Vayu Purana
162
अध्याय 162 / 232

Adhyaya 162

5 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ5 श्लोक

अध्याय 162

श्लोक 1

॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे सर्पतीर्थमाहात्म्यवर्णनं नामैकषष्ट्युत्तरशततमो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय १६२ श्रीमार्कण्डेय उवाच: गोपेश्वरं ततो गच्छेत् सर्पक्षेत्रादनन्तरम् ।यत्र स्नानेन चैकेन मुच्यन्ते पातकैर्नराः

|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe sarpatīrthamāhātmyavarṇanaṃ nāmaikaṣaṣṭyuttaraśatatamo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 162 śrīmārkaṇḍeya uvāca: gopeśvaraṃ tato gacchet sarpakṣetrādanantaram / yatra snānena caikena mucyante pātakairnarāḥ

हिन्दी अर्थ

महाधृतिसुतो राजा कीतिराजः प्रतापवान् । कीतिराज/त्मजो विद्वान्म हारोमेति विश्रुतः १३

English

She prepared the funeral pyre of her husband, got him placed and lit it and was (about) to enter into the fire,

अध्याय 162

श्लोक 2

तत्र तीर्थे तु यः स्नात्वा कुरुते प्राणसंक्षयम् ।स गच्छेद्यदि युक्तो ऽपि पापेन शिवमन्दिरम्

tatra tīrthe tu yaḥ snātvā kurute prāṇasaṃkṣayam / sa gacchedyadi yukto 'pi pāpena śivamandiram

हिन्दी अर्थ

कर्य सीता समुत्पन्ना कृष्पणमाणा यशस्विनी । किमर्थ चाकृषद्राजा क्षेत्र यस्मिन्बभूव सा बचश्नंत की उत्पत्ति हुई। नन्दिवधत से वीर एवं धामिक सुकेतु की उत्पत्ति हुई ।७। सुकेतु के भी धर्मात्मा एवं महाबलवान् देवरात उत्पन्न हुए । उन देवरात से धर्मात्मा राजा बुह॒दुत्थ की उत्पत्ति सुनी जाती है । राजा बृहदुत्थ के पुश्न परम प्रतापी महावीय॑ नाम से विख्यात थे, महावीयं के पुत्र धृतिमान् थे, उनके पुत्र सुधृति थे । सुधृति के पुत्र परम तपस्वी एवं धर्मात्मा धृष्ठकेतु थे । धुष्टकेतु के पुत्र हुयंइव भी परम विख्यात राजा थे ।5-६ ०

English

In his urVa.fiministercd) poison. Thus she gave (child) alongh the: | t P

अध्याय 162

श्लोक 3

तत्र तीर्थे तु यः स्नात्वा पूजयेद्देवमीश्वरम् ।मुच्यते सर्वपापैश्च रुद्रलोकं स गच्छति

tatra tīrthe tu yaḥ snātvā pūjayeddevamīśvaram / mucyate sarvapāpaiśca rudralokaṃ sa gacchati

हिन्दी अर्थ

हयेदव के पुत्र मह और मर के पृत्र प्रसित्वक हुए । प्रतित्वक के परम धर्मात्मा राजा कीतिरथ थे । राजा कौतिरथ के पुत्र देवमीढ़ नाम से प्रसिद्ध थे। देवमीढ़ के पुत्र विबुध और विबुध के पुत्र धृति हुए 7१-१२! उस राजा महाधति के पुत्र परम प्रतापशाली राजा कीतिराज हुए। कीतिराज के पुत्र परम विद्वान् राजा महारोमा नाम से विष्यात थे । राजा महारोमा के पुत्र स्वर्ण रोमा हुए। स्वर्णरोमा के पुत्र राजा हस्वरोमा हुए। हस्वरोमा के -

English

Being harassed and victimised by the heroic and noble-souled Sagara, all of them desirous of protection sought

अध्याय 162

श्लोक 4

क्रीडित्वा च यथाकामं रुद्रलोके महातपाः ।इह मानुष्यतां प्राप्य राजा भवति धार्मिकः

krīḍitvā ca yathākāmaṃ rudraloke mahātapāḥ / iha mānuṣyatāṃ prāpya rājā bhavati dhārmikaḥ

हिन्दी अर्थ

पुत्र राजा सीरध्वज सुने जाते हैं। उन्‍्हों राजा सीरध्वज के प्रृथ्वी जोतते समय परम यशस्विनी सीता देवी का प्रादुर्भाव हुआ--ऐसी प्रसिद्ध है। वे सीता रामचन्द्र की परम साध्वी पतितन्नरता सदब्नतपरायणा पत्नी शाशपायन बोले--सूत जी ! प्रथ्वी जोतते समय परम यशस्विनी सीता देवी का प्रादुर्भाव किस प्रकार हुआ ? और राजा सीरध्वज किस प्रयोजन वश उस क्षेत्र को जोत रहे थे। जिसमें सीता को उत्पत्ति हुई 7

English

Remembering his own vow and on hearing the words of his preceptor, Sagara put an end to their traditional rites of worship and made them change their dress and apparel. 1

अध्याय 162

श्लोक 5

हस्त्यश्वरथसम्पन्नो दासीदाससमन्वितः ।पूज्यमानो नरेन्द्रैश्च जीवेद्वर्षशतं सुखी

hastyaśvarathasampanno dāsīdāsasamanvitaḥ / pūjyamāno narendraiśca jīvedvarṣaśataṃ sukhī

हिन्दी अर्थ

सीरध्वजात्तु जातस्तु भानुमान्नाम मैथिलः । भ्राता कुशध्वजस्तस्य स काश्याघिपतिन् पः १८ तस्य भानुमतः पुत्र: प्रद्युम्नश्व॒ प्रतापवान् । मुनिस्तस्य सुतश्चाषि तस्मादूर्जवहः स्मृतः ११९

English

He got half of the heads of Sakas shaved and released them. He got the heads of Yavanas and Kambojas comp¬

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_revAkhANDa-of-the-vAyupurANa-rkv.txt · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।