Harivamsha Purana
94
अध्याय 94 / 318

Parva 2, Adhyāya 39

83 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ83 श्लोक

अध्याय 94

श्लोक 1

पुर्याः पुरवासिनां च रक्षणाय बलरामकृष्णयोः मथुरातः दक्षिणभारतं प्रति प्रस्थानम्, परशुरामस्य दर्शनम्, तेन गोमन्तपर्वतोपरि गमनाय ताभ्यां मन्त्रणं विकद्रोस्तु वचः श्रुत्वा वसुदवो महायशाः ।परितुष्टेन मनसा वचनं चेदमब्रवीत्

puryāḥ puravāsināṃ ca rakṣaṇāya balarāmakṛṣṇayoḥ mathurātaḥ dakṣiṇabhārataṃ prati prasthānam, paraśurāmasya darśanam, tena gomantaparvatopari gamanāya tābhyāṃ mantraṇaṃ vikadrostu vacaḥ śrutvā vasudavo mahāyaśāḥ | parituṣṭena manasā vacanaṃ cedamabravīt

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! विकद्ठुकी बात सुनकर महायशस्वी वसुदेव संतुष्चित्तसे इस प्रकार बोले-

अध्याय 94

श्लोक 2

राजा षाड्गुण्यवक्ता वै राजा मन्त्रार्थतत्त्ववित् ।सतत्त्वं च हितं चैव कृष्णोक्तं किल धीमता

rājā ṣāḍguṇyavaktā vai rājā mantrārthatattvavit | satattvaṃ ca hitaṃ caiva kṛṣṇoktaṃ kila dhīmatā

हिन्दी अर्थ

श्रीकृष्ण ! जो राजनीतिके छः गुर्णोंसे युक्त बात बोले अथवा उन छहों गुणोंके उपयोगका अवसर बताये, वह राजा है। जो मन्त्रार्थतत्त्व (गुप्त मन्त्रणाका प्रयोजन एवं महत्त्व) समझता हो, वह राजा है। बुद्धिमान्‌ विकद्ठुने तत्व और हितकी बात बतायी है

अध्याय 94

श्लोक 3

भाषिता राजधर्माश्च सत्याश्च जगतो हिताः ।विक्रद्रुणा यदुश्रेष्ठ यद्धितं तद् विधीयताम्

bhāṣitā rājadharmāśca satyāśca jagato hitāḥ | vikradruṇā yaduśreṣṭha yaddhitaṃ tad vidhīyatām

हिन्दी अर्थ

यदुश्रेष्ठ! विकद्ठने उन राजधर्मोका प्रतिपादन किया है, जो सत्य होनेके साथ ही जगत्‌के लिये हितकर हैं। अब तुम्हें जो हितकर जान पड़े, वह करो '

अध्याय 94

श्लोक 4

एतच्छ्रुत्वा पितुर्वाक्यं विक्रद्रोश्च महात्मनः ।वाक्यमुत्तममेकाग्रो बभाषे पुरुषोत्तमः

etacchrutvā piturvākyaṃ vikradrośca mahātmanaḥ | vākyamuttamamekāgro babhāṣe puruṣottamaḥ

हिन्दी अर्थ

अपने पिता वसुदेव तथा महात्मा विकद्ठुका यह कथन सुनकर पुरुषोत्तम श्रीकृष्णने एकाग्रचित्त होकर यह उत्तम बात कही—

अध्याय 94

श्लोक 5

ब्रुवतां वः श्रुतं वाक्यं हेतुतः क्रमतस्तथा ।न्यायतः शास्त्रतश्चैव दैवं चैवानुपश्यताम्

bruvatāṃ vaḥ śrutaṃ vākyaṃ hetutaḥ kramatastathā | nyāyataḥ śāstrataścaiva daivaṃ caivānupaśyatām

हिन्दी अर्थ

आपलोगोंने वैरके मूल- कारण शत्रुके पराक्रम, न्यायोचित बर्ताव, शास्त्रकी आज्ञा तथा दैववश भविष्यमें होनेवाले कार्यपर दृष्टि रखते हुए जो कुछ कहा है, वह सब मैंने सुन लिया

अध्याय 94

श्लोक 6

श्रूयतामुत्तरं वाक्यं श्रुत्वा च परिगृह्यताम् ।नयेन व्यवहर्तव्यं पार्थिवेन यथाक्रमम्

śrūyatāmuttaraṃ vākyaṃ śrutvā ca parigṛhyatām | nayena vyavahartavyaṃ pārthivena yathākramam

श्लोक 6–7 का हिन्दी अर्थ

अब उसका उत्तर सुनिये और सुनकर यदि ठीक जँचे तो उसे ग्रहण कीजिये। इसमें संदेह नहीं कि राजाको राजनीतिके अनुसार व्यवहार करना चाहिये। उसके लिये यह उचित है कि संधि, विग्रह, यान, आसन, ह्रैधीभाव और समाश्रय—इन छः गुणोंका क्रमश: सदा चिन्तन करता रहे*

अध्याय 94

श्लोक 7

सन्धिं च विग्रहं चैव यानमासनमेव च ।द्वैधीभावं संश्रयं च षाड्गुण्यं चिन्तयेत् सदा

sandhiṃ ca vigrahaṃ caiva yānamāsanameva ca | dvaidhībhāvaṃ saṃśrayaṃ ca ṣāḍguṇyaṃ cintayet sadā

अर्थ श्लोक 6 के साथ

अध्याय 94

श्लोक 8

बलिनः सन्निकृष्टे तु न स्थेयं पण्डितेन वै ।अपक्रमेद्धि कालज्ञः समर्थो युद्धमुद्वहेत्

balinaḥ sannikṛṣṭe tu na stheyaṃ paṇḍitena vai | apakrameddhi kālajñaḥ samartho yuddhamudvahet

हिन्दी अर्थ

विद्वान्‌ पुरुषको चाहिये कि वह बलवान्‌ शत्रुके समीप न ठहरे। समयका ज्ञान रखनेवाला पुरुष बलवान्‌ शत्रुसे अपनी रक्षा करनेके लिये स्थान छोड़कर हट जाय। यदि वह शत्रुसेनाका सामना करनेके लिये समर्थ हो तो युद्धका बोझ उठाये

अध्याय 94

श्लोक 9

अहं तावत् सहार्येण मुहूर्तेऽस्मिन् प्रकाशिते ।जीवितार्थे गमिष्यामि शक्तिमानप्यशक्तवत्

ahaṃ tāvat sahāryeṇa muhūrte'smin prakāśite | jīvitārthe gamiṣyāmi śaktimānapyaśaktavat

हिन्दी अर्थ

मैं शक्तिशाली होकर भी असमर्थकी भाँति इस वर्तमान मुहूर्तमें भैया बलरामजीके साथ जीवनकी रक्षाके लिये यहाँसे पलायन करूँगा

अध्याय 94

श्लोक 10

ततः सह्याचलयुतं सहार्येणाहमक्षयम् ।आत्मद्वितीयः श्रीमन्तं प्रवेक्ष्ये दक्षिणापथम्

tataḥ sahyācalayutaṃ sahāryeṇāhamakṣayam | ātmadvitīyaḥ śrīmantaṃ pravekṣye dakṣiṇāpatham

हिन्दी अर्थ

कार है—शत्रुसे मेल रखना संधि, उससे लड़ाई छेड़ना विग्रह, गी नीति बर्तना ट्रैधीभाव और अपनेसे बलवान्‌ राजाकी शरण ँशो + 'ढं५७ यहाँसे प्रस्थान करनेके बाद मैं आर्य बलरामके साथ अपने-आपको ही उनका दूसरा साथी बनाकर उस अक्षय शोभासम्पम्न दक्षिणापथमें प्रवेश करूँगा, जो सह्मपर्वतसे मिला-जुला है

अध्याय 94

श्लोक 11

करवीरपुरं चैव रम्यं क्रौञ्चपुरं तथा ।द्रक्ष्यावस्तत्र सहितौ गोमन्तं च नगोत्तमम्

karavīrapuraṃ caiva ramyaṃ krauñcapuraṃ tathā | drakṣyāvastatra sahitau gomantaṃ ca nagottamam

हिन्दी अर्थ

वहाँ हम दोनों भाई एक साथ रहकर करवीरपुर, रमणीय क्रौज्अपुर तथा पर्वतश्रेष्ठ गोमन्तका दर्शन करेंगे

अध्याय 94

श्लोक 12

आवयोर्गमनं श्रुत्वा जितकाशी स पार्थिवः ।अप्रविश्य पुरीं दर्पादनुसारं करिष्यति

āvayorgamanaṃ śrutvā jitakāśī sa pārthivaḥ | apraviśya purīṃ darpādanusāraṃ kariṣyati

हिन्दी अर्थ

हमलोगोंका दक्षिण-गमन सुनकर विजयसे सुशोभित होनेवाला राजा जरासंध बलके घमण्डमें आकर मथुरापुरीमें प्रवेश न करके हमारा पीछा ही करेगा

अध्याय 94

श्लोक 13

ततः सह्यवनेष्वेव राजा याति स सानुगः ।आवयोर्ग्रहणे चैव नृपतिः प्रयतिष्यति

tataḥ sahyavaneṣveva rājā yāti sa sānugaḥ | āvayorgrahaṇe caiva nṛpatiḥ prayatiṣyati

हिन्दी अर्थ

तत्पश्चात्‌ हमारा अनुसरण करता हुआ वह राजा सेवकोंसहित सद्याचलके वनोंमें ही जा पहुँचेगा और हम दोनोंको पकड़ लेनेके लिये पूरा प्रयत्न करेगा

अध्याय 94

श्लोक 14

एषा नः श्रेयसी यात्रा भविष्यति कुलस्य वै ।पौराणामथ पुर्याश्च देशस्य च सुखावहा

eṣā naḥ śreyasī yātrā bhaviṣyati kulasya vai | paurāṇāmatha puryāśca deśasya ca sukhāvahā

हिन्दी अर्थ

हमारी यह यात्रा इस यादवकुलके लिये कल्याणकारिणी होगी तथा पुर- वासियोंके, मथुरापुरीके एवं इस शूरसेन-देशके लिये भी सुखदायिनी होगी

अध्याय 94

श्लोक 15

न च शत्रोः परिभ्रष्टा राजानो विजिगीषवः ।परराष्ट्रेषु मृष्यन्ति मृधे शत्रोः क्षयं विना

na ca śatroḥ paribhraṣṭā rājāno vijigīṣavaḥ | pararāṣṭreṣu mṛṣyanti mṛdhe śatroḥ kṣayaṃ vinā

हिन्दी अर्थ

विजयकी इच्छा रखनेवाले राजालोग जब शत्रु हाथमें आकर निकल जाता है, तब वे उस शत्रुके राज्योंमें पहुँचकर युद्धमें उसका वध किये बिना शान्त नहीं होते हैं

अध्याय 94

श्लोक 16

एवमुक्त्वा तु तौ वीरौ कृष्णसङ्कर्षणावुभौ ।प्रपेदतुरसम्भ्रान्तौ दक्षिणौ दक्षिणापथम्

evamuktvā tu tau vīrau kṛṣṇasaṅkarṣaṇāvubhau | prapedaturasambhrāntau dakṣiṇau dakṣiṇāpatham

हिन्दी अर्थ

ऐसा कहकर वे दोनों नीतिनिपुण वीर श्रीकृष्ण और संकर्षण बिना किसी घबराहटके दक्षिणापथकी ओर चल दिये

अध्याय 94

श्लोक 17

तौ तु राष्ट्राणि शतशश्चरन्तौ कामरूपिणौ ।दक्षिणां दिशमास्थाय चेरतुर्मार्गगौ सुखम्

tau tu rāṣṭrāṇi śataśaścarantau kāmarūpiṇau | dakṣiṇāṃ diśamāsthāya ceraturmārgagau sukham

हिन्दी अर्थ

इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले वे दोनों वीर सैकड़ों रास्तोंपर विचरते हुए दक्षिण दिशामें पहुँचकर उत्तम मार्गका आश्रय ले सुखपूर्वक आगे बढ़ने लगे

अध्याय 94

श्लोक 18

सह्यपृष्ठेषु रम्येषु मोदमानावुभौ तथा ।दक्षिणापथगौ वीरावध्वानं सम्प्रपेदतुः

sahyapṛṣṭheṣu ramyeṣu modamānāvubhau tathā | dakṣiṇāpathagau vīrāvadhvānaṃ samprapedatuḥ

हिन्दी अर्थ

सह्यपर्वतके रमणीय शिखरोंपर सानन्द विचरते हुए वे दोनों दक्षिणापथके वीर यात्री अपने मार्गपर बढ़ते ही चले गये

अध्याय 94

श्लोक 19

तौ च स्वल्पेन कालेन सह्याचलविभूषितम् ।करवीरपुरं प्राप्तौ स्ववंशेन विभूषितम्

tau ca svalpena kālena sahyācalavibhūṣitam | karavīrapuraṃ prāptau svavaṃśena vibhūṣitam

हिन्दी अर्थ

थोड़े ही समयमें वे दोनों भाई सह्यकी पर्वत-मालाओंसे अलंकृत करवीरपुरमें जा पहुँचे, जो उन्हींके वंशके लोगोंसे विभूषित था

अध्याय 94

श्लोक 20

तौ तत्र गत्वा वेणाया नद्यास्तीरान्तमाश्रितम् ।आसेदतुः प्ररोहाढ्यं न्यग्रोधं तरुपुङ्गवम्

tau tatra gatvā veṇāyā nadyāstīrāntamāśritam | āsedatuḥ prarohāḍhyaṃ nyagrodhaṃ tarupuṅgavam

हिन्दी अर्थ

वहाँ पहुँचकर वे दोनों वीर वेणा नदीके तटपर ही बढ़े हुए वरोहोंसे युक्त एक श्रेष्ठ वृक्ष बरगदके समीप गये

अध्याय 94

श्लोक 21

अधस्तात् तस्य वृक्षस्य मुनिं दीप्ततपोधनम् ।अंसावसक्तपरशुं जटावल्कलधारिणम्

adhastāt tasya vṛkṣasya muniṃ dīptatapodhanam | aṃsāvasaktaparaśuṃ jaṭāvalkaladhāriṇam

श्लोक 21–25 का हिन्दी अर्थ

उस वृक्षके नीचे उद्दीप्त तपस्वी भृूगुनन्दन परशुरामजी विराज- मान थे, जिनके एक कंधेपर फरसा सटा हुआ था और जो जटा और वल्कल धारण किये हुए थे। उनके शरीरका वर्ण गौर तथा अग्निशिखाके समान प्रकाशमान था। वे सूर्यके समान तेजस्वी दिखायी देते थे । क्षत्रियोंका अन्त करनेवाले परशुराम किसीसे क्षुब्ध होनेवाले नहीं थे। वे मूर्तिमान्‌ समुद्रके समान गम्भीर प्रतीत होते थे। इनका अग्न्याधान-सम्बन्धी कार्य समाप्त एवं संकुचित ही चुका था, फिर भी वे समय-समयपर प्रज्वलित भग्निमें आहुति दिया करते थे। तीनों समय स्नान करनेके कारण उनका शरीर एवं वस्त्र जलसे भीगे हुए पे। वे देवताओंके आदिगुरु बृहस्पतिके समान जान डड़ते थे। उनके पास जो श्वेत रंगकी सवत्सा (बछड़ेवाली ) पेनु थी, वह केवल होमके लिये दुही जाती थी, सलिये होमधेनु कहलाती थी । इसके सिवा वह मुनिकी च्छाके अनुसार समस्त वस्तुओंको देनेमें समर्थ थी, सलिये कामदोहना या कामधेनु कहलाती थी । दूधरूपी भग्निको प्रकट करनेके लिये अरणीके समान शोभित गनेवाली उस होमधेनुको परशुरामजी कहीं खींचकर ने जा रहे थे। वे कभी परिश्रमसे थकते नहीं हैं और मविनाशी हैं। श्रीकृष्ण और बलरामने महेन्द्र गिरिपर विचरनेवाले परशुरामजीको वहाँ मन्दराचलके शिखरपर काशित होनेवाले सूर्यके समान देखा

अध्याय 94

श्लोक 22

गौरमग्निशिखाकारं तेजसा भास्करोपमम् ।क्षत्रान्तकरमक्षोभ्यं वपुष्मन्तमिवार्णवम्

gauramagniśikhākāraṃ tejasā bhāskaropamam | kṣatrāntakaramakṣobhyaṃ vapuṣmantamivārṇavam

अर्थ श्लोक 21 के साथ

अध्याय 94

श्लोक 23

न्यस्तसङ्कुचिताधानं काले हुतहुताशनम् ।क्लिन्नं त्रिषवणाम्भोभिराद्यं देवगुरुं यथा

nyastasaṅkucitādhānaṃ kāle hutahutāśanam | klinnaṃ triṣavaṇāmbhobhirādyaṃ devaguruṃ yathā

अर्थ श्लोक 21 के साथ

अध्याय 94

श्लोक 24

सवत्सां धेनुकां श्वेतां होमधुक् कामदोहनाम् ।क्षीरारणिं कर्षमाणं महेन्द्रगिरिगोचरम्

savatsāṃ dhenukāṃ śvetāṃ homadhuk kāmadohanām | kṣīrāraṇiṃ karṣamāṇaṃ mahendragirigocaram

अर्थ श्लोक 21 के साथ

अध्याय 94

श्लोक 25

ददृशतुस्तौ सहितावपरिश्रान्तमव्ययम् ।भार्गवं राममासीनं मन्दरस्थं यथा रविम्

dadṛśatustau sahitāvapariśrāntamavyayam | bhārgavaṃ rāmamāsīnaṃ mandarasthaṃ yathā ravim

अर्थ श्लोक 21 के साथ

अध्याय 94

श्लोक 26

न्यायतस्तौ तु तं दृष्ट्वा पादमूले कृताञ्जली ।वसुदेवसुतौ वीरौ सधिष्ण्याविव पावकौ

nyāyatastau tu taṃ dṛṣṭvā pādamūle kṛtāñjalī | vasudevasutau vīrau sadhiṣṇyāviva pāvakau

हिन्दी अर्थ

नका दर्शन करके वसुदेवके उन दोनों वीर पुत्रोंने यायानुसार उनके चरणोंमें हाथ जोड़कर प्रणाम किया। | उस समय वेदीपर प्रज्वलित अग्नियोंके समान जान ड्ते थे

अध्याय 94

श्लोक 27

कृष्णस्तमृषिशार्दूलमुवाच वदतां वरः ।श्लक्ष्णं मधुरया वाचा लोकवृत्तान्तकोविदः

kṛṣṇastamṛṣiśārdūlamuvāca vadatāṃ varaḥ | ślakṣṇaṃ madhurayā vācā lokavṛttāntakovidaḥ

हिन्दी अर्थ

इसके बाद वक्ताओंमें श्रेष्ठ एवं कवृत्तान्तके ज्ञानमें कुशल श्रीकृष्णने मुनिश्रेष्ठ परशुरामजीसे नेहयुक्त मधुर वाणीमें कहा—

अध्याय 94

श्लोक 28

भगवन् जामदग्न्यं त्वामवगच्छामि भार्गवम् ।रामं मुनीनामृषभं क्षत्रियाणां कुलान्तकम्

bhagavan jāmadagnyaṃ tvāmavagacchāmi bhārgavam | rāmaṃ munīnāmṛṣabhaṃ kṣatriyāṇāṃ kulāntakam

हिन्दी अर्थ

भगवन्‌! मैं [मझता हूँ कि आप भृगुकुलभूषण क्षत्रियकुलविनाशक निश्नेष्ठ जमदग्निनन्दन परशुरामजी हैं

अध्याय 94

श्लोक 29

त्वया सायकवेगेन क्षिप्तो भार्गव सागरः ।इषुपातेन नगरं कृतं शूर्पारकं त्वया

tvayā sāyakavegena kṣipto bhārgava sāgaraḥ | iṣupātena nagaraṃ kṛtaṃ śūrpārakaṃ tvayā

हिन्दी अर्थ

भृगुनन्दन ! आपने अपने बाणके वेगसे समुद्रको पीछे ढकेल दिया और जितनी दूरीमें बाण गिरा समुद्रसे उतनी ही भूमि कर वहाँ शू्पारक नगरका निर्माण किया

अध्याय 94

श्लोक 30

धनुःपञ्चशतायाममिषुपञ्चशतोच्छ्रयम् ।सह्यस्य च निकुञ्जेषु स्फीतो जनपदो महान्

dhanuḥpañcaśatāyāmamiṣupañcaśatocchrayam | sahyasya ca nikuñjeṣu sphīto janapado mahān

हिन्दी अर्थ

उस गरकी लम्बाई पाँच सौ धनुष और चौड़ाई पाँच सौ ण है * । सह्मपर्वतके निकुज्ोंमें वह समृद्धिशाली महान्‌ नपद बसा हुआ है

अध्याय 94

श्लोक 31

अतिक्रम्योदधेर्वेलामपरान्ते निवेशितः ।त्वया तत् कार्तवीर्यस्य सहस्रभुजकाननम्

atikramyodadhervelāmaparānte niveśitaḥ | tvayā tat kārtavīryasya sahasrabhujakānanam

श्लोक 31–33 का हिन्दी अर्थ

आपने समुद्रवेलाका उल्लड्जन रके अपरान्तदेशमें (जो पश्चिम समुद्रके तटपर है) स महानू जनपदको बसाया है। आपने ही अपने पताकी मृत्युको याद करके एक ही फरसेसे कार्तवीर्यकी हस्र भुजाओंका वह जंगल काट डाला था। आपके रा मारे गये जो शत्रुभूत क्षत्रिय थे, आपके फरसेसे वाहित हुए उनके स्निग्ध रुधिरसे आज भी यह सुन्धरा भीगकर रक्तकी कीचसे युक्त दिखायी देती है। जानता हूँ कि आप भूमण्डलके क्षत्रियोंपर रोष प्रकट रनेवाले रेणुकानन्दन परशुराम हैं

अध्याय 94

श्लोक 32

छिन्नं परशुनैकेन स्मरता निधनं पितुः ।इयमद्यापि रुधिरैः क्षत्रियाणां हतद्विषाम्

chinnaṃ paraśunaikena smaratā nidhanaṃ pituḥ | iyamadyāpi rudhiraiḥ kṣatriyāṇāṃ hatadviṣām

अर्थ श्लोक 31 के साथ

अध्याय 94

श्लोक 33

स्निग्धैस्त्वत्परशूत्सृष्टै रक्तपङ्का वसुन्धरा ।रैणुकेयं विजाने त्वां क्षितौ क्षितिपरोषणम्

snigdhaistvatparaśūtsṛṣṭai raktapaṅkā vasundharā | raiṇukeyaṃ vijāne tvāṃ kṣitau kṣitiparoṣaṇam

अर्थ श्लोक 31 के साथ

अध्याय 94

श्लोक 34

परशुप्रग्रहे युक्तं यथैवेह रणे तथा ।तदिच्छावस्त्वया विप्र कञ्चिदर्थमुपश्रुतम्

paraśupragrahe yuktaṃ yathaiveha raṇe tathā | tadicchāvastvayā vipra kañcidarthamupaśrutam

श्लोक 34–36 का हिन्दी अर्थ

पा है। शोउध्याय: + ५९ क्योंकि आप रणभूमिकी ही भाँति यहाँ भी फरसा लिये हुए हैं, अत: विप्रवर! हम दोनों आपसे एक बात पूछना चाहते हैं तथा आप हमारी बात सुनकर निर्भीक हो हमें जो उत्तर देंगे, उसे सुननेकी भी हमारी इच्छा है। मुनिश्रेष्ठ परशुराम ! हमारी निवासभूमि मथुरापुरी है, जो यमुनातटपर शोभा पाती है। हम दोनों यादव हैं । यदि हमारे नाम भी कभी आपके कानोंमें पड़े हों तो आप हमें जानते भी होंगे। यदुकुलके श्रेष्ठ पुरुष तथा उत्तम व्रत धारण करनेवाले वसुदेवजी हम दोनोंके पिता हैं

अध्याय 94

श्लोक 35

उत्तरं च श्रुतार्थेन प्रत्युक्तमविशङ्कया ।आवयोर्मथुरा राम यमुनातीरशोभिनी

uttaraṃ ca śrutārthena pratyuktamaviśaṅkayā | āvayormathurā rāma yamunātīraśobhinī

अर्थ श्लोक 34 के साथ

अध्याय 94

श्लोक 36

यादवौ स्वो मुनिश्रेष्ठ यदि ते श्रुतिमागतौ ।वसुदेवो यदुश्रेष्ठः पिता नौ हि धृतव्रतः

yādavau svo muniśreṣṭha yadi te śrutimāgatau | vasudevo yaduśreṣṭhaḥ pitā nau hi dhṛtavrataḥ

अर्थ श्लोक 34 के साथ

अध्याय 94

श्लोक 37

जन्मप्रभृति चैवावां व्रजेष्वेव नियोजितौ ।तौ स्वः कंसभयात् तत्र शङ्कितौ परिवर्द्धितौ

janmaprabhṛti caivāvāṃ vrajeṣveva niyojitau | tau svaḥ kaṃsabhayāt tatra śaṅkitau parivarddhitau

हिन्दी अर्थ

हम दोनों भाई जन्मसे ही कंसके भयसे ब्रजमें ही रखे गये और वहीं उससे शड्लित रहकर बड़े हुए हैं

अध्याय 94

श्लोक 38

वयञ्च प्रथमं प्राप्तौ मथुरायां प्रवेशितौ ।तावावां व्युत्थितं हत्वा समाजे कंसमोजसा

vayañca prathamaṃ prāptau mathurāyāṃ praveśitau | tāvāvāṃ vyutthitaṃ hatvā samāje kaṃsamojasā

श्लोक 38–39 का हिन्दी अर्थ

प्रथम किशोरावस्थाको प्राप्त होनेपर हम दोनों भाइयोंका मथुरामें प्रवेश हुआ। वहाँ हमने धर्म- मर्यादासे विचलित हुए कंसको रंगशालामें बलपूर्वक मार डाला और उसके राज्यपर उसीके पिताको राजा बनाकर बिठा दिया। तत्पश्चात्‌ सदासे गोपालन-सम्बन्धी कार्य करनेवाले हम दोनों भाइयोंने फिर वही अपना काम-धंधा आरम्भ कर दिया

अध्याय 94

श्लोक 30b

पितरं तस्य तत्रैव स्थापयित्वा जनेश्वरम् ।स्वमेव कर्म चारब्धौ गवां व्यापारकारकौ

pitaraṃ tasya tatraiva sthāpayitvā janeśvaram | svameva karma cārabdhau gavāṃ vyāpārakārakau

अध्याय 94

श्लोक 40

अथावयोः पुरं रोद्धुं जरासन्धो व्यवस्थितः ।सङ्ग्रामान्सुबहून्कृत्वा लब्धलक्षावपि स्वयम्

athāvayoḥ puraṃ roddhuṃ jarāsandho vyavasthitaḥ | saṅgrāmānsubahūnkṛtvā labdhalakṣāvapi svayam

श्लोक 40–41 का हिन्दी अर्थ

तदनन्तर राजा जरासंधने हम दोनोंके नगरपर घेरा डालनेके लिये निश्चित विचार कर लिया। यद्यपि हम दोनों उसके साथ बहुत युद्ध कर चुके हैं और उनमें अपना लक्ष्य सिद्ध करनेमें सफल भी हुए हैं तथापि अपने नगर और प्रजाजनोंकी रक्षाके लिये हमने जरासंधसे लड़नेके लिये कोई उद्योग नहीं किया। व्रतधारी मुने ! अभी हमलोगोंको शक्ति और साधनका संचय करना है, अतः: अकृतार्थ होकर ही हमलोग वहाँसे चल पड़े

अध्याय 94

श्लोक 41

ततः स्वपुररक्षार्थं प्रजानां च धृतव्रत ।अकृतार्थावनुद्योगौ कर्तव्यबलसाधनौ

tataḥ svapurarakṣārthaṃ prajānāṃ ca dhṛtavrata | akṛtārthāvanudyogau kartavyabalasādhanau

अर्थ श्लोक 40 के साथ

अध्याय 94

श्लोक 42

अरथौ पत्तिनौ युद्धे निस्तनुत्रौ निरायुधौ ।जरासन्धोद्यमभयात् पुराद् द्वावेव निःसृतौ

arathau pattinau yuddhe nistanutrau nirāyudhau | jarāsandhodyamabhayāt purād dvāveva niḥsṛtau

हिन्दी अर्थ

हमारे पास युद्धके लिये रथ नहीं है। हम पैदल ही हैं। हमारे शरीरपर कवच और हाथोंमें अस्त्र-शस्त्र भी नहीं हैं। हम जरासंधके आक्रमणके भयसे नगरको छोड़कर केवल दो ही जने वहाँसे निकल आये हैं

अध्याय 94

श्लोक 43

एवमावामनुप्राप्तौ मुनिश्रेष्ठ तवान्तिकम् ।आवयोर्मन्त्रमात्रेण कर्तुमर्हसि सत्क्रियाम्

evamāvāmanuprāptau muniśreṣṭha tavāntikam | āvayormantramātreṇa kartumarhasi satkriyām

हिन्दी अर्थ

मुनिश्रेष्ठ ! इस प्रकार हम दोनों आपके निकट आये हैं । आप हमें सलाहमात्र देकर हमारा सत्कार करें

अध्याय 94

श्लोक 44

श्रुत्वैतद् भार्गवो रामस्तयोर्वाक्यमनिन्दितम् ।रेणुकेयः प्रतिवचो धर्मसंहितमब्रवीत्

śrutvaitad bhārgavo rāmastayorvākyamaninditam | reṇukeyaḥ prativaco dharmasaṃhitamabravīt

श्लोक 44–45 का हिन्दी अर्थ

प्रभावशाली श्रीकृष्ण! मैं तुम दोनोंको सलाह देनेके लिये ही इस समय यहाँ अपरान्तसे अकेला ही चला आया हूँ। शिष्योंको भी मैंने साथ नहीं लिया है

अध्याय 94

श्लोक 45

अपरान्तादहं कृष्ण सम्प्रतीहागतः प्रभो ।एक एव विना शिष्यैर्युवयोर्मन्त्रकारणात्

aparāntādahaṃ kṛṣṇa sampratīhāgataḥ prabho | eka eva vinā śiṣyairyuvayormantrakāraṇāt

अर्थ श्लोक 44 के साथ

अध्याय 94

श्लोक 46

विदितो मे व्रजे वासस्तव पद्मनिभेक्षण ।दानवानां वधश्चापि कंसस्यापि दुरात्मनः

vidito me vraje vāsastava padmanibhekṣaṇa | dānavānāṃ vadhaścāpi kaṃsasyāpi durātmanaḥ

हिन्दी अर्थ

कमलनयन! तुम्हारा जो ब्रजमें निवास हुआ है तथा तुम्हारे हाथसे जो दानवों और दुरात्मा कंसका वध हुआ है, वह सब मुझे विदित है'

अध्याय 94

श्लोक 47

विग्रहं च जरासन्धे विदित्वा पुरुषोत्तम ।तव सभ्रातृकस्येह सम्प्राप्तोऽस्मि वरानन

vigrahaṃ ca jarāsandhe viditvā puruṣottama | tava sabhrātṛkasyeha samprāpto'smi varānana

हिन्दी अर्थ

सुन्दर मुखवाले पुरुषोत्तम ! जरासंधके साथ होनेवाले विग्रहको जानकर ही मैं भाईसहित तुमसे मिलनेके लिये यहाँ आ गया हूँ

अध्याय 94

श्लोक 48

जाने त्वां कृष्ण गोप्तारं जगतः प्रभुमव्ययम् ।देवकार्यार्थसिद्ध्यर्थमबालं बालतां गतम्

jāne tvāṃ kṛṣṇa goptāraṃ jagataḥ prabhumavyayam | devakāryārthasiddhyarthamabālaṃ bālatāṃ gatam

हिन्दी अर्थ

श्रीकृष्ण! मैं तुम्हें अच्छी तरह जानता हूँ। तुम जगत्‌के रक्षक अविनाशी भगवान्‌ हो और देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये बालक न होनेपर भी बालक बनकर प्रकट हुए हो

अध्याय 94

श्लोक 49

न त्वयाविदितं किञ्चित् त्रिषु लोकेषु विद्यते ।तथापि भक्तिमात्रेण शृणु वक्ष्यामि ते वचः

na tvayāviditaṃ kiñcit triṣu lokeṣu vidyate | tathāpi bhaktimātreṇa śṛṇu vakṣyāmi te vacaḥ

हिन्दी अर्थ

तीनों लोकोंमें जो कुछ भी है, वह तुमसे अविदित नहीं है' (अत: तुम्हें सलाह देनेकी कोई आवश्यकता नहीं है) तथापि मैं अपनी भक्तिमात्रसे प्रेरित हो तुमसे जो बात कहता हूँ, उसे सुनो

अध्याय 94

श्लोक 50

पूर्वजैस्तव गोविन्द पूर्वं पुरमिदं कृतम् ।करवीरपुरं नाम राष्ट्रं चैव निवेशितम्

pūrvajaistava govinda pūrvaṃ puramidaṃ kṛtam | karavīrapuraṃ nāma rāṣṭraṃ caiva niveśitam

हिन्दी अर्थ

गोविन्द! पहले तुम्हारे पूर्वजोंने यहाँ इस करवीरपुर नामक नगरका निर्माण किया और इस राष्ट्रको बसाया है

अध्याय 94

श्लोक 51

पुरेऽस्मिन् नृपतिः कृष्ण वासुदेवो महायशाः ।शृगाल इति विख्यातो नित्यं परमकोपनः

pure'smin nṛpatiḥ kṛṣṇa vāsudevo mahāyaśāḥ | śṛgāla iti vikhyāto nityaṃ paramakopanaḥ

हिन्दी अर्थ

श्रीकृष्ण ! इस करवीरपुरमें इस समय महायशस्वी वासुदेव रहता है, जो श्रुगाल नामसे विख्यात है। वह सदा ही अत्यन्त क्रोधमें भरा रहता है

अध्याय 94

श्लोक 52

नृपेण तेन गोविन्द तव वंशभवा नृपाः ।दायादा निहताः सर्वे वीर द्वेषानुशायिना

nṛpeṇa tena govinda tava vaṃśabhavā nṛpāḥ | dāyādā nihatāḥ sarve vīra dveṣānuśāyinā

हिन्दी अर्थ

वीर गोविन्द! सदा दट्वेषका ही अनुसरण करनेवाले उस राजा श्रूगालने तुम्हारे कुलमें उत्पन्न हुए समस्त उत्तराधिकारी क्षत्रिय नरेशोंको मार डाला है

अध्याय 94

श्लोक 53

अहङ्कारपरो नित्यमजितात्मातिमत्सरी ।राज्यैश्वर्यमदाविष्टः पुत्रेष्वपि च दारुणः

ahaṅkāraparo nityamajitātmātimatsarī | rājyaiśvaryamadāviṣṭaḥ putreṣvapi ca dāruṇaḥ

हिन्दी अर्थ

वह नित्य घमंडमें भरा रहता है। उसका मन वशभमें नहीं है। वह दूसरोंसे अत्यन्त डाह खता है। राज्य और ऐश्वर्यके मदसे उन्मत्त होकर अपने पुत्रोंके प्रति भी निर्दयतापूर्ण बर्ताव करता है

अध्याय 94

श्लोक 54

तन्नेह भवतः स्थानं रोचते मे नरोत्तम ।करवीरपुरे घोरे नित्यं पार्थिवदूषिते

tanneha bhavataḥ sthānaṃ rocate me narottama | karavīrapure ghore nityaṃ pārthivadūṣite

हिन्दी अर्थ

श्रेष्ठ! इसीलिये यहाँ सर्वदा इस राजाद्वारा कलड्ित गोर करवीरपुरमें तुम्हारा ठहरना मुझे ठीक नहीं जँचता दे

अध्याय 94

श्लोक 55

श्रूयतां कथयिष्यामि यत्रोभौ शत्रुबाधनौ ।जरासन्धं बलोदग्रं भवन्तौ योधयिष्यतः

śrūyatāṃ kathayiṣyāmi yatrobhau śatrubādhanau | jarāsandhaṃ balodagraṃ bhavantau yodhayiṣyataḥ

हिन्दी अर्थ

जहाँ रहकर तुम दोनों बन्धु शत्रुको बाधा हुँचाते हुए बलमें बढ़े-चढ़े जरासंधके साथ युद्ध करोगे, रस स्थानका परिचय देता हूँ; सुनो

अध्याय 94

श्लोक 56

तीर्त्वा वेणामिमां पुण्यां नदीमद्यैव बाहुभिः ।विषयान्ते निवासाय गिरिं गच्छाम दुर्गमम्

tīrtvā veṇāmimāṃ puṇyāṃ nadīmadyaiva bāhubhiḥ | viṣayānte nivāsāya giriṃ gacchāma durgamam

हिन्दी अर्थ

हमलोग भाज ही इस पुण्य नदी वेणाको भुजाओंसे ही पार करके इस देशकी सीमापर स्थित एक दुर्गम पर्वतपर तले चलें, वहीं निवास करेंगे

अध्याय 94

श्लोक 57

रम्यं यज्ञगिरिं नाम सह्यस्य प्ररुहं गिरिम् ।निवासं मांसभक्षाणां चौराणां घोरकर्मणाम्

ramyaṃ yajñagiriṃ nāma sahyasya praruhaṃ girim | nivāsaṃ māṃsabhakṣāṇāṃ caurāṇāṃ ghorakarmaṇām

हिन्दी अर्थ

उस पर्वतका नाम ' यज्ञगिरि, जो सह्मपर्वतकी ही उपशाखा है । वह बड़ा गी रमणीय स्थान है। वहाँ इन दिनों भयानक कर्म उरनेवाले मांसाहारी चोर-डाकुओंने अड्डा जमा रखा '

अध्याय 94

श्लोक 58

नानाद्रुमलतायुक्तं चित्रं पुष्पितपादपम् ।प्रोष्ये तत्र निशामेकां खटवाङ्गां नाम निम्नगाम्

nānādrumalatāyuktaṃ citraṃ puṣpitapādapam | proṣye tatra niśāmekāṃ khaṭavāṅgāṃ nāma nimnagām

श्लोक 58–59 का हिन्दी अर्थ

उस पर्वतपर भाँति-भाँतिके वृक्ष और लताएँ हहलहा रही हैं। वृक्षोंमें फूल लगे हुए हैं। इससे उस वतकी विचित्र शोभा होती है। वहाँ हमलोग एक रात वास करेंगे। तदनन्तर खट्वाड़ा नामवाली नदीको पार रेंगे, जो कसौटीके पत्थरोंसे विभूषित है। तुम्हारा भला । वह नदी उस महान्‌ पर्वतसे गिरी हुई है, जो गड़ाके पात-सी दिखायी देती है

अध्याय 94

श्लोक 59

भद्रं ते सन्तरिष्यामो निकषोपलभूषणाम् ।गङ्गाप्रपातप्रतिमां भ्रष्टां च महतो गिरेः

bhadraṃ te santariṣyāmo nikaṣopalabhūṣaṇām | gaṅgāprapātapratimāṃ bhraṣṭāṃ ca mahato gireḥ

अर्थ श्लोक 58 के साथ

अध्याय 94

श्लोक 60

तस्याः प्रपातं द्रक्ष्यामस्तापसारण्यभूषणम् ।उपभुज्य त्विमान्कामान्गत्वा तान्धरणीधरान्

tasyāḥ prapātaṃ drakṣyāmastāpasāraṇyabhūṣaṇam | upabhujya tvimānkāmāngatvā tāndharaṇīdharān

श्लोक 60–61 का हिन्दी अर्थ

ढंद्१ है, हमलोग उसे देखेंगे और वहीं कुछ खा-पीकर इन कमनीय एवं प्रसिद्ध पर्वतोंपर विचरते हुए वहाँ उन तपस्वी ब्राह्मणोंका दर्शन करेंगे, जो तपमें संलग्न होकर कष्ट उठा रहे हैं। तत्पश्चात्‌ हम रमणीय एवं श्रेष्ठ नगर क्रौज्अपुरमें चलेंगे

अध्याय 94

श्लोक 61

द्रक्ष्यामस्तत्र तान् विप्राञ्छाम्यतो वै तपोधनान् ।रम्यं क्रौञ्चपुरं नाम गमिष्यामः पुरोत्तमम्

drakṣyāmastatra tān viprāñchāmyato vai tapodhanān | ramyaṃ krauñcapuraṃ nāma gamiṣyāmaḥ purottamam

अर्थ श्लोक 60 के साथ

अध्याय 94

श्लोक 62

वंशजस्तत्र ते राजा कृष्ण धर्मरतः सदा ।महाकपिरिति ख्यातो वनवास्यजनाधिपः

vaṃśajastatra te rājā kṛṣṇa dharmarataḥ sadā | mahākapiriti khyāto vanavāsyajanādhipaḥ

हिन्दी अर्थ

श्रीकृष्ण ! वहाँ तुम्हारे ही कुलमें उत्पन्न एक राजा राज्य करते हैं, जो सदा धर्ममें तत्पर रहनेवाले हैं, उनका नाम है महाकपि; वे वनवासी जनपद तथा वहाँके निवासी प्रजाओंके अधिपति हैं

अध्याय 94

श्लोक 63

तमदृष्ट्वैव राजानं निवासाय गतेऽहनि ।तीर्थमानडुहं नाम तत्रस्थाः स्याम सङ्गताः

tamadṛṣṭvaiva rājānaṃ nivāsāya gate'hani | tīrthamānaḍuhaṃ nāma tatrasthāḥ syāma saṅgatāḥ

हिन्दी अर्थ

उस राजासे मिले बिना ही हमलोग निवासके लिये संध्या होते-होते आनडुह नामक तीर्थमें जा पहुँचेंगे और वहाँ एक साथ मिलकर रहेंगे

अध्याय 94

श्लोक 64

ततश्च्युता गमिष्यामः सह्यस्य विवरे गिरिम् ।गोमन्तमिति विख्यातं नैकशृङ्गविभूषितम्

tataścyutā gamiṣyāmaḥ sahyasya vivare girim | gomantamiti vikhyātaṃ naikaśṛṅgavibhūṣitam

हिन्दी अर्थ

वहाँसे उतरकर हमलोग सद्मपर्वतकी गुफामें होते हुए उस गोमन्त नामसे विख्यात शैलपर जा पहुँचेंगे, जो अनेकानेक शिखरों से विभूषित है

अध्याय 94

श्लोक 65

स्वर्गतैकमहाशृङ्गं दुरारोहं खगैरपि ।विश्रामभूतं देवानां ज्योतिर्भिरभिसंवृतम्

svargataikamahāśṛṅgaṃ durārohaṃ khagairapi | viśrāmabhūtaṃ devānāṃ jyotirbhirabhisaṃvṛtam

हिन्दी अर्थ

उसका एक विशाल शिखर इतना ऊँचा है कि वह स्वर्गलोकतक पहुँचा हुआ जान पड़ता है। आकाशचारी पक्षियोंके लिये भी उसपर चढ़ना कठिन है। वह देवताओंका विश्राम-स्थल है और ज्योतियोंसे घिरा हुआ है

अध्याय 94

श्लोक 66

सोपानभूतं स्वर्गस्य गगनाद्रिमिवोच्छ्रितम् ।तं विमानावतरणं गिरिं मेरुरिवापरम्

sopānabhūtaṃ svargasya gaganādrimivocchritam | taṃ vimānāvataraṇaṃ giriṃ merurivāparam

हिन्दी अर्थ

उसे स्वर्गका सोपान समझा जाता है। वह उच्चतम पर्वत (भूतलका नहीं) आकाशका-सा पर्वत जान पड़ता है। उसपर देवताओंके विमान उतरते हैं तथा वह दूसरे मेरुगिरिके समान प्रतीत होता है

अध्याय 94

श्लोक 67

तस्योत्तमे महाशृङ्गे भास्वन्तौ देवरूपिणौ ।उदयास्तमये सूर्यं सोमं च ज्योतिषां पतिम्

tasyottame mahāśṛṅge bhāsvantau devarūpiṇau | udayāstamaye sūryaṃ somaṃ ca jyotiṣāṃ patim

श्लोक 67–68 का हिन्दी अर्थ

तुम दोनों भाई देवताओंके समान दिव्य रूपधारी तथा तेजस्वी हो । उस गोमन्त गिरिके महानू शिखरपर आरूढ़ होकर उदय और अस्तके समय सूर्य एवं नक्षत्रोंके स्वामी चन्द्रमाका तथा अपार द्वीपोंसे विभूषित और तरज्ञमालाओंसे अलंकृत समुद्रका दर्शन करते हुए तुम दोनों बन्धु वहाँ पर्वतीय शिखरके अग्रभागमें सुखपूर्वक विचरोगे

अध्याय 94

श्लोक 68

ऊर्मिमन्तं समुद्रं च अपारद्वीपभूषणम् ।प्रेक्षमाणौ सुखं तत्र नगाग्रे विचरिष्यथः

ūrmimantaṃ samudraṃ ca apāradvīpabhūṣaṇam | prekṣamāṇau sukhaṃ tatra nagāgre vicariṣyathaḥ

अर्थ श्लोक 67 के साथ

अध्याय 94

श्लोक 69

शृङ्गस्थौ तस्य शैलस्य गोमन्तस्य वनेचरौ ।दुर्गयुद्धेन धावन्तौ जरासन्धं विजेष्यथ

śṛṅgasthau tasya śailasya gomantasya vanecarau | durgayuddhena dhāvantau jarāsandhaṃ vijeṣyatha

हिन्दी अर्थ

उस गोमन्त नामक शैलके शिखरपर रहकर वहाँके वनमें विचरते हुए तुम दोनों वीर दुर्ग- युद्धद्वारा धावा करके जरासंधको जीत लोगे

अध्याय 94

श्लोक 70

तत्र शैलगतौ दृष्ट्वा भवन्तौ युद्धदुर्मदौ ।आसक्तः शैलयुद्धे च जरासन्धो भविष्यति

tatra śailagatau dṛṣṭvā bhavantau yuddhadurmadau | āsaktaḥ śailayuddhe ca jarāsandho bhaviṣyati

हिन्दी अर्थ

तुम दोनों रण-दुर्मद वीरोंको उस पर्वतपर आरूढ़ हुआ देख जरासंध पर्वत-युद्धमें ही आसक्त हो जायगा

अध्याय 94

श्लोक 71

भवतोरपि युद्धे तु प्रवृत्ते तत्र दारुणे ।आयुधैः सह संयोगं पश्यामि नचिरादिव

bhavatorapi yuddhe tu pravṛtte tatra dāruṇe | āyudhaiḥ saha saṃyogaṃ paśyāmi nacirādiva

हिन्दी अर्थ

वहाँ भयंकर युद्ध आरम्भ हो जानेपर तुम दोनोंके हाथमें भी शीघ्र ही दिव्य आयुधोंका संयोग हुआ देखूँगा

अध्याय 94

श्लोक 72

सङ्ग्रामश्च महान् कृष्ण निर्दिष्टस्तत्र दैवतैः ।यदूनां पार्थिवानां च मांसशोणितकर्दमः

saṅgrāmaśca mahān kṛṣṇa nirdiṣṭastatra daivataiḥ | yadūnāṃ pārthivānāṃ ca māṃsaśoṇitakardamaḥ

हिन्दी अर्थ

श्रीकृष्ण ! वहाँ देवताओंने यादवों तथा अन्य राजाओंके महान्‌ युद्धका निर्देश किया है, जिसमें रक्त और मांसकी कीच जम जानेवाली है

अध्याय 94

श्लोक 73

तत्र चक्रं हलं चैव गदां कौमोदकीं तथा ।सौनन्दं मुसलं चैव वैष्णवान्यायुधानि च

tatra cakraṃ halaṃ caiva gadāṃ kaumodakīṃ tathā | saunandaṃ musalaṃ caiva vaiṣṇavānyāyudhāni ca

श्लोक 73–74 का हिन्दी अर्थ

वहाँ सुदर्शन चक्र, संवर्तक हल, कौमोदकी दा तथा सौनन्द नामक मुसल—ये विष्णुसम्बन्धी आायुध संग्राममें तुम्हें दर्शन देंगे और अपने कालके परमान स्वरूपोंसे कालके अधीन हुए राजाओंका रक्त पीयेंगे

अध्याय 94

श्लोक 74

दर्शयिष्यन्ति सङ्ग्रामे पास्यन्ति च महीक्षिताम् ।रुधिरं कालयुक्तानां वपुर्भिः कालसन्निभैः

darśayiṣyanti saṅgrāme pāsyanti ca mahīkṣitām | rudhiraṃ kālayuktānāṃ vapurbhiḥ kālasannibhaiḥ

अर्थ श्लोक 73 के साथ

अध्याय 94

श्लोक 75

स चक्रमुसलो नाम सङ्ग्रामः कृष्ण विश्रुतः ।दैवतैरिह निर्दिष्टः कालस्यादेशसंज्ञितः

sa cakramusalo nāma saṅgrāmaḥ kṛṣṇa viśrutaḥ | daivatairiha nirdiṣṭaḥ kālasyādeśasaṃjñitaḥ

हिन्दी अर्थ

श्रीकृष्ण! वह संग्राम चक्र-मुसलके ामसे विख्यात होगा। देवताओंने इसी स्थानपर उसके होनेका संकेत किया है। वह युद्ध साक्षात्‌ कालका भाज्ञापन्र है

अध्याय 94

श्लोक 76

तत्र ते कृष्ण सङ्ग्रामे सुव्यक्तं वैष्णवं वपुः ।द्रक्ष्यन्ति रिपवः सर्वे सुराश्च सुरभावन

tatra te kṛṣṇa saṅgrāme suvyaktaṃ vaiṣṇavaṃ vapuḥ | drakṣyanti ripavaḥ sarve surāśca surabhāvana

हिन्दी अर्थ

देवताओंकी उत्पत्ति और वृद्धि करनेवाले श्रीकृष्ण! उस संग्राममें समस्त शत्रु और रैवता भी तुम्हारे भलीभाँति व्यक्त हुए वैष्णव रूपका र्शन करेंगे

अध्याय 94

श्लोक 77

तां भजस्व गदां कृष्ण चक्रं च चिरविस्मृतम् ।भजस्व स्वेन रूपेण सुराणां विजयाय वै

tāṃ bhajasva gadāṃ kṛṣṇa cakraṃ ca ciravismṛtam | bhajasva svena rūpeṇa surāṇāṃ vijayāya vai

हिन्दी अर्थ

श्रीकृष्ण! तुम अपने उसी वैष्णव ूपसे स्थित हो देवताओंकी विजयके लिये चिरकालसे बूले हुए अपने उस चक्र और गदाको ग्रहण करना

अध्याय 94

श्लोक 78

बलश्चायं हलं घोरं मुसलं चारिभेदनम् ।वधाय सुरशत्रूणां भजताल्लोकभावनः

balaścāyaṃ halaṃ ghoraṃ musalaṃ cāribhedanam | vadhāya suraśatrūṇāṃ bhajatāllokabhāvanaḥ

हिन्दी अर्थ

था ये लोकभावन बलराम भी देवद्रोहियोंका वध करनेके लिये अपने शत्रुविदारण घोर हल और मूसलको ाथमें ले लें

अध्याय 94

श्लोक 79

एष ते प्रथमः कृष्ण सङ्ग्रामो भुवि पार्थिवैः ।पृथिव्यर्थे समाख्यातो भारावतरणे सुरैः

eṣa te prathamaḥ kṛṣṇa saṅgrāmo bhuvi pārthivaiḥ | pṛthivyarthe samākhyāto bhārāvataraṇe suraiḥ

हिन्दी अर्थ

श्रीकृष्ण! पृथ्वीका भार उतारनेके लिये भूमण्डलके राजाओंके साथ तुम्हारा यह पहला ग्राम देवताओंद्वारा बताया गया है

अध्याय 94

श्लोक 80

आयुधावाप्तिरत्रैव वपुषो वैष्णवस्य च ।लक्ष्म्याश्च तेजसश्चैव व्यूहानां च विदारणम्

āyudhāvāptiratraiva vapuṣo vaiṣṇavasya ca | lakṣmyāśca tejasaścaiva vyūhānāṃ ca vidāraṇam

हिन्दी अर्थ

यहीं तुम्हें भपने दिव्य आयुधोंकी, वैष्णव स्वरूपकी, लक्ष्मीकी था शत्रुव्यूहोंका विदारण करनेवाले तेजकी प्राप्ति गगी

अध्याय 94

श्लोक 81

अतःप्रभृति सङ्ग्रामो धरण्यां शस्त्रमूर्च्छितः ।भविष्यति महान् कृष्ण भारतं नाम वैशसम्

ataḥprabhṛti saṅgrāmo dharaṇyāṃ śastramūrcchitaḥ | bhaviṣyati mahān kṛṣṇa bhārataṃ nāma vaiśasam

हिन्दी अर्थ

श्रीकृष्ण! इसके बाद पृथ्वीपर अस्त्र- स्त्रोंसे व्याप्त एक महान्‌ संग्राम होगा, जो लोगोंमें हाभारतके नामसे प्रसिद्ध होगा

अध्याय 94

श्लोक 82

तद् गच्छ कृष्ण शैलेन्द्रं गोमन्तं च नगोत्तमम् ।जरासन्धमृधे चापि विजयस्त्वामुपस्थितः

tad gaccha kṛṣṇa śailendraṃ gomantaṃ ca nagottamam | jarāsandhamṛdhe cāpi vijayastvāmupasthitaḥ

हिन्दी अर्थ

अत: श्रीकृष्ण ! मम पर्वतोंमें श्रेष्ठ गिरिराज गोमन्तपर चलो । जरासंधके द्धमें भी विजयश्री तुम्हारा ही वरण करनेके लिये स्तुत है

अध्याय 94

श्लोक 83

इदं चैवामृतप्रख्यं होमधेनोः पयोऽमृतम् ।पीत्वा गच्छत भद्रं वो मयाऽऽदिष्टेन वर्त्मना

idaṃ caivāmṛtaprakhyaṃ homadhenoḥ payo'mṛtam | pītvā gacchata bhadraṃ vo mayā''diṣṭena vartmanā

हिन्दी अर्थ

तुम्हारा कल्याण हो । मेरी इस होमधेनुका ह अमृतोपम सुमधुर दुग्ध पीकर मेरे बताये हुए र्गसे चलो'

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

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शोध टिप्पणीResearch note

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पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.