Matsya Purana
102
अध्याय 102 / 176

Adhyaya 102

31 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ31 श्लोक

अध्याय 102

श्लोक 1

मत्स्य-पुराण १०२ नैर्मल्यं भावशुद्धिश्च विना स्नानं न विद्यते तस्मान्मनोविशुद्ध्यर्थं स्नानमादौ विधीयते

matsya-purāṇa 102 nairmalyaṃ bhāvaśuddhiśca vinā snānaṃ na vidyate tasmānmanoviśuddhyarthaṃ snānamādau vidhīyate

हिन्दी अर्थ

दोनोंने क्रुद्ध होकर महासुरोंकी विशाल सेनाके साथ गणेश्वरोंको मारना आरम्भ किया। उस समय त्रिपुरमें विद्युन्माली और मय जिस-जिस मार्गसे निकलते थे, वे मार्ग प्रमथोंके घायल होकर भाग जानेसे शून्य हो जाते थे। तब यम और वरुणके मृदङ्गघोष और ढोल, नगारे एवं धनुषकी प्रत्यञ्चाके निनादके साथ-साथ ताली बजाते और सिंहनाद करते हुए सभी देवगण शङ्करजीकी पूजा करके उन्हें घेरकर खड़े हो गये। सूर्यके समान तेजस्वी

English

Srutasena. Sarvaya. Ghatolkacha.

अध्याय 102

श्लोक 2

अनुद्धृतैरुद्धृतैर्वा जलैः स्नानं समाचरेत् तीर्थं च कल्पयेद्विद्वान् मूलमन्त्रेण मन्त्रवित् नमो नारायणायेति मूलमन्त्र उदाहृतः

anuddhṛtairuddhṛtairvā jalaiḥ snānaṃ samācaret tīrthaṃ ca kalpayedvidvān mūlamantreṇa mantravit namo nārāyaṇāyeti mūlamantra udāhṛtaḥ

हिन्दी अर्थ

उन महात्मा देवगणोंद्वारा पूजित होते हुए तथा सत्यपरायण तपस्वियोंद्वारा स्तुति किये जाते हुए भगवान् शङ्कर अस्ताचलके शिखरपर पहुँचे हुए सूर्यकी भाँति सुशोभित र्यथास्त शृङ्गाभिगतो दिवाकरः॥ ५७ हो रहे थे॥ ४७--५७॥ इति श्रीमत्स्ये महापुराणे त्रिपुरदाहे तारकाख्यवधो नामाष्टात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः

English

Sahadeva.

अध्याय 102

श्लोक 3

दर्भपाणिस्तु विधिना आचान्तः प्रयतः शुचिः चतुर्हस्तसमायुक्तं चतुरस्रं समन्ततः प्रकल्प्यावाहयेद् गङ्गाम् एभिर्मन्त्रैर्विचक्षणः

darbhapāṇistu vidhinā ācāntaḥ prayataḥ śuciḥ caturhastasamāyuktaṃ caturasraṃ samantataḥ prakalpyāvāhayed gaṅgām ebhirmantrairvicakṣaṇaḥ

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके त्रिपुरदाहके प्रसङ्गमें तारकासुर-वध नामक एक सौ अड्तीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ दानवराज मयका दानवोंको समझा-बुझाकर त्रिपुरकी रक्षामें नियुक्त करना तथा त्रिपुरकौमुदीका वर्णन

English

viife wife

अध्याय 102

श्लोक 4

विष्णोः पादप्रसूतासि वैष्णवी विष्णुदेवता पाहि नस् त्वेनसस् तस्माद् आजन्ममरणान्तिकात्

viṣṇoḥ pādaprasūtāsi vaiṣṇavī viṣṇudevatā pāhi nas tvenasas tasmād ājanmamaraṇāntikāt

हिन्दी अर्थ

तारकाख्ये हते युद्धे उत्सार्य प्रमथान् मयः। उवाच दानवान् भूयो भूयः स तु भयावृतान् यत् कर्तव्यं मया चैव युष्माभिश्च महाबलैः पुष्यं समेष्यते काले चन्द्रश्चन्द्रनिभाननाः। यहैकं त्रिपुरं सर्व॑ क्षणमेकं भविष्यति

English

nraujiadi. SnbhadrA.

अध्याय 102

श्लोक 5

तिस्रः कोट्यो ऽर्धकोटी च तीर्थानां वायुरब्रवीत् दिवि भुव्यन्तरिक्षे च तानि ते सन्ति जाह्नवि

tisraḥ koṭyo 'rdhakoṭī ca tīrthānāṃ vāyurabravīt divi bhuvyantarikṣe ca tāni te santi jāhnavi

हिन्दी अर्थ

कुरुध्वं निर्भयाः काले पिशुनाशंसितेन च। स कालः पुष्ययोगस्य पुरस्य च मया कृतः काले तस्मिन् पुरे यस्तु सम्भावयति संहतिम्। स एनं कारयेच्चूर्ण बलिनैकेषुणा सुरः

English

'ratakfrti. 40. Abhi- manyu (=UtharA).

अध्याय 102

श्लोक 6

नन्दिनीत्येव ते नाम देवेषु नलिनीति च दक्षा पृथ्वी च विहगा विश्वकायामृता शिवा

nandinītyeva te nāma deveṣu nalinīti ca dakṣā pṛthvī ca vihagā viśvakāyāmṛtā śivā

हिन्दी अर्थ

तथा कुर्मो यथा रुद्रो न मोक्ष्यति पुरे शरम् वयं न धर्म हास्यामो यस्मिन् योक्ष्यति नो भवान्। अहैवतमहैत्यं वा लोकं द्रक्ष्यन्ति मानवाः सूतजी कहते हैं-ऋषियो ! इस प्रकार युद्धभूमिमें तारकासुरके मारे जानेपर दानवराज मय प्रमथोंको खदेड़कर भयभीत हुए दानवोंको सब तरहसे सान्त्वना देते हुए बोला--' अरे असुरेन्द्रो! इस समय तुम सभी महाबली

English

PaplLslt.

अध्याय 102

श्लोक 7

विद्याधरी सुप्रशान्ता तथा विश्वप्रसादिनी क्षेमा च जाह्नवी चैव शान्ता शान्तिप्रदायिनी

vidyādharī supraśāntā tathā viśvaprasādinī kṣemā ca jāhnavī caiva śāntā śāntipradāyinī

हिन्दी अर्थ

दानवोंका जो कर्तव्य है, उसे मैं बतला रहा हुँ, सब लोग ध्यान देकर सुनो। चन्द्रवदन दानवो! जिस समय चन्द्रमा पुष्य नक्षत्रसे समन्वित होंगे, उस समय एक क्षणके लिये तीनों पुर एकमें मिल जायेगे । यह चन्द्रमाका पुष्य नक्षत्रसे सम्बन्ध होनेपर त्रिपुरके सम्मिलित होनेका काल मैंने ही निर्धारित कर रखा है, अतः उस समय तुमलोग निर्भय होकर नारदजीद्वारा बतलाये गये उपायोंका प्रयोग करो; क्योंकि उस समय जो कोई देवता त्रिपुरोंके

English

„ 1 - 1 Draapadi. 2nd wife,

अध्याय 102

श्लोक 8

एतानि पुण्यनामानि स्नानकाले प्रकीर्तयेत् भवेत्संनिहिता तत्र गङ्गा त्रिपथगामिनी

etāni puṇyanāmāni snānakāle prakīrtayet bhavetsaṃnihitā tatra gaṅgā tripathagāminī

हिन्दी अर्थ

सम्मिलित होनेका पता लगा लेगा, वह एक ही सुदृढ बाणसे इस त्रिपुरको चूर्ण कर डालेगा। इसलिये असुरो! तुमलोगोंमें जितनी प्राणशक्ति है, जितना बल है और विचारकर इस त्रिपुरको रक्षामें जुट जाओ। तुमलोग एकमात्र महेश्वरके भीषण रथको पूरी शक्ति लगाकर ऐसा विमुख कर दो, जिससे वे बाण न छोड़ सकें। इस प्रकार हमलोगोंद्वारा त्रिपुरकी रक्षा सम्पन्न कर लेनेपर प्रतीक्षा करनी पड़ेगी।' मयका ऐसा कथन सुनकर यमराजके समान भीषण त्रिपुरनिवासी दानव बारम्बार सिंहनाद कर मयसे बोले-'राजन्! हम सब लोग प्रयत्नपूर्वक आपके कथनका पालन करेंगे और ऐसा

English

eJinlka. 40. Niralitra

अध्याय 102

श्लोक 9

सप्तवाराभिजप्तेन करसम्पुटयोजितः मूर्ध्नि कुर्याज्जलं भूयस् त्रिचतुष्पञ्चसप्तकम् स्नानं कुर्यान्मृदा तद्वद् आमन्त्र्य तु विधानतः

saptavārābhijaptena karasampuṭayojitaḥ mūrdhni kuryājjalaṃ bhūyas tricatuṣpañcasaptakam snānaṃ kuryānmṛdā tadvad āmantrya tu vidhānataḥ

हिन्दी अर्थ

कर्म कर दिखायेंगे, जिससे रुद्र त्रिपुरपर बाण नहीं छोड़ सकेंगे। हमलोग आज ही उस रुद्रका वध करनेके लिये संग्रामभूमिमें जा रहे हैं। या तो हमारा त्रिपुर कल्पपर्यन्त निश्चलरूपसे सर्वदाके लिये आकाशमें स्थिर रहेगा अथवा नारायणके तीन पदकी तरह यह दानवोंसे खाली हो जायगा। आप हमलोगोंको जिस कार्यमें नियुक्त कर देंगे, हमलोग उस कर्तव्यका कदापि त्याग नहीं करेंगे। आज मानव जगतको देवता अथवा हैत्यसे रहित ही देखेंगे।'

English

• Dranpadi. 2Dd \rife,

अध्याय 102

श्लोक 10

अश्वक्रान्ते रथक्रान्ते विष्णुक्रान्ते वसुंधरे मृत्तिके हर मे पापं यन्मया दुष्कृतं कृतम्

aśvakrānte rathakrānte viṣṇukrānte vasuṃdhare mṛttike hara me pāpaṃ yanmayā duṣkṛtaṃ kṛtam

हिन्दी अर्थ

भ्राजते भ्राजयँल्लोकाञ्सृजञ्ज्योत्स्त्ारसं बलात् चन्द्राट्टहासे तरुणप्रदोषे । पञ्चेषवस्ते मकरध्वजेन।

English

S'rata- 40. Inkotrs. karman.

अध्याय 102

श्लोक 11

उद्धृतासि वराहेण कृष्णेन शतबाहुना मृत्तिके ब्रह्मदत्तासि काश्यपेनाभिमन्त्रिता आरुह्य मम गात्राणि सर्वं पापं प्रचोदय

uddhṛtāsi varāheṇa kṛṣṇena śatabāhunā mṛttike brahmadattāsi kāśyapenābhimantritā āruhya mama gātrāṇi sarvaṃ pāpaṃ pracodaya

हिन्दी अर्थ

मत्तप्रलापेषु च कोकिलानां सचापबाणो मदनो ममन्थ पुलकित शरीरवाले हैत्य हर्षपूर्वक इस प्रकार कह रहे थे। इस प्रकार वे देवशत्रु दानव त्रिपुरके भीतर मन्त्रणा करके सायंकाल होनेपर प्रसन्न होकर स्वच्छन्दाचारमें

English

BARHADHATHA8.

अध्याय 102

श्लोक 12

मृत्तिके देहि नः पुष्टिं त्वयि सर्वं प्रतिष्ठितम् नमस्ते सर्वलोकानां प्रभवारणि सुव्रते

mṛttike dehi naḥ puṣṭiṃ tvayi sarvaṃ pratiṣṭhitam namaste sarvalokānāṃ prabhavāraṇi suvrate

हिन्दी अर्थ

उसी समय बारम्बार मोतीके निकलनेका भ्रम उत्पन्न करनेवाले एवं महामणिके समान भगवान् चन्द्रमा उदयाचलके शिखरपर दीख पड़े। वे अन्थकारका

English

MahlrathaCBPihadPathaof Magadha).

अध्याय 102

श्लोक 13

एवं स्नात्वा ततः पश्चाद् आचम्य च विधानतः उत्थाय वाससी शुक्ले शुद्धे तु परिधाय वै ततस्तु तर्पणं कुर्यात् त्रैलोक्याप्यायनाय वै

evaṃ snātvā tataḥ paścād ācamya ca vidhānataḥ utthāya vāsasī śukle śuddhe tu paridhāya vai tatastu tarpaṇaṃ kuryāt trailokyāpyāyanāya vai

हिन्दी अर्थ

विनाश करके आकाशमण्डलमें आगे बढ़ रहे थे। उस समय जैसे कुमुदिनीसे सुशोभित विशाल सरोवरमें

English

KusAgra.

अध्याय 102

श्लोक 14

देवा यक्षास्तथा नागा गन्धर्वाप्सरसो ऽसुराः क्रूराः सर्पाः सुपर्णाश्च तरवो जम्बुकाः खगाः

devā yakṣāstathā nāgā gandharvāpsaraso 'surāḥ krūrāḥ sarpāḥ suparṇāśca taravo jambukāḥ khagāḥ

हिन्दी अर्थ

हंस, वैदूर्ये शिखरपर बैठा हुआ महान् सिंह और भगवान् विष्णुके विस्तीर्ण वक्षःस्थलपर लटकता हुआ हार शोभा पाता है, उसी तरह महर्षि अत्रिके

English

APPENDIX IL

अध्याय 102

श्लोक 15

वाय्वाधारा जलाधारास् तथैवाकाशगामिनः निराधाराश्च ये जीवा ये तु धर्मरतास्तथा

vāyvādhārā jalādhārās tathaivākāśagāminaḥ nirādhārāśca ye jīvā ye tu dharmaratāstathā

हिन्दी अर्थ

नेत्रसे उत्पन्न हुए चन्द्रमा अथाह आकाशमें स्थित होकर अपनी चाँदनीसे बलपूर्वक सारे लोकोंको सींचते

English

Vpl9abha.Iil

अध्याय 102

श्लोक 16

तेषामाप्यायनायैतद् दीयते सलिलं मया कृतोपवीती देवेभ्यो निवीती च भवेत्ततः

teṣāmāpyāyanāyaitad dīyate salilaṃ mayā kṛtopavītī devebhyo nivītī ca bhavettataḥ

हिन्दी अर्थ

चन्द्रः प्रभाभिः कुरुतेऽधिराज्यम्॥ २५ एवं प्रकाशित करते हुए सुशोभित हो रहे थे। इस स्थित्वैव कान्तस्य तु पादमूले काचिद् वरस्त्री स्वकपोलमूले। विशेषकं चारुतरं करोति तेनाननं स्वं समलङ्करोति

English

Punyavat.

अध्याय 102

श्लोक 17

मनुष्यांस्तर्पयेद्भक्त्या ब्रह्मपुत्रानृषींस्तथा सनकश्च सनन्दश्च तृतीयश्च सनातनः

manuṣyāṃstarpayedbhaktyā brahmaputrānṛṣīṃstathā sanakaśca sanandaśca tṛtīyaśca sanātanaḥ

हिन्दी अर्थ

काचित् प्रियस्यातिचिरात् प्रसन्ना आसीत् प्रलापेषु च सम्प्रसन्ना पङ्काङ्किताक्षीरधराऽऽसुरीणाम् ।

English

Batyadbfiti.

अध्याय 102

श्लोक 18

कपिलश्चासुरिश्चैव वोढुः पञ्चशिखस्तथा सर्वे ते तृप्तिमायान्तु मद्दत्तेनाम्बुना सदा

kapilaścāsuriścaiva voḍhuḥ pañcaśikhastathā sarve te tṛptimāyāntu maddattenāmbunā sadā

हिन्दी अर्थ

ललन्ति हैत्या दयितासु रक्ताः। कामस्य बाणैः सुकृतं निधानम्। केचित् प्रियां तत्र च साधयन्ति। केचित् प्रियां सम्प्रति बोधयन्ति

English

Diianufa. Sambhava.

अध्याय 102

श्लोक 19

मरीचिमत्र्यङ्गिरसं पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम् प्रचेतसं वसिष्ठं च भृगुं नारदमेव च देवब्रह्मऋषीन् सर्वांस् तर्पयेद् अक्षतौदकैः

marīcimatryaṅgirasaṃ pulastyaṃ pulahaṃ kratum pracetasaṃ vasiṣṭhaṃ ca bhṛguṃ nāradameva ca devabrahmaṛṣīn sarvāṃs tarpayed akṣataudakaiḥ

हिन्दी अर्थ

शब्दश्च सम्बाधति कोकिलानाम् प्रकार सायंकालमें शीतरश्मि चन्द्रमाके उदय होनेपर

English

Bpibadratha II.

अध्याय 102

श्लोक 20

अपसव्यं ततः कृत्वा सव्यं जान्वाच्य भूतले अग्निष्वात्तास्तथा सौम्या हविष्मन्तस्तथोष्मपाः

apasavyaṃ tataḥ kṛtvā savyaṃ jānvācya bhūtale agniṣvāttāstathā saumyā haviṣmantastathoṣmapāḥ

हिन्दी अर्थ

जब त्रिपुरमें चाँदनी फैल गयी, तब असुरगण अपने- अपने गृहोंको सजाने लगे। गलियों, सड़कों, महलों और गृहोंमें तेलसे भरे हुए दीपक जला दिये गये, जो चम्याके पुष्पकी भाँति सुशोभित हो रहे थे। उसी प्रकार देवालयोंमें भी तेलसे परिपूर्ण दीपक जलाये गये। दानवोंके गृह धन-सम्पत्तिसे परिपूर्ण तो थे ही, उनमें अनेक प्रकारके रत्न भी जड़े हुए थे, जिससे वे जलते हुए दीपकोंको चन्द्रोदय होनेपर ग्रहोंकी तरह अधिक उद्दी्त कर रहे थे॥ १५--३०॥

English

Jar ft sand ha. 47- Sahadeva (killed in the Mahftbhftrata War). 1920 B.C.

अध्याय 102

श्लोक 21

सुकालिनो बर्हिषदस् तथान्ये वाज्यपाः पुनः संतर्प्याः पितरो भक्त्या सतिलोदकचन्दनैः

sukālino barhiṣadas tathānye vājyapāḥ punaḥ saṃtarpyāḥ pitaro bhaktyā satilodakacandanaiḥ

हिन्दी अर्थ

वे भवन बाहरसे तो चन्द्रमाकी किरणोंसे प्रकाशित थे और भीतर जलते हुए दीपकोंसे उद्दीस हो रहे थे,

English

Somavit (Bomftdhi).

अध्याय 102

श्लोक 22

यमाय धर्मराजाय मृत्यवे चान्तकाय च वैवस्वताय कालाय सर्वभृतक्षयाय च

yamāya dharmarājāya mṛtyave cāntakāya ca vaivasvatāya kālāya sarvabhṛtakṣayāya ca

हिन्दी अर्थ

जिससे वे त्रिपुरके अन्धकारको उसी प्रकार पीकर नष्ट कर रहे थे, जैसे उपद्रवोंके प्रकोपसे कुल नष्ट हो जाता ७०० मत्स्यपुराण

English

Hrutasravas. THE LINE OF ASVAJIT.

अध्याय 102

श्लोक 23

औदुम्बराय दध्नाय नीलाय परमेष्ठिने वृकोदराय चित्राय चित्रगुप्ताय वै नमः दर्भपाणिस्तु विधिना पितॄन्संतर्पयेद्बुधः

audumbarāya dadhnāya nīlāya parameṣṭhine vṛkodarāya citrāya citraguptāya vai namaḥ darbhapāṇistu vidhinā pitṝnsaṃtarpayedbudhaḥ

हिन्दी अर्थ

प्रियावगूढा दयितोपगूढा है। रात्रिके समय जब चन्द्रमाकी उज्वल छटा पूरे काचित् प्ररूढाङ्गरुहापि नारी। सुचारुवाष्पाङ्करपल्लवानां

English

Abvajil.

अध्याय 102

श्लोक 24

पित्रादीन्नामगोत्रेण तथा मातामहानपि संतर्प्य विधिना भक्त्या इमं मन्त्रमुदीरयेत्

pitrādīnnāmagotreṇa tathā mātāmahānapi saṃtarpya vidhinā bhaktyā imaṃ mantramudīrayet

हिन्दी अर्थ

शशाङ्कपाहैरु पशोभितेषु पीनोन्नतां काञ्जनमेखलाख्याम् हैत्याङ्गा यूथगता विभान्ति त्रिपुरमें फैल गयी तब दानवगण रात बितानेके लिये

English

Sonajit. Ruclilras'va.

अध्याय 102

श्लोक 25

ये ऽबान्धवा बान्धवा वा ये ऽन्यजन्मनि बान्धवाः ते तृप्तिमखिलां यान्तु यश् चास्मत्तो ऽभिवाञ्छति

ye 'bāndhavā bāndhavā vā ye 'nyajanmani bāndhavāḥ te tṛptimakhilāṃ yāntu yaś cāsmatto 'bhivāñchati

हिन्दी अर्थ

अट्टाइहासेषु च चामरेषु प्रोवाच काञ्चीगुणसूक्ष्मनादा

English

Dpiilharatha,

अध्याय 102

श्लोक 26

ततश्चाचम्य विधिवद् आलिखेत्पद्ममग्रतः अक्षताभिः सपुष्पाभिः सजलारुणचन्दनम् अर्घ्यं दद्यात्प्रयत्नेन सूर्यनामानि कीर्तयेत्

tataścācamya vidhivad ālikhetpadmamagrataḥ akṣatābhiḥ sapuṣpābhiḥ sajalāruṇacandanam arghyaṃ dadyātprayatnena sūryanāmāni kīrtayet

हिन्दी अर्थ

काञ्जीकलापश्च सहाङ्गराग प्रियालयान् मन्मथमार्गणानाम्॥ ४१ अपनी पत्नियोंके साथ अपने-अपने गृहोंमें चले गये। चित्राम्बरश्चोद्धूतकेशपाश काञ्जीभ्रष्टेर्मणिभिर्विप्रकीर्णैः ।

English

Ppithusena, Saropftra.

अध्याय 102

श्लोक 27

नमस्ते विष्णुरूपाय नमो विष्णुमुखाय वै सहस्ररश्मये नित्यं नमस्ते सर्वतेजसे

namaste viṣṇurūpāya namo viṣṇumukhāya vai sahasraraśmaye nityaṃ namaste sarvatejase

हिन्दी अर्थ

सचन्द्रिके सोपवने प्रदोषे रुतेषु वृन्देषु च कोकिलानाम्। प्रक्षीणबाणो मदनश्चचार॥ ४४ इधर रात बीती और कोयलें कूजने लगीं

English

Sadasiva,

अध्याय 102

श्लोक 28

नमस्ते शिव सर्वेश नमस्ते सर्ववत्सल जगत्स्वामिन्नमस्ते ऽस्तु दिव्यचन्दनभूषित

namaste śiva sarveśa namaste sarvavatsala jagatsvāminnamaste 'stu divyacandanabhūṣita

हिन्दी अर्थ

चन्द्रोऽथ कुन्दकुसुमाकरहारवर्णो संतप्तकाञ्चनरथाङ्गसमानबिम्बः । कुछ देर बाद त्रिपुरमें युद्धके मुहानेपर शङ्करजीके घोडोंद्वारा पराजित किये गये शत्रुओंकी क्षीण कीर्तिकी तरह उन देवशत्रुओंके नगरमें एकाएक चतुर्थ प्रहरकी क्षीण चाँदनी दीख पड़ने लगी। उस समय कुन्दके

English

Ppithii. (LOONipas). I

अध्याय 102

श्लोक 29

पद्मासन नमस्ते ऽस्तु कुण्डलाङ्गदभूषित नमस्ते सर्वलोकेश जगत्सर्वं विबोधसे

padmāsana namaste 'stu kuṇḍalāṅgadabhūṣita namaste sarvalokeśa jagatsarvaṃ vibodhase

हिन्दी अर्थ

पुष्पसमूहोंसे निर्मित हारके समान उज्ज्वल वर्णवाले चन्द्रमा किरणजालके क्षीण हो जानेके कारण निर्जल बादलकी तरह दीखने लगे। चाँदनीके नष्ट हो जानेपर चन्द्रमाको शोभा उसी प्रकार जाती रही, जैसे धन- सम्पत्तिसे सम्पन्न मनुष्य भाग्यके नष्ट हो जानेपर शोभाहीन हो जाता है। उस समय तपाये हुए स्वर्णमय चक्रके समान बिम्बवाले सूर्य अपने सारथि अरुणकी प्रभासे चन्द्रमाको कान्तिको तिरस्कृत कर उदयाचलके अग्र

English

, 1 40. Sukrita.

अध्याय 102

श्लोक 30

सुकृतं दुष्कृतं चैव सर्वं पश्यसि सर्वग सत्यदेव नमस्ते ऽस्तु प्रसीद मम भास्कर

sukṛtaṃ duṣkṛtaṃ caiva sarvaṃ paśyasi sarvaga satyadeva namaste 'stu prasīda mama bhāskara

हिन्दी अर्थ

शिखरपर स्थित हुए और आकाशमण्डलमें अन्धकाररूपी भात्यम्बरे तिमिरतोयवहां तरिष्यन् ॥ ४७ नदीको पार करते हुए शोभा पा रहे थे॥ ४५--४७॥ इति श्रीमत्स्ये महापुराणे त्रिपुरकौमुदीनामैकोनचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः

English

Brlmat. i Viblirftja.

अध्याय 102

श्लोक 31

दिवाकर नमस्ते ऽस्तु प्रभाकर नमो ऽस्तु ते एवं सूर्यं नमस्कृत्य त्रिः कृत्वाथ प्रदक्षिणम् द्विजं गां काञ्चनं स्पृष्ट्वा ततो विष्णुगृहं व्रजेत्

divākara namaste 'stu prabhākara namo 'stu te evaṃ sūryaṃ namaskṛtya triḥ kṛtvātha pradakṣiṇam dvijaṃ gāṃ kāñcanaṃ spṛṣṭvā tato viṣṇugṛhaṃ vrajet

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें त्रिपुरकौमुदी नामक एक सो उन्तालीसबाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ मयका पलायन तथा शङ्करजीकी त्रिपुरपर विजय

English

Anuha (married Kritvi, daughter of Buka).

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_matsyapurANa1-176.txt · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।