Padma Purana
7
अध्याय 7 / 8

Shiva-Gita — Shiva's Teaching on Brahman to Kartikeya

शिवगीता

4 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ4 श्लोक

अध्याय 7

श्लोक 1

अहमेव परं ब्रह्म सच्चिदानन्दमव्ययम् ।अहमेव परं धाम अहमेव परं पदम्

ahameva paraṃ brahma saccidānandamavyayam | ahameva paraṃ dhāma ahameva paraṃ padam

हिन्दी अर्थ

मैं ही परम ब्रह्म हूँ — सच्चिदानन्द, अव्यय। मैं ही परम धाम हूँ; मैं ही परम पद हूँ।

English

I alone am the supreme Brahman — Existence-Consciousness-Bliss, imperishable. I alone am the supreme abode; I alone am the supreme state.

अध्याय 7

श्लोक 5

शिवः सर्वत्र शिवः सर्वः शिवः सर्वेषु भूतेषु ।यः शिवं पश्यति सर्वत्र स शिवं पश्यति नान्यथा

śivaḥ sarvatra śivaḥ sarvaḥ śivaḥ sarveṣu bhūteṣu | yaḥ śivaṃ paśyati sarvatra sa śivaṃ paśyati nānyathā

हिन्दी अर्थ

शिव सर्वत्र है, शिव सब कुछ है, शिव सभी प्राणियों में है। जो शिव को सर्वत्र देखता है, वही शिव को देखता है — अन्यथा नहीं।

English

Shiva is everywhere, Shiva is all, Shiva is in all beings. He who sees Shiva everywhere, sees Shiva — not otherwise.

अध्याय 7

श्लोक 22

न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः ।अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे

na jāyate mriyate vā kadācinnāyaṃ bhūtvā bhavitā vā na bhūyaḥ | ajo nityaḥ śāśvato'yaṃ purāṇo na hanyate hanyamāne śarīre

हिन्दी अर्थ

यह कभी जन्म नहीं लेता और न मरता है। यह होकर फिर नहीं होगा। अज, नित्य, शाश्वत, पुराण — शरीर के मारे जाने पर यह नहीं मारा जाता।

English

It is never born and never dies at any time. It has not come into being and will not come into being. Unborn, eternal, ever-existing, primeval — it is not slain when the body is slain.

अध्याय 7

श्लोक 48

ज्ञानं यज्ञेन पर्युप्तं यज्ञस्तपसि तिष्ठति ।तप आत्मनि तिष्ठत्यात्मा सर्वत्र तिष्ठति

jñānaṃ yajñena paryuptaṃ yajñastapasitiṣṭhati | tapa ātmani tiṣṭhatyātmā sarvatra tiṣṭhati

हिन्दी अर्थ

ज्ञान यज्ञ से परिष्कृत होता है; यज्ञ तप में स्थित है; तप आत्मा में स्थित है; आत्मा सर्वत्र स्थित है।

English

Knowledge is purified by sacrifice; sacrifice rests in austerity; austerity rests in the Self; the Self rests everywhere.

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/ · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।