Harivamsha Purana
8
अध्याय 8 / 318

Parva 1, Adhyāya 8

45 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ45 श्लोक

अध्याय 8

श्लोक 1

चारों युगों, मन्वन्तरों और व्रह्माजी के दिन एवं वर्ष का मान मन्वन्तरस्य सङ्ख्यानं युगानां च महामते ।ब्रह्मणोऽह्नः प्रमाणं च वक्तुमर्हसि मे द्विज

cāroṃ yugoṃ, manvantaroṃ aura vrahmājī ke dina evaṃ varṣa kā māna manvantarasya saṅkhyānaṃ yugānāṃ ca mahāmate | brahmaṇo'hnaḥ pramāṇaṃ ca vaktumarhasi me dvija

हिन्दी अर्थ

ध्याय: न धाजीके दिन एवं वर्षका मान जनमेजयने कहा—परम बुद्धिमान्‌ द्विजवर ! आप मुझसे मन्वन्तरोंके युगोंकी संख्याका वर्णन कीजिये तथा ब्रह्माजीके दिनका प्रमाण भी बताइये

अध्याय 8

श्लोक 2

अहोरात्रं भजेत् सूर्यो मानवं लौकिकं परम् ।तामुपादाय गणनां शृणु सङ्ख्यामरिन्दम

ahorātraṃ bhajet sūryo mānavaṃ laukikaṃ param | tāmupādāya gaṇanāṃ śṛṇu saṅkhyāmarindama

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी बोले—शत्रुदमन! सूर्य मनुष्योंके दिन और रात्रिका विभाग करते हैं। इस लौकिक गणनासे आरम्भ करके मनुसे भी परे द्विपरार्ध नामक ब्राह्म-गणनातकका वर्णन सुनो

अध्याय 8

श्लोक 3

निमेषैः पञ्चदशभिः काष्ठा त्रिंशत् तु ताः कलाः ।त्रिंशत्कलो मुहूर्तस्तु त्रिंशता तैर्मनीषिणः

nimeṣaiḥ pañcadaśabhiḥ kāṣṭhā triṃśat tu tāḥ kalāḥ | triṃśatkalo muhūrtastu triṃśatā tairmanīṣiṇaḥ

श्लोक 3–4 का हिन्दी अर्थ

राजन्‌! पंद्रह निमेषोंकी एक काष्ठा होती है और तीस काष्ठाओंकी एक कला होती है। तीस कलाओंका एक मुहूर्त होता है और बुद्धिमान पुरुष तीस मुहूर्तोंको एक दिन-रात कहते हैं, जिसका निर्माण चन्द्रमा तथा सूर्यकी गतिद्वारा होता है। विशेषकर सूर्य-चन्द्रमाके उदय-अस्तसे मेरुके परिवर्ती भू-प्रदेशमें रात-दिन होता है

अध्याय 8

श्लोक 4

अहोरात्रमिति प्राहुश्चन्द्रसूर्यगतिं नृप ।विशेषेण तु सर्वेषु अहोरात्रे च नित्यशः

ahorātramiti prāhuścandrasūryagatiṃ nṛpa | viśeṣeṇa tu sarveṣu ahorātre ca nityaśaḥ

अर्थ श्लोक 3 के साथ

अध्याय 8

श्लोक 5

अहोरात्राः पञ्चदश पक्ष इत्यभिशब्दितः ।द्वौ पक्षौ तु स्मृतो मासो मासौ द्वावृतुरुच्यते

ahorātrāḥ pañcadaśa pakṣa ityabhiśabditaḥ | dvau pakṣau tu smṛto māso māsau dvāvṛturucyate

हिन्दी अर्थ

पंद्रह अहोरात्र (दिन-रात)-का नाम पक्ष है और दो पक्षों—पखवाड़ोंका एक महीना माना जाता है तथा दो महीनोंकी एक ऋतु कहलाती है

अध्याय 8

श्लोक 6

अब्दं द्व्ययनमुक्तं च अयनं त्वृतुभिस्त्रिभिः ।दक्षिणं चोत्तरं चैव सङ्ख्यातत्त्वविशारदैः

abdaṃ dvyayanamuktaṃ ca ayanaṃ tvṛtubhistribhiḥ | dakṣiṇaṃ cottaraṃ caiva saṅkhyātattvaviśāradaiḥ

हिन्दी अर्थ

तीन ऋतुओंका एक अयन होता है और दो अयनोंका एक वर्ष होता है। संख्याके तत्त्वको जाननेमें चतुर पुरुषोंने उन दोनों अयनोंका नाम दक्षिणायन और उत्तरायण बताया है

अध्याय 8

श्लोक 7

मानेनानेन यो मासः पक्षद्वयसमन्वितः ।पितॄणां तदहोरात्रमिति कालविदो विदुः

mānenānena yo māsaḥ pakṣadvayasamanvitaḥ | pitṝṇāṃ tadahorātramiti kālavido viduḥ

हिन्दी अर्थ

उध्याय: + ७ इस मानसे जो दो पक्षोंका (एक) मास होता है, उसे समयको जाननेवाले (चतुर पुरुष) पितरोंका (एक) दिन-रात कहते हैं

अध्याय 8

श्लोक 8

कृष्णपक्षस्त्वहस्तेषां शुक्लपक्षस्तु शर्वरी ।कृष्णपक्षं त्वहः श्राद्धं पितॄणां वर्तते नृप

kṛṣṇapakṣastvahasteṣāṃ śuklapakṣastu śarvarī | kṛṣṇapakṣaṃ tvahaḥ śrāddhaṃ pitṝṇāṃ vartate nṛpa

हिन्दी अर्थ

कृष्णपक्ष उन पितरोंका दिन होता है और शुक्लपक्ष उनकी रात्रि होती है, इसलिये राजन्‌! कृष्णपक्षरूप दिनमें पितरोंका श्राद्ध होता है*

अध्याय 8

श्लोक 9

मानुषेण तु मानेन यो वै संवत्सरः स्मृतः ।देवानां तदहोरात्रं दिवा चैवोत्तरायणम् ।दक्षिणायनं स्मृता रात्रिः प्राज्ञैस्तत्त्वार्थकोविदैः

mānuṣeṇa tu mānena yo vai saṃvatsaraḥ smṛtaḥ | devānāṃ tadahorātraṃ divā caivottarāyaṇam | dakṣiṇāyanaṃ smṛtā rātriḥ prājñaistattvārthakovidaiḥ

हिन्दी अर्थ

मनुष्योंके मानसे जो एक वर्ष कहा गया है, वह देवताओंका एक दिन-रात होता है । तत्त्वको जाननेमें चतुर बुद्धिमान्‌ पुरुषोंने उत्ततायणको देवताओंका दिन और दक्षिणायनको देवताओंकी रात्रि बताया है।

अध्याय 8

श्लोक 10

दिव्यमब्दं दशगुणमहोरात्रं मनोः स्मृतम् ।अहोरात्रं दशगुणं मानवः पक्ष उच्यते

divyamabdaṃ daśaguṇamahorātraṃ manoḥ smṛtam | ahorātraṃ daśaguṇaṃ mānavaḥ pakṣa ucyate

हिन्दी अर्थ

देवताओंके दस वर्षोंका मनुका एक दिन-रात कहा है और इस दिन-रातका दसगुना मनुका एक पक्ष कहलाता है

अध्याय 8

श्लोक 11

पक्षो दशगुणो मासो मासैर्द्वादशभिर्गुणैः ।ऋतुर्मनूनां सम्प्रोक्तः प्राज्ञैस्तत्त्वार्थदर्शिभिः ।ऋतुत्रयेण त्वयनं तद्द्वयेनैव वत्सरः

pakṣo daśaguṇo māso māsairdvādaśabhirguṇaiḥ | ṛturmanūnāṃ samproktaḥ prājñaistattvārthadarśibhiḥ | ṛtutrayeṇa tvayanaṃ taddvayenaiva vatsaraḥ

हिन्दी अर्थ

दस पक्षोंका मनुका एक मास होता है, बारह महीनोंकी एक ऋतु होती है। तत्त्वार्थदर्शी बुद्धिमानोंने तीन ऋतुओंका एक अयन माना है और दो अयनोंका एक वर्ष कहा है +

अध्याय 8

श्लोक 12

चत्वार्येव सहस्राणि वर्षाणां तु कृतं युगम् ।तावच्छती भवेत् सन्ध्या सन्ध्यांशश्च तथा नृप

catvāryeva sahasrāṇi varṣāṇāṃ tu kṛtaṃ yugam | tāvacchatī bhavet sandhyā sandhyāṃśaśca tathā nṛpa

हिन्दी अर्थ

राजन्‌! देवताओंके चार हजार वर्षोंका एक सत्ययुग होता है, चार सौ वर्षोकी उसकी संध्या होती है और इतना ही उसका संध्यांश होता है $

अध्याय 8

श्लोक 13

त्रीणि वर्षसहस्राणि त्रेता स्यात्परिमाणतः ।तस्याश्च त्रिशती सन्ध्या सन्ध्यांशश्च तथाविधः

trīṇi varṣasahasrāṇi tretā syātparimāṇataḥ | tasyāśca triśatī sandhyā sandhyāṃśaśca tathāvidhaḥ

हिन्दी अर्थ

तीन हजार वर्षोके परिमाणका त्रेतायुग होता है और तीन सौ वर्षोकी उसकी संध्या होती है तथा इतना ही उसका संध्यांश होता है

अध्याय 8

श्लोक 14

तथा वर्षसहस्रे द्वे द्वापरं परिकीर्तितम् ।तस्यापि द्विशती सन्ध्या सन्ध्यांशश्च तथाविधः

tathā varṣasahasre dve dvāparaṃ parikīrtitam | tasyāpi dviśatī sandhyā sandhyāṃśaśca tathāvidhaḥ

हिन्दी अर्थ

इसी प्रकार दो हजार वर्षोका द्वापरयुग कहा गया है, दो सौ वर्षोकी उसकी संध्या होती है और इतना ही उसका संध्यांश होता है

अध्याय 8

श्लोक 15

कलिर्वर्षसहस्रं च सङ्ख्यातोऽत्र मनीषिभिः ।तस्यापि शतिका सन्ध्या सन्ध्यांशश्चैव तद्विधः

kalirvarṣasahasraṃ ca saṅkhyāto'tra manīṣibhiḥ | tasyāpi śatikā sandhyā sandhyāṃśaścaiva tadvidhaḥ

हिन्दी अर्थ

इसी गणनाके अनुसार बुद्धिमान पुरुषोंने कलियुगको एक हजार वर्षोवाला बताया है। सौ वर्षोकी उसकी संध्या होती है और इतना ही उसका संध्यांश होता है

अध्याय 8

श्लोक 16

एषा द्वादशसाहस्री युगसङ्ख्या प्रकीर्तिता ।दिव्येनानेन मानेन युगसङ्ख्यां निबोध मे

eṣā dvādaśasāhasrī yugasaṅkhyā prakīrtitā | divyenānena mānena yugasaṅkhyāṃ nibodha me

हिन्दी अर्थ

ए सूर्यको नहीं देखते। कृष्णपक्षमें सूर्य और चन्द्रमा एक-दूसरेके पक्षको पितरोंकी रात्रि और कृष्णपक्षको पितरोंका दिन कहा है। दिनका अन्त होनेके कारण अमावास्याको श्राद्ध-काल बताया है। न्ततक सूर्यके रथकी किरणोंके और अक्षांशकी किरणोंके प्रतिदिन के शिखरपर रहनेवाले देवताओंको दीखता रहता है, अत: उत्तरायण के अन्ततक उन दोनों प्रकारकी किरणोंके ध्रुवको प्रतिदिन क्रमश: दीखता। अतएव दक्षिणायन देवताओंकी रात है। न होता है। गका नाम संध्यांश है। यह बारह हजार वर्षोंकी एक चतुर्युगकी संख्या कही गयी। राजन्‌ ! इस दिव्यमानसे तुम युगोंके वर्षोकी गिनती समझ लो*

अध्याय 8

श्लोक 17

कृतं त्रेता द्वापरं च कलिश्चैव चतुर्युगी ।युगं तदेकसप्तत्या गणितं नृपसत्तम

kṛtaṃ tretā dvāparaṃ ca kaliścaiva caturyugī | yugaṃ tadekasaptatyā gaṇitaṃ nṛpasattama

श्लोक 17–18 का हिन्दी अर्थ

सत्ययुग, त्रेता, द्वार और कलियुग—इन चारोंको चतुर्युगी कहते हैं। नृपश्रेष्ठ ! संख्या करनेमें चतुर पुरुषोंने इकहत्तर चौकड़ी युगों (-से कुछ अधिक काल) -का नाम मन्वन्तर कहा है (क्योंकि हजारका चौदहवाँ भाग इतना ही होता है)। इसके भी दक्षिणायन और उत्तरायण—ये दो अयन कहे गये हैं

अध्याय 8

श्लोक 18

मन्वन्तरमिति प्रोक्तं सङ्ख्यानार्थविशारदैः ।अयनं चापि तत्प्रोक्तं द्वेऽयने दक्षिणोत्तरे

manvantaramiti proktaṃ saṅkhyānārthaviśāradaiḥ | ayanaṃ cāpi tatproktaṃ dve'yane dakṣiṇottare

अर्थ श्लोक 17 के साथ

अध्याय 8

श्लोक 19

मनुः प्रलीयते यत्र समाप्ते चायने प्रभोः ।ततोऽपरो मनुः कालमेतावन्तं भवत्युत

manuḥ pralīyate yatra samāpte cāyane prabhoḥ | tato'paro manuḥ kālametāvantaṃ bhavatyuta

हिन्दी अर्थ

उत्तरायणके पूर्ण होनेपर मनु ब्रह्में लीन हो जाते हैं। फिर इतने ही समयतक दूसरे मनु रहते हैं

अध्याय 8

श्लोक 20

समतीतेषु राजेन्द्र प्रोक्तः संवत्सरः स वै ।तदेव चायुतं प्रोक्तं मुनिना तत्त्वदर्शिना

samatīteṣu rājendra proktaḥ saṃvatsaraḥ sa vai | tadeva cāyutaṃ proktaṃ muninā tattvadarśinā

हिन्दी अर्थ

राजेन्द्र ! तत्त्वदर्शी मुनिने दस हजार (अस्सी) मनुओंका ब्रह्माजीका एक वर्ष कहा है +

अध्याय 8

श्लोक 21

ब्रह्मणस्तदहः प्रोक्तं कल्पश्चेति स कथ्यते ।सहस्रयुगपर्यन्ता या निशा प्रोच्यते बुधैः

brahmaṇastadahaḥ proktaṃ kalpaśceti sa kathyate | sahasrayugaparyantā yā niśā procyate budhaiḥ

श्लोक 21–25 का हिन्दी अर्थ

भरतसत्तम! ब्रह्माजीका जो दिन कहा है, उसीका नाम कल्प है और विद्वान्‌ पुरुषोंने हजार युगोंकी ब्रह्माजीकी जो रात्रि कही है, उसमें वन और पर्वतोंसहित पृथ्वी जलमें डूब जाती है और उन हजार चतुर्युगियोंके पूर्ण होनेपर जो ब्रह्माजीका दिन आरम्भ होता है, उसकी समापितकका समय एक कल्प कहलाता है। राजन्‌ ! सत्ययुग, त्रेतायुगादिसहित इकहत्तर चतुर्युगीसे कुछ अधिक कालका एक मन्वन्तर कहलाता है*। यह कीर्ति बढ़ानेवाले चौदह मनुओंका वर्णन कर दिया। सभी पुराणों और वेदोंमें इन प्रभावशाली प्रजापति मनुओंका वर्णन आता है । राजन्‌ ! इनका कीर्तन करनेसे धनकी प्राप्ति होती है

अध्याय 8

श्लोक 22

निमज्जत्यप्सु यत्रोर्वी सशैलवनकानना ।तस्मिन् युगसहस्रे तु पूर्णे भरतसत्तम

nimajjatyapsu yatrorvī saśailavanakānanā | tasmin yugasahasre tu pūrṇe bharatasattama

अर्थ श्लोक 21 के साथ

अध्याय 8

श्लोक 23

ब्राह्मे दिवसपर्यन्ते कल्पो निःशेष उच्यते ।युगानि सप्ततिस्तानि साग्राणि कथितानि ते

brāhme divasaparyante kalpo niḥśeṣa ucyate | yugāni saptatistāni sāgrāṇi kathitāni te

अर्थ श्लोक 21 के साथ

अध्याय 8

श्लोक 24

कृतत्रेतानिबद्धानि मनोरन्तरमुच्यते ।चतुर्दशैते मनवः कीर्तिताः कीर्तिवर्द्धनाः

kṛtatretānibaddhāni manorantaramucyate | caturdaśaite manavaḥ kīrtitāḥ kīrtivarddhanāḥ

अर्थ श्लोक 21 के साथ

अध्याय 8

श्लोक 25

वेदेषु सपुराणेषु सर्वेषु प्रभविष्णवः ।प्रजानां पतयो राजन् धन्यमेषां प्रकीर्तनम्

vedeṣu sapurāṇeṣu sarveṣu prabhaviṣṇavaḥ | prajānāṃ patayo rājan dhanyameṣāṃ prakīrtanam

अर्थ श्लोक 21 के साथ

अध्याय 8

श्लोक 26

मन्वन्तरेषु संहाराः संहारान्तेषु सम्भवाः ।न शक्यमन्तरं तेषां वक्तुं वर्षशतैरपि

manvantareṣu saṃhārāḥ saṃhārānteṣu sambhavāḥ | na śakyamantaraṃ teṣāṃ vaktuṃ varṣaśatairapi

हिन्दी अर्थ

मन्वन्तरोंमें कितने ही संहार होते हैं और संहारके बाद कितनी ही सृष्टियाँ होती रहती हैं। इनके अन्तरको सैकड़ों वर्षोंमें भी नहीं बताया जा सकता

अध्याय 8

श्लोक 27

विसर्गस्य प्रजानां वै संहारस्य च भारत ।मन्वन्तरेषु संहाराः श्रूयन्ते भरतर्षभ

visargasya prajānāṃ vai saṃhārasya ca bhārata | manvantareṣu saṃhārāḥ śrūyante bharatarṣabha

हिन्दी अर्थ

भारत! भरततश्रेष्ठ ! प्राय; सभी मन्वन्तरोंमें यदा-कदा प्रजाकी सृष्टि और संहारकी परम्पराका उपसंहार हो जाता है—यह बात सुननेमें आती है

अध्याय 8

श्लोक 28

सशेषास्तत्र तिष्ठन्ति देवाः सप्तर्षिभिः सह ।तपसा ब्रह्मचर्येण श्रुतेन च समाहिताः

saśeṣāstatra tiṣṭhanti devāḥ saptarṣibhiḥ saha | tapasā brahmacaryeṇa śrutena ca samāhitāḥ

हिन्दी अर्थ

मम्वन्तरोंके बाद जो संहार होता है, उसमें तपस्या, ब्रह्मचर्य और शास्त्र-ज्ञानसे सम्पन्न कुछ देवता और ससर्पि शेष रह जाते हैं

अध्याय 8

श्लोक 29

पूर्णे युगसहस्रे तु कल्पो निःशेष उच्यते ।तत्र सर्वाणि भूतानि दग्धान्यादित्यतेजसा

pūrṇe yugasahasre tu kalpo niḥśeṣa ucyate | tatra sarvāṇi bhūtāni dagdhānyādityatejasā

हिन्दी अर्थ

देवताओंके बारह हजार वर्षोंकी होती है अर्थात्‌ दिव्य दस हजार दिव्य वर्षोंकी होती हैं और इनके संध्यांश भी एक हजार दिव्य अधिकारको भोगनेके अनन्तर उत्तरायणके मार्गसे ब्रह्मलोकमें पहुँच चतुर्युग होते हैं तथा ब्रह्मके एक दिनमें एक हजार चतुर्युग होते छ कम पाँच हजार एक सौ तीन दिव्य वर्ष होता है। इस प्रकार अधिक होते हैं। इध्याय: + ९ सहस्त्र चतुर्युगियोंके पूर्ण होनेपर कल्प पूरा हो जाता है। उस समय सब भूत द्वादश आदित्योंकी किरणोंसे भस्म हो जाते हैं

अध्याय 8

श्लोक 30

ब्रह्माणमग्रतः कृत्वा सहादित्यगणैर्विभुम् ।योगं योगीश्वरं देवमजं क्षेत्रज्ञमच्युतम् ।प्रविशन्ति सुरश्रेष्ठं हरिं नारायणं प्रभुम्

brahmāṇamagrataḥ kṛtvā sahādityagaṇairvibhum | yogaṃ yogīśvaraṃ devamajaṃ kṣetrajñamacyutam | praviśanti suraśreṣṭhaṃ hariṃ nārāyaṇaṃ prabhum

हिन्दी अर्थ

और वे (द्वादश सूर्य) भी (जिसका ईंधन जल गया है, ऐसे अग्रिकी भाँति अपनी आत्माका उपसंहार करके) देवताओंसहित ब्रह्माजीको |. आगे करके योगीश्वर योगस्वरूप, देव, अज, क्षेत्रजञ . अच्युत, सुरश्रेष्ठ, सर्वव्यापी, प्रभु श्रीहरि नारायणमें प्रवेश कर जाते हैं

अध्याय 8

श्लोक 31

यः स्रष्टा सर्वभूतानां कल्पान्तेषु पुनः पुनः ।अव्यक्तः शाश्वतो देवस्तस्य सर्वमिदं जगत्

yaḥ sraṣṭā sarvabhūtānāṃ kalpānteṣu punaḥ punaḥ | avyaktaḥ śāśvato devastasya sarvamidaṃ jagat

हिन्दी अर्थ

जो प्रत्येक कल्पका अन्त होनेपर (दूसरे कल्पका आरम्भ होनेके समय) बारम्बार सब भूतोंको रचते हैं, जो अप्रकट, शाश्वत देव हैं, उन्हींका यह सम्पूर्ण जगत्‌ है

अध्याय 8

श्लोक 32

तत्र संवर्तते रात्रिः सकलैकार्णवे तदा ।नारायणो दधे निद्रां ब्राह्मं वर्षसहस्रकम्

tatra saṃvartate rātriḥ sakalaikārṇave tadā | nārāyaṇo dadhe nidrāṃ brāhmaṃ varṣasahasrakam

हिन्दी अर्थ

(यह प्रलय सुषुसिके समय होता है, अतएव) जब सम्पूर्ण विश्व एकार्णवके जलमें निमग्र हो जाता है, तब रात्रि होती है और ब्रह्माजीके हजार वर्षोतक नारायण निद्रा लेते हैं

English

²³ The promise refers to that of his no longer being a disciple of

अध्याय 8

श्लोक 33

तावन्तमिति कालस्य रात्रिरित्यभिशब्दिता ।निद्रायोगमनुप्राप्तो यस्यां शेते पितामहः

tāvantamiti kālasya rātrirityabhiśabditā | nidrāyogamanuprāpto yasyāṃ śete pitāmahaḥ

हिन्दी अर्थ

जितने समयतक ब्रह्माजी योगनिद्राका आश्रय लेकर शयन करते हैं, उतना समय उनकी रात्रि कहलाती है

अध्याय 8

श्लोक 34

सा च रात्रिरपक्रान्ता सहस्रयुगपर्यया ।तदा प्रबुद्धो भगवान् ब्रह्मा लोकपितामहः

sā ca rātrirapakrāntā sahasrayugaparyayā | tadā prabuddho bhagavān brahmā lokapitāmahaḥ

श्लोक 34–35 का हिन्दी अर्थ

जब वह रात्रि सहस्र चतुर्युगी बीतनेपर समाप्त होती है, तब लोकोंके पितामह भगवान्‌ ब्रह्माजी जागते हैं। फिर रचनेकी इच्छासे युक्त होकर मनमें सृष्टि करनेका विचार करते हैं। उस समय उनकी चेष्टा और स्मृति पहले कल्पकी तरह ही होती है

अध्याय 8

श्लोक 35

पुनः सिसृक्षया युक्तः सर्गाय विदधे मनः ।सैव स्मृतिः पुराणेयं तद्वृत्तं तद्विचेष्टितम्

punaḥ sisṛkṣayā yuktaḥ sargāya vidadhe manaḥ | saiva smṛtiḥ purāṇeyaṃ tadvṛttaṃ tadviceṣṭitam

अर्थ श्लोक 34 के साथ

अध्याय 8

श्लोक 36

देवस्थानानि तान्येव केवलं च विपर्ययः ।ततो दग्धानि भूतानि सर्वाण्यादित्यरश्मिभिः

devasthānāni tānyeva kevalaṃ ca viparyayaḥ | tato dagdhāni bhūtāni sarvāṇyādityaraśmibhiḥ

श्लोक 36–37 का हिन्दी अर्थ

तात! उस समय (ब्रह्माण्डमें सूर्य आदि) देवताओंके (और पिण्डमें चक्षु आदिके ) स्थान भी वे ही होते हैं। परंतु (जीवोंका) विपर्यय (उलट-फेर) होता रहता है। भरतसत्तम ! सूर्यकी किरणोंसे . भस्म होकर ( भगवान्‌ विष्णुमें लीन हुए) सब भूत तथा देवता, ऋषि, गन्धर्व, यक्ष, पिशाच, सर्प और राक्षस भी फिर उस युगमें उत्पन्न हो जाते हैं

अध्याय 8

श्लोक 37

देवर्षियक्षगन्धर्वाः पिशाचोरगराक्षसाः ।जायन्ते च पुनस्तात युगे भरतसत्तम

devarṣiyakṣagandharvāḥ piśācoragarākṣasāḥ | jāyante ca punastāta yuge bharatasattama

अर्थ श्लोक 36 के साथ

अध्याय 8

श्लोक 38

यथर्तावृतुलिङ्गानि नानारूपाणि पर्यये ।दृश्यन्ते तानि तान्येव तथा ब्राह्मीषु रात्रिषु

yathartāvṛtuliṅgāni nānārūpāṇi paryaye | dṛśyante tāni tānyeva tathā brāhmīṣu rātriṣu

हिन्दी अर्थ

जैसे (ग्रीष्म-शीत आदि) ऋतुओंके चिह्न उन ऋतुओंके | आनेपर प्रकट होने लगते हैं, इसी प्रकार ब्रह्माजीकी | रात्रियोंक बीतनेपर (पूर्व कल्पके समान) अनेक रूपोंवाले प्राणी (फिर) दीखने लगते हैं

अध्याय 8

श्लोक 39

निष्क्रमित्वा प्रजाकारः प्रजापतिरसंशयम् ।ये च वै मानवा देवाः सर्वे चैव महर्षयः

niṣkramitvā prajākāraḥ prajāpatirasaṃśayam | ye ca vai mānavā devāḥ sarve caiva maharṣayaḥ

श्लोक 39–40 का हिन्दी अर्थ

तात ! प्रजाओंको _ रचनेवाले प्रजापति (उस समय नारायणमेंसे) निकलकर | (फिर भूतोंको रचने लगते हैं ।) जो-जो मनुष्य, देवता . और महर्षिगण शाश्चतधर्म अर्थात्‌ देहादिमें आत्मबुद्धिरूप _ स्वाभाविक दोषोंको त्यागकर शुद्ध ब्रह्ममें पहुँचकर उसमें लीन हो जाते हैं, भरतसत्तम! वे फिर (दूसरे) कल्पमें उत्पन्न नहीं होते

अध्याय 8

श्लोक 40

ते सङ्गताः शुद्धसङ्गाः शश्वद्धर्मविसर्गतः ।न भवन्ति पुनस्तात युगं भरतसत्तम

te saṅgatāḥ śuddhasaṅgāḥ śaśvaddharmavisargataḥ | na bhavanti punastāta yugaṃ bharatasattama

अर्थ श्लोक 39 के साथ

अध्याय 8

श्लोक 41

तत्सर्वं क्रमयोगेन कालसङ्ख्याविभागवित् ।सहस्रयुगसङ्ख्यानं कृत्वा दिवसमीश्वरः

tatsarvaṃ kramayogena kālasaṅkhyāvibhāgavit | sahasrayugasaṅkhyānaṃ kṛtvā divasamīśvaraḥ

श्लोक 41–42 का हिन्दी अर्थ

कालकी संख्याका विभाग करनेमें चतुर वे सर्वसमर्थ भगवान्‌ परमात्मा क्रमानुसार सहस््र युगोंकी संख्यावाले दिन और (इसी प्रकार) सहस्र चतुर्युगियोंकी रात्रिको बनाकर प्राणियोंकी बारम्बार रचना और संहार करते रहते हैं

अध्याय 8

श्लोक 42

रात्रिं युगसहस्रान्तां कृत्वा च भगवान् विभुः ।संहरत्यथ भूतानि सृजते च पुनः पुनः

rātriṃ yugasahasrāntāṃ kṛtvā ca bhagavān vibhuḥ | saṃharatyatha bhūtāni sṛjate ca punaḥ punaḥ

अर्थ श्लोक 41 के साथ

अध्याय 8

श्लोक 43

व्यक्ताव्यक्तो महादेवो हरिर्नारायणः प्रभुः ।तस्य ते कीर्तयिष्यामि मनोर्वैवस्वतस्य ह

vyaktāvyakto mahādevo harirnārāyaṇaḥ prabhuḥ | tasya te kīrtayiṣyāmi manorvaivasvatasya ha

श्लोक 43–45 का हिन्दी अर्थ

महादेव श्रीहरिनारायण प्रभु ही स्थूल-सूक्ष्म-रूप (-से सर्वत्र विराजमान) हैं । महाद्युते ! वर्तमान वैवस्वत मनु भी उनके ही अंश हैं । वृष्णिवंशके प्रसद्से मैं उनकी पुरातन सृष्टिका वर्णन करूँगा । भरतत्रेष्ठ ! वे परमात्मा और प्रभु श्रीहरि सारे असुरोंका विनाश तथा सम्पूर्ण लोकोंका कल्याण करनेके लिये इसी वृष्णिवंशमें उत्पन्न हुए थे॥ ४इ—

अध्याय 8

श्लोक 44

विसर्गं भरतश्रेष्ठ साम्प्रतस्य महाद्युते ।वृष्णिवंशप्रसङ्गेन कथ्यमानं पुरातनम्

visargaṃ bharataśreṣṭha sāmpratasya mahādyute | vṛṣṇivaṃśaprasaṅgena kathyamānaṃ purātanam

अर्थ श्लोक 43 के साथ

अध्याय 8

श्लोक 45

यत्रोत्पन्नो महात्मा स हरिर्वृष्णिकुले प्रभुः ।सर्वासुरविनाशाय सर्वलोकहिताय च

yatrotpanno mahātmā sa harirvṛṣṇikule prabhuḥ | sarvāsuravināśāya sarvalokahitāya ca

अर्थ श्लोक 43 के साथ

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.