Padma Purana
8
अध्याय 8 / 8

Uttara Khanda — Marks of the True Devotee

उत्तरखण्ड — भागवत लक्षण

3 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ3 श्लोक

अध्याय 8

श्लोक 1

अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् ।साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः

api cet sudurācāro bhajate māmananyabhāk | sādhureva sa mantavyaḥ samyagvyavasito hi saḥ

हिन्दी अर्थ

यदि अत्यंत दुराचारी भी अनन्य भाव से मेरा भजन करता है — वह साधु ही मानना चाहिए, क्योंकि उसका निश्चय सम्यक है।

English

Even if a person of very bad conduct worships Me with undivided devotion — he is to be considered a saint, for he has resolved rightly.

अध्याय 8

श्लोक 18

समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः ।ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्

samo'haṃ sarvabhūteṣu na me dveṣyo'sti na priyaḥ | ye bhajanti tu māṃ bhaktyā mayi te teṣu cāpyaham

हिन्दी अर्थ

मैं सभी प्राणियों में समान हूँ — न कोई द्वेष्य, न प्रिय। किन्तु जो भक्ति से भजते हैं — वे मुझमें हैं और मैं उनमें हूँ।

English

I am equal to all beings — none is hateful to Me, none is dear. But those who worship Me with devotion — they are in Me, and I am in them.

अध्याय 8

श्लोक 35

मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम् ।कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च

maccittā madgataprāṇā bodhayantaḥ parasparam | kathayantaśca māṃ nityaṃ tuṣyanti ca ramanti ca

हिन्दी अर्थ

मुझमें मन लगाए, मुझमें प्राण अर्पित किए — परस्पर बोध देते हुए, नित्य मेरी कथा करते हुए — वे तृप्त होते हैं और आनन्दित होते हैं।

English

Their minds absorbed in Me, their life-breath gone to Me — enlightening one another, always speaking of Me — they are satisfied and they rejoice.

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/ · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।