अध्याय 150
श्लोक 1
रामभद्र! मोहिं आपनो सोच है अरु नाहीं ।जीव सकल संतापके भाजन जग माहीं
rāmabhadra! mohiṃ āpano soca hai aru nāhīṃ | jīva sakala saṃtāpake bhājana jaga māhīṃ
अध्याय 150
रामभद्र! मोहिं आपनो सोच है अरु नाहीं ।जीव सकल संतापके भाजन जग माहीं
rāmabhadra! mohiṃ āpano soca hai aru nāhīṃ | jīva sakala saṃtāpake bhājana jaga māhīṃ
अध्याय 150
नातो बड़े समर्थ सों इक ओर किधौं हौं ।तोको मोसे अति घने मोको एकै तूँ
nāto baḍa़e samartha soṃ ika ora kidhauṃ hauṃ | toko mose ati ghane moko ekai tū~
अध्याय 150
बड़ी गलानि हिय हानि है सरबग्य गुसाईं ।कूर कुसेवक कहत हौं सेवककी नाईं
baḍa़ī galāni hiya hāni hai sarabagya gusāīṃ | kūra kusevaka kahata hauṃ sevakakī nāīṃ
अध्याय 150
भलो पोच रामको कहैं मोहि सब नरनारी ।बिगरे सेवक स्वान ज्यों साहिब-सिर गारी
bhalo poca rāmako kahaiṃ mohi saba naranārī | bigare sevaka svāna jyoṃ sāhiba-sira gārī
अध्याय 150
असमंजस मनको मिटै सो उपाय न सूझै ।दीनबंधु! कीजै सोइ बनि परै जो बूझै
asamaṃjasa manako miṭai so upāya na sūjhai | dīnabaṃdhu! kījai soi bani parai jo būjhai
अध्याय 150
बिरुदावली बिलोकिये तिन्हमें कोउ हौं हौं ।तुलसी प्रभुको परिहर्यो सरनागत सो हौं
birudāvalī bilokiye tinhameṃ kou hauṃ hauṃ | tulasī prabhuko pariharyo saranāgata so hauṃ
पाठ सेटिंग्स · Reading settings
भाषा एवं सामग्री · Language and layers
स्रोत: local proofread transcription: Tulsidas's Vinaya Patrika (279 padas), read from page images of a printed edition and proofread. One chapter per pada, stanza numbers as printed. The editor's Hindi bhavartha is not reproduced. · प्राप्त 19/10/2026
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अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)
मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।
पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)
व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।
आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)
प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।
भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)
आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।
समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)
दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)
पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।
Collated against Kashi Nagari Pracharini Sabha critical edition.