Harivamsha Purana
92
अध्याय 92 / 318

Parva 2, Adhyāya 37

72 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ72 श्लोक

अध्याय 92

श्लोक 1

जरासन्धस्य पुनराक्रमणात् शङ्कितानां यादवानां सभायां विकद्रोः भाषणं - राज्ञः हर्यश्वस्य चरित्रं, तस्मात् यदोः एवं यादवानां उत्पत्तेः वर्णनं स कृष्णस्तत्र बलवान् रौहिणेयेन सङ्गतः ।मथुरां यादवाकीर्णां पुरीं तां सुखमावसत्

jarāsandhasya punarākramaṇāt śaṅkitānāṃ yādavānāṃ sabhāyāṃ vikadroḥ bhāṣaṇaṃ - rājñaḥ haryaśvasya caritraṃ, tasmāt yadoḥ evaṃ yādavānāṃ utpatteḥ varṇanaṃ sa kṛṣṇastatra balavān rauhiṇeyena saṅgataḥ | mathurāṃ yādavākīrṇāṃ purīṃ tāṃ sukhamāvasat

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! महाबली भगवान्‌ श्रीकृष्ण रोहिणीकुमार बलदेवजीके साथ मिलकर यादवोंसे भरी हुई उस मथुरापुरीमें सुखपूर्वक रहने लगे

अध्याय 92

श्लोक 2

प्राप्तयौवनदेहस्तु युक्तो राजश्रिया विभुः ।चचार मथुरां प्रीतः सवनाकरभूषणाम्

prāptayauvanadehastu yukto rājaśriyā vibhuḥ | cacāra mathurāṃ prītaḥ savanākarabhūṣaṇām

हिन्दी अर्थ

उनके श्रीअज्लों में यौवनावस्थाका प्रवेश हुआ था। वे भगवान्‌ राजोचित शोभासे सम्पन्न हो वनप्रान्तसे विभूषित मथुरामें प्रसन्नतापूर्वक विचरते थे

अध्याय 92

श्लोक 3

कस्यचित् त्वथ कालस्य राजा राजगृहेश्वरः ।सस्मार निहतं कंसं जरासन्धः प्रतापवान्

kasyacit tvatha kālasya rājā rājagṛheśvaraḥ | sasmāra nihataṃ kaṃsaṃ jarāsandhaḥ pratāpavān

हिन्दी अर्थ

कुछ कालके अनन्तर राजगृहके स्वामी प्रतापी राजा जरासंधने कंसके मारे जानेकी घटनाको फिरसे स्मरण किया

अध्याय 92

श्लोक 4

युद्धाय योजितो भूयो दुहितृभ्यां महीपतिः ।दश सप्त च सङ्ग्रामाञ्जरासन्धस्य यादवाः ।ददुर्न चैनं समरे हन्तुं शेकुर्महारथाः

yuddhāya yojito bhūyo duhitṛbhyāṃ mahīpatiḥ | daśa sapta ca saṅgrāmāñjarāsandhasya yādavāḥ | dadurna cainaṃ samare hantuṃ śekurmahārathāḥ

हिन्दी अर्थ

उसकी दोनों कन्याओंने पुन: उसे युद्धके लिये उत्साहित किया। यादवोंने जरासंधको क्रमश: सत्रह बार युद्धका अवसर दिया; परंतु वे महारथी यादव समरभूमिमें उसे मार न सके

अध्याय 92

श्लोक 5

ततो मागधराट् श्रीमांश्चतुरङ्गवलान्वितः ।भूयोऽप्यष्टादशं कर्तुं सङ्ग्रामं स समारभत्

tato māgadharāṭ śrīmāṃścaturaṅgavalānvitaḥ | bhūyo'pyaṣṭādaśaṃ kartuṃ saṅgrāmaṃ sa samārabhat

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर श्रीमान्‌ मगधराजने चतुरद्िणी सेनाको साथ लेकर फिर अठारहवीं बार यादवोंके साथ युद्ध करनेका आयोजन किया

अध्याय 92

श्लोक 6

वैलक्ष्यात् पुनरेवासौ राजा राजगृहेश्वरः ।जरासन्धो बली श्रीमान् पाकशासनविक्रमः

vailakṣyāt punarevāsau rājā rājagṛheśvaraḥ | jarāsandho balī śrīmān pākaśāsanavikramaḥ

हिन्दी अर्थ

राजगृहका स्वामी बलवान्‌ राजा श्रीमान्‌ जरासंध इन्द्रके समान पराक्रमी था। उसने पहलेकी पराजयसे लज्जाका अनुभव करनेके कारण पुन: युद्धकी तैयारी की

अध्याय 92

श्लोक 7

स साधनेन महता बृहद्रथसुतो बली ।कृष्णस्य वधमन्विच्छन् भूयो वै संन्यवर्तत

sa sādhanena mahatā bṛhadrathasuto balī | kṛṣṇasya vadhamanvicchan bhūyo vai saṃnyavartata

हिन्दी अर्थ

बृहद्रथका वह बलबवान्‌ पुत्र महानू साधनसे सम्पन्न हो श्रीकृष्णका वध चाहता हुआ फिर मथुरापुरीकी ओर लौटा

अध्याय 92

श्लोक 8

तं श्रुत्वा सहिताः सर्वे निवृत्तं मगधेश्वरम् ।यादवा मन्त्रयामासुर्जरासन्धभयार्दिताः

taṃ śrutvā sahitāḥ sarve nivṛttaṃ magadheśvaram | yādavā mantrayāmāsurjarāsandhabhayārditāḥ

हिन्दी अर्थ

मगधराजकों पुन: लौटा हुआ सुनकर जरासंधके भयसे पीड़ित हुए सब यादव एक साथ बैठकर मन्त्रणा करने लगे

अध्याय 92

श्लोक 9

ततः प्राह महातेजा विकद्रुर्नयकोविदः ।कृष्णं कमलपत्राक्षमुग्रसेनस्य शृण्वतः

tataḥ prāha mahātejā vikadrurnayakovidaḥ | kṛṣṇaṃ kamalapatrākṣamugrasenasya śṛṇvataḥ

हिन्दी अर्थ

उस समय नीतिकुशल महातेजस्वी विकद्ठुने उग्रसेनके सुनते हुए कमलनयन श्रीकृष्णसे कहा—

अध्याय 92

श्लोक 10

श्रूयतां तात गोविन्द कुलस्यास्य समुद्भवः ।श्रूयतामभिधास्यामि प्राप्तकालमहं ततः ।युक्तं चेन्मन्यसे साधो करिष्यसि वचो मम

śrūyatāṃ tāta govinda kulasyāsya samudbhavaḥ | śrūyatāmabhidhāsyāmi prāptakālamahaṃ tataḥ | yuktaṃ cenmanyase sādho kariṣyasi vaco mama

हिन्दी अर्थ

तात! गोविन्द! इस कुलकी उत्पत्तिका प्रसंग सुनो। इसके लिये उपयुक्त अवसर आया है, इसलिये बता रहा हूँ; ध्यान देकर श्रवण करो । साधो ! इसे सुनकर यदि उचित समझो तो मेरे कथनानुसार कार्य करना

अध्याय 92

श्लोक 11

यादवस्यास्य वंशस्य समुद्भवमशेषतः ।यथा मे कथितः पूर्वं व्यासेन विदितात्मना

yādavasyāsya vaṃśasya samudbhavamaśeṣataḥ | yathā me kathitaḥ pūrvaṃ vyāsena viditātmanā

हिन्दी अर्थ

यादववंशकी इस उत्पत्तिका सारा प्रसंग आत्मज्ञानी व्यासजीने पूर्वकालमें मुझे जैसा बताया था, वैसा ही सुना रहा हूँ

अध्याय 92

श्लोक 12

आसीद् राजा मनोर्वंशे श्रीमानिक्ष्वाकुसम्भवः ।हर्यश्व इति विख्यातो महेन्द्रसमविक्रमः

āsīd rājā manorvaṃśe śrīmānikṣvākusambhavaḥ | haryaśva iti vikhyāto mahendrasamavikramaḥ

हिन्दी अर्थ

वैवस्वत मनुके वंशमें इक्ष्वाकुके पुत्र हर्यश्र नामसे विख्यात एक श्रीसम्पन्न राजा हो गये हैं, जो महेन्द्रके तुल्य पराक्रमी थे

अध्याय 92

श्लोक 13

तस्यासीद् दयिता भार्या मधोर्दैत्यस्य वै सुता ।देवी मधुमती नाम यथेन्द्रस्य शची तथा

tasyāsīd dayitā bhāryā madhordaityasya vai sutā | devī madhumatī nāma yathendrasya śacī tathā

हिन्दी अर्थ

मधु नामक दैत्यकी पुत्री मधुमती देवी उनकी प्राणप्यारी भार्या थी। जैसे इन्द्रको शची प्रिय हैं, उसी प्रकार हर्यश्रको मधुमती प्रिय थी

अध्याय 92

श्लोक 15

सा यौवनगुणोपेता रूपेणाप्रतिमा भुवि ।मनोरथकरी राज्ञः प्राणेभ्योऽपि गरीयसी ॥ १४॥ अ ।दानवेन्द्रकुले जाता सुश्रोणी कामरूपिणी ।एकपत्नीव्रतधरा खेचरा रोहिणी यथा

sā yauvanaguṇopetā rūpeṇāpratimā bhuvi | manorathakarī rājñaḥ prāṇebhyo'pi garīyasī || 14|| a | dānavendrakule jātā suśroṇī kāmarūpiṇī | ekapatnīvratadharā khecarā rohiṇī yathā

हिन्दी अर्थ

दानवराज मधुके कुलमें उत्पन्न हुई वह सुन्दर कटिप्रदेशवाली कामरूपिणी देवी रोहिणीके समान एकपत्नीव्रतका पालन करनेवाली तथा आकाशमें विचरनेवाली थी

अध्याय 92

श्लोक 16

सा तमिक्ष्वाकुशार्दूलं कामयामास कामिनी ।स कदाचिन्नरश्रष्ठो भ्रात्रा ज्येष्ठेन माधव

sā tamikṣvākuśārdūlaṃ kāmayāmāsa kāminī | sa kadācinnaraśraṣṭho bhrātrā jyeṣṭhena mādhava

श्लोक 16–17 का हिन्दी अर्थ

वह कामिनी होकर इश््वाकुवंशके श्रेष्ठ वीर हर्यश्वको सम्पूर्ण हृदयसे चाहती थी। माधव! एक दिन बड़े भाईने उनके विश्वासपर रहनेवाले नरश्रेष्ठ हर्यश्वको राज्यसे निकाल दिया, तब उन्होंने अयोध्या छोड़ दी और थोड़े-से परिवारके साथ अपनी प्रिया मधुमतीसहित वे वनमें रहने लगे

अध्याय 92

श्लोक 17

राज्यान्निरस्तो विश्वस्तः सोऽयोध्यां सम्परित्यजत् ।स तदाल्पपरीवारः प्रियया सहितो वने

rājyānnirasto viśvastaḥ so'yodhyāṃ samparityajat | sa tadālpaparīvāraḥ priyayā sahito vane

अर्थ श्लोक 16 के साथ

अध्याय 92

श्लोक 18

रेमे समेत्य कालज्ञः प्रियया कमलेक्षणः ।भ्रात्रा विनिष्कृतं राज्यात् प्रोवाच कमलेक्षणा

reme sametya kālajñaḥ priyayā kamalekṣaṇaḥ | bhrātrā viniṣkṛtaṃ rājyāt provāca kamalekṣaṇā

हिन्दी अर्थ

कालकी महिमाको जाननेवाले कमलनयन हर्यश्व अपनी प्यारी पत्नीके साथ मिलकर वहाँ बड़े आनन्दसे समय बिताने लगे।' एक दिन कमलनयनी मधुमतीने भाईद्वारा राज्यसे निकाले गये पतिसे कहा—

अध्याय 92

श्लोक 19

एह्यागच्छ नरश्रेष्ठ त्यज राज्यकृतां स्पृहाम् ।गच्छावः सहितौ वीर मधोर्मम पितुर्गृहम्

ehyāgaccha naraśreṣṭha tyaja rājyakṛtāṃ spṛhām | gacchāvaḥ sahitau vīra madhormama piturgṛham

हिन्दी अर्थ

नरश्रेष्ठ वीर ! अयोध्याके राज्यकी अभिलाषा छोड़ दो और आओ मेरे साथ चलो। हम दोनों मेरे पिता मधुके घरपर चलें

अध्याय 92

श्लोक 20

रम्यं मधुवनं नाम कामपुष्पफलद्रुमम् ।सहितौ तत्र रंस्यावो यथा दिवि गतौ तथा

ramyaṃ madhuvanaṃ nāma kāmapuṣpaphaladrumam | sahitau tatra raṃsyāvo yathā divi gatau tathā

हिन्दी अर्थ

सुरम्य मधुवन नामक वन ही मेरे पिताका निवासस्थान है। वहाँके वृक्ष इच्छानुसार फूल और फल देनेवाले हैं। वहाँ हम दोनों साथ रहकर स्वर्गवासियोंके समान मौज करेंगे

अध्याय 92

श्लोक 21

पितुर्मे दयितस्त्वं हि मातुर्मम च पार्थिव ।मत्प्रियार्थं प्रियतरो भ्रातुश्च लवणस्य वै

piturme dayitastvaṃ hi māturmama ca pārthiva | matpriyārthaṃ priyataro bhrātuśca lavaṇasya vai

हिन्दी अर्थ

पृथ्वीनाथ! मेरे पिता और माता दोनोंको ही तुम बहुत प्रिय हो तथा मेरा प्रिय करनेके लिये मेरा भाई लवणासुर भी तुम्हें अत्यन्त प्रिय मानेगा

अध्याय 92

श्लोक 22

रंस्यावस्तत्र सहितौ राज्यस्थाविव कामगौ ।तत्र गत्वा नरश्रेष्ठ ह्यमराविव नन्दने ।भद्रं ते विहरिष्यावो यथा देवपुरे तथा

raṃsyāvastatra sahitau rājyasthāviva kāmagau | tatra gatvā naraśreṣṭha hyamarāviva nandane | bhadraṃ te vihariṣyāvo yathā devapure tathā

हिन्दी अर्थ

नरश्रेष्ठ ! वहाँ जाकर हम दोनों साथ-साथ रहकर राज्यपर बैठे हुए दम्पतियोंकी भाँति इच्छानुरूप वस्तुओंका उपभोग करते हुए रमण करेंगे । जैसे देवपुरीके नन्दनवनमें देवाज़ना और देवता विहार करते हैं, उसी प्रकार वहाँ हम दोनों विहार करेंगे। आपका भला हो

अध्याय 92

श्लोक 23

तं त्यजाव महाराज भ्रातरं तेऽभिमानिनम् ।आवयोर्द्वेषिणं नित्यं मत्तं राज्यमदेन वै

taṃ tyajāva mahārāja bhrātaraṃ te'bhimāninam | āvayordveṣiṇaṃ nityaṃ mattaṃ rājyamadena vai

हिन्दी अर्थ

महाराज! आपका भाई राज्यके मदसे सदा उन्मत्त रहकर अभिमानमें भरा रहता है और हम दोनोंसे द्वेष रखता है; अत: हम दोनों उसे त्याग दें

अध्याय 92

श्लोक 24

धिगिमं गर्हितं वासं भृत्यवच्च पराश्रयम् ।गच्छावः सहितौ वीर पितुर्मे भवनान्तिकम्

dhigimaṃ garhitaṃ vāsaṃ bhṛtyavacca parāśrayam | gacchāvaḥ sahitau vīra piturme bhavanāntikam

हिन्दी अर्थ

दासकी भाँति दूसरेके आश्रित होकर रहना अच्छा नहीं है; अतः इस निन्दित निवासको धिक्कार है। वीर! चलो, हम दोनों मेरे पिताके घरके पास चलें'

अध्याय 92

श्लोक 25

तस्य सम्यक्प्रवृत्तस्य पूर्वजं भ्रातरं प्रति ।कामार्तस्य नरेन्द्रस्य पत्न्यास्तद् रुरुचे वचः

tasya samyakpravṛttasya pūrvajaṃ bhrātaraṃ prati | kāmārtasya narendrasya patnyāstad ruruce vacaḥ

हिन्दी अर्थ

श्रीकृष्ण! यद्यपि हर्यश्वका अपने बड़े भाईके प्रति अच्छा बर्ताव था (वह उनसे कोई प्रतिशोध नहीं लेना चाहता था) तो भी कामसे पीड़ित होनेके कारण उस नरेशको पत्नीकी बात पसंद आ गयी

अध्याय 92

श्लोक 26

ततो मधुपुरं राजा हर्यश्वः स जगाम च ।भार्यया सह कामिन्या कामी पुरुषपुङ्गवः

tato madhupuraṃ rājā haryaśvaḥ sa jagāma ca | bhāryayā saha kāminyā kāmī puruṣapuṅgavaḥ

हिन्दी अर्थ

तब कामी पुरुषप्रवर राजा हर्यश्व अपनी कामवती पत्नीके साथ मधुपुरको चला गया'

अध्याय 92

श्लोक 27

मधुना दानवेन्द्रेण स साम्ना समुदाहृतः ।स्वागतं वत्स हर्यश्व प्रीतोऽस्मि तव दर्शनात्

madhunā dānavendreṇa sa sāmnā samudāhṛtaḥ | svāgataṃ vatsa haryaśva prīto'smi tava darśanāt

हिन्दी अर्थ

वहाँ दानवराज मधुने उससे सान्त्वनापूर्वक कहा—' बेटा हर्यश्व ! तुम्हारा स्वागत है। मैं तुम्हारे दर्शनसे (अथवा तुमसे मिलकर) बहुत प्रसन्न हूँ

अध्याय 92

श्लोक 28

यदेतन्मम राज्यं वै सर्वं मधुवनं विना ।ददामि तव राजेन्द्र वासश्च प्रतिगृह्यताम्

yadetanmama rājyaṃ vai sarvaṃ madhuvanaṃ vinā | dadāmi tava rājendra vāsaśca pratigṛhyatām

हिन्दी अर्थ

राजेन्द्र ! यह जो मेरा सारा राज्य है, उसे मैं केवल मधुवनको छोड़कर तुम्हें सौंप रहा हूँ। तुम यहाँ निवास करो

अध्याय 92

श्लोक 29

वनेऽस्मिँल्लवणश्चायं सहायस्ते भविष्यति ।अमित्रनिग्रहे चैव कर्णधारत्वमेष्यति

vane'smi~llavaṇaścāyaṃ sahāyaste bhaviṣyati | amitranigrahe caiva karṇadhāratvameṣyati

हिन्दी अर्थ

इस वनमें यह मेरा पुत्र लवण भी तुम्हारा सहायक होगा तथा शत्रुओंका निग्रह करनेमें यह तुम्हारे लिये कर्णधारका काम देगा

अध्याय 92

श्लोक 30

पालयैनं शुभं राष्ट्रं समुद्रानूपभूषितम् ।गोसमृद्धं श्रिया जुष्टमाभीरप्रायमानुषम्

pālayainaṃ śubhaṃ rāṣṭraṃ samudrānūpabhūṣitam | gosamṛddhaṃ śriyā juṣṭamābhīraprāyamānuṣam

हिन्दी अर्थ

तुम समुद्रके जलप्राय प्रदेशसे विभूषित इस शुभ राष्ट्रका पालन करो। यह गौओंसे समृद्ध और लक्ष्मीसे सेवित है तथा इसमें अधिकतर आभीर जातिके लोगोंका निवास है

अध्याय 92

श्लोक 31

अत्र ते वसतस्तात दुर्गं गिरिपुरं महत् ।भविता पार्थिवावासः सुराष्ट्रविषयो महान्

atra te vasatastāta durgaṃ giripuraṃ mahat | bhavitā pārthivāvāsaḥ surāṣṭraviṣayo mahān

श्लोक 31–33 का हिन्दी अर्थ

तात! यहाँ रहनेपर महान्‌ एवं दुर्गम गिरिपुर (गिरिनार या रैवतक पर्वतसे मिला हुआ नगर) तुम्हारी राजधानीके रूपमें प्रतिष्ठित होगा। यह महान्‌ सुराष्ट्र राज्य समुद्रके निकट और जलप्राय प्रदेशसे युक्त है। यहाँ किसी प्रकारका रोग नहीं होता। तुम्हारा विशाल एवं विस्तृत राज्य आनर्त नामसे विख्यात होगा। पृथ्वीनाथ ! मेरा विश्वास है कि कालयोगसे वह अवश्यम्भावी है। तुम समयानुसार उत्तम राजोचित बर्तावका आश्रय लेकर यहाँ रहो

अध्याय 92

श्लोक 32

अनूपविषयश्चैव समुद्रान्ते निरामयः ।आनर्तं नाम ते राष्ट्रं भविष्यत्यायतं महत्

anūpaviṣayaścaiva samudrānte nirāmayaḥ | ānartaṃ nāma te rāṣṭraṃ bhaviṣyatyāyataṃ mahat

अर्थ श्लोक 31 के साथ

अध्याय 92

श्लोक 33

तद् भविष्यमहं मन्ये कालयोगेन पार्थिव ।अध्यास्यतां यथाकालं पार्थिवं वृत्तमुत्तमम्

tad bhaviṣyamahaṃ manye kālayogena pārthiva | adhyāsyatāṃ yathākālaṃ pārthivaṃ vṛttamuttamam

अर्थ श्लोक 31 के साथ

अध्याय 92

श्लोक 34

यायातमपि वंशस्ते समेष्यति च यादवम् ।अनु वंशं च वंशस्ते सोमस्य भविता किल

yāyātamapi vaṃśaste sameṣyati ca yādavam | anu vaṃśaṃ ca vaṃśaste somasya bhavitā kila

हिन्दी अर्थ

तुम्हारा यह वंश ययाति एवं यदुके वंशमें मिल जायगा। चन्द्रबंशके भीतर तुम्हारा वंश चलेगा (सूर्यबंशसे उसका कोई सम्बन्ध नहीं रह जायगा)

अध्याय 92

श्लोक 35

एष मे विभवस्तात तवेमं विषयोत्तमम् ।दत्त्वा यास्यामि तपसे सागरं लवणालयम्

eṣa me vibhavastāta tavemaṃ viṣayottamam | dattvā yāsyāmi tapase sāgaraṃ lavaṇālayam

हिन्दी अर्थ

तात! यही मेरा विभव है। मैं तुम्हें यह उत्तम राज्य देकर तपस्याके लिये लवणसमुद्रको चला जाऊँगा

अध्याय 92

श्लोक 36

लवणेन समायुक्तस्त्वमिमं विषयोत्तमम् ।पालयस्वाखिलं तात स्वस्य वंशस्य वृद्धये

lavaṇena samāyuktastvamimaṃ viṣayottamam | pālayasvākhilaṃ tāta svasya vaṃśasya vṛddhaye

हिन्दी अर्थ

तात! तुम लवणके साथ रहकर अपने बंशकी वृद्धिकि लिये इस समस्त उत्तम राज्यका पालन करो'

अध्याय 92

श्लोक 37

बाढमित्येव हर्यश्वः प्रतिजग्राह तत् पुरम् ।स च दैत्यस्तपोवासं जगाम वरुणालयम्

bāḍhamityeva haryaśvaḥ pratijagrāha tat puram | sa ca daityastapovāsaṃ jagāma varuṇālayam

हिन्दी अर्थ

तब ' बहुत अच्छा' कहकर हर्यश्वने उस पुरको ग्रहण किया; फिर वह दैत्य तपस्याके लिये समुद्रको चला गया

अध्याय 92

श्लोक 38

हर्यश्वश्च महातेजा दिव्ये गिरिवरोत्तमे ।निवेशयामास पुरं वासार्थममरोपमः

haryaśvaśca mahātejā divye girivarottame | niveśayāmāsa puraṃ vāsārthamamaropamaḥ

हिन्दी अर्थ

अमरोंके समान महातेजस्वी हर्यश्वने दिव्य एवं श्रेष्ठ गिरिवर (रैवतक)-के समीप अपने रहनेके लिये एक नगर बसाया

अध्याय 92

श्लोक 39

आनर्तं नाम तद् राष्ट्रं सुराष्ट्रं गोधनायुतम् ।अचिरेणैव कालेन समृद्धं प्रत्यपद्यत

ānartaṃ nāma tad rāṣṭraṃ surāṣṭraṃ godhanāyutam | acireṇaiva kālena samṛddhaṃ pratyapadyata

हिन्दी अर्थ

आनर्त नामसे प्रसिद्ध वह गोधनसम्पनन राष्ट्र सुरा्ट्र कहलाया और थोड़े ही समयमें समृद्धिशाली हो गया

अध्याय 92

श्लोक 40

अनूपविषये चैव वेलावनविभूषितम् ।विचित्रं क्षेत्रसस्याढ्यं प्राकारग्रामसङ्कुलम्

anūpaviṣaye caiva velāvanavibhūṣitam | vicitraṃ kṣetrasasyāḍhyaṃ prākāragrāmasaṅkulam

श्लोक 40–41 का हिन्दी अर्थ

विचित्र खेतों और हरी-भरी खेतीसे सुशोभित, परकोटों और गाँवोंसे युक्त तथा धनधान्यसे सम्पन्न उस राष्ट्रपर राष्ट्रकी वृद्धि करनेवाले राजा हर्यश्व शासन करने लगे और राजधर्म एवं यशसे प्रजाका आनन्द बढ़ाने लगे

अध्याय 92

श्लोक 41

शशास नृपतिः स्फीतं तद् राष्ट्रं राष्ट्रवर्द्धनः ।राजधर्मेण यशसा प्रजानां नन्दिवर्द्धनः

śaśāsa nṛpatiḥ sphītaṃ tad rāṣṭraṃ rāṣṭravarddhanaḥ | rājadharmeṇa yaśasā prajānāṃ nandivarddhanaḥ

अर्थ श्लोक 40 के साथ

अध्याय 92

श्लोक 42

तस्य सम्यक प्रचारेण हर्यश्वस्य महात्मनः ।व्यवर्धत तदक्षोभ्य राष्ट्रं राष्ट्रगुणैर्युतम्

tasya samyaka pracāreṇa haryaśvasya mahātmanaḥ | vyavardhata tadakṣobhya rāṣṭraṃ rāṣṭraguṇairyutam

हिन्दी अर्थ

महामना हर्यश्वके उत्तम आचार- व्यवहारके कारण वह अआक्षोभ्य राष्ट्र उत्तम राष्ट्रके गुणोंसे सम्पन्न हो निरन्तर उन्नति करने लगा

अध्याय 92

श्लोक 43

स हि राजा स्थितो राज्ये राजवृत्तेन शोभितः ।प्राप्तः कुलोचितां लक्ष्मीं वृत्तेन च नयेन च

sa hi rājā sthito rājye rājavṛttena śobhitaḥ | prāptaḥ kulocitāṃ lakṣmīṃ vṛttena ca nayena ca

हिन्दी अर्थ

राज्यपर स्थित होकर राजोचित बर्तावसे सुशोभित होनेवाले उन राजा हर्यश्वने सदाचार और उत्तम नीतिसे अपने कुलके लिये उचित लक्ष्मी प्रात कर ली

अध्याय 92

श्लोक 44

तस्यैव च सुवृत्तस्य पुत्रकामस्य धीमतः ।मधुमत्यां सुतो जज्ञे यदुर्नाम महायशाः

tasyaiva ca suvṛttasya putrakāmasya dhīmataḥ | madhumatyāṃ suto jajñe yadurnāma mahāyaśāḥ

श्लोक 44–45 का हिन्दी अर्थ

महातेजस्वी यदुका स्वर दुन्दुभिनिनादके समान गम्भीर था। वे राजोचित लक्षणोंसे सम्पन्न होकर दिनोंदिन बढ़ने लगे। शत्रुओंके लिये वे सर्वथा दुर्जय थे

अध्याय 92

श्लोक 45

सोऽवर्धत महातेजा यदुर्दुन्दुभिनिःस्वनः ।राजलक्षणसम्पन्नः सपत्नैर्दुरतिक्रमः

so'vardhata mahātejā yadurdundubhiniḥsvanaḥ | rājalakṣaṇasampannaḥ sapatnairduratikramaḥ

अर्थ श्लोक 44 के साथ

अध्याय 92

श्लोक 46

यदुर्नामाभवत् पुत्रो राजलक्षणपूजितः ।यथास्य पूर्वजो राजा पूरुः स सुमहायशाः

yadurnāmābhavat putro rājalakṣaṇapūjitaḥ | yathāsya pūrvajo rājā pūruḥ sa sumahāyaśāḥ

हिन्दी अर्थ

हर्यश्वका वह पुत्र यदु नामसे ही विख्यात हुआ। यदु राजोचित लक्षणोंसे सम्मानित थे, ठीक उसी तरह जैसे उनके पूर्वज राजा महायशस्वी पूरु सम्मानित होते थे

अध्याय 92

श्लोक 47

स एक एव तस्यासीत् पुत्रः परमशोभनः ।ऊर्जितः पृथिवीभर्ता हर्यश्वस्य महात्मनः

sa eka eva tasyāsīt putraḥ paramaśobhanaḥ | ūrjitaḥ pṛthivībhartā haryaśvasya mahātmanaḥ

हिन्दी अर्थ

महामना हर्यश्वके एक ही पुत्र यदु हुए। वे परम सुन्दर, बलवान्‌ और पृथ्वीका भरण-पोषण करनेमें समर्थ थे

अध्याय 92

श्लोक 48

दस वर्षसहस्राणि स कृत्वा राज्यमव्ययम् ।जगाम त्रिदिवं राजा धर्मेणाप्रतिमो भुवि

dasa varṣasahasrāṇi sa kṛtvā rājyamavyayam | jagāma tridivaṃ rājā dharmeṇāpratimo bhuvi

हिन्दी अर्थ

राजा हर्यश्व दस हजार वर्षोतक अक्षय राज्यका उपभोग करके स्वर्गलोकमें चले गये। वे भूमण्डलके अनुपम धर्मात्मा थे

अध्याय 92

श्लोक 49

ततो यदुरदीनात्मा प्रजाभिस्त्वभ्यषिच्यत ।पितर्युपरते श्रीमान् क्रमेणार्क इवोदितः

tato yaduradīnātmā prajābhistvabhyaṣicyata | pitaryuparate śrīmān krameṇārka ivoditaḥ

हिन्दी अर्थ

पिताके मर जानेपर प्रजाओंने उदारचेता श्रीमान्‌ू यदुको उनके राज्यपर अभिषिक्त कर दिया। वे क्रमश: एक सूर्यके बाद दूसरे सूर्यके समान उदित हो प्रकाशित होने लगे

अध्याय 92

श्लोक 50

शशास चेमां वसुधां प्रशान्तभयतस्कराम् ।यदुरिन्द्रप्रतीकाशो नृपो येनास्य यादवाः

śaśāsa cemāṃ vasudhāṃ praśāntabhayataskarām | yadurindrapratīkāśo nṛpo yenāsya yādavāḥ

हिन्दी अर्थ

वे इन्द्रतुल्य तेजस्वी यदु, जिनके कारण हमलोग यादव कहलाते हैं, जब इस पृथ्वीका शासन करने लगे, तब यहाँका सारा भय शान्त हो गया। चोर-लुटेर आदि लुप्त हो गये

अध्याय 92

श्लोक 51

स कदाचिन्नृपश्चक्रे जलक्रीडां महोदधौ ।दारैः सह गुणोदारैः सतार इव चन्द्रमाः

sa kadācinnṛpaścakre jalakrīḍāṃ mahodadhau | dāraiḥ saha guṇodāraiḥ satāra iva candramāḥ

हिन्दी अर्थ

एक समयकी बात है, राजा यदु अपनी उदार गुणवाली पत्नियोंके साथ ताराओंसहित चन्द्रमाके समान महासागरमें जलक्रीडा कर रहे थे

अध्याय 92

श्लोक 52

स तत्र सहसा क्षिप्तस्तितीर्षुः सागराम्भसि ।धूम्रवर्णेन नृपतिः सर्पराजेन वीर्यवान्

sa tatra sahasā kṣiptastitīrṣuḥ sāgarāmbhasi | dhūmravarṇena nṛpatiḥ sarparājena vīryavān

श्लोक 52–54 का हिन्दी अर्थ

वे पराक्रमी राजा यदु जलको पार करके निकलना ही चाहते थे कि सहसा किसीने उन्हें समुद्रके गहरे जलमें डाल दिया। बात यह हुई कि सर्पोके राजा धूम्रवर्णने गरणवश मित्रावरुणके अंशसे नूतन शरीर धारण करके प्रकट गज यदु ही योगबलसे हर्यश्वके पुत्ररूपमें प्रकट हुए थे और डड़े वेगसे उनको खींचा और जलके भीतर बसे हुए र्पोंके एक महान्‌ नगरमें पहुँचा दिया । वहाँके खम्भे, घर गौर द्वार सभी मणियोंके बने हुए थे । उन सबको मोतीकी ड़ियों एवं झालरोंसे सजाया गया था। वहाँ ढेर-के-ढेर वेत शड्ोंकें समूह पड़े हुए थे। रत्न-राशियोंसे उस गरके घर-द्वारको विभूषित किया गया था। नूतन पल्लव, मंकुर और पत्तोंसे युक्त वृक्ष उस नगरकी शोभा बढ़ाते

अध्याय 92

श्लोक 53

सोऽपाकृष्यत वेगेन जले सर्पपुरं महत् ।मणिस्तम्भगृहद्वारं मुक्तादामविभूषितम्

so'pākṛṣyata vegena jale sarpapuraṃ mahat | maṇistambhagṛhadvāraṃ muktādāmavibhūṣitam

अर्थ श्लोक 52 के साथ

अध्याय 92

श्लोक 54

कीर्णं शङ्खकुलैः शुभ्रै रत्नराशिविभूषितम् ।प्रवालाङ्कुरपत्राढ्यैः पादपैरुपशोभितम्

kīrṇaṃ śaṅkhakulaiḥ śubhrai ratnarāśivibhūṣitam | pravālāṅkurapatrāḍhyaiḥ pādapairupaśobhitam

अर्थ श्लोक 52 के साथ

अध्याय 92

श्लोक 55

कीर्णं पन्नगनार्योघैः समुद्रोदरवासिभिः ।स्वर्णवर्णेन भास्वन्तं स्वस्तिकेनेन्दुवर्चसा

kīrṇaṃ pannaganāryoghaiḥ samudrodaravāsibhiḥ | svarṇavarṇena bhāsvantaṃ svastikenenduvarcasā

हिन्दी अर्थ

वहाँ समुद्रके उदरमें निवास करनेवाली ागललनाएँ भरी हुई थीं । वह ग्राम कहीं सुवर्णमय और रहीं चन्द्रमाके समान श्वेत कान्तिमान्‌ स्वस्तिकसे प्रकाशित ता था '

अध्याय 92

श्लोक 56

स तं ददर्श राजेन्द्रो विमले सागराम्भसि ।पन्नगेन्द्रपुरं तोये जगत्यामिव निर्मितम्

sa taṃ dadarśa rājendro vimale sāgarāmbhasi | pannagendrapuraṃ toye jagatyāmiva nirmitam

हिन्दी अर्थ

राजाधिराज यदुने उसे देखा—समुद्रके र्मल जलमें बना हुआ यह नागराजका नगर भूतलपर ी निर्मित हुआ-सा जान पड़ता है

अध्याय 92

श्लोक 57

स्वच्छं चैव पुरं तत्र प्रविवेश नृपो यदुः ।अगाधं तोयदाकारं पूर्णं सर्पवधूगणैः

svacchaṃ caiva puraṃ tatra praviveśa nṛpo yaduḥ | agādhaṃ toyadākāraṃ pūrṇaṃ sarpavadhūgaṇaiḥ

हिन्दी अर्थ

राजा यदुने र्पवधुओंसे भरे हुए उस अगाध जलदाकार स्वच्छ गरमें प्रवेश किया

अध्याय 92

श्लोक 58

तस्य दत्तं मणिमयं जलजं परमासनम् ।स्वास्तीर्णं पद्मपत्रैश्च पद्मसूत्रोत्तरच्छदम्

tasya dattaṃ maṇimayaṃ jalajaṃ paramāsanam | svāstīrṇaṃ padmapatraiśca padmasūtrottaracchadam

हिन्दी अर्थ

वहाँ उन्हें मणिमय कमलका मासन दिया गया, जिसपर पद्मोंके दल बिछे हुए थे और दयसूत्रोंकी ही बनी हुई चादर डाली गयी थी

अध्याय 92

श्लोक 59

तमासीनं नृपं तत्र परमे पन्नगासने ।द्विजिह्वपतिरव्यग्रो धूम्रवर्णोऽभ्यभाषत

tamāsīnaṃ nṛpaṃ tatra parame pannagāsane | dvijihvapatiravyagro dhūmravarṇo'bhyabhāṣata

हिन्दी अर्थ

र्पोंके दिये हुए उस उत्तम आसनपर जब राजा यदु वहाँ विराजमान हुए, तब सर्पराज धूम्रवर्णने उनसे शान्तभावसे हा—

अध्याय 92

श्लोक 60

पिता ते स्वर्गतिं प्राप्तः कृत्वा वंशमिमं महत् ।भवन्तं तेजसा युक्तमुत्पाद्य वसुधाधिपम्

pitā te svargatiṃ prāptaḥ kṛtvā vaṃśamimaṃ mahat | bhavantaṃ tejasā yuktamutpādya vasudhādhipam

हिन्दी अर्थ

राजन्‌ ! तुम्हारे पिता इस विशाल वंशकी व डालकर और तुम-जैसे तेजस्वी भूपालको जन्म कर स्वर्गलोकको चले गये

अध्याय 92

श्लोक 61

यादवानामयं वंशस्त्वन्नाम्ना यदुपुङ्गव ।पित्रा ते मङ्गलार्थाय स्थापितः पार्थिवाकरः

yādavānāmayaṃ vaṃśastvannāmnā yadupuṅgava | pitrā te maṅgalārthāya sthāpitaḥ pārthivākaraḥ

हिन्दी अर्थ

यदुपुड्भव ! तुम्हारे एमसे ही यह वंश यादववंश कहलायेगा । तुम्हारे पिताने म्हारे मड्लके लिये ही इस कुलकी स्थापना की है, पल राजाओंकी खान है

अध्याय 92

श्लोक 62

वंशे चास्मिंस्तव विभो देवानां तनयाव्ययाः ।ऋषीणामुरगाणां च उत्पत्स्यन्ते नृयोनिजाः

vaṃśe cāsmiṃstava vibho devānāṃ tanayāvyayāḥ | ṛṣīṇāmuragāṇāṃ ca utpatsyante nṛyonijāḥ

हिन्दी अर्थ

प्रभो ! तुम्हारे इस वंशें वताओं और ऋषियों तथा नागोंकी अक्षय संतानें मनुष्य- निमें उत्पन्न होंगी

अध्याय 92

श्लोक 63

तन्ममेमाः सुताः पञ्च कुमार्यो वृत्तसम्मताः ।उत्पन्ना यौवनाश्वस्य भगिन्यां नृपसत्तम

tanmamemāḥ sutāḥ pañca kumāryo vṛttasammatāḥ | utpannā yauvanāśvasya bhaginyāṃ nṛpasattama

हिन्दी अर्थ

नृपश्रेष्ठ! मेरी जो ये पाँच मारी कन्याएँ हैं, ये उत्तम आचार-व्यवहारसे सम्मानित । इनका जन्म यौवनाश्वकी बहिनके गर्भसे हुआ '

अध्याय 92

श्लोक 64

प्रतीच्छेमाः स्वधर्मेण प्राजापत्येन कर्मणा ।वरं च ते प्रदास्यामि वरार्हस्त्वं मतो मम

pratīcchemāḥ svadharmeṇa prājāpatyena karmaṇā | varaṃ ca te pradāsyāmi varārhastvaṃ mato mama

हिन्दी अर्थ

तुम अपने धर्मके अनुसार वैवाहिक विधिसे न कन्याओंको ग्रहण करो । मेरी धारणाके अनुसार तुम र पानेके योग्य हो, अत: मैं तुम्हें मनोवाज्छित वर भी गा

अध्याय 92

श्लोक 65

भैमाश्च कुकुराश्चैव भोजाश्चान्धकयादवाः ।दाशार्हा वृष्णयश्चेति ख्यातिं यास्यन्ति सप्त ते

bhaimāśca kukurāścaiva bhojāścāndhakayādavāḥ | dāśārhā vṛṣṇayaśceti khyātiṃ yāsyanti sapta te

हिन्दी अर्थ

तुमसे सात कुल विख्यात होंगे, जो भैम, क्कुर, भोज, अन्धक, यादव, दाशाह तथा वृष्णिके मसे प्रसिद्ध होंगे'

अध्याय 92

श्लोक 66

स तस्मै धूम्रवर्णो वै कन्याः कन्याव्रते स्थिताः ।जलपूर्णेन योगेन ददाविन्द्रसमाय वै

sa tasmai dhūmravarṇo vai kanyāḥ kanyāvrate sthitāḥ | jalapūrṇena yogena dadāvindrasamāya vai

हिन्दी अर्थ

ऐसा कहकर धूम्रवर्णने नद्रतुल्य तेजस्वी यदुको कन्याब्रतमें स्थित हुई वे न्याएँ हाथमें जल लेकर संकल्पपूर्वक दे दीं

अध्याय 92

श्लोक 67

वरं चास्मै ददौ प्रीतः स वै पन्नगपुङ्गवः ।श्रावयन् कन्यकाः सर्वा यथाक्रममदीनवत्

varaṃ cāsmai dadau prītaḥ sa vai pannagapuṅgavaḥ | śrāvayan kanyakāḥ sarvā yathākramamadīnavat

हिन्दी अर्थ

फर उन नागशिरोमणि धूम्रवर्णने प्रसन्न होकर समस्त न्याओंको सुनाते हुए एक उदार पुरुषकी भाँति जाको क्रमश: वर प्रदान किये

अध्याय 92

श्लोक 68

एतासु ते सुताः पञ्च सुतासु मम मानद ।उत्पत्स्यन्ते पितुस्तेजो मातुश्चैव समाश्रिताः

etāsu te sutāḥ pañca sutāsu mama mānada | utpatsyante pitustejo mātuścaiva samāśritāḥ

हिन्दी अर्थ

मानद! मेरी इन पाँच कन्याओंसे तुम्हारे पाँच पुत्र त्पन्न होंगे, जो पिता और माता दोनोंके तेजसे सम्पन्न गि

अध्याय 92

श्लोक 69

अस्मत्समयबद्धाश्च सलिलाभ्यन्तरेचराः ।तव वंशे भविष्यन्ति पार्थिवाः कामरूपिणः

asmatsamayabaddhāśca salilābhyantarecarāḥ | tava vaṃśe bhaviṣyanti pārthivāḥ kāmarūpiṇaḥ

हिन्दी अर्थ

हमारे वरदानसे अनुगृहीत होकर तुम्हारे शके वे सभी राजा जलके भीतर विचरनेवाले तथा च्छानुसार रूप धारण करनेमें समर्थ होंगे '

अध्याय 92

श्लोक 70

स वरं कन्यकाश्चैव लब्ध्वा यदुवरस्तदा ।उदतिष्ठत् वेगेन सलिलाच्चन्द्रमा इव

sa varaṃ kanyakāścaiva labdhvā yaduvarastadā | udatiṣṭhat vegena salilāccandramā iva

हिन्दी अर्थ

वे श्रेष्ठ दु उस समय वर और उन कन्याओंको पाकर चन्द्रमाके मान वेगपूर्वक जलसे ऊपर उठे

अध्याय 92

श्लोक 71

स पञ्चकन्यामध्यस्थो ददृशे तत्र पार्थिवः ।पञ्चतारेण संयुक्तो नक्षत्रेणेव चन्द्रमाः

sa pañcakanyāmadhyastho dadṛśe tatra pārthivaḥ | pañcatāreṇa saṃyukto nakṣatreṇeva candramāḥ

हिन्दी अर्थ

पाँच कन्याओंके चमें स्थित हुए राजा यदु वहाँ पाँच ताराओंवाले क्षत्रसे संयुक्त चन्द्रमाके समान दिखायी देते थे

अध्याय 92

श्लोक 72

स तदन्तःपुरं सर्वं ददर्श नृपसत्तमः ।वैवाहिकेन वेषेण दिव्यस्रगनुलेपनः

sa tadantaḥpuraṃ sarvaṃ dadarśa nṛpasattamaḥ | vaivāhikena veṣeṇa divyasraganulepanaḥ

हिन्दी अर्थ

वाहिक वेशसे युक्त तथा दिव्य हार एवं चन्दन धारण रनेवाले नृपश्रेष्ठ यदुने जलसे बाहर आकर अपने मस्त अन्त:पुरको वहाँ उपस्थित देखा

अध्याय 92

श्लोक 73

समाश्वास्य च ताः सर्वाः स पत्नीः पावकोपमाः ।जगाम स्वपुरं राजा प्रीत्या परमया युतः

samāśvāsya ca tāḥ sarvāḥ sa patnīḥ pāvakopamāḥ | jagāma svapuraṃ rājā prītyā paramayā yutaḥ

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर पग्निके समान तेजस्विनी उन सारी पत्नियोंको आश्वासन कर राजा यदु अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक उन सबके साथ पपने नगरकों चले गये'

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.