Mahanarayana Upanishad
64
अध्याय 64 / 79

Anuvāka 64

3 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ3 श्लोक

अध्याय 64

श्लोक 1

तिलाः कृष्णास्तिलाः श्वेतास्तिलाः सौम्या वशानुगाः ।तिलाः पुनन्तु मे पापं यत्किञ्चिद् दुरितं मयि स्वाहा

tilāḥ kṛṣṇāstilāḥ śvetāstilāḥ saumyā vaśānugāḥ | tilāḥ punantu me pāpaṃ yatkiñcid duritaṃ mayi svāhā

हिन्दी अर्थ

काले तिल, श्वेत तिल, सौम्य और वश में आने वाले तिल — तिल मेरे पाप को पवित्र करें, मुझमें जो भी दुरित है, स्वाहा।

English

Black sesame, white sesame, gentle sesame, obedient sesame — may the sesame purify my sin, whatever evil is in me, svaha.

अध्याय 64

श्लोक 2

चोरस्यान्नं नवश्राद्धं ब्रह्महा गुरुतल्पगः ।गोस्तेयँ सुरापानं भ्रूणहत्या तिला शान्तिँ शमयन्तु स्वाहा

corasyānnaṃ navaśrāddhaṃ brahmahā gurutalpagaḥ | gosteya~ surāpānaṃ bhrūṇahatyā tilā śānti~ śamayantu svāhā

हिन्दी अर्थ

चोर का अन्न, नव-श्राद्ध का अन्न, ब्रह्महत्यारा, गुरु-शय्या का अपराधी, गोचोरी, सुरापान, भ्रूणहत्या — तिल इन्हें शान्त करें, स्वाहा।

English

Food of a thief, the first funerary rite, the Brahmin-killer, the violator of a teacher's bed, cattle-theft, drinking liquor, killing an embryo — may sesame quell these with peace, svaha.

अध्याय 64

श्लोक 3

श्रीश्च लक्ष्मीश्च पुष्टीश्च कीर्तिं चानृण्यताम् ।ब्रह्मण्यं बहुपुत्रताम् ।श्रद्धामेधे प्रज्ञा तु जातवेदः संददातु स्वाहा

śrīśca lakṣmīśca puṣṭīśca kīrtiṃ cānṛṇyatām | brahmaṇyaṃ bahuputratām | śraddhāmedhe prajñā tu jātavedaḥ saṃdadātu svāhā

हिन्दी अर्थ

श्री, लक्ष्मी, पुष्टि, कीर्ति, ऋण-मुक्ति, ब्राह्मण्य, बहुपुत्रता, श्रद्धा, मेधा और प्रज्ञा जातवेदा दें, स्वाहा।

English

May Shri, Lakshmi, nourishment, fame, freedom from debt, Brahminhood, many sons, faith, insight and wisdom be given by Jatavedas, svaha.

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/mahanarayana.itx · प्राप्त 30/9/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with Andhra recension (64 anuvākas) and standard 80-anuvāka recension.