अध्याय 3
श्लोक 85
भजनीयेनाद्वितीयमिदं कृत्स्नस्य तत्स्वरूपत्वात्
bhajanīyenādvitīyamidaṃ kṛtsnasya tatsvarūpatvāt
अध्याय 3
भजनीयेनाद्वितीयमिदं कृत्स्नस्य तत्स्वरूपत्वात्
bhajanīyenādvitīyamidaṃ kṛtsnasya tatsvarūpatvāt
अध्याय 3
तच्छक्तिर्माया जडसामान्यात्
tacchaktirmāyā jaḍasāmānyāt
अध्याय 3
व्यापकत्वाद्व्याप्यानाम्
vyāpakatvādvyāpyānām
अध्याय 3
न प्राणिबुद्धिभ्योऽसम्भवात्
na prāṇibuddhibhyo'sambhavāt
अध्याय 3
निर्मायोच्चावचं श्रुतीश्च निर्मिमीते पितृवत्
nirmāyoccāvacaṃ śrutīśca nirmimīte pitṛvat
अध्याय 3
मिश्रोपदेशान्नेति चेन्न स्वल्पत्वात्
miśropadeśānneti cenna svalpatvāt
अध्याय 3
फलमस्माद्बादरायणो दृष्टत्वात्
phalamasmādbādarāyaṇo dṛṣṭatvāt
अध्याय 3
व्युत्क्रमादप्ययस्तथा दृष्टम्
vyutkramādapyayastathā dṛṣṭam
अध्याय 3
तदैक्यं नानात्वैकत्वमुपाधियोगहानादादित्यवत्
tadaikyaṃ nānātvaikatvamupādhiyogahānādādityavat
अध्याय 3
पृथगिति चेन्न परेणासम्बन्धात् प्रकाशानाम्
pṛthagiti cenna pareṇāsambandhāt prakāśānām
अध्याय 3
न विकारिणस्तु करणविकारात्
na vikāriṇastu karaṇavikārāt
अध्याय 3
अनन्यभक्त्या तद्बुद्धिर्बुद्धिलयादत्यन्तम्
ananyabhaktyā tadbuddhirbuddhilayādatyantam
अध्याय 3
आयुश्चिरमितरेषां तु हानिरनास्पदत्वात्
āyuściramitareṣāṃ tu hāniranāspadatvāt
अध्याय 3
संसृतिरेषामभक्तिः स्यान्नाज्ञानात् कारणासिद्धेः
saṃsṛtireṣāmabhaktiḥ syānnājñānāt kāraṇāsiddheḥ
अध्याय 3
त्रीण्येषां नेत्राणि शब्दलिङ्गाक्षभेदाद्रुद्रवत्
trīṇyeṣāṃ netrāṇi śabdaliṅgākṣabhedādrudravat
अध्याय 3
आविस्तिरोभावा विकाराः स्युः क्रियाफलसंयोगात्
āvistirobhāvā vikārāḥ syuḥ kriyāphalasaṃyogāt
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भाषा एवं सामग्री · Language and layers
स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit sutra text only, read from the Gita Press Gorakhpur edition and proofread against the page images. The Hindi gloss is not reproduced. · प्राप्त 18/10/2026
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धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।
अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)
मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।
पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)
व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।
आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)
प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।
भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)
आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।
समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)
दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)
पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।
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