध्याय 29

श्लोक 58

ततो नार्हति सत्कारं मत्सकाशाद् विशेषतः ।तस्मात्तु नाशयिष्यामि स्थानमस्य दुरात्मनः

tato nārhati satkāraṃ matsakāśād viśeṣataḥ | tasmāttu nāśayiṣyāmi sthānamasya durātmanaḥ

अर्थ श्लोक 55 के साथ

अध्याय 29

श्लोक 59

एवं स तु विनिश्चित्य दुरात्मा राजकिल्बिषी ।स्थानं गणपतेस्तस्य नाशयामास दुर्मतिः

evaṃ sa tu viniścitya durātmā rājakilbiṣī | sthānaṃ gaṇapatestasya nāśayāmāsa durmatiḥ

हिन्दी अर्थ

ऐसा निश्चय करके दुरात्मा, दुर्बुद्धि एवं पापी राजाने गणपति निकुम्भके उस स्थानको नष्ट करा दिया

अध्याय 29

श्लोक 60

भग्नमायतन दृष्ट्वा राजानमशपत् प्रभुः ।यस्मादनपराधस्य त्वया स्थानं विनाशितम् ।पुर्यकस्मादियं शून्या तव नूनं भविष्यति

bhagnamāyatana dṛṣṭvā rājānamaśapat prabhuḥ | yasmādanaparādhasya tvayā sthānaṃ vināśitam | puryakasmādiyaṃ śūnyā tava nūnaṃ bhaviṣyati

हिन्दी अर्थ

गो अपने वासस्थानको भग्र हुआ देख भगवान्‌ निकुम्भने राजाको शाप देते हुए कहा-' राजन्‌ ! तुमने बिना किसी अपराधके मेरे स्थानको नष्ट कराया है, इसलिये निश्चय ही तुम्हारी यह नगरी अकस्मात्‌ जनशून्य हो जायगी'

अध्याय 29

श्लोक 61

ततस्तेन तु शापेन शून्या वाराणसी तदा ।शप्त्वा पुरीं निकुम्भस्तु महादेवमथागमत्

tatastena tu śāpena śūnyā vārāṇasī tadā | śaptvā purīṃ nikumbhastu mahādevamathāgamat

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर उस शापसे उस समय वाराणसीपुरी सूनी हो गयी। उस पुरीको शाप देकर निकुम्भ महादेवजीके पास चले गये

अध्याय 29

श्लोक 62

अकस्मात्तु पुरी सा तु विद्रुता सर्वतोदिशम् ।तस्यां पुर्यां ततो देवो निर्ममे पदमात्मनः

akasmāttu purī sā tu vidrutā sarvatodiśam | tasyāṃ puryāṃ tato devo nirmame padamātmanaḥ

हिन्दी अर्थ

वाराणसीमें रहनेवाले सब लोग अकस्मात्‌ सम्पूर्ण दिशाओंमें भाग गये। तब महादेवजीने उस पुरीमें अपना निवास-स्थान बनाया

अध्याय 29

श्लोक 63

रमते तत्र वै देवो रममाणो गिरेः सुताम् ।न रतिं तत्र वै देवी लभते गृहविस्मयात् ।वसाम्यत्र न पुर्यां तु देवी देवमथाब्रवीत्

ramate tatra vai devo ramamāṇo gireḥ sutām | na ratiṃ tatra vai devī labhate gṛhavismayāt | vasāmyatra na puryāṃ tu devī devamathābravīt

हिन्दी अर्थ

फिर वे भगवान्‌ शिव गिरिराजनन्दिनी उमाका मनोरझन करते हुए वहाँ आनन्दपूर्वक रहने लगे। परंतु देवी पार्वतीका मन वहाँ नहीं लगता था, क्योंकि वहाँ कोई निश्चित गृह न होनेसे वे विस्मयमें पड़ी रहती थीं। (अथवा पिताके घरके लिये उत्कण्ठित होनेके कारण देवीको वहाँ प्रसन्नता नहीं प्रात होती थी ।) उन्होंने महादेवजीसे कहा-' भगवन्‌ ! मैं इस पुरीमें नहीं रहूँगी (आप मेरे घरको चलिये) '

अध्याय 29

श्लोक 64

नाहं वेश्मनि वत्स्यामि अविमुक्तं हि मे गृहम् ।नाहं तत्र गमिष्यामि गच्छ देवि गृहं प्रति

nāhaṃ veśmani vatsyāmi avimuktaṃ hi me gṛham | nāhaṃ tatra gamiṣyāmi gaccha devi gṛhaṃ prati

हिन्दी अर्थ

महादेवजी बोले—देवि! मैं और किसी घरमें नहीं रहूँगा। यह अविमुक्त क्षेत्र ही मेरा घर है। अतः मैं वहाँ नहीं चलूँगा। तुम जाना चाहो तो अपने उस घरको जाओ

अध्याय 29

श्लोक 65

सन्नुवाच भगवांस्त्र्यन्तकस्त्रिपुरान्तकः ।तस्मात् तदविमुक्तं हि प्रोक्तं देवेन वै स्वयम्

sannuvāca bhagavāṃstryantakastripurāntakaḥ | tasmāt tadavimuktaṃ hi proktaṃ devena vai svayam

श्लोक 65–66 का हिन्दी अर्थ

त्रिपुरोंका विनाश करनेवाले त्रिनेत्रधारी भगवान्‌ शिवने हँसते हुए पूर्वाक्त बात कही थी। महादेवजीने स्वयं ही उस क्षेत्रको अविमुक्त कहा था, इसलिये वह अविमुक्त नामसे प्रसिद्ध हो गया। इस तरह वाराणसीपुरीको शाप प्राप्त हुआ और उसे अविमुक्त क्षेत्र कहा गया

अध्याय 29

श्लोक 66

एवं वाराणसी शप्ता अविमुक्तं च कीर्तितम्

evaṃ vārāṇasī śaptā avimuktaṃ ca kīrtitam

अर्थ श्लोक 65 के साथ

अध्याय 29

श्लोक 67

यस्मिन् वसति वै देवः सर्वदेवनमस्कृतः ।युगेषु त्रिषु धर्मात्मा सह देव्या महेश्वरः

yasmin vasati vai devaḥ sarvadevanamaskṛtaḥ | yugeṣu triṣu dharmātmā saha devyā maheśvaraḥ

हिन्दी अर्थ

सर्वदेववन्दित धर्मात्मा देव महेश्वर सत्ययुग आदि तीन युगोंमें देवी पार्वतीके साथ उस अविमुक्त क्षेत्रमें प्रत्यक्ष निवास करते हैं

अध्याय 29

श्लोक 68

अन्तर्धानं कलौ याति तत्पुरं हि महात्मनः ।अन्तर्हिते पुरे तस्मिन् पुरी सा वसते पुनः ।एवं वाराणसी शप्ता निवेशं पुनरागता

antardhānaṃ kalau yāti tatpuraṃ hi mahātmanaḥ | antarhite pure tasmin purī sā vasate punaḥ | evaṃ vārāṇasī śaptā niveśaṃ punarāgatā

हिन्दी अर्थ

कलियुग आनेपर महात्मा महादेवजीका वह नगर अदृश्य हो जाता है। उसके अदृश्य हो जानेपर वाराणसीपुरी फिरसे बसती है। इस प्रकार वाराणसी नगरी शापग्रस्त होकर उजड़ी और पुन: बसी थी

अध्याय 29

श्लोक 69

भद्रश्रेण्यस्य पुत्रो वै दुर्दमो नाम विश्रुतः ।दिवोदासेन बालेति घृणया स विवर्जितः

bhadraśreṇyasya putro vai durdamo nāma viśrutaḥ | divodāsena bāleti ghṛṇayā sa vivarjitaḥ

हिन्दी अर्थ

भद्रश्रेण्यका एक पुत्र दुर्दम नामसे विख्यात था। दिवोदासने उसे बालक समझकर दयावश जीवित छोड़ दिया था

अध्याय 29

श्लोक 70

हैहयस्य तु दायाद्यं कृतवान् वै महीपतिः ।आजह्रे पितृदायाद्यं दिवोदासहृतं बलात्

haihayasya tu dāyādyaṃ kṛtavān vai mahīpatiḥ | ājahre pitṛdāyādyaṃ divodāsahṛtaṃ balāt

हिन्दी अर्थ

उस राजाने हैहयका पुत्र होना स्वीकार किया और उन्हींकी सहायतासे उसने दिवोदासद्वारा बलपूर्वक अपहत हुई अपनी पैतृक सम्पत्तिको फिर वापस लौटाया

अध्याय 29

श्लोक 71

भद्रश्रेण्यस्य पुत्रेण दुर्दमेन महात्मना ।वैरस्यान्तं महाराज क्षत्रियेण विधित्सता

bhadraśreṇyasya putreṇa durdamena mahātmanā | vairasyāntaṃ mahārāja kṣatriyeṇa vidhitsatā

हिन्दी अर्थ

महाराज! भद्रश्रेण्यका महामनस्वी पुत्र दुर्दम एक वीर क्षत्रिय था। उसने वैरका बदला लेनेके लिये ही वैसा किया था

अध्याय 29

श्लोक 72

दिवोदासाद् दृषद्वत्यां वीरो जज्ञे प्रतर्दनः ।तेन पुत्रेण बालेन प्रहतं तस्य वै पुनः

divodāsād dṛṣadvatyāṃ vīro jajñe pratardanaḥ | tena putreṇa bālena prahataṃ tasya vai punaḥ

हिन्दी अर्थ

दिवोदासके द्वारा उनकी पत्नी दृषद्वतीके गर्भसे वीर प्रतर्दनका जन्म हुआ। उस राजकुमारने बालक होनेपर भी दुर्दमसे पुन: राज्य छीन लिया

अध्याय 29

श्लोक 73

प्रतर्दनस्य पुत्रौ द्वौ वत्सभार्गौ बभूवतुः ।वत्सपुत्रो ह्यलर्कस्तु सन्नतिस्तस्य चात्मजः

pratardanasya putrau dvau vatsabhārgau babhūvatuḥ | vatsaputro hyalarkastu sannatistasya cātmajaḥ

हिन्दी अर्थ

प्रतर्दनके दो पुत्र थे-वत्स और भार्ग। वत्सके पुत्र अलर्क और अलर्कके संनति हुए

अध्याय 29

श्लोक 74

अलर्कः काशिराजस्तु ब्रह्मण्यः सत्यसङ्गरः ।अलर्कं प्रति राजर्षि श्लोको गीतः पुरातनैः

alarkaḥ kāśirājastu brahmaṇyaḥ satyasaṅgaraḥ | alarkaṃ prati rājarṣi śloko gītaḥ purātanaiḥ

हिन्दी अर्थ

काशिराज अलर्क बड़े ब्राह्मणभक्त और सत्यप्रतिज्ञ थे। राजर्षि अलर्कके विषयमें प्राचीन पुरुषोंने निम्नाड्डित श्लोकका गान किया है

अध्याय 29

श्लोक 76

षष्टिवर्षसहस्राणि षष्टिं वर्षशतानि च ।युवा रूपेण सम्पन्न आसीत् काशिकुलोद्वहः ॥ लोपामुद्राप्रसादेन परमायुरवाप सः ।तस्यासीत् सुमहद्राज्यं रूपयौवनशालिनः

ṣaṣṭivarṣasahasrāṇi ṣaṣṭiṃ varṣaśatāni ca | yuvā rūpeṇa sampanna āsīt kāśikulodvahaḥ || lopāmudrāprasādena paramāyuravāpa saḥ | tasyāsīt sumahadrājyaṃ rūpayauvanaśālinaḥ

हिन्दी अर्थ

उन्होंने लोपामुद्राकी कृपासे उत्तम आयु प्राप्त की थी। रूप और युवावस्थासे सुशोभित होनेवाले अलर्कका राज्य बहुत विशाल था

अध्याय 29

श्लोक 77

शापस्यान्ते महाबाहुर्हत्वा क्षेमकराक्षसम् ।रम्यां निवेशयामास पुरीं वाराणसीं पुनः

śāpasyānte mahābāhurhatvā kṣemakarākṣasam | ramyāṃ niveśayāmāsa purīṃ vārāṇasīṃ punaḥ

हिन्दी अर्थ

महाबाहु अलर्कने निकुम्भके शापका अन्त होनेपर क्षेमक नामक राक्षसको मारकर पुनः रमणीय वाराणसीपुरी बसायी थी

अध्याय 29

श्लोक 78

सन्नतेरपि दायादः सुनीथो नाम धार्मिकः ।सुनीथस्य तु दायादः क्षेम्यो नाम महायशाः

sannaterapi dāyādaḥ sunītho nāma dhārmikaḥ | sunīthasya tu dāyādaḥ kṣemyo nāma mahāyaśāḥ

हिन्दी अर्थ

संनतिके पुत्र धर्मात्सा सुनीथ हुए और सुनीथका महायशस्वी पुत्र क्षेम्य नामसे प्रसिद्ध हुआ

अध्याय 29

श्लोक 79

क्षेम्यस्य केतुमान्पुत्रः सुकेतुस्तस्य चात्मजः ।सुकेतोस्तनयश्चापि धर्मकेतुरिति स्मृतः

kṣemyasya ketumānputraḥ suketustasya cātmajaḥ | suketostanayaścāpi dharmaketuriti smṛtaḥ

हिन्दी अर्थ

क्षेम्यके पुत्र केतुमान्‌, केतुमान्‌के पुत्र सुकेतु और सुकेतुके भी पुत्र धर्मकेतु हुए

अध्याय 29

श्लोक 80

धर्मकेतोस्तु दायादः सत्यकेतुर्महारथः ।सत्यकेतुसुतश्चापि विभुर्नाम प्रजेश्वरः

dharmaketostu dāyādaḥ satyaketurmahārathaḥ | satyaketusutaścāpi vibhurnāma prajeśvaraḥ

हिन्दी अर्थ

धर्मकेतुके पुत्र महारथी सत्यकेतु हुए और सत्यकेतुके पुत्र प्रजापालक विभु हुए

अध्याय 29

श्लोक 81

आनर्तस्तु विभोः पुत्रः सुकुमारस्तु तत्सुतः ।सुकुमारस्य पुत्रस्तु धृष्टकेतुः सुधार्मिकः ।धृष्टकेतोस्तु दायादो वेणुहोत्रः प्रजेश्वरः

ānartastu vibhoḥ putraḥ sukumārastu tatsutaḥ | sukumārasya putrastu dhṛṣṭaketuḥ sudhārmikaḥ | dhṛṣṭaketostu dāyādo veṇuhotraḥ prajeśvaraḥ

हिन्दी अर्थ

विभुके पुत्रका नाम आनर्त था। आनर्तका पुत्र सुकुमार हुआ। सुकुमारके पुत्र परम धर्मात्मा धृष्टकेतु हुए और धृष्टकेतुके पुत्र राजा वेणुहोत्र थे

अध्याय 29

श्लोक 82

वेणुहोत्रसुतश्चापि भर्गो नाम प्रजेश्वरः ।वत्सस्य वत्सभूमिस्तु भृगुभूमिस्तु भार्गवात्

veṇuhotrasutaścāpi bhargo nāma prajeśvaraḥ | vatsasya vatsabhūmistu bhṛgubhūmistu bhārgavāt

हिन्दी अर्थ

वेणुहोत्रका पुत्र राजा भर्गके नामसे विख्यात हुआ। प्रतर्दनके जो वत्स और भार्ग नामक दो पुत्र बतलाये गये हैं, उनमेंसे वत्सके वत्सभूमि तथा भार्गके भृगुभूमि नामक पुत्र हुए

अध्याय 29

श्लोक 83

एते त्वङ्गिरसः पुत्रा जाता वंशेऽथ भार्गवे ।ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्यास्तयोः पुत्राः सहस्रशः ।इत्येते काशयः प्रोक्ता नहुषस्य निबोध मे

ete tvaṅgirasaḥ putrā jātā vaṃśe'tha bhārgave | brāhmaṇāḥ kṣatriyā vaiśyāstayoḥ putrāḥ sahasraśaḥ | ityete kāśayaḥ proktā nahuṣasya nibodha me

हिन्दी अर्थ

ये अद्धिरगोत्री गालवके वंशज हैं, जो भार्गववंशमें उत्पन्न हुए। इनमें ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य—तीनों वर्णोंके लोग हैं। वत्सभूमि और भृगुभूमिके सहसत्रों पुत्र कहे गये हैं। इस प्रकार ये राजा काशिके कुलमें उत्पन्न हुए क्षत्रिय बताये गये हैं। अब तुम मुझसे नहुषकी संतानोंका वर्णन सुनो

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.