Harivamsha Purana
318
अध्याय 318 / 318

Parva 3, Adhyāya 135

17 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ17 श्लोक

अध्याय 318

श्लोक 1

हरिवंशश्रवणस्य दक्षिणा, फलं एवं माहात्म्यस्य वर्णनं हरिवंशे पुराणे तु श्रुते मुनिवरोत्तम ।किं फलं किं च देयं वै तद् ब्रूहि त्वं ममाग्रतः

harivaṃśaśravaṇasya dakṣiṇā, phalaṃ evaṃ māhātmyasya varṇanaṃ harivaṃśe purāṇe tu śrute munivarottama | kiṃ phalaṃ kiṃ ca deyaṃ vai tad brūhi tvaṃ mamāgrataḥ

हिन्दी अर्थ

शततमो 5ध्याय: “णणणणणाएणाण फल एवं माहात्म्यका वर्णन जनमेजयने पूछा—मुनिवरोत्तम! अब आप मेरे सामने यह बताइये कि हरिवंशपुराण सुन लेनेपर क्या । फल होता है और उस समय क्या दान देना चाहिये?

अध्याय 318

श्लोक 2

हरिवंशे पुराणे तु श्रुते च भरतोत्तम ।कायिकं वाचिकं चैव मनसा समुपार्जितम्

harivaṃśe purāṇe tu śrute ca bharatottama | kāyikaṃ vācikaṃ caiva manasā samupārjitam

श्लोक 2–6 का हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजीने कहा—भरतवंशशिरेमणे! हरिवंशपुराण । सुन लेनेपर शरीर, वाणी और मनके द्वारा उपार्जित सारे । पापोंका उसी प्रकार नाश हो जाता है, जैसे सूर्योदय रा. अन्धकार। अठारह पुराणोंके श्रवणसे जो फल प्राप्त होता है, उसे विष्णुभक्त पुरुष केवल हरिवंश सुनकर प्राप्त कर लेता है, इसमें संशय नहीं है। जो श्रद्धापूर्वक हरिवंशके आधे या चौथाई श्लोकको भी सुनते हैं, वे भगवान्‌ विष्णुके धाममें चले जाते हैं। राजन्‌ ! कलियुगमें जम्बूद्वीपका आश्रय लेकर रहनेवाले लोगोंमें इस ग्रन्थके श्रोता दुर्लभ हो जायँगे, यह मैं सत्य- सत्य कहता हूँ। पुत्रकी कामना रखनेवाली स्त्रियोंको भगवान्‌ विष्णुके सुयशसे भरे हुए इस ग्रन्थका अवश्य श्रवण करना चाहिये

अध्याय 318

श्लोक 3

तत् सर्वं नाशमायाति तमः सूर्योदये यथा ।अष्टादशपुराणानां श्रवणाद् यत्फलं भवेत्

tat sarvaṃ nāśamāyāti tamaḥ sūryodaye yathā | aṣṭādaśapurāṇānāṃ śravaṇād yatphalaṃ bhavet

अर्थ श्लोक 2 के साथ

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श्लोक 4

तत् फलं समवाप्नोति वैष्णवो नात्र संशयः ।श्लोकार्धं श्लोकपादं वा हरिवंशसमुद्भवम्

tat phalaṃ samavāpnoti vaiṣṇavo nātra saṃśayaḥ | ślokārdhaṃ ślokapādaṃ vā harivaṃśasamudbhavam

अर्थ श्लोक 2 के साथ

अध्याय 318

श्लोक 5

शृण्वन्ति श्रद्धया युक्ता वैष्णवं पदमाप्नुयुः ।जम्बूद्वीपं समाश्रित्य श्रोतारो दुर्लभाः कलौ

śṛṇvanti śraddhayā yuktā vaiṣṇavaṃ padamāpnuyuḥ | jambūdvīpaṃ samāśritya śrotāro durlabhāḥ kalau

अर्थ श्लोक 2 के साथ

अध्याय 318

श्लोक 6

भविष्यन्ति नरा राजन् सत्यं सत्यं वदाम्यहम् ।स्त्रीभिश्च पुत्रकामाभिः श्रोतव्यं वैष्णवं यशः

bhaviṣyanti narā rājan satyaṃ satyaṃ vadāmyaham | strībhiśca putrakāmābhiḥ śrotavyaṃ vaiṣṇavaṃ yaśaḥ

अर्थ श्लोक 2 के साथ

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श्लोक 7

दक्षिणा चात्र देया वै निष्कत्रयसुवर्णकम् ।वाचकाय यथाशक्त्या यथोक्तं फलमिच्छता

dakṣiṇā cātra deyā vai niṣkatrayasuvarṇakam | vācakāya yathāśaktyā yathoktaṃ phalamicchatā

हिन्दी अर्थ

जो शास्त्रोक्त फलको प्राप्त करनेकी इच्छा रखता हो, उस श्रोताको चाहिये कि वह अपनी शक्तिके अनुसार वाचकको हरिवंश सुननेकी दक्षिणाके रूपमें तीन निष्क सुवर्ण प्रदान करे

अध्याय 318

श्लोक 8

स्वर्णशृङ्गीं च कपिलां सवत्सां वस्त्रसंयुताम् ।वाचकाय प्रदद्याद् वै आत्मनः श्रेयकाङ्क्षया

svarṇaśṛṅgīṃ ca kapilāṃ savatsāṃ vastrasaṃyutām | vācakāya pradadyād vai ātmanaḥ śreyakāṅkṣayā

हिन्दी अर्थ

ब्दार्थकौस्तुभ ) अपने कल्याणकी इच्छासे वह वाचकको वस्त्र और छड़ेसहित एक कपिला गौ भी दे, जिसके सींगोंमें मोना मढ़ा हुआ हो

अध्याय 318

श्लोक 9

अलङ्कारं प्रदद्याच्च पाण्योर्वै भरतर्षभ ।कर्णस्याभरणं दद्याद् यानं च सविशेषतः

alaṅkāraṃ pradadyācca pāṇyorvai bharatarṣabha | karṇasyābharaṇaṃ dadyād yānaṃ ca saviśeṣataḥ

हिन्दी अर्थ

भरततश्रेष्ठ ! वह दोनों हाथोंके लिये अलंकार (कड़े, बाजूबन्द, अँगूठी आदि) भी दे था कानके आभूषण (कुण्डल आदि) भी अर्पित करे; विशेषत:, शिविका आदि कोई सवारी अवश्य दे

अध्याय 318

श्लोक 10

भूमिदानं समादद्याद् ब्राह्मणाय नराधिप ।भूमिदानसमं दानं न भूतं न भविष्यति

bhūmidānaṃ samādadyād brāhmaṇāya narādhipa | bhūmidānasamaṃ dānaṃ na bhūtaṃ na bhaviṣyati

हिन्दी अर्थ

रिधर! उसे ब्राह्मणके लिये भूमिका दान भी देना नाहिये; क्योंकि भूमिदानके समान दूसरा कोई दान न ही हुआ है और न होगा ही

अध्याय 318

श्लोक 11

शृणोति श्रावयेद् वापि हरिवंशं तु यो नरः ।सर्वथा पापनिर्मुक्तो वैष्णवं पदमाप्नुयात्

śṛṇoti śrāvayed vāpi harivaṃśaṃ tu yo naraḥ | sarvathā pāpanirmukto vaiṣṇavaṃ padamāpnuyāt

हिन्दी अर्थ

जो मनुष्य रिवंशको सुनता और सुनाता है, वह सब प्रकारसे पमुक्त होकर भगवान्‌ विष्णुके धामको प्राप्त कर लेता

अध्याय 318

श्लोक 12

पितॄनुद्धरते सर्वानेकादशसमुद्भवान् ।आत्मानं ससुतं चैव स्त्रियं च भरतर्षभ

pitṝnuddharate sarvānekādaśasamudbhavān | ātmānaṃ sasutaṃ caiva striyaṃ ca bharatarṣabha

हिन्दी अर्थ

भरतश्रेष्ठ! वह अपनी ग्यारह पीढ़ीके समस्त पतरोंका उद्धार कर देता है। साथ ही अपना, अपने ज्रका तथा अपनी पत्नीका भी उद्धार करता है

अध्याय 318

श्लोक 13

दशांशश्चात्र होमो वै कार्यः श्रोत्रा नराधिप ।इदं मया तवाग्रे च सर्वं प्रोक्तं नरर्षभ

daśāṃśaścātra homo vai kāryaḥ śrotrā narādhipa | idaṃ mayā tavāgre ca sarvaṃ proktaṃ nararṣabha

हिन्दी अर्थ

रे्वर ! नरश्रेष्ठ ! श्रोताको इस हरिवंश-श्रवणके उपलक्ष्यमें सकी श्लोकसंख्याका दशांश हवन करना चाहिये। यह ब कुछ मैंने तुम्हारे सामने कह दिया

अध्याय 318

श्लोक 14

यस्य स्मरणमात्रेण सर्वपापैः प्रमुच्यते ।अपुत्रः पुत्रमाप्नोति अधनो धनमाप्नुयात्

yasya smaraṇamātreṇa sarvapāpaiḥ pramucyate | aputraḥ putramāpnoti adhano dhanamāpnuyāt

हिन्दी अर्थ

इसके मरणमात्रसे मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। इसके वणसे पुत्रहीनको पुत्र और निर्धनको धनकी प्रासि ती है

अध्याय 318

श्लोक 15

नरमेधाश्वमेधाभ्यां यत् फलं प्राप्यते नरैः ।तत् फलं लभते नूनं पुराणश्रवणाद्धरेः

naramedhāśvamedhābhyāṃ yat phalaṃ prāpyate naraiḥ | tat phalaṃ labhate nūnaṃ purāṇaśravaṇāddhareḥ

हिन्दी अर्थ

नरमेध और अश्वमेध यज्ञोंसे मनुष्यों को ही फल प्राप्त होता है, उसीको श्रीहरिके इस पुराणका वण करनेसे मनुष्य निश्चय ही प्राप्त कर लेता

अध्याय 318

श्लोक 16

ब्रह्महा भ्रूणहा गोघ्नः सुरापो गुरुतल्पगः ।सकृत्पुराणश्रवणात् पूतो भवति नान्यथा

brahmahā bhrūṇahā goghnaḥ surāpo gurutalpagaḥ | sakṛtpurāṇaśravaṇāt pūto bhavati nānyathā

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मह्त्या, भ्रूणहत्या, गोहत्या, सुरापान और रुपल्लीगमन—इन महापातकोंसे युक्त मनुष्य भी इस राणको एक बार पूर्वोक्त विधिसे सुन लेनेपर पवित्र जाता है। इसमें अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये

अध्याय 318

श्लोक 17

इदं मया ते परिकीर्तितं महच्छ्रीकृष्णमाहात्म्यमपारमद्भुतम् ।शृण्वन् पठन्नाशु समाप्नुयात्फलं यच्चापि लोकेषु सुदुर्लभं महत्

idaṃ mayā te parikīrtitaṃ mahacchrīkṛṣṇamāhātmyamapāramadbhutam | śṛṇvan paṭhannāśu samāpnuyātphalaṃ yaccāpi lokeṣu sudurlabhaṃ mahat

हिन्दी अर्थ

ह मैंने तुमसे श्रीकृष्णके अपार, अद्भुत एवं महान्‌ हात्म्यका वर्णन किया है। जो इसे सुनता और पढ़ता . वह लोकमें जो परम दुर्लभ और महान्‌ फल है, उसे | शीघ्र ही प्राप्त कर लेता है

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

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आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

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सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

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Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.