Vayu Purana
103
अध्याय 103 / 232

Adhyaya 103

210 श्लोकभाग 1/4 · श्लोक 1–72

पूर्ण अध्याय पाठ72 श्लोक

अध्याय 103

श्लोक 1

॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे मन्मथेश्वरतीर्थमाहात्म्यवर्णनं नाम द्व्यधिकशततमो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय १०३ श्रीमार्कण्डेय उवाच: ततो गच्छेन्महीपाल एरण्डीसङ्गमं परम् ।यच्छ्रुतं वै मया राजञ्छिवस्य वदतः पुरा

|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe manmatheśvaratīrthamāhātmyavarṇanaṃ nāma dvyadhikaśatatamo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 103 śrīmārkaṇḍeya uvāca: tato gacchenmahīpāla eraṇḍīsaṅgamaṃ param / yacchrutaṃ vai mayā rājañchivasya vadataḥ purā

हिन्दी अर्थ

चका, ये तीनों गुणों के विकार से समुत्पन्न, मूतिरहित, स्थ्य प्रकाशमान, ज्योतिष्मान् एवं विख्यात हैं

English

O Suta, O blessed one, eighteen Puranas have been entirely narrated along with the connected anecdotes in the manner of Upakrama (beginning) and Upasarfihdra (conclusion),

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श्लोक 2

एतदेव पुरा प्रश्नं गौर्या पृष्टस्तु शङ्करः ।प्रोवाच नृपशार्दूल गुह्याद्गुह्यतरं शुभम्

etadeva purā praśnaṃ gauryā pṛṣṭastu śaṅkaraḥ / provāca nṛpaśārdūla guhyādguhyataraṃ śubham

हिन्दी अर्थ

उन पितरों के राजा यम नामक देव हैं, जिनके पाप तपस्या द्वारा नष्ट हो चुके हैं। अब आप लोग साव- धानतापुर्वक अन्य प्रजापतियों के व्रिषय में सुनिये । कर्दम, कह्यप, शेष, विक्रास्त, सुश्नवा, बहुपुत्र, कुमार, विवस्थान्ू, शुचिश्रवा, प्रचेतस, अरिष्टेमि, एवं बहुल नामक प्रजापतियों के अतिरिक्त अश्यान्य बहुतेरे प्रजापति हो गये हैं ।(५३-५४। उनमें कुशोच्चय एवं बालखिलय गण परम ऋषि हो गये हैं, जो सब के सब मन के समान वेगशाली, स्वंगामी, तथा सावंभौम थे ॥५४। ब्रह्मषियों द्वारा सम्माननीय, तपस्या एवं शास्त्राभ्यासर में निरत रहनेवाले वेस्धानस मुनिनण यज्ञ के भस्म से प्रादुर्भूत हुए। उस (ब्रह्मा) के कानों से अति रूपवान् दो अश्विनीकुमारों की उत्पत्ति हुई। नेत्र से उत्पन्न होनेवाले निष्पाप, जन्म से इन्द्रिय को स्ववश रखनेवाले तथा साल्विक प्रकृतिवाले ऋषिगण इस वृत्तान्त को जानते हैं । उसके कानों से अन्यान्य श्रेष्ठ प्रजापतियों की

English

You have clearly narrated Matsya Purana- containing fourteen thousand verses; the Bhavisya Parana containing an

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श्लोक 3

ईश्वर उवाच: शृणु देवि परं गुह्यं नाख्यातं कस्यचिन्मया ।रेवायाश्चोत्तरे कूले तीर्थं परमशोभनम् ।भ्रूणहत्याहरं देवि कामदं पुत्रवर्धनम्

īśvara uvāca: śṛṇu devi paraṃ guhyaṃ nākhyātaṃ kasyacinmayā / revāyāścottare kūle tīrthaṃ paramaśobhanam / bhrūṇahatyāharaṃ devi kāmadaṃ putravardhanam

हिन्दी अर्थ

उत्पत्ति हुई, रोमछिद्रों से अन्यान्य ऋषियों की उत्पत्ति हुई, इसी प्रकार स्वेद एवं मल से भी कुछ प्रजापतियों की उत्पत्ति हुई। ५६-५८। उसके स्वर से दारुण मास, निर्यास (?) पक्षों की संधियाँ, वत्सर दिन रात एवं

English

The holy rites and duties (Dharma) of those with and without attachment, those of ascetics, the religious students, householders, forest-hermits, women and Sudras have been particularly explained by you. Similarly the rites and duties of Brabmanas, Ksatriyas, Vaisyas and the mixed castes have been recounted. You have described the big rivers Ganga and others. Many kinds of Yajnas, holy rites and penances have been explained in those Puranas. Many kinds of religious gifts, all kinds of Tamos (restraints and holy observances), the duties of Yoga, Samkhya and Bhagavata (pertaining to the holy devotee of the lord) have been explained in them. The paths of devo¬ tion, knowledge, and detachment have been explained. The procedures for the Upasand (special forms of worship) with water and wind (i.c. such as Pranayama where the breath is control¬ led) by those whose minds have been purified by holy rites, have been mentioned.

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श्लोक 4

पार्वत्युवाच: कथयस्व महादेव तीर्थं परमशोभनम् ।भ्रूणहत्याहरं कस्मात्कामदं स्वर्गदर्शनम्

pārvatyuvāca: kathayasva mahādeva tīrthaṃ paramaśobhanam / bhrūṇahatyāharaṃ kasmātkāmadaṃ svargadarśanam

हिन्दी अर्थ

दारुणा हि रुते मासा निर्यासाः पक्षसंधयः । वत्सरा ये त्वहोरात्राः पित्र (5यं ) ज्योतिश्व दारुणम् आदिसानस्य लोकस्य ब्रह्मा ब्रह्मसमुझ्भूवः सर्वकामदमित्याहुस्तत्र कन्यामुदाहरन् ६६२ ब्रह्मा सुरगुरुस्तत्र त्रिश्शै: संप्रसोदर्ति । इसे वे जनयिष्यन्ति प्रजा: सर्वाः प्रजेश्वरा: ६३ सर्वे प्रजानां पतयः सर्वे चापि तपस्विनः । तत्प्रसादादिमॉल्लोकान्धारय्रेयुरिसा: क्रिया: ६४ हंढू संवर्धधामास तव तेजो विवर्धनम् । देवेधु बेदविद्वांसः सर्वे राजषंयस्तथा ६५

English

The systems (of philosophy and devotion), the Brahma (pertaining to Brahma), Saiva (that of Siva), Vaisnava (that of Vi§nu)j Saura (that of the Sun), Sakta (that of Sakti, the goddess), Arhata* (that of Arhat, Jina), the six systems of philosophy and the materialistic philosophy—all these and many other things have been explained in the Puranas.

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श्लोक 5

ईश्वर उवाच: अत्रिर्नाम महादेवि मानसो ब्रह्मणः सुतः ।अग्निहोत्ररतो नित्यं देवतातिथिपूजकः

īśvara uvāca: atrirnāma mahādevi mānaso brahmaṇaḥ sutaḥ / agnihotrarato nityaṃ devatātithipūjakaḥ

हिन्दी अर्थ

वेदमन्त्रपरा: सर्वे प्रजापतिगुणो दबा: । अनन्तं ब्रह्म सत्यं च तपश्च परम भुवि

English

It is not known whether there is or not anything be- yond tills that is excellent and worth knowing.

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श्लोक 6

सोमसंस्थाश्च सप्तैव कृता विप्रेण पार्वति ।अनसूयेति विख्याता भार्या तस्य गुणान्विता

somasaṃsthāśca saptaiva kṛtā vipreṇa pārvati / anasūyeti vikhyātā bhāryā tasya guṇānvitā

हिन्दी अर्थ

सर्वे हि बयमेते च तथ्थव प्रसव: प्रभो । ब्रह्म च ब्राह्मणाश्चेव लोकाश्चेव चराचराः ६७ मरीचिमादित: कृत्वा देवाश्च ऋषिभि: सह । अपत्यानीह संचिन्त्य तेउपत्यं फामयामहे तस्मिन्यज्ञ महाभागा देवाश्च ऋषिभिः सह । एतह्वंशसमुद्भुताः स्थानकालाभिमानिनः ६९ न च तेनव रूपेण स्थापयेयुरिमा: प्रजा: । युगादिनिधनाश्चेब स्थापयेयुरिमाः प्रजा:

English

Could it be that Vyasa or you, holy sir, are hiding any¬ thing? Please clear our doubts in this respect, since you are a complete Pauranika (knower of Puranas).

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श्लोक 7

पतिव्रता पतिप्राणा पत्युः कार्यहिते रता ।एवं याति ततः काले न पुत्रा न च पुत्रिका

pativratā patiprāṇā patyuḥ kāryahite ratā / evaṃ yāti tataḥ kāle na putrā na ca putrikā

हिन्दी अर्थ

पितरगणों की दाहुण ज्योति का प्रादुर्भाव हुआ । रोौद्र को लोहित कहा जाता है, लोहित को कनक नाम से भी स्मरण किया गया है, उसी को मैत्र भी जानना चाहिए, धृम पश् माने गये हैं ।५९-६०। उसकी देह- युति से रुद्र तथा आदित्यगणों का समुद्भव हुआ अडगारों से दिव्य एवं मानुष क़्योतियों का उद्भव हुआ इस प्रकार ब्रह्म से समुद्भत भगवान् ब्रह्मा इस लोकसृष्टि के आदिमकर्त्ता एवं पूल पुरुष म!ने गये हैं ।

English

O Saunaka, listen. I shall explain this intricate pro¬ blem. This is a great secret of divine nature. It should not be mentioned (to anyone and everyone), so say (the sages).

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श्लोक 8

अपराह्णे महादेवि सुखासीनौ तु सुन्दरि ।वदन्तौ सुखदुःखानि पूर्ववृत्तानि यानि च

aparāhṇe mahādevi sukhāsīnau tu sundari / vadantau sukhaduḥkhāni pūrvavṛttāni yāni ca

हिन्दी अर्थ

उनको सब मनोरथों का देनेवाला कहा जाता है। उस महायज्ञ के अवसर पर कन्या की बातचीत के सिलसिले में ऋषियों और ब्रह्मा से इस प्रकार वार्तालाप हुआ। मरीचि ऋषि को अग्रुआ बनाकर सभी ऋषियों एवं प्रजाओं की सृष्टि का कार्य सम्पन्न करेंगे, आपकी क॒पा से ये सभी प्रजापति तथा परम तपस्वी हैं और सभी लोकों को धारण (पालन) करने में समक्ष तथा क्रियानिष्ठ हैं ।६१०६४। तुम्हारे तेश की अभिवद्धि करनेवाले द्न्द्वात्मक भाव की वृद्धि हो गई । देवताओं में वेदों के जाननेवाले ये राजथिंगण, वेदिकमंत्र पराबण एवं प्रजापति के समस्त गुणों से समलंकृत हैं। इस पृथ्वी तल पर एक ब्रह्म ही अनन्त, सत्य एवं परम तप

English

After writing the scory of the Puranas wherein all the meanings of the Vcdic passages have been included, Vyasa, son of Parasara, thought thus in his mind. 1 2

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श्लोक 9

अत्रिरुवाच: सौम्ये शुभे प्रिये कान्ते चारुसर्वाङ्गसुन्दरि ।विद्याविनयसम्पन्ने पद्मपत्रनिभेक्षणे

atriruvāca: saumye śubhe priye kānte cārusarvāṅgasundari / vidyāvinayasampanne padmapatranibhekṣaṇe

हिन्दी अर्थ

साध्य है। ये और हम सभी तुम्हारी ही सन्‍्तानें है, इस जगत में ब्रह्म, ब्राह्मण एवं चराचर लोक सब कुछ तुमसे प्रदुर्भूत हुए हैं, हम सभी सन्‍्तान की कामना करते हैं ।६५-६८। इस प्रकार उस महायज्ञ में महा- भाग्यशाली देवगणों ने ऋषियों के साथ ब्रह्मा से प्राथंना की । इन्हीं उपयुक्त ऋषियों एवं देवताओं के वंश में स्थान एवं काल का निर्धारण करनेवाली सन्‍्तानें उत्पन्न हुईं । उन लोगों ने फिर कह्दा, ये प्रजापतिमण इसी

English

c 'The duties of the different castes and stages of life have been clearly explained by me. Different paths leading to salvation without infringing the Vedic injunctions have been mentioned by me.

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श्लोक 10

पूर्णचन्द्रनिभाकारे पृथुश्रोणिभरालसे ।न त्वया सदृशी नारी त्रैलोक्ये सचराचरे

pūrṇacandranibhākāre pṛthuśroṇibharālase / na tvayā sadṛśī nārī trailokye sacarācare

हिन्दी अर्थ

ततो5ब्रवील्लोकगुरु: परमित्यविचारयन् । एवं देवा विनिश्चित्य मया सृष्ठा न संशय: ॥। तेषां भूगोः कीतंयिष्ये वंश पूर्व महात्मन: । विस्तरेणा55नृपुर्र्या च॒ प्रथमस्य प्रजापते ७२

English

In my decisions (incorporated) in the {Brahma siilra), the (alleged) distinction between Jiva (individual soul), Isvara and Brahman has been completely refuted. Brahman the supreme soul has been explained on the basis of Vedic passages, cogent arguments and deliberations.

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श्लोक 11

रतिपुत्रफला नारी पठ्यते वेदवादिभिः ।पुत्रहीनस्य यत्सौख्यं तत्सौख्यं मम सुन्दरि

ratiputraphalā nārī paṭhyate vedavādibhiḥ / putrahīnasya yatsaukhyaṃ tatsaukhyaṃ mama sundari

हिन्दी अर्थ

भृगोस्त्वजनयहिव्या काव्यं वेदबिदां वरम् । देवासुराणासाचार्य शुक्र कविसुत॑ ग्रहम् ..

English

Mention of Jainism and non-mention of Buddhism shows that Buddhism had either disappeared from India at that time or the inclusion of the Buddha as an incarnation of Visnu was probably regarded a sufficient ground not to mention it as a separate system of philosophy. I believe in the first alternative (disappearance of Buddhism on a large scale).

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श्लोक 12

यथाहं न तथा पुत्रः समर्थः सर्वकर्मसु ।पुन्नामनरकाद्भद्रे जातमात्रेण सुन्दरि

yathāhaṃ na tathā putraḥ samarthaḥ sarvakarmasu / punnāmanarakādbhadre jātamātreṇa sundari

हिन्दी अर्थ

स शुक्रश्वोशना ख्यातः स्मृतः काव्योषपि नामतः । पितृणां मानसी कन्या सोमपानां यशस्विनो ॥ ब्राह्मण तेजसा युक्तः स जातो ब्रह्मवित्तम: । तस्थामेव तु चत्वारः पुत्रा: शुक्स्य जज्ञिरे...

English

Gf. Bh. 4.26-31 and the subsequent two chapters 5 & 6. That episode in the Bh. P. is the basis of this episode of Vyasa's dejection. The mention of Brahma Sutras shows that at the time of this Purana the authors of the Mahabliarata, the Puranas and the Brahma sutra were believed to be one si nglc individual called Krsna Dvaipayana Vyasa.

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श्लोक 13

पतन्तं रक्षयेद्देवि महापातकिनं यदि ।महाघोरे गता वापि दुष्टकर्मपितामहाः

patantaṃ rakṣayeddevi mahāpātakinaṃ yadi / mahāghore gatā vāpi duṣṭakarmapitāmahāḥ

हिन्दी अर्थ

त्वष्टा बरूत्री द्वावेती शण्डामकों च तावभो । ते तदा5वित्यसंकाशा ब्रह्मकल्पा: प्रभावतः.

English

Those who strictly adhere to the injunctions of the Vedas, perform holy rites only for the sake of Brahman They are free from desires and sins. They perform the holy rites dedicating the fruit thereof to the greatest soul.

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श्लोक 14

तद्धरन्ति सुपुत्राश्च वैतरण्यां गतानपि ।पुत्रेण लोकाञ्जयति पौत्रेण परमा गतिः

taddharanti suputrāśca vaitaraṇyāṃ gatānapi / putreṇa lokāñjayati pautreṇa paramā gatiḥ

हिन्दी अर्थ

रठजन:ः प्ृथुरश्मिश्न विद्वान्यस्य बृहद्गिरा:। वरूत्रिणः सता हतते ब्रहिष्ठा: सुरयाजकाः ७८ इज्याधमंबिनाशार्थ मनुमेत्याम्ययोजयन् । निरस्यमान वे धर्म दृष्ट्वेन्द्रो मनुभब्रवीत् ७६ अपने रूप में (बिना स्त्री के) प्रजाओं का विस्तार तो कर नहीं सकते, इनकी प्रजाएं बुगारम्भ से लेकर युगान्त तक स्थित रहनेवाली होगी ।' ऐसी बातें सुनकर लोकपितामह ब्रह्मा ने बिना कुछ विशेष विचार किये ही उत्तर दिया, निस्संदेह इन्हीं सब बातों का निश्चय करके मैंने पहले देवताओं की सृष्टि की है । ये मह॒ब्रिगण जो आप लोगों के वंश में उत्पन्न होनेवाले हैं, उनमें से स्वेप्रथम महात्मा भृगु के वंश का वर्णन विस्तारपूर्वंक क्रमश: कर

English

That Brahman is the greatest. It is pure. It has neither beginning nor end. It is free from ailments. It is eternal and omnipresent. It is steady like the summit of a mountain. It is devoid of deception. It pervades all sense organs but is im- perceivable. It is devoid of sense-organs that are the creations ofPrakrti. It is undeflected by Dik (Space) and Kdla (Time) etc. It is eternal. It is pure consciousness. It is unchanging.

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श्लोक 15

अथ पुत्रस्य पौत्रेण प्रगच्छेद् ब्रह्म शाश्वतम् ।नास्ति पुत्रसमो बन्धुरिह लोके परत्र च

atha putrasya pautreṇa pragacched brahma śāśvatam / nāsti putrasamo bandhuriha loke paratra ca

हिन्दी अर्थ

रहा हूं, जो कि प्रथम प्रजापति हैं। उन महात्मा भूगु की दो सत्कुलोत्पन्न कल्याणी स्त्रियाँ थीं, जिनमें एक हिरण्यकशिपु की कन्या थी जिसका“ दिव्या नाम विख्यात है, दूसरी परमसुन्दरी प्रलोम की कन्या थी, जिसका पौलोमी नाम था ।६९-७३। दिव्या ने भगु के संयोग से वेदशानियाँ में सर्वेश्रेष्ठ, देवताओं एवं असूरों के आचायें, कविपुत्र, सुप्रसिद्ध ग्रह शुक्र को उत्पन्त किया। . वे झुक्र उशनता एवं काव्य नाम से भी विख्यात

English

The whole universe is super-imposed on it like the

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श्लोक 16

अहश्च मध्यरात्रे च चिन्तयानस्य सर्वदा ।शुष्यन्ति मम गात्राणि ग्रीष्मे नद्युदकं यथा

ahaśca madhyarātre ca cintayānasya sarvadā / śuṣyanti mama gātrāṇi grīṣme nadyudakaṃ yathā

हिन्दी अर्थ

हैं। शुक्र की पत्ती एवं सोम पान करनेवाले पितरों की यशस्विनी मो नामक कन्या ने चार पुत्रों को उत्पन्न किया ।७४-७६। वे शुक्राचार्थ ब्रह्मतेन से समलंकृत एवं ब्रह्मज्ञानियों में श्रेष्ठ थे। उस पत्नी में शुक्र के चार पुत्र उपन्‍्न हुए, जो त्वष्टा और वरुत्री तथा दण्ड एवं अमक के नाम से विख्यात हैं। शुक्र के प्रभाव से वे पुत्र ब्रहा के समान तेजस्वी तथा आदित्य के समान थे । तिनमें से वरुत्री के रझजन, प्रुथुरदिम और विद्वान बृहद््गिरा नामक ब्रह्मपरायण पुत्र हुए, जो सभी देवताओं के पुरोहित हुए । एक बार यज्ञ एवं धरम के विनाश के लिये इन शुत्रपुत्रों ने मनु से अपने तकंपूर्ण मतों कों निवेदित किया । धर्म कों नष्ट होते देख इन्द्र ने मनु

English

The Nigamas (Vedas) declare,'Everything is Brahman There is no multiplicity'. It is from Brahman that the crores of Brahmarnjas (Cosmic Eggs) are created and dissolved.

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श्लोक 17

अनसूयोवाच: यत्त्वया शोचितं विप्र तत्सर्वं शोचयाम्यहम् ।तवोद्वेगकरं यच्च तन्मे दहति चेतसि

anasūyovāca: yattvayā śocitaṃ vipra tatsarvaṃ śocayāmyaham / tavodvegakaraṃ yacca tanme dahati cetasi

हिन्दी अर्थ

भ््पर्द वायुपुराणमभ्

English

This Adhyasavada shows that this chapter was written in the post- Sankara period. See v. 39 below.

अध्याय 103

श्लोक 18

येन पुत्रा भविष्यन्ति आयुष्मन्तो गुणान्विताः ।तत्कार्यं च समीक्षस्व येन तुष्येत् प्रजापतिः

yena putrā bhaviṣyanti āyuṣmanto guṇānvitāḥ / tatkāryaṃ ca samīkṣasva yena tuṣyet prajāpatiḥ

हिन्दी अर्थ

एतेरेव तु काम त्वां प्रापयिष्यासि याजनम् । श्रुत्वेन्द्रस्य तु तद्ाक्‍्यं तस्माहेशादपाक़्मतू.. च० सुष्कप देवदेवस्य वेद्यां वे दक्षिण ततः

English

The dissolution and creation of all the worlds depend upon the Unmesa (opening) and jYimesa (closing) of Brah¬ man. 1 The great Sakti (the divine goddess of power) is station- ed with the support of Brahman.

अध्याय 103

श्लोक 19

अत्रिरुवाच: तपस्तप्तं मया भद्रे जातमात्रेण दुष्करम् ।व्रतोपवासनियमैः शाकाहारेण सुन्दरि

atriruvāca: tapastaptaṃ mayā bhadre jātamātreṇa duṣkaram / vratopavāsaniyamaiḥ śākāhāreṇa sundari

हिन्दी अर्थ

एवं वरूत्रिणः पुत्रा इन्द्रेण निहताः पुरा। यजन्यां देवयानी च शुक्रस्य दुहिताइभवत् ८४

English

The universe is in it. It originates from Brahman. It is Brahman itself. It is due to the ignorance of Brahman that the universe appears. When Brahman is realised there is no universe.

अध्याय 103

श्लोक 20

क्षीणदेहस्तु तिष्ठामि ह्यशक्तो ऽहं महाव्रते ।तेन शोचामि चात्मानं रहस्यं कथितं मया

kṣīṇadehastu tiṣṭhāmi hyaśakto 'haṃ mahāvrate / tena śocāmi cātmānaṃ rahasyaṃ kathitaṃ mayā

हिन्दी अर्थ

विश्वरूपानुजश्रापि विश्वकर्मा यमः स्मृतः ८५ भगोस्तु भुगवो देवा जज्ञिरे दुवादशा55त्मजाः । देव्यां तान्सुषुबे सर्वान्काव्यश्चेवा55तमजान्प्रभुः

English

The universe is explained as Asalya (unreal), Ja<fa (insentient), Duhkha (cause of misery) and Auaslu (unreal, un¬ substantial). The opposite of it is Saccidamndamurti— the embodiment of existence, knowledge and bliss.

अध्याय 103

श्लोक 21

अनसूयोवाच: भर्तुः पतिव्रता नारी रतिपुत्रविवर्धिनी ।त्रिवर्गसाधना सा च श्लाघ्या च विदुषां जने

anasūyovāca: bhartuḥ pativratā nārī ratiputravivardhinī / trivargasādhanā sā ca ślāghyā ca viduṣāṃ jane

हिन्दी अर्थ

इत्येते भुगवो देवा: स्मृता द्वादश याज्ञिका: । पौलोम्यजनयत्पुत्न॑ ब्रह्मिष्ठं बसिनं विभुम् 'पैदद

English

It is called Vifva when the individual soul is in the wakeful state. It is remembered as Taijasa when the individual is in a state of dream. It is called Prajna when the individual soul is in the state of dreamless slumber. 2 It persists in all the states.

अध्याय 103

श्लोक 22

जपस्तपस्तीर्थयात्रा मृडेज्यामन्त्रसाधनम् ।देवताराधनं चैव स्त्रीशूद्रपतनानि षट्

japastapastīrthayātrā mṛḍejyāmantrasādhanam / devatārādhanaṃ caiva strīśūdrapatanāni ṣaṭ

हिन्दी अर्थ

से कहा कि मैं इन्हीं लोगों के द्वारा तुमसे यज्ञ करवाऊँगा। इन्द्र की बातें सुनकर वे लोग वहाँ से पलायन कर गये ।७७०८०। उन लोगों के छिप जाने पर उनकी धर्मंपत्नी चेतना को पुरस्कारों से प्रलोभित कर इन्द्र ने अनुगसन किया। तदनस्तर इन्द्र के विमाद्यार्थ यदन करते हुए वे यति (संन्यास्री) वेश में उसी स्थान पर पुनः आये, वहाँ पथ उन दुरात्माओं को आया देख इन्द्र ने संहार कर दिया और स्वयं देबदेव के यज्ञ को दक्षिण वेदी पय शयन किया । वहाँ पर शाला में रहनेवात्रे गीदज्ञों ओर कुत्तों द्वारा भक्षण करते समय उन बरुत्रीपत्नों के शिर गिरकर खजूर के रूप में परिणत हुए। इस प्रकार प्राचोन काल में वसरुत्री के पुत्रों का इन्द्र द्वारा संहार किया गया । यजनी ( जयन्ती ) नामक पत्नी में शुक्र की पुत्री देवयानी की उत्पत्ति हुई ।5१-५४। विरोचन की कन्या यशोधरा में त्वष्टा के तीन शिरवाले विश्वरूप एवं उनके अनुज महान्

English

It is the eye of eyes. It is the ear of ears. It is the Tvac (skin, i.e, organ of touch) of all Tvacs. It is the tongue of tongues. They consider it the Prana (vital breath) of Pranas.

अध्याय 103

श्लोक 23

ईदृशं तु महादोषं स्त्रीणां तु व्रतसाधने ।वदन्ति मुनयः सर्वे यथोक्तं वेदभाषितम्

īdṛśaṃ tu mahādoṣaṃ strīṇāṃ tu vratasādhane / vadanti munayaḥ sarve yathoktaṃ vedabhāṣitam

हिन्दी अर्थ

यशस्वी विश्वकर्मा की यमज (जुड़वा) उत्पत्ति हुई। भुगु के बारह पुत्र उत्पस्त हुए जो भृगुगणदेव के नाम से प्रसिद्ध हैं। भगवान् काव्य ने देवी में उन सभी आत्मजों को उत्पन्न किया । जिनके नाम भुवन, भावन, अन्य, अन्यायत, क्रतु, श्रवा, मूर्धा, व्यजय, व्यश्रुष, प्रसव, अज एवं अधिपति स्मरण किये गये हैं। ये बारह भूगुपुत्र बारह याज्ञिक देवगणों के नाम से विख्यात हैं ।५५-८७३। पुलोमा की पुत्री पौलोमी ने ब्रह्मनिष्ठ

English

Human beings are incapable of knowing precisely and attaining it by means of intellect, worldly knowledge, vital breath or physical activity for ever.

अध्याय 103

श्लोक 24

अनुज्ञाता त्वया ब्रह्मंस् तपस् तप्स्यामि दुष्करम् ।पुत्रार्थित्वं समुद्दिश्य तोषयामि सुरोत्तमान्

anujñātā tvayā brahmaṃs tapas tapsyāmi duṣkaram / putrārthitvaṃ samuddiśya toṣayāmi surottamān

हिन्दी अर्थ

जितेरिद्रिय परम प्रभावशाली पृन्र को उत्पन्न किय। । किसी कठोर कर्म के कारण पौलोमी का वह गर्भ आठवें हृदमर्ध नास्ति क. पुस्तके ।

English

Just as snake (is misconceived as such) in the rope, mirage as water in the desert, and blueness in the sky is super¬ imposed due to ignorance, so also the non-existing universe is superimposed on Brahman and hence it simply appears to exist.

अध्याय 103

श्लोक 25

अत्रिरुवाच: साधु साधु महाप्राज्ञे मम संतोषकारिणि ।आज्ञाता त्वं मया भद्रे पुत्रार्थं तप आश्रय

atriruvāca: sādhu sādhu mahāprājñe mama saṃtoṣakāriṇi / ājñātā tvaṃ mayā bhadre putrārthaṃ tapa āśraya

हिन्दी अर्थ

तस्य तुर्वो ऋषिजेशे ऊरू भित्वा महायशा: । ओवंश्रा5:सोद्चीकस्तु दोप्ता्निसद्शप्रभः ६६२

English

The vast sky appears to be different inasmuch as it is restricted by jars etc. Similarly the Jiva is the restricted form of the all-pervading soul, restricted through the karya (product e.g. the physical body).

अध्याय 103

श्लोक 26

देवतानां मनुष्याणां पित्ःणामनृणो भवे ।न भार्यासदृशो बन्धुस्त्रिषु लोकेषु विद्यते

devatānāṃ manuṣyāṇāṃ pitḥṇāmanṛṇo bhave / na bhāryāsadṛśo bandhustriṣu lokeṣu vidyate

हिन्दी अर्थ

जमनाह्ृष्णवस्याग्नेजंमदग्निरजायत । रेणका जमदर्नेस्तु शक्नतुल्यपराक्तमम् ॥॥ ब्रह्मक्षत्रमयं राम सुषुवेडसिततेजसम् ६४ औवस्या5इसी त्पुत्रशतं जमदग्निपुरोगमम् । तेषां पुत्रसहस्नाणि भागंवाणां परस्परात् ६५ देवाश्वाडरिरसो मुख्यास्त्विषुमन्तो महौजसः ६७

English

A partial quotation from Vasugupta's Spanda-Karika 1, but attributes this creation and destruction of the Universe to Siva's Para Sakti—an attempt to adapt aTrika Saiva concept and adopt it in Kevalddvaita.

अध्याय 103

श्लोक 27

तेन देवाः प्रशंसन्ति न भार्यासदृशं सुखम् ।सन्मुखे मन्मुखाः पुत्राः विलोमे तु पराङ्मुखाः

tena devāḥ praśaṃsanti na bhāryāsadṛśaṃ sukham / sanmukhe manmukhāḥ putrāḥ vilome tu parāṅmukhāḥ

हिन्दी अर्थ

मास में व्याधिग्रस्त होकर गिर पड़ा, अतः च्यवन (गिर जाने) के कारण उसका च्यवन नाम पड़ा और प्रचेतस से चेतन हुआ। प्राचेतस च्यवन के क्रीध से पुरुषदाज ने अध्वाको'"”“““ (?) उन भृगु पुत्र च्यबन ने सुकन्या नामक अपनी धमंपत्नी में सत्पुरुषों द्वारा परम सम्मानतीय आत्मवान् और दधीच नामक दो पुत्रों को उत्पन्न किया । सरस्वती में दधीच के संयोग से सारस्वत नामक पुत्र की उत्पत्ति हुई। नहुष की पुत्री महाभाग्य-

English

The terras Taijasa, Prajna etc. used here are of Upani$adic antiquity {vide Mantfukya U , 10 and 11).

अध्याय 103

श्लोक 28

तेन भार्यां प्रशंसन्ति सदेवासुरमानुषाः ।महाव्रते महाप्राज्ञे सत्त्ववति शुभेक्षणे

tena bhāryāṃ praśaṃsanti sadevāsuramānuṣāḥ / mahāvrate mahāprājñe sattvavati śubhekṣaṇe

हिन्दी अर्थ

शालिनी रुची आत्मवान् की पत्नी थी ।८८-९१॥ आत्मवान् के ऋषि उरू नामक महायशस्वी पुत्र जंधाओं को फाड़कर उत्पन्न हुआ। उस उवे का पृत्र ऋचीक हुआ जो भ्रज्वलित अग्ति के समान परम तेजस्वी था । ऋचीक मुनि की सत्यवती नामक स्त्री में जमदर्ति ऋषि उत्पन्न हुए। भृगु कृत रुद्र ओर विष्णु के चर में विपयंय हो जाने के कारण वेष्णव अग्नि के रुद्र अंश के भक्षण के कारण ज॑मदग्नि ऋषि उत्पन्न हुए । जमदग्नि के संयोग से रेणुका ने इस्द्र के समान पराक्रमी, परम तेजस्वी ब्रह्मनल से संयुक्त परशुराम को उत्पन्त किया । उव के पुत्र ऋचीक के एक सौ पुत्र थे, जिनमें जमदग्नि सबसे बड़े थे। उन सौ पुत्रों के एक सहस्र पुत्र हुए। उन सभी भगुवंशीय ऋषियों के वंशज परस्पर अन्यान्य ऋषियों के वंशजों से बाह्य विवाहादि कार्यों में योग्य माने गये हैं। वत्स, विश्व, अश्विषेण, पाण्ड, पथ्य, और शौतक--इन सात गोत्रों

English

Verses 4-1-55 show the influence of the Radha- Krsna cult or Bhagavatism.

अध्याय 103

श्लोक 29

तपस्तपस्व शीघ्रं त्वं पुत्रार्थं तु ममाज्ञया ।एतद्वाक्यावसाने तु साष्टाङ्गं प्रणताब्रवीत्

tapastapasva śīghraṃ tvaṃ putrārthaṃ tu mamājñayā / etadvākyāvasāne tu sāṣṭāṅgaṃ praṇatābravīt

हिन्दी अर्थ

में भागवगण विभक्त भाने जाते हैं ।९२-९६। अरब अग्नि के पुत्र, परम बुद्धिमान् अंग्रिरा के वंश का वृत्तान्त सुनिये, जिसके गोत्र में परम तेजस्वी भारद्वाज, गौतम, एवं इषुमानू नामक मुख्य देवगण उत्पन्न हुए हैं।

English

He sports in the world called Goloka which is Brah¬ man itself, the Cil alone, free from difference and Gunas. I have heard it so.

अध्याय 103

श्लोक 30

त्वत्प्रसादेन विप्रेन्द्र सर्वान्कामानवाप्नुयाम् ।हंसलीलागतिः सा च मृगाक्षी वरवर्णिनी

tvatprasādena viprendra sarvānkāmānavāpnuyām / haṃsalīlāgatiḥ sā ca mṛgākṣī varavarṇinī

हिन्दी अर्थ

५६० द वायुपुराणम् सुरूपा चेव मारोची कार्दमी च तथा स्व॒राट । पथ्या व सानवी कन्या तिस्रो भारयस्त्वथर्वणः ॥

English

There is nothing greater than He as mentioned in Nigamas and Agamas. Still the Vedas say that he is beyond and greater than Aksara.

अध्याय 103

श्लोक 31

नियमस्था ततो भूत्वा सम्प्राप्ता नर्मदां नदीम् ।शिवस्वेदोद्भवां देवीं सर्वपापप्रणाशनीम्

niyamasthā tato bhūtvā samprāptā narmadāṃ nadīm / śivasvedodbhavāṃ devīṃ sarvapāpapraṇāśanīm

हिन्दी अर्थ

अथवंणस्तु दायादास्तासु जाता: कुलोद्बहाः । उत्पन्ना महता चंव तपसा भावितात्मनामू

English

The lord who is the resident of Goloka is called greater than Aksara. Who is this always spoken by the Vedas as beyond even that?

अध्याय 103

श्लोक 32

यस्या दर्शनमात्रेण नश्यते पापसञ्चयः ।स्नानमात्रेण वै यस्या अश्वमेधफलं लभेत्

yasyā darśanamātreṇa naśyate pāpasañcayaḥ / snānamātreṇa vai yasyā aśvamedhaphalaṃ labhet

हिन्दी अर्थ

बहस्पतिः सुरूपाया गोतभः सुषुवे स्व॒राद् । अवन्ध्यं वामदेव च उतथ्यसुशिजं तथा ११०० धिष्णु: पुत्रस्तु पथ्यायां संबतेंश्चंव मानसः । घिचित्तश्र तथा यस्‍्य शरद्ांश्वाप्युतथ्यज: अशिजो दी्घंतमा बृह॒दुत्थो वामदेवज: । धिष्णोः पुत्र: सुधन्वान ऋषभश्न सुधन्वन: १०२

English

How is the special meaning, that which is indicated by the words of the Vedas to be known? Is the text of the Veda to be interpi eted otherwise as it implies more than recorded in words (?)

अध्याय 103

श्लोक 33

ये पिबन्ति महादेवि श्रद्दधानाः पयः शुभम् ।सोमपानेन तत्तुल्यं नात्र कार्या विचारणा

ye pibanti mahādevi śraddadhānāḥ payaḥ śubham / somapānena tattulyaṃ nātra kāryā vicāraṇā

हिन्दी अर्थ

. रथकारः स्मृता देवा ऋषयो ये परिश्रुता: । बृहस्पतेयंबीयांसो विश्वुते: सुमहायशाः १०३ अडुगिरसस्तु संवर्तो देवानड्रिरसः शुणु । बृहस्पतेयवीयांसो देवा ह्याड्भिरसः स्मृताः

English

Vyasa, the son of Satyavatl, became doubtful as to the meaning of the Sruti. He pondered over it for a long time. He could not understand it precisely.

अध्याय 103

श्लोक 34

ये स्मरन्ति दिवा रात्रौ योजनानां शतैरपि ।मुच्यन्ते सर्वपापेभ्यो रुद्रलोकं प्रयान्ति ते

ye smaranti divā rātrau yojanānāṃ śatairapi / mucyante sarvapāpebhyo rudralokaṃ prayānti te

हिन्दी अर्थ

अयस्यस्तु उतथ्यश्व वामदेवस्तथोसिज: । भारद्वाजाः शांकृतिका गाग्यंकाण्वरथीतराः आड़्िरस अथर्वा की मरीचि नन्दिनी सुरूपा, कर्दम पुत्री स्वराद तथा मनुकल्या पथ्या नामक तीन स्त्रियाँ थीं, उनमें होनेवाली सन्ततियों का विवरण बतला रहा हूं, अथर्वा के वंशोद्धारक उन उत्तराधिकारियों का, जो परम पूजनीय अंगिरा की परम तपस्या के फलस्वरूप उत्पन्न हुए थे, वर्णन कर रहा हूँ, सुरूपा में बृहस्पति का जन्म हुआ, स्वराट् ने गौतम को जन्म दिया +६७-६६ टै। अवन्ध्य, वामदेव, उशिज उतथ्य ओर

English

Even after deliberating (long) the sage did not arrive at the decisive meaning of the Vedic passage. The Veda is Narayana himself, where even great sages (poets) become confounded.

अध्याय 103

श्लोक 35

नर्मदायाः समीपे तु तावुभौ योजनद्वये ।न पश्यन्ति यमं तत्र ये मृता वरवर्णिनि

narmadāyāḥ samīpe tu tāvubhau yojanadvaye / na paśyanti yamaṃ tatra ye mṛtā varavarṇini

हिन्दी अर्थ

धिष्ण ये पथ्या में उत्पन्न हुए, ऑर संबर्त तथा विचित्त उसके मानस पुत्र हुए। उतथ्य के पुत्र शरह्वान हुए । उशिज के पुत्र दीघंतमा तथा वामदेब के पुत्र बृहदुत्थ हुए । धिष्णु के पुत्र सुधन्वा ओर सुधन्वा का पृत्र ऋषय हुआ । और ऋषय के रथकार नामक देवगण तथा परम विख्यात ऋषिगण पूत्र रूप में हुए । बृहस्पति के पुत्र महान यशस्वी एवं परम विख्यात भारद्वाज हुए ।१००-१०३। आउज्लिरस के संवर्त नामक जो पूत्र थे उनकी संततियाँ

English

Still he underwent great distress of the heart. Then he thought: 'Whom shall I approach? What shall I do?

अध्याय 103

श्लोक 36

ततस्तदुत्तरे कूले एरण्ड्याः सङ्गमे शुभे ।नियमस्था विशालाक्षी शाकाहारेण सुन्दरि

tatastaduttare kūle eraṇḍyāḥ saṅgame śubhe / niyamasthā viśālākṣī śākāhāreṇa sundari

हिन्दी अर्थ

देवगणों में परिगणित हैं, उत आंगिरस गोत्रीय देवताओं का विवरण सुनिये। बृहस्पति के छोटे भाई वे आंगिरस गोत्रीय देवगण माने जाते हैं। वे आंगिरस गोत्रीय देवणण सुरूपा के औरस पुत्र रूप में उत्पन्न हुए थे उनकी संख्या दस है तथा उनके नाम औरस, आंयु, दनु, दक्ष, दर्भ, प्राण, हविष्मान्, हंविष्णु क्रु ओर सत्य है । अयस्य, उतथ्य, वामदेव, भारद्वाज गोजोय शांकृतिक, गाग्य, काण्व, रथीतर, मुद्गल, विष्णुवृद्ध, हरित, वायव, भारद्वाज गोत्रीय भाक्ष, आर्षभ और किभय--पये पनद्रह अंगिरा के गमोनीय हैं, जो अन्यान्य ऋषियों के गोत्रों स विवाहादि सम्बन्धों में अंगीकार किये गये हैं। अंगिरा के गोत्र में उत्पन्‍्न होनेवालों की संख्या

English

I do not see anyone in this world who is omniscient and who sees everything.' After not knowing anyone in the world who could clear his doubts he went to a cave in Meru and performed a great penance. There was a beautiful forest there. Although there was blinding darkness within, the rocks shed a golden brilliance everywhere.

अध्याय 103

श्लोक 37

तोषयन्ती त्रींश्च देवाञ्छुभैः स्तोत्रैर् व्रतैस्तथा ।ग्रीष्मेषु च महादेवि पञ्चाग्निं साधयेत् ततः

toṣayantī trīṃśca devāñchubhaiḥ stotrair vrataistathā / grīṣmeṣu ca mahādevi pañcāgniṃ sādhayet tataḥ

हिन्दी अर्थ

फश्यपः सवितुविद्वांस्तेन स ब्रह्मण: समः । मन्वन्तरेषु सर्वेषु ब्रह्मणांड्शेन जायते

English

The forest was resonant with the chirping sounds of the birds among the groves of the different trees and creepers. It was devoid of the sufferings due to hunger, thirst, fear, anger, distress and dejection. Ponds and tanks beautified with lotuses abounded there. Their banks were set with golden slabs on which the birds moved about. It was served by the winds wafting the fragrance from the lotuses. It was devoid of beasts of prey. It was frequented by animalshaving auspicious nature. The place was devoid of crowds of people. It was embellished

अध्याय 103

श्लोक 38

वर्षाकाले चार्द्रवासाश्चरेच्चान्द्रायणानि च ।हेमन्ते तु ततः प्राप्ते तोयमध्ये वसेत्सदा

varṣākāle cārdravāsāścareccāndrāyaṇāni ca / hemante tu tataḥ prāpte toyamadhye vasetsadā

हिन्दी अर्थ

“हाश्चेकसा हि विज्ञेया वाइसनः कश्य उच्यते । कश्यं मद्यं स्मृतं विप्रेः कश्यपानात्तु कश्यप: करोति नाम यद्वाचो वा क्रमुदाहृतम् । दक्षाभिशप्तः कुपितः कश्यपस्तेन सोभवत्

English

The sage entered that cave. After attaining full con¬ trol over his mind, posture and urge for food, he meditated on the four Vedas with great concentration.

अध्याय 103

श्लोक 39

प्रातःस्नानं ततः सन्ध्यां कुर्याद् देवर्षितर्पणम् ।देवानामर्चनं कृत्वा होमं कुर्याद् यथाविधि

prātaḥsnānaṃ tataḥ sandhyāṃ kuryād devarṣitarpaṇam / devānāmarcanaṃ kṛtvā homaṃ kuryād yathāvidhi

हिन्दी अर्थ

बहुत अधिक बतलाई गई है ।१०४-१०८। उत्तम पुरुषों वाले मरीचि-पत्रों के वंश का वर्णन अब मैं कर रहा हूं जिसके बंश में समस्त स्थावर जंगम जगत् की उत्पत्ति हुईं । सर्वप्रथम मरीचि ने जल की कामला की ओर सनन्‍्तति की ६च्छा से उसी के द्वारा ध्यान मग्न हुए। 'सभी सदगुणों से सम्पन्न सन्ततिवान् शुभ- रुचिवाले पुत्र की उत्पत्ति से लोक में प्रतिष्ठा बढ़ती है! इस प्रकार की भावना प्रभु मरीचि के मन्र में

English

Even as he was meditating, three hundred ycais passed and then the four Vedas of beautiful appearance 1 stood in front of him. Their eyes were resplendent like the petals of the lotus. Their heads were embellished with matted hair like coronets. Sacred Kusa grass was held in the fists ot their lotus-like hands. Their shoulders were adorned with deer skin. The splendour of their mouths was heightened by means of the sixteen Svara (vowel) sounds intersprsed with Prcmava (Om). Their hands with five fingers to each were constituted bv the letters of the guttural and the palatal classes of conso¬ nants. Their right legs were constituted by the labial class consonants and the left legs consisted of the letters of the dental. The sides of their belly were constituted of intermediate and last consonants (of each group). The letter jVa constituted their navels. Their backs were refulgent (The letters ending with Ka constituted their backs). The letter Ma was their stomach. The letters Ta,Ra, La and Va were their tied up hair (tresses). Agnibija (the seed-like Mantra of Agni) shone in their right shoulders. The Dhard (Bija ) (the seed-like Mantra of the earth) was their neck and the Bhtta (? Mantra) shone on their (left) shoulders.

अध्याय 103

श्लोक 40

यजते वैष्णवांल् लोकान् स्नानजाप्यहुतेन च ।एवं वर्षशते प्राप्ते रुद्रविष्णुपितामहाः

yajate vaiṣṇavāṃl lokān snānajāpyahutena ca / evaṃ varṣaśate prāpte rudraviṣṇupitāmahāḥ

हिन्दी अर्थ

हुई !०६-११०। तदनन्तर मरीचि के आवाहन करने पर सभी जल समूह उसके समोप उपस्थित हुए । भगवान् मरीचि ने उस जल राशि में निवास किया । उसमें स्थित हो परम ऐब्वर्यशाली मरीचि ने पुत्र की कामना कर जितेन्द्रिय एवं अनृपम तेजस्वी अरिष्टनेमि नामक पूत्र को उत्पन्त किया, जो प्रजापति हुआ । मरीचि का वह पुत्र सूय॑ के समान तेजस्वी “”““”“(?) उत्पन्न हुआ । जलराशि में स्थित होकर सज्जनों की कल्याणदायिती बाणी का विशेष ध्यान करते हुए मरीचि सात सह्न वष तक स्थित रहे जिससे उनका वह पुत्र अनृपम हुआ (उसी अरिष्टनेमि का दूसरा नाम कश्यप था) कश्यप सविता के जनक थे । अत: उनकी महत्ता ब्रह्म के समान थी। सभी मस्वन्तरों में वे ब्रह्म के अंथ से अवतीर्ण होते हैं

English

Their joints consisted of the A ntahstha (semi-vowel) letters. They were throbbing with Vaikhari speech. He saw (the city of) Mathura marked in their lotus-like hearts.

अध्याय 103

श्लोक 41

सम्प्राप्ता द्विजरूपैस्तु एरण्ड्याः सङ्गमे प्रिये ।पुरतः संस्थितास्तस्या वेदमभ्युद्धरन्ति च

samprāptā dvijarūpaistu eraṇḍyāḥ saṅgame priye / purataḥ saṃsthitāstasyā vedamabhyuddharanti ca

हिन्दी अर्थ

दक्ष ने कन्या के लिये जब सभी प्रजाओं को अप्रसन्‍त्र और कुषित कर दिया तब उन्होंने (अरिष्टनेमि) कश्य (मद्य ) का पान किया । कदय मद्य को कहते हैं। हाश्वेकस।(?) भी कश्य कहा जाता है । वचन और मत को कश्य कहते हैं। ब्राह्मणों ने कश्य मद्य को कहा है और उसी कश्य (मद्य ) के पीने के कारण कश्यप ताम पड़ा कन्या के लिए दक्ष द्वारा तिरस्कृत होकर उन्होंने कुपित होकर कठोर वाकयों का प्रयोग किया

English

Indeed that is the holy centre of the manifestation of Lord Hari himself. He saw (the holy place) KasI in the middle

अध्याय 103

श्लोक 42

अनसूया जपं त्यक्त्वा निरीक्ष्य तान्मुहुर्मुहुः ।उत्थिता सा विशालाक्षी अर्घं दत्त्वा यथाविधि

anasūyā japaṃ tyaktvā nirīkṣya tānmuhurmuhuḥ / utthitā sā viśālākṣī arghaṃ dattvā yathāvidhi

हिन्दी अर्थ

ऋइदमर्घ नास्ति झ. पुस्तके । . तस्माच्च कश्यपेनोक्तों ब्रह्मणा परमेष्ठिना । + तस्माहक्ष: कश्यपाय कन्यास्ता: प्रत्यपद्यत ॥

English

A beautiful yet significant description of the personality of the Vedas. The vision of seven holy cities, important or major sacrifices, four sacred fires on their person is interesting as it shows t:.e attritude of the author to synthesize Puranic and Vedic traditions.

अध्याय 103

श्लोक 43

अद्य मे सफलं जन्म अद्य मे सफलं तपः ।दर्शनेन तु विप्राणां सर्वपापैः प्रमुच्यते

adya me saphalaṃ janma adya me saphalaṃ tapaḥ / darśanena tu viprāṇāṃ sarvapāpaiḥ pramucyate

हिन्दी अर्थ

सर्वाश्वि ब्रह्मवादिन्य: सर्वास्ता लोकमातर: ११८

English

He saw the city of Kanci in the region of their penis; the city of AvantI in the navel region; the city of Dvaraka in the region of the neck and the city of Prayaga in the region of Prana (vital air).

अध्याय 103

श्लोक 44

प्रदक्षिणं ततः कृत्वा साष्टाङ्गं प्रणताब्रवीत् ।कन्दमूलफलं शाकं नीवारानपि पावनान् ।प्रयच्छाम्यहमद्यैव मुनीनां भावितात्मनाम्

pradakṣiṇaṃ tataḥ kṛtvā sāṣṭāṅgaṃ praṇatābravīt / kandamūlaphalaṃ śākaṃ nīvārānapi pāvanān / prayacchāmyahamadyaiva munīnāṃ bhāvitātmanām

हिन्दी अर्थ

धारणाच्छवणाच्चेव सवंपाप: प्रम्मुच्यते आत्मान व्यभजच्छीमान्मनुष्योरगराक्षसान् । देवासुरसगन्धर्वान्दिव्यसंहननप्रजान् ॥॥ ईश्वरानात्सनस्तुल्यान्कपद्रविणतेजसा फ

English

To their left and right flowed the rivers Ganga and Yamuna. In the middle flowed the river Sarasvati itself. The holy centre of Gaya was in the facial region.

अध्याय 103

श्लोक 45

विप्रा ऊचुः ।तपसा तु विचित्रेण तपःसत्येन सुव्रते ।तृप्ताः स्म सर्वकामैस्तु सुव्रते तव दर्शनात्

viprā ūcuḥ / tapasā tu vicitreṇa tapaḥsatyena suvrate / tṛptāḥ sma sarvakāmaistu suvrate tava darśanāt

हिन्दी अर्थ

था अतः कश्यप नाम से विख्यात हुए। परमेष्ठी ब्रह्मा के अनुरोध पर एवं कश्यप की प्रार्थना पर दक्ष ने अपनी कन्याएँ कदयप को सौप दीं, वे दक्ष-कन्याएँ ब्रह्मगादिनी एवं लोकमाता थीं। ११५०११८। इस परम पवित्र पुषण्यदायी वारुण सृष्टि के वृत्तान्त को जो जानता है वह दीर्घायु-सम्पन्न, पृण्यवान्, पवित्रात्मा परमानन्द को प्राप्त करता है। इस वृत्तान्त को घारण करनेवाले तथा सुननेवाले सभी पापों से मुक्त हो जाते हैं। तदनन्तर

English

The excellent holy centre of Prabhasa was in the middle of the neck and the chin. He saw the hermitage of Badaryasrama in their Brahmarandhra (cerebral aperture).

अध्याय 103

श्लोक 46

अस्माकं कौतुकं जातं तापसेन व्रतेन यत् ।स्वर्गमोक्षसुतस्यार्थे तपस्तपसि दुष्करम्

asmākaṃ kautukaṃ jātaṃ tāpasena vratena yat / svargamokṣasutasyārthe tapastapasi duṣkaram

हिन्दी अर्थ

उन ऋषियों ने रोमहर्षण सूतजी से पुनः पूछा, है सूतजी ! छठवें चाक्षुष मन्वस्तर की समाप्ति हो जाने पर यह बेवस्वत मन्वन्तर किस भाँति प्रवृर्त होता है ? इसे बताइये ।!१६-१२०। सूत ने कहा--इस बैवस्वत मन्वन्तर के उपस्थित होने पर 'प्रजाओं की सृष्टि करो'--स्वयंभू ब्रह्मा की इस आज्ञा पर दक्ष प्रजापति ने चर अचर सभी प्रकार के जीव समूहों की सृष्टि की । उस समय वे जरायुज, अण्डज, उद्भिज्ज और स्वेदज चारों प्रकार को प्रजाओं की सृष्टि के लिये प्रवत्त हुए

English

The holy seats of Paundravardhana -(Pandua) (Malda District) and Nepala were seen in the two eyes. The seat named Purnagiri was seen on the forehead,

अध्याय 103

श्लोक 47

अनसूयोवाच: तपसा सिध्यते स्वर्गस्तपसा परमा गतिः ।तपसा चार्थकामौ च तपसा गुणवान्सुतः ।तप एव च मे विप्राः सर्वकामफलप्रदम्

anasūyovāca: tapasā sidhyate svargastapasā paramā gatiḥ / tapasā cārthakāmau ca tapasā guṇavānsutaḥ / tapa eva ca me viprāḥ sarvakāmaphalapradam

हिन्दी अर्थ

ओर दस सहल्न॒ बष तक अति घोर तपस्या में निरत रह अणिमा आदि सिद्धियों तथा योगबल से समुत्पत्न होकर उन्होंने अपने शरीर को मनुष्य, सर्प, राक्षस, देव, असुर, गन्धवं प्रभृति दिव्य प्रजाओं तथा सम्पत्ति

English

The holy seat (Pltha) of Mathura was seen in the neck. The seat of Kanci was stationed in the hips. The Pltha of Jalandhara was seen in the region of the breasts,

अध्याय 103

श्लोक 48

विप्रा ऊचुः ।तन्वी श्यामा विशालाक्षी स्निग्धाङ्गी रूपसंयुता ।हंसलीलागतिगमा त्वं च सर्वाङ्गसुन्दरी

viprā ūcuḥ / tanvī śyāmā viśālākṣī snigdhāṅgī rūpasaṃyutā / haṃsalīlāgatigamā tvaṃ ca sarvāṅgasundarī

हिन्दी अर्थ

+ इंदमर्ध नास्ति घ. पुस्तके । एतदधंस्थानेध्यं इलोक:--देवासु रगन्धर्वान्मनुष्यो रगराक्षसान् । समानवानेतान्सर्वान्दिव्यसंहुननप्रजान् । इति ख. ग. घ. ह. पुस्तकेष । ऋषीन्‍देवान्सगन्धर्वान्मनुष्यो रगराक्षसान । यक्षभतपिशाचांश्व वयःपशुमृगांस्तथा -

English

The Pitha called Bhrgu was in the region of the ears; the city of Ayodhya was in the cup of the nose. The holy centre Brahmya was stationed in the cerebral aperture; the holy centre Saiva was in the partition on the crown of the head.

अध्याय 103

श्लोक 49

किं च ते तपसा कार्यमात्मानं शोच्यसे कथम्

kiṃ ca te tapasā kāryamātmānaṃ śocyase katham

हिन्दी अर्थ

सेथुनेन च भावेन सिसुक्षुबिविधाः प्रजा: । असिक्‍नों चावह॒त्पत्नों वीरणस्य प्रजापते: १२८ सु्ता सुमहता युक्तां तपसा लोकधारिणीम् । यया धृतमिदं सर्े जगत्स्थावरजइःगमम्

English

The holy centre Sakta was situated on the tip of the tongue. The holy Vaisnava centre was in the lotus of the heart; the holy centre of the Sun was situated in the region of the eyes and all Bauddha (Buddhistic) holy centres were stationed in the shadows.

अध्याय 103

श्लोक 50

अनसूयोवाच: यदि रुद्रश्च विष्णुश्च स्वयं साक्षात्पितामहः ।गूढरूपधराः सर्वे तच्चिह्नमुपलक्षये

anasūyovāca: yadi rudraśca viṣṇuśca svayaṃ sākṣātpitāmahaḥ / gūḍharūpadharāḥ sarve taccihnamupalakṣaye

हिन्दी अर्थ

अत्राप्युदाहरन्तीमो श्लोकौ प्राचेतसे प्रति । दक्षस्योहहतो भार्यामसिकक्‍्नी बोरणीं पराम्॥ तें दृष्ट्वा ऋषिन्नि: प्रोक्‍्तं प्रतिष्ठास्यति वे प्रजा: । प्रथमा5न्र द्वितीया तु दक्षस्थेह प्रजापते: ॥

English

He saw the Sautramani Yajna in the region of the neck; the Pasubandha in the chest. He saw the Vajapeya sacri¬ fice in the region of the buttocks and the Agnihotra in the mouth (Pface).

अध्याय 103

श्लोक 51

तस्या वाक्यावसाने तु स्वरूपं दर्शयन्ति ते ।स्वस्वरूपैः स्थिता देवाः सूर्यकोटिसमप्रभाः

tasyā vākyāvasāne tu svarūpaṃ darśayanti te / svasvarūpaiḥ sthitā devāḥ sūryakoṭisamaprabhāḥ

हिन्दी अर्थ

तथा«£गच्छद्यथाकालं कपानां नियुते तु सः। असिक्‍नीं वरिणों यत्र दक्ष: प्राचेतसो5वहत् १३३ अथ पुत्रसहल्न' स वरिण्याससितौजसा । असिवन्यां जनयामास दक्ष: प्राचेतस: प्रभः

English

He saw Asvamedha in the region of the buttocks and Naramcdha (human sacrifice) in the belly. He saw Rajasuya in the region of the head and Avasathya in the lower lip.

अध्याय 103

श्लोक 52

चतुर्भुजो महादेवि शङ्खचक्रगदाधरः ।अतसीपुष्पवर्णस्तु पीतवासा जनार्दनः

caturbhujo mahādevi śaṅkhacakragadādharaḥ / atasīpuṣpavarṇastu pītavāsā janārdanaḥ

हिन्दी अर्थ

सौन्दर्य एवं तेज में अपने ही समान परम ऐद्वर्यशाली, विभूतियों के रूप में विभक्त किया। इस प्रकार उस समय अति प्रमुदित होकर इन सबों के अतिरिक्त विविध प्रजाओं को सृष्टि की अभिलाषा में अन्यानन्‍््य चराचर जीव जस्तुओं को मानसिक संकल्पों द्वारा उत्पन्न कर ऋषियों, देवताओं, गन्धवों, मनुष्यों, सर्पों, राक्षसों, यक्षों, भतों, पिशाचों, पक्षियों, पशुओं तथा मृगादिकों को भी उत्पन्न किया। १२३-१२६। किन्तु मानसिक संकल्प द्वारा सृष्टिकमं करने पर जब प्रजाओं की यश्रेष्ट वृद्धि नहीं हुई तब परम बुद्धिमान भगवान् महादेव के बुरा भला कहने पर सम्भोग कम द्वारा विविध प्रजाओं की सृष्टि का विचार किया और इसके लिए वीरण नामक प्रजापति की पुत्री असिल्‍नी को पत्नी के रूप में अंगीकार किया, वह असिक्‍नी अपनी घोर तपस्था के बल से समस्त लोक का पालन करनेवाली तथा समस्त स्थ। वर जगात्मक जगन्मण्डल को धारण

English

He saw Daksinagni on the upper lip and the Garha- patya (fire) in the mouth. The Havya was in the ears. He saw the different Mantras stationed in the bodily hair. He saw the Vedas severally revered and honoured by the Puranas, Nyayas,

अध्याय 103

श्लोक 53

गरुत्मान्वाहनं यस्य श्रिया च सहितो हरिः ।प्रसन्नवदनः श्रीमान्स्वयंरूपो व्यवस्थितः

garutmānvāhanaṃ yasya śriyā ca sahito hariḥ / prasannavadanaḥ śrīmānsvayaṃrūpo vyavasthitaḥ

हिन्दी अर्थ

करनेवाली थी ।१२७-३२९। इस विषय में लोग प्राचेतस दक्ष के लिये इन दो श्लोकों (छुन्दों) को कहा करते हैं, जिनका आरोप इस प्रकार है। परम श्रेष्ठ वीरण की पुत्री असिक्नी को -उद्घाहित करते ( व्याहते) समय दक्ष ने दस लक्ष गमनशील अभिमानी कूपों का निर्माण किया, जो नदियों और पर्वतों में लीन हुए, ऐश्वयंशाली दक्ष ने उन सबों का अनुसरण किया। दक्ष को इस प्रकार परम ऐश्वर्यं सम्पन्त देखकर ऋषियों ने कहा

English

Since, O holy Sires, you have been visible to me, my birth is fruitful today. My mind is satisfied. My life (longevity)

अध्याय 103

श्लोक 54

पीतवासा महादेवि चतुर्वदनपङ्कजः ।हंसोपरि समारूढो ह्यक्षमालाकरोद्यतः

pītavāsā mahādevi caturvadanapaṅkajaḥ / haṃsopari samārūḍho hyakṣamālākarodyataḥ

हिन्दी अर्थ

कि इसके द्वारा प्रजाओं की प्रतिष्ठा होगी । इस प्रकार प्रजापति दक्ष की प्रथम सृष्टि सन्‍्तति रूप में तथा द्वितीय प्रजा में परिणत हुई । इस प्रकार दस लक्ष कपों का निर्माण कर यथासमय वीरण पुत्री असिकनी को दक्ष ने वरण किया । अमित तंजस्वी प्राचेतस दक्ष ने उस वीरण पुत्री असिक्नी में एक सहस्न पुत्रों को उत्पस्न किया । प्रजाओं की वृद्धि की इच्छा रखनेवाले उन दक्ष पुत्रों को देखकर ब्रह्मा के पूत्र कलहप्रिय देवषि तांस्तु दृष्ट्वा महातेजा: स विवर्धयिषून्प्रजा: । देवधिः प्रियसंवादों नारदो ब्रह्मणः सुतः ॥

English

Whatever there is whether worldly or divine, whatever is worth knowing whether past, present or future is not un¬

अध्याय 103

श्लोक 55

आगतो नर्मदातीरे ब्रह्मा लोकपितामहः ।यो ऽसौ सर्वजगद्व्यापी स्वयं साक्षान्महेश्वरः

āgato narmadātīre brahmā lokapitāmahaḥ / yo 'sau sarvajagadvyāpī svayaṃ sākṣānmaheśvaraḥ

हिन्दी अर्थ

यः स वे प्रोच्यते विप्र: कश्यपस्येति कृत्रिमः । दक्षशापभया:द्वीतो ब्रह्मषिस्तेन कर्म णा

English

You all are not the mere instructors of the path oi

अध्याय 103

श्लोक 56

वृषभं तु समारूढो दशबाहुसमन्वितः ।भस्माङ्गरागशोभाढ्यः पञ्चवक्त्रस्त्रिलोचनः

vṛṣabhaṃ tu samārūḍho daśabāhusamanvitaḥ / bhasmāṅgarāgaśobhāḍhyaḥ pañcavaktrastrilocanaḥ

हिन्दी अर्थ

यः कश्यपसुतस्थाथ परसेष्ठी व्यजायत । मानसः कश्यपस्येह दक्षशापभयात्पुनः ॥ १ ३७ तस्मात्स कश्यपस्याथ द्वितीय॑ मानसो5भवत् । स हि पृबंससुत्पन्नो नारदः परमेष्ठिन: तस्योद्यतस्तदा दक्ष: कूद्दों नाशाय वे प्रभु: । ब्रह्मर्षीन्व पुरस्कृत्य याचितः परमेष्ठिना १४० ततोभिसंधितं चक्रे दक्षस्तु परमेष्ठिना। कन्यायां नारदों महा तब पुत्रो भव भवत्विति

English

Your words of injunction and prohibition regarding the status of Brahman and the unreality of the universe are not based on attachment which is unreal. They are binding as the injunctions and prohibitions (?)

अध्याय 103

श्लोक 57

जटामुकुटसंयुक्तः कृतचन्द्रार्द्धशेखरः ।एवंरूपधरो देवः सर्वव्यापी महेश्वरः

jaṭāmukuṭasaṃyuktaḥ kṛtacandrārddhaśekharaḥ / evaṃrūpadharo devaḥ sarvavyāpī maheśvaraḥ

हिन्दी अर्थ

तारद ने उनके विनाशार्थ एवं अपने शाप के लिए उनसे दुष्ट परामर्श पूर्ण बातें कीं ।१३०-१३५। विप्रवर्य्य नारदजी, जिस कारण कश्यप के पुत्र कहे जाते हैं, उसका मूल कारण उनकी यही करतूत है ।. उस परामरां रूप निन्‍्धय काय के कारण दक्ष के शाप से भयभीत होकर ब्रह्मनिष्ठ ब्रह्मथि नारद कश्यप सुत के रूप में अवतीण्ण हुए । फिर दक्ष-शाप के भय से कश्यप के यहाँ मानसपुत्र रूप में अवतीर्ण होना उनका द्वितीय जन्म था ।

English

Hence the objects such as heaven etc. mentioned by yourselves have been censured by you, saying that they are of a perishable nature, while the truth is being explained by you, the benefactors of the worlds.

अध्याय 103

श्लोक 58

अनसूया निरीक्ष्यैतद्देवानां दर्शनं परम् ।वेपमाना ततः साध्वी सुरान्दृष्ट्वा मुहुर्मुहुः

anasūyā nirīkṣyaitaddevānāṃ darśanaṃ param / vepamānā tataḥ sādhvī surāndṛṣṭvā muhurmuhuḥ

हिन्दी अर्थ

ये नारदजी स्बंप्रथम परमेष्ठी ब्रह्मा-के पुत्र रूप में उत्पस्न हुए थे। प्राचीन काल में दक्ष प्रजापति के हथंश्व नाम से विख्यात समस्त पुत्रों को निन्‍दा के लिये इन्होंने नष्ट किया था, इसमें सल्देह नहीं ।!३६-१३९। अपने पुत्रों का विनाश देख नारद का नाश करने के लिए जब प्रभु दक्ष उद्यत हुए तो समस्त ब्रह्मषियों को आगे करके परमेष्ठी पितामह ने दक्ष से इनके लिए याचना की । उस समय दक्ष के साथ पिताभह की यह झछातें तथ हुईं कि 'मेरे उहदेश्य से दी गई कच्या में नारद तुम्हारे पुत्र रूप में उत्पन्न होंगे । तब दक्ष ने अपनी प्रिय कन्या परमेष्ठी को दी, जिसके गर्भ से पुनः भयभीत नारदजी शान्‍्त रूप में उत्पन्न हुए ऐसी बातें सुन उन ऋषियों को बड़ा कौतू हल हुआ । उन्होंने तत्त्वार्थदर्शी, व्याख्याताओं में सर्वश्रेष्ठ सतत से पूछा ।१४०

English

By teaching the path of action and the path of know¬ ledge to different individuals according to their capacity and eligibility, the world has certainly been saved by you whose person is constituted of the revealed word of the supreme Brahman.

अध्याय 103

श्लोक 59

अनसूयोवाच: किं व्यापारस्वरूपास्तु विष्णुरुद्रपितामहाः ।एतद्वै श्रोतुमिच्छामि ह्यशेषं कथयन्तु मे

anasūyovāca: kiṃ vyāpārasvarūpāstu viṣṇurudrapitāmahāḥ / etadvai śrotumicchāmi hyaśeṣaṃ kathayantu me

हिन्दी अर्थ

ऋषियों ने कहा--सूतजी ! महात्मा नारद ने किस लिये प्राचेतस दक्ष प्रजापति के उन पृत्रों एवं प्रजाओं का विनाश किया ? ऋषियों की ऐसी जिज्ञासा भरी कल्याणपूर्ण बातें सुन सुत ने उनसे सबंगुण

English

Hence I would like to ask you, should you be kind and merciful (towards me). With regard to those whose minds are filled with desires only, the fruit ordained for their riles is Svarga (heaven).

अध्याय 103

श्लोक 60

ब्रह्मोवाच: प्रावृट्कालो ह्यहं ब्रह्मा आपश्चैव प्रकीर्तिताः ।मेघरूपो ह्यहं प्रोक्तो वर्षयामि च भूतले

brahmovāca: prāvṛṭkālo hyahaṃ brahmā āpaścaiva prakīrtitāḥ / megharūpo hyahaṃ prokto varṣayāmi ca bhūtale

हिन्दी अर्थ

ते तु तद्चन श्रुत्वा प्रयाता: स्वंतोदिशम् । वायुं तु समनृप्राप्य गतास्ते वे पराभवम् (५१४६ अद्यापि न निवतंन्ते भ्रमन्‍्तो वायुमिश्रिता:। एवं वायुपर्थ प्राप्य अमन्‍्ते ते मह्॒षयः १५० सम्पन्न यह मधुर बातें कहीं। महाबलवान् दक्ष प्रजापति के ह॒र्यश्व नामक प्रजा-सुष्टि की बुद्धि के इच्छुक पत्रों को अपने पास आया देख नारद ने कहा “दक्ष के मूर्ख पूत्रों! तुम लोग भूगोल के तत्त्व को बिल्कुल नहीं जानते, इसके ऊपर क्या है! नीचे क्‍या है ? इसका अन्त कहाँ होता है ? इन सब बातों को बिता जाने बूझे किस तरह प्रजाओं की सृष्टि करोगे ? तुम्हें यह तो मालूम नहीं है कि इस पृथ्वी का क्‍या

English

To those men who have dedicated their minds and souls to Isa (the Lord), the fruit of the action performed is the

अध्याय 103

श्लोक 61

अहं सर्वाणि बीजानि प्राक्सन्ध्यासूदिते रवौ ।एतद्वै कारणं सर्वं रहस्यं कथितं परम्

ahaṃ sarvāṇi bījāni prāksandhyāsūdite ravau / etadvai kāraṇaṃ sarvaṃ rahasyaṃ kathitaṃ param

हिन्दी अर्थ

परिमाण है और इसमें कितनी प्रजाओं की सृष्टि करनी चाहिए बिना जाने मदि सृष्टि कम करोगे तो या अल्पता के अथवा अधिकता के अपराधी होओगे। इसके अतिरिक्त बिना जाने बूझे और क्‍या कर ही सकते हो ।१४४-१४८। नारद की ऐसी बातें सुनकर वे दक्षपुत्र गण सभी दिशाओं की ओर चले गये और वहाँ वायुमण्डल को प्राप्त होकर एकदम शिथिल एवं पराभूत हो गये वायुमण्डल में पहुँचकर वे बेचारे वाय

English

Salvation is the identity with Brahman which is Existence, Knowledge and Bliss. When it is realized whatever is done or left undone, everything comes to an end.

अध्याय 103

श्लोक 62

विष्णुरुवाच: हेमन्तश्च भवेद्विष्णुर्विश्वरूपं चराचरम् ।पालनाय जगत्सर्वं विष्णोर्माहात्म्यमुत्तमम्

viṣṇuruvāca: hemantaśca bhavedviṣṇurviśvarūpaṃ carācaram / pālanāya jagatsarvaṃ viṣṇormāhātmyamuttamam

हिन्दी अर्थ

के साथ घूमते हुए आज तक नहीं लोट सके इस प्रकार नारद की कटपूर्ण बातों में आकर वे महरपिगण वायुमण्डल में भ्रमण करते हैं । अपने उन पुत्रों के नष्ट हो जाने पर प्राचेतस दक्ष ने पुनः वरिणी में एक सहस्न पुत्र उत्पन्न किये। प्रजाओं की वृद्धि के इच्छुक शबलाश्व नाम से विख्यात इस पत्रों से भी नारद ने पुनः अपनी वही पुरानी बातें सुनाई । जिसे सुनकर उब परमतेजस्वी कुमारों ने एक दूसरे से सम्भति की कि महर्षि तारद का कहना ठीक है। अपने पूव॑ज उन बड़े भाइयों की राह पर हम लोगों को बिता किसी सन्देह के चलना चाहिए ।१४६-१५३।॥ भौर इस पृथ्वीमण्डल का प्रमाण आदि समझन-बूझकर तब हम लोग सुखपुर्वेक

English

It is unattached. It is the firmament of knowledge of the nature of wisdom unobscured by Maya. It is free from desire. It is steady (immovable), pure and devoid of Gunas. It is proclaimed to be all-pervading.

अध्याय 103

श्लोक 63

रुद्र उवाच: ग्रीष्मकालो ह्यहं प्रोक्तः सर्वभूतक्षयंकरः ।कर्षयामि जगत्सर्वं रुद्ररूपस्तपस्विनि

rudra uvāca: grīṣmakālo hyahaṃ proktaḥ sarvabhūtakṣayaṃkaraḥ / karṣayāmi jagatsarvaṃ rudrarūpastapasvini

हिन्दी अर्थ

ततः प्रभृति वे भ्राता आतुरम्वेषणे रतः । प्रयातो नश्यति तथा तन्न कार्य विजानता..

English

When products (the created beings, the world) are being destroyed, Brahman (the unchangeable) does not perish, just as the Sun retainsits splendour while the whole world becomes plunged in blinding darkness.

अध्याय 103

श्लोक 64

एवं ब्रह्मा च विष्णुश्च रुद्रश्चैव महाव्रते ।त्रयो देवास्त्रयः सन्ध्यास्त्रयः कालास्त्रयो ऽग्नयः

evaṃ brahmā ca viṣṇuśca rudraścaiva mahāvrate / trayo devāstrayaḥ sandhyāstrayaḥ kālāstrayo 'gnayaḥ

हिन्दी अर्थ

नष्टेयु शबलाश्वेषु दक्ष: क्ुद्धोउभवद्विभुः । नारदं नाशभेहीति गर्भवासं वसेति च तास्तदा प्रतिजग्राह पत्न्यर्थे कश्यप: प्रभुः। धर्म: सोमस्तु भगवांस्तथैवास्ये मह्॒षय: १५८

English

It is with the brilliance of the Satta (the existent Brahman) that the universe is illuminated, in the same way as a piece of iron is ignited by the solar crystal or Arani produces fire.

अध्याय 103

श्लोक 65

तथा ब्रह्मा च विष्णुश्च रुद्रश्चैकात्मतां गतः ।वरं दद्युश्च ते भद्रे यस्त्वया मनसीप्सितम्

tathā brahmā ca viṣṇuśca rudraścaikātmatāṃ gataḥ / varaṃ dadyuśca te bhadre yastvayā manasīpsitam

हिन्दी अर्थ

इमां विसृष्टि दक्षस्य कृत्स्नां यो बेद तत्त्वत:। आयुष्मान्कीतिमान्धन्य: प्रजावांभ्व भवत्युत

English

It manifests in the form of Jlva (the individual soul), Isvara (godhead) etc. and lo! in the form of the universe too! When everything is dissolved the firm, motionless Brahman alone remains.

अध्याय 103

श्लोक 66

अनसूयोवाच: धन्या पुण्या ह्यहं लोके श्लाघ्या वन्द्या च सर्वदा ।ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च प्रसन्नवदनाः शुभाः

anasūyovāca: dhanyā puṇyā hyahaṃ loke ślāghyā vandyā ca sarvadā / brahmā viṣṇuśca rudraśca prasannavadanāḥ śubhāḥ

हिन्दी अर्थ

इति श्रीमहापुराणे वायुप्रोक्ते प्रजापतिबंशानुकीतंन॑ नाम पश्चषष्टितमोउ्ष्याय: प्रजाओं की सृष्टि करेंगे। ऐसा निश्चय कर वे लोग भी विभिन्न दिशाओं की ओर चले मये और आज तक वहाँ से समुद्र में गई हुई नदियों की भाँति लौट नहीं सके। तभी से यदि बड़े भाई को खोजने के लिए छोटा भाई प्रवृत्त होता है तो वह भी नष्ट हो जाता है, बुद्धिमानों को ऐसा नहीं करता चाहिए ।१५४-१५५॥। शवलाइव नामक अपने दूसरे पृत्र-समूहों के नष्ट हो जाने पर परमऐश्वयंशाली दक्ष'

English

This has been decided by you and undoubtedly it must be so. Still I have a desire to know something and have a doubt in my mind.

अध्याय 103

श्लोक 67

यदि तुष्टास्त्रयो देवा दयां कृत्वा ममोपरि ।अस्मिंस्तीर्थे तु सांनिध्याद्वरदाः सन्तु मे सदा

yadi tuṣṭāstrayo devā dayāṃ kṛtvā mamopari / asmiṃstīrthe tu sāṃnidhyādvaradāḥ santu me sadā

हिन्दी अर्थ

प्रजापति ने नारद को शाप दिया कि "तू वष्ट हो जा, अर्थात् मृत्यु को प्राप्त हो और गर्भवास का कष्ट अनुभव कर ॥ इस प्रकार उन शबलाइव नामक महात्मा पृत्रों के नष्ट हो जाने पर प्राचीन काल में यह सर्वप्रसिद्ध बात है कि दक्ष ने उसी वेरिणी के संथोग से साठ परम प्रसिद्ध कन्‍्याओं को उत्पन्न किया। और उन दक्ष- पुत्रियों को प्रभु कश्यप, धर्म, चन्द्रमा तथा अन्यान्य महर्षियों ते अंगीकार किया। दक्षप्रजापति के इस सृष्टि

English

Is there anything greater than this or not? O blessed ones, please tell it, as you have the vision of reality.

अध्याय 103

श्लोक 68

रुद्र उवाच: एवं भवतु ते वाक्यं यत्त्वया प्रार्थितं शुभे ।प्रत्यक्षा वैष्णवी माया एरण्डीनाम नामतः

rudra uvāca: evaṃ bhavatu te vākyaṃ yattvayā prārthitaṃ śubhe / pratyakṣā vaiṣṇavī māyā eraṇḍīnāma nāmataḥ

हिन्दी अर्थ

विस्तार की सम्पूर्ण कथा को जो सत्यरूप में जानता है वह दीर्घायु-सम्पन्न, यशस्वी, धनघान्यादि-सम्पन्न एवं पुत्र-पौत्रादि से संयुक्त रहता है ।१५६-१ ५६। इदमर्घ नास्ति ख. ग. घ. ड, पुस्तकेषु ।

English

The listening to that alone shall be conducive to the success and fruitfulness of my life. 5 '

अध्याय 103

श्लोक 69

यस्या दर्शनमात्रेण नश्यते पापसञ्चयः ।चैत्रमासे तु सम्प्राप्ते अहोरात्रोषितो भवेत्

yasyā darśanamātreṇa naśyate pāpasañcayaḥ / caitramāse tu samprāpte ahorātroṣito bhavet

हिन्दी अर्थ

देवानां दानवानां च देत्यानां चेव सवंशः । उर्त्पात्ति बिस्तरेणह ब्रहि बेवस्वते5स्तरे ॥

English

Very well, O highly intelligent one. You are Visnu, the Atman of all embodied ones. Though unborn, you take up birth and desire to bless the worlds.

अध्याय 103

श्लोक 70

एरण्ड्याः सङ्गमे स्नात्वा ब्रह्महत्यां व्यपोहति ।रात्रौ जागरणं कुर्यात् प्रभाते भोजयेद् द्विजान्

eraṇḍyāḥ saṅgame snātvā brahmahatyāṃ vyapohati / rātrau jāgaraṇaṃ kuryāt prabhāte bhojayed dvijān

हिन्दी अर्थ

धर्मस्थ तावद्क्ष्यामि निसर्ग तं निबोधत । अरुन्धतो वसुर्यामी लम्बा भानुम॑रुत्वती २ संकल्पा च मुहूर्ता च साध्या विश्वा तथेव च्। धर्मंपत्नयो दश त्वेता दक्षः प्राचेतसो ददौ साध्या पुत्रांस्तु धमस्य साध्यान्द्रादश जज्ञिरे । साध्या नाम महाभागाश्छन्दजा यज्ञभागिनः ॥ देवे भ्यस्तान्परान्देवान्देवज्ञा: परिचक्षते ४ ब्रह्मणो व मुखात्सृष्टा जया देवा: प्रजेप्सया । सर्वे मन्त्रशरीरास्ते स्मृता मन्वन्तरेष्विह ३५

English

Otherwise why should you be fettered by the worldly Karmans? It does not affect you. You are untouched for ever by the divine Maya that hides perfect knowledge.

अध्याय 103

श्लोक 71

यथोक्तेन विधानेन पिण्डं दद्याद् यथाविधि ।प्रदक्षिणां ततो दद्याद्धिरण्यं वस्त्रमेव च

yathoktena vidhānena piṇḍaṃ dadyād yathāvidhi / pradakṣiṇāṃ tato dadyāddhiraṇyaṃ vastrameva ca

हिन्दी अर्थ

कश्यप के सन्‍्तानों की सृष्टिकथा

English

You take up forms according to your own will and you withdraw the same at your own will. Only matters accepted by us have been revealed by you in the Purapas, Itihasa (Mahabharata) and the (Brahma) Sutras in various ways. The imperishable Brahman is supreme, the cause (source)

अध्याय 103

श्लोक 72

रजतं च तथा गावो भूमिदानम् अथापि वा ।सर्वं कोटिगुणं प्रोक्तमिति स्वायम्भुवो ऽब्रवीत्

rajataṃ ca tathā gāvo bhūmidānam athāpi vā / sarvaṃ koṭiguṇaṃ proktamiti svāyambhuvo 'bravīt

हिन्दी अर्थ

ऋषियों ने कहा--सूतजी ! अब हम लोगों से बंवस्वत मन्वन्तर में होनेवाले देवताओं, दानवों एवं देत्यों की उत्पत्ति का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये सूत ने कहा--ऋषिवृन्द ! सर्वप्रथम धर्म की प्रजाओं का सृष्टि-क्रम बतला रहा हूँ, सुनिये। अरुन्धती, वसु, यामी, लम्बा, भानु, मरुत्वती, सकलपा, मुहूर्ता साध्या और धर्मा-ये दस धर्म की पत्नियाँ थीं, जिन्हें प्राचेतस दक्ष ने उनके लिये दिया था ।। साध्या ने धर्म के संयोग से बारह पुत्रों को जन्म दिया, जो साध्यगणों के नाम से प्रख्यात हैं। ये महाभाग्यशाली साध्य नामक देवगण हन्‍्दों से उत्पन्न होनेवाले एवं यज्ञ

English

You take up forms according to your own will and you withdraw the same at your own will. Only matters accepted by us have been revealed by you in the Purapas, Itihasa (Mahabharata) and the (Brahma) Sutras in various ways. The imperishable Brahman is supreme, the cause (source)

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_revAkhANDa-of-the-vAyupurANa-rkv.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।