Matsya Purana
101
अध्याय 101 / 176

Adhyaya 101

85 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ85 श्लोक

अध्याय 101

श्लोक 1

मत्स्य-पुराण १०१ अथातः सम्प्रवक्ष्यामि व्रतषष्ठीमनुत्तमाम् रुद्रेणाभिहितां दिव्यां महापातकनाशनम्

matsya-purāṇa 101 athātaḥ sampravakṣyāmi vrataṣaṣṭhīmanuttamām rudreṇābhihitāṃ divyāṃ mahāpātakanāśanam

हिन्दी अर्थ

जलसे सर्वप्रथम विद्युन्मालीके शवको धोया उस बावलीमें डुबोये जानेपर देवशत्रु महाबली हैत्य विद्युन्माली उसी प्रकार उठ खड़ा हुआ, जैसे इन्धन पड्नेसे हवन की गयी अग्नि तुरंत उद्दी्त हो उठती है। उठते ही विद्युन्मालीने हाथ जोड़कर मय और तारकासुरका अभिवादन किया और मयसे इस प्रकार कहा--' प्रमथरूपी शृगालोंसे घिरा हुआ रुद्रके साथ नन्दी कहाँ खड़ा है? अब हमलोग शत्रुओंको पीसते हुए युद्ध करेंगे। हमलोगोंके शरीरमें दया कहाँ? हमलोग या तो रुद्रको खदेड़कर प्रभावशाली होंगे अथवा उनके द्वारा युद्धस्थलमें मारे जाकर यमराजके ग्रास बन जायंगे।' विद्युन्मालीके ऐसे उत्साहपूर्ण वचन सुनकर महासुर मयके नेत्रॉंमें आँसू छलक आये। तब

English

DcTay&nl (d. of SnkrAchdrya

अध्याय 101

श्लोक 2

नक्तमब्दं चरित्वा तु गवा सार्धं कुटुम्बिने हैमं चक्रं त्रिशूलं च दद्याद्विप्राय वाससी

naktamabdaṃ caritvā tu gavā sārdhaṃ kuṭumbine haimaṃ cakraṃ triśūlaṃ ca dadyādviprāya vāsasī

हिन्दी अर्थ

उसने विद्युन्मालीका आलिङ्गन कर इस प्रकार कहा- है, न जीवनकी ही अभिलाषा है। महासुर! अन्य पदार्थोंकी तो बात ही क्या है? ऐश्वर्यशाली वीर! मैंने मायाद्वारा अमृतसे भरी हुई इस बावलीकी रचना की है। यह मरे हुए दानवों और हैत्योंको जीवन-दान देगी। हैत्य!

English

Eausalyd

अध्याय 101

श्लोक 3

शिवरूपस्ततो ऽस्माभिः शिवलोके स मोदते एतद्देवव्रतं नाम महापातकनाशनम्

śivarūpastato 'smābhiḥ śivaloke sa modate etaddevavrataṃ nāma mahāpātakanāśanam

हिन्दी अर्थ

सौभाग्यवश (इसीके प्रभावसे) मैं तुम्हें यमलोकसे लौटा हुआ देख रहा हूँ। अब हमलोग आपत्तिके समय अन्यायसे अपहरण की हुई महानिधिका उपभोग करेंगे' हृष्टाननाक्षा हैत्येन्द्रा इदं वचनमब्रुवन् ततः क्षुब्धाम्बुधिनिभा भेरी सा तु भयंकरी। वाह्यमाना ननादोच्चै रौरवी सा पुनः पुनः

English

JanameJaya=Ananifi, d. of Madbu

अध्याय 101

श्लोक 4

यस्त्वेकभक्तेन समां शिवं हैमवृषान्वितम् धेनुं तिलमयीं दद्यात् स पदं याति शांकरम् एतद्रुद्रव्रतं नाम पापशोकविनाशनम्

yastvekabhaktena samāṃ śivaṃ haimavṛṣānvitam dhenuṃ tilamayīṃ dadyāt sa padaṃ yāti śāṃkaram etadrudravrataṃ nāma pāpaśokavināśanam

हिन्दी अर्थ

धूमायिता ह्यविरमा ज्वलन्त इव पावकाः। आयुधानि समादाय काशिनो दूढविक्रमाः करोच्छ्या इव गजा: सिंहा इव च निर्भया:

English

Manasyn (Sarnylti::Var&hgi, d. of Dpisadvata),

अध्याय 101

श्लोक 5

यस्तु नीलोत्पलं हैमं शर्करापात्रसंयुतम् एकान्तरितनक्ताशी समान्ते वृषसंयुतम् स वैष्णवं पदं याति लीलाव्रतमिदं स्मृतम्

yastu nīlotpalaṃ haimaṃ śarkarāpātrasaṃyutam ekāntaritanaktāśī samānte vṛṣasaṃyutam sa vaiṣṇavaṃ padaṃ yāti līlāvratamidaṃ smṛtam

हिन्दी अर्थ

द्रुमा इव च हैत्येन्द्रास्त्रासयन्तो बलं महत् नन्दीश्वरेण प्रमथास्तारकाख्येन दानवाः। चक्रुः संहृत्य संग्रामं चोद्यमाना बलेन च तेऽसिभिश्चन्द्रसंकाशैः शूलैश्चानलपिङ्गलैः । बाणैश्च दृढनिर्मुक्तैरभिजघ्नुः परस्परम्

English

Pitayudha (V&tayudha or Ahamy&ti)~Bhftnuroatj, d. of Eyitavirya).

अध्याय 101

श्लोक 6

आषाढादिचतुर्मासम् अभ्यङ्गं वर्जयेन्नरः भोजनोपस्करं दद्यात् स याति भवनं हरेः जने प्रीतिकरं नॄणां प्रीतिव्रतमिहोच्यते

āṣāḍhādicaturmāsam abhyaṅgaṃ varjayennaraḥ bhojanopaskaraṃ dadyāt sa yāti bhavanaṃ hareḥ jane prītikaraṃ nṝṇāṃ prītivratamihocyate

हिन्दी अर्थ

रूपाण्यासन् महोल्कानां पतन्तीनामिवाम्बरात् छिन्नाः करिवराकारा निपेतुस्ते धरातले

English

Bbundhu 0Sftrvabhauma)onandft (of Kekaya family)

अध्याय 101

श्लोक 7

वर्जयित्वा मधौ यस्तु दधिक्षीरघृतैक्षवम् दद्याद्वस्त्राणि सूक्ष्माणि रसपात्रैश्च संयुतम्

varjayitvā madhau yastu dadhikṣīraghṛtaikṣavam dadyādvastrāṇi sūkṣmāṇi rasapātraiśca saṃyutam

हिन्दी अर्थ

मायाके प्रभावसे मयद्वारा निर्मित उस बावलीको देख-देखकर हैत्येन्द्रोंके नेत्र और मुख हर्षके कारण उत्फुल्ल हो उठे थे। तब वे (दानवोंको ललकारते हुए) इस प्रकार बोले-'दानवो! अब तुमलोग निर्भय होकर प्रमथगणोंके साथ युद्ध करो। मयद्वारा निर्मित यह बावली मरे हुए तुमलोगोंको जीवित कर देगी।' फिर तो क्षुब्ध हुए सागरके समान भय उत्पन्न करनेवाली दानवोंकी भेरी बज उठी। वह बड़े जोरसे भयंकर शब्द कर रही थी। मेघकी गर्जनाके समान उस भयंकर भेरीके शब्दको सुनकर युद्धके लिये लालायित हुए असुरगण तुरंत ही त्रिपुरसे बाहर निकल पड़े। वे लोहे, चाँदी, सुवर्ण और मणियोंके बने हुए कड़े, कुण्डल, हार और उत्तम मुकुट धारण

English

Bamyftti (Samprati or Jayatsena)=Sasruv& (of Videba)

अध्याय 101

श्लोक 8

सम्पूज्य विप्रमिथुनं गौरी मे प्रीयतामिति एतद्गौरीव्रतं नाम भवानीलोकदायकम्

sampūjya vipramithunaṃ gaurī me prīyatāmiti etadgaurīvrataṃ nāma bhavānīlokadāyakam

हिन्दी अर्थ

किये हुए थे। वे अनवरत जलते हुए धूमसे युक्त प्रज्वलित अग्निके समान दीख रहे थे। वे सुदृढ़ पराक्रमी हैत्य अपने-अपने अस्त्र लेकर (उछलते-कूदते हुए) ऐसे लग रहे थे, जैसे रंगमंचपर नाचते हुए नट हों। वे सूँड़ उठाये हुए हाथीके समान हाथ उठाकर और सिंह-सदृश निर्भय होकर बादलकी तरह गर्जना कर रहे थे। कुण्डके समान गम्भीर, सूर्यके सदृश तेजस्वी और वृक्षोंके-से धैर्यशाली हैत्येन्द्र प्रमथोंकी विशाल सेनाको पीडित करने लगे।

English

Hahamavarchas rAvftcbina)Maryftd& (of Videha)

अध्याय 101

श्लोक 9

पुष्यादौ यस्त्रयोदश्यां कृत्वा नक्तं मधौ पुनः अशोकं काञ्चनं दद्याद् इक्षुयुक्तं दशाङ्गुलम्

puṣyādau yastrayodaśyāṃ kṛtvā naktaṃ madhau punaḥ aśokaṃ kāñcanaṃ dadyād ikṣuyuktaṃ daśāṅgulam

हिन्दी अर्थ

तत्पश्चात् गरुडकी भाँति झपट्टा मारनेवाले दानव-शत्रु प्रमथगण भी उत्साहपूर्वक युद्ध करनेकी अभिलाषासे दानवोंपर टूट पड़े। उस समय नन्दीश्वरकी अध्यक्षतामें प्रमथगण और तारकासुरकी अध्यक्षतामें दानवयूथ समवेतरूपसे युद्ध करने लगे। उन्हें सेनाएँ भी प्रेरित कर रही थीं। वे चन्द्रमाके समान चमकीली तलवारों, अग्नि-सदृश पीले शूलों और सुदृढ्रूपसे छोड़े गये बाणोंसे परस्पर एक- दूसरेपर प्रहार कर रहे थे। उस समय छोड़े जाते हुए बाणों तथा प्रहार की जाती हुई तलवारोंके रूप ऐसे दीख रहे थे मानो आकाशसे गिरती हुई महोल्काएँ हों॥ २५--३६ ॥

English

BbadrlMva (ifarrted)

अध्याय 101

श्लोक 10

विप्राय वस्त्रसंयुक्तं प्रद्युम्नः प्रीयतामिति कल्पं विष्णुपदे स्थित्वा विशोकः स्यात्पुनर्नरः एतत् कामव्रतं नाम सदा शोकविनाशनम्

viprāya vastrasaṃyuktaṃ pradyumnaḥ prīyatāmiti kalpaṃ viṣṇupade sthitvā viśokaḥ syātpunarnaraḥ etat kāmavrataṃ nāma sadā śokavināśanam

हिन्दी अर्थ

शक्तिके आघातसे उनके हृदय छिन्न-भिन्न हो गये थे और वे दयाहीनकी भाँति भूमिपर पड़े हुए थे। इस प्रकार प्रमथगण तथा असुरवृन्द नरकमें पड़े हुए जीवोंकी तरह चीत्कार कर रहे थे। स्वर्णनिर्मित कुण्डलों और प्रभावशाली किरीटोंसे युक्त वीरोंके मस्तक प्रलयकालमें पर्वतशिखरकी भाँति पृथ्वीपर गिर रहे थे। बे कुठार, पटा, खड्ग और लोहेकी गदाके आघातसे छिन्न-भिन्न होकर गजेन्द्रोके समान धराशायी हो रहे थे। कभी

English

TABLE No. 11.

अध्याय 101

श्लोक 11

आषाढादिव्रतं यस्तु वर्जयेन्नखकर्तनम् वार्ताकं च चतुर्मासं मधुसर्पिर्घटान्वितम्

āṣāḍhādivrataṃ yastu varjayennakhakartanam vārtākaṃ ca caturmāsaṃ madhusarpirghaṭānvitam

हिन्दी अर्थ

परिघैराहताः केचिद् दानवैः शङ्करानुगाः। वमन्ते रुधिरं वक्त्रैः स्वर्णधातुमिवाचलाः सूदितानथ तान् हैत्यानन्ये दानवपुङ्गवाः। उत्क्षिप्य चिक्षिपुर्वाप्यां मयदानवचोदिताः ते चापि भास्वरैर्देहैः स्वर्गलोक इवामराः। उत्तस्थुर्वापीमासाद्य सब्रूपाभरणाम्बराः

English

JvalanI (d. of Takfaka)

अध्याय 101

श्लोक 12

कार्त्तिक्यां तत्पुनर्हैमं ब्राह्मणाय निवेदयेत् स रुद्रलोकमाप्नोति शिवव्रतमिदं स्मृतम्

kārttikyāṃ tatpunarhaimaṃ brāhmaṇāya nivedayet sa rudralokamāpnoti śivavratamidaṃ smṛtam

हिन्दी अर्थ

अथैके दानवाः प्राप्य वापीप्रक्षेपणादसून्। आस्फोट्य सिंहनादं च कृत्वाधावंस्तथासुराः एवं श्रुत्वा शङ्कुकर्णो वचोऽग्रग्रहसंनिभः। दरुतमेवैत्य देवेशमिदं वचनमन्रवीत्

English

Gbritichi

अध्याय 101

श्लोक 13

वर्जयेद्यस्तु पुष्पाणि हेमन्तशिशिरावृतू पुष्पत्रयं च फाल्गुन्यां कृत्वा शक्त्या च काञ्चनम्

varjayedyastu puṣpāṇi hemantaśiśirāvṛtū puṣpatrayaṃ ca phālgunyāṃ kṛtvā śaktyā ca kāñcanam

हिन्दी अर्थ

सूदिताः सूदिता देव प्रमथैरसुरा ह्यमी। उत्तिष्ठन्ति पुनर्भीमाः सस्या इव जलोक्षिताः इति विज्ञापयद् देवं शङ्कुकर्णो महेश्वरम्। अभवन् दानवबल उत्पाता वै सुदारुणाः तारकाख्यः सुभीमाक्षो दारितास्यो हरिर्यथा। अभ्यधावत् संक्रुद्धो महादेवरथं प्रति

English

Antin&ra {Manried)

अध्याय 101

श्लोक 14

दद्याद्द्विकालवेलायां प्रीयेतां शिवकेशवौ दत्त्वा परं पदं याति सौम्यव्रतमिदं स्मृतम्

dadyāddvikālavelāyāṃ prīyetāṃ śivakeśavau dattvā paraṃ padaṃ yāti saumyavratamidaṃ smṛtam

हिन्दी अर्थ

त्रिपुरे तु महान् घोरो भेरीशङ्करवो बभौ। दानवा निःसृता दृष्टा देवदेवरथे सुरम् सहसा भयंकर गर्जना करनेवाले प्रमथगण हर्षपूर्वक गर्जना करने लगते तो इधर सिद्धगण अद्भुत युद्ध- कौशल दिखाते थे। रणभूमिमें आगे चलनेवाले चारण-

English

sllina (d, of Yama)

अध्याय 101

श्लोक 15

फाल्गुन्यादितृतीयायां लवणं यस्तु वर्जयेत् समाप्ते शयनं दद्याद् गृहं चोपस्करान्वितम्

phālgunyāditṛtīyāyāṃ lavaṇaṃ yastu varjayet samāpte śayanaṃ dadyād gṛhaṃ copaskarānvitam

हिन्दी अर्थ

गर्वीले दीख रहे हो '--इस प्रकारके वचन बोल रहे थे। दानवोंँद्वारा चलाये गये लोहनिर्मित गदाके आघातसे कुछ पार्षदगण मुखसे रक्त उगल रहे थे, जो ऐसे लगते थे, रणभूमिमें बाणों, वृक्षों और पर्वत-शिखरोंके प्रहारसे बहुतेरे देवशत्रु असुरोंको पूर्णरूपसे घायल कर उन्हे कालके हवाले कर रहे थे। मयदानवकी आज्ञासे दूसरे दानवश्रेष्ठ उन मरे हुए दानवोंको उठाकर उसी बावलीमें डाल देते थे। उस बावलीमें पड़ते ही वे सभी दानव स्वर्गवासी देवताओंकी तरह तेजस्वी शरीर धारण कर उत्तम आभूषणों और वस्त्रोंसे विभूषित हो बाहर निकल आते थे। तदनन्तर बावलीमें डाल देनेसे जीवित हुए

English

Amdrtarayas

अध्याय 101

श्लोक 16

सम्पूज्य विप्रमिथुनं भवानी प्रीयतामिति गौरीलोके वसेत्कल्पं सौभाग्यव्रतमुच्यते

sampūjya vipramithunaṃ bhavānī prīyatāmiti gaurīloke vasetkalpaṃ saubhāgyavratamucyate

हिन्दी अर्थ

कुछ दानव ताल ठोंककर सिंहनाद करते हुए इधर- प्रमथगणोंपर धावा करो। क्यों बैठे हो ? (अब तुमलोगोंको कोई भय नहीं है; क्योंकि) मर जानेपर भी तुमलोगोंको यह बावली पुनः जीवित कर देगी'॥ ३७--४७॥ दानवोंको ऐसा कहते सुनकर सूर्यके समान

English

:==Mana8vIni

अध्याय 101

श्लोक 17

संध्यामौनं ततः कृत्वा समान्ते घृतकुम्भकम् वस्त्रयुग्मं तिलान्घण्टां ब्राह्मणाय निवेदयेत्

saṃdhyāmaunaṃ tataḥ kṛtvā samānte ghṛtakumbhakam vastrayugmaṃ tilānghaṇṭāṃ brāhmaṇāya nivedayet

हिन्दी अर्थ

तेजस्वी शङ्ककर्णने शीघ्र ही देवेश्वर शंकरजीके निकट जाकर इस प्रकार कहा--' देव! प्रमथगणोंद्वारा बारंबार मारे गये ये भयंकर असुर पुन: उसी प्रकार जी उठते हैं, जैसे जलके सिञ्चनसे सूखी हुई फसल। निश्चय ही इस पुरमें अमृतरूपी जलसे परिपूर्ण कोई बावली है, जिसमें डाल देनेसे बार-बार मारे गये दानव पुनः जीवित हो जाते हैं ।' इस प्रकार शङ्कुकर्णने भगवान् महे धरको सूचित किया। उसी समय दानवोंकी सेनामें अत्यन्त तारकाक्षने अत्यन्त कुपित होकर सिंहकी तरह मुँह फैलाये हुए महादेवजीके रथपर धावा किया। उस समय त्रिपुरमें भेरियों और शङ्खोंका महान् भीषण निनाद होने लगा। देवाधिदेव शंकरजीके रथपर (शंकर और)

English

Trivanam

अध्याय 101

श्लोक 18

सारस्वतं पदं याति पुनरावृत्तिदुर्लभम् एतत्सारस्वतं नाम रूपविद्याप्रदायकम्

sārasvataṃ padaṃ yāti punarāvṛttidurlabham etatsārasvataṃ nāma rūpavidyāpradāyakam

हिन्दी अर्थ

ब्रह्माको उपस्थित देखकर दानवगण त्रिपुरसे बाहर निकले। ताभ्यां देववरिष्ठाभ्यामन्वितः स रथोत्तमः। अनायतनमासाद्य सीदते गुणवानिव

English

Qanrj, mother of MandhAtri

अध्याय 101

श्लोक 19

लक्ष्मीमभ्यर्च्य पञ्चम्याम् उपवासी भवेन्नरः समान्ते हेमकमलं दद्याद्धेनुसमन्वितम्

lakṣmīmabhyarcya pañcamyām upavāsī bhavennaraḥ samānte hemakamalaṃ dadyāddhenusamanvitam

हिन्दी अर्थ

उज्जहार महाप्राणो रथं त्रैलोक्यरूपिणम् स विषाणाभ्यां त्रैलोक्यं रथमेव महारथः । प्रगृह्योद्दहते सज्जं कुलं कुलवहो यथा तारकाख्योऽपि हैत्येन्द्रो गिरीन्द्र इव पक्षवान्। अभ्यद्रवत्तदा देवं ब्रह्माणं हतवांश्च सः

English

(1) (2) (3) (4) I

अध्याय 101

श्लोक 20

स वैष्णवं पदं याति लक्ष्मीवाञ्जन्मजन्मनि एतत् सम्पद्व्रतं नाम सदा पापविनाशनम्

sa vaiṣṇavaṃ padaṃ yāti lakṣmīvāñjanmajanmani etat sampadvrataṃ nāma sadā pāpavināśanam

हिन्दी अर्थ

स तारकाख्याभिहतः प्रतोदं न्यस्य कूबरे। विजज्वाल मुहुर््रह्मा श्वासं वक्त्रात् समुद्विरन् तत्र॒ हैत्यैर्महानादो दानवैरपि भैरवः। तारकाख्यस्य पूजार्थं कृतो जलधरोपमः

English

Rifyanta Dayanta Pravira Anagha

अध्याय 101

श्लोक 21

कृत्वोपलेपनं शम्भोर् अग्रतः केशवस्य च यावदब्दं पुनर्दद्याद् धेनुं जलघटान्विताम्

kṛtvopalepanaṃ śambhor agrataḥ keśavasya ca yāvadabdaṃ punardadyād dhenuṃ jalaghaṭānvitām

हिन्दी अर्थ

रथचरणकरोऽथ महामृधे त्रिपुरपुरं प्रविवेश केशवः तभी वहाँ ऐसा भयंकर भूकम्प आया, जिससे (शिवजीके) रथका चक्का पृथ्वीमें प्रविष्ट हो गया यह देखकर भगवान् रुद्र और स्वयम्भू ब्रह्मा क्षुब्ध हो उठे । उन दोनों देवश्रेष्ठोंसे युक्त वह उत्तम रथ कहीं ठहरनेका स्थान न पाकर स्थानरहिंत

English

{Married)

अध्याय 101

श्लोक 22

जन्मायुतं स राजा स्यात् ततः शिवपुरं व्रजेत् एतद् आयुर्व्रतं नाम सर्वकामप्रदायकम्

janmāyutaṃ sa rājā syāt tataḥ śivapuraṃ vrajet etad āyurvrataṃ nāma sarvakāmapradāyakam

हिन्दी अर्थ

गुणी पुरुषकी तरह विपत्तिग्रस्त हो गया। वह रथ वीर्यनाश हो जानेपर शरीर, ग्रीष्म ऋतुमें अल्प जलवाले जलाशय और तिरस्कृत स्नेहकी तरह शिथिलताको प्राप्त हो गया। इस प्रकार जब वह श्रेष्ठ रथ नीचे जाने लगा, तब महाबली स्वयम्भू ब्रह्माने उससे कूदकर उस त्रैलोक्यरूपी रथको ऊपर उठा दिया। इतनेमें ही पीताम्बरधारी भगवान् जनार्दने बाणसे निकलकर विशाल वृषभका रूप धारण किया और उस दुर्धर रथको उठा लिया। वे महारथी जनार्दन त्रिलोकीरूप

English

SaknotaU (d. of Visv&mitra)

अध्याय 101

श्लोक 23

अश्वत्थं भास्करं गङ्गां प्रणम्यैकत्र वाग्यतः एकभक्तं नरः कुर्याद् अब्दमेकं विमत्सरः

aśvatthaṃ bhāskaraṃ gaṅgāṃ praṇamyaikatra vāgyataḥ ekabhaktaṃ naraḥ kuryād abdamekaṃ vimatsaraḥ

हिन्दी अर्थ

उस रथको अपने सींगोंपर उठाकर उसी तरह ढो रहे थे, जैसे कुलपति अपने संगठित कुलका भार वहन करता है। उसी समय पक्षधारी गिरिराजकी तरह विशालकाय हैत्येन्द्र तारकासुरने भी देवेश्वर ब्रह्मापर धावा बोल दिया और उन्हें घायल कर दिया। तब तारकासुरके प्रहारसे घायल हुए ब्रह्मा रथके कूबरपर चाबुक रखकर मुखसे बारंबार लम्बी साँस छोड़ते हुए (क्रोधसे) प्रज्वलित हो उठे वहाँ हैत्य और दानव तारकासुरका सत्कार करनेके लिये मेघकी गर्जनाके समान अत्यन्त भयंकर सिंहनाद करने लगे। यह देखकर वृषभका शरीर धारण करनेवाले एवं शंकरद्वारा पूजित भगवान् केशव हाथमें सुदर्शन चक्र

English

Rons died through a curse.

अध्याय 101

श्लोक 24

व्रतान्ते विप्रमिथुनं पूज्यं धेनुत्रयान्वितम् वृक्षं हिरण्मयं दद्यात् सोऽश्वमेधफलं लभेत् एतत् कीर्तिव्रतं नाम भूतिकीर्तिफलप्रदम्

vratānte vipramithunaṃ pūjyaṃ dhenutrayānvitam vṛkṣaṃ hiraṇmayaṃ dadyāt so'śvamedhaphalaṃ labhet etat kīrtivrataṃ nāma bhūtikīrtiphalapradam

हिन्दी अर्थ

धारण कर उस महासमरमें हैत्योंकी सारी सेनाओंका मर्दन करते हुए त्रिपुरमें प्रविष्ट हुए। वहाँ वे उस बावलीपर जा पहुँचे, जो चारों ओरसे बादलोंसे सुशोभित तथा खिली हुई कुमुदिनी, नीलकमल और अन्यान्य कमलोंसे व्याप्त थी। फिर तो उन देवश्रेष्ठने उसके अमृतरूपी जलको इस प्रकार पी लिया, जैसे सूर्य रात्रिमें संचित हुए घने अन्धकारको पी जाते हैं। इस प्रकार पीताम्बरधारी महाबाहु जनार्दन असुरेन्द्रोंकी बावलीका अमृत पीकर सिंहनाद करते हुए

English

I 1; I II I 11

अध्याय 101

श्लोक 25

घृतेन स्नपनं कुर्याच् छम्भोर् वा केशवस्य च अक्षताभिः सुपुष्पाभिः कृत्वा गोमयमण्डलम्

ghṛtena snapanaṃ kuryāc chambhor vā keśavasya ca akṣatābhiḥ supuṣpābhiḥ kṛtvā gomayamaṇḍalam

हिन्दी अर्थ

पुनः उसी बाणमें प्रविष्ट हो गये। तत्पश्चात् भयावने मुखवाले भयंकर गणेश्वरोंने असुरोंको मारना प्रारम्भ किया। उनके प्रहारसे घायल हुए दानवोंके रुधिरसे नदियाँ बह चलीं। वे उसी प्रकार युद्धविमुख कर दिये गये, यथा नयाभ्युद्यततत्परैर्नरैः॥ ६६ जैसे नयशील पुरुष अन्यायियोंको विमुख कर देते हैं। कुछ प्रतियोंके अनुसार यहाँ यदि “शताङ्ग' पाठ भी हो तो भी विष्णु आदि सैकड़ों अङ्गयुक्त रथ ही अभिप्रेत होगा। तारकाख्यस्तडिमालिरेव च

English

(l) (2) (3) (4) (5) (6) (7) (8) (9) aO)

अध्याय 101

श्लोक 26

तिलधेनुसमोपेतं समान्ते हेमपङ्कजम् शुद्धमष्टाङ्गुलं दद्याच् छिवलोके महीयते सामगाय ततश्चैतत् सामव्रतमिहोच्यते

tiladhenusamopetaṃ samānte hemapaṅkajam śuddhamaṣṭāṅgulaṃ dadyāc chivaloke mahīyate sāmagāya tataścaitat sāmavratamihocyate

हिन्दी अर्थ

गणेश्वराभ्युद्यतदर्पकाशिनो इस प्रकार प्रमथगणोंद्वारा खदेड़े गये एवं बाणोंके प्रहारसे घायल मयके साथ तारकासुर और विद्युन्माली त्रिपुरमें ऐसे लौट आये, मानो उनके शरीरसे प्राण ही निकल गये हों। उस समय युद्धस्थलमें महेन्द्र, नन्दीश्वर और

English

Ancheyu Hrisoyu Eakeyu Uaneyu Dhfiteyu Vineyu Saleyu Dharmeyu Samnateyu Punyeya

अध्याय 101

श्लोक 27

नवम्यामेकभक्तं तु कृत्वा कन्याश्च शक्तितः भोजयित्वासनं दद्याद् धैमकञ्चुकवाससी

navamyāmekabhaktaṃ tu kṛtvā kanyāśca śaktitaḥ bhojayitvāsanaṃ dadyād dhaimakañcukavāsasī

हिन्दी अर्थ

स्वामिकार्तिक गणेश्वरोंके साथ दर्पसे सुशोभित हो रहे थे। चे उन्मत्त होकर सिंहनाद एवं अट्टहास करते हुए इति श्रीमत्स्ये महापुराणे त्रिपुरदाहे षट्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके त्रिपुरदाहप्रसङ्गमें एक सौ छत्तीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ

English

Irhapata.

अध्याय 101

श्लोक 28

हैमं सिंहं च विप्राय दत्त्वा शिवपदं व्रजेत् जन्मार्बुदं सुरूपः स्याच् छत्रुभिश्चापराजितः एतद्वीरव्रतं नाम नारीणां च सुखप्रदम्

haimaṃ siṃhaṃ ca viprāya dattvā śivapadaṃ vrajet janmārbudaṃ surūpaḥ syāc chatrubhiścāparājitaḥ etadvīravrataṃ nāma nārīṇāṃ ca sukhapradam

हिन्दी अर्थ

वापी-शोषणसे मयको चिन्ता, मय आदि दानवोंका त्रिपुरसहित समुद्रमें प्रवेश तथा शंकरजीका इन्द्रको युद्ध करनेका आदेश यथा विपक्षा: शकुना नद्यः क्षीणोदका यथा

English

(Adopted son) Bhfiradvfija (son of Bfihaspati, named subsequently)

अध्याय 101

श्लोक 29

यावत्समा भवेद्यस्तु पञ्चदश्यां पयोव्रतः समान्ते श्राद्धकृद्दद्यात् पञ्च गास्तु पयस्विनीः

yāvatsamā bhavedyastu pañcadaśyāṃ payovrataḥ samānte śrāddhakṛddadyāt pañca gāstu payasvinīḥ

हिन्दी अर्थ

मृतप्रायास्तथा हैत्या हैवतैर्विकृताननाः। बभूवुस्ते विमनसः कथं कार्यमिति ब्रुवन् उवाच हैत्यो हैत्यानां परमाधिपतिर्मयः यूयं यत् प्रथमं हैत्याः पश्चाच्च बलपीडिताः। प्रविष्ठा नगरं त्रासात् प्रमथैर्भृशमर्दिताः

English

* Bhuvamanyu

अध्याय 101

श्लोक 30

वासांसि च पिशङ्गानि जलकुम्भयुतानि च स याति वैष्णवं लोकं पितॄणां तारयेच्छतम् कल्पान्ते राजराजः स्यात् पितृव्रतम् इदं स्मृतम्

vāsāṃsi ca piśaṅgāni jalakumbhayutāni ca sa yāti vaiṣṇavaṃ lokaṃ pitṝṇāṃ tārayecchatam kalpānte rājarājaḥ syāt pitṛvratam idaṃ smṛtam

हिन्दी अर्थ

अप्रियं क्रियते व्यक्तं देवैर्नास्त्यत्र संशयः। यत्र नाम महाभागाः प्रविशन्ति गिरेर्वनम् अहो हि कालस्य बलमहो कालो हि दुर्जयः।

English

Brihatkfatra

अध्याय 101

श्लोक 31

चैत्रादिचतुरो मासाञ् जलं दद्यादयाचितम् व्रतान्ते मणिकं दद्याद् अन्नवस्त्रसमन्वितम्

caitrādicaturo māsāñ jalaṃ dadyādayācitam vratānte maṇikaṃ dadyād annavastrasamanvitam

हिन्दी अर्थ

सूतजी कहते हैं-ऋषियो ! इस प्रकार समरभूमिमें प्रमथगणोंद्वारा घायल किये गये त्रिपुरवासी देवशत्रु दानव भयभीत होकर त्रिपुरमें लौट गये। उस समय प्रमथोंने त्रिपुरे फाटकको भी नष्ट-भ्रष्ट कर दिया था। जैसे नष्ट हुए दाँतोंवाले सर्प, टूटे हुए सींगोंवाले साँड़, डेनेरहित हैं, उसी प्रकार देवताओंके प्रहारसे हैत्यवृन्द मृतप्राय हो गये थे। उनके मुख विकृत हो गये थे और वे खिन्न मनसे कह रहे थे कि अब क्या किया जाय? तब कमल-सदृश मुखवाले हैत्योंके चक्रवर्ती सम्राट् मय

English

Mahftvirya (or Aharya)

अध्याय 101

श्लोक 32

तिलपात्रं हिरण्यं च ब्रह्मलोके महीयते कल्पान्ते भूपतिर्नूनम् आनन्दव्रतमुच्यते

tilapātraṃ hiraṇyaṃ ca brahmaloke mahīyate kalpānte bhūpatirnūnam ānandavratamucyate

हिन्दी अर्थ

हैत्यने उन मलिन मनवाले हैत्योंसे कहा--' हैत्यो! इसमें सन्देह नहीं है कि तुमलोगोंने पहले युद्धभूमिमें उन्हें संतुष्ट किया है, किंतु पीछे तुमलोग देवसेनासे पीड़ित और प्रमथोंके प्रहारसे अत्यन्त घायल होकर भयवश नगरमें भाग आये हो । निस्संदेह देवगण प्रकटरूपमें हमलोगोंका अप्रिय कर रहे हैं, इसी कारण ये महान्

English

Uruksava =ViafiU 26.

अध्याय 101

श्लोक 33

पञ्चामृतेन स्नपनं कृत्वा संवत्सरं विभोः वत्सरान्ते पुनर्दद्याद् धेनुं पञ्चामृतेन हि

pañcāmṛtena snapanaṃ kṛtvā saṃvatsaraṃ vibhoḥ vatsarānte punardadyād dhenuṃ pañcāmṛtena hi

हिन्दी अर्थ

भाग्यशाली हैत्य इस समय भागकर पर्वतीय वनोंमें छिप रहे हैं। अहो! कालका बल महान् है! अहो! यह काल किसी प्रकार जीता नहीं जा सकता। कालके ही प्रभावसे उपरोधोऽयमागतः ॥ ८ त्रिपुर-जैसे दुर्गपर यह अवरोध उत्पन्न हो गया है।' बभूवुर्निष्प्रभा हैत्या ग्रहा इन्दूदये यथा

English

Sankriti

अध्याय 101

श्लोक 34

विप्राय दद्याच्छङ्खं च स पदं याति शांकरम् राजा भवति कल्पान्ते धृतिव्रतमिदं स्मृतम्

viprāya dadyācchaṅkhaṃ ca sa padaṃ yāti śāṃkaram rājā bhavati kalpānte dhṛtivratamidaṃ smṛtam

हिन्दी अर्थ

वापीपालास्ततोऽभ्येत्य नभः काल इवाम्बुदाः । मयमाहुर्यमप्रख्यं साञ्जलिप्रग्रहाः स्थिताः पीता सा वृषरूपेण केनचिद् हैत्यनायक। वापी सा साम्प्रतं दृष्ट्रा मृतसंज्ञा इवाङ्गना

English

Mah&ya8as=

अध्याय 101

श्लोक 35

वर्जयित्वा पुमान्मांसम् अब्दान्ते गोप्रदो भवेत् तद्वद्धेममृगं दद्यात् सोऽश्वमेधफलं लभेत् अहिंसाव्रतमित्युक्तं कल्पान्ते भूपतिर्भवेत्

varjayitvā pumānmāṃsam abdānte goprado bhavet tadvaddhemamṛgaṃ dadyāt so'śvamedhaphalaṃ labhet ahiṃsāvratamityuktaṃ kalpānte bhūpatirbhavet

हिन्दी अर्थ

निहतान् निहतान् हैत्यानाजीवयति हैवतैः। पीता वा यदि वा वापी पीता वै पीतवाससा कोऽन्यो मन्मायया गुप्तां वापीममृततोयिनीम्। पास्यते विष्णुमजितं वर्जयित्वा गदाधरम् सुगुह्यमपि हैत्यानां नास्त्यस्याविदितं भुवि। यत्र मद्दरकौशल्यं विज्ञानं न वृतं बुधेः

English

Satkriti

अध्याय 101

श्लोक 36

माघमास्युषसि स्नानं कृत्वा दाम्पत्यमर्चयेत् भोजयित्वा यथाशक्त्या माल्यवस्त्रविभूषणः सूर्यलोके वसेत्कल्पं सूर्यव्रतमिदं स्मृतम्

māghamāsyuṣasi snānaṃ kṛtvā dāmpatyamarcayet bhojayitvā yathāśaktyā mālyavastravibhūṣaṇaḥ sūryaloke vasetkalpaṃ sūryavratamidaṃ smṛtam

हिन्दी अर्थ

सागरोऽम्बरसङ्काशः शरणं नो भविष्यति इत्युक्त्वा स मयो हैत्यो हैत्यानामधिपस्तदा। त्रिप्रण ययौ तूर्ण सागरं सिन्धुबान्धवम्

English

Tryusana

अध्याय 101

श्लोक 37

आषाढादिचतुर्मासं प्रातःस्नायी भवेन्नरः विप्रेषु भोजनं दद्यात् कार्त्तिक्यां गोप्रदो भवेत् स वैष्णवं पदं याति विष्णुव्रतमिदं शुभम्

āṣāḍhādicaturmāsaṃ prātaḥsnāyī bhavennaraḥ vipreṣu bhojanaṃ dadyāt kārttikyāṃ goprado bhavet sa vaiṣṇavaṃ padaṃ yāti viṣṇuvratamidaṃ śubham

हिन्दी अर्थ

मेघकी भाँति कड़कते हुए मयके इस प्रकार विषाद करनेपर सभी हैत्य उसी प्रकार निस्तेज हो गये, जैसे चन्द्रमाके उदय होनेपर अन्य ग्रह मलिन हो जाते हैं॥ १--९॥ इसी समय वर्षाकालीन मेघकी तरह शरीरधारी बावलीके रक्षक हैत्य यमराज-सदूश भयंकर मयके निकट आकर हाथ जोड़कर (अभिवादन करके) खड़े हो गये और इस प्रकार बोले-'हैत्यनायक! आपने अमृतरूपी जलसे भरी हुई जिस गुप्त बावलीका निर्माण किया था, जो नील कमल-वनसे व्याप्त थी तथा जिसमें मछलियाँ और विभिन्न प्रकारके भी कमल भरे हुए थे, उसे वृषभरूपधारी किसी देवताने पी लिया। इस समय

English

Gurundhi

अध्याय 101

श्लोक 38

अयनादयनं यावद् वर्जयेत्पुष्पसर्पिषी तदन्ते पुष्पदामानि घृतधेन्वा सहैव तु

ayanādayanaṃ yāvad varjayetpuṣpasarpiṣī tadante puṣpadāmāni ghṛtadhenvā sahaiva tu

हिन्दी अर्थ

वह बावली मूर्च्छित हुई सुन्दरी स्त्रीकी भाँति दीख रही है।' बावलीके रक्षकोंकी बात सुनकर दानवराज मय “कष्ट है'—एऐसा कई बार कहकर हैत्योंसे इस प्रकार बोला--'दानवो! मेरे द्वारा मायाके बलसे रची हुई बावलीको यदि किसीने पी लिया तो निश्चय समझो कि हमलोग नष्ट हो गये और त्रिपुरको भी गया हुआ ही समझो। हाय! जो देवताओंद्वारा बार-बार मारे गये हैत्योंको जीवन-दान देती थी, वह बावली पी ली गयी!

English

Rantideva

अध्याय 101

श्लोक 39

दत्त्वा शिवपदं गच्छेद् विप्राय घृतपायसम् एतच्छीलव्रतं नाम शीलारोग्यफलप्रदम्

dattvā śivapadaṃ gacched viprāya ghṛtapāyasam etacchīlavrataṃ nāma śīlārogyaphalapradam

हिन्दी अर्थ

यदि वह सचमुच पी ली गयी तो (निश्चय ही) उसे पीताम्बरधारी विष्णुने ही पीया होगा। भला, गदाधारी अजेय विष्णुको छोड़कर दूसरा कौन ऐसा समर्थ है, जो मेरी मायाद्वारा गुप्त एवं अमृतरूपी जलसे भरी हुई बावलीको पी सकेगा? भूतलपर हैत्योंकी गुप्त-से-गुप्त बात विष्णुसे अज्ञात नहीं है। मेरी वरप्रापिकी कुशलता, जिसे विद्वान् लोग नहीं जान सके, विष्णुसे छिपी नहीं है। हमारा यह देश सुन्दर और समतल है। यह वृक्ष और पर्वतसे रहित है। फिर भी मरुद्गण इसे नूतन जलसे परिपूर्ण करके हमलोगोंको बाधा पहुँचा रहे हैं। इसलिये यदि तुमलोगोंको स्वीकार हो तो हमलोग सागरके ऊपर स्थित हो जायँ और वहींसे प्रमथोंके वायुके

English

Ajamidha (four wives)

अध्याय 101

श्लोक 40

संध्यादीपप्रदो यस्तु समां तैलं विवर्जयेत् समान्ते दीपिकां दद्याच् चक्रशूले च काञ्चने

saṃdhyādīpaprado yastu samāṃ tailaṃ vivarjayet samānte dīpikāṃ dadyāc cakraśūle ca kāñcane

हिन्दी अर्थ

समान महान् वेगको सहन करें। सागरकी उस बाढ़में इनका सारा उद्योग उत्साहहीन हो जायगा और उस विशाल रथका मार्ग रुक जायगा। इसलिये युद्ध करते समय, शत्रुओंको मारते समय और भयभीत होकर भागते समय हमलोगोंके लिये यह सागर आकाशकी भाँति शरणदाता हो जायगा।' ऐसा कहकर हैत्यराज मयदानव तुरंत त्रिपुरसहित नदियोंके बन्धुस्वरूप सागरकी ओर प्रस्थित हुआ। फिर

English

Dvimfdha

अध्याय 101

श्लोक 41

वस्त्रयुग्मं च विप्राय तेजस्वी स भवेदिह रुद्रलोकमवाप्नोति दीप्तिव्रतमिदं स्मृतम्

vastrayugmaṃ ca viprāya tejasvī sa bhavediha rudralokamavāpnoti dīptivratamidaṃ smṛtam

हिन्दी अर्थ

अवतस्थुः पुराण्येब गोपुराभरणानि च सिंहनादं ततः कृत्वा देवा देवरथं च तम्। त्रिपुरमभिसमीक्ष्य देवता विविधबला ननदुर्यथा घनाः

English

PurunAdha.

अध्याय 101

श्लोक 42

कार्त्तिक्यादितृतीयायां प्राश्य गोमूत्रयावकम् नक्तं चरेदब्दमेकम् अब्दान्ते गोप्रदो भवेत्

kārttikyāditṛtīyāyāṃ prāśya gomūtrayāvakam naktaṃ caredabdamekam abdānte goprado bhavet

हिन्दी अर्थ

त्रिपुरनिकेतनं दानवाः प्रविष्टाः । सह गणपैरपि हन्मि तावदेव

English

Riksa, 100 28. Yavinara

अध्याय 101

श्लोक 43

गौरीलोके वसेत्कल्पं ततो राजा भवेदिह एतद्रुद्रव्रतं नाम सदा कल्याणकारकम्

gaurīloke vasetkalpaṃ tato rājā bhavediha etadrudravrataṃ nāma sadā kalyāṇakārakam

हिन्दी अर्थ

ब्रज जलधेस्तु यतः पुराणि तस्थुः । तो वह श्रेष्ठ त्रिपुर नामक नगर अगाध जलवाले सागरके ऊपर मँडराने लगा। उसके फाटक और आभूषणादि- इस प्रकार त्रिपुरके दूर हट जानेपर त्रिपुरारि भगवान् शंकरने वेदवादमें निपुण ब्रह्मासे इस प्रकार कहा- 'ऐश्वर्यशशाली पितामह! दानवगण हमलोगोंसे भलीभाँति डर गये हैं, इसलिये वे भागकर विशाल सागरकी शरणमें

English

others i

अध्याय 101

श्लोक 44

वर्जयेच्चैत्रमासे च यश्च गन्धानुलेपनम् शुक्तिं गन्धभृतां दत्त्वा विप्राय सितवाससी वारुणं पदमाप्नोति दृढव्रतमिदं स्मृतम्

varjayeccaitramāse ca yaśca gandhānulepanam śuktiṃ gandhabhṛtāṃ dattvā viprāya sitavāsasī vāruṇaṃ padamāpnoti dṛḍhavratamidaṃ smṛtam

हिन्दी अर्थ

चले गये । पितामह ! त्रिपुरसहित वे दानव जिस मार्गसे गये हैं, उसी मार्गसे आप शीघ्र ही मेरे रथको वहाँ पहुँचाइये।' तब आयुधधारी देवगण हर्षपूर्वक सिंहनाद करके और उस देवरथको चारों ओरसे घेरकर पश्चिम सागरकी ओर चल पड़े। तत्पश्चात् देवगण देवश्रेष्ठ भगवान् शंकरको चारों ओरसे घेरकर सिंहनाद करते हुए शीघ्र ही दानवोंके निवासस्थान सागरकी ओर प्रस्थित हुए। वहाँ पहुँचनेपर सुन्दर पताकाओंसे विभूषित तथा ढोल, नगारे और शङ्के

English

» Saniyarana 29. DhrHimat I I

अध्याय 101

श्लोक 45

वैशाखे पुष्पलवणं वर्जयित्वाथ गोप्रदः भूत्वा विष्णुपदे कल्पं स्थित्वा राजा भवेदिह एतत्कान्तिव्रतं नाम कान्तिकीर्तिफलप्रदम्

vaiśākhe puṣpalavaṇaṃ varjayitvātha gopradaḥ bhūtvā viṣṇupade kalpaṃ sthitvā rājā bhavediha etatkāntivrataṃ nāma kāntikīrtiphalapradam

हिन्दी अर्थ

शब्दोसे निनादित त्रिपुरको देखकर अनेकों सेनाओंसे सम्पन्न देवगण बादलोंकी तरह गर्जना करने लगे। उधर असुरश्रेष्ठ मयके पुरमें भी दानवोंके सिंहनादके साथ-साथ मेघ-गर्जनाके सदृश मृदंगांका भयंकर एवं गम्भीर शब्द हो रहा था, जो क्षुब्ध हुए महासागरकी गर्जनाके समान प्रतीत हो रहा था। तदनन्तर देवताओंके आश्रयस्थान प्रत्युत्पन्नमति त्रिभुवनपति शंकर शत्रुओंका शिकार करनेके लिये उद्यत हो गये। तब उन्होंने सहसा शत्रुओंको त्रिपुरमें प्रवेश करते देखकर देवताओं और गणोंके सेनानायक इन्द्रसे इस प्रकार कहा--' देवताओं और गणेश्वरोंके नायक इन्द्र! आपलोग मेरी यह बात सुनें। दानवलोग अपने निवासस्थान त्रिपुरमें घुस गये हैं, अत: आप यम, वरुण,

English

I 80. Satyadhriti

अध्याय 101

श्लोक 46

ब्रह्माण्डं काञ्चनं कृत्वा तिलराशिसमन्वितम् त्र्यहं तिलप्रदो भूत्वा वह्निं संतर्प्य सद्विजम्

brahmāṇḍaṃ kāñcanaṃ kṛtvā tilarāśisamanvitam tryahaṃ tilaprado bhūtvā vahniṃ saṃtarpya sadvijam

हिन्दी अर्थ

कुबेर, कार्तिकेय तथा गणेश्वरोंको साथ लेकर इनका संहार करें। तबतक मैं भी इन्हें मार रहा हूँ। आप शत्रुसेनापर प्रहार करते हुए समुद्रके उस स्थानतक बढ़ते चलें, जहाँ तीनों पुर स्थित हैं। यह देखकर जब उन हैत्योंको यह विदित हो जायगा कि सामर्थ्यशाली शंकर उस श्रेष्ठ रथपर आरूढ हो पुन: त्रिपुरका विनाश करनेके लिये समुद्रतटपर आ गये हैं, तब वे लवणसागरके ऊपर निकल आयेंगे। तब आप वज्रसहित मुसलों एवं बाणोंकी

English

Byihadann 28. Kanva 28. Nila Brihanta 29. MedhAtithi 29. SusAnti

अध्याय 101

श्लोक 47

सम्पूज्य विप्रदाम्पत्यं माल्यवस्त्रविभूषणैः शक्तितस्त्रिपलादूर्ध्वं विश्वात्मा प्रीयतामिति

sampūjya vipradāmpatyaṃ mālyavastravibhūṣaṇaiḥ śaktitastripalādūrdhvaṃ viśvātmā prīyatāmiti

हिन्दी अर्थ

वर्षा करते हुए दानवेन्द्रोंसहित त्रिपुरपर आक्रमण कर दें। सुरश्रेष्ठ! उस समय मैं भी इस श्रेष्ठ रथपर बैठा हुआ असुरेन्द्रोंका वध करनेके लिये उद्यत आपलोगोंके पीछे रहूँगा। अनघ! मैं सर्वथा आपलोगोंके सुखका विधान करता रहूँगा।' इस प्रकार शंकरजीके वचनोंसे प्रेरित होकर एक हजार नेत्रोंवाले इन्द्र, जिनके नेत्र प्रफुल्ल कमलके सदृश सुन्दर थे, त्रिपुरके विनाशकी इच्छासे

English

mauas I I

अध्याय 101

श्लोक 48

पुण्ये ऽह्नि दद्यात्स परं ब्रह्म यात्यपुनर्भवम् एतद्ब्रह्मव्रतं नाम निर्वाणपददायकम्

puṇye 'hni dadyātsa paraṃ brahma yātyapunarbhavam etadbrahmavrataṃ nāma nirvāṇapadadāyakam

हिन्दी अर्थ

प्रविकसिताम्बुजलोचनो ययौ॥ ३६ उद्यत होकर आगे बढ़े इति श्रीमत्स्ये महापुराणे त्रिपुराक्रमणं नाम सपतत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः

English

APPENDIX VL I I Became 81. Pfithu

अध्याय 101

श्लोक 49

यश्चोभयमुखीं दद्यात् प्रभूतकनकान्विताम् दिनं पयोव्रतस्तिष्ठेत् स याति परमं पदम् एतद्धेनुव्रतं नाम पुनरावृत्तिदुर्लभम्

yaścobhayamukhīṃ dadyāt prabhūtakanakānvitām dinaṃ payovratastiṣṭhet sa yāti paramaṃ padam etaddhenuvrataṃ nāma punarāvṛttidurlabham

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें त्रिपुराक्रमण नामक एक सौ सँतीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ लोकपाला ययुः सर्वे गणपालाश्च सर्वशः नादयन्तः पुरो देवा दृष्टारित्रपुरवासिभिः

English

it Dridhancml 8i» Bfihaddhanua Br&hmanas 8ee page LX

अध्याय 101

श्लोक 50

त्र्यहं पयोव्रते स्थित्वा काञ्चनं कल्पपादपम् पलादूर्ध्वं यथाशक्त्या तण्डुलैस् तूपसंयुतम् दत्त्वा ब्रह्मपदं याति कल्पव्रतमिदं स्मृतम्

tryahaṃ payovrate sthitvā kāñcanaṃ kalpapādapam palādūrdhvaṃ yathāśaktyā taṇḍulais tūpasaṃyutam dattvā brahmapadaṃ yāti kalpavratamidaṃ smṛtam

हिन्दी अर्थ

पूर्वदेवाश्च देवाश्च सूदयन्तः परस्परम् सूतजी कहते हैं--ऋषियो ! शंकरजीद्वारा उत्साहित किये जानेपर देवराज इन्द्र, सभी लोकपाल और गणपाल सब ओरसे उन असुरोंका वध करनेके लिये चले और आकाशकी ओर उछल पड़े। आकाशमें पहुँचकर वे

English

Sudharman 82. Brihadiu SArvabhauma 88. Jayadratha

अध्याय 101

श्लोक 51

मासोपवासी यो दद्याद् धेनुं विप्राय शोभनाम् स वैष्णवं पदं यति भीमव्रतमिदं स्मृतम्

māsopavāsī yo dadyād dhenuṃ viprāya śobhanām sa vaiṣṇavaṃ padaṃ yati bhīmavratamidaṃ smṛtam

हिन्दी अर्थ

पंखधारी पर्वतकी तरह शोभा पाने लगे। तत्पश्चात् वे शङ्क और डंकेके निर्घोषके साथ-साथ ढोलों और नगाड़ोंको पीटते हुए त्रिपुरका विनाश करनेके लिये उसी प्रकार आगे बढ़े, जैसे व्याधियाँ शरीरको नष्ट कर देती हैं। इतनेमें त्रिपुरवासी दानवोंने देवगणोंको आगे बढ़ते हुए देख लिया। फिर तो वे महाबली असुर 'शंकर (यहाँ भी) आ गये'-एऐसा कहकर प्रलयकालीन सागरोंकी तरह परम क्षुब्ध हो उठे। तब भयंकर रूपधारी दानव बजाते हुए बारंबार उच्च स्वरसे गर्जना करने लगे। तत्पश्चात् पुनः पराक्रम प्रकट करनेवाले वे दानव और देव परस्पर क्रुद्ध होकर एक-दूसरेपर प्रहार करने लगे। दोनों सेनाओंमें समानरूपसे सिंहनाद हो रहे थे। उनके शरीर कट-कटकर

English

<MahApaara- 84. Asvajit.

अध्याय 101

श्लोक 52

दद्याद् विंशत्पलादूर्ध्वं महीं कृत्वा तु काञ्चनीम् दिनं पयोव्रतस्तिष्ठेद् रुद्रलोके महीयते धराव्रतमिदं प्रोक्तं सप्तकल्पशतानुगम्

dadyād viṃśatpalādūrdhvaṃ mahīṃ kṛtvā tu kāñcanīm dinaṃ payovratastiṣṭhed rudraloke mahīyate dharāvratamidaṃ proktaṃ saptakalpaśatānugam

हिन्दी अर्थ

गिर रहे थे। फिर तो प्रहार करनेवालोंकी गर्जनाके साथ- रहा था, मानो अनेकों सूर्य गिर रहे हैं, अग्नियाँ प्रज्वलित हो उठी हैं, विषधर सर्प फुफकार मार रहे हैं, पक्षी

English

vanadana See page LX Rukmaratha

अध्याय 101

श्लोक 53

माघे मासे ऽथवा चैत्रे गुडधेनुप्रदो भवेत् गुडव्रतस्तृतीयायां गौरीलोके महीयते महाव्रतमिदं नाम परमानन्दकारकम्

māghe māse 'thavā caitre guḍadhenuprado bhavet guḍavratastṛtīyāyāṃ gaurīloke mahīyate mahāvratamidaṃ nāma paramānandakārakam

हिन्दी अर्थ

गिरीन्द्रा इव कम्पन्तो गर्जन्त इव तोयदाः॥ ८ आकाशमें चक्कर काट रहे हैं, पर्वत काँप रहे हैं, बादल गरज रहे हैं, सिंह जमुहाई ले रहे हैं, भयानक झंझावात चल प्रवृद्धोर्मितरङ्गौघाः क्षुभ्यन्त इव सागराः॥ ९ रहा है और उछलती हुई लहरोंके समूहसे सागर क्षुब्ध हो

English

SupAraava

अध्याय 101

श्लोक 54

पक्षोपवासी यो दद्याद् विप्राय कपिलाद्वयम् ब्रह्मलोकमवाप्नोति देवासुरसुपूजितम् कल्पान्ते राजराजः स्यात् प्रभाव्रतमिदं स्मृतम्

pakṣopavāsī yo dadyād viprāya kapilādvayam brahmalokamavāpnoti devāsurasupūjitam kalpānte rājarājaḥ syāt prabhāvratamidaṃ smṛtam

हिन्दी अर्थ

कार्मुकाणां विकृष्टानां बभूदुर्दारुणा रवाः। कालानुगानां मेघानां यथा वियति वायुना खड्रापवर्जिताः केचित् केचिच्छिन्ना परश्वधैः । केचिन्मुद्गरचूर्णाश्च केचिद् बाहुभिराहताः

English

fiamaatimat UgrAyttdha (KArti)

अध्याय 101

श्लोक 55

वत्सरं त्वेकभक्ताशी सभक्ष्यजलकुम्भदः शिवलोके वसेत्कल्पं प्राप्तिव्रतमिदं स्मृतम्

vatsaraṃ tvekabhaktāśī sabhakṣyajalakumbhadaḥ śivaloke vasetkalpaṃ prāptivratamidaṃ smṛtam

हिन्दी अर्थ

पट्टिशैः सूदिताः केचित् केचिच्छूलविदारिताः। तेन शब्देन मकरा नक्रास्तिमितिमिङ्गिलाः। मत्ता लोहितगन्धेन क्षोभयन्तो महार्णवम् जग्रसुस्तिमयो हैत्यान् द्रावयन्तो जलेचरान्

English

Nripanjaya

अध्याय 101

श्लोक 56

नक्ताशी चाष्टमीषु स्याद् वत्सरान्ते च धेनुदः पौरंदरं पुरं याति सुगतिव्रतमुच्यते

naktāśī cāṣṭamīṣu syād vatsarānte ca dhenudaḥ pauraṃdaraṃ puraṃ yāti sugativratamucyate

हिन्दी अर्थ

यथा भ्रमन्ति प्रमथाः सहैत्या- उठा है। इस प्रकार महान् शूरवीर प्रमथ और महाबली दानव उसी प्रकार डटकर युद्ध कर रहे थे, जैसे महान् पर्वतोंसे टकरानेपर भी वज्र अटल रहता है

English

Viratha. Kuril, the founder of Eurukfetra

अध्याय 101

श्लोक 57

विप्रायेन्धनदो यस्तु वर्षादिचतुरस्त्वृतून् घृतधेनुप्रदो ऽन्ते च स परं ब्रह्म गच्छति वैश्वानरव्रतं नाम सर्वपापविनाशनम्

viprāyendhanado yastu varṣādicaturastvṛtūn ghṛtadhenuprado 'nte ca sa paraṃ brahma gacchati vaiśvānaravrataṃ nāma sarvapāpavināśanam

हिन्दी अर्थ

जैसे आकाशमें वायुद्वारा प्रेरित किये जानेपर प्रलयकालीन मेघोंकी गर्जना होती है, उसी तरह खाचे जाते हुए धनुषोंके भीषण शब्द हो रहे थे। युद्धभूमिमें दोनों ओरके वीर परस्पर “मत डरो, कहाँ भागकर जाओगे, अब तो तुम मरे ही हो, शीघ्र प्रहार करो, मैं यहाँ खड़ा हूँ, आओ और अपना पुरुषार्थ दिखाओ, पकड़ लो, काट डालो, विदीर्ण कर दो, खा लो, मार शान्त होकर यमलोकके पथिक बन जाते थे। उनमेंसे कुछ वीर तलवारसे काट डाले गये थे, कुछ फरसोंसे छिन्न-भिन्न कर दिये गये थे, कुछ मुद्गरोंकी मारसे चूर्ण-सरीखे हो गये थे, कुछ हाथके चपेटोंसे घायल कर

English

(1) (2) (3)

अध्याय 101

श्लोक 58

एकादश्यां च नक्ताशी यश्चक्रं विनिवेदयेत् समान्ते वैष्णवं हैमं स विष्णोः पदमाप्नुयात् एतत् कृष्णव्रतं नाम कल्पान्ते राज्यभाग्भवेत्

ekādaśyāṃ ca naktāśī yaścakraṃ vinivedayet samānte vaiṣṇavaṃ haimaṃ sa viṣṇoḥ padamāpnuyāt etat kṛṣṇavrataṃ nāma kalpānte rājyabhāgbhavet

हिन्दी अर्थ

दिये गये, कुछ पट्टिशों (पटों)-के प्रहारसे मार डाले गये और कुछ शूलोंसे विदीर्ण कर दिये गये। सरपतके फूलकी-सी कान्तिवाले दानव वनसहित पर्वतोंकी तरह भयंकर नाक और तिमिंगिलोंसे भरे हुए समुद्रके जलमें गिर रहे थे। दानवोंके कवच आदिसे भलीभाँति बँधे हुए प्राणरहित शरीरोंके समुद्रमें गिरनेसे सजल जलधरकी गर्जनाके समान शब्द हो रहा था। उस शब्दसे तथा दानवोंके रुधिरकी गन्धसे मतवाले हुए मगर, नाक,

English

t Sadhauvan 81. Jahuu rarikait 82# Suhd'tra

अध्याय 101

श्लोक 59

पायसाशी समान्ते तु दद्याद्विप्राय गोयुगम् लक्ष्मीलोकमवाप्नोति ह्य् एतद् देवीव्रतं स्मृतम्

pāyasāśī samānte tu dadyādviprāya goyugam lakṣmīlokamavāpnoti hy etad devīvrataṃ smṛtam

हिन्दी अर्थ

तिमि और तिमिंगिल आदि जन्तु महासागरको क्षुब्ध कर रहे थे। वे भयंकर आकारवाले जलजन्तु परस्पर झगड़ते हुए दानवोंका रुधिर पान कर चक्कर काट रहे थे। यूथ- के-यूथ मगरमच्छ अन्य जल-जन्तुओंको खदेड़कर रथ, आयुध, अश्व, वस्त्र और आभूषणोंसहित हैत्योंको निगल जाते थे। जिस प्रकार आकाशमें दानवों और प्रमथोंका युद्ध चल रहा था, उसी तरह समुद्रमें जल-जन्तु (शवोंको खानेके लिये) परस्पर लड़ रहे थे उस समय जैसे आकाशमें प्रमथगण हैत्योंके साथ युद्ध करते हुए चक्कर काट रहे थे, वैसे ही जलमें मगरमच्छ नाकोंके साथ झगड़ते हुए घूम रहे थे। जैसे देवता और दानव परस्पर एक-दूसरेके शरीरको काट रहे थे, वैसे

English

Chyavana

अध्याय 101

श्लोक 60

सप्तम्यां नक्तभुग्दद्यात् समान्ते गां पयस्विनीम् सूर्यलोकमवाप्नोति भानुव्रतमिदं स्मृतम्

saptamyāṃ naktabhugdadyāt samānte gāṃ payasvinīm sūryalokamavāpnoti bhānuvratamidaṃ smṛtam

हिन्दी अर्थ

तथैव क्रन्दन्ति विभिन्नदेहाः॥ २१ ही मगरमच्छ और नाक भी एक-दूसरेके शरीरको यमश्च वित्ताधिपतिश्च देवो

English

Krimi (Rfiti from Uiksa) Vasa (Chaidyoparichara - Girika.

अध्याय 101

श्लोक 61

चतुर्थ्यां नक्तभुग्दद्याद् अब्दान्ते हेमवारणम् व्रतं वैनायकं नाम शिवलोकफलप्रदम्

caturthyāṃ naktabhugdadyād abdānte hemavāraṇam vrataṃ vaināyakaṃ nāma śivalokaphalapradam

हिन्दी अर्थ

देवारिणस्तस्य पुरस्य द्वारं ताभ्यां तु तत्पश्चिमतो निरुद्धम् स भास्वता देवरथेन देवः। तुङ्गानि वेश्मानि सगोपुराणि

English

r ' '■ c '"1 V T'

अध्याय 101

श्लोक 62

महाफलानि यस्त्यक्त्वा चतुर्मासं द्विजातये हैमानि कार्त्तिके दद्याद् गोयुगेन समन्वितम् एतत् फलव्रतं नाम विष्णुलोकफलप्रदम्

mahāphalāni yastyaktvā caturmāsaṃ dvijātaye haimāni kārttike dadyād goyugena samanvitam etat phalavrataṃ nāma viṣṇulokaphalapradam

हिन्दी अर्थ

सशैलमालासमवेदिकानि । कालाम्बुदाभाः प्रमथा विनेदुः

English

(l) (2) (3) (4) (5) MahAracha Pratyasravas Kusa UarivAliaua Yajn or

अध्याय 101

श्लोक 63

यश्चोपवासी सप्तम्यां समान्ते हैमपङ्कजम् गाश्च वै शक्तितो दद्याद् धेमान्नघटसंयुताः एतत् सौरव्रतं नाम सूर्यलोकफलप्रदम्

yaścopavāsī saptamyāṃ samānte haimapaṅkajam gāśca vai śaktito dadyād dhemānnaghaṭasaṃyutāḥ etat sauravrataṃ nāma sūryalokaphalapradam

हिन्दी अर्थ

साशोकखण्डानि सकोकिलानि। गृहाणि है नाथ पितः सुतेति भ्रातेति कान्तेति प्रियेति चापि। विदीर्ण कर चीत्कार कर रहे थे। देवताओं, असुरो, नाकों और तिमिंगिलोंके घावों और मुखोंसे बहते हुए रुधिरसे समुद्रके उस प्रदेशका जल मुहूर्तमात्रके लिये रक्तयुक्त हो गया और वहाँ बाढ़ आ गयी। उस त्रिपुरका

English

Brihadratha (founder of Magadha line)

अध्याय 101

श्लोक 64

द्वादश द्वादशीर्यस्तु समाप्योपोषणेन च गोवस्त्रकाञ्चनैर्विप्रान् पूजयेच्छक्तितो नरः परमं पदं प्राप्नोति विष्णुव्रतमिदं स्मृतम्

dvādaśa dvādaśīryastu samāpyopoṣaṇena ca govastrakāñcanairviprān pūjayecchaktito naraḥ paramaṃ padaṃ prāpnoti viṣṇuvratamidaṃ smṛtam

हिन्दी अर्थ

पूर्वद्वार अत्यन्त विशाल और काले मेघ तथा पर्वतके समान कान्तिमान् था। महान् बलशाली इन्द्र देवताओंकी विशाल सेनाके साथ उस द्वारको अवरुद्ध कर खड़े थे। उसी प्रकार उदयकालीन सूर्य और सुवर्णके तुल्य रंगवाले शंकरजीके आत्मज स्कन्द त्रिपुरके उत्तरद्वारपर ऐसे चढ़े हुए थे मानो बढ़े हुए सूर्य अस्ताचलके

English

# EuAAgra, (The line of Jabnu.)

अध्याय 101

श्लोक 65

कार्त्तिक्यां च वृषोत्सर्गं कृत्वा नक्तं समाचरेत् शैवं पदमवाप्नोति वार्षव्रतमिदं स्मृतम्

kārttikyāṃ ca vṛṣotsargaṃ kṛtvā naktaṃ samācaret śaivaṃ padamavāpnoti vārṣavratamidaṃ smṛtam

हिन्दी अर्थ

रेष्ठ अस्त्र पाशको धारण किये हुए कुबेर-ये दोनों हुए थे। दस हजार सूर्योकी-सी आभावाले दक्षके शत्रु त्रिनेत्रधारी भगवान् रुद्रदेव उस उद्दीप्त देवरथपर आरूढ़ होकर शत्रु-नगरके दक्षिणद्वारको रोककर स्थित थे। उस त्रिपुरके फाटकोंसहित स्वर्णनिर्मित ऊँचे-ऊँचे महलोंको, जो कैलास और चन्द्रमाके सदृश चमक रहे थे, प्रसन्न मुखवाले प्रमथोंने उसी प्रकार अवरुद्ध कर रखा था, जैसे उपलोंकी वर्षा करनेवाले मेघ ज्योतिर्गणोंको घेर लेते हैं। काले मेघकी-सी कान्तिवाले प्रमथगण दानवोंके

English

Suratba,

अध्याय 101

श्लोक 66

कृच्छ्रान्ते गोप्रदः कुर्याद् भोजनं शक्तितः पदम् विप्राणां शांकरं याति प्राजापत्यमिदं व्रतम्

kṛcchrānte gopradaḥ kuryād bhojanaṃ śaktitaḥ padam viprāṇāṃ śāṃkaraṃ yāti prājāpatyamidaṃ vratam

हिन्दी अर्थ

पर्वतमालाके सदृश ऊँची-ऊँची वेदिकाओंसे युक्त गृहोंको, वनोंसे युक्त थे और जिनमें कोयलें कूक रही थीं, उखाड़-उखाड़कर लगातार समुद्रमें फेंक रहे थे और उच्च स्वरसे गर्जना कर रहे थे। गृहोंको उखाड्ते समय उनमें रहनेवाली रित्रियाँ-'हे नाथ! हा पिता!

English

Viduratha. SArvabhauma,

अध्याय 101

श्लोक 67

चतुर्दश्यां तु नक्ताशी समान्ते गोधनप्रदः शैवं पदमवाप्नोति त्रैयम्बकमिदं व्रतम्

caturdaśyāṃ tu naktāśī samānte godhanapradaḥ śaivaṃ padamavāpnoti traiyambakamidaṃ vratam

हिन्दी अर्थ

अरे पुत्र! हाय भाई! हाय कान्त! है प्रियतम !' आदि स्त्वनार्यशब्दान् विविधान् प्रचक्रुः ॥ २९ अनेक प्रकारके अनार्योचित शब्द बोल रही थीं। गणेश्वराः कोपवृताः प्रतीयुः

English

JatyatsAna.

अध्याय 101

श्लोक 68

सप्तरात्रोषितो दद्याद् घृतकुम्भं द्विजातये घृतव्रतमिदं प्राहुर् ब्रह्मलोकफलप्रदम्

saptarātroṣito dadyād ghṛtakumbhaṃ dvijātaye ghṛtavratamidaṃ prāhur brahmalokaphalapradam

हिन्दी अर्थ

युगान्तकालेष्विव सागराणाम् कोपोपरक्ता बहुधा नदन्तः।

English

TABLE No. TI. (passed over).

अध्याय 101

श्लोक 69

आकाशशायी वर्षासु धेनुमन्ते पयस्विनीम् शक्रलोके वसेन्नित्यम् इन्द्रव्रतमिदं स्मृतम्

ākāśaśāyī varṣāsu dhenumante payasvinīm śakraloke vasennityam indravratamidaṃ smṛtam

हिन्दी अर्थ

मार्गाः पुरे लोहितकर्दमाक्ताः स्वर्णेष्टरकास्फाटिकभिन्नचित्राः । छिन्नोत्तमाङ्गाङ्गिकराः करालाः कोपावृताक्षः स तु तारकाख्यः

English

42. 48. 44.

अध्याय 101

श्लोक 70

अनग्निपक्कम् अश्नाति तृतीयायां तु यो नरः गां दत्त्वा शिवमभ्येति पुनरावृत्तिदुर्लभम् इह चानन्दकृत्पुंसां श्रेयोव्रतमिदं स्मृतम्

anagnipakkam aśnāti tṛtīyāyāṃ tu yo naraḥ gāṃ dattvā śivamabhyeti punarāvṛttidurlabham iha cānandakṛtpuṃsāṃ śreyovratamidaṃ smṛtam

हिन्दी अर्थ

स तत्र प्राकारगतांश्च भूतान्- चासेन्द्रियगर्वदृसः पुराद् विनिष्क्रम्य ररास घोरम्

English

Rnchira. Tvaritaya.

अध्याय 101

श्लोक 71

हैमं पलद्वयादूर्ध्वं रथमश्वयुगान्वितम् ददत्कृतोपवासः स्याद् दिवि कल्पशतं वसेत् कल्पान्ते राजराजः स्याद् अश्वव्रतमिदं स्मृतम्

haimaṃ paladvayādūrdhvaṃ rathamaśvayugānvitam dadatkṛtopavāsaḥ syād divi kalpaśataṃ vaset kalpānte rājarājaḥ syād aśvavratamidaṃ smṛtam

हिन्दी अर्थ

स हैत्योत्तमपर्वताभो सुधन्वा गिरिशश्च देव- तारकाख्याभिगतागताजौ क्षोभं यथा वायुवशात् समुद्रा:

English

Akrddhana.

अध्याय 101

श्लोक 72

तद्वद्धेमरथं दद्यात् करिभ्यां संयुतं नरः सत्यलोके वसेत्कल्पं सहस्रमथ भूपतिः भवेदुपोषितो भूत्वा करिव्रतमिदं स्मृतम्

tadvaddhemarathaṃ dadyāt karibhyāṃ saṃyutaṃ naraḥ satyaloke vasetkalpaṃ sahasramatha bhūpatiḥ bhavedupoṣito bhūtvā karivratamidaṃ smṛtam

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार जब उस पुरमें स्त्री, पुत्र तथा प्राणका विनाश करनेवाला अत्यन्त भीषण युद्ध होने लगा, तब सागरतुल्य वेगशाली महान् असुर और गणेश्वर क्रोधसे भर गये। (एक प्रकारका शस्त्र) आदिके प्रहारसे शरीर और गृहको विनष्ट करनेवाला अत्यन्त घोर युद्ध आरम्भ हो गया; क्योंकि दोनों सेनाओंमें सुदृढ़ वैर बँधा हुआ था। परस्पर एक-दूसरेको लक्ष्य करके मर्दन, आक्रमण और प्रहार

English

DevatithK Bhimasena (fihimatejas). Diiipa.

अध्याय 101

श्लोक 73

उपवासं परित्यज्य समान्ते गोप्रदो भवेत् यक्षाधिपत्यमाप्नोति सुखव्रतमिदं स्मृतम्

upavāsaṃ parityajya samānte goprado bhavet yakṣādhipatyamāpnoti sukhavratamidaṃ smṛtam

हिन्दी अर्थ

करनेवाले देवताओं और दानवोंका प्रलयकालमें सागरोंकी गर्जनाकी भाँति भीषण शब्द होने लगा उस समय वे गणेश्वर और असुरश्रेष्ठ घावोंसे निरन्तर रक्तकी धारा बहाते हुए, बारंबार गरजते हुए और भयंकर शब्द बोलते हुए युद्ध कर रहे थे। उस पुरमें स्वर्ण और स्फटिक मणिकी ईटोंसे बने हुए जो चित्र-विचित्र मार्ग थे, वे दो ही घड़ीमें रुधिरयुक्त कोचड़से भर दिये गये। जो सुखपूर्वक चलनेयोग्य- थे, वे कटे हुए मस्तकों, पादों और पैरोंसे व्याप्त हो जानेके कारण दुर्गम हो गये। तब तारकासुर क्रोधसे आंखें

English

Pratfpa,

अध्याय 101

श्लोक 74

निशि कृत्वा जले वासं प्रभाते गोप्रदो भवेत् वारुणं लोकमाप्नोति वरुणव्रतमुच्यते

niśi kṛtvā jale vāsaṃ prabhāte goprado bhavet vāruṇaṃ lokamāpnoti varuṇavratamucyate

हिन्दी अर्थ

तरेरता हुआ वृक्ष और पर्वत हाथमें लेकर युद्धस्थलमें आ पहुँचा। वह उस समय अद्भुत पराक्रमी शंकरद्वारा अवरुद्ध किये गये दक्षिणद्वारकी रक्षा करना चाहता था। महान् पराक्रमी एवं अद्भुत सत्त्वशाली तारकासुर अपनी इन्द्रियोंके गर्वसे उन्मत्त होकर परकोटोंपर चढ़े हुए भूतगणोंको काटकर वहाँ विचरण करने लगा। पुनः नगरसे बाहर निकलकर उसने घोर गर्जना की। पर्वतकी- सी आभावाला हैत्येन्द्र तारक मतवाले हाथीकी तरह

English

(i) (3) filntana. Blhlika.

अध्याय 101

श्लोक 75

चान्द्रायणं च यः कुर्याद् धैमं चन्द्रं निवेदयेत् चन्द्रव्रतमिदं प्रोक्तं चन्द्रलोकफलप्रदम्

cāndrāyaṇaṃ ca yaḥ kuryād dhaimaṃ candraṃ nivedayet candravratamidaṃ proktaṃ candralokaphalapradam

हिन्दी अर्थ

शीघ्र ही शंकरजीके रथको पकड़ लेना चाहता था, परंतु प्रमथोंद्वारा इस प्रकार रोक दिया गया, जैसे बढ़ते हुए समुद्रको उसका तट रोक देता है। उस समय शेषनाग, ब्रह्मा तथा सुन्दर धनुष धारण करनेवाले और पर्वतपर शयन करनेवाले त्रिनेत्रधारी भगवान् शंकर युद्धस्थलमें तारकासुरके आ जानेसे उसी प्रकार क्षुब्ध हो गये, जैसे वायुके वेगसे सागर उद्वेलित हो उठते हैं। यह एक शस्त्र है। इसका वर्णन महाभारत १। ६९। २३ में है।

English

(married)

अध्याय 101

श्लोक 76

ज्येष्ठे पञ्चतपाः सायं हेमधेनुप्रदो दिवम् यात्यष्टमीचतुर्दश्यो रुद्रव्रतमिदं स्मृतम्

jyeṣṭhe pañcatapāḥ sāyaṃ hemadhenuprado divam yātyaṣṭamīcaturdaśyo rudravratamidaṃ smṛtam

हिन्दी अर्थ

कूजन्निनादांश्च करोति घोरान् तारकाख्यस्तु भीमाक्षो रौद्ररक्तान्तरेक्षणीः। रुद्रान्तिके सुसंरुद्धो नन्दिना कुलनन्दिना

English

(a) Jllinavi. (b) KlH, d. of Dlsa. Dovavrata (Bhisma) 46. Vichitravirya.

अध्याय 101

श्लोक 77

सकृद्वितानकं कुर्यात् तृतीयायां शिवालये समान्ते धेनुदो याति भवानीव्रतमुच्यते

sakṛdvitānakaṃ kuryāt tṛtīyāyāṃ śivālaye samānte dhenudo yāti bhavānīvratamucyate

हिन्दी अर्थ

दुद्राव खड्गं निष्कृष्य तारकाख्यो गणेश्वरम् यज्ञोपवीतमार्गेण चिच्छेद च ननाद च। गणेश्वरैः कृतस्तत्र तारकाख्ये निषूदिते

English

l)hritarA§(ra 47. Konti Panda. sMldri. Vidura

अध्याय 101

श्लोक 78

माघे निश्यार्द्रवासाः स्यात् सप्तम्यां गोप्रदो भवेत् दिवि कल्पमुषित्वेह राजा स्यात्पवनं व्रतम्

māghe niśyārdravāsāḥ syāt saptamyāṃ goprado bhavet divi kalpamuṣitveha rājā syātpavanaṃ vratam

हिन्दी अर्थ

स्तव यशसो निधिधीरः तारकाख्यः। युदध्वा यस्तपति हि तारको गणेन्द्रै:

English

GAndhftri 1 * I I I! I f

अध्याय 101

श्लोक 79

त्रिरात्रोपोषितो दद्यात् फाल्गुन्यां भवनं शुभम् आदित्यलोकमाप्नोति धामव्रतमिदं स्मृतम्

trirātropoṣito dadyāt phālgunyāṃ bhavanaṃ śubham ādityalokamāpnoti dhāmavratamidaṃ smṛtam

हिन्दी अर्थ

आकाशस्थित रथपर बैठे हुए बलसम्पन्न शेषनाग, शंकर और ब्रह्माने विशेष क्षुब्ध होकर पृथक्-पृथक् तारकासुरके शरीरकी संधियोंको बींध दिया और वे घोर गर्जना करने लगे। उस समय हाथमें धनुष-बाण लिये हुए भगवान् शंकर अपना एक पैर ऋगवेदरूप घोड़ेकी तथा दूसरा पैर नन्दीश्वरकी पीठपर रखकर त्रिपुरोंके परस्पर सम्मिलनकी प्रतीक्षा करते हुए खड़े हो गये। उस समय शंकरजीके पैर रखनेसे उन त्रिशूलधारीके भारसे पीड़ित हुए अश्वके स्तन और वृषभके दाँत टूटकर गिर पड़े। तभीसे घोड़ोंके स्तन और गो-वंशके (ऊपरी जबड़ेके) दाँत गुप्त हो गये। इसी कारण वे दिखायी नहीं पड़ते। उसी समय जिसके नेत्रोंके अन्तर्भाग भयंकर और लाल थे,

English

DurytV 99 brothers. i 48. Nakala. Sahadeva

अध्याय 101

श्लोक 80

त्रिसंध्यं पूज्य दाम्पत्यम् उपवासी विभूषणैः अन्नं गाश्च समाप्नोति मोक्षमिन्द्रव्रतादिह

trisaṃdhyaṃ pūjya dāmpatyam upavāsī vibhūṣaṇaiḥ annaṃ gāśca samāpnoti mokṣamindravratādiha

हिन्दी अर्थ

उस भीषण नेत्रोंवाले तारकासुरको भगवान् रुद्रके निकट आते देखकर कुलको आनन्दित करनेवाले नन्दीने रोक दिया तथा उन्होंने अपने तीखे कुठारसे उस दानवेश्वरके शरीरको इस प्रकार छील डाला, जैसे गन्धकी इच्छावाला (अथवा इत्र बनानेवाला) बढ़ई चन्दन-वृक्षको छाँर देता है। कुठारके आघातसे आहत हुए शूरवीर तारकासुरने पर्वतीय सिंहको तरह क्रुद्ध होकर म्यानसे तलवार खींचकर गणेश्वर नन्दीपर आक्रमण किया। तब नन्दीश्वरने

English

dhana. | Yadhisthira 48. Bhima Ariona

अध्याय 101

श्लोक 81

दत्त्वा सितद्वितीयायाम् इन्दोर्लवणभाजनम् समान्ते गोप्रदो याति विप्राय शिवमन्दिरम् कल्पान्ते राजराजः स्यात् सोमव्रतमिदं स्मृतम्

dattvā sitadvitīyāyām indorlavaṇabhājanam samānte goprado yāti viprāya śivamandiram kalpānte rājarājaḥ syāt somavratamidaṃ smṛtam

हिन्दी अर्थ

यज्ञोपवीत-मार्गसे (अर्थात् जनेऊ पहननेकी जगह--बाएँ कंधेसे लेकर दाहिने कटितटतक) तिरछे रूपमें तारकासुरके शरीरको विदीर्ण कर दिया और भयंकर गर्जना की। फिर तो वहाँ तारकासुरके मारे जानेपर गणेश्वरोके भयंकर सिंहनाद गूँज उठे और उनके शङ्खोंके भीषण शब्द होने लगे तब प्रमथगणोंके सिंहनाद और उनके बाजोंके भीषण शब्दको सुनकर बगलमें ही स्थित मयदानवने महान् बलशाली विद्युन्मालीसे पूछा--'विद्युन्मालिन् ! बताओ तो सही, अनेकों मुखोंवाले प्रमथगणोंका सागरकी गर्जनाके

English

sDraapadi. =Draapad).

अध्याय 101

श्लोक 82

प्रतिपद्येकभक्ताशी समान्ते कपिलाप्रदः वैश्वानरपदं याति शिवव्रतमिदं स्मृतम्

pratipadyekabhaktāśī samānte kapilāpradaḥ vaiśvānarapadaṃ yāti śivavratamidaṃ smṛtam

हिन्दी अर्थ

समान यह भयंकर सिंहनाद क्यों सुनायी पड़ रहा है? ये गणेश्वर क्यों गजराज-से गरजते हुए इतने उत्साहसे युद्ध कर रहे हैं ?' इस प्रकार मयके वचनरूपी अङ्कुशसे पीड़ित हुआ किरणमाली सूर्यकी तरह तेजस्वी शत्रुदमन विद्युन्माली, जो तुरंत ही देवताओंके युद्धके मुहानेसे लौटकर आया था, अत्यन्त दु:खके साथ मयसे इस प्रकार बोला--' धैर्यशाली राजन्! जो यम, वरुण, महेन्द्र और रुद्रके समान पराक्रमी, आपकी कीर्तिका निधिस्वरूप,

English

Yudhifthira. Bimasena. "*

अध्याय 101

श्लोक 83

दशम्याम् एकभक्ताशी समान्ते दशधेनुदः दिशश्च काञ्चनैर्दद्याद् ब्रह्माण्डाधिपतिर्भवेत् एतद् विश्वव्रतं नाम महापातकनाशनम्

daśamyām ekabhaktāśī samānte daśadhenudaḥ diśaśca kāñcanairdadyād brahmāṇḍādhipatirbhavet etad viśvavrataṃ nāma mahāpātakanāśanam

हिन्दी अर्थ

समस्त युद्धोंके मुहानेपर पर्वतराजकी भाँति डरा रहनेवाला मृदितमुपनिशम्य तारकाख्यं विद्युन्मालिन्न नः कालः साधितुं ह्यवहेलया। करोमि विक्रमेणैतत् पुरं व्यसनवर्जितम्

English

Ut wife 2fid tet/e

अध्याय 101

श्लोक 84

यः पठेच्छृणुयाद्वापि व्रतषष्टिम् अनुत्तमाम् मन्वन्तरशतं सो ऽपि गन्धर्वाधिपतिर्भवेत्

yaḥ paṭhecchṛṇuyādvāpi vrataṣaṣṭim anuttamām manvantaraśataṃ so 'pi gandharvādhipatirbhavet

हिन्दी अर्थ

सकरतलपुटै श्र सिहनाहै- भवमभिपूज्य तदा सुरावतस्थुः और युद्धभूमिमें शत्रुओंके लिये संतापदायक था, वह

English

Drau|>adi. No name. Prativindhya. Yandhoya.

अध्याय 101

श्लोक 85

षष्टिव्रतं नारद पुण्यमेतत् तवोदितं विश्वजनीनमन्यत् श्रोतुं तवेच्छा तदुदीरयामि प्रियेषु किं वाकथनीयम् अस्ति

ṣaṣṭivrataṃ nārada puṇyametat tavoditaṃ viśvajanīnamanyat śrotuṃ tavecchā tadudīrayāmi priyeṣu kiṃ vākathanīyam asti

हिन्दी अर्थ

अग्निके समान भयंकर विशाल नेत्रोंवाले तारकको मारा गया सुनकर हर्षके कारण सभी प्रमथोंके शरीर पुलकित और नेत्र उत्फुल्ल हो गये हैं और वे बादलोंकी तरह गर्जना कर रहे हैं।' अपने मित्र विद्युन्मालीके इस तत्त्वपूर्ण वचनको सुनकर कञ्जलगिरिके सदृश शरीरवाला स्वर्णमालाधारी मय रणके मुहानेपर विद्युन्मालीसे इस प्रकार बोला--'विद्युन्मालिन्! अब हमलोगोंके लिये अवहेलना (प्रमाद) -पूर्वक समय बिताना ठीक नहीं है। मैं अपने पराक्रमसे पुनः इस त्रिपुरको आपत्तिरहित

English

Draapadi. 3rd wife. HidimbA.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_matsyapurANa1-176.txt · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।