Harivamsha Purana
28
अध्याय 28 / 318

Parva 1, Adhyāya 28

36 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ36 श्लोक

अध्याय 28

श्लोक 1

राजा रजि और उनके पुत्रों का चरित्र, इन्द्र का अपने स्थान से भ्रष्ट होकर पुनः उस पर प्रतिष्ठित होना आयोः पुत्रास्तथा पञ्च सर्वे वीरा महारथाः ।स्वर्भानुतनयायां च प्रभायां जज्ञिरे नृप

rājā raji aura unake putroṃ kā caritra, indra kā apane sthāna se bhraṣṭa hokara punaḥ usa para pratiṣṭhita honā āyoḥ putrāstathā pañca sarve vīrā mahārathāḥ | svarbhānutanayāyāṃ ca prabhāyāṃ jajñire nṛpa

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—नरेधर ! स्वर्भानुकुमारी प्रभा आयुकी पत्नी थी। उसके गर्भसे आयुके पाँच पुत्र उत्पन्न हुए, जो सब-के-सब वीर और महारथी थे

अध्याय 28

श्लोक 2

नहुषः प्रथमं जज्ञे वृद्धशर्मा ततः परम् ।रम्भो रजिरनेनाश्च त्रिषु लोकेषु विश्रुताः

nahuṣaḥ prathamaṃ jajñe vṛddhaśarmā tataḥ param | rambho rajiranenāśca triṣu lokeṣu viśrutāḥ

हिन्दी अर्थ

उनमें सबसे पहले नहुषका जन्म हुआ । तत्पश्चात्‌ वृद्धशर्मा उत्पन्न हुए। तदनन्तर क्रमश: रम्भ, रजि और अनेना प्रकट हुए। ये तीनों लोकोंमें विख्यात थे

अध्याय 28

श्लोक 3

रजिः पुत्रशतानीह जनयामास पञ्च वै ।राजेयमिति विख्यातं क्षत्रमिन्द्रभयावहम्

rajiḥ putraśatānīha janayāmāsa pañca vai | rājeyamiti vikhyātaṃ kṣatramindrabhayāvaham

हिन्दी अर्थ

श्द्दे रजिने पाँच सौ पुत्रोंको जन्म दिया। वे सभी क्षत्रिय राजेय नामसे विख्यात हुए। उनसे इन्द्र भी डरते थे

अध्याय 28

श्लोक 4

यत्र देवासुरे युद्धे समुत्पन्ने सुदारुणे ।देवाश्चैवासुराश्चैव पितामहमथाब्रुवन्

yatra devāsure yuddhe samutpanne sudāruṇe | devāścaivāsurāścaiva pitāmahamathābruvan

श्लोक 4–5 का हिन्दी अर्थ

पूर्वकालमें देवताओं तथा असुरोंमें अत्यन्त भयंकर युद्ध आरम्भ होनेपर उन दोनों पक्षोंके लोगोंने पितामह ब्रह्माजीसे पूछा—' भगवन्‌ ! सर्वभूतेश्वर ! बताइये, हम दोनोंके युद्धमें कौन विजयी होगा ? हम इस विषयमें आपकी यथार्थ बात सुनना चाहते हैं'

अध्याय 28

श्लोक 5

आवयोर्भगवन् युद्धे को विजेता भविष्यति ।ब्रूहि नः सर्वभूतेश श्रोतुमिच्छामि ते वचः

āvayorbhagavan yuddhe ko vijetā bhaviṣyati | brūhi naḥ sarvabhūteśa śrotumicchāmi te vacaḥ

अर्थ श्लोक 4 के साथ

अध्याय 28

श्लोक 6

ब्रह्मोवाच ।येषामर्थाय सङ्ग्रामे रजिरात्तायुधः प्रभुः ।योत्स्यते ते जयिष्यन्ति त्रींल्लोकान्नात्र संशयः

brahmovāca | yeṣāmarthāya saṅgrāme rajirāttāyudhaḥ prabhuḥ | yotsyate te jayiṣyanti trīṃllokānnātra saṃśayaḥ

हिन्दी अर्थ

ब्रह्माजीने कहा—शक्तिशाली राजा रजि हाथमें हथियार लेकर जिनके लिये संग्रामभूमिमें खड़े हो युद्ध करेंगे, वे तीनों लोकोंपर विजय प्राप्त कर लेंगे। इसमें संशय नहीं है

अध्याय 28

श्लोक 7

यतो रजिर्धृतिस्तत्र श्रीश्च तत्र यतो धृतिः ।यतो धृतिश्च श्रीश्चैव धर्मस्तत्र जयस्तथा

yato rajirdhṛtistatra śrīśca tatra yato dhṛtiḥ | yato dhṛtiśca śrīścaiva dharmastatra jayastathā

हिन्दी अर्थ

जिस पक्षमें रजि हैं, उधर ही धृति है जहाँ धृति है वहीं लक्ष्मी है तथा जहाँ धृति और लक्ष्मी हैं वहीं धर्म एवं विजय है

English

⁹³ An object of immolation.

अध्याय 28

श्लोक 8

ते देवदानवाः प्रीता देवेनोक्ता रजेर्जये ।अभ्ययुर्जयमिच्छन्तो वृण्वाना भरतर्षभ

te devadānavāḥ prītā devenoktā rajerjaye | abhyayurjayamicchanto vṛṇvānā bharatarṣabha

हिन्दी अर्थ

भरतकुलभूषण जनमेजय! रजिकी विजयके विषयमें ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर देवता और दानव प्रसन्न हो अपनी-अपनी विजय चाहते हुए रजिका वरण करनेके लिये उनके पास गये

अध्याय 28

श्लोक 9

स हि स्वर्भानुदौहित्रः प्रभायां समपद्यत ।राजा परमतेजस्वी सोमवंशप्रवर्धनः

sa hi svarbhānudauhitraḥ prabhāyāṃ samapadyata | rājā paramatejasvī somavaṃśapravardhanaḥ

हिन्दी अर्थ

वे राहुके दौहित्र थे। राहुकी पुत्री प्रभाके गर्भसे उनका जन्म हुआ था। सोमवंशकी वृद्धि करनेवाले वे राजा रजि बड़े तेजस्वी थे

English

⁹³ An object of immolation.

अध्याय 28

श्लोक 10

ते हृष्टमनसः सर्वे रजिं देवाश्च दानवाः ।ऊचुरस्मज्जयाय त्वं गृहाण वरकार्मुकम्

te hṛṣṭamanasaḥ sarve rajiṃ devāśca dānavāḥ | ūcurasmajjayāya tvaṃ gṛhāṇa varakārmukam

हिन्दी अर्थ

समस्त देवता और दानव दोनों प्रसन्नचित्त हो रजिके पास जाकर बोले—धारण कीजिये '

अध्याय 28

श्लोक 11

अथोवाच रजिस्तत्र तयोर्वै देवदैत्ययोः ।स्वार्थज्ञः स्वार्थमुद्दिश्य यशः स्वं च प्रकाशयन्

athovāca rajistatra tayorvai devadaityayoḥ | svārthajñaḥ svārthamuddiśya yaśaḥ svaṃ ca prakāśayan

हिन्दी अर्थ

तब स्वार्धको समझनेवाले रजिने वहाँ स्वार्थको सामने रखकर अपने यशको प्रकाशमें लाते हुए देवता और दानव दोनों पक्षके लोगोंसे कहा

English

⁹³ An object of immolation.

अध्याय 28

श्लोक 12

यदि दैत्यगणान् सर्वाञ्जित्वा शक्रपुरोगमाः ।इन्द्रो भवामि धर्मेण ततो योत्स्यामि संयुगे

yadi daityagaṇān sarvāñjitvā śakrapurogamāḥ | indro bhavāmi dharmeṇa tato yotsyāmi saṃyuge

हिन्दी अर्थ

रजि बोले—इन्द्रादि देवताओ! यदि मैं समस्त दैत्योंको जीतकर धर्मत: इन्द्र हो सकूँ तो तुम्हारी ओरसे रणभूमिमें युद्ध करूँगा

अध्याय 28

श्लोक 13

देवाः प्रथमतो भूयः प्रत्यूचुर्दृष्टमानसाः ।एवं यथेष्टं नृपते कामः सम्पद्यतां तव

devāḥ prathamato bhūyaḥ pratyūcurdṛṣṭamānasāḥ | evaṃ yatheṣṭaṃ nṛpate kāmaḥ sampadyatāṃ tava

हिन्दी अर्थ

यह सुनकर देवताओंने फिर प्रसन्नचित्त हो पहले ही उत्तर दिया—' नरेश्वर ! ऐसा ही होगा। तुम्हारी अभीष्ट कामना पूर्ण हो'

अध्याय 28

श्लोक 14

श्रुत्वा सुरगणानां तु वाक्यं राजा रजिस्तदा ।पप्रच्छासुरमुख्यांस्तु यथा देवानपृच्छत

śrutvā suragaṇānāṃ tu vākyaṃ rājā rajistadā | papracchāsuramukhyāṃstu yathā devānapṛcchata

हिन्दी अर्थ

देवताओंकी यह बात सुनकर उस समय राजा रजिने मुख्य-मुख्य असुरोंसे भी वैसी ही बात पूछी जैसी देवताओंसे पूछी थी

English

⁹³ An object of immolation.

अध्याय 28

श्लोक 16

दानवा दर्पपूर्णास्तु स्वार्थमेवानुगम्य ह ।प्रत्यूचुस्ते नृपवरं साभिमानमिदं वचः १५॥ अस्माकमिन्द्रः प्रह्लादो यस्यार्थे विजयामहे ।अस्मिंस्तु समये राजंस्तिष्ठेथा राजसत्तम

dānavā darpapūrṇāstu svārthamevānugamya ha | pratyūcuste nṛpavaraṃ sābhimānamidaṃ vacaḥ 15|| asmākamindraḥ prahlādo yasyārthe vijayāmahe | asmiṃstu samaye rājaṃstiṣṭhethā rājasattama

हिन्दी अर्थ

राजशिरोमणे ! हमारे इन्द्र तो प्रह्नाद ही हैं, जिनके लिये हम विजय प्रास करना चाहते हैं। राजन्‌! आपको इसी शर्तपर हमारे पक्षमें खड़ा होना चाहिये

अध्याय 28

श्लोक 17

तथेति ब्रुवन्नेव देवैरप्यभिचोदितः ।भविष्यसीन्द्रो जित्वैवं देवैरुक्तस्तु पार्थिवः ।जघान दानवान् सर्वान् ये वध्या वज्रपाणिनः

tatheti bruvanneva devairapyabhicoditaḥ | bhaviṣyasīndro jitvaivaṃ devairuktastu pārthivaḥ | jaghāna dānavān sarvān ye vadhyā vajrapāṇinaḥ

हिन्दी अर्थ

वे बहुत अच्छा' कहकर असुरोंकी बात मानना चाहते थे कि देवताओंने फिर उन्हें अपने पक्षमें मानेके लिये प्रेरणा देते हुए कहा—'राजन्‌! तुम इस कार विजय पाकर हमारे इन्द्र हो जाओगे।' देवताओंके सा कहनेपर राजा रजिने उन समस्त दानवोंका संहार र डाला, जो वज्पाणि इन्द्रके द्वारा मारे जाने योग्य

अध्याय 28

श्लोक 18

स विप्रणष्टां देवानां परमश्रीः श्रियं वशी ।निहत्य दानवान् सर्वानाजहार रजिः प्रभुः

sa vipraṇaṣṭāṃ devānāṃ paramaśrīḥ śriyaṃ vaśī | nihatya dānavān sarvānājahāra rajiḥ prabhuḥ

हिन्दी अर्थ

मनको वशमें रखनेवाले परमकान्तिमान्‌ एवं किशाली राजा रजिने समस्त दानवोंका संहार करके 'वताओंकी रटोयी हुई सम्पत्तिको फिर वापस ला दया

अध्याय 28

श्लोक 19

ततो रजिं महावीर्यं देवैः सह शतक्रतुः ।रजेः पुत्रोऽहमित्युक्त्वा पुनरेवाब्रवीद्वचः

tato rajiṃ mahāvīryaṃ devaiḥ saha śatakratuḥ | rajeḥ putro'hamityuktvā punarevābravīdvacaḥ

हिन्दी अर्थ

तब देवताओंसहित इन्द्रने अपनेको रजिका त्र बताकर उन महापराक्रमी रजिसे पुन: इस प्रकार हा—

अध्याय 28

श्लोक 20

इन्द्रोऽसि तात देवानां सर्वेषां नात्र संशयः ।यस्याहमिन्द्रः पुत्रस्ते ख्यातिं यास्यामि कर्मभिः

indro'si tāta devānāṃ sarveṣāṃ nātra saṃśayaḥ | yasyāhamindraḥ putraste khyātiṃ yāsyāmi karmabhiḥ

हिन्दी अर्थ

तात! आप हम सब देवताओंके इन्द्र हैं, समें संशय नहीं है; क्योंकि मैं इन्द्र आजसे आपके इन गीरोचित कर्मोद्धारा अनुगृहीत हो आपका पुत्र कहलाऊँगा। भापके पुत्ररूपमें ही मेरी ख्याति होगी

अध्याय 28

श्लोक 21

स तु शक्रवचः श्रुत्वा वञ्चितस्तेन मायया ।तथेत्येवाब्रवीद् राजा प्रीयमाणः शतक्रतुम्

sa tu śakravacaḥ śrutvā vañcitastena māyayā | tathetyevābravīd rājā prīyamāṇaḥ śatakratum

हिन्दी अर्थ

इन्द्रकी हह बात सुनकर उनकी मायासे वद्चित हो महाराज जिने 'तथास्तु' कह दिया। वे इन्द्रपर बहुत प्रसन्न पे

English

⁹³ An object of immolation.

अध्याय 28

श्लोक 22

तस्मिंस्तु देवसदृशे दिवं प्रान्ते महीपतौ ।दायाद्यमिन्द्रादाजह्रुराचारात् तनया रजेः

tasmiṃstu devasadṛśe divaṃ prānte mahīpatau | dāyādyamindrādājahrurācārāt tanayā rajeḥ

हिन्दी अर्थ

उन देवोपम भूपाल रजिके ब्रह्मलोकवासी हो न्नानेपर उनके पुत्रोंने लोकव्यवहारके अनुसार इन्द्रसे भपना दायभाग माँगा और बलपूर्वक ले लिया

अध्याय 28

श्लोक 23

पञ्चपुत्रशतान्यस्य तद्वै स्थानं शतक्रतोः ।समाक्रमन्त बहुधा स्वर्गलोकं त्रिविष्टपम्

pañcaputraśatānyasya tadvai sthānaṃ śatakratoḥ | samākramanta bahudhā svargalokaṃ triviṣṭapam

हिन्दी अर्थ

जिके पाँच सौ पुत्र थे। उन्होंने इन्द्रके त्रिविष्टप नामसे सिद्ध स्वर्गलोकपर बारम्बार आक्रमण करके उसे ले लया

अध्याय 28

श्लोक 24

ततो बहुतिथे काले समतीते महाबलः ।हृतराज्योऽब्रवीच्छक्रो हृतभागो बृहस्पतिम्

tato bahutithe kāle samatīte mahābalaḥ | hṛtarājyo'bravīcchakro hṛtabhāgo bṛhaspatim

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर बहुत समय बीत जानेपर राज्य और यज्ञभागसे वद्चित हो अत्यन्त दुर्बल हुए इन्द्रने एक देन एकान्तमें बृहस्पतिजीसे कहा

English

⁹³ An object of immolation.

अध्याय 28

श्लोक 25

बदरीफलमात्रं वै पुरोडाशं विधत्स्व मे ।ब्रह्मर्षे येन तिष्ठेयं तेजसाऽऽप्यायितः सदा

badarīphalamātraṃ vai puroḍāśaṃ vidhatsva me | brahmarṣe yena tiṣṭheyaṃ tejasā''pyāyitaḥ sadā

हिन्दी अर्थ

इन्द्र बोले—ब्रह्मणें! आप एक बेरके बराबर भी पुरोडाशखण्डकी व्यवस्था मेरे लिये कर दें, जिससे मैं भी पदा तेजसे परिपुष्ट होता रहूँ

English

⁹³ An object of immolation.

अध्याय 28

श्लोक 26

ब्रह्मन् कृशोऽहं विमना हृतराज्यो हृताशनः ।हृतौजा दुर्बलो मूढो रजिपुत्रैः कृतः प्रभो

brahman kṛśo'haṃ vimanā hṛtarājyo hṛtāśanaḥ | hṛtaujā durbalo mūḍho rajiputraiḥ kṛtaḥ prabho

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मन्‌ ! प्रभो ! रजिके पुत्रॉंने मेरा राज्य और भोजन छीनकर मुझे अत्यन्त कृश, खेन्नचित्त, हतोत्साह, दुर्बल एवं मूढ़ बना दिया है

अध्याय 28

श्लोक 27

यद्येवं चोदितः शक्र त्वयास्यां पूर्वमेव हि ।नाभविष्यस्यत्प्रियार्थमकर्तव्यं ममानघ

yadyevaṃ coditaḥ śakra tvayāsyāṃ pūrvameva hi | nābhaviṣyasyatpriyārthamakartavyaṃ mamānagha

हिन्दी अर्थ

खुहस्पतिजीने कहा—निष्पाप इन्द्र! यदि ऐसी बात है तो तुम्हें मुझसे पहले ही यह कहना चाहिये था। तुम्हारा प्रिय करनेके लिये ऐसा कोई कार्य नहीं है, जो मैं न कर सकूँ

अध्याय 28

श्लोक 28

प्रयतिष्यामि देवेन्द्र त्वत्प्रियार्थं न संशयः ।यथा भागं च राज्यं च नचिरात् प्रतिलप्स्यसे

prayatiṣyāmi devendra tvatpriyārthaṃ na saṃśayaḥ | yathā bhāgaṃ ca rājyaṃ ca nacirāt pratilapsyase

हिन्दी अर्थ

श्३५ देवेन्द्र ! मैं तुम्हारे प्रिय मनोरथकी सिद्धिके लिये निःसंदेह ऐसा प्रयत्न करूँगा, जिससे तुम अपना राज्य और यज्ञभाग शीघ्र प्रात्त कर लोगे

English

⁹³ An object of immolation.

अध्याय 28

श्लोक 29

तथा तात करिष्यामि मा भूत्ते विक्लवं मनः ।ततः कर्म चकारास्य तेजसो वर्धनं तदा

tathā tāta kariṣyāmi mā bhūtte viklavaṃ manaḥ | tataḥ karma cakārāsya tejaso vardhanaṃ tadā

हिन्दी अर्थ

तात! तुम जैसा चाहते हो वैसा ही करूँगा। तुम्हारा मन व्याकुल न हो। ऐसा कहकर बृहस्पतिजीने उस समय इन्द्रके तेजको बढ़ानेवाले कर्मका अनुष्ठान किया

अध्याय 28

श्लोक 30

तेषां च बुद्धिसम्मोहमकरोद् द्विजसत्तमः ।नास्तिवादार्थशास्त्रं हि धर्मविद्वेषणं परम्

teṣāṃ ca buddhisammohamakarod dvijasattamaḥ | nāstivādārthaśāstraṃ hi dharmavidveṣaṇaṃ param

हिन्दी अर्थ

द्विजश्रेष्ठ बृहस्पतिने रजिके पुत्रोंकी बुद्धिमें मोह उत्पन्न करनेके लिये ऐसे शास्त्रका निर्माण किया, जो नास्तिकवादसे परिपूर्ण तथा धर्मके प्रति अत्यन्त द्वेष उत्पन्न करनेवाला था

अध्याय 28

श्लोक 31

परमं तर्कशास्त्राणामसतां तन्मनोऽनुगम् ।न हि धर्मप्रधानानां रोचते तत्कथान्तरे

paramaṃ tarkaśāstrāṇāmasatāṃ tanmano'nugam | na hi dharmapradhānānāṃ rocate tatkathāntare

हिन्दी अर्थ

केवल तर्कके आधारपर अपने सिद्धान्तका प्रतिपादन करनेवाले शास्त्रों में वह उत्कृष्ट माना गया है। बृहस्पतिका वह नास्तिक दर्शन दुष्ट. पुरुषोंके ही मनको अधिक भाता है। धर्मप्रधान पुरुषोंको बातचीतके प्रसंगमें भी उसकी चर्चा नहीं सुहाती है

अध्याय 28

श्लोक 32

ते तद् बृहस्पतिकृतं शास्त्रं श्रुत्वाल्पचेतसः ।पूर्वोक्तधर्मशास्त्राणामभवन् द्वेषिणः सदा

te tad bṛhaspatikṛtaṃ śāstraṃ śrutvālpacetasaḥ | pūrvoktadharmaśāstrāṇāmabhavan dveṣiṇaḥ sadā

हिन्दी अर्थ

बृहस्पतिके उस शास्त्रको सुनकर वे मन्दबुद्धि रजिपुत्र पहलेके धर्मशास्त्रोंसे सदा द्वेष रखने लगे

English

⁹³ An object of immolation.

अध्याय 28

श्लोक 33

प्रवक्तुर्न्यायरहितं तन्मतं बहु मेनिरे ।तेनाधर्मेण ते पापाः सर्व एव क्षयं गताः

pravakturnyāyarahitaṃ tanmataṃ bahu menire | tenādharmeṇa te pāpāḥ sarva eva kṣayaṃ gatāḥ

हिन्दी अर्थ

वक्ताका वह न्यायरहित मत उन्हें बहुत उत्तम जान पड़ने लगा। उसी अधर्मसे वे सब पापी नष्ट हो गये

अध्याय 28

श्लोक 34

त्रैलोक्यराज्यं शक्रस्तु प्राप्य दुष्प्रापमेव च ।बृहस्पतिप्रसादाद्धि परां निर्वृतिमभ्ययात्

trailokyarājyaṃ śakrastu prāpya duṣprāpameva ca | bṛhaspatiprasādāddhi parāṃ nirvṛtimabhyayāt

हिन्दी अर्थ

इस तरह बृहस्पतिकी कृपासे त्रिलोकीका वह दुर्लभ राज्य पाकर इन्द्र बड़े प्रसन्न हुए

अध्याय 28

श्लोक 35

ते यदा तु सुसम्मूढा रागोन्मत्ता विधर्मिणः ।ब्रह्मद्विषश्च संवृत्ता हतवीर्यपराक्रमाः

te yadā tu susammūḍhā rāgonmattā vidharmiṇaḥ | brahmadviṣaśca saṃvṛttā hatavīryaparākramāḥ

श्लोक 35–36 का हिन्दी अर्थ

वे रजिके पुत्र जब नास्तिकवादका आश्रय ले विवेकशून्य, रागोन्मत्त, धर्मके विपरीत चलनेवाले, ब्रह्मद्रोही, शक्तिहीन और पराक्रमशून्य हो गये, तब काम-क्रोधमें तत्पर रहनेवाले उन समस्त रजिपुत्रोंको मारकर इन्द्रने देवताओंका ऐश्र्य और उत्तम स्थान प्राप्त कर लिया

अध्याय 28

श्लोक 36

ततो लेभे सुरैश्वर्यमिन्द्रः स्थानं तथोत्तमम् ।हत्वा रजिसुतान् सर्वान् कामक्रोधपरायणान्

tato lebhe suraiśvaryamindraḥ sthānaṃ tathottamam | hatvā rajisutān sarvān kāmakrodhaparāyaṇān

अर्थ श्लोक 35 के साथ

English

⁹³ An object of immolation.

अध्याय 28

श्लोक 37

य इदं च्यावनं स्थानात् प्रतिष्ठां च शतक्रतोः ।शृणुयाद् धारयेद्वापि न स दौरात्म्यमाप्नुयात्

ya idaṃ cyāvanaṃ sthānāt pratiṣṭhāṃ ca śatakratoḥ | śṛṇuyād dhārayedvāpi na sa daurātmyamāpnuyāt

हिन्दी अर्थ

जो इन्द्रके अपने स्थानसे भ्रष्ट होने और पुन: उसपर प्रतिष्ठित होनेके इस प्रसज्को सुनता और अपने हृदयमें धारण करता है, उसके मनमें कभी दुर्भावना नहीं आती

English

⁹³ An object of immolation.

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

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आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

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भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

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Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.