Harivamsha Purana
95
अध्याय 95 / 318

Parva 2, Adhyāya 40

47 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ47 श्लोक

अध्याय 95

श्लोक 1

श्रीकृष्णस्य, बलरामस्य एवं परशुरामस्य गोमन्तपर्वतोपरि आरोहणम्, गोमन्तस्य शोभावर्णनम्, परशुरामस्य कृष्णं युद्धाय प्रोत्साहयित्वा तत्रतः प्रस्थानं तत्तु धेन्वाः पयः पीत्वा बलर्द्पसमन्वितौ ।ततस्तौ रामसहितौ प्रस्थितौ यदुपुङ्गवौ

śrīkṛṣṇasya, balarāmasya evaṃ paraśurāmasya gomantaparvatopari ārohaṇam, gomantasya śobhāvarṇanam, paraśurāmasya kṛṣṇaṃ yuddhāya protsāhayitvā tatrataḥ prasthānaṃ tattu dhenvāḥ payaḥ pītvā balardpasamanvitau | tatastau rāmasahitau prasthitau yadupuṅgavau

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! उस होमधेनुका दूध पीकर बल और दर्पसे भरे हुए वे दोनों यदुपुज़व वीर परशुरामजीके साथ वहाँसे प्रस्थित हुए

अध्याय 95

श्लोक 2

गोमन्तं पर्वतं द्रष्टुं मत्तनागेन्द्रगामिनौ ।जामदग्न्यप्रदिष्टेन मार्गेण वदतां वरौ

gomantaṃ parvataṃ draṣṭuṃ mattanāgendragāminau | jāmadagnyapradiṣṭena mārgeṇa vadatāṃ varau

हिन्दी अर्थ

मतवाले गजराजकी भाँति मस्तीके साथ चलनेवाले वे वक्ताओंमें श्रेष्ठ श्रीकृष्ण और बलराम परशुरामजीके बताये हुए मार्गसे गोमन्तपर्वतका दर्शन करनेके लिये चले

अध्याय 95

श्लोक 3

जामदग्न्यतृतीयास्ते त्रयस्त्रय इवाग्नयः ।शोभयन्ति स्म पन्थानं त्रिदिवं त्रिदशा इव

jāmadagnyatṛtīyāste trayastraya ivāgnayaḥ | śobhayanti sma panthānaṃ tridivaṃ tridaśā iva

हिन्दी अर्थ

उन दोनोंके साथ तीसरे परशुरामजी थे। वे तीनों तीन अग्नियोंके समान उसी तरह उस मार्गकी शोभा बढ़ाते थे, जैसे देवता स्वर्गकी

अध्याय 95

श्लोक 4

ते चाध्वविधिना सर्वे ततो वै दिवसक्रमात् ।गोमन्तमचलं प्राप्ता मन्दरं त्रिदशा इव

te cādhvavidhinā sarve tato vai divasakramāt | gomantamacalaṃ prāptā mandaraṃ tridaśā iva

हिन्दी अर्थ

मनुष्य जिस तरह किसी मार्गपर चलते हैं, उसी विधिसे वे सब लोग यात्रा करते हुए क्रमश: कई दिनोंके बाद गोमन्तगिरिपर जा पहुँचे, मानो देवता मन्दराचलके शिखरपर गये हों

अध्याय 95

श्लोक 5

लताचारुविचित्रं च नानाद्रुमविभूषितम् ।नानागुरुपिनद्धाङ्गं चित्रं चित्रैर्मनोहरैः

latācāruvicitraṃ ca nānādrumavibhūṣitam | nānāgurupinaddhāṅgaṃ citraṃ citrairmanoharaiḥ

हिन्दी अर्थ

नाना प्रकारकी लताओंके विस्तारसे उस पर्वतकी सुन्दर एवं विचित्र शोभा हो रही थी। भाँति-भाँतिके वृक्ष उसके लिये भूषणका काम दे रहे थे। उस पर्वतका सारा अज्ञ अनेक प्रकारके अगुरु आदि सुगन्धित धूपोंसे व्याप्त था। मनोहर मयूर उसे और भी विचित्र शोभासे सम्पन्न किये देते थे

अध्याय 95

श्लोक 6

द्विरेफगणसङ्कीर्णं शिलासङ्कटपादपम् ।मत्तबर्हिणनिर्घोषैर्नादितं मेघनादिभिः

dvirephagaṇasaṅkīrṇaṃ śilāsaṅkaṭapādapam | mattabarhiṇanirghoṣairnāditaṃ meghanādibhiḥ

हिन्दी अर्थ

श्रमरोंसे व्याप्त और शिला तथा वृक्षोंसे भरा हुआ वह पर्वत मेघोंके समान गम्भीर स्वरोंमें बोलनेवाले मतबाले मयूरोंकी मधुर ध्वनिसे निनादित हो रहा था

अध्याय 95

श्लोक 7

गगनालग्नशिखरं जलदासक्तपादपम् ।मत्तद्विपविषाणाग्रैः परिघृष्टोपलाङ्कितम्

gaganālagnaśikharaṃ jaladāsaktapādapam | mattadvipaviṣāṇāgraiḥ parighṛṣṭopalāṅkitam

हिन्दी अर्थ

उसके शिखर आकाशके ऊर्ध्वभागसे लगे हुए थे। बादल उसके वृक्षोंका आलिड्रन करते थे तथा उसके प्रस्तरखण्ड मतवाले हाथियोंके दाँतोंके अग्रभागकी रगड़से घिरे हुए दिखायी देते थे। उन प्रस्तरोंसे अड्धित हुआ वह पर्वत बड़ी शोभा पाता था

अध्याय 95

श्लोक 8

कूजद्भिश्चाण्डजगणैः समन्तात् प्रतिनादितम् ।दरीप्रपाताम्बुरवैश्छन्नं शार्दूलतल्लजैः

kūjadbhiścāṇḍajagaṇaiḥ samantāt pratināditam | darīprapātāmburavaiśchannaṃ śārdūlatallajaiḥ

हिन्दी अर्थ

वहाँ चारों ओर पक्षी कलरव करते थे, जिनकी प्रतिध्वनि सब ओर छायी रहती थी। गुफाओंमें झरनेका जल गिरनेसे जो शब्द होता था तथा बड़े-बड़े व्याप्रोंके दहाड़नेसे जो ध्वनि होती थी, उससे भी वह पर्वत व्याप्त हो रहा था

अध्याय 95

श्लोक 9

नीलाश्मचयसङ्घातैर्बहुवर्णं यथा घनम् ।धातुविस्रावदिग्धाङ्गं सानुप्रस्रवभूषितम्

nīlāśmacayasaṅghātairbahuvarṇaṃ yathā ghanam | dhātuvisrāvadigdhāṅgaṃ sānuprasravabhūṣitam

हिन्दी अर्थ

वहाँ नीले पत्थरोंके ढेर-के-ढेर पड़े थे, जिनसे वह अनेक वर्णके मेघकी भाँति सुशोभित होता था। पानीके साथ गेरू आदि धातुओंके बहानेसे उसका अज्ञ चन्दनसे चर्चित-सा जान पड़ता था। शिखरोंसे जो झरने गिर रहे थे, वे आभूषणके समान उसकी शोभा बढ़ाते थे

अध्याय 95

श्लोक 10

कीर्णं सुरगणैः कान्तैर्मैनाकमिव कामगम् ।उच्छ्रितं सुविशालाग्रं समूलाम्बुपरिस्रवम्

kīrṇaṃ suragaṇaiḥ kāntairmainākamiva kāmagam | ucchritaṃ suviśālāgraṃ samūlāmbuparisravam

हिन्दी अर्थ

कान्तिमान्‌ देवता वहाँ सब ओर फैले हुए थे। वह च्छानुसार विचरनेवाले मैनाक-सा प्रतीत होता था। भत्यन्त विशाल शिखरसे सुशोभित वह उच्चतम पर्वत भपने मूलभागसे निर्रोंके जलकी धारा बहा रहा पा

अध्याय 95

श्लोक 11

सकाननदरीप्रस्थं श्वेताभ्रगणभूषितम् ।पनसाम्रातकाम्रौघैर्वेत्रस्यन्दनचन्दनैः

sakānanadarīprasthaṃ śvetābhragaṇabhūṣitam | panasāmrātakāmraughairvetrasyandanacandanaiḥ

श्लोक 11–13 का हिन्दी अर्थ

वन, गुफा और शिखरोंसे सम्पन्न वह शैलराज वेत बादलोंसे विभूषित था। वहाँ कटहल, आम्रातक आमड़ा), आमोंके समूह, बेंत, स्यन्दन (तिनिश), अन्दन, तमाल, इलायचीके वन तथा मिर्चकी झाड़ियाँ ऐभा पाती थीं। वहाँ सब ओर पिप्पलीकी बेलें फैली ीं। इजुदीके वृक्ष विचित्र शोभा दे रहे थे तथा सर्जरस राल)-के वृक्ष सब ओरसे उस पर्वतको सुशोभित केये हुए थे। ऊँचे-ऊँचे शाल वृक्षोंके वन तथा अन्य हुत-से विचित्र वन उस पर्वतकी शोभा बढ़ा रहे

अध्याय 95

श्लोक 12

तमालैलावनयुतं मरीचक्षुपसङ्कुलम् ।पिप्पलीवल्लिकलिलं चित्रमिङ्गुदिपादपैः

tamālailāvanayutaṃ marīcakṣupasaṅkulam | pippalīvallikalilaṃ citramiṅgudipādapaiḥ

अर्थ श्लोक 11 के साथ

अध्याय 95

श्लोक 13

द्रुमैः सर्जरसानां च सर्वतः परिशोभितम् ।प्रांशुशालवनैर्युक्तं बहुचित्रवनैर्युतम्

drumaiḥ sarjarasānāṃ ca sarvataḥ pariśobhitam | prāṃśuśālavanairyuktaṃ bahucitravanairyutam

अर्थ श्लोक 11 के साथ

अध्याय 95

श्लोक 14

सर्जनिम्बार्जुनवनं पाटलीकुलसङ्कुलम् ।हिन्तालैश्च तमालैश्च पुन्नागैश्चोपशोभितम्

sarjanimbārjunavanaṃ pāṭalīkulasaṅkulam | hintālaiśca tamālaiśca punnāgaiścopaśobhitam

हिन्दी अर्थ

राल, नीम और अर्जुन-वृक्षोंका वन ऐभा दे रहा था। पाड़र-वृक्षोंके समूह वहाँ सब ओर शा रहे थे । हिंताल, तमाल और पुन्नाग (जायफल) उस ललशिखरकी शोभा बढ़ाते थे

अध्याय 95

श्लोक 15

जलेषु जलजैश्छन्नं स्थलेषु स्थलजैरपि ।पङ्कजैर्द्रुमखण्डैश्च सर्वतः प्रतिभूषितम्

jaleṣu jalajaiśchannaṃ sthaleṣu sthalajairapi | paṅkajairdrumakhaṇḍaiśca sarvataḥ pratibhūṣitam

हिन्दी अर्थ

वहाँ जलोंमें लज कमल, स्थलोंगें स्थलज कमल तथा अन्यान्य क्षसमूह सब ओरसे उस पर्वतके आभूषण बने हुए

अध्याय 95

श्लोक 16

जम्बूजम्बूलवृक्षाढ्यं कद्रुकन्दलभूषितम् ।चम्पकाशोकबकुलं बिल्वतिन्दुकशोभितम्

jambūjambūlavṛkṣāḍhyaṃ kadrukandalabhūṣitam | campakāśokabakulaṃ bilvatindukaśobhitam

हिन्दी अर्थ

जामुन, केवड़े, कद्ठू, केले, चम्पा, अशोक, कुल, बिल्व और तिन्‍्दुक आदि वृक्षोंसे वह शैल [शोभित था

अध्याय 95

श्लोक 17

कुञ्जैश्च नागपुष्पैश्च समन्तादुपशोभितम् ।नागयूथसमाकीर्णं मृगसङ्घातशोभितम्

kuñjaiśca nāgapuṣpaiśca samantādupaśobhitam | nāgayūthasamākīrṇaṃ mṛgasaṅghātaśobhitam

हिन्दी अर्थ

बहुत-से कुज्ञ और नागकेसरके ल सब ओरसे उसकी शोभा बढ़ाते थे। झुंड-के- [ड हाथी वहाँ सब ओर फैले हुए थे। मृगोंके समुदायसे ह शोभायमान था

अध्याय 95

श्लोक 18

सिद्धचारणरक्षोभिः सेवितप्रस्तरान्तरम् ।गन्धर्वैश्च समायुक्तं गुह्यकैः पक्षिभिस्तथा

siddhacāraṇarakṣobhiḥ sevitaprastarāntaram | gandharvaiśca samāyuktaṃ guhyakaiḥ pakṣibhistathā

हिन्दी अर्थ

उसके प्रस्तरखण्डोंके मध्य- गोंमें सिद्ध, चारण तथा राक्षस बैठे हुए थे। गन्धर्व, ह्मक तथा पक्षी भी उस पर्वतका सेवन करते थे

अध्याय 95

श्लोक 19

विद्याधरगणैर्नित्यमनुकीर्णशिलातलम् ।सिंहशार्दूलसन्नादैः सततं प्रतिनादितम् ।सेवितं वारिधाराभिश्चन्द्रपादैश्च शोभितम्

vidyādharagaṇairnityamanukīrṇaśilātalam | siṃhaśārdūlasannādaiḥ satataṃ pratināditam | sevitaṃ vāridhārābhiścandrapādaiśca śobhitam

हिन्दी अर्थ

सकी शिलाएँ सदा ही विद्याधरगणोंसे सेवित होती ीं । सिंहों और व्याप्रोंके दहाड़नेकी ध्वनिसे वह पर्वत रन्तर गूँजता रहता था। जलकी धाराएँ और चन्द्रमाकी करणें उसका सेवन एवं शोभा-संवर्धन करती थीं

अध्याय 95

श्लोक 20

स्तुतं त्रिदशगन्धर्वैरप्सरोभिरलङ्कृतम् ।वनस्पतीनां दिव्यानां पुष्पैरुच्चावचैः श्रितम्

stutaṃ tridaśagandharvairapsarobhiralaṅkṛtam | vanaspatīnāṃ divyānāṃ puṣpairuccāvacaiḥ śritam

हिन्दी अर्थ

वता और गन्धर्व उसकी प्रशंसा करते थे। वह पर्वत प्सराओंसे अलंकृत था। दिव्य वनस्पतियोंके नाना कारके फूल वहाँ सब ओर बिखरे पड़े थे

अध्याय 95

श्लोक 21

शक्रवज्रप्रहाराणामनभिज्ञं कदाचन ।दावाग्निभयनिर्मुक्तं महावातभयोज्झितम्

śakravajraprahārāṇāmanabhijñaṃ kadācana | dāvāgnibhayanirmuktaṃ mahāvātabhayojjhitam

हिन्दी अर्थ

उस वतको कभी भी इन्द्रके वज्प्रहारकी व्यथाका अनुभव हीं हुआ था। वहाँ न तो दावानलका भय था और न चण्ड आँधीका

अध्याय 95

श्लोक 22

प्रपातप्रभवाभिश्च सरिद्भिरुपशोभितम् ।काननैराननाकारैर्विशेषद्भिरिव श्रियम्

prapātaprabhavābhiśca saridbhirupaśobhitam | kānanairānanākārairviśeṣadbhiriva śriyam

हिन्दी अर्थ

निर्रोंसे प्रकट हुई सरिताएँ उस वतको सुशोभित करती थीं। वह अपनी शोभा बढ़ाते ए-से मुखाकार काननोंसे उपलक्षित होता था

अध्याय 95

श्लोक 23

जलशैवलशृङ्गाग्रैरुन्मिषन्तमिव श्रिया ।स्थलीभिर्मृगजुष्टाभिः कान्ताभिरुपशोभितम्

jalaśaivalaśṛṅgāgrairunmiṣantamiva śriyā | sthalībhirmṛgajuṣṭābhiḥ kāntābhirupaśobhitam

हिन्दी अर्थ

दा जल और सिवारसे युक्त शिखरोंके अग्रभागद्वारा पानों वह लक्ष्मीसे आँख मिला रहा था। पशुओंसे पेवित कमनीय वनस्थलियाँ उसकी शोभा बढ़ाती थीं

अध्याय 95

श्लोक 24

पार्श्वैरुपलकल्माषैर्मेघैरिव विभूषितम् ।पादपच्छन्नभूमीभिः सपुष्पाभिः समन्ततः

pārśvairupalakalmāṣairmeghairiva vibhūṣitam | pādapacchannabhūmībhiḥ sapuṣpābhiḥ samantataḥ

श्लोक 24–26 का हिन्दी अर्थ

पार्श्वंभागमें स्थित चितकबरे प्रस्तरखण्डों से तरह ऐसी शोभा पा रहा था, मानो बहुरंगे बादलोंसे वभूषित हो रहा हो। अपने वृक्षसमूहोंसे भूमिको ढक रैनेवाली पुष्पशोभित वनश्रेणियाँ उस पर्वतको सब भोरसे घेरकर उसी प्रकार शोभा-सम्पन्न किए हुए थीं, जैसे पुष्पवती (रजस्वला होनेके पश्चात्‌ स्नान एवं ुष्पहारसे अलंकृत) युवती स्त्रियाँ पतिको घेरकर खड़ी हों । जगह-जगह सुन्दर गुफाओं और मनोहर कन्दराओंसे भलंकृत हुआ गोमन्तगिरि विभिन्‍न स्थानोंमें सपत्नीक मुरुषकी भाँति शोभा पाता था। विभिन्‍न प्रकारकी भोषधियाँ उसके शिखरको उद्धासित किये हुए थीं। त्रानप्रस्थ मुनि उसका सेवन करते थे तथा उसके सहज सुन्दर वनोदेश कृत्रिम उद्यानोंकी भाँति उसे विभूषित किये हुए थे

अध्याय 95

श्लोक 25

मण्डितं वनराजीभिः प्रमदाभिः पतिर्यथा ।सुन्दरीभिर्दरीभिश्च कन्दराभिस्तथैव च

maṇḍitaṃ vanarājībhiḥ pramadābhiḥ patiryathā | sundarībhirdarībhiśca kandarābhistathaiva ca

अर्थ श्लोक 24 के साथ

अध्याय 95

श्लोक 26

तेषु तेष्ववकाशेषु सदारामिव शोभितम् ।औषधीदीप्तशिखरं वानप्रस्थनिषेवितम् ।जातरूपैर्वनोद्देशैः कृत्रिमैरिव भूषितम्

teṣu teṣvavakāśeṣu sadārāmiva śobhitam | auṣadhīdīptaśikharaṃ vānaprasthaniṣevitam | jātarūpairvanoddeśaiḥ kṛtrimairiva bhūṣitam

अर्थ श्लोक 24 के साथ

अध्याय 95

श्लोक 27

मूलेन सुविशालेन शिरसाप्युच्छ्रितेन च ।पृथिवीमन्तरिक्षं च ग्राहयन्तमिव स्थितम्

mūlena suviśālena śirasāpyucchritena ca | pṛthivīmantarikṣaṃ ca grāhayantamiva sthitam

हिन्दी अर्थ

वह पर्वत अपने अत्यन्त विशाल मूलभाग और उच्चतम शिखरसे पृथ्वी भर आकाशमें प्रविष्ट होकर उनकी थाह लगाता हुआ- पा खड़ा था

अध्याय 95

श्लोक 28

ते समासाद्य गोमन्तं रम्यं भूमिधरोत्तमम् ।रुचिरं रुरुचुः सर्वे वासायामरसन्निभाः

te samāsādya gomantaṃ ramyaṃ bhūmidharottamam | ruciraṃ rurucuḥ sarve vāsāyāmarasannibhāḥ

हिन्दी अर्थ

पर्वतोंमें श्रेष्ठ सुन्दर एवं मनोहर पमन्तपर्वतपर पहुँचकर उन सभी देवोपम पुरुषोंने वहाँ निवास करनेकी इच्छा की

अध्याय 95

श्लोक 29

रुरुहुस्ते गिरिवरं खमूर्ध्वमिव पक्षिणः ।असज्जमाना वेगेन वैनतेयपराक्रमाः

ruruhuste girivaraṃ khamūrdhvamiva pakṣiṇaḥ | asajjamānā vegena vainateyaparākramāḥ

हिन्दी अर्थ

गरुड़के समान पराक्रमी वे तीनों महापुरुष उस श्रेष्ठ पर्वतपर उसी तरह वेगसे चढ़ने लगे, जैसे पक्षी ऊपर आकाशमें डड़्ते हैं। उस समय उनमेंसे किसीकी भी गति अवरुद्ध हीं होती थी

अध्याय 95

श्लोक 30

ते तु तस्योत्तरं शृङ्गमारूढास्त्रिदशा इव ।अगारं सहसा चक्रुर्मनसा निर्मितोपमम्

te tu tasyottaraṃ śṛṅgamārūḍhāstridaśā iva | agāraṃ sahasā cakrurmanasā nirmitopamam

हिन्दी अर्थ

वे देवताओंकी भाँति उसके पर्वोच्च शिखरपर आरूढ़ हो गये। वहाँ उन्होंने सहसा अपने रहनेके लिये घर बना लिया, मानो मानसिक पंकल्पसे ही उसका निर्माण कर लिया हो

अध्याय 95

श्लोक 31

निविष्टौ यादवौ दृष्टा जामदग्न्यो महामतिः ।रामोऽभिमतमक्लिष्टमाप्रष्टुमुपचक्रमे

niviṣṭau yādavau dṛṣṭā jāmadagnyo mahāmatiḥ | rāmo'bhimatamakliṣṭamāpraṣṭumupacakrame

हिन्दी अर्थ

इन दोनों यदुकुमारोंको वहाँ विराजमान हुआ देख परम बुद्धिमान्‌ परशुरामजीने प्रसननतापूर्वक अपने अभीष्ट स्थानपर जानेके लिये उनसे पूछना आरम्भ किया—

अध्याय 95

श्लोक 32

कृष्ण यास्याम्यहं तात पुरं शूर्पारकं विभो ।युवयोर्नास्ति वैमुख्यं सङ्ग्रामे दैवतैरपि

kṛṣṇa yāsyāmyahaṃ tāta puraṃ śūrpārakaṃ vibho | yuvayornāsti vaimukhyaṃ saṅgrāme daivatairapi

हिन्दी अर्थ

तात ! प्रभावशाली श्रीकृष्ण! अब मैं शूर्पारक नगरको जाऊँगा। आप दोनोंको तो युद्धमें देवता भी नहीं हरा सकते (फिर मनुष्यकी तो बात ही क्या दे ?)

अध्याय 95

श्लोक 33

प्राप्तवानस्मि यां प्रीतिं मार्गानुगमनादपि ।सा मे कृष्णानुगृह्णाति शरीरमिदमव्ययम्

prāptavānasmi yāṃ prītiṃ mārgānugamanādapi | sā me kṛṣṇānugṛhṇāti śarīramidamavyayam

हिन्दी अर्थ

श्रीकृष्ण ! तुम दोनोंके साथ मार्गका अनुसरण करनेसे मुझे जो प्रसन्नता प्राप्त हुई है, वह मेरे इस अविनाशी शरीरको अनुगृहीत कर रही है'

अध्याय 95

श्लोक 34

इदं तत् स्थानमुद्दिष्टं यत्रायुधसमागमः ।युवयोर्विहितो देवैः समयः साम्परायिकः

idaṃ tat sthānamuddiṣṭaṃ yatrāyudhasamāgamaḥ | yuvayorvihito devaiḥ samayaḥ sāmparāyikaḥ

हिन्दी अर्थ

मैंने जिसे बताया था और जहाँ तुम्हें अपने दिव्य आयुध प्राप्त होनेवाले हैं, वह स्थान यही है। देवताओंने तुम्हारे लिये उनकी प्रासिका यही समय निर्धारित किया है, जो परलोकके लिये हितकर है

अध्याय 95

श्लोक 35

दैवानां मुख्य वैकुण्ठ विष्णो देवैरभिष्टुत ।कृष्ण सर्वस्य लोकस्य शृणु मे नैष्ठिकं वचः

daivānāṃ mukhya vaikuṇṭha viṣṇo devairabhiṣṭuta | kṛṣṇa sarvasya lokasya śṛṇu me naiṣṭhikaṃ vacaḥ

हिन्दी अर्थ

देवताओंमें श्रेष्ठ बैकुण्ठ ! तुम सर्वव्यापी विष्णु हो। देवताओंने सदा तुम्हारी स्तुति की है। श्रीकृष्ण! तुम मेरी यह तात्त्विक बात सुनो, जो सम्पूर्ण जगतूके लिये हितकर है

अध्याय 95

श्लोक 36

यदिदं प्रस्तुतं कर्म त्वया गोविन्द लौकिकम् ।मानुषाणां हितार्थाय लोके मानुषदेहिना

yadidaṃ prastutaṃ karma tvayā govinda laukikam | mānuṣāṇāṃ hitārthāya loke mānuṣadehinā

हिन्दी अर्थ

गोविन्द! तुमने मनुष्योंके हितके लिये संसारमें मानव- शरीर धारण करके जो यह लौकिक कर्म प्रारम्भ किया है, उसका यह पहला प्रयोग यहीं होने जा रहा है। कालने उसका आयोजन यहीं किया है

अध्याय 95

श्लोक 37

तस्यायं प्रथमः कल्पः कालेन तु नियोजितः ।जरासन्धेन वै सार्धं सङ्ग्रामे समुपस्थिते

tasyāyaṃ prathamaḥ kalpaḥ kālena tu niyojitaḥ | jarāsandhena vai sārdhaṃ saṅgrāme samupasthite

श्लोक 37–38 का हिन्दी अर्थ

श्रीकृष्ण ! जरासंधके साथ संग्राम उपस्थित होनेपर तुम स्वयं ही अपने-आपके द्वारा अपनेको आयुध-बलसे सम्पन्न कर लेना और अपना रण-कर्कश रूप बना लेना

अध्याय 95

श्लोक 38

तत्रायुधबलं चैव रूपं च रणकर्कशम् ।स्वयमेवात्मना कृष्ण त्वमात्मानं विधत्स्व ह

tatrāyudhabalaṃ caiva rūpaṃ ca raṇakarkaśam | svayamevātmanā kṛṣṇa tvamātmānaṃ vidhatsva ha

अर्थ श्लोक 37 के साथ

अध्याय 95

श्लोक 39

चक्रोद्यतकरं दृष्ट्वा त्वां गदापाणिमाहवे ।चतुर्द्विगुणपीनांसं बिभ्येदपि शतक्रतुः

cakrodyatakaraṃ dṛṣṭvā tvāṃ gadāpāṇimāhave | caturdviguṇapīnāṃsaṃ bibhyedapi śatakratuḥ

हिन्दी अर्थ

जिस समय तुम आठ मांसल कंधोंसे युक्त हो हाथोंमें चक्र और गदा उठाये युद्धके लिये उपस्थित होओगे, उस समय तुम्हें देखकर देवराज इन्द्र भी भयभीत हो उठेंगे

अध्याय 95

श्लोक 40

अद्यप्रभृति ते यात्रा स्वर्गोक्ता समुपस्थिता ।पृथिव्यां पार्थिवेन्द्राणां कृतास्त्रे त्वयि मानद

adyaprabhṛti te yātrā svargoktā samupasthitā | pṛthivyāṃ pārthivendrāṇāṃ kṛtāstre tvayi mānada

हिन्दी अर्थ

मानद! जब तुम हाथमें हथियार लेकर युद्धके लिये उद्यत हो गये हो, तब आजसे ही भूमण्डलके राजाओंकी स्वर्गीय यात्रा आरम्भ हो जायगी

अध्याय 95

श्लोक 41

वैनतेयस्य चाह्वानं वाहनं ध्वजकर्मणि ।कुरु शीघ्रं महाबाहो गोविन्द वदतां वर

vainateyasya cāhvānaṃ vāhanaṃ dhvajakarmaṇi | kuru śīghraṃ mahābāho govinda vadatāṃ vara

हिन्दी अर्थ

वक्ताओंमें श्रेष्ठ महाबाहु गोविन्द ! तुम अपने ध्वजारोपणरूप कार्यकी सिद्धिके लिये शीघ्र ही वाहनरूप विनतानन्दन गरुड़का आवाहन करो

अध्याय 95

श्लोक 42

युद्धकामा नृपतयस्त्रिदिवाभिमुखोद्यताः ।धार्तराष्ट्रस्य वशगास्तिष्ठन्ति रणवृत्तयः

yuddhakāmā nṛpatayastridivābhimukhodyatāḥ | dhārtarāṣṭrasya vaśagāstiṣṭhanti raṇavṛttayaḥ

हिन्दी अर्थ

युद्धकी इच्छा करनेवाले नरेशगण स्वर्गके लिये अभिमुख एवं उद्यत होकर युद्धवृत्तिका आश्रय ले धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनके अधीन होकर खड़े हैं

अध्याय 95

श्लोक 43

राज्ञां निधनदृष्टार्था वैधव्येनाधिवासिता ।एकवेणीधरा चेयं वसुधा त्वां प्रतीक्षते

rājñāṃ nidhanadṛṣṭārthā vaidhavyenādhivāsitā | ekaveṇīdharā ceyaṃ vasudhā tvāṃ pratīkṣate

हिन्दी अर्थ

राजाओंका निधन होनेवाला है, यह बात प्रत्यक्ष देखकर वैधव्यसूचक वेष-भूषा धारण किये एक वेणीधारिणी (केशसंस्कारसे रहित) यह वसुन्धरा तुम्हारी राह देखती है

अध्याय 95

श्लोक 44

सग्रहं कृष्ण नक्षत्रं सङ्क्षिप्यारिविमर्दन ।त्वयि मानुष्यमापन्ने युद्धे च समुपस्थिते

sagrahaṃ kṛṣṇa nakṣatraṃ saṅkṣipyārivimardana | tvayi mānuṣyamāpanne yuddhe ca samupasthite

हिन्दी अर्थ

शत्रुमर्दन श्रीकृष्ण! आप मानवरूप धारण करके इस धरातलपर आ गये हैं और युद्धका अवसर भी उपस्थित है, इसलिये क्षत्रियसमाज मृत्युसे संकुचित न होकर रणभूमिमें आनेके लिये उतावला हो उठा है। किसी समयविशेषकी प्रतीक्षा नहीं कर रहा है, क्योंकि उसका जन्मनक्षत्र क्रूरग्रहसे आक्रान्त हो गया है

अध्याय 95

श्लोक 45

त्वरस्व कृष्ण युद्धाय दानवानां वधाय च ।स्वर्गाय च नरेन्द्राणां देवतानां सुखाय च

tvarasva kṛṣṇa yuddhāya dānavānāṃ vadhāya ca | svargāya ca narendrāṇāṃ devatānāṃ sukhāya ca

हिन्दी अर्थ

श्रीकृष्ण ! तुम दानवोंका वध करने, नरेशोंको स्वर्गलोकमें भेजने और देवताओंको सुख पहुँचानेके उद्देश्यसे युद्धके लिये जल्दी करो॥ '

अध्याय 95

श्लोक 46

सत्कृतोऽहं त्वया कृष्ण लोकैश्च सचराचरैः ।त्वया सत्कृतरूपेण येन सत्कृतवानहम्

satkṛto'haṃ tvayā kṛṣṇa lokaiśca sacarācaraiḥ | tvayā satkṛtarūpeṇa yena satkṛtavānaham

हिन्दी अर्थ

शोडध्याय;: *+ ६७ "सच्चिदानन्दघन श्रीकृष्ण ! तुम स्वरूपत: सबके द्वारा सत्कृत हो। तुम सर्वात्माने जो मेरा सत्कार किया है, उससे मैं चराचर प्राणियोंसहित सम्पूर्ण लोकोंद्वारा सत्कृत हो गया और सदाके लिये सत्कारवान्‌ बन गया

अध्याय 95

श्लोक 47

साधयामि महाबाहो भवतः कार्यसिद्धये ।स्मर्तव्यश्चास्मि युद्धेषु कान्तारेषु महीक्षिताम्

sādhayāmi mahābāho bhavataḥ kāryasiddhaye | smartavyaścāsmi yuddheṣu kāntāreṣu mahīkṣitām

हिन्दी अर्थ

महाबाहो ! मैं तुम्हारे कार्यकी सिद्धिके लिये स्वयं भी साधना करूँगा। सभी भूमिपालोंको चाहिये कि वे दुर्गम संकट और युद्धके अवसरोंपर मेरा स्मरण करें '

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.